प्रेमचंद रचनावली (खण्ड ५)/गबन/तेंतालीस

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प्रेमचंद रचनावली ५  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

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रास्ते में और कोई बातचीत न हुई। जालपा का मन अपनी हार मानने के लिए किसी तरह राजी न होता था। वह परास्त होकर भी दर्शक की भांति यह अभिनय देखने से संतुष्ट न हो। सकती थी। वह उस अभिनय में सम्मिलित होने और अपना पार्ट खेलने के लिए विवश हो रही थी। क्या एक बार फिर रमा से मुलाकात न होगी? उसके हृदय में उन जलते हुए शब्दों का एक सागर उमड़ रहा था, जो वह उससे कहना चाहती थी। उसे रमा पर जरा भी दया न आती थी,उससे रत्ती भर सहानुभूति न होती थी। वह उससे कहना चाहती थी-तुम्हारा धन और वैभव तुम्हें मुबारक हो,जालपा उसे पैरों से ठुकराती है। तुम्हारे खून से रंगे हुए हाथ के स्पर्श से मेरी देह में छाले पड़ जाएंगे। जिसने धन और पद के लिए अपनी आत्मा बेच दी, उसे मैं मनुष्य नहीं समझती। तुम मनुष्य नहीं हो तुम पशु भी नहीं,तुम कायर हो । कायर ।

जालपा का मुखमंडल तेजमय हो गया। गर्व से उसकी गर्दन तन गई। यह शायद समझते होंगे, जालपा जिस वक्त मुझे झब्बेदार पगड़ी बांधे घोड़े पर सवार देखेगी, फूली न समाएगी। जालपा इतनी नीच नहीं है। तुम घोड़े पर नहीं,आसमान में उड़ो,मेरी आंखों में हत्यारे हो, पूरे हत्यारे,जिसने अपनी जान बचाने के लिए इतने आदमियों की गर्दन पर छुरी चलाई । मैंने चलते-चलते समझाया था,उसका कुछ असर न हुआ । ओह,तुम इतने धन-लोलुप हो,इतने लोभी । कोई हजर नहीं। जालपा अपने पालन और रक्षा के लिए तुम्हारी मुहताज नहीं। इन्हीं संतप्त भावनाओं में डूबी हुई जालपा घर पहुंची।

तेंतालीस

एक महीना गुजर गया। जालपा कई दिन तक बहुत विकल रही। कई बार उन्माद-सा हुआ कि अभी सारी कथा किसी पत्र में छपवा दें,सारी कलई खोल दूं, सारे हवाई किले ढा दें पर यह सभी उद्वेग शांत हो गए। आत्मा को गहराइयों में छिपी हुई कोई शक्ति उसकी जबान बंद कर देती थी। रमा को उसने हृदय से निकाल दिया था। उसके प्रति अब उसे क्रोध न था,द्वेष न था, दया भी न थी, केवल उदासीनता थी। उसके मर जाने की सूचना पाकर भी शायद वह न रोती। हां,इसे ईश्वरीय विधान की एक लीला, माया का एक निर्मम हास्य, एक क्रूर क्रीड़ा समझकर थोड़ी देर के लिए वह दुखी हो जाती। प्रणय का वह बंधन जो उसके गले में दो ढाई साल पहले पड़ा था, टूट चुका था। पर उसका निशान बाकी था। रमा को इस बीच में उसने कई बार मोटर पर अपने घर के सामने से जाते देखी। उसकी आंखें किसी को खोजती हुई मालूम होती थीं। उन आंखों में कुछ लज्जा थी, कुछ क्षमा-याचना,पर जालपा ने कभी उसकी तरफ आंखें न उठाईं। वह शायद इस वक्त आकर उसके पैरों पर पड़ता,तो भी वह उसकी ओर न ताकती। रमा की इस घृणित कायरता और महान् स्वार्थपरता ने जालपा के हृदय को मानो चीर डाला था, फिर भी उस प्रणय-बंधन का निशान अभी बना हुआ था। रमा की वह प्रेम-विह्वल मूर्ति, जिसे देखकर एक दिन वह गद्गद हो जाती थी, कभी-कभी उसके हृदय में छाए हुए अंधेरे में क्षीण, मलिन, निरनिंद ज्योत्स्ना की भांति प्रवेश करती, और एक क्षण के लिए वह स्मृतियां विलाप कर [ १९३ ]
उठती। फिर उसी अंधकार और नीरवता का परदा पड़ जाता। उसके लिए भविष्य की मृदु स्मृतियां न थीं, केवल कठोर, नीरस वर्तमान विकराल रूप से खड़ा घूर रहा था।

वह जालपा, जो अपने घर बात-बात पर मान किया करती थी, अब सेवा, त्याग और सहिष्णुता की मूर्ति थी।जग्गो मना करती रहती, पर वह मुंह-अंधेरे सारे घर में झाडू लगा आती, चौका-बरतन कर डालती, आटा गंधकर रख देती, चूल्हा जला देती। तब बुढ़िया का काम केवल रोटियां सेंकना था। छूत-विचार को थी उसने ताक पर रख दिया था। बुढिया उसे ठेल-ठालकर रसोई में ले जाती और कुछ न कुछ खिला देती। दोनों में मां-बेटी का-सा प्रेम हो गया था।

मुकदमे की सब कार्रवाई समाप्त हो चुकी थी। दोनों पक्ष के वकीलों की बहस हो चुकी थी। केवल फैसला सुनाना बाकी था। आज उसकी तारीख थी। आज बड़े सबेरे घर के कामधंधों से फुरसत पाकर जालपा दैनिक-पत्र वाले की आवाज पर कान लगाए बैठी थी, मानो आज उसी का भाग्य-निर्णय होने वाला है। इतने में देवीदीन ने पत्र लाकर उसके सामने रख दिया। जालपा पत्र पर टूट पड़ी और फैसला पढ़ने लगी। फैसला क्या था, एक खयाली कहानी थी, जिसका प्रधान नायक रमा था। जज ने बार-बार उसकी प्रशंसा की थी। सारा अभियोग उसी के बयान पर अवलंबित था।

देवीदीन ने पूछा-फैसला छपा है?

जालपा ने पत्र पढ़ते हुए कहा-हां, है तो ।

'किसकी सजा हुई?'

'कोई नहीं छूटा। एक को फांसी की सजा मिली। पांच को दस-दस साल और आठ को पांच-पांच साल। उसी दिनेश को फांसी हुई।'

यह कहकर उसने समाचार-पत्र रख दिया और एक लंबी सांस लेकर बोली-इन बेचारों के बाल-बच्चों का न जाने क्या हाल होगा।

देवीदीन ने तत्परता से कहा-तुमने जिस दिन मुझसे कहा था, उसी दिन से मैं इन बातों का पता लगा रहा हूँ। आठ आदमियों को तो अभी तक ब्याह ही नहीं हुआ और उनके घर वाले मजे में हैं। किसी बात की तकलीफ नहीं है। पांच आदमियों का विवाह तो हो गया है, पर घर के खुश हैं। किसी के घर रोजगार होता है,कोई जमींदार है,किसी के बाप-चचा नौकर हैं। मैंने कई आदमियों से पूछा। यहां कुछ चंदा भी किया गया है। अगर उनके घर वाले लेना चाहें तो तो दिया जायेगा। खाली दिनेस तबाह है। दो छोटे-छोटे बच्चे हैं,बुढिया,मां और औरत। यहां किसी स्कूल में मास्टर था। एक मकान किराए पर लेकर रहता था। उसकी खराबी है।

जालपा ने पूछा-उसके घर का पता लगा सकते हो?

'हां, उसका पता कौन मुसकिल है?'

जालपा ने याचना-भाव से कहा-तो कब चलोगे? मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी। अभी तो वक्त है। चलो, जरा देखें।

देवीदीन ने आपत्ति करके कहा—पहले मैं देख तो आऊं। इस तरह उटक्करलैस मेरे साथ कहां-कहां दौड़ती फिरोगी?

