मानसरोवर १/बेटोंवाली विधवा

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
मानसरोवर १  (1947) 
द्वारा प्रेमचंद
[ ५८ ]
बेटोंवाली विधवा

पण्डित अयोध्यानाथ का देहान्त हुआ तो सबने कहा, ईश्वर आदमी को ऐसी ही मौत दे। चार जवान बेटे थे, एक लड़की। चारों लड़कों के विवाह हो चुके थे, केवल लड़की क्वाँरी थी। सम्पत्ति भी काफी छोड़ी थी। एक पक्का मकान, दो बगीचे, कई हज़ार के गहने और बीस हज़ार नकद। विधवा फूलमती को शौक तो हुआ और कई दिन तक बेहाल पड़ी रही, लेकिन जवान बेटों को सामने देखकर उसे ढाढस हुआ। चारों लड़के एक से-एक सुशील, चारों बहुए एक-से-एक बढ़ कर आज्ञाकारिणी। जब वह रात को लेटती, तो चारों बारी-बारी से उसके पाँव दबात, वह स्नान कै उठती, तो उसकी साड़ी छांटती। सारा घर उसके इशारे पर चलता था। बड़ी लड़का कामता एक दफ्तर में ५०J पर नौकर था, छोटा उमानाथ डाक्टरी पास कर चुका था और छह औषधालय खोलने की फिक्र में था, तीसरा दयानाथ दी० ए० में फेल झे गया था और पत्रिकाओं में लेख लिखकर कुछ न-कुछ कमा लेता था, चौथा सीतानाथ चारों में सबसे कुशाग्र और होनहार था और अबकी साल बी० ए० प्रथम श्रेणी में पास करके एम० ए० की तैयारी में ला हुआ था। किसी लड़के में वह दुर्व्यसन, वह छैलापन, वह लुटाऊपन न था, जो माता-पिता को जलाता और कुलमर्यादा की डुवाता है। फूलमती घर की मालकिन थी। गोकि कुञ्जिय बड़ी बहू के पास रहती थीं—बुढिया में वह अधिकार-प्रेम न था, जो वृद्धजनों को कटु और कलहशील बना दिया करता है ; किन्तु उसकी इच्छा के बिना कोई वालक्क मिठाई तक न मॅगा सकता था।

सन्ध्या हो गई थी। पण्डितजी को मरे आज बारहवाँ दिन था। कल तेरही है। ब्रह्मभोज होगा। बिरादरी के लोग निमन्त्रित होंगे। उसी की तैयारियाँ हो रही थीं। फूलमती अपनी कोठरी में बैठी देख रही थी, कि पल्लेदार बोरे में आटा लाकर रख रहे हैं। घी के टिन आ रहे हैं। शाक-भाजी के टोकरे, शक्कर की बोरियां, दही के मटके चले आ रहे हैं। महापात्र के लिए दाने की चीजें लाई गईं-चर्तन, कपड़े, पलग, विछावन, छाते, जूते, छड़ियाँ, