मानसरोवर १/घासवाली

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
मानसरोवर १  (1947) 
द्वारा प्रेमचन्द
[ २८० ]
घासवाली

मुलिया हरी-हरी घास का गढ़ा लेकर आई, तो उसका गेहुआ रंग कुछ तम- समाया हुआ था और बड़ी-बड़ी मद-भरी आँखों में शका समाई हुई थी। महावीर ने उसका तमतमाया हुआ चेहरा देखकर पूछा -- है मुलिया, आज कैसा जो है ।

मुलिया ने कुछ जवाब न दिया -- उसकी आंखें डबडबा गई।

महावीर ने समीप भाकर पूछा --- क्या हुआ है, बताती क्यों नहीं ? किसी ने कुछ कहा है, अम्माँ ने डाँटा है, क्यों इतनो उदास है ?

मुलिया ने सिसककर कहा --- कुछ नहीं, हुआ क्या है, अच्छौ तो हूँ?

महावीर ने मुखिया को सिर से पाँव तक देखकर कहा --- चुपचाप रोयेगी, बता- येगी नहीं?

मुलिया ने बात टालकर कहा --- कोई बात भी हो, क्या बताऊँ ?

मुलिया इस ऊपर में गुलाब का फूल थो। गेहुआ रग था, हिरन की-सी आँखें, नीचे खिचा हुआ चिबुक, कपोलों पर हलकी लालिमा, बड़ी-बड़ी नुकीली पलके, आँखो में, एक विचित्र आर्द्रता जिसमें एक स्पष्ट वेदना, एक मूक व्यधा झलकती रहती थी। मालूम नहीं, चमारों के इस घर में यह अप्सरा कहाँ से आ गई थी। क्या उनका कोमल फूल-सा गात इस योग्य था कि सिर पर घास को टोकरी रखकर बेचने जाती? उस गाँव में भी ऐसे लोग मौजूद थे, जो उसके तलवों के नीचे आंखें, बिछाते थे, उसकी एक चितवन के लिए तरसते थे, जिनसे भगर वह एक शब्द भी बोलतो. तो निहाल हो जाते ; लेकिन उसे भाये साल भर से अधिक हो गया, किसी ने उसे युवकों की तरफ ताकते या बातें करते नहीं देखा । वह घाम लिये निकलतो, तो ऐसा मालूम होता, मानौ उषा का प्रकाश, सुनहरे आवरण से रजित, अपनी छटा बिखेरता जाता हो। कोई अज़लें गाता, कोई छाती पर हाथ रखता , पर भुलिया अपनी नीची आँखें किये अपनी राह चली जाती। लोग हैरान होकर कहते इतना अभिमान ! महावीर में ऐसे क्या सुरखाव के पर लगे हैं, ऐसा मच्छा जवान भी तो नहीं, न. जाने यह कैसे उनके साथ रहती है। [ २८१ ]
मगर आज एक ऐसौ बात हो गई, जो इस जाति को और युवतियों के लिए चाहे गुप्त संदेश होती, मुलिया के लिए हृदय का शुल थी। प्रभात का समय था, पवन आम को और की सुगन्धि से मतवाला हो रहा था, आकाश पृथ्वी पर सोने की वर्षा कर रहा था। मुलिया सिर पर झौआ रखे घास छीलने चली, तो उसका गेहुभा रंग प्रभात को सुनहरी किरणों से कुन्दन की तरह दमक उठा । एकाएक युवक चैनसिंह सामने से आता हुआ दिखाई दिया। भुलिया ने चाहा कि कतराकर निकल जाय । मगर चैनसिंह ने उसका हाथ पका लिया और बोला- मुलिया, तुझे क्या मुझ पर जरा भी दया नहीं आती ?