जालपा ने मन को दबाकर लाचारी से सिर झुका लिया और कुछ न बोलो। देवीदीन चला गया। जालपा फिर समाचार-पत्र देखने लगी;पर उसका ध्यान दिनेश की [ १९४ ]
ओर लगा हुआ था। बेचारा फांसी पा जायेगा। जिस वक्त उसने फांसी का हुक्म सुना होगा, उसकी क्या दशा हुई होगी। उसकी बूढ़ी मां और स्त्री यह खबर सुनकर छाती पीटने लगी होंगी। बेचारा स्कूल-मास्टर ही तो था, मुश्किल से रोटियां चलती होंगी। और क्या सहारा होगा? उनकी विपत्ति की कल्पना करके उसे रमा के प्रति उत्तेजनापूर्ण घृणा हुई कि वह उदासीन न रह सकी। उसके मन में ऐसा उद्वेग उठा कि इस वक्त वह आ जाये तो ऐसा धिक्कारू कि वह भी याद करें। तुम मनुष्य हो । कभी नहीं। तुम मनुष्य के रूप में राक्षस हो, राक्षस ! तुम इतने नीच हो कि उसको प्रकट करने के लिए कोई शब्द नहीं है। तुम इतने नीच हो कि आज कमीने से कमीना आदमी भी तुम्हारे ऊपर थूक रहा है। तुम्हें किसी ने पहले ही क्यों न मार डाला। इन आदमियों की जान तो जाती ही; पर तुम्हारे मुंह में तो कालिख न लगती। तुम्हारा इतना पतन हुआ कैसे । जिसका पिता इतना सच्चा, इतना ईमानदार हो; वह इतना लोभी, इतना कायर ।

शाम हो गई, पर देवीदीन न आया। जालपा बार-बार खिड़की पर खड़ी हो-होकर इधर-उधर देखती थी; पर देवीदीन का पता न था। धीरे-धीरे आठ बज गए और देवी न लौटा। सहसा एक मोटर द्वार पर आकर रुकी और रमा ने उतरकर जग्गो से पूछा-सब कुशल-मंगल है। ने दादी ! दादा कहां गए हैं।

जग्गो ने एक बार उसकी ओर देखा और मुंह फेर लिया। केवल इतना बोलीं-कहीं गए होंगे; मैं नहीं जानती।

रमा ने सोने की चार चूड़ियां जेब से निकालकर जग्गो के पैरों पर रख दीं और बोला—यह तुम्हारे लिए लाया हूँ दादी, पहनो, ढीली तो नहीं हैं?

जागो ने चूड़ियां उठाकर जमीन पर पटक दीं और आंखें निकालकर बोली-जहां इतना पाप समा सकता है, वहां चार चूड़ियों की जगह नहीं है । भगवान् की दया से बहुत चूड़ियां पहन चुकी और अब भी सेर-दो सेर सोना पड़ा होगा, लेकिन जो खाया, पहना, अपनी मिहनत की कमाई से, किसी का गला नहीं दबाया, पाप की गठरी सिर पर नहीं लादी, नीयत नहीं बिगाड़ी। उस कोख में आग लगे जिसने तुम-जैसे कपूत को जन्म दिया। यह पाप की कमाई लेकर तुम बहू को देने आए होगे । समझते होगे, तुम्हारे रुपयों की थैली देखकर वह लट्टू हो जाएगी। इतने दिन उसके साथ रहकर भी तुम्हारी लोभी आंखें उसे न पहचान सकीं। तुम जैसे राक्षस उस देवी के जोग न थे। अगर अपनी कुसल चाहते हो, तो इन्हीं पैरों जहां से आए हो वहीं लौट जाओ, उसके सामने जाकर क्यों अपना पानी उतरवाओगे। तुम आज पुलिस के हाथों जख्मी होकर, मार खाकर आए होते, तुम्हें सजा हो गई होती, तुम जेहल में डाल दिए गए होते तो बहू तुम्हारी पूजा करती, तुम्हारे चरन धो-धोकर पीती। वह उन औरतों में है जो चाहे मजूरी करे, उपास करें, फटे-चीथड़े पहनें, पर किसी की बुराई नहीं देख सकतीं। अगर तुम मेरे लड़के होते, तो तुम्हें जहर दे देती। क्यों खड़े मुझे जला रहे रहे हो। चले क्यों नहीं जाते। मैंने तुमसे कुछ ले तो नहीं लिया है।

