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[ Act v.
SAKUNTALÀ

दोहा।


धनवैभव तो और ह बहुत धावियन माहि ।
पै मुमजाहित तुम हि में अधिक भेद कलु नाहि ॥



सोरठा।


राषत वन्धु समान या ही ते नुम मबन को।
करत मान समान दुख न काहू देत तो ॥

दुष्य० । इस राग के सुनने से परिश्रमों का दुख मिटकर चित्र नया सा हो गया है ॥

माढव्य । सत्य है । जैसे थके बैल की सव थकावट उस समय उतर जाती है जब लोग कहते हैं कि ये आए बैलों के राजा¹¹

दुष्य०' । (मुसकुराकर)अहामित्र तू यहीं है। आ एकान्त बैठें ॥ (राजा सौर माढय्य दोनों बैठे)

माढ । (कान लगाकर) मित्र संगीतशाला की ओर कान लगाओ। देखो¹² वीन की तान कैसी मधुर मधुर आती है। रानी हंसमती तुम्हारे सुनाने को किसी नये गीत पर अभ्यास कर रही है ॥

दुष्य० । चुप रह । सुनने दे ।

द्वारपाल । (आप ही आप)अभीराजा का ध्यान दृसरी ओर है। कुछ हरकर कहंगा ॥ (अलग चला गया)

(नेपथ्य में राग कालंगमा इकताला)¹³



भ्रमर तुम मधु के चाखनहार
आदम की रसभरी मृदुल मन्नरो ता सो प्रीति अपार ॥
रहसि रहसि नित रस लेवे को धायत है करि नेम।
क्यों कल आई कमल बसेरे किन भूले पारी को प्रेम ॥

दुष्य० । आहा यह गति¹⁴ कैसा प्रेम उपजाती है ।

माढ० । आप ने अर्थ समझ लिया । मेरी समझ में तो नहीं आया । दुष्य० । (मुसक्याकर)एक समय में हंसमती पर आसक्त था। और अब