प्रेमचंद रचनावली (खण्ड ५)/गबन/चौदह

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प्रेमचंद रचनावली ५  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

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जालपा इस तरह दौड़ी हुई नीचे गई, मानो उसे वहां कोई निधि मिल जायेगी।

आधी रात बीत चुकी थी। रमा आनंद की नींद सो रहा था। जालपा ने छत पर आकर एक बार आकाश की ओर देखा। निर्मल चांदनी छिटकी हुई थी-वह कार्तिक की चांदनी जिसमें संगीत की शांति है, शांति का माधुर्य और माधुर्य का उन्माद। जालपा ने कमरे में आकर अपनी संदूकची खोली और उसमें से वह कांच का चन्द्रहार निकाला जिसे एक दिन पहनकर उसने अपने को धन्य माना था। पर अब इस नए चन्द्रहार के सामने उसकी चमक उसी भांति मंद पड़ गई थी, जैसे इस निर्मल चन्द्रज्योति के सामने तारों का आलोक। उसने उस नकली हार को तोड़ डाला और उसके दानों को नीचे गली में फेंक दिया, उसी भांति जैसे पूजन समाप्त हो जाने के बाद कोई उपासक मिट्टी की मूर्तियों को जल में विसर्जित कर देता है।

चौदह

उस दिन से जालपा के पति- स्नेह में सेवा-भाव का उदय हुआ। वह स्नान करने जाता, तो उसे अपनी धोती चुनी हुई मिलती। आने पर तेल और साबुन भी रक्खा हुआ पाता। जब दफ्तर जाने लगता, तो जालपा उसके कपड़े लाकर सामने रख देती। पहले पान मांगने पर मिलते थे, अब जबरदस्ती खिलाए जाते थे। जालपा उसका रुख देखा करती। उसे कुछ कहने की जरूरत न थी। यहां तक कि जब वह भोजन करने बैटता, तो वह पंखा झला करती। पहले वह बड़ी अनिच्छा में भोजन बनाने जाती थी और उस पर भी बेगार-सी टालती थी। अब बड़े प्रेम से रसोई में जाती। चीजें अब भी वही बनती थीं, पर उनका स्वाद बढ़ गया था। रमा को इस मधुर स्नेह के सामने वह दो गहने बहुत हो तुच्छ जंचते थे।

उधर जिस दिन रमा ने गंगू की दुकान से गहने खरीदे, उसी दिन दूसरे सर्राफों को भी उसके आभूषण -प्रेम की सूचना मिल गई। रमा जब उधर से निकलता तो दोनों तरफ से दुकानदार उठ-उठकर उसे सलाम करते-आइए बाबूजी, पान तो खाके जाइए।दो-एक चीजें हमारी दुकान से तो देखिए।

रमा का आत्म-संयम उसकी साख को और भी बढ़ाता था। यहां तक कि एक दिन एक दलाल रमा के घर पर आ पहुंचा, और उसके नहीं- नहीं करने पर भी अपनी संदूकची खोल ही दी।

रमा ने उससे पीछा छुड़ाने के लिए कहा-भाई, इस वक्त मुझे कुछ नहीं लेना है। क्यों अपना और मेरा समय नष्ट करोगे। दलाल ने बड़े विनीत भाव से कहा-बाबूजी, देख तो लीजिए। पसंद आए तो लीजिएगा, नहीं तो न लीजिएगा। देख लेने में तो कोई हर्ज नहीं है। आखिर रईसों के पास न जायं, तो किसके पास जायं। औरों ने आपसे गहरी रकमें मारी, हमारे भाग्य में भी बदा होगा,तो आपसे चार पैसा पा जाएंगे। बहूजी और माईजी को दिखा लीजिए। मेरा मन तो कहता है कि आज आप ही के हाथों बोहनी होगी।

रमानाथ-औरतों के पसंद की न कहो, चीजें अच्छी होंगी ही। पसंद आते क्या देर लगती है, लेकिन भाई, इस वक्त हाथ खाली है। [ ५२ ]
दलाल हंसकर बोला-बाबूजी, बस ऐसी बात कह देते हैं कि वाह !आपका हुक्म हो जाय तो हजार पांच सौ आपके ऊपर निछावर कर दें। हम लोग आदमी का मिजाज देखते हैं, बाबूजी । भगवान् ने चाहा तो आज मैं सौदा करके ही उठूंगा।

