पृष्ठ:Sakuntala in Hindi.pdf/९८

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[ACT VI.
SAKUNTALA.

SAKUNYALA. [ACT VI. प्रजा में जिस किप्ती को किसी प्यारे बांधव का वियोग हो वह दुष्यन्त को अपना धर्म का बांधव समझे ।। बार । यही ढंढोरा हो जायगा ।। (घाहर गया) पन्त सोच में बैठा हुया ! द्वारपाल फिर माया) हार । महाराज आप की आज्ञा की नगर में बड़ी बड़ाई हुई। दुष्य० । (गहरी सांस भरकर) जब कोई बड़ा मनुष्य विना संतान मरता है तो उस की संपत्ति यों ही विराने घर जाती है। यही वृत्तान्त किसी दिन पुरुवंशियों के संचय किये धन का होना है ॥ बार । ईश्वर ऐसा अमङ्गल न करे ॥ (बाहर गया) दुथ । धिक्कार है मुझे कि मैं ने प्राप्त हुए सुख को लात मारी ॥ मिश्र । (साप ही प्राप) निश्चय इस ने यह अपनी निन्दा अपने जी से की होगी। दुप्प । हाय मैं बड़ा अपराधी हू कि मैं ने अपनी धर्मपत्नी को जो किसी दिन पुरुवंश की प्रतिष्ठा होती ऐसे त्याग दिया जैसे कोई अपनी बोई धरती को फल आने के समय छोड़ दे ॥ मिश्र । (आप हो आप) सब ने तो नहीं छोड़ दिया। क्या आश्चर्य है कि फिर तुझे मिले। चतरिका । (आप ही साप) मन्त्री निर्देई ने उत्पात का भरा पत्र भेज राजा को क्या दशा कर दी है । देखो आंसुओं से बहा जाता है। दुष्य । हाय मेरे पितरों को नित्य यह खटका लगा रहता होगा कि जब दुष्यन्त संसार से उठ जायगा तब कौन हम को पिण्ड देगा। मेरे पीछे कौन इस वंश के श्राद्धादिक करेगा। हाय अब तक तो मेरे कुल के निपुत्री पितरों को मेरे हाथ से वस्त्र का निचोड़ा जल तौ भी मिल जाता था। फिर यह भी न मिलेगा। मिश्र । (आप ही जाप) राजा की आंखों पर इस समय मोह का ऐसा अञ्चल पड़ा है मानो सुन्दर दीपक की ज्योति में अंधेरा सूझे ॥