मुलिया का वह फूल सा खिला हुआ चेहरा ज्वाला को तरह पहक ठा। वह जरा भी नहीं डरी, ख़रा भी न झिसकी मौआ जमीन पर गिरा दिया, और बोली --- मुझे छोड़ दो, नहीं मैं चिल्लाती हूँ।

चैनसिंह को आप जीवन में एक नया अनुभव हुआ। नोची बातों में रूप-माधुर्य का इसके सिवा और काम ही क्या है कि वह ऊँची जातिवालों का खिलौना बने । ऐसे कितने ही मा उसने जीते थे ; पर आज मुलिया के चेहरे का वह रंग, उसका यह क्रोध, वह अभिमान देखकर उसके छक्के छूट गये। उसने लज्जित होकर उसका हाथ छोड़ दिया । मुलिया वेग से आगे बढ़ गई । संघर्ष की गरमी में चोट की व्यथा नहीं होतो, पीछे से शौस होने लगती है । मुखिया जब कुछ दूर निकल गई, तो क्रोध और भय तथा अपनी बेकसी का अनुभव करके उसकी आँखों में आँसू भर आये। उसने कुछ देर जन्त किया। फिर सिस-सिसककर रोने लगी। अगर वह इतनो गरीब न होती, तो किसी की मजाल थी कि इस तरह उसका अपमान करता! वह रोती जाती थी और पास छोलती जाती थी। महावीर का क्रोध वह जानती थी। मगर उससे कह दे, तो वह इस ठाकुर के खून का प्यासा हो जायगा। फिर न जाने क्या हो ! इस खयाल से उसके रोएँ खड़े हो गये। इसीलिए उसने महावीर के प्रश्नों का कोई उत्तर न दिया।

( २ )

दूसरे दिन मुखिया घास के लिए न गई। सास ने पूछा --- तू क्यों नहीं जाती, और सब तो चली गई।

मुलिया ने सिर झुकाकर कहा --- मैं अकेली न जाऊंगी । [ २८२ ]सास ने बिगड़कन कहा --- अकेले क्या तुझे बाघ उठा ले जायगा ?

मुलिया ने और भी सिर झुका लिया और दबी हुई आराम से बोली --- खब मुझे छेड़ते हैं।

सास ने डाटा, न तू औरों के साथ जायगी, न अकेली बायपी, तो फिर जायगो कैसे ? साफ-साफ यह क्यों नहीं कहती कि मैं न जाऊँगी । तो यहा मेरे घर में रानी बनके विवाह न होगा। किसो को चाम नहीं प्यारा होता, काम प्यारा होता है। तू बड़ो सुन्दर है तो तेरो सुन्दरता लेकर चाई। उठा मावा और घास ला !

द्वार पर नीम के दरख्त के साये में महापौर खड़ा घोड़े को मल रहा था । उसने मुलिया को रोनी सूरत बनाये जान देखा पर कुछ बोल न सका । उसका वश चलता तो मुलिया को कर्जे में बिठा लेता, माखों में छिपा लेता। लेकिन बाडे का पेट भरना तो जरूरी था घास मोल लेकर खिलाये, तो बारदाने रोज से इस न पड़े। ऐधी मजदूरी ही कौन होता है । मुश्किल से डेढ़-दो रुपये मिलते हैं, वह भो कभी मिले, कभी न मिले । जब से यह सत्यानाशा लारियाँ चलने लगे हैं, इक्बालों को बधिया चेठ गई है। कोई संत भी नहीं पूछता । महाजन से डेढ़ सौ रुपये उधार लेकर इका और घोड़ा खरोदा था मगर लारियों के आगे इक्के को कौन पूछता है। महाजन का सूद भी तो न पहुंच सस्ता था ! मुळ का कहना ही क्या । कारो मन से बोला- नमन हो तो रहने दे, देखो जायगी।

इस दिलजोई से मुलिया निहाल हो गई। बोली --- घोड़ा खायेगा क्या !

आज उसने कल का रास्ता छोड़ दिया, और खेतों की मेड़ों से होती हुई चली। बार बार सतर्क आंखों से इधर-उधर ताकती आती थी। दोनों तरफ जख के खेत खड़े थे। जरा भी खड़खड़ाहट इती, उसका सन से हो जाता। कहीं कोई ऊख में छिपा न मंठा हो; मगर कोई नई बात न हुई। कख के खेत निकल गये, आमों का मात्र निकल गया, सिचे हुए खेत नजर आने लगे। दूर के कुएँ पर पुर चल रहा था। खेतों की मेड़ों पर हरी हरा पास जमा हुई थी। मुलिया का जो ललचाया । यहाँ आध घण्टे में जितनी पाद छिल सकता है, उतनी सूखे मैदान में दोपहर तकन छिल सकेगी। यहाँ देखता ही झोन है। काई चिल्लायेगा, तो चलो जाऊंगा। वह बैठकर घास छीलने लगी, और एक घण्टे में उसका झावा आधे से ज्यादा भर गया। [ २८३ ]
यह अपने काम में इतनी तन्मय थी कि उसे चैनसिंह के आने की खबर ही न हुई । एकाएक उसने आहट पाकर सिर उठाया, तो चैनसिंह को खड़ा देखा।