रमा सिर झुकाए चुपचाप सुनता रहा। तब हित स्वर में बोला-दादी,मैंने बुराई की है। और इसके लिए मरते दम तक लज्जिते रहूंगा; लेकिन तुम मुझे जितना नीच समझ रही हो,उतना नीच नहीं है। अगर तुम्हें मालूम होता कि पुलिस ने मेरे साथ कैसी-कैसी सख्तियां कीं, [ १९५ ]
मुझे कैसी-कैसी धमकियां दीं, तो तुम मुझे राक्षस न कहतीं।

जालपा के कानों में इन आवाजों की भनक पड़ी। उसने जीने से झांककर देखा। रमानाथ खड़ा था। सिर पर बनारसी रेशमी साफा था, रेशम का बढ़िया कोट, आंखों पर सुनहली ऐनक। इस एक ही महीने में उसकी देह निखर आई थी। रंग भी अधिक गोरा हो गया था। ऐसी कति उसके चेहरे पर कभी न दिखाई दी थी। उसके अंतिम शब्द जालपा के कानों में पड़ गए, बाज की तरह टूटकर धम-धमकरती हुई नीचे आई और जहर में बुझे हुए नेत्रबाणों का उस पर प्रहार करती हुई बोली-अगर तुम सख्तियों और धमकियों से इतना दब सकते हो, तो तुम कायर हो। तुम्हें अपने को मनुष्य कहने का कोई अधिकार नहीं। क्या सख्तियों की थीं? जरा सुनें । लोगों ने तो हंसते-हंसते सिर कटा लिए हैं, अपने बेटों को मरते देखा है, कोल्हू में पेले जाना मंजूर किया है, पर सच्चाई से जौ-भर भी नहीं हटे। तुम भी तो आदमी हो, तुम क्यों धमकी में आ मए? क्यों नहीं छाती खोलकर खड़े हो गए कि इसे गोली का निशाना बना लो, पर मैं झूठ न बोलूंगा। क्यों नहीं सिर झुका दिया? देह के भीतर इसीलिए आत्मा रक्खी गई है कि देह उसकी रक्षा करे। इसलिए नहीं कि उसका सर्वनाश कर दे। इस पाप का क्या पुरस्कार मिला? जरा मालूम तो हो ।

रमा न दबी हुई आवाज से कहा-अभी तो कुछ नहीं।

जालपा ने सर्पिणी की भांति हुंकारकर कहा-यह सुनकर मुझे बड़ी खुशी हुई। ईश्वर करे, तुम्हें मुंह में कालिख लगाकर भी कुछ न मिले। मेरी यह सच्चे दिल से प्रार्थना है, लेकिन नहीं, तुम-जैसे मोम के पुतलों को पुलिस वाले कभी नाराज न करेंगे। तुम्हें कोई जगह मिलेगी और शायद अच्छी जगह मिले; मगर जिस जाल में तुम फंसे हो, उसमें से निकल नहीं सकते। झूठी गवाही, झूठे मुकदमें बनाना और पाप का व्यापार करना हो तुम्हारे भाग्य में लिख गया। जाओ शौक से जिंदगी के सुख लूटो। मैंने तुमसे पहले ही कह दिया था और आज फिर कहती हूँ कि मेरा तुमसे कोई नाता नहीं है। मैंने समझ लिया कि तुम मर गए। तुम भी समझ लो कि मैं मर गई। बस, जाओ। मैं औरत हूं। अगर कोई धमकाकर मुझसे पाप कराना चाहे,तो चाहे उसे न मार सकू; अपनी गर्दन पर छुरी चला दूंगी। क्या तुममें औरतों के बराबर भी हिम्मत नहीं है?

रमा ने भिक्षुकों की भांति गिडगिड़ाकर कहा- तुम मेरा कोई उज़ न सुनोगी?

जालपा ने अभिमान से कहा-नहीं।

'तो मैं मुंह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊ?'

'तुम्हारी खुशी ।

'तुम मुझे क्षमा न करोगी?'

