पृष्ठ:Ramanama.pdf/७४

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रोजके विचार ६७ आश्चर्य है कि वैद्य मरते है, डॉक्टर मरते है, फिर भी उनके पीछे हम भटकते है। लेकिन जो राम मरता नहीं है, हमेशा जिन्दा रहता है और अचूक वैद्य है, उसे हम भूल जाते है। -सेवाग्राम, ३०-१२-४४ इससे भी ज्यादा आश्चर्य यह है कि हम जानते है कि हम भी मरनेवाले तो है ही, बहुत करे तो वैद्यादिकी दवसे शायद हम थोडे दिन और काट सकते है और इसलिए ख्वार होते है। -सेवाग्राम, ३१-१२-४४ इसी तरह बूढे, बच्चे, जवान, धनिक, गरीब, सबको मरते हुए पाते है, तो भी हम सतोपसे बैठना नही चाहते और थोडे दिन जीनेके लिओ रामको छोड सब प्रयत्न करते है। --सेवाग्राम, १-१-'४५ कैसा अच्छा हो कि इतना समझकर हम रामके भरोसे रहकर जो भी व्याधि आवे, उसे बरदाश्त करे और अपना जीवन आनन्दमय बनाकर व्यतीत करे ! --सेवाग्राम, २-१-४५ अगर धार्मिक माना जानेवाला मनुष्य रोगसे दुखी हो, तो समझना चाहिए कि उसमे किसी-न-किसी चीज की कमी है। -सेवाग्राम, २२-४-४५ अगर लाख प्रयत्न करने पर भी मनुष्यका मन अपवित्र रहे, तो रामनाम ही उसका एकमात्र आधार होना चाहिये । -मद्रासके नजदीक पहुचते हुओ, २१-१-४६ मै जितना ज्यादा विचार करता हू, उतना ही ज्यादा यह महसूस करता हू कि ज्ञानके साथ हृदयसे लिया हुआ रामनाम सारी बीमारियोकी रामबाण दवा है । - उरुळी, २२-३-४६ आसक्ति, घृणा वगैरा भी रोग है और वे शारीरिक रोगोसे ज्यादा बुरे है। रामनामके सिवा उनका कोई इलाज नही है। उरुळी, २३-३-४६