दलाल ने संदूकची से दो चीजें निकाली, एक तो नए फैशन का जड़ाऊ कंगन था और दूसरी कानों का रिंग। दोनों ही चीजें अपूर्व थीं। ऐसी चमक थी मानो दीपक जल रहा हो। दस बजे थे, दयानाथ दफ्तर जा चुके थे, वह भी भोजन करने जा रहा था। समय बिल्कुल न था, लेकिन इन दोनों चीजों को देखकर उसे किसी बात की सुध ही न रही। दोनों केस लिए हुए घर में आया। उसके हाथ में केस देखते ही दोनों स्त्रियां टूट पड़ीं और उन चीजों को निकाल- निकालकर देखने लगीं। उनकी चमक-दमक ने उन्हें ऐसा मोहित कर लिया कि गुण-दोष की विवेचना करने की उनमें शक्ति ही न रही।

जागेश्वरी-आजकल की चीजों के सामने तो पुरानी चीजें कुछ जंचती ही नहीं।

जालपा-मुझे तो उन पुरानी चीजों को देखकर कै आने लगती है। न जाने उन दिनों औरतें कैसे पहनती थीं।

रमा ने मुस्कराकर कहा-तो दोनों चीजें पसंद हैं न?

जालपा-पसंद क्यों नहीं हैं,अम्मांजी, तुम ले लो।

जागेश्वरी ने अपनी मनोव्यथा छिपाने के लिए सिर झुका लिया। जिसका सारा जीवन गृहस्थी की चिंताओं में कट गया, वह आज क्या स्वप्न में भी इन गहनों के पहनने की आशा कर सकती थी । आह । उस दुखिया के जीवन की कोई साध ही न पूरी हुई। पति की आय ही कभी इतनी न हुई कि बाल-बच्चों के पालन-पोषण के उपरांत कुछ बचता। जब से घर की स्वामिनी हुई, तभी से मानो उसकी तपश्चर्या का आरंभ हुआ और सारी लालसाएं एक-एक करके धूल में मिल गईं। उसने उन आभूषणों की ओर से आखें हटा लीं। उनमें इतना आकर्षण था कि उनकी ओर ताकते हुए वह डरती थी। कहीं उसकी विरक्ति का परदा न खुल जाय। बोली- मैं लेकर क्या करूंगी बेटी मेरे पहनने-ओढने के दिन तो निकल गए। कौन लाया है बेटा? क्या दाम हैं इनके?

रमानाथ–एक सर्राफ दिखाने लाया है, अभी दाम-आम नहीं पूछे, मगर ऊंचे दाम होंगे। लेना तो था ही नहीं, दाम पूछकर क्या करता ?

जालपा–लेना ही नहीं था, तो यहां लाए क्यों?

जालपा ने यह शब्द इतने वेश में आकर कहे कि रमा खिसिया गया। उनमें इतनी उत्तेजना, इतना तिरस्कार भरा हुआ था कि इन गहनों को लौटा ले जाने की उसकी हिम्मत न पड़ी। बोला-तो ले लूं?

जालपा-अम्मां लेने ही नही कहतीं तो लेकर क्या करोगे? क्या मुफ्त में दे रहा है?

रमानाथ–समझ लो मुफ्त ही मिलते हैं।

जालपा-सुनती हो अम्माजी, इनकी बातें। आप जाकर लौटा आइए। जब हाथ में रुपये होंगे, तो बहुत गहने मिलेंगे।

जागेश्वरी ने मोहासक्त स्वर में कहा–रुपये अभी तो नहीं मांगता?

जालपा-उधार भी देगा, तो सूद तो लगा ही लेगा?

