पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/२२

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                श्रीचन्द्रावली

हम जानी ऐसिहि बीतैगी जैसी बीति रही। सो उल्टी कीनी बिघिना ने कछू नाहिं नियही॥ हमै बिसारि अनत रहे मोहन औरै चाल गही। 'हरीचन्द' कहा को है गयो कछु नहिं जात कही॥

                 (रोती है)

बन-(आँखों में आँसू भरके) प्यारी! अरी इतनी क्यो घबराई जाय है,देख तौ सखी खडी हैं सो कहा कहैंगी। चन्द्रा- ये कौन हैं? बन-(वर्षा को दिखाकर) यह मेरी सखी वर्षा है। चन्द्रा- यह वर्षा है तो हा! मेरा वह आनन्द का घन कहॉ है? हा! मेरे प्यारे! प्यारे कहाँ बरस रहे हौ? प्यारे गरजना इधर और बरसना और कहाँ?

 बलि सॉंवरी सूरत मोहनी मूरत
       आॅखिन को कबौं आइ दिखाइए।
  चातक सी मरै प्यासी परी
        इन्है पनिप रुप मुघा कबौं प्याइए॥

पीत पटै बिजुरी से कबौं

       'हरीचन्द जू' घाइ इतै चमकाइए।

इतहू कबौं आइकै आनँद के घन

        नेह को मेह पिया बरसाइए॥
प्यारे! चाहे गरजो चाहे लरजो,इन चातको की तो तुम्हारे बिना और गति ही नही है,क्योंकि फिर यह कौन सुनेगा कि चातक ने दुसरा जल पी लिया;

प्यारे! तुम तो ऐसे करुणा के समुद्र हो कि केवल हमारे एक जाचक के माँगने पर नदी-नद भर देते हो तो चातक के इस छोटे चंचुपुट भरने मे कौन श्रम है;

क्योंकि प्यारे हम दुसरे पक्षी नही है कि किसी भाँति प्यास बुझा लेगे। हमारे तो श्याम घन!तुम्ही अवलम्ब  हौ; हा!
  ( नेत्रों मे जल भर लेती है और तीनो परस्पर चकित होकर देखती है)

बन- सखी,देखि तौ कछू इनकी हू सुन कछू इनकी हू लाज कर। अरी, यह तो नई आई है ये कहा कहैंगी? संध्या-सखी,यह कहा कहै है हम तौ याकौ प्रेम देखि बिन मोल की दासी होय रही हैं और तू पंडिताइन बनिकै ज्ञान रही है।