पृष्ठ:Sakuntala in Hindi.pdf/९६

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80 SAKUNTALA. FACT TI. दुय । अब मैं इस भारी व्यथा को कैसे सहं । जो चाहूं कि प्यारो से स्वप्न में मिलूं तौ नींद नहीं आती । और चित्र में देख कर मन बहलाऊं तो आंसू नहीं देखने देते ॥ मिट । (आप ही प्राप) शकुन्तला को त्यागने का कलङ्क राजा के सिर से अब इस विलाप ने धो दिया ॥ (चतुरिका फिर भाई) चतुरिका । महाराज जब मैं रङ्गों का डिब्बा लेकर चली तभी . . . . ॥ दुष्य। शीघ्रता से तब क्या हुआ ॥ चतु । तभी महारानी वसुमती पिङ्गला को साथ लिये आई और मेरे हाथ से डिवा छीनकर कहा कि डिया ला । इसे मैं ही महाराज को चलकर दूंगी॥ माढ० । भला हुआ जो तू बच आई ॥ चतु० । रानी का वस्त्र एक कांटे के वृक्ष में अटक गया । उसे छुड़ाने में पिङ्गला लगी। तब तक मैं निकल आई ॥ दुष्य० । हे सखा माढव्य मैं रानी वसुमतौ का मान बहुत रखता हूं। इस से गर्वित हो गई है । अब चित्र छुपाने का उपाय कर ॥ माढ० । (साप ही भाप) तुम ही छपा लो तो अच्छा है (यह कह कर पिच को लेका उठा) । (प्रगट) जो तुम मुझे रनवास की ऊंची भीति पर चढ़ा दो तौ इस चित्र को ऐसा छपाऊं कि कोई न देख सके ॥ (बाहर गया) मिश्न। (साप ही पाप) आहा राजा अपने धर्म को कैसा पहचानता है कि यद्यपि दूसरी पर आसक्त है तो भी अपने अगले वचन का निर्वाह करता है ॥ (एक द्वारपाल पत्र हाथ में लिये आया) द्वारपाल । महाराज की जय हो ॥ दुष्य। हारपाल तुम ने इस समय महारानी वसुमती को तो नहीं देखा है ।।