रमानाथ-तो लौटा दें? एक बात चटपट तय कर डालो। लेना हो, ले लो, न लेना हो, तो
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लौटा दो मोह और दुविधा में न पड़ो।

जालपा को यह स्पष्ट बातचीत इस समय बहुत कठोर लगी। रमा के मुंह से उसे ऐसी आशा न थी। इंकार करना उसका काम था, रमा को लेने के लिए आग्रह करना चाहिए था। जागेश्वरी की ओर लालायित नेत्रों से देखकर बोली-लौटा दो। रात-दिन के तकाजे कौन सहेगा।

वह केसों को बंद करने ही वाली थी कि जागेश्वरी ने कंगन उठाकर पहन लिया, मानो एक क्षण-भर पहनने से ही उसकी साध पूरी हो जायेगी। फिर मन में इस ओछेपन पर लज्जित होकर वह उसे उतारना ही चाहती थी कि रमा ने कहा-अब तुमने पहन लिया है अम्मां, तो पहने रहो। मैं तुम्हें भेंट करता हूं। जागेश्वरी की आंखें जल हो गईं। जो लालसा आज तक ने पूरी हो सकी, वह आज रमा की मातृ-भक्ति से पूरी हो रही थी, लेकिन क्या वह अपने प्रिय पुत्र पर ऋण का इतना भारी बोझ रख देगी ? अभी वह बेचारा बालक है, उसकी सामर्थ्य ही क्या है? न जाने रुपये जल्द हाथ आएं या देर में। दाम भी तो नहीं मालूम। अगर ऊंचे दामों का हुआ, तो बेचारा देगा कहां से? उसे कितने तकाजे सहने पड़ेंगे और कितनी लज्जित होना पड़ेगा। कातर स्वर में बोली- नहीं बेटा, मैंने यों ही पहन लिया था। ले जाओ, लौटा दो।

माता का उदास मुख देखकर रमा का हृदय मातृ-प्रेम से हिल उठा। क्या ऋण के भय से वह अपनी त्यागमूर्ति माता की इतनी सेवा भी न कर सकेगा? माता के प्रति उसका कुछ कर्तव्य भी तो है? बोला-रुपये बहुत मिल जाएंगे अम्मां, तुम इसकी चिंता मत करो।

जागेश्वरी ने बहू की ओर देखा। मानो कह रही थी कि रमा मुझ पर कितना अत्याचार कर रहा है।

जालपा उदासीन भाव से बैठी थी। कदाचित् उसे भय हो रहा था कि माताजी यह कंगन ले न लें। मेरा कंगन पहन लेना बहू को अच्छा नहीं लगा, इसमें जागेश्वरी को संदेह नहीं रहा। उसने तुरंत कंगन उतार डाला, और जालपा की ओर बढ़ाकर बोली- मैं अपनी ओर से तुम्हें भेंट करती हूं, मुझे जो कुछ पहनना-ओढ़ना था, ओढ-पहन चुकी। अब जरा तुम पहनों, देखें।

जालपा को इसमें जरा भी संदेह न था कि माताजी के पास रुपये की कमी नहीं। वह समझी, शायद आज वह पसीज गई हैं और कंगन के रुपए दे देंगी। एक क्षण पहले उसने समझा था कि रुपये रमा को देने पड़ेंगे, इसीलिए इच्छा रहने पर भी वह उसे लौटा देना चाहती थी। जब माताजी उसका दाम चुका रही थीं, तो वह क्यों इंकार करती; मगर ऊपरी मन से बोली-रुपये न हों, तो रहने दीजिए अम्मांजी, अभी कौन जल्दी है?

रमा ने कुछ चिढ़कर कहा-तो तुम यह कंगन ले रही हो?

जालपा-अम्माजी नहीं मानतीं, तो मैं क्या करूं?

रमानाथ-और ये रिंग, इन्हें भी क्यों नहीं रख लेतीं?

जालपा-जाकर दाम तो पूछ आओ।

रमा ने अधीर होकर कहा-तुम इन चीजों को ले जाओ, तुम्हें दाम से क्या मतलब !