मुलिया की छाती धक् से हो गई। जी में आया, भाग जाय, मावा उलट दे और खाली झाना लेकर चली जाय ; पर चैनसिंह ने कई गज के फासले से ही रुक- कर कहा --- डर मत, हर मत, भगवान् जानता है, मैं तुझसे कुछ न बोलूँगा। जितनी घास चाहे, छील ले, मेरा हो खेत है।

मुलिया के हाथ सुन्न हो गये, खुरपी हाथ में जम-सी गई। घास नजर ही न आती थी । जी चाहता था, जमीन फट जाय और मैं समा जाऊँ। अमीन आँखों के सामने तैरने लगी।

चैनसिंह ने आश्वासन दिया --- छीलती क्यों नहीं? मैं तुमसे कुछ कहता थोड़े हो हूँ। यही रोज चलो आया कर, मैं छोल दिया करूंगा।

मुलिया चित्र लिखित-सी बैठी रही ।

चैनसिंह ने एक कदम और आगे बढ़ाया और बोला --- तू मुझसे इतना डरती क्यों है ? क्या तू समझती है, मैं आज भी तुझे सताने आया हूँ ? ईश्वर जानता है, कक भी तुझे सताने के लिए मैंने तेरा हाथ नहीं पकड़ा था। तुझे देखकर आप-ही- भाप हाथ बढ़ गये। मुझे कुछ सुध हो न रहो। तू चली गई, तो मैं वहीं बैठकर घण्टों रोता रहा । जी में आता था, हाथ काट डालूं। कभी जी चाहता था, जहर खा हूँ। तभी से तुझे ढूंढ़ रहा हूँ। आज तू इस रास्ते से चली, आई । मैं सारा हार छानता हुआ यहाँ आया हूँ। अब जो सज़ा तेरे जी में आये, दे दे। अगर तू मेरा सिर भी काट ले, तो गर्दन न हिलाऊँगा। मैं शोहदा था, लुचा था, लेकिन जब से तुझे देखा है, मेरे मन की पारी सोट मिट गई है। अब तो यही जी में आता है कि तेरा कुत्ता होता और तेरे पीछे-पीछे चलता, तेरा घोड़ा होता, तब तो तू अपने हाथों ले मेरे सामने, घास डालती। किसी तरह यह चोला तेरे काम आवे, मेरे मन को यह सबसे बड़ी लालसा है। मेरी जवानी काम न आवे, पर मैं किसो बोट से ये आते कर रहा है । बहा भागवान् था महाबोर, जो ऐसी देवी उसे मिली।

मुलिया चुपचाप सुनती रही, फिर सिर नीचा करके भोलेपन से बोली-तो तुम मुझे क्या करने को कहते हो ?

चनसिह और समीप आकर बोला --- बस, तेरी दया चाहता हूँ। ! [ २८४ ]मुलिया ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा। उसकी लज्जा न जाने का गायव हो गई। चुसते हुए शब्दों में होली-तुमसे एक बात कहू, बुरा तो न मानोगे ? तुम्हारा विवाह हो गया है या नहीं ?

चैनसिंह ने वो ज़बान से कहा --- व्याह तो हो गया है, लेकिन व्याह क्या है, खिल्बाइ है।

मुलिया के होठों पर अवहेलना को मुसकिराहट मलक पड़ी, बोली --- फिर भी मगर मेश आदमी तुम्हारी औरत से इसी तरह बातें करता, तो तुम्हें कैसा लगता? तुम उसकी गर्दन काटने पर तैयार हो जावे कि नहों ? बोलो ! क्या समझते हो कि महाबोर चमार है तो उसकी देह में लहू नहीं है, उसे लज्जा नहीं है, अपने मर्याद का विचार नहीं है ? मेरा रूप-रंग तुम्हें भाता है। क्या घाट के किनारे मुझसे कहाँ सुन्दर औरतें नहीं घूमा करतो? मैं उनके तलवों को बराबरी भी नहीं कर सकती। तुम उनमें से किसी से क्यों नहीं दया मांगते ? क्या उनके पास दया नहीं है। मगर वहाँ तुम न जाओगे, क्योंकि वहाँ आते तुम्हारो छाती दहलती है। मुझसे दया मांगते हो, इसलिए न कि मैं चमारिन हूँ, नीच जाति हूँ और नोच जाति का ओरत रा-सो घुड़की-धमकी या जरा-से लालच से तुम्हारी मुट्ठी में आ जायगी। शितना सस्ता सौदा है । ठाकुर हो न, ऐसा सस्ता सौदा क्यों छोड़ने लगे।

