मानसरोवर १/गुल्ली-डण्डा

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मानसरोवर १  (1947) 
द्वारा प्रेमचंद
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गुल्ली-डण्डा

हमारे अंग्रेजोदाँ दोस्त माने या न माने, मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डण्डा सर खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डण्डा खेलते देखता हूँ, तो जो लोट-पोट हो जाता है कि इसके साथ जाकर खेलने लगूं। न लान की ज़रूरत, न कोर्ट को, न नेट की, न यापी की। मज़े से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना की, और दो आदमी भी आ गये, तो खेल शुरू हो गया। विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उनके सामान महंगे होते हैं। जब तक कम-से-कम एक सैकमा न खर्च कीजिए, खिलाड़ियों में शुमार ही नहीं हो सकता। यहाँ गुल्ली डण्डा है कि बिना हर-फिटकरी के चोखा रंग देता है। पर हम, अंग्रेजो चीत्रों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीज़ों से अरुचि हो गई है। हमारे स्कूलों में बरेक लड़के से तीन चार रुपये सालाना केवल खेलने को फीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सकता कि भारतीय खेल खिलायें, जो बिना दाम-कौड़ी के खेले जाते हैं। अंग्रेजो खेल उनके लिए हैं, जिनके पास धन है। गरीब लड़कों के सिर क्यों यह व्यसन मढ़ते हो। ठीक है, गुल्ली से आँख फूट जाने का भय रहता है। तो क्या क्रिकेट से सिर टूट जाने, तिलो फूट जाने, टांग टूट जाने का भय नहीं रहता ? मगर हमारे माथे में गुल्ली का दान आज तक बना हुआ है, तो हमारे कई दोस्त ऐसे भी हैं, जो थापो को बैसाखी से बदल धैठे। खैर, यह तो अपनी-अपनी रुचि है। मुझे गुल्को हो सब खेलों से अच्छी लगती है और बचपन की मीठो स्मृतियों में गुल्लो हो सबसे मीठी है। वह प्रातःकाल घर से निकल जाना, वह पेड़ पर चढ़कर टहनियाँ काटना और गुल्ली-डण्डे बनाना, वह उत्साह, वह लगन, वह खिलाड़ियों के.जमघटे, वह पदना और पदाना, वह लड़ाई-झगड़े, वह सरल स्वभाव, जिसमें छूत-अछूत, अमीर-गरीब का बिलकुल भेद न रहता था, जिसमें अमीराना चोंचलों को, प्रदर्शन की, अभिमान की गुञ्जाइश ही न थी, उसी वक्त भूलेगा जब जब घरवाले बिगड़ रहे हैं, पिताजी चौके पर बैठे वेग से रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं, अम्माँ की दौड़ केवल द्वार तक है, लेकिन उनकी विचारधारा में मेरा अन्धकारमय भविष्य टूटी हुई नौका
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कि तरह डगमगा रहा है। और मैं हूँ कि पदाने में मस्त हूँ, न नहाने को सुधि है, न खाने की। गुल्ली है तो ज़रा-सी ; पर उसमें दुनिया भर को मिठाइयों को मिठास और तमाशों का आनन्द भरा हुआ है।

मेरे हमजोलियों में एक लड़का गया नाम का था। मुझसे दो-तीन साल बड़ा होगा। दुबला, लांबा, बन्दरों की-सी लम्बी-लम्बी पतली-पतलो उँगलियाँ, बन्दरों हो की-सी चपलता, वही झलाहट। गुल्ली कैसो हो हो, उस पर इस तरह लपता था, जैसे छिपकली कीड़ों पर लपकती है। मालूम नहीं, उसके मां-बाप थे या नहीं, कहा रहता था, क्या खाता था; पर था हमारे गुरी-क्लब का चैम्पियन। जिसकी तरफ वह मा जाय, उसकी जीत निश्चित थी। हम सब उसे दूर से आते देख, उपका दोरकर स्वागत करते थे और उसने अपना गोइयां बना लेते थे।

एक दिन हम और गया दो ही खेल रहे थे। वह पा रहा था, मैं पद रहा था मगर कुछ विचित्र वात है कि पदाने में हम दिन-भर मस्त रह सकते हैं, पदना एक मिनट का भी अखरता है। मैंने गला छुड़ाने के लिए वह सब चालें चली, जो ऐसे अवसर पर शास्त्र-विहित न होने पर भी क्षम्य है। लेकिन गया अपना दाव लिये वगैर मेरा पिण्ड न छोड़ता था।

मैं घर को ओर भागा। अनुनय-विनय का कोई असर न हुआ।

गया ने मुझे दौड़कर पकड़ लिया और उडा तानकर बोला --- मेरा दाँव देखर जाओ। पदाया तो बड़े बहादुर अनके, पदने को बेर क्यों भागे जावे हो ?

'तुम दिन-भर पक्षाओं तो मैं दिन-भर पादता रहूँ ?'

'हाँ, तुम्हें दिन-भर पादना पड़ेगा।'

'न खाने जाऊँ, न पीने जाऊँ ?'

'हां, मेरा दाव दिये बिना कहीं नहीं जा सकते।'

'तुम्हारा गुलाम हूँ ?'

'हा, मेरे गुलाम हो।'

'मैं घर जाता हूँ, देखू, मेरा क्या कर लेते हो।'

'घर कैसे जाओगे, कोई दिल्लयो है ? दाँव दिया है, दांव लैंगे।'

'अच्छा, कल मैंने अमरूद खिलाया था। वह लौटा दो।'

'वह तो पेट में चला गया।' [ १५९ ]'निकालो पेट से। तुमने क्यों खाया मेरा अमरूद ?'

'अमरूद तुमने दिया, तब मैंने खाया। मैं तुमसे मांगने न गया था।'

'जब तक मेरा अमरूद न दोगे, मैं दाँव न दूंगा।'

मैं समझता था, न्याय मेरी ओर है। आखिर मैंने किसी स्वार्थ से ही उसे अमरूद खिलाया होगा। कौन निःस्वार्थ किसी के साथ सलूक करता है। भिक्षा तक तो स्वार्थ के लिए हो देते हैं। जन गया ने अमरूद खाया, तो फिर उसे मुमसे दांव लेने का क्या अधिकार है। रिश्वत देकर तो लोग खून पचा जाते हैं। यह मेरा अमरूद यों हो हजम कर जायगा ? अमरुद पैसे के पांचवाळे थे, जो गया के माप को भी नसीब न होंगे। यह सरासर अन्याय था।

गया ने मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा-मेरा दाँव देकर जाओ, अमरूद- समरूद में नहीं जानता।

मुझे न्याय का बल था। वह अन्याय पर डटा हुआ था। मैं हाथ छुड़ाकर भागना चाहता था। वह मुझे जाने न देता था। मैंने गाली दी, उसने उससे कड़ी गाली दी, और गाली ही नहीं, दो-एक चांटा जमा दिया। मैंने उसे दात काट लिया। उसने मेरी पीठ पर हण्डा जमा दिया। मैं रोने लगा। गया मेरे इस अस्त्र का मुका- बला न कर सका। भागा। मैंने तुरन्त बासू पोंछ डाले, डण्डे को चोट भूल गया और हसता हुआ घर जा पहुंचा। मैं थानेदार का लड़का, एक नोच जात के लौंडे के हाथों पिट गया, यह मुझे उस समय भी अपमानजनक मालूम हुआ; लेकिन घर में किसी से शिकायत न को।

( २ )

उन्हीं दिनों पिताजी का वही से तबादला हो गया। नई दुनिया देखने को खुशो में ऐसा फूला कि अपने हमजोलियों से बिछुड़ जाने का बिलकुल दुःख न हुआ। पिताजी दुखी थे। यह बड़ी आमदनी की जगह थी। अम्माजो भी दुखी थीं, यहाँ सब चीजें सस्ती थी, और मुहल्ले की स्त्रियों से धराव-सा हो गया था, लेकिन मैं मारे खुशी के फूला न समाता था। लड़कों से जीट उड़ा रहा था, वहां ऐसे घर थोड़े ही होते हैं। ऐसे-ऐसे ऊँचे. घर है कि आसमान से बातें करते हैं। वहां के अंग्रेजी स्कूल में कोई मास्टर लड़कों को पोटे, तो उसे जेहल हो जाय। मेरे मित्रों की फैली हुई पाखें और चकित-मुद्रा बतला रही थी कि मैं उनकी निगाह में कितना
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ऊँचा उठ गया हूँ। बच्चों में मिथ्या को सत्य बना लेने की वह शक्ति है, जिसे हम, जो सत्य को मिथ्या बना लेते हैं, क्या समझेगे। उन बेचारों को मुझसे कितनी स्पर्धा हो रही थी। मानों कह रहे थे-तुम भागवान हो भाई, जाओ, हमें तो इसो उजड़ ग्राम में जीना भी है और मरना भी।

बीस साल गुजर गये। मैंने इंजीनियरो पास की और सो जिले का दौरा करता हुआ उसी कस्बे में पहुंचा और डाकबंगले में ठहरा। उस स्थान को देखते हो इतनी मधुर बाल स्मृतियां हृदय में जाग उठी कि मैंने छहो उठाई और करने की सैर करने निकला। आँखें किसी प्यासे पधिक को भांति जवान के उन क्रीड़ा-स्थलों को देख ने के लिए व्याकुल हो रही थी ; पर उस परिचित नाम के सिवा वहाँ और कुछ परि- चित न था। जहां खंडहर था, वहीं पक्के मकान खड़े थे। जहाँ नगद का पुराना पेड़ था, वहाँ अब एक सुन्दर क्योचा था। स्थान को कायापलट हो गई थी। अगर उसके नाम और स्थिति का ज्ञान न होता, तो मैं उसे पहचान भो न सकता। बचपन को सञ्चित और अमर स्मृतियां बहिँ खोले अपने उन पुराने मित्रों से गले मिलने को अधौर हो रही थी। मगर वह दुनिया बदल गई थी। ऐसा जो होता था कि उस धरती से लिपटकर रोऊँ और कहूँ, तुम मुझे भूल गई । मैं तो अब भी तुम्हारा वही रूप देखना चाहता हूँ।

सहसा एक खुली हुई जगह में मैंने दो-तीन लड़कों को गुल्लो-डण्डा खेलते देखा। एक क्षण के लिए मैं अपने को बिलकुल भूल गया। भूल गया कि मैं एक ऊँचा अफ- सर हूँ, साइवी ठाठ में, रोब और अधिकार के आवरण में।

जाकर एक लड़के से पूछा --- क्यों बेटे, यहाँ कोई गया नाम का आदमी रहता है ?

एक लड़के ने गुल्लो-डण्डा समेटकर सहमे हुए स्वर में कहा --- कौन गया गया चमार !

मैंने यों ही कहा --- हाँ-हाँ वहो गयानाम का कोई आदमी है तो। शायद वही हो।

'हाँ, है तो।'

'ज़रा उसे बुला ला सकते हो ?'

लड़का दौड़ा हुआ गया और एक क्षण में एक पाँच हाथ के काले देव को साथ लिये आता दिखाई दिया। मैं दूर हो से पहचान गया। उसको ओर लपकना चाहता था कि उसके गले लिपट जाऊँ , पर कुछ सोचकर रह गया।

बोला --- कहो गया, मुझे पहचानते हो? [ १६१ ] [ १६२ ]मैंने कुछ उदास होकर कहा --– लेकिन मुझे तो बराबर तुम्हारी याद आती थी। तुम्हारा वह डण्डा, जो तुमने तानकर जमाया था, याद है न ?

गया ने पछताते हुए कहा --- वह लड़कपन था साकार, उसकी याद न दिलाओ।

'वाह ! वह मेरे वाल-जोवन को सबसे रसोलो याद है। तुम्हारे उस डण्डे में जो रस था, वह न तो अब आदर-सम्मान में पाता हूँ, न धन में। कुछ ऐसो मिठास थो उसमें कि आज तक उससे मन मोठा होता रहता है।'

इतनी देर में हम वस्ती से कोई तीन मोल निकल आये है। चारों तरफ सनाटा है। पश्चिम और कोसों तक भीमताल फैला हुआ है, जहाँ आकर हम किसो समय कमल-पुष्प तोड़ ले जाते थे और उनके झुमक बनाकर कानों में डाल लेते थे। जेठ को सन्ध्या केसर में डूबी चली आ रही है। मैं लपकर एक पेड़ पर चढ़ गया और एक टहनी काट लाया। चटपट गुल्लो-डण्डा बन गया। खेल शुरू हो गया। मैंने गुच्ची में गुलो रखकर उछाली । गुल्लो गया के सामने से निकल गई। उसने हाथ लपकाया, ज से मछली पकड़ रहा हो। गुल्ली उसके पीछे जाकर गिरी। यह वहो गया है, जिसके हार्थों में गुल्लो जैसे आप-हो-आप जाकर बैठ जाती थी। वह दाहने-बायें कहीं हो, गुल्ली उसको हथेलियों में हो पहुँचतो थी। जैसे गुल्लियों पर वशीकरण डाल देता हो। नई गुल्लो, पुरानो गुल्लो, छोटी गुल्लो, बड़ो गुल्लो, नोकदार गुल्ली, सपाट गुल्ली, सभी उससे मिल जाती थी। जैसे उसके हाथों में कोई चुम्बक हो, जो गुलियों को खींच लेता हो, लेकिन आज गुल्लो को उससे वह प्रेम नहीं रहा। फिर तो मैंने पदाना शुरू किया। मैं तरह-तरह की धांधलियां कर रहा था। अभ्यास को कसर बेईमानो से पूरी कर रहा था। हुच जाने पर भो डण्डा खेले . जाता था, हालांकि शास्त्र के अनुसार गया की बारी आनी चाहिए थी। गुल्लो पर मोछो चोट पड़ती और वह जरा दूर पर गिर पड़तो, तो मैं झपटकर उसे खुद उठा लेता और दोषारा टाँड़ लगाता। गया यह सारी बेकायदगियाँ देख रहा था; पर कुछ न बोलता था, जैसे उसे वह सब कायदे-कानून भूल गये। उसका निशाना कितना अचूक था। गुल्ली उसके हाथ से निकलकर टन से डण्डे में आकर लगती थी। उसके हाथ से छूटकर उसका काम था डण्डे से टकरा जाना , लेकिन आज वह गुल्ली डण्डे में लाती हो नहीं ! कभी दाइने जाती है, कभी वायें, कमो आगे, कभी पीछ। [ १६३ ] [ १६४ ]गया ने कहा --- आप तो अंधेरा हो गया है भैया, कल पर रखो।

मैंने सोचा, कल बहुत-सा समय होगा, यह न जाने कितनी देर पदाये ; इसलिए इसी वक्त मुआमला साफ़ कर लेना अच्छा होगा।

'नहीं, नहीं। अभी बहुत उजाला है। तुम अपना दांव ले लो।'

'गुल्लो सूझगो नहीं।'

'कुछ परवाह नहीं।'

गया ने पदाना शुरू किया , पर उसे अब बिलकुल अभ्यास न था। उसने यो वार टाड़ लगाने का इरादा किया ; पर दोनों ही पार हुच गया। एक मिनिट से कम में वह अपना दांव पूरा कर चुका। बेचारा घंटा-भर पादा; पर एक मिनिट हो में अपना दाव खो बैठा। मैंने अपने हृदय की विशालता का परिचय दिया।

'एक दाँव और खेल लो। तुम तो पहले ही हाथ मे हुच गये।'

'नहीं भैया, अब अँधेरा हो गया।'

'तुम्हारा अभ्यास छूट गया। क्या कभी खेलते नहीं ?

'खेलने का समय कहाँ मिलता है भैया!'

हम दोनों मोटर पर जा बैठे और चिरारा जलते-जलते पड़ाव पर पहुंच गये। गया चलते-चलते बोला-कल यहाँ गुल्ली-डण्डा होगा। सभी पुराने खिलाडो खेलेंगे। तुम भी आओगे ? जब तुम्हें फुरसत हो, तभी खिलाड़ियों को बुलाऊँ।

मैंने शाम का समय दिया और दूसरे दिन मैच देखने गया। कोई दस-दस भादमियों को मण्डली थी ; कई मेरे लड़कपन के साथी निकले। अधिकाश युवक थे, जिन्हे मैं पहचान न सका। खेल शुरू हुआ। मैं मोटर पर बैठा-बैठा तमाशा देखने लगा। आज गया का खेल, उसका वह नैपुण्य देखकर मैं चकित हो गया ! ठौड़ लगाता, तो गुल्ली आसमान से बातें करती। कल की-सी चह किमक वह हिचकिचा- हट, वह बेदिली आज न थी। लड़कपन में जो बात थी, आज उसने प्रौढ़ता प्राप्त कर ली थी। कहीं कल इसने मुझे इस तरह पदाया होता, तो मैं कर रोने लगता। उसके डण्डे की चोट खाकर गल्ली दो सौ राज को खबर लाती थी।

पदनेवालों में एक युवक ने कुछ धांधली की। उसने अपने विचार में गुल्ली लोक ली थी। गया का कहना था --- गुल्ली ज़मीन में लगकर उछली थी। इस पर दोनों में ताल ठोंकने की नौबत आई । युवक दब गया। गया का तमतमाया हुआ चेहरा देख-
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कर डर गया। भगर वह दब न जाता तो ज़रूर मार-पीट हो जाती। मैं खेल में न था पर दूसरों के इस खेल में मुझे वही लड़कपन का मानन्द आ रहा था, जब हम सब कुछ भूलकर खेल में मस्त हो जाते थे। अब मुझे मालूम हुभा कि कल गया ने मेरे साथ चला नहीं, केवल रोलने का बहाना किया। उसने मुझे दया का पात्र समझा। मैंने धांधली की, बेईमानियों को ; पर उसे जरा भो कोधन आया। इसी- लिए कि वह सेल न रहा था, मुझे खिला रहा था, मेरा मन रख रहा था। वह मुझे पदाकर मेरा कचूमर नहीं निकालना चाहता था। मैं भग भापर हूँ। यह अफसरी मेरे और उसके बीच में दीवार बन गई है। मैं अब उसका लिहाज़ पा सकता हूँ, भदव पा सकता हूँ, साहचर्य नहीं पा सकता। लड़कपन था, तब मैं उसका समकक्ष था। इममें कोई भेद न था। यह पद पाकर अब मैं केवल उसको दया के योग्य हूँ। यह मुझे अपना जोड़ नहीं समझता। वह बड़ा हो गया है, मैं छोटा हो गया हूँ।