मानसरोवर १/नशा

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मानसरोवर १  (1947) 
द्वारा प्रेमचंद
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नशा

' ईश्वरी एक बड़े जमींदार का लड़का था और मैं एक गरीब क्लर्क का, जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई ज़ायदाद न थी। हम दोनों में परस्पर बहसें होती रहती थी। मैं ज़मींदारों को बुराई करता, उन्हें हिसक पशु और खून चूसने- वाली जोक और वृक्षों की चोटी पर फूलनेवाला बझा कहता। यह ज़मीदारों का पक्ष रेता ; पर स्वभावतः उसका पहलू कुछ कमज़ोर होता था, क्योंकि उसके पास जमी- दारों के अनुकूल कोई दलील न थी। यह कहना कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते, छोटे-बड़े हमेशा होते रहते है और होते रहेंगे, लचर दलील थी। किसी मानुषोय या नैतिक यिम से इस व्यवस्था का औचित्य सिद्ध करना कठिन था। मैं इस वाद-विवाद की गर्मा गर्मी में अबसर तेफ हो जाता और लानेवाली बात कह जाता, लेकिन ईश्वरी हारकर भी मुस्कराता रहता था। मैंने उसे कभी गर्म होने नहीं देखा शायद इसका कारण यह था कि वह अपने पक्ष की कमज़ोरी समझता था। नौकरों से वह सीधे मुंह बात न करता था। अमीरों में जो एक बेदर्दी और उद्दण्डता होती है, इसमें से भी प्रचुर भाग मिला था। नौकर ने बिस्तर लगाने में ज़रा भी देर की, दूध ज़रूरत से ज्यादाम या ठण्डा हुआ, साइकिल अच्छी तरह साफ नहीं हुई, तो वह आपे से गहर हो जाता ! सुरती या बदतमीजी की उसे जरा भी बर्दाश्त न थी; पर दोस्तों से और विशेषकर ममसे उसका व्यवहार सौहार्द और नन्नता से भरा होता था। शायद उसकी जगह में होता तो मुझमें भी वही कठोरताएँ पैदा हो जाती, ओ उसमें थी; क्योंकि मेरा लोक प्रेम सिद्धान्तों पर नहीं, निजी दशाओं पर टिका हुआ था, लेकिन वह मेरे जरह होकर भी शायद अमीर ही रहता ; वयोकि वह प्रकृति से ही विलासी और ऐश्वर्य-प्रिय था।

अबकी दशहरे की छुट्टियों में मैंने निश्च्य किया कि पर न जाऊँगा। मेरे पास किराये के लिए रुपये न और न मैं घरवालों को तकलीफ़ देना चाहता था। मैं जानता हूँ, वे मझे जो कुछ देते हैं वह उनकी स्थित से बहुत प्यादा है। इसके साथ ही परीक्षा का भी ख्यात था। भी बहुत-कुछ पढ़ना बाकी था और घर जाकर
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कौन पढ़ता है। बोडिङ्गहाउस में भूत की तरह अकेले पड़े रहने को भी जी न चाहता था। इसलिए जब ईश्वरी ने मुझे अपने घर चलने का नेवता दिया, तो मैं बिना आग्रह के राजो हो गया। ईश्वरी के साथ परीक्षा की तैयारी खूब हो जायगी। वह अमीर होकर भी मेहनती और जहीन है।

उसने इसके साथ ही कहा लेकिन भाई, एक बात का ख्याल रखना। वहीं अगर ज़मीदारों को निन्दा को तो मुआमिला बिगड़ जायगा और मेरे घरवालों को बुरा लगेगा। वह लोग तो असामियों पर इसी दावे से शासन करते हैं कि ईश्वर ने असामियों को उनकी सेवा के लिए ही पदा ख्यिा है। असामी भी यही समझता है। अगर उसे सुम्सा दिया जाय हि ज़मींदार और असामी में कोई मौलिक भेद नहीं है, तो ज़मींदारों का कहीं पता न लगे।

मैंने कहा --- तो क्या तुम समझते हो कि मैं वहाँ जाकर कुछ और हो जाऊंगा?

