पृष्ठ:Sakuntala in Hindi.pdf/१९

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ŚAKUNTALÅ

दुष्य० : (प्रणाम करके ) ब्राह्मणेीं का वचन सिर माथे " ॥

तप० । हे राजा हम यज्ञ के लिये समिध लेने जाते हैं। आगे मालिनी के तट पर गुरू कन्व" का आश्रम दिखाई देता है। आप को अवकाश हो तो वहां चलकर अतिथिसत्कार लीजिये । उस जगह तपस्वियों के धमैकार्य निर्विभ होते ” देखकर आप भी जानोगे " कि मेरी इस भूजा से जिस में प्रत्यच्चा की फटकार के चिहूभूषण हैं कितने में सत्पुरूषों की रक्षा होती है।

दुष्य० । तुम्हारे गुरू आश्रम में है या नहीं ॥

तप० । अपनी पुत्री शकुन्तला को अतिथिसत्कार की आज्ञा देकर उसी की ग्रहदशा निवारने के लिये सोमतीर्थ की गये हैं।॥

दुष्य० । अच्छा" | हम अभी आश्रन के दर्शन को चलते हैं। उस कन्या को भी देखेंगे और वह हमारी भक्ति का प्रभाव महर्षीं से कहेगी ॥

तप० । आप सिधारिये । हम भी अपने कार्य को जाते हैं। (तपस्वी अपने चेले ममेत गया)

दुष्य० । सारथी रय को हांकी । इस पविच आश्रम के दर्शन करके " हम अपना जन्म सफल्म करें ॥

सार० । जो आज्ञा ॥ (रथ बढ़ाया)

दुष्य० । (चारों ओर देखक्रर) कदाचित किसी ने बतलाया न होता ” तो भी यहां हम जान लेते कि अब तपोवन समीप है ॥

सार° । महाराज ऐसें आप ने क्या चिहू देखे ॥

दुष्य० । क्या तुम को " चिहू नहीं दिखाई देते हैं। देखो वृक्षे के नीचे तोतों के मुख से गिरा सुन्यन्न पड़ा है। ठौर ठौर हिंगोट कुटने की चिकनी शिला रखी है। मनुष्यों से हरिण के बचे ऐसे हिल रहे हैं कि हमारा आहट पाकर कुछ भी नहीं चैके। जैसे अपने खेल कूद में मगन थे वैसे ही बने हैं । उधर देखो यज्ञ की सामग्री के छिलके