रमा ने बाहर आकर दलाल से दाम पूछा तो सन्नाटे में आ गया। कंगन सात सौ के थे, और रिंग डेढ़ सौ के। उसका अनुमान था कि कंगन अधिक-से-अधिक तीन सौ के होंगे और रिंग चालीस-पचास रुपये के। पछताए कि पहले ही दाम क्यों न पूछ लिए, नहीं तो इन चीजों को घर में ले जाने की नौबत ही क्यों आती? फेरते हुए शर्म आती थी; मगर कुछ भी हो, फेरना तो
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पड़ेगा ही। इतना बड़ा बोझ वह सिर पर नहीं ले सकता। दलाल से बोला-बड़े दाम हैं भाई, मैंने तो तीन-चार सौ के भीतर ही आंका था। दलाल का नाम चरनदास था। बोला-दाम में एक कौड़ी फरक पड़ जाय सरकार, तो मुंह न दिखाऊ। धनीराम की कोठी का तो माल है, आप चलकर पूछ लें। दमड़ी रुपये की दलाली अलबत्ता मेरी है, आपकी मरजी हो दीजिए या न दीजिए।

रमानाथ–तो भाई इन दामों की चीजें तो इस वक्त हमें नहीं लेनी हैं।

चरनदास-ऐसी बात न कहिए, बाबूजी । आपके लिए इतने रुपये कौन बड़ी बात है। दो महीने भी माल चल जाय तो उसके दूने हाथ आ जायेंगे। आपसे बढ़कर कौन शौकीन होगा। यह सब रईसों के ही पसंद की चीजें हैं। गंवार लोग इनकी कद्र क्या जानें।

रमानाथ-साढ़े आठ सौ बहुत होते हैं भई ।

चरनदास–रुपये का मुंह न देखिए बाबूजी, जब बहूजी पहनकर बैठेगी, तो एक निगाह में सारे रुपये तर जायंगे।

रमा को विश्वास था कि जालपा गहनों का यह मूल्य सुनकर आप ही बिचक जायेगी।

दलाल से और ज्यादा बातचीत न की। अंदर जाकर बड़े जोर से हंसा और बोला-आपने इस कंगन का क्या दाम समझा था, मांजी?

जागेश्वरी कोई जवाब देकर बेवकूफ न बनना चाहती थी-इन जड़ाऊ चीजों में नाप-तौल का तो कुछ हिसाब रहता नहीं जितने में तै हो जाय, वही ठीक है।

रमानाथ-अच्छा, तुम बताओ जालपा, इस कंगन का कितना दाम आंकती हो?

जालपा-छ: सौ से कम का नहीं।

रमा का सारा खेल बिगड़ गया। दाम का भय दिखाकर रमा ने जालपा को डरा देना चाहा था, मगर छ: और सात में बहुत थोड़ा ही अंतर था। और संभव है चरनदास इतने ही पर राजी हो जाय। कुछ झेंपकर बोला-कच्चे नगीने नहीं हैं।

जालपा–कुछ भी हो, छ: सौ से ज्यादा का नहीं।

रमानाथ-और रिंग का? ।

जालपा-अधिक से अधिक सौ रुपये।

रमानाथ-यहां भी चूकीं, डेढ़ सौ मांगता है।

जालपा-जट्टू है कोई, हमें इन दामों लेना ही नहीं।

रमा की चाल उल्टी पड़ी, जालपा को इन चीजों के मूल्य के विषय में बहुत धोखा न हुआ था। आखिर रमा की आर्थिक दशा तो उससे छिपी न थी, फिर वह सात सौ रुपये की चीजों के लिए मुंह खोले बैठी थी। रमा को क्या मालूम था कि जालपा कुछ और ही समझकर कंगन पर लहराई थी। अब तो गला छूटने का एक ही उपाय था और वह यह कि दलाल छ: सौ पर राजी न हो। बोला-वह साढे आठ से कौड़ी कम न लेगा।

जालपा-तो लौटा दो।

रमानाथ-मुझे तो लौटाते शर्म आती है। अम्मां, जरा आप ही दालान में चलकर कह दें, हमें सात सौ से ज्यादा नहीं देना है। देना होता तो दे दो, नहीं चले जाओ।