चैनसिंह लज्जित होकर बोला --- मूला, यह बात नहीं है। मैं सच कहता हूँ, इसमें ऊँच नीच की बात नहीं है। सब आदमो बराबर हैं . मैं तो तेरे चरणों पर सिर रखने को तैयार हूँ।

मुलिया --- इसलिए न कि जानते हो, मैं कुछ कर नहीं सकती। जाकर किसो खतरानी के चरणों पर सिर रखो, तो मालूम हो कि चरणों पर घिर रखने का क्या फल मिलता है । फिर यह सिर तुम्हारी गर्दन पर न रहेगा।

चैनसिंह मारे शर्म के प्रमोन में गया जाता था। उसका मुंह ऐसा सूख गया था, मानो महोनी की बीमारी से उठा हो। मुंह से बात न निकलता थी । मुशिया एतनी वाक्पट है, इसका उसे गुमान भी न था।

मुलिया फिर बोली --- मैं भी रोज बाजार जाती हूँ। बड़े-बड़े पों का हाल मानतो हूँ। मुझे किसी बड़े घर का नाम बता दो, जिसमें कोई साईस, कोई कोचवान, कोई वार, कोई पाहा, कोई महाराज न घुसा बैठा हो ? यह सब बड़े घरों को लीला
[ २८५ ]
है। और वह औरतें जो कुछ करती हैं, ठीक करती हैं। उनके घरवाले भी तो चमारिनों और कहारिनों पर जान देते फिरते हैं। लेना-देना बराबर हो जाता है। बेचारे मरीज आदमियों के लिए यह बातें कहा । मेरे आदमी के लिए संसार में जो कुछ हूँ, मैं हूँ। वह किसी दूसरी मेहरिया की और आँख उठाकर भी नहीं देखता। सयोग की बात है कि मैं तनिक सुन्दर हूँ; लेकिन मैं काली-कलूटी भी होती, तब भी वह मुझे इसी तरह रखता । इसका मुझे विश्वास है । मै चमाग्नि होकर भी इतनी नौच नही हूँ कि विश्वास का बदला खोट से हूँ। हाँ, वह अपने मन की करने लगे मेरी छाती पर मूंग दलने लगे, तो मैं उसकी छाती पर मूंग दलूगी। तुम मेरे रूप ही के दीवाने हो न ? आज मुझे माता निकल आयें, कानी हो जाऊँ, तो मेरी भोर ताकीगे भी नहीं। घोलो, झूठ कहती हैं।

चैनसिंह इनकार न कर सका।

मुलिया ने उसी गर्व से भरे हुए स्वर में कहा --- लेकिन मेरी एक नहीं, दोनों भाख फूट जायें, तब भी वह मुहे इसी तरह रखेगा । मुझे उठावेगा, बैठावेगा, खिला- वेगा। तुम चाहते हो, मैं ऐसे आदमी के साथ कपट करूं? जाओ,'अब मुझे कभी न छेड़ना, नही अच्छा न होगा!

( ३ )

जवानी जोश है, एक है, दया है, साहस है, भात्म-विश्वास है, गौरव है और वह सब कुछ जी जीवन को पवित्र, उज्ज्वल और पूर्ण बना देता है। जवानी का नशा धमंड है, नियता है, स्वार्थ है, शेखी है, विषय वासना है, कटुता है और वह सब कुछ जो जीवन को पशुता विकार और पतन की ओर ले जाता है। चैनसिंह पर जवानी का नशा था। मुलिया के शीतल छोटों ने नशा उतार दिया, जैसे हुई चाशनी में पानी के छीटे पड़ जाने से फेन मिट जाता है, मेल निकल जाता है और निर्मल, शुद्ध रस निकल आता है । जवानी का नशा जाता रहा, केवल जप । रह गई । कामिनी के शब्द जितनी आसानी से दोन और ईमान को ग्रास्त कर हैं, उतनी ही आसानी से उनका उद्धार भी कर सकते हैं।

