पृष्ठ:Ramanama.pdf/५२

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३२ कुदरतके नियम स०-आपके सुझावके मुताबिक रामनामका-सच्चिदानन्दके नामका -मेरा जप चालू है। और उससे मेरी क्षयकी बीमारीमे सुधार भी होने लगा है। यह सही है कि साथमे डॉक्टरी इलाज भी चल रहा है। लेकिन आप कहते है कि युक्ताहार और मिताहारसे मनुष्य बीमारियोसे दूर रहकर अपनी उम्र बढा सकता है। मै तो पिछले २५ बरससे मिताहारी रहता आया हू, फिर भी आज एसी बीमारीका भोग बना हुआ ह । इसे क्या पहले जन्म या इस जन्मकी कमनसीबी कहा जाय ? आप यह भी कहते है कि मनुष्य १२५ बरस जी सकता है । स्वर्गीय महादेवभाईकी आपको बडी जरूरत थी, यह जानते हुए भी भगवानने उन्हें उठा लिया । युक्ताहारी और मिताहारी महादेवभाई आपको ईश्वर-स्वरूप मानकर जीते थे, फिर भी वे खूनके दबावकी बीमारी (ब्लड-प्रेशर) के शिकार बनकर सदाके लिए चल बसे । भगवानका अवतार माने जानेवाले रामकृष्ण परमहस क्षय जैसी कैन्सरकी खतरनाक बीमारीके शिकार होकर कैसे मर गये ? व भी कैन्सरका सामना क्यो न कर सके ? ज० -मै तो स्वास्थ्यकी हिफाजतके जो नियम खुद जानता हू वही बताता ह ।। लेकिन मिताहार या युक्ताहार किसे माना जाय, यह हरएक आदमीको जानना चाहिये। इस बारेमे जिसने बहुतसा साहित्य पढा हो और बहुत विचार किया हो, वह खुद भी इसे जान सकता है। लेकिन इसके यह मानी नही कि एसा ज्ञान या जानकारी शुद्ध और पूरी है। इसीलिए कुछ लोग जिन्दगीको प्रयोगशाला कहते है। कई लोगोके तजरबोको इकट्ठा करना चाहिये और उनमे से जानने लायक बातको लेकर आगे बढना चाहिये । लेकिन एसा करते हुए अगर कामयाबी न मिले, तो भी किसीको दोष नही दिया जा सकता । खुदको भी दोषी नही कहा जा सकता । नियम गलत है, यह कहनेकी भी एकदम हिम्मत न करनी चाहिये। लेकिन अगर हमारी बुद्धिको कोई नियम गलत मालूम हो, तो सही नियम कौनसा है यह बतानेकी ताकत अपनेमे पैदा करके उसका प्रचार करना चाहिये । YY