'हाँ, मैं तो यहो समझता हूँ।'

'तुम गलत समझाते हो।'

ईश्वरी ने इसका कोई जवाब न दिया। कदाचित् उसने इस मुआमले को मेरे विवेक पर छोड़ दिया। और बहुत अच्छा किया। अगर वह अपनी बात पर अड़ता, तो मैं भी ज़िद पकड़ लेता।

( २ )

सेकेण्ड क्लास तो क्या, मैंने कभी इण्टर क्लास से भी सफर न किया था। अब - की सेकेण्ड क्लास में सफर करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गाहो तो नौ बजे रात को आती थी, पर यात्रा के दर्ष में हम शाम को हो स्टेशन जा पहुँचे। कुछ देर इधर- उघर सैर करने के बाद रिफ्रेशमेण्ट रूम में जाकर हम लोगों ने भोजन किया मेरी वेष-भूषा और रग ढग से पारखो खानसामों को यह पहचानने में देर न लगा कि मालिक कौन है और पिछ-लागू कीन, लेकिन न जाने क्यों मुझे उनको गुस्ताखी बुरी लग रही थी। पैसे ईश्वी के जेब से गये। शायद मेरे पिता को जो वेतन मिलता है, उससे ज्यादा इन खानसामों को इनाम-इकराम में मिल जाता हो। एक अठन्नी तो चलते समय ईश्वरो हो ने दी। फिर भी मैं उन सभों से उसी तत्परता और विनय को प्रतीक्षा करता था, जिससे वे ईश्वरी को सेवा कर रहे थे। क्यों ईश्वरो के हुक्म पर सब-के-सब दौड़ते हैं, लेकिन मैं कोई चीज़ मांगता हूँ तो उतना उत्साह नहीं
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दिखाते। मुझे भोजन में कुछ स्वाद न मिला। यह भेद मेरे ध्यान को सम्पूर्ण रूप से अपनी ओर खींचे हुए था।

गाई, आई, हम दोनों सवार हुए। खानसामों ने ईश्वरी को सलाम किया। मेरी और देखा भी नहीं।

ईश्वरी ने कहा -- तमीजदार हैं ये सब ! एक हमारे नौकर हैं कि कोई काम करने का ढङ्ग नहीं।

मैंने खट्टे मन से कहा --- इसी तरह भार तुम अपने नौकरों को भी आठ आने रोज़ इनाम दिया करो तो शायद इससे ज्यादा तमोजदार हो जाय।

तो क्या तुम सकते हो, यह सब केवल इनाम के लालच से इतना अदब करते हैं।'

'जी नहीं, कदापि नहीं। तमीज़ और अदर तो इनके रक्त में मिल गया है।' गाड़ी चली। डाक थी। प्रयाग से चली तो प्रतापगढ़ जाकर रुकी। एक आदमी ने हमारा कमरा खोला। मैं तुरन्त चिल्ला उठा --- दूसरा दरजा है-सेकेण्ड क्लास है।

उस मुसाफिर ने डच्चे के अन्दर आकर मेरी और एक विचित्र उपेक्षा की दृष्टि से देखकर कहा-जी हाँ, सेवक भी इतना समझता है, और बोचवाले बर्थ पर बैठ गया। मुझे कितनी लज्जा आई, कह नहीं सकता।

भोर होते-होते हम लोग मुरादाबाद पहुँचे। स्टेशन पर कई आदमी हमारा स्वागत करने के लिए खड़े थे। दो भद्र पुरुष थे। पांच बेगार। बेगारों ने हमारा लोज उठाया। दोनों भद्र पुरुष पोछे-पीछे चले। एक मुसलमान था, रियासत अली; दूसरा ब्राह्मण था, रामहरख। दोनों ने मेरी ओर अपरिचित नेत्रों से देखा, मानों कह रहे हैं, तुम कौवे होकर इस के साथ कैसे ?