चैनसिंह उस दिन से दूसरा ही आदमी हो गया। गुस्सा उसकी नाक पर था, बात-बात पर मजदूरों को गालियां देना, डाँटना और पीटना उसको आदत थी असामी उससे थरथर कापते थे। मजदूर उसे आने देखकर आते काम में चस्त
[ २८६ ]
जाते थे, पर ज्योंही उसने इधर पोठ फेरो और उन्होंने चिलम पौना शुरू किया। सब दिल में उपमे जलते थे, उसे गालियाँ देते थे ; मगर उस दिन से चैनसिह इतना दयालु, इतना गमार, इतना सहनशोल हो गया कि लोगों को आश्चय होता था।

कई दिन गुजर गये थे एक दिन सन्ध्या समय चैनसिंह खेत देखने गया । पुर चल रहा था। उसने देखा कि एक जगह नालो टूट गई है, और सारा पानी बहा चला जाता है क्यारियों में पानी बिलकुल नहीं पहुँचता । मगर क्यारी बरानेवाली।

बुढ़िया चुपचाप अठा है उसे जरा भी किक नहा है कि पानी क्यों नहीं आता। पहले यह दशा देखा चनसिंह आपे से बाहर हो जाता । उस औरत की उस दिन की पूरी मजूगे काट लेता और पुर चल नेवालों को घुड़कियां जमाता; पर आज उसे क्रोध नहीं आया। उसने मिट्टी लेकर नालो पाँव दो और खेत में जाकर बुढ़िया से बोला-तू यही बैठा है और पानी सम यहा जा रहा है । पुढ़िया पबहाकर बोलो अमो खुल गई होगी राजा ! मैं अभी जाकर बन्द किये देती हूँ।

यह कहती हुई वह थरथर कापने लगी चेनसिंह ने उसको दिल जोई करते हुए कहा --- भाग मत, भाग मत, मैंने नाली बन्द कर दी है। बुढ़ऊ कई दिन से नहीं दिखाई दिये। कहीं काम पर जाते हैं कि नहों ?

बुढ़िया गद्गद होकर बोली --- आजकल तो खाली हो बैठे है भैया, कहाँ काम नहीं लगता।

चैनसिंह ने नन्न भाव से कहा --- जो हमारे यहाँ लगा दे। थोड़ा-सा सन रखा है, उसे कात दें।

यह कहता हुआ वह कुएँ को ओर चला गया। यहाँ चार पुर चल रहे थे पर इस वक्त दा हकवे वेर खाने गये हुए थे। चेनसिह को देखते ही मजूरों के होश उड़ गये ठाकुर ने पूछा, दो आदमी कहा गये, तो क्या जवाब देंगे। सम-के- सब दाटे जायेंगे। बेचारे दिल में सहमे जा रहे थे । चनसिह ने पूछा-वह दोनों कहाँ चले गये।

किसी के मुंह से आवाज न निकली। सहसा सामने से दोनों मजूर धोतो के एक कोने में बेर भरे आते दिखाई दिये। खुशखुश बातें करते चले भा रहे थे। चैनसिंह पर निगाह बड़ो, तो दोनों के प्राण सूख गये। पौव मन-मन-भर के हो गये। अब न
[ २८७ ]
माते बनता है, न जाते। दोनों समझ गये कि आज डांट पड़ी, शायद मजूरी भी कट बाय । चाल धौमी पड़ गई । इतने में चैनसिंह ने पुकारा-बढ़ आओ, पढ़ आओ कैसे बेर हैं, लाओ ज़रा मुझे भी दो, मेरे ही पेड़ के हैं न ?

दोनों और भी सहम उठे । आज ठाकुर जीता न छोड़ेगा। कैसा मिठा-मिठाकर बोल रहा है। इतनी ही भिगो भिगोकर लगायेगा । बेचारे और भी सिकुड़ गये।

चैनसिंह ने फिर कहा --- जल्दी से माओ जी, पक्की पको सब मैं ले लूंगा। परा एक आदमी लपककर घर से थोड़ा सा नमक तो ले लो। (बाकी दोनों मजूरों से) तुम भी दोनों भा जाओ, उस पेड़ के बेश मोठे होते हैं। बेर खा लें, काम तो करना

