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३४ रामलाम

उस सचाईका एक नमूना मात्र है, जिसके लिए वह लिया जाता है। जिस वक्त कोई आदमी बुद्धिपूर्वक अपने अन्दर ईश्वरका दर्शन करता है, उसी वक्त वह अपनी शारीरिक, मानसिक और नैतिक सब व्याधियोसे छूट जाता है। यह कहकर कि हमे प्रत्यक्ष जीवनमे कोई ऐसा आदमी नही मिलता, हम अिस बयानकी सचाइको झूठ नही ठहरा सकते । हा, जिन लोगोको ईश्वर पर विश्वास नही हे, उनके लिओ बेशक मेरी दलील बेकार है।

क्रिश्चियन साअिन्टिस्ट, फेथ-हीलर और साअिको-थेरेपिस्ट अगर चाहे, तो रामनाममे छिपी सचाईकी थोडी गवाही दे सकते है। मै दलील देकर पाठकोको ज्यादा नही बता सकता । जिसने कभी चीनी खाई नही, उसे कैसे समझाये कि चीनी मीठी होती है? उसे तो चीनी चखनेके लिए ही कह सकते है ।

    मेरी कोअी श्रद्धा नही है । बौद्धिक विश्वास होना एक बात है, पर किसी चीजको हृदयसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण कर लेना दूसरी बात है। मै अिस विधानको मजूर करता हू कि रोगमात्र पापका परिणाम है। आदमीको अगर खासी भी आती है, तो वह पापका ही फल है । मेरी अपनी अिस खूनके दबाववाली बीमारीका कारण भी अत्यधिक काम और चिन्ताका बोझ ही तो है । पर सवाल यह है कि मैने क्यो अितना काम और चिन्ता की ? अत्यधिक काम और जल्दबाजी भी तो पाप ही है। मै यह भी खूब जानता हू कि डॉक्टरोसे बचना भी मेरे लिए पूरी तरह सम्भव था। पर ईसाई-विज्ञानने शारीरिक स्वास्थ्य और रोगवाले प्रश्नको जो अितना अधिक महत्त्व दे रखा है, वह मेरी समझमे नही आता।”
 लॉर्ड लोथियनने कहा-“आदमी अगर अितना मान ले कि रोगमात्र पापका ही फल है तो काफी है। गीतामे भी तो कहा है न कि पचेन्द्रियोके विषयोका मनुष्यको त्याग कर देना चाहिये, क्योकि वे माया है। ईश्वर जीवन, प्रेम और स्वास्थ्य है ।”

गाधीजी-“मैने अिसे कुछ दूसरे शब्दोमे रखा है। ईश्वर सत्य है। क्योकि हमारे धर्मग्रथोमे लिखा है कि सिवा सत्यके कुछ है ही नही । अिसीका अर्थ हुआ औीश्वर जीवन है। और islie मै कहता हू कि सत्य और प्रेम ek ही सिक्केकी दो बाजुए है । और प्रेम वह जरिया है, जिसके द्वारा हम सत्यको प्राप्त कर सकते है, जो कि हमारा ध्येय है । ” -

हरिजनसेवक, २९-१-१९३८