'कभी नहीं, किसी तरह नहीं ।'

रमा एक क्षण सिर झुकाए खड़ा रहा,तब धीरे-धीरे बरामदे के नीचे जाकर जग्गो से बोला-दादी, दादा आएं तो कह देना, मुझसे जरा देर मिल लें। जहां कहें, आ जाऊँ?

जग्गों ने कुछ पिघलकर कहा–कल यहीं चले आना। रमा ने मोटर पर बैठते हए कहा-यहां अब न आऊंगा, दादी । मोटर चली गई तो जालपा ने कुत्सित भाव से कहा-मोटर दिखाने आए थे, जैसे [ १९६ ]
खरीद ही तो लाए हों।

जग्गो ने भर्त्सना की-तुम्हें इतना बेलगाम न होना चाहिए था, बहू'दिल पर चोट लगती है, तो आदमी को कुछ नहीं सूझता।

जालपा ने निष्ठुरता से कहा-ऐसे हयादार नहीं हैं,दादी । इसी सुख के लिए तो आत्मा बेची। उनसे यह सुख भला क्या छोड़ा जायगी। पूछा नहीं, दादा से मिलकर क्या करोगे? वह होते तो ऐसी फटकार सुनाते कि छठी का दूध याद आ जाता।

जग्गों ने तिस्कार के भाव से कहा-तुम्हारी जगह मैं होती तो मेरे मुंह से ऐसी बातें न निकलतीं। तुम्हारा हिया बड़ी कठोर है। दूसरा मर्द होता तो इस तरह चुपका-चुपका सुनता? मैं तो थर-थर कांप रही थी कि कहीं तुम्हारे ऊपर हाथ ने चला दे; मगर है बड़ा गमखोर।

जालपा ने उसी निष्ठुरता से कहा-इसे गमखोरी नहीं कहते दादी, यह बेहयाई है।

देवीदीन ने आकर कहा-क्या यहां भैया आए थे? मुझे मोटर पर रास्ते में दिखाई दिए थे।

जग्गो ने कहा-हां, आए थे। कह गए हैं, दादा मुझसे जरा मिल लें। देवीदीन ने उदासीन होकर कहा-मिल लूंगा। यहां कोई बातचीत हुई?

जग्गो ने पछताते हुए कहा–बातचीत क्या हुई, पहले मैंने पूजा की, मैं चुप हुई तो बहू ने अच्छी तरह फूल-माला चढ़ाई।

जालपा ने सिर नीचा करके कहा-आदमी जैसा करेगा, वैसा भोगेगा।

जग्गो-अपना ही समझकर तो मिलने आए थे।

जालपा-कोई बुलाने तो न गया था। कुछ दिनेश का पता चला, दादा !

देवीदीन-हां, सब पूछ आया। हाबड़े में घर है। पता-ठिकाना सब मालूम हो गया।

जालपा ने डरते-डरते कहा-इस वक्त चलोगे या कल किसी वक्त?

देवीदीन-तुम्हारी जैसी मरजी। जी जाहे इसी बखत चलो, मैं तैयार हूं। जालपा-थक गए होगे? देवीदीन-इन कामों में थकान नहीं होती बेटी।

आठ बज गए थे। सड़क पर मोटरों का तांता बंधा हुआ था। सड़क की दोनों पटरियों पर हजारों स्त्री-पुरुष बने-उने, हंसते-बोलते चले जाते थे। जालपा ने सोचा, दुनिया कैसी अपने राग-रंग में मस्त है। जिसे उसके लिए मरना हो मरे, वह अपनी टेव ने छोड़ेगी। हर एक अपना छोटा-सा मिट्टी का घरौंदा बनाए बैठा है। देश बह जाए, उसे परवा नहीं। उसका घरौंदा बच रहे । उसके स्वार्थ में बाधा न पड़े। उसका भोली-भाली हृदय बाजार को बंद देखकर खुश होता। सभी आदमी शोक से सिर झुकाए, त्योरियां बदले उन्मत्त-से नजर आते। सभी के चेहरे भीतर की जलन से लाल होते। वह न जानती थी कि इस जन-सागर में ऐसी छोटी-छोटी ककड़ियों के गिरने से एक हल्कोरा भी नहीं उठता, आवाज तक नहीं आती।