मानसरोवर १/पूस की रात

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मानसरोवर १  (1947) 
द्वारा प्रेमचंद
[ १४३ ]
पूस की रात

हल्कू ने आकर स्त्री से कहा --- सहना आया है, लाओ, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूं, किसी तरह गला तो छुटे।

मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली --- तीन हो तो रुपये हैं। दे दोगे तो कम्मल कहाँ से आवेगा ? माध-पूस की रात हार में कैसे कटेगी। उससे कह दो, फसल पर रुपये दे देंगे। अभी नहीं है।

हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में बड़ा रहा। पूस सिर पर आ गया, कम्मल के बिना हार में रात को वह किसी तरह नहीं सो सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, धुड़कियां समावेगा, गालियां देगा। बला से माझे मरेंगे, बला तो सिर से टल जायगी। यह सोचता हुआ वह अपना भारी-भरकम डील लिये हुए (जो उसके नाम को मुठ सिद्ध करता था) स्त्री के समीप गया और खुशामद करके बोला --- ला दे दे, गला तो छूटे। कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूंगा।

मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और आँखें तरेतरी हुई बोली --- कर चुके दुसरा उपाय ! जरा सुनें, कौन उपाय करोगे ? कोई खैरात दे देगा कम्मल ? न जाने कितनी बाकी है जो किसी तरह चुस्ने हो नहीं भाती। मैं कहती हूँ, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते ? मर-मर काम करो, उपन हो तो बाको दे दो, चलो छुट्टी हुई। माकी चुकाने के लिए हो तो हमारा जनम हुआ है। पेट के लिए मजूरी करो। ऐसी खेती से बाज आये। मैं रुपये न दंगो-न दूंगी।

हल्कू उदास होकर बोला --; क्या गाली खाऊं ?

मुन्नी ने तापकर कहा --- गाली क्यों देगा, क्या उसका राम है ?

मगर यह कहने के साथ ही उसकी तनी हुई भौहें ढीली पड़ गई। हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह माना एक भीषण जंतु की भौति उसे घूर रहा था।

आले पर से रुपये निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिये। फिर बोली --- तुम छोड़ दो अबकी से खेती। मजूरी में सुख से एक रोटी खाने को तो मिलेगी। किसी की धौंस तो न रहेगी। अच्छी खेती है। मजूरी करके लाओ, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर से धौंसा। [ १४४ ]हल्कू ने रुपये लिये और इस तरह शहर चला मानों अपना ह्रदय निकालकर देने जा रहा हो। उसने मजूरी में एक-एक पैसा काट-कपटकर तीन रुपये कम्बल के लिए जमा किये थे। वह आज निकले जा रहे थे। एक-एक पग के साथ उसका मस्तक अपनी दीनता के भार से दबा जा रहा था।

( २ )

पूस की अंधेरी रात! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पत्तों को एक छतरी के नीचे बाँस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा काँप रहा था। खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट में मुंह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था। दो में से एक को भी नींद न आती थी।

हल्कू ने घुटनियों को गर्दन में चिमटाते हुए कहा—क्यों जबरा, जाड़ा लगता है? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहाँ क्या लेने आये थे। अब खामो मैं क्या करूं। जानवे थे, मैं यहाँ हलुवा-पूरो खाने आ रहा हूं, दो-दो आगे-आगे चले आये। अब रोओ नानी के नाम को।

जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलाई और अपनी कूँ - कूँ को दोर्घ बनाता हुआ एक बार जम्हाई लेकर चुप हो गया। उपक श्वान-बुद्धि ने शायद ताइ लिया, स्वामी को मेरी कूँ - कूँ से नींद नहीं आ रही है।

हल्कू ने हाथ निकालकर जारा को ठण्ड' पोठ सहलाते हुए कहा-कल से मत बाना मेरे साथ, नहीं तो ठण्डे हो जाओगे। यह रोड पचा न जाने कहाँ से बरफ लिये आ रही है। उलूं, फिर एक चिलप भरूं। किसी तरह रात तो कटे! आठ चिलम तो पो चुका। यह खेतो का मना है। और एक-एक मागवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास आ जाय तो गमी से घनाकर भागे ! मोटे-मोटे गद्दे, लिहाफ, कम्मल ! मजाल है, आहे का गुजर हो जाय । तकदोर को खूपी है। मजूरो हम करें, मजा दुसरे लूट!

हल्कू उठा और गड्ढे में से ज़रा-सी भाग निकालकर चिलम भरी। जबरा भी उठ बैठा।

हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा, पियेगा चिलम ? बाड़ा तो क्या जाता है, हो, ना मन बहल जाता है।

जबरा ने उसके मुंह की ओर प्रेम से छलकती हुई आँखों से देखा। [ १४५ ]हल्कू --- आज और जादा खा ले। कल से मैं यहाँ पुाले निछा दूंगा। उसी में धुसकर बैठना तब जामान लगेगा।

जबरा ने अगले पंजे उसकी घुटनियों पर रख दिये और उसके मुंह के पास अपना मुँह ले गया। हत्कू को उसकी गर्म साँस लगी।

चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके बेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊँगा पर एक ही क्षण में उसके हृदय में कंपन होने लगा। कभी इसे करवट लेटता, कभी उस करवट ; पर जाड़ा किसी पिशाच की भांति उसकी छाती को दबाये हुए था।

जब किसी तरह न रहा गया, तो उसने जब को घोरे से उठाया और उसके सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया। कुत्ते को देह से जाने कैसी दुर्गन्ध भा रही थी। पर वह उसे अपनी गोद से-चिमटाये हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था। जबरा शायद समझ रहा था कि स्वर्ग यही है ; और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा को गन्ध तक न थी। अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता। वह अपनी दोनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा को पहुँचा दिया। नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सम द्वार खोल दिये थे और उसका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था।

सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पाई। इस विशेष आत्मीयता ने उसमें एक नई स्फूर्ति पैदा कर दी थी, जो हवा के ठण्डे मौकों को तुच्छ समझती थी। वह मकर सठा और छतरी के बाहर आकर भूकने लगा! हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया ; पर वह उसके पास न आया। हार में चारों तरफ दौड़-दौड़कर भूकता रहा। एक क्षण के लिए भा भी जाता, तो तुरन्त ही फिर दौड़ता। कर्तव्य उसके हृदय में अरमान की भांति उठल रहा था।

( ३ )

एक घण्टा और गुज़र गया। रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरू किया। हरकू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया। फिर भी टण्ड कम हुई। ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया है, धमनियों में रक्त की जगह हिम बह रहा है। उसने झुककर आकाश की और देखा, अभी कितनी
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रात बाकी है ! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े। ऊपर आ जायेंगे तम कहीं सबेस होगा। अभी पहर से ऊपर रात है। हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर भामों का एक बाग था। पतझड़ शुरू हो गई थी। बाग में पत्तियों का ढेर लगा हुआ था। हल्कू ने सोचा, चलकर पत्तियां बटोरूँ और उन्हें जलाकर खूब तापूँ रात को कोई मुझे पत्तियां बटोरते देखे तो समझे कोई भूत है। कौन जाने कोई जानवर ही छिपा बैठा हो ; मगर अब तो बैठे नहीं रहा जाता।

उसने पास के अरहर के खेत में जाकर कई पौधे उखाड़ लिये और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलाता हुआ उपला लिये बगीचे की तरफ़ चला। जबरा ने उसे आते देखा, तो पास आया और दुम हिलाने लगा।

हल्कू ने कहा --- अब तो नहीं रहा जाता जबरू! चलो, बगीचे में पत्तियां बटोरकर तापें। टोटे हो जायगे, तो फिर आकर सोयेंगे। अभी तो रात बहुत है।

जबरा ने कूँ-कूँ करके सहमति प्रकट को ओर आगे-आगे बगीचे की ओर चला।

बगीचे में खूब अँधेरा छाया हुआ था और अन्धकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था। वृक्षों से बोस को बूंदें टप-टप नीचे टपक रही-थीं।

एकाएक एक-झोंका मेंहदी के फूलों की खुशबू लिये हुए भाया।

हल्कू ने कहा --- कैसी अच्छी महक, आई जबरू ! तुम्हारी नाक में भी कुछ सुगन्ध आ रही है।

जबरा को कहीं ज़मीन पर एक हड्डी पड़ी मिल गई थी। उसे चिचोड़ रहा था।

हल्कू ने आग ज़मीन पर रख दी और पत्तियां बटोरने लगा। जरा देर में पत्तियों का एक ढेर लग गया। हाध ठिठुर जाते थे। नगे पांव पले जाते थे। - और वह पत्तियों का पहाद खवा कर रहा था। इसी अलाव में पह ठण्ड को जलाकर भस्म कर देगा।

थोड़ी देर में अलाव जल उठा। उसको लौ ऊपरवाले वृक्ष की, पत्तियों को इन छूकर भागने लगो। उस अस्पिर प्रकाश में क्योचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थे मानों उस अथाइ अन्धकार को अपने सिरों पर संभाले हुए हो। अन्धकार के उस अनन्त सागर में यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था। [ १४७ ]हस्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा यां। एक क्षण में उसने दोहर उतार- कर बगल में दवा ली और दोनों पाव फैला दिये, मानों ठण्ड को ललकार रहा हो, 'तेरे जी में जो आये सो कर।' ठण्ड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विषय- गर्व को हृदय में छिपा न सकता था।

उसने जबरा से कहा --- क्यों बब्बर, अब ठण्ड नहीं लग रही है ?

जब्बर ने कूं - कूं करके मानों कहा --- अब क्या ठण्ड माती ही रहेगी।

'पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठण्ड क्यों खाते।'

बबर ने पूँछ हिलाई।'

'अच्छा आओ, इस अलाव को कूदकर पार करें। देखे, कौन निकल जाता है। अगर जल गये बचा, तो मैं दवा न करूंगा।'

जब्बर ने उस अग्निराशि की ओर कातर नेत्रों से देखा।

'मुन्नी से कल न कह देना, नहीं लड़ाई करेगी।'

यह कहता हुआ वह उछला और उप अवाल के छपर से साफ निकल गया। पैरों में ज़रा लपट लगी, पर वह कोई बात न थी। जबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ।

हल्कू ने कहा --- चलो-चलो, इसको सही नहीं। ऊपर से कूदकर भाभो । वह फिर कूदा और भलाव के इस पार आ गया।

( ४ )

पत्तियां बल चुकी थीं। बीचे में फिर मैंधेरा छाया था। राख के नीचे कुछ- कुछ आग बाकी थी, जो हवा का मौका भा जाने पर प्ररा जाग उठती थी पर एक क्षण में फिर भाख बन्द कर लेती थी।

हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुन- गुनाने लगा। उसके बदन में गर्मी आ गई थी। पर ज्यों-ज्यों शोत बढ़ती जाती भी, उसे भालस्य दवाये लेता था।

जबरा जोर से, भूककर खेत की और भागा। हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुण्ड उसके खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुण्ड या उनके कूदने-दौड़ने को भापागाफ कान में भा रही थी। फिर ऐसा मालम हुआ कि वह खेत में चर रही है। बनके, सबाने को भावान चघर सुनाई देने समी। [ १४८ ]उसने दिल में कहा --- नहीं, अबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं मा सकता । नौच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहाँ ! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोका हुआ !

उसने जोर से आवाज लगाई --- जबरा, जबरा।

जबरा भूकता रहा। उसके पास न भाया।

फिर खेत के चरे आने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना सहर भा रहा था। कैसा ददाया हुआ मैठा था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असूक भान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला।

उसने जोर से आवाज़ लगाई --- लिहो-लिहो ! लिहो !!

जबरा फिर भूक उठा। जानवर खेत चर रहे थे। फसल तैयार है। कैसो अच्छी खेती थी , पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किये डालते हैं।

हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन कदम चला; पर एकाएक हवा का ऐसा ठण्डा, चुमनेवाला, बिच्छु के डंक का-सा मौका लगा कि वह फिर दुमते हुए अलाव के पास भा बैठा और राख को इरेदकर अपनी ठण्डो देह को गर्माने लगा।

जबरा अपना गला फाड़े डालता था, नीलगायें खेत का सफाया किये डालत भों और हाकू गर्म राख के पास शांत ठा, हुआ था। अकर्मण्यता ने रस्सियों को भौति उसे चारों तरफ से पकड़ रखा था।

उसो राख के पास गर्म जमीन पर वह चादर ओढ़कर सो गया।

सवेरे जब उनको नीद शुलो, तब चारों तरफ धूप फैल गई थी । और मुनो कह रही थौ-क्या आज स्रोते ही रहोगे ? तुम यहां लाकर रम गये और उधर सारस खेत चौपट हो गया।

हल्कू ने उठकर कहा --- क्या त खेत से होकर भा रही है ?

मुन्नी बोली --- हाँ, सारे खेत का सत्यानास हो गया। भला ऐसा भी कोई सौता है। तुम्हारे यहां मया डालने से क्या हुआ ?

हल्कू ने बहाना किया --- मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत को पदी है। पेट में ऐसा दरद हुभा, ऐसा दरद हुमा कि मैं हो जानता हूँ। [ १४९ ]दोनों फिर खेत के दौड़ पर आये। देखा, सारा, खेत-रौंदा पड़ा हुआ है और जबरा मँड़ैया के नीचे चित लेटा है, 'मानों प्राण हो न हों।

दोनों खेत की दशा देख रहे थे। मुन्नी के मुख पर उदासी छाई थी; पर हल्कू प्रसन्न था।

मुन्नी ने चिंतित होकर कहा --- अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।

हल्कू ने प्रसन्न-मुख से कहा --- रात की ठण्ड में यहां सोना तो न पड़ेगा।