रियासत अली ने ईश्वरी से पूछा --- यह बाबू साहब क्या आपके साथ पढ़ते हैं ?

ईश्वरी ने जवाब दिया --- साथ पढ़ते भी हैं, और साथ रहते भी हैं। यों कहिए कि आप हो की बदौलत मैं इलाहावाद पड़ा हुआ हूँ, नहीं कब का लखनऊ चला आया होता। अवको में इन्हे घसीट लाया। इनके घर से कई तार आ चुके थे मगर मैंने इन्कारो जवान दिलवा दिये। आखिरी तार तो अर्जेन्ट था, जिसकी 'फ़ीस चार आने प्रति शब्द है; पर यहां से भी उसका जवाब इन्कारी हो गया। [ १०६ ]

शनों सजनों ने मेरी और चकित नेत्रों से देखा। आतकित हो जाने की चेष्टा करते हुए जान पड़े।

रियासत अली ने अर्द्धशका के स्वर में कहा लेकिन आप बड़े सादे लिबास में रहते हैं।

ईश्वरी ने शंका निवारण को --- महात्मा गांधी के भक्त है साहब! खद्दर के - सिवा कुछ पहनते ही नहीं। पुगने सारे कपड़े जला डाले। यों कहो कि राजा हैं। ढाई लाख सालाना की रियासत है। पर आपको सूरत देखो तो मालूम होता है, अभी अनाथालय से पकड़कर आये हैं!

रामहरख बोले --- अमीरों का ऐसा स्वभाव बहुत कम देखने में आता है। कोई भाप ही नहीं सकता।

रियासत अली ने समर्थन किया --- आपने महाराजा चांगली को देखा होता तो दांतों उँगली दबाते। एक गाढ़े को मिर्जई और चमरौधे जूते पहने बाजारों में धूमा करते थे। सुनते है, एक बार बेगार में पड़ गये थे और उन्हीं ने दस लाख से कालेज खोल दिया।

मैं मन में कटा जा रहा था ; पर न जाने क्या बात थी कि यह सफ़ेद झठ उस भक्त मुझे हास्यास्पद न जान पड़ा। उसके प्रत्येक वाक्य के साथ मानों में उस कल्पित वैभव के समीपतर आता जाता था।

मैं शहसवार नहीं हूँ। हाँ, लड़कपन में कई बार लद्द, घोड़ों पर सवार हुआ हूँ। यहाँ देखा तो दो कला-रास घोड़े हमारे लिए तैयार खड़े थे। मेरी तो जान ही निकल गई। सवार तो हुआ , पर योटियाँ काप रही थी। मैंने चेहरे पर शिकन न पड़ने दिया। घोड़े को ईश्वरी के पीछे डाल दिया। खैरियत यह हुई दिईश्वरी ने घोड़े को तेज न लिया, बन्ना शायद मैं हाथ-पाय तुझ्याकर लौटर।। सम्भव है, ईश्वरी ने समझ लिया हो कि यह कितने पानी में है।

( ३ )

ईश्वरी का घर क्या था, किला था। इमामबाड़े का-सा फाटक, द्वार पर पहरेदार टहलता हुआ, नौकरों का कोई हिसाब नहीं, एक हाथी बँधा हुआ। वरी ने अपने पिता, चावा, ताल आदि सबसे मेरा परिचय कगया, और उसी अतिशयोक्ति के साथ। ऐसी हवा गाँधी कि कुछ न पूछिए। नौकर चार ही नहीं, घर के लोग भी मेरा
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सम्मान करने लगे। देहात के जमींदार, लाखों का मुनाफा , मगर पुलिस कॉन्स्टेबिल को भी अफसर समझनेवाले। कई महाशय तो मुझे हुजूर-हुजूर कहने लगे। अब जरा एकान्त हुआ, तो मैंने ईश्वरी से कहा --- तुम बड़े शतान हो यार, मेरी मिट्टो क्यों पलीद कर रहे हो ?

ईश्वरी ने सुदृढ़ मुरकान के साथ कहा --- इन गधों के सामने यही चाल जारी थी। वरना सीधे मुंह बोलते भी नहीं।

ज़रा देर बाद एक नाई हमारे पांव दाने आया। कुँवर लोग स्टेशन से आये हैं, थर गये होंगे। ईश्वरी ने मेरी ओर इशारा करके कहा --- पहले कुँवर साहब के पाँव दवा।

मैं चारपाई पर लेटा हुआ था। मेरे जीवन में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी ने मेरे पांव दवाये हों। मैं इसे अमोरों के चोचले, रईसों का गधापन और बड़े आदमियों की मुधमरदो और आने क्या-क्या कहकर ईश्वरी का परिहार किया करता और आज मैं पौतों का रईस बनने का स्वांग भर रहा था !

इतने में दस बज गये। पुरानी सभ्यता के लोग थे। नई रोशनी अभी केवल पहाड़ की चोटी तक पहुंच पाई थी। अन्दर से भोजन का बुलावा आया। हम स्नान करने चले। मैं हमेशा अपनी धोती खुद छाँट लिया करता हूँ; मगर यहाँ मैंने ईश्वरी की ही भांति अपनो धोती भी छोड़ थी । अपने हाथों अपनी धोती छाँटते बड़ी शर्म आ रही थी। अन्दर भोजन करने चले। होस्टल में जूते पहने मेज़ पर जा बटते थे। • यहाँ पाँव धोना आवश्यक था। कहार पानी लिये खड़ा था। ईश्वरी ने पाँव बढ़ा दिये। कहार ने उसके पांव धोये। मैंने भी पाँव बढ़ा दिये। कहार ने मेरे पाँव भी धोये। मेरा वह विचार न जाने कहाँ चला गया था।'

( ४)

सोचा था, वहाँ देहात में एकाग्र होकर खूब पढेगे ; पर यहाँ सारा दिन सैर-सपाटे में कट जाता था। कहीं नदी में बजरे पर सैर कर रहे हैं ; कहीं मछलियों या चिड़ियों का शिकार खेल रहे हैं, कहीं पहलवानों की कुश्ती देख रहे हैं, कही शतरज पर जमे हैं। ईश्वरी खूप अण्डे मंगवाता और कमरे में 'स्टोव' पर आमलेट बनते। नौकरों का एक जत्था हमेशा घेरे रहता। अपने हाथ पाव के हिलाने को कोई जरूरत -नहीं। केवल जान हिला देना काशो है। नहाने बैठे तो आदमी नहलाने को
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हाजिर, लेटे तो दो आदमी पङ्खा मलने को खड़े। मैं महात्मा गांधी का कुँवर चेला मशहूर था भीतर से बाहर तक मेरी धाक था। नाश्ते में जरा भी देर न होने पाये, कहों कुंघर साहब नाराज़ न हो जायें, बिछावन ठीक समय पर ला जाय, कुँवर साहब के सोने का समय आ गया। मैं ईश्वरी से भी ज्यादा नाजुकदिमाय बन गया था, या बनने पर मजबूर किया गया था। ईश्वरी अपने हाथ से बिस्तर बिछा ले , लेकिन कुवर मेहमान अपने हाथों कैसे अपना बिछावन विछा सकते हैं। उनकी महा- नता में बट्टा लग जायगा।

एक दिन सचमुच यही बात हो गई। ईश्वरी घर में थे। शायद अपनी माता से कुछ बात-चीत करने में देर हो गई। यहाँ दस बज गये। मेरी आखें नींद से झपक रही थी। मगर बिस्तर कैसे लगाऊँ ? कुँबर जो ठहरा। कोई साढ़े ग्यारह बजे महरा भाया। बड़ा मुंह-लगा नौकर था। घर के धन्धों में मेरा बिस्तर लगाने को उसे सुधि ही न रही। अब जो याद आई, तो यागा हुआ आया। मैंने ऐसो डाँट पताई लि उसने भी याद किया होगा।

ईश्वरी मेरी डांट सुनकर बाहर निकल आया और बोला --- तुमने बहुत अच्छा किया। यह सव हरामखोर इसी व्यवहार के योग्य है।

इसी तरह ईश्वरी एक दिन एक जगह दावत में गया हुआ था। शाम हो गई। मगर लैम्प न जला। लैम्प मेज पर रखा हुआ था। दियासलाई भी वही थी , लेकिन ईश्वरी खुद कभी लैम्प नहीं जलाता। फिर कुँवर साइप कसे जलायें ? में झुंझला रहा था समाचार-पत्र आया रखा हुआ था। जी उघर लगा हुआ था, पर लैम्म नदारद देवयोग से उसी वक्त मुन्शी रियासत अली आ निकले। में उन्हों पर उबल पक्षा, ऐसी फटकार बताई कि वेचारा उल्लू हो गया --- तुम लोगो को इतनी फिट भी नहीं कि लैम्प तो जलवा दो। मालूम नहीं, ऐसे कामचोर आदमियों का यहां केसे गुज़र होता है। मेरे यहाँ घण्टे भर निर्वाह न हो। रियासत अली ने कापते हुए हाथों से लेम्पलला दिया।

वहाँ एक ठाकुर अनवर जाया करता। कुछ मनचला आक्ष्मी था, महात्मा गांधी का परम भक्त। मुझे महात्माजी का चेला समझाकर मेरा बड़ा लिहान करता था; पर मुझसे कुछ पूछते संकोच करता था। एक दिन मुझे अकेला देखकर आया और हाथ बांधकर बोला- सरकार तो गधो बार के चेले हैं न ? लोग कहत हैं कि यहाँ सुराज हो जायगा तो जमीदार न रहेंगे। [ १०९ ]

मैंने शान जमाई --- जमींदारों के रहने की जरुरत ही क्या है ? यह लोग ग़रीबी का खून चूसने के सिवा और क्या करते हैं ?

ठाकुर ने फिर पूछा --- तो क्या सरकार, सभी जमीदारों की ज़मीन छीन ली बायगी ? .

मैंने कहा --- बहुत-से लोग तो खुशो से दे देंगे। जो लोग खुशी से न देंगे उनकी जमीन छीननी ही पड़ेगी। हर लोग तो तैयार बैठे हुए हैं। ज्याही स्वराज्य हुआ, अपने सारे इलाके असामियों के नाम हिबा कर देंगे।

मैं कुरसी पर पाँव लटकाये बैठा था। ठाकुर मेरे पाँव दबाने लगा। फिर बोला --- आजकल जमोदार लोग बड़ा जुलुम करते हैं सरकार ! हमें भी हजूर अपने इलाके में थोड़ी-सी जमीन दे दे, तो चलकर वहीं आपकी सेवा में रहें।

' मैंने कहा --- अभी तो मेरा कोई अख्तियार नहीं है साई, लेकिन ज्योंही अस्ति- यार मिला, मैं सबसे पहले तुम्हें बुलाऊँगा। तुम्हें मोटर-ड्राइवरी सिखाकर अपना हाइवर बना लूगा।

मुना, उस दिन ठाकुर ने खूब भंग पो और अपनी स्त्री को खूब पीटा और गाँव के महाजन से लड़ने पर तैयार हो गया।

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छुट्टी इस तरह तमाम हुई और हम फिर प्रयाग चले। गांव के बहुत-से लोग इम लोगों को पहुँचाने आये। ठाकुर तो हमारे साथ स्टेशन तक आया। मैने भी अपना, पार्ट खूब सफाई से खेला और अपनी कुवेरोचित विनय और देवत्व की मुहर हरेक हृदय पर लगा दी। जी तो चाहता था, हरेक नौकर को अच्छा इनाम दूं; लेकिन वह सामर्थ्य कहाँ थी? वापसी टिकट था ही, केवल गाड़ी में बैठना था ; पर गाड़ी आई तो ठसाठस भरी हुई। दुर्गापूजा की छुट्टियाँ भोगकर सभी लोग लौट रहे थे। सेकेण्ड क्लास में तिल रखने की जगह नहीं। इण्टर क्लास की हालत उससे भी बदतर। यह आखिरी गाड़ी थी। किसी तरह रुक न सकते थे। बड़ी मुश्किल से तीसरे दरजे में जगह मिलो। हमारे ऐश्वर्य ने वहाँ अपना रग जमा लिया , मगर मुझे उसमें बैठना बुरा लग रहा था। आये थे आराम से लेटे-लेटे, जा रहे थे सिकुड़े हुए। पहल बदलने की भी जगह न थी।

कई आदमी पढ़े-लिखे भी थे। वे आपस में अंग्रेजी राज्य की तारीफ़ करते जा
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रहे थे। एक महाशय बोले-ऐसा न्याय तो किसी राज्य में नहीं देखा। छोटे-बड़े सब बराबर। राजा भी किसी पर अन्याय करे, तो अदालत उसको भी गर्दन दया देती है।

दुसरे सज्जन ने समर्थन किया --- अरे साहब, आप खुद बादशाह पर दावा कर सकते हैं। अदालत में मादशाह पर डिग्री हो जाती है।

एक आदमी, जिसकी पीठ पर बड़ा-सा गट्ठर बांधा था, कलकत्ते जा रहा था। कहीं गठरी रखने की जगह न मिलती थी। पीठ पर बांधे हुए था। इससे बेचन होकर भार-बार द्वार पर खड़ा हो जाता। में द्वार के पाय हो वठा हुआ था। उसका बार-बार जाकर मेरे मुंह को भरनो गठरी से रगड़ना मुझे बहुत बुरा ला रहा था। एक तो हवा योहो कम थी, दूसरे उस गवार सा आकर मेरे मुंह पर खड़ा हो जाना माना मेरा गला दबाना था। मैं कुछ देर तक जन्त किये बठा रहा। एकाएक मुझे क्रोध आ गया। मैंने उसे पकड़कर पीछे ढकेल दिया और दो तमाचे जोर शोर से लगाये।

उसने पाखें निकालकर कहा --- क्यों मारते हो बाबूजी, हमने भी गिराया दिया है।

मैंने उठकर दो-तीन तमाचे और जस दिये ्।

गाड़ी में तूफ़ान आ गया। चारों ओर से मुम पर बौछार पड़ने लगी।

'अगर इतने नाजुक-मिजाम हो, तो अब्बल दर्जे मस्या नहीं बठे?'

'कोई बड़ा आदमी होगा तो अपने घर का होगा। मुझे इस तरह मारते, तो दिखा देता।

'क्या कसूर किया था बेचारे ने ? गाड़ी में सांस लेने को जगह नहीं, खिड़को पर जारा साँस लेने सड़ा हो गया तो उस पर इतना काध! अमीर होकर क्या आदलो अपनी इन्सानियत बिलकुल खो देता है ?

'यह भी अंगरेजी राज है, जिसका थाप बखान कर रहे थे।'

एक प्रामीण गोला-दफ्तरन मा घुस पाचत नहीं, उस पे इत्ता मिजाज !

ईश्वरी ने अग्रेजी में कहा --- What an idiot you are Bir!

और मेरा नशा अब कुछ-कुछ उतरता हुआ मालूम होता था।