अब दोनों भगोड़ों को कुछ ढारस हुआ। सबों ने भाकर सब बेर चैनसिंह के मागे डाल दिये, और एक-एक छांटकर से देने लगे। एक आदमी नमक लाने होला । आध घण्टे तक चारों पुर बाद रहे। जल सब बेर उड़ गये, और ठाकुर बलने लगे, तो दोनों अपराधियों ने हाथ जोड़कर कहा-यानी, आज जानवकसी हो जाय, बसी भूख लगी थी, नहीं तो कभी न जाते।

चैनसिंह ने नम्रता से कहा- तो इसमें बुराई क्या हुई? मैंने भी तो बेर खाये। एक-गध घण्टे का हरज हुआ, यही न ? तुम चाहोगे, तो घाटे-भर का काम आध घण्टे में कर दोगे । न चाहेंगे, दिन-भर में घण्टे-सा का भी काम न होगा।

चैनसिंह चला गया, तो चारों मात करने लगे-

एक ने कहा --- मालिक इस तरह रहे, तो काम करने में जो लगता है। यह नहीं कि हरदम छाती पर सवार !

दूसरा-- -मैंने तो समझा, आज कच्चा ही खा लायेंगे।

तीसरा---कई दिन से देखता हूँ, मिजाज बहुत नरम हो गया है।

चौथा---साँझ को पूरी मजूरी मिले तो कहना !

पहला---तुम तो हो गोबर-गनेस । आदमी का रुख नहीं पहचानते ।

दूसरा---अब खूब दिल लगाकर काम करेंगे ।

तीसरा---और क्या ! जब उन्होंने हमारे पर छोड़ दिया, तो हमारा भी घरम है कि कोई कसर न छोड़ें।

चौथा---मुझे तो भैया, ठाकुर पर भी विश्वास नहीं आता। [ २८८ ]

( ४ )

एक दिन चैनसिंह को किसी काम से कचहरी जाना था। पाँच मील का सफर था । यों तो वह बराबर अपने घोड़े पर जाया करता था; पर आन धूप बो तेज हो हो यो, सोचा, एक्के पर चला चलूँ। महावीर को कहला भेजा, मुझे लेते जाना। कोई नौ बजे महाबीर ने पुकारा । चैनिसह तैयार बैठा था। चटपट एक्के पर वठ गगा; मगर घोड़ा इतना दुबला हो रहा था, एक्के को गद्दों इतनी मैलो और फट. हुई, सारा सामाम इतना रही कि चैनधिह को उस पर बैठते शर्म आई। पूछा-यह सामान क्यों बिगड़ा हुआ है महावीर ? तुम्हारा घोड़ा तो इतना दुबला कमी न था, आजकल सवा- रिया कम है क्या ? महाबोर ने कहा --- नहीं मालिक, सवारियों काहे नहीं है, मगर लारियों के सामने एक्के को कौन पूछता है। कहाँ दो, ढाई, तीन की मजूरी करके घर लौटता था, कहां भव मीस आने पैसे भी नहीं मिलते। क्या जानवर का खिलाज क्या आप खाऊँ ? मी विपत्ति में पड़ा हूँ । सोचता हूँ, एकका-घोसा वैच-बाचकर आप लोगों की मजूरी कर लूं, पर कोई हक नहीं लगता। ज्यादा नहीं, तो बारह आने तो घोड़े ही को चाहिए, घास ऊपर से। जब अपना ही पेट नहीं चलता तो जानवर को कौन पूछे। चैनसिंह ने उसके फटे हुए कुरखे को ओर देखकर कहा--दो-चार बोधे को खेती क्यों नहीं कर लेते ?

महावीर सिर झुकाकर बोला --- खेती के लिए बड़ा पौरख चाहिए मालिक। मैंने तो यही सोचा है कि कोई गाहक लग जाय, तो एक्के को औने-पौने निकाल , फिर घास छीलकर बाजार ले जाया करूँ। आजकल सास-पतोह दोनों घास छोलतो है । तब जाकर दस-बारह आने पैसे नसोध होते हैं ।

चैनसिंह ने पूछा --- तो खुड़िया बाजार जातो होगी ?