जागेश्वरी–हां रे, क्यों नहीं, उस दलाल से मैं बातें करने जाऊं ।

जालपा-तुम्हीं क्यों नहीं कह देते, इसमें तो कोई शर्म की बात नहीं। [ ५५ ]रमानाथ-मुझसे साफ जवाब न देते बनेगा। दुनिया भर की खुशामद करेगा। चुनी चुना-आप बड़े आदमी हैं, रईस हैं, राजा हैं। आपके लिए डेढ़ सौ क्या चीज है। मैं उसकी बातों में आ जाऊंगा।

जालपा–अच्छा, चलो मैं ही कहे देती हूं।

रमानाथ-वाह, फिर तो सब काम ही बन गया।

रमा पीछे दुबक गया। जालपा दालान में आकर बोली- जरा यहां आना जी, ओ सर्राफ । लूटने आए हो, या माल बेचने आए हो । चरनदास बरामदे से उठकर द्वार पर आया और बोला-क्या हुक्म है, सरकार?

जालपा–माल बेचने आते हो, या जटने आते हो? सात सौ रुपये कंगन के मांगते हो?

चरनदास-सात सौ तो उसको कारीगरी के दाम हैं, हुजूर ।

जालपा–अच्छा तो जो उस पर सात सौ निछावर कर दें, उसके पास ले जाओ। रिंग के डेढ़ सौ कहते हो, लूट है क्या? मैं तो दोनों चीजों के सात सौ से अधिक न दूंगी।

चरनदास-बहूजी, आप तो अंधेर करती हैं। कहां साढ़े आठ सौ और कहां सात सौ?

जालपा–तुम्हारी खुशी, अपनी चीज ले जाओ।

चरनदास-इतने बड़े दरबार में आकर चीज लौटा ले जाऊं? आप या ही पहनें। दस-पांच रुपये की बात होती, तो आपकी ज़बान से फेरता। आपसे झठ नहीं कहता बहूजी, इन चीजों पर पैसा रुपया नफा है। उसी एक पैसे में दुकान का भाड़ा, बट्टा-खाता, दस्तूरी, दलाली सब समझिए। एक बात ऐसी समझकर कहिए कि हमें भी चार पैसे मिल जाएं। सवेरे-सवेरे लौटना ने पड़े।

जालपा-कह दिए,वहीं सात सौ।

चरनदास ने ऐसा मुंह बनाया, मानो वह किसी धर्म-संकट में पड़ गया है। फिर बोला-सरकार हैं तो घाटा ही, पर आपकी बात नहीं टालते बनती। रुपये कब मिलेंगे?

जालपा-जल्दी ही मिल जायंगे।

जालपा अंदर जाकर बोली-आखिर दिया कि नहीं सात सौ में डेढ़ सौ साफ उडाए लिए जाता था। मुझे पछतावा हो रहा है कि कुछ और कम क्यों न कही। वे लोग इसी तरह गाहकों को लूटते हैं।

रमा इतना भारी बोझ लेते घबरा रहा था, लेकिन परिस्थिति ने कुछ ऐसा रंग पकड़ा कि बोझ उस पर लद ही गया।

जालपा तो खुशी की उमंग में दोनों चीजें लिए ऊपर चली गई, पर रमा सिर झुकाए चिंता में डूबा खड़ा था। जालपा ने उसकी दशा जानकर भी इन चीजों को क्यों ठुकरा नहीं दिया, क्यों जोर देकर नहीं कहा मैं न लेंगी, क्यों दुविधे में पड़ी रही। साढ़े पांच सौ भी चुकाना मुश्किल था, इतने और कहां से आएंगे। असल में गलती मेरी ही है। मुझे दलाल को दरवाजे से ही दुत्कार देना चाहिए था।

लेकिन उसने मन को समझाया। यह अपने हो गों का तो प्रायश्चित है। फिर आदमी इसीलिए तो कमाता है। रोटियों के लाले थोड़े ही थे?

भोजन करके जब रमा ऊपर कपड़े पहनने गया, तो जलपा आईने के सामने खड़ी कानों में रिंग पहन रही थी। उसे देखते ही बोली-आज किसी अच्छे का मुंह देखकर उठी थी। दो [ ५६ ]
चीजें मुफ्त हाथ आ गई।

रमा ने विस्मय से पूछा-मुफ्त क्यों? रुपये न देने पड़ेंगे?

