मानसरोवर १/शांति

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मानसरोवर १  (1947) 
द्वारा प्रेमचंद
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शांति

स्वर्गीय देवनाथ मेरे अभिन्न मित्रों में थे। आज भी जब उनकी याद आ जाती है, तो वह ईंगरेलियाँ आँखों में फिर जाती हैं, और कहीं एकान्त में जाकर जरा देर रौ लेता हूँ। हमारे और उनके बीच में दो-ढाई सौ मिक्त का अन्तर था। मैं लखनऊ में था, वह दिल्ली में, लेकिन ऐसा शायद ही कोई महीना जाता हो कि हमें आपस में न मिल जाते हैं। वह स्वच्छन्द प्रकृति के, विनोद-प्रिय, सहृदय, उदार और मिळू पर प्राण देनेवाले आदमी थे, जिन्होंने अपने और पराये में भी भेद नहीं किया। सच्चाई क्या है और यहाँ लौकिक व्यवहार को कैसे निर्वाह होता है, यह उस व्यक्ति ने कभी न जानने की चेष्टा की। उनके जीवन में ऐसे कई अवसर आये, जब उन्हें आगे के लिए होशियार हो जाना चाहिए था, मित्रों ने उनकी निकटता से अनुचित लाभ उठाया। और कई बार उन्हें लज्जित भी होना पड़ा; लेकिन उस भले आदमी ने जीवन से कोई सबक लेने की कसम खा की थी। उनके व्यवहार जयों-कै-त्यों रहे-जैसे भोलानाथ जिये, वैसे ही भोलानाथ मरे।' जिस दुनिया में वह रहते थे वह निराली दुनिया थी, जिसमें सन्देह, चालाकी और कपट के लिए स्थान न था—सब अपने थे, कोई गैर न था। मैंने बार-बार उन्हें सचेत करना चाहा। पर इसका परिणाम आशा के विरुद्ध हुभा। जीवन के स्वप्न को भंग करते उन्हें हार्दिक वेदना होती थी। मुझे कभी-कभी चिन्ता होती थी कि इन्होंने हाथ बन्द न किया, तो नतीजा क्या होगा ? लेकिन विडबना यह थी कि उनको खो गौपा भी कुछ उसी सांचे में ढली हुई थी। इमारी देविय में से एक चातुरी होती है, जो सदैव ऐसे उड़ाऊ पुरुषों को असावधानियों पर ब्रेक का काम करती है, उससे वह वंचित थी। यहाँ तक कि वस्त्राभूषण में भी उसे विशेष रुचि न थी। अतएव, जब मुझे देवनाथ के स्वर्हरोहण का समाचार मिला, और मैं भागी हु। दिल्ली गया, तो घर में बरतन-भाई और मकान के सिवा और कोई संपत्ति न थी। और अभी उनकी उम्र ही क्या थी, जो संचय की चिन्ता करते। चालीस भी तो पूरे न हुए थे। यों तो लड़कपन उनके स्वभाव में ही था; लेकिन इस तम्र में प्रायः सभी लोग कुछ बेफिक रहते हैं। पहले एक लड़को हुई थी। इसके बाद दो
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लड़के हुए। दोनों लड़के तो बचपन में ही दया दे गये थे। लड़की बच रही थी, और यही इस नाटक का सबसे करुण दृश्य था। जिस तरह का इनका जीवन था, उसके देखते इस छोटे-से परिवार के लिए दो सौ रुपये महीने की जरूरत थी। दो-तीन साल में लड़की का विवाह भी करना होगा। कैसे क्या होगा, मेरी बुद्धि कुछ काम न करती थी।

इस अवसर पर मुझे यह वहुमूल्य अनुभव हुआ कि जो लोग सेवा-भाव रखते हैं और जो स्वार्थ-सिद्धि को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाते, उनके परिवार को आड़ ‘देनेवालों की कमी नहीं रहती। यह कोई नियम नहीं हैं ; क्योंकि मैंने ऐसे लोगों को भी देखा है, जिन्होंने जीवन में बहुतों के साथ सलूक किये ; पर उनके पीछे उनके याल-बच्चों को किसी ने बात तक न पूछी ; लेकिन चाहे कुछ हो, देवनाथ के मित्र ने प्रशसनीय औदार्य से काम लिया और गोपा के निर्वाह के लिए स्थायौ धन जमा करने का प्रस्ताव किया। दो-एक सज्जन जो रंडुवे थे, उससे विवाह करने को तैयार थे ; किन्तु गोपी ने भी उसी स्वाभिमान का परिचय दिया, जो हमारी देवियों का जौहर है और इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। मकान बहुत बड़ा था। उसका एक भाग किराये पर उठा दिया। इस तरह उसको ५०) माहवार मिलने लगे। वह इतने में ही अपना नियहि कार लेगी ! जो कुछ खर्च था, वह सुन्नी की जास से था। गोपा के लिए तो जीवन में अब कोई अनुराग ही न था ।

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इसके एक ही महीने बाद मुझे कारोबार के सिलसिले में विदेश जाना पड़ा और वहाँ मेरे अनुमान से छह अधिक-दो साल--लग गये। पोप के पन्न बराबर जाते रहते थे, जिससे मालूम होता था-वे आराम से हैं, कोई चिन्ता की बात नहीं, है। मुझे पीछे ज्ञात हुआ कि गोपा ने मुझे भी ग्रे र समझा और वास्तविक स्थिति छिपाती रही।

विदेश से लौटकर मैं सीधा दिल्ली पहुँचा। द्वार पर पहुँचते ही मुझे रोना आ गया। मृत्यु की प्रतिध्वनि-सी छाई हुई थी। जिस कमरे में मित्रों के जमघट रहते -ये, उसके द्वार बंद थे, मकड़ियों ने चारों ओर जाले तान रखे थे। देवनाथ के साथ -वह श्री भी लुप्त हो गई थी। पहली नज़र मैं तो मुझे ऐसा भ्रम हुआ कि देवनाथ द्वार पर खड़े मेरी ओर देखकर मुस्करा रहे हैं। मैं मिथ्यावादी नहीं हैं और आत्मा की
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दैहिकता में मुझे सदेह है; लेकिन उस वक एक बार में चौंक ज़रूर पक्ष। हृदय में एक कम्पन-सा उठा लेकिन दूसरी नज़र में प्रतिमा मिट चुकी थी। द्वार खुला। गोपा के सिवा खोलनेवाला कौन था? मैंने उसे देखकर दिल थाम लिया। उसे मेरे आने की सूचना थी और मेरे स्वागत की प्रतीक्षा में उसने नई साड़ी पहन ली थी और शायद आल भी गुँथा लिये थे ; पर इन दो वर्षों में समय ने उस पर जो आघात किये थे, उन्हें क्या करती ? नारियों के जीवन में यह वह अवस्था है, जई रूप-लावण्य अपने पूरे विकास पर होता है, जब उसमें अल्हड़पन, चचलता और अभिमान की जगह आकर्षण, माधुर्य और रसिकता आ जाती है, लेकिन गोपा का यौवन बीत चुका था। उसके मुख पर झुर्रियों और विषाद को रेखाएँ अकित थीं, जिन्हें उसकी प्रयत्न- शील प्रसन्नता भी न मिटा सकती थी। केशों पर सफेदी दौड़ चली थी और एक-एक अग बूढ़ा हो रहा था।

मैंने करुण स्वर में पूछा --- क्या तुम बीमार थी, गोपा ?

गोपा ने आँसु पीकर कहा --- नहीं तो, मुझे तो कभी सिर-दर्द भी नहीं हुआ।

'तो तुम्हारी यह क्या दशा है। बिलकुल बूढ़ी हो गई हो।'

'तो अब जवानी लेकर करना ही क्या है ? मेरी उम्र भी तो पैंतीस के ऊपर हो गई।

'पैंतीस की उन्न तो बहुत नहीं होती।'

'हां, उनके लिए, जो बहुत दिन जीना चाहते हैं। मैं तो चाहती हूँ, जितनी जल्द हो सके, जीवन का अन्त हो जाय। बस सुन्नी के ब्याह को चिंता है। इससे छुट्टी पा जाऊँ, फिर मुझे जिंदगी की परवाह न रहेगी।'

अब मालूम हुआ कि जो सजन इस मकान में किरायेदार हुए थे, वह थोड़े दिनों के बाद तबदील होकर चले गये और तब से कोई दूसरा किरायेदार न आया। मेरे हृदय में बरछी-सी चुभ गई। इतने दिनों इन बेचारों का निर्वाह कैसे हुआ, यह कल्पना हो दुःखद थी।

मैंने-विरक्त मन से कहा --- लेकिन तुमने मुझे सूचना क्यों न दी। क्या मैं बिलकुल गैर हूँ ?

गोपा ने लज्जित होकर कहा --- नहीं-नहीं, यह बात नहीं है। तुम्हें गैर समझूँगी तो अपना किसे समझूँगी ? मैंने समझा, परदेश में तुम खुद अपने झमेले में पड़े होगे,
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तुम्हें क्यों सताऊँ ? किसी-न-किसी तरह दिन कट हो गये। घर में और कुछ न था, तो थोड़े-से गहने तो थे हो। अब सुनीता के विवाह को चिंता है। पहले मैंने सोचा था। इस मकान को निकाल दूंगी, बीस बाईस हजार मिल जायेंगे। विवाह भी हो जायगा और कुछ मेरे लिए बच भी रहेगा। लेकिन बाद को मालूम हुआ कि मकान 'पहले ही रेहन हो चुका है और सूद मिलाकर उस पर बीस हज़ार हो गये हैं। महा- जन ने इतनी हो दया क्या कम की कि मुझे घर से निकाल दिया। इधर से तो "अब कोई आशा नहीं है। बहुत हाथ-पाँव जोड़ने पर, संभव है, महाजन से दो-ढाई हज़ार और मिल जाय। इतने में क्या होगा ? इसी फ़िक्र में घुली जा रही हूँ। लेकिन, मैं भी कितनी मतलबी हूँ, न तुम्हें हाथ-मुँह धोने को पानी दिया, न कुछ जलपान लाई और अपना दुखड़ा ले बैठी। अब आप कपड़े उतारिए और आराम से बैठिए। कुछ खाने को लाऊँ, खा लीजिए, तब बाते हो। घर पर तो सब कुशल है।

मैंने कहा --- मैं तो सीधा बम्बई से यहाँ भा रहा हूँ। घर कहाँ गया।

गोपा ने मुझे तिरस्कार-भरी आँखों से देखा ; पर उस तिरस्कार की आड़ में घनिष्ठ आत्मीयता बैठी झांक रही थी। मुझे ऐसा जान पड़ा, उसके मुख को झुर्रियाँ मिट गई हैं। पीछे मुख पर हलको-सौ लाली दौड़ गई। उसने कहा-इसका फल यह होगा कि तुम्हारी देवोजी तुम्हें कभी यहाँ न आने देगी।

मैं किसी का गुलाम नहीं हूँ।'

'किसी को अपना गुलाम बनाने के लिए पहले खुद भी उसका गुलाम बनना पड़ता है।'

शीतकाल की संध्या देखते-ही-देखते दीपक जलाने लगी। सुन्नी लालटेन लेकर कमरे में आई। दो साल पहले की अबोध और कृशतनु वालिका रूपवती युवती हो गई थी, जिसकी हर एक चितवन, हर एक बात, उसकी गौरवशील प्रकृति का पता दे रही थी। जिसे मैं गोद में उठाकर प्यार करता था, उसकी तरफ आज आखें न उठा सका और वह जो मेरे गले से लिपटकर प्रपन्न होती थी, आज मेरे सामने खड़ी भी न रह सकी। जैसे मुझसे कोई वस्तु छिपाना चाहती है। और जैसे मैं उसे उस वस्त को छिपाने का अवसर दे रहा हूँ।

मैंने पूछा --- अब तुम किस दरजे में पहुँचौं सुन्नी ?

उसने सिर झुकाये हुए जवाब दिया-दसवें में हूँ। [ ९२ ]'घर का भी कुछ काम-काज करती हो ?'

'अम्मा जब करने भी दें।'

गोपा बोली --- मैं नहीं करने देती या तू खुद किसी काम के नगीच नहीं जाती ?

सुन्नी मुंह फेरकर हँसती हुई चली गई। मां की दुलारी लड़की थी। जिस दिन वह गृहस्थी का काम करती, उस दिन शायद गोपा रो-रोकर आंखें फोड़ लेती। वह खुद लकी को कोई काम न करने देती थी। मगर सबसे शिकायत करती यो कि वह कोई काम नहीं करती। यह शिकायत भी उसके प्यार का ही एक करिश्मा था। हमारी 'मर्याद' हमारे बाद भी घोषित रहती है। मैं भोजन करके लेटा, तो गोपा ने फिर सुन्नी के विवाह की तैयारियों को चर्चा छेड़ दी। इसके सिवा उसके पास और बात ही क्या थी। लड़के तो बहुत मिलते हैं। लेकिन कुछ हैसियत भी तो हो। लड़को को यह सोचने का अवसर क्यों मिले कि दादा होते, तो शायद मेरे लिए इससे अच्छा घर-वर ढूँढते। फिर गोपा ने डरते-हरते लाला मदारीलाल के लड़के का ज़िक्र किया।

मैंने चकित होकर उसकी ओर देखा। लाला मदारोलाल पहले इंजीनियर थे। भव पेंशन पाते थे, लाखों रुपया जमा कर लिये थे, पर अब तक उनके लोभ को प्यास न बुझी थी। गोपा ने घर भो वह छोटा, जहां उसको रसाई कठिन थी।

मैंने आपत्ति को मदारीलाल तो बड़ा हो दुर्जन मनुष्य है।

गोपा ने दांतों तले जोम दवाकर कहा --- अरे नहीं भैया, तुमने उन्हें पहचाना न होगा। मेरे ऊपर बड़े दयालु हैं। कभी-कभी आकर कुशल-समाचार पूछ बाते हैं। लहका ऐसा होनहार है कि मैं तुमसे क्या कहूँ। फिर उनके यहाँ कमी किस बात की है ? यह ठीक है कि पहले वह खूप रिश्वत लेते थे, लेकिन यहाँ धर्मात्मा कौन है ? कौन अवसर पाकर छोड़ देता है ? मदारीलाल ने तो यहां तक कह दिया है कि वह मुमसे दहेज नहीं चाहते, केवल कन्या चाहते हैं। सुन्नी उनके मन में बैठ गई है।

मुझे गोपा की सरलता पर दया आई। लेकिन मैंने सोचा, क्यों इसके मन में किसी के प्रति अविश्वास उत्पल कह। संभव है, मदारीलाल वह न रहे हों। चित्त को भावनाएं बदलती भी रहती हैं।

मैंने अर्ध-सहमत होकर कहा --- मगर यह तो सोचो, उनमें और तुममें कितना सन्तर है। तुम शायद अपना सर्वस्व अर्पण करके भी उनका मुंह सीधा न कर सकी। [ ९३ ]लेकिन गोपा के मन में बात जम गई थी। सुन्नो को वह ऐसे घर में ब्याहना चाहती थी, जहाँ वह रानी बनकर रहे।

दूसरे दिन प्रातःकाल मैं मदारीलाल के पास गया और उनसे मेरी जो बातचीत हुई, उसने मुझे मुग्ध कर लिया। किसी समय वह लोभी रहे होंगे। इस समय तो मैंने उन्हें बहुत ही सहृदय, उदार और विनय-शील पाया। बोले-भाई साहब, मैं देव- नाथजीसे परिचित हूँ। आदमियों में रत्न थे। उनको लकी मेरे घर में आये, यह मेरा सौभाग्य है। आप उसकी माँ से कह दें, मदारीलाल उनसे किसी चीज़ की इच्छा नहीं रखता। ईश्वर का दिया हुआ मेरे घर में सब कुछ है, मैं उन्हे जेरबार नहीं करना चाहता।

मेरे दिल का बोझ उतर गया। हम सुनी-सुनाई बातों से दूसरों के सम्बन्ध में कैसी मिथ्या धारणा कर लिया करते हैं, इसका बड़ा शुभ अनुभव हुआ। मैंने आकर गोपा को बधाई दी। यह निश्चय हुआ कि गरमियों में विवाह कर दिया जाय। ,

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ये चार महीने गोपा ने विवाह की तैयारियों में काटे। मैं महीने में एक बार अवश्य उससे मिल आता था ; पर हर भार खिन्न होकर लौटता। गोपा ने अपनी कुल- मर्यादा का न जाने कितना महान् आदर्श अपने सामने रख लिया था। पगली इस भ्रम में पड़ी हुई थी कि उसका यह उत्साह नगर में अपनी यादगार छोड़ जायगा। यह न जानती थी कि यहां ऐसे तमाशे रोज होते हैं और आये-दिन भुला दिये जाते हैं। शायद वह संसार से यह श्रेय लेना चाहती थी कि इस गई-बौती दशा में भी, लय हुआ हाथी नौ लाख का है। पग-पग पर उसे देवनाथ को याद आती। वह होते तो यह काम यों न होता, यों होता, और तब वह शेती। मदारीलाल सज्जन है, यह सत्य है। लेकिन गोपा का अपनो कन्या के प्रति भो तो कुछ धर्म है। कौन उसके दस-पांच लड़कियां बैठी हुई हैं। वह तो दिल खोलकर अरमान निकालेगी। सुन्नी के लिए उसने जितने गहने और जोड़े बनवाये थे, उन्हें देखकर मुझे आश्चर्य होता था। जब देखो, कुछ-न-कुछ सी रही है, कभी सुनारों की दुकान पर बैठी हुई है, कभी मेहमानों के आदर-सत्कार का आयोजन कर रही है, मुहल्ले में ऐसा बिरला ही कोई सम्पन्न मनुष्य होगा, जिससे उसने कुछ कर्ज न लिया हो। वह इसे कर्ज समझती थो; पर देनेवाले दान समझकर देते थे। सारा मुहला उसका सहायक था। सुन्नी अब मुहल्ले की लड़की
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थी। गोपा को इज्जत सबकी इज्जत है और गोपा के लिए तो नींद और आराम हराम था। दर्द से सिर फटा जा रहा है, आधी रात हो गई। मगर वह बैठो कुछ-न- कुछ सो रही है, या 'इस कोठी का धान उस कोठी' कर रही है। कितनी वात्सल्य से भरो भाकाक्षा थो कि जो देखनेवालों में श्रद्धा उत्पन्न कर देती थी।

अकेली औरत और वह भी आधी जान की। क्या क्या करे। जो काम दूसरों पर छोड़ देती है, उसी में कुछ न कुछ कसर रह जाती है। पर उसको हिम्मत है कि किसी तरह हार नहीं मानती।

पिछली बार उसको दशा देखकर मुझसे न रहा गया। बोला ---गोपा देवी, अगर मरना ही चाहती हो, तो विवाह हो जाने के बाद मरो। मुझे भय है कि तुम उसके पहले ही न चल दो।

गोपा का मुरझाया हुआ मुख प्रमुदित हो उठा। बोली-इसको चिन्ता न करो भैया, विधवा को आयु बहुत लम्बी होती है। तुमने सुना नहीं, राड मरे न खंडहर ढहे। लेकिन मेरी कामना यही है कि सुन्नी का ठिकाना लगाकर मैं भी चल दूँ। अब और जीकर क्या करूँगी, सोचो। क्या कल, अगर किसी तरह का विघ्न पड़ गया, तो किसकी बदनामी होगी ? इन चार महीनों में मुश्किल से घण्टा-भर सोती हूँगो। नींद ही नहीं आती, पर मेरा चित्त प्रसन्न है। मैं मरूँ या जीऊँ, मुझे यह सन्तोष तो होगा कि सुन्नी के लिए उसका बाप जो कर सकता था, वह मैने कर दिया। मदारीलाल ने अपनी सज्जनता दिखाई, तो मुझे भी तो अपनी नाक रखती है।

एक देवी ने आकर कहा --- बहन, जरा चार देख लो, चाशनी ठीक हो गई है या नहीं। गोपा उसके साथ चाशनी को परीक्षा करने गई और एक क्षण के बाद भाकर बोलो --- जी चाहता है, सिर पीट लू। तुम जरा बात करने लगी, उधर चारानी इतनी कड़ी हो गई कि लट दातों से लड़ेगे। किससे क्या कहूँ !

मैंने चिढ़ार कहा --- तुम व्यर्थ का मट कर रही हो। क्यों नहीं किसी हलवाई‌। को घुलाकर मिठाइयों का ठीका दे देती ? फिर तुम्हारे यहाँ मेहमान हो कितने भायेंगे, जिनके लिए यह तमार बांध रहो हो। दस-पाच को मिठाई उनके लिए बहुत होगी।

गोपा ने व्यथित नेत्रों से मेरो और देखा। मेरी यह आलोचना उसे दुरो लो। इन दिनों से मात बात पर मोच आ आता था। बोलो --- भैया, तुम यह बातें न सम- झोगे। तुम्हें न मां बनने का अवसर मिला, न पत्नी बनने का! सुन्नी के पिता का
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कितना नाम था, कितने आदमी उनके दम से बोते थे, क्या यह तुम नहीं जानते ! वह पगढी मेरे ही सिर तो बंधी है। तुम्हे विश्वास न आयेगा, नास्तिक जो ठहरे पर मैं तो उन्हें सदेव अपने अन्दर बैठा हुआ पाती हू, जो कुछ कर रहे हैं, वह कर रहे है, मैं मन्दबुद्धि स्त्री भला अकेली क्या कर देती ? वही मेरे सहायक हैं, वही मेरे प्रकार हैं। यह समझ लो कि यह देह मेरी है ; पर इसके अन्दर जो आत्मा है, वह उनकी है। जो कुछ हो रहा है, उनके पुण्य-आदेश से हो रहा है। तुम उनके मित्र हो। तुमने अपने सकड़ों रुपये खर्च किये और इतना हैरान हो रहे हो। मैं तो उनकी सहामिनी हूँ, लोक में भी, परलोक में भी।

मैं अपना-सा मुँह लेकर रह गया।

( ४ )

जून में विवाह हो गया। गोपा ने बहुत कुछ दिया और अपनी हैसियत से बहुत ज्यादा दिया लेकिन फिर भी, उसे संतोष न था। आज सुन्नी के पिता होते, तो न जाने क्या करते ! बराबर रोती रही।

जाड़ों में में फिर दिल्ली गया। मैंने समझा था, अब गोपा सुखी होगी। लड़की का घर और वर दोनो आदर्श हैं। गोपा को इसके सिवा और क्या चाहिए। लेकिन सुख उसके भाग्य में ही न था।

मैं अभी कपड़े भी न उतारने पाया था कि उसने अपना दुखड़ा शुरू कर दिया - भैया, पर-द्वार सम अच्छा है, सास-ससुर भी अच्छे हैं। लेकिन जमाई निकम्मा निकला। सुन्नी बेचारी रो-रकर दिन काट रही है। तुम उसे देखो, तो पहचान न सको। उसकी परछाई मात्र रह गई है। अभी कई दिन हुए, आई हुई थी, उसकी दशा देख. कर छाती फटती थी। जैसे जीवन में अपना पथ खो बैठी हो। न तन-बदन की सुध है, न कपड़े-लत्ते को। मेरी सुन्नी की यह दुर्गति होगी, यह तो स्वप्न में भी न सोचा था। बिलकुल गुम-सुम हो गई है। कितना पूछा --- बेटी, तुझसे वह क्यों नहीं बोलता, किस बात पर नाराज़ है। लेकिन कुछ जवाब ही नहीं देतो। बस, आँखों से भास बहते रहते हैं। मेरो मुन्नी कुएँ में गिर गई।

मैंने कहा --- तुमने उसके घरवालों से पता नहीं लगाया ?

'लगाया क्यों नहीं भैया, सम हाल मालुम हो गया। लौंडा चाहता है, मैं चाहे
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जिस राह जाऊँ, सुनो मेरी पूजा करती रहे। सुनो भला इसे क्यों सहने लगी। उसे तो तुम जानते हो, कितनी अभिमानिनी है। वह उन नियों में नहीं है, जो पति को देवता समझती है और उसका दुर्व्यवहार सहतो रहती हैं। उसने सदैव दुलार और प्यार पाया है। वाप भी उस पर जान देता था। मैं भी आँख को पुतलो समतो थी। पति मिला छैला, जो आधी-आधी रात तक मारा-मारा फिरता है। दोनों में क्या पात हुई, यह कौन जान सकता है, लेकिन दोनों में कोई गांठ पढ़ गई है। न वह सुन्नी की परवाह करता है, न सुन्नी उसकी परवाह करती है। मगर वह तो अपने रंग में मस्त है, सुन्नी प्राण दिये देती है। उसके लिए सुन्नी की जगह मुन्ती है, सुन्नो के लिए उसकी उपेक्षा है --- और रुदन है।'

मैंने कहा --- लेकिन तुमने सुन्नी को समझाया नहीं ? उस लौंडे का क्या बिग- ड़ेगा ! इसकी तो ज़िन्दगी खराब हो जायगी।

गोपा की आँखों में आँसू भर आये। बोली --- भया, किस दिल से समझाऊँ ? सुन्नी को देखकर तो मेरी छाती फटने लगती है। बस, यहो जी चाहता है कि इसे अपने कलेजे में रख लें, कि इसे कोई कड़ी आंख से देख भो न सके। सुन्नी फूहड़ होती, कट-भाषिणी होती, आरामतलव होती, तो समझाती भी। क्या यह सममाऊँ हि तेरा पति गली गली मुंह काला करता फिरे, फिर भी तू उसकी पूजा किया कर ? मैं तो खुद यह अपमान न सह सकती। स्त्री-पुरुष में विवाह को पहली शर्त यह है कि दोनों सोलहों आने एक दूसरे के हो जाय । ऐसे पुरुष तो कम हैं, जो स्त्रा को जो-भर भी विचलित होते देखकर शात रह सकें, पर ऐसी स्त्रियां बहुत है, जो पति को स्वच्छन्द सममती हैं। सुन्नी उन स्त्रियों में नहीं है। वह अगर आत्म समर्पण करती है, तो आत्म-समर्पण चाहती भी है, और यदि पति में यह बात न हुई, तो वह उससे कोई सम्पर्क न रखेगी, चाहे उसका सारा जीवन रोते कट जाय।

यह कहकर गोपा भीतर गई और एक सिंगारदान लाकर उसके अन्दर के आभू- पण दिखाती हुई बोली --- सुन्नी इसे भबकी यहीं छोड़ गई। इसो लिए आई ही यो। ये वे गहने हैं, जो मैंने न जाने कितने कष्ट महकर बनवाये थे। उनके पीछे महीनों मारी-मारी फिरी थी। यों कहो कि भीख मांगकर जमा किये घे। सुन्नी अब इनको और आँख उठाकर भी नहीं देखती। पहने तो किसके लिए ? जिगार करे तो किस पर ? पाच सन्दक कपड़ों के दिये थे। कपड़े सोते सोते मेरो आँखें फट गई। [ ९७ ]
वह सब कपड़े उठाती लाई। इन चीजों से जैसे उसे घृणा हो गई है। बस, कलाई में दो कांच की चूड़ियाँ और एक उजली साड़ी, यही उसका सिगार है ! मैंने गोपा को सांत्वना दी-मैं जाकर जरा केदारनाथ से मिलगा। देखू तो, वह किस रंग-ढंग का आदमी है।

गोपा ने हाथ जोड़कर कहा --- नहीं भैया, भूलकर भी न जाना ; सुन्नी सुनेगी तो प्राण ही दे देगी। अभिमान की पुतली ही समझो उसे। रस्सो समझ लो, जिसके जल जाने पर भी बल नहीं जाते। जिन पैरों ने उसे ठुकरा दिया है, उन्हें वह कभी न सहलायेगी। उसे अपना बनाकर कोई चाहे तो लौंडी बना ले , लेकिन शासन तो उसने मेरा न सहा, दूसरों का क्या सहेगी।

मैंने गोपा से तो उस वक्त कुछ न कहा; लेकिन अवसर पाते ही लाला मदारी- लाल से मिला। मैं रहस्य का पता लगाना चाहता था। सयोग से पिता और पुत्र, दोनों एक ही जगह मिल गये। मुझे देखते ही केदार ने इस तरह झुककर मेरे चरण छुए कि मैं उसकी शालीनता पर मुग्ध हो गया। तुरन्त भौतर गया और वाय, मुरब्बा और मिठाइयों लाया। इतना सौम्य, इतना सुशोल, इतना विनन्न युवक मैंने न देखा था। यह भावना ही न हो सकती थी कि इसके भीतर और बाहर में कोई अन्तर हो सकता है। जब तक रहा, सिर झुकाये बैठा रहा। उच्छृङ्खलता तो उसे छू भी नहीं गई थी।

जब केदार टेनिस खेलने चला गया, तो मैंने मदारीलाल से कहा --- केदार बाबू तो बहुत सन्चश्त्रि जान पड़ते हैं, फिर स्त्री-पुरुष में इतना मनोमालिन्य क्यों हो गया है ?

मदारीलाल ने एक क्षण विचार करके कहा-इसका कारण इसके सिवा और क्या बताऊँ कि दोनों अपने माँ बाप के लादले हैं, और प्यार लड़कों को अपने मन का बना देता है। मेरा सारा जीवन संघर्ष में स्टा। अब जाकर जरा शांति मिली है। भोग-विलास का कभी अवसर ही न मिला। दिन-भर परिश्रम करता था, संध्या को पड़कर सो रहता था। स्वास्थ्य भी अच्छा न था, इसलिए बार-बार यह चिन्ता सवार रहती थी दि कुछ सचय कर लें। ऐसा न हो कि मेरे पीछे बाल-बच्चे भीख मांगते फिरे। नतीजा यह हुआ कि इन महाशय को मुफ्त का धन मिला। सनक सवार हो गई। शराब उड़ने लगी। फिर ड्रामा खेलने का शौक हुआ। धन की कमी थी ही नही, उस पर मां-बाप के अवेले बेटे। उनकी प्रसन्नता हो हमारे जीवन का स्वर्ग
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थी। पढ़ना-लिखना तो दूर रहा, विलास को इच्छा बढ़ती गई। रग और गहरा हुमा, अपने जीवन का ड्रामा खेलने लगे। मैंने यह रंग देखा तो मुझे चिंता हुई। सोचा, च्याह कर दूं, ठीक हो जायगा। गोपा देवी का पैगाम आया, तो मैंने तुरन्त स्वीकार कर लिया। मैं सुन्नी को देख चुका था। सोचा, ऐसौ रूपवती पत्नो पाकर इसका मन स्थिर हो जायगा, पर वह भी लाडली लडको धी-हठीलो, अबोध, भादर्शवादिनी। सहिष्णुता तो उसने सीखी ही न थी। समझौते का जीवन में क्या मूल्य है, इसकी उसे खर ही नहीं। लोहा लोहे से लड़ गया। वह अभिमान से इसे पराजित करना चाहती है, यह उपेक्षा से। यही रहस्य है। और साहब, मैं तो बह को ही अधिक दोषों सम- झता हूँ। लड़के तो प्रायः मनचले होते ही हैं। लड़किया स्वभाव से ही सुशीला होती हैं और अपनी जिम्मेदारी समझती हैं। उनकी सेवा, त्याग और प्रेम ही उनका मन्त्र है, जिससे वे पुरुष पर विजय पाती हैं । वह में ये गुण नहीं हैं। डोंगा कैसे पार होगा, ईश्वर हो जाने।

सहसा सुन्नी अन्दर से आ गई। बिलकुल अपने चित्र की रेखा-सी, मानों मनो- हर संगीत की प्रतिध्वनि हो। कुन्दन तपकर भस्म हो गया था। मिठो हुई आशाओं का इससे अच्छा चित्र नहीं हो सकता। उलाहना देतो हुई बोली --- आप न जाने कब से बैठे हुए है, मुझे खबर तक नहीं, और शायद आप बाहर-हो-बाहर चले भी जाते। मैंने आसुओं के वेग को रोकते हुए कहा --- नहीं सुन्नी, यह कैसे हो सकता था। तुम्हारे पास मा हो रहा था कि तम स्वय आ गई।

मदारीलाल छमरे के बाहर अपनी 'कार' को सफ़ाई कराने लगे। शायद मुझे सुन्नी से बातचीत करने का अवसर देना चाहते थे।

सुन्नी ने पूछा --- अम्माँ तो अच्छी तरह हैं।

'हाँ, अच्छी हैं। तुमने अपनी यह क्या गत बना रखी हे ?'

'मैं तो बहुत अच्छी तरह से हूँ ।'

'यह बात क्या है ? तुम लोगों में यह क्या अनबन है ? गोपा देवी प्राण दिये डालती हैं। तुम खुद मरने की तैयारी कर रही हो। कुछ तो विचार से काम लो।'

सुन्नी के माथे पर बल पड़ गये-आपने नाहक यह विषय छेड़ दिया चाचाजी। मैंने तो यह सोचकर अपने मन को समझा लिया कि मैं अभागिन हूँ। बम, इसका निवारण मेरे बूते से बाहर है। मैं उस जीवन से मृत्यु को कहाँ अच्छा समझतो हूँ,
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जहाँ अपनी कदर न हो। मैं व्रत के बदले में व्रत चाहती हूँ। जीवन का कोई दूसरा रूप मेरी समझ में नहीं आता। इस विषय में किसी तरह का समझौता करना मेरे लिए असम्भव है। नतीजे की मैं परवाह नहीं करती !

'लेकिन। '

'नहीं चाचाजी, इस विषय में अब कुछ न कहिए, नहीं तो मैं चलो जाऊँगी।'

'आखिर सोचो तो...'

'मैं सब सोच चुकी और तय कर चुकी। पशु को मनुष्य बनाना मेरी शक्ति के इसके बाद मेरे लिए अपना मुंह बन्द कर लेने के सिवा और क्या रह गया था?

( ५ )

मई का महीना था। मैं मंसूरी गया हुआ था कि गोपा का तार पहुँचा -'तुरन्त आओ, जरूरी काम है। मैं घबरा तो गया, लेकिन इतना निश्चित था कि कोई दुर्घ- टना नहीं हुई है। दूसरे ही दिन दिल्ली जा पहुँचा। गोपा मेरे सामने आकर खड़ी हो गई. निःस्पन्द, मूक निष्प्राण, जैसे तपेदिक का रोगी हो।

मैने पूछा --- कुशल तो है, मैं तो घबरा उठा।

उसने बुझी हुई आँखों से देखा और बोली --- सच !

'सुन्नी तो कुशल से है?'

'हां, अच्छी तरह है।'

'और केदारनाथ'

'वह भी अच्छी तरह है।'

'तो फिर माजरा क्या है ?

'कुछ तो नहीं।'

'तुमने तार दिया और कहती हो --- कुछ तो नहीं।'

'दिल घबरा रहा था, इससे तुम्हें बुला लिया। सुन्नी को किसी तरह समझाकर यहाँ लाना है। मैं तो सब कुछ करके हार गई।'

'क्या इधर कोई नई बात हो गई।'

'नई तो नहीं है, लेकिन एक तरह से नई ही समझो। केदार एक ऐक्ट्रेस के साथ कहाँ भाग गया। एक सप्ताह से उसका कही पता नहीं है। सुन्नी से कह गया
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है --- जब तक तुम रहोगी, घर न आऊँगा। सारा घर सुन्नो का शत्रु हो रहा है। लेकिन वह वहां से टलने का नाम नहीं लेती। सुना है, केदार अपने बाप के दस्तखत बनाकर कई हज़ार रुपये बैंक से ले गया है।'

'तुम सुन्नी से मिली थी ?'

'हो, तीन दिन से बराबर जा रही हूँ।'

'वह नहीं आना चाहती, तो रहने क्यों नहीं देती?

'वहाँ वह घुट-घुटकर मर जायगी।'

मैं उन्हीं परों लाला मदारीलाल के घर चला। हालांकि मैं जानता था कि सुन्नी किसी तरह न आयगो, मगर वहाँ पहुचा, तो देखा- कुहराम मचा हुआ है। मेरा कलेजा धक्-से रह गया। वहाँ ता अर्थी सज रही थी। मुहल्ले के सैकड़ों आदमी जमा थे। घर में से 'हाय ! हाय !' की कादन-ध्वनि आ रही थी। यह सुन्नी का शव था।

मदारीलाल मुझे देखते ही मुझसे उन्मत्त की भांति लिपट गये और बोले --- भाई साहब, मैं तो लुट गया। लड़का भी गया, बहू भी गई, ज़िदगी ही ग्रारत हो गई।

मालूम हुआ कि जब से केदार गायब हो गया था, सुन्नी और भी ज्यादा उदास रहने लगी थी। उसने उसी दिन अपनो चूड़ियां तोड़ डाली थी और मांग का सिंदूर पाँछ डाला था। सास ने जब आपत्ति की, तो उनको अपशब्द कहे। मदारोलाल ने समझाना चाहा, तो उन्हें भी जली-कटी सुनाई। ऐसा अनुमान होता था --उन्माद हो गया है। लोगों ने उससे बोलना छोड़ दिया था। आज प्रात काल यमुना स्नान करने गई। अंधेरा था सारा घर सो रहा था। किसी को नहीं लगाया। जव दिन चढ़ गया और बहू घर में न मिली, तो उसकी तलाश होने लगी। दोपहर को पता लगा कि यमुना गई है। लोग उधर भागे। वहाँ उसको लाश मिली। पुलिस भाई, शव की परीक्षा हुई। अब जाकर शव मिला है। मैं कलेजा थामकर बैठ गया। हाय, अभी थोड़े दिन पहले जो सुन्दरी पालकी पर सवार होकर आई थी, आज वह चार के कन्धे पर जा रही है।

मैं अर्थी के साथ हो लिया और वहाँ से लौटा तो रात के दस बज गये थे। मेरे पाँव काँप रहे थे। माल्म नहीं, यह खबर पाकर गोपा की क्या दशा होगी। प्राणान्त न हो जाय, मुझे यही भय हो रहा था। सुन्नी उसका प्राण थी, उसके जीवन
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का केन्द्र थी। उस दुखिया के उद्यान में यही एक पौधा बच रहा था। उसे वह हृदय- रक्त से सीच-बीचकर पाल रही थी। उसके बसन्त का सुनहरा स्वप्न हो उसका जीवन था-उसमें कोपलें निकलेगो, फूल खिलेंगे, फल लगेंगे, चिड़ियाँ उसकी डालियों पर बैठकर अपने सुहाने राग गायेंगी ; किन्तु आज निष्ठुर नियति ने उस जीवन-सूत्र को उखाड़कर फेंक दिया । और अब उसके जीवन का कोई आधार न था। वह विन्दु ही मिट गया था, जिस पर जीवन की सारी रेखाएँ आकर एकत्र हो जाती थीं।

दिल को दोनों हाथों से थामे, मैंने जजीर खटखटाई। गोपा एक लालटेन लिये निकली। मैंने गोपा के मुख पर एक नये आनन्द को झलक देखी।

मेरी शोल - मुद्रा देखकर उसने मातृवत्-प्रेम से मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली --- आज तो तुम्हें सारे दिन रोते ही कटा। अर्थी के साथ बहुत --- से आदमी रहे होंगे! मेरे जी में भी आया कि चलकर सुन्नी का अन्तिम दर्शन कर लें। लेकिन, मैंने सोचा-जब सुन्नी ही न रही, तो उसको लाश में क्या रखा है। न गई।

मैं विस्मय से गोपा का मुंह देखने लगा। तो इसे यह शोक-समाचार मिल चुका है। फिर भी यह शांति ! और यह अविचल धैर्य ! गोला --- अच्छा किया, न गई, रोना ही तो था।

'हां, और क्या होती तो यहाँ भी लेकिन तुमसे सच कहती हूँ, दिल से नहीं रोई। न जाने कैसे आंसू निकल आये। मुझे तो सुन्नी की मौत से प्रसन्नता हुई। दुखिया अपनी 'मान-मर्यादा' लिये संसार से विदा हो गई, नरी तो न जाने क्या-क्या देखना परता , इसलिए और भी प्रसन्न हूँ कि उसने अपनी आन निभा दी। स्त्री को जीवन में प्यार न मिले, तो उसका अन्त हो जाना ही अच्छा। तुमने सुन्नी की मुद्रा देखी थी, लोग कहते हैं, ऐसा जान पड़ता था --- मुस्करा रही है। मेरी सुन्नी सचमुच देवी थी। भैया, आक्ष्मी इसलिए थोड़े ही जीना चाहता है कि रोता रहे। जब मालूम हो गया कि जीवन में दुख के सिवा और कुछ नहीं है, तो आदमी जीकर क्या करे ? किसलिए जिये ? खाने और सोने और मर जाने के लिए ? यह मैं नहीं कहती कि मुझे सुन्नी की याद न आयगी और मैं उसे याद करके रोऊँगी नहीं ; लेकिन वह शोक के आंसू न होंगे, हर्ष के आँसू होंगे। बहादुर बेटे को मां उसकी वोरगति पर प्रसन्न होती है। मुन्नी को मौत में क्या कुछ कम गौरव है ? मैं आँसू बहाकर उस गौरव का अनादर कैसे करूँ ? वह जानती है, और चाहे सारा संसार उसकी निन्दा करे, उसकी
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माता उसकी सराहना ही करेगी। उसकी आत्मा से यह आनन्द भी छीन लूँ ? लेकिन अब रात ज़्यादा हो गई है। ऊपर जाकर सो रहो। मैंने तुम्हारी चारपाई बिछा दी है ; मगर देखो, अकेले पड़े-पड़े रोना नहीं। सुन्नी ने वही किया, जो उसे करना चाहिए था। उसके पिता होते तो आज सुन्नी की प्रतिमा बनाकर पूजते।

मैं ऊपर जाकर लेटा, तो मेरे दिल का बोझ बहुत हलका हो गया था ; किंतु रह-रहकर यह सन्देह हो जाता था कि गोपा को यह शाति उसकी अपार व्यथा का ही रूप तो नहीं है।