पृष्ठ:Ramanama.pdf/६३

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 “ राम ! राम ! " ૧૧

                                                                                                                                     “ नई दिल्ली, २९-१-४८                                                       “  चि० किशोरलाल,

“आज प्रार्थना के बाद मैं अपना सारा समय पत्र लिखने मे बिता रहा हूँ। शकरनजी की लडकी के मरने के समाचार यहाँ भेजकर तुमने ठीक किया। मैने उनको पत्र लिख दिया है। मेरे वहा (सेवाग्राम) आने की बात को अभी अनिश्चित् समझना चाहिए। वहा ता० ३ से ता० १२ तक रहने की बात मैं चला रहा है। अगर यह कहा जाय कि दिल्ली में मैंने ‘किया' है, तो प्रतिज्ञा-पालन के लिए मेरा यहा रहना अब जरूरी नहीं है। इसका आधार यहा के मेरे साथियों पर है । शायद कल निश्चय किया जा सकेगा । मेरे आने का मकसद एक तो इस पर विचार करना है कि रचनात्मक काम करनेवाली सारी सस्थाये एक हो सकती है या नहीं, और दूसरे, जमनालालकी पुण्यतिथि मनाना है। मुझ मे ठीक शक्ति आ रही है। इस बार किडनी और लिवर दोनो बिगडे है। मेरी दृष्टि से यह रामनाम मे मेरे विश्वासके कच्चेपन की वजह से है।

                                                                                                                                 दोनोको आशीर्वाद हरिजनसेवक, ८-२-१९४८
                                  
                                                                                  ४०
                                                                             " राम ! राम ! 
       जब गाँधी जी प्रार्थना-सभा के बीच से रस्सियो से घिरे रास्ते मे चलने लगे, तो उन्हों ने प्रार्थना मे शामिल होनेवाले लोगो के नमस्कारों का जवाब देने के लिए लडकियों के कन्धों से अपने हाथ उठा लिए । एकाएक भीड मे से कोई दाहिनी ओर से भीड को चीरता हुआ उस रास्ते पर आया । छोटी मनुने यह सोचा कि वह आदमी बापू के पाँव छूने को आगे बढ रहा हैो इसलिए उसने उसे ऐसा करने के लिए झिडका, क्योंकि प्रार्थना के लिए पहले ही देर हो चुकी थी । उसने रास्ते मे आनेवाले आदमीका हाथ पकड कर उसे रोकने की कोशिश की। लेकिन उसने जोर से मनुको धक्का दिया, जिससे उसके हाथकी आश्रम-भजनावली, माला और बापू का पीकदान नीचे गिर गए। ज्यो ही वह बिखरी हुई चीजो को उठाने के लिए झुकी, वह आदमी बापूके सामने