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श्रीचन्द्रावली

श्रीचन्द्रावली ७३ मलार-मलार राग। झोंटन-पेंग। घन स्याम-काले बादल { धनस्याम-श्रीकृष्ण । घहरि-घरि-गरजने का गम्भीर शब्द करना । इन्द्रधनु-बनमाल-तुलसी, कुद, मदार, परजाता और कमल इन पांच चीजों से वनमाला बनती है। बगमाल-मोतीलर-सर्पद रग होने के कारण दोनों में साम्य है । छहरि-छहरि-छितरा जाती है, चारों ओर फैल जाती है अर्थात् श्रीकृष्ण की शोभा सामने आ जाती है । फहरि-फहरि-फहरना, वायु में उड़ना । चौथा अंक जोगिनी-साधुनी, तपस्विनी । अलख-अलख-अलख-अगोचर, अपत्यक्ष, ईश्वर का एक विशेषण । परमात्मा के नाम पर भिक्षा मांगना, अथवा पुकार कर परमात्मा का स्मरण करना या कराना। आदेश आदेश गुरु को-गुरु की आज्ञा । गुरु की दुहाई देना । बंक-टेढ़ी। छकोहैं-छके हुए (अपने प्रेम-रम के उन्माद के कारण) । कोपन-आँख का कोना । कान छिय-कान छूते है (नेत्रो के बडे होने का चिह्न है)। बारि फेरि जल सबहिं पियें-सब निछावर होते हैं । नागर मनमथ-चतुर काम देव । सेली-वह बद्धी या माला जिसे योगी लोग गले में डालते या सिर में लपेटते है । सोहिनियाँ-सुहावनी, शोभा देनेवाली । मातै-मदमस्त । बिरह-अगिनियाँ-विरहाग्नि । चितवन मद अलसाई-मत्तता के कारण नेत्र अलसाए हुए है । गावत बिरह बधाई-विरह का गीत गाती है । खुमारी-नशा। खुभना-चुभना, घुसना, फँसना ।