जालपा-रुपये तो अम्मांजी देंगी?

रमानाथ-क्या कुछ कहती थीं?

जालपा-उन्होंने मुझे भेंट दिए हैं, तो रुपये कौन देगा?

रमा ने उसके भोलेपन पर मुस्कराकर कहा-यही समझकर तुमने यह चींजे ले लीं ? अम्मा को देना होता तो उसी वक्त दे देतीं जब गहने चोरी गए थे। क्या उनके पास रुपये न थे?

जालपा असमंजस में पड़कर बोली-तो मुझे क्या मालूम था। अब भी तो लौटा सकते हो। कह देना, जिसके लिए लिया था, उसे पसंद नहीं आया।

यह कहकर उसने तुरंत कानों से रिंग निकाल लिए। कगन भी उतार डाले और दोनों चीजें केस में रखकर उसकी तरफ इस तरह बढ़ाई, जैसे कोई बिल्ली चूहे से खेल रही हो। वह चूहे को अपनी पकड़ से बाहर नहीं होने देती। उसे छोड़कर भी नहीं छोड़ती। हाथों को फैलाने का साहस नहीं होता था। क्या उसके हृदय की भी यही दशा न थी? उसके मुख पर हवाइयां उड़ रही थीं। क्यों वह रमा की और न देखकर भूमि की ओर देख रही थी ? क्यों सिर ऊपर न उठाती थी? किसी संकट से बच जाने में जो हार्दिक आनंद होता है, वह कहां था? उसकी दशा ठीक उस माता की-सी थी, जो अपने बालक को विदेश जाने की अनुमति दे रही हो। वही विवशता, वही कातरता, वहीं ममता इस समय जालपा के मुख़ पर उदय हो रही थी।

रमा उसके हाथ से केसों को ले सके, इतना कड़ा संयम उसमें न था। उसे तकाजे सहना, लज्जित होना, मुंह छिपाए फिरना, चिंता की आग में जलना, सब कुछ सहना मजूर था। ऐसा काम करना नामंजूर था जिससे जालपा का दिल टूट जाए, वह अपने को आभागिन समझने लगे। उसका सारा ज्ञान, सारी चेष्टा, मारा विवेक इस आघात का विरोध करने लगा। प्रेम और परिस्थितियों के संघर्ष में प्रेम ने विजय पाई।

उसने मुस्कराकर कहा-रहने दो, अब ले लिया है, तो क्या लौटाएं। अम्माजी भी हँसेगी।

जालपा ने बनावटी कांपते हुए कंठ में कहा-अपनी चादर देखकर ही पांव फेलाना चाहिए। एक नई विपत्ति मोल लेने की क्या जरूरत है।

रमा ने मानो जल में डूबते हुए कहा-ईश्वर मालिक हैं। और तुरंत नीचे चला गया।

हम क्षणिक मोह और संकोच में पड़कर अपने जीवन के सुख और शांति का कैसे होम कर देते हैं । अगर जालपा मोह के इस झोंके में अपने को स्थिर रख सकती, अगर रमा संकोच के आगे सिर न झुका देता, दोनों के हृदय में प्रेम का सच्चा प्रकाश होता, तो वे पथ-भ्रष्ट होकर सर्वनाश की ओर न जाते।

ग्यारह बज गए थे। दफ्तर के लिए देर हो रही थी, पर रमा इस तरह जा रहा था, जैसे कोई अपने प्रिय बंधु की दाह-क्रिया करके लौट रहा हो। [ ५७ ]

पंद्रह

जालपा अब वह एकांतवासिनी रमणी न थी, जो दिन-भर मुंह लपेटे उदास पड़ी रहती थी। उसे अब घर में बैठना अच्छा नहीं लगता था। अब तक तो वह मजबूर थी, कहीं आ-जा न सकती थी। अब ईश्वर की दया से उसके पास भी गहने हो गए थे। फिर वह क्यों मन मारे घर में पड़ी रहती। वस्त्राभूषण कोई मिठाई तो नहीं जिसका स्वाद एकांत में लिया जा सके। आभूषणों को संदूकचों में बंद करके रखने से क्या फायदा। मुहल्ले या बिरादरी में कहीं से बुलावा आता, तो वह सास के साथ अवश्य जाती। कुछ दिनों के बाद सास की जरूरत भी न रही। वह अकेली आने-जाने लगी। फिर कार्य प्रयोजन की कैद भी नहीं रही। उसके रूप-लावण्य, वस्त्र आभूषण और शील-विनय ने मुहल्ले की स्त्रियों में उसे जल्दी ही सम्मान के पद पर पहुंचा दिया। उसके बिना मंडली सुनी रहती थी। उसका कंठ-स्वर इतना कोमल था,भाषण इतना मधुर, छवि इतनी अनुपम कि वह मंडली की रानी मालूम होती थी। उसके आने से मुहल्ले के नारी जीवन में जान-सी पड़ गई। नित्य ही कहीं-न-कहीं जमा हो जाता। घंटे-दो घंटे गा-बजाकर या गपशप करके रमणियां दिल बहला लिया करतीं। कभी किसी के घर, कभी किसी के घर, फागुन में पंद्रह दिन बराबर गाना होता रहा। जालपा ने जैसा रूप पाया था, वैसा ही उदार हृदय भी पाया था। पान-पत्ते का खर्च प्राय: उसी के मत्थे पडता। कभी-कभी गायनें बुलाई जातीं, उनकी सेवा सत्कार का भार उसी पर था। कभी -कभी वह स्त्रियों के साथ गंगा-स्नान करने जाती, तांगे का किराया और गंगा-तट पर जलपान का ख़र्च भी उसके मत्थे जाता। इस तरह उसके दो तीन रुपये रोज उड़ जाते थे। रमा आदर्श पति था। जालपा अगर मांगती तो प्राण तक उसके चरणों पर रख देता। रुपये की हकीकत ही क्या थी? उसका मुंह जोहता रहता था। जालपा उससे इन जमघटों की राज चर्चा करती। उसकी स्त्री-समाज में कितना आदर-सम्मान है, यह देखकर वह फूला न समाता था।

एक दिन इस मंडली को सिनेमा देखने की धुन सवार हुई। वहां की बहार देखकर सब-की-सब मुग्ध हो गई। फिर तो आए दिन सिनेमा की सैर होने लगी। रमा को अब तक सिनेमा का शौक न था। शौक होता भी तो क्या करता। अब हाथ पैसे आने लगे, उस पर जालपा का आग्रह, फिर भला वह क्यों न जाता? सिनेमागृह में ऐसी कितनी ही रमणियां मिलतीं, जो मुंह खोले नि:संकोच हंसती-बोलती रहती थीं। उनकी आजादी गुप्तरूप से जालपा पर भी जादू डालती जाती थी। वह घर से बाहर निकलते ही मुंह खोल लेती; मगर संकोचवश परदेवाली स्त्रियों के ही स्थान पर बैठती। उसकी कितनी इच्छा होती कि रमा भी उसके साथ बैठता। आख़िर वह उन फैशनेबुल औरतों से किस बात में कम है? रूप-रंग में वह हेठी नहीं। सजधज में किसी से कम नहीं। बातचीत करने में कुशल। फिर वह क्यों परदेवालियों के साथ बैठे। रम्रा बहुत शिक्षित न होने पर भी देश और काल के प्रभाव से उदार था। पहले तो वह परदे का ऐसा अनन्य भक्त था, कि माता को कभी गंगा-स्नान कराने लिवा जाता, तो पंडों तक से न बोलने देता। कभी माता की हंसी मर्दाने में सुनाई देती, आकर बिगड़ता-तुमको जरा भी शर्म नहीं है अम्मां बाहर लोग बैठे हुए हैं, और तुम हंस रही हो। मां लज्जित हो जाती थीं। किंतु अवस्था के साथ रमा का यह लिहाज गायब होता जाता था। उस पर जालपा की रूप-छटा उसके साहस को और भी उत्तेजित करती थी। जालपा रूपहीन, काली-कलूटी, फूहड़ होती तो