महावीर लजाता हुआ बोला --- नहीं भैया, वह इतनी दूर कहाँ चल सकती है घरवाली चली जाती है। दोपहर तक घास हीलती है, तीसरे पहर बाजार जाती है। वहाँ से घड़ी रात गये लौरती है। इलकान हो जाती है भैया, मगर क्या करू, तकदीर से क्या जोर।

चैनसिंह कचहरी पहुँच गये, और महावीर सवारियों की टोह में इधर-उधर एक्के को घुमाता हुआ शहर की तरफ चला गया ! चैनसिह ने उसे पांच बजे आने को कह दिया। [ २८९ ]कोई चार बजे चैनसिंह कचहरी से फुरसत पाकर बाहर निकले। हाते में पान की दूकान थो, जरा और आगे बढ़कर एक घना बरगद का पेड़ था। उसको छाँह में बोसों ही तांगे, इक्के, फिटने खड़ी थी। घोड़े खोल दिये गये थे। वकीलों, मुख्तारों और अफसरों को धवारियां यहीं खो रहती थी चनसिंह ने पानी पिया, पान खाया भोर सोचने लगा, कोई लारो मिल जाय, तो जरा शहर चला जाऊँ कि उपकी निगाह एक घासवाली पर पड़ गई। सिर पर घास का साबा रखे साईसों से मोल-भाव कर रही थी । चैनसिंह का हृदय उछल पहा -यह तो मुलिया है ! बनी-ठनी, एक गुलाबो साड़ी पहने कोचवानों से मोल-तोल कर रही थे। कई छोचवान जमा हो गये थे। कोई उससे दिल्लगी करता था, कोई घूरता था, कोई हसता था।

एक काले-कालटे कोचवान ने कहा --- मूला, घास तो उड़के छः आने की है।

मुलिया ने उन्माद पैदा करनेवाली आँखों से देखघर कहा --- छ. आने पर लेना है, तो वह सामने सियारिन वठो हैं, चले जाओ, दो-चार पैसे कम में या जाओगे, मेरी घास तो बारह आने में ही जायगी।

एक अधेड़ कोचवान ने फिटन के ऊपर से कहा --- नेश अमाना है, बारह आने नहीं, एक रुपया मांग लेनेशले न मारेंगे और लेंगे। निकलने दे वकीलों को । भव देर नहीं है।

एक तांगेवाले ने, जो गुलावो पगड़ी बांधे हुए था, बोला---बुढ़ऊ के मुँह में भी पानी भर आया, अब मुलिया काहे को किसी की भोर देखेगा !

चैनसिंह को ऐसा क्रोध आ रहा था कि इन दुष्टों को जूतों से पौटे। सब-के-सब कैसे उसकी और टकटको लगाये ताक रहे हैं, मानों आँखों से पी जायेंगे । और मुलिया भी यहां कितनी खुश है । न लजातो है, न मिलती है, न दबतो है। कैसा मुस- किरा मुसकिराकर, रसोली आँखों से देख-देखकर, सिर का अञ्चल खिसका-खिसकाकर, मुँह मोड़-मोरकर बातें कर रही है। वही मुलिया, जो शेरनी की तरह तड़प उठी थो।

इतने में चार बजे। अमले और वकील-मुख्तारों का एक मेला-सा निकल पड़ा। अमले लारियों पर दौड़, वकील-मुख्तार इन सवारियों को जोर चले । कोचवानों ने भी चटपट घेड़े जोते। कई महाशयों ने मुलिया को रसिक नेत्रों से देखा और अपनी गाड़ियों पर जा‌।

एकाएक मुलिया घास का झावा लिये उस फिटन के पिछे शैड़ी। फिटन में एक 1 [ २९० ]
अँगरेज़ी फैशन के जवान वकील साहव बैठे थे। उन्होंने पायदान के पास पास रखवा ली, जेब से कुछ निकालकर मुलिया को दिया। मुलिया मुसकिगई। दोनों में कुछ पाते भी हुई, जो चैनसिह न सुन सके ।

एक क्षण में मुलिया प्रसन्न मुख घर की और चली। चैनसिह पानवाले की दूकान पर विस्मृति की दशा में खड़ा रहा । पानवाले ने दुकान पढ़ाई कपड़े पहने और अपने कैसिन का द्वार बन्द करके नीचे उतरा तो चैनसिंह की समाधि टूटी। पूछा- क्या दूकान बन्द कर दी।

पानवाले ने सहानुभूति दिखाकर कहा --- इसकी दवा करो ठाकुर साहब, यह बीमारी अच्छी नहीं है।

चैनसिंह ने चलित होकर पूछा --- कैसी बीमारी ?

पानवाला बोला --- कसी बीमारी! आध घण्टे से यहां खड़े हो जैसे कोई सुरक्षा खड़ा हो । सारी कचहरी खाली हो गई, सब दुकानें वन्द हो गई, मेहतर तक झा, लगाकर चल दिये, तुम्हें कुछ खबर हुई । यह बुरी बीमारी है जल्दी दवा बरा डालो।

चैनसिंह ने छड़ी संभालो और फाटक को ओर चला कि महावीर डा एका सामने से आता दिखाई दिया।

( ५ )

कुर दूर एका निकल गया, तो चैनसिंह ने पूछा --- आज तिने पैसे कमाये महावीर ?

महावीर ने हंसकर कहा --- आज तो मालिक, दिन-भर खदा ही रह गया। किसो ने बेगार में भी न पकवा । कपर से चार पैसे को बोड़ियां पी गया ।

चनसिंह ने जरा देर के बाद कहा --- मेरी एक सलाह है । तुम मुझसे एक रुपया रोज़ ले लिया करो ' वस, जब मैं बुलाऊँ, तो एका लेकर चले आया बरो। सब तो तुम्हारी घरवाली को घास लेकर बाजार न आना पड़ेगा। बोलो, मजूर है।

महावीर ने सजल आंखों से देखकर कहा --- मालिक, भाप हो का तो खाता हूँ। आपकी परजा हूँ ! जब मरजी हो, पहना मैंगवाइए । आपसे रुपये...

चैनसिंह ने बात काटकर कहा --- नही, मैं तुमसे चार नहीं लेना चाहता । तुम मुझसे एक रुपया रोज ले जाया करो। घास लेकर घरवाली को बाजार मत भेा करो। तुम्हारी आवत मेरी आवरू है । और भी रुपये पैसे का जब काम लगे, देखरके चले आया
[ २९१ ]
करो । हाँ, देखो, मुलिया से इस बात को भूलकर भी चर्चा न करना। क्या फायदा!

कई दिनों के बाद सन्ध्या समय मुलिया चैनसिंह से मिली। चैनसिंह असामियों से मालगुजारी वसुल करके घर की ओर लपका जा रहा था कि उसी जगह जहाँ उसने मुलिया की बाँह पकड़ी थी, मुलिया की आवाफा कानों में आई। उसने ठिठककर पोछे देखा, तो मुलिया दौड़ी चली आ रही थी। बोला --- क्या है, मूला ! क्यों दौड़ती हो, मैं तो खड़ा हूँ?

मुलिया ने हांफते हुए कहा --- कई दिन से तुमसे मिलना चाहती थी। आज तुम्हें आते देखा, तो दौड़ी। अब मैं घास बेचने नहीं जातो ।

चैनसिंह ने कहा --- बहुत अच्छी बात है।

'क्या तुमने मुझे कभी घास बेचते देखा है ?'

'हां, एक दिन देखा था । क्या महावीर ने तुझसे सब कह डाला ? मैंने तो सना कर दिया था।

'वह मुझसे कोई बात नहीं छिपाता।'

दोनों एक क्षण चुप खड़े रहे। किसी को कोई बात न सूझती थी। एकाएक मुलिया ने मुसकिराकर कहा --- यही तुमने मेरी बाँह पकड़ी थी।

चैनसिंह ने लजित होकर कहा --- उसको भूल जाओ मूला! मुझ पर न जाने कौन भूत सवार था।

मुलिया गद्गद कण्ठ से बोली --- उसे क्यों भूल जाऊँ ? उसो बांह गहे की लाज तो निभा रहे हो ! गरीबी आदमी से जो चाहे, करावे। तुमने मुझे बचा लिया ! फिर दोनों चुप हो गये।

जरा देर के बाद मुलिया ने फिर कहा --- तुमने समझा होगा, मैं हँसने बोलने में मगन हो रही थी?

चैनसिंह ने बलपूर्वक कहा --- नहीं मुलिया, मैंने एक क्षण के लिए भी यह नहीं समझा।

मुलिया मुसकिराकर बोली --- मुझे तुमसे यही आशा थी, और है।

पवन सींचे हुए खेतों में विश्राम करने जा रहा था, सूर्य निशा को गोद में विश्राम करने जा रहा था, और उस मलीन प्रकाश में चैनसिंह मुलिया को विलोन होतो हुई रेखा को खड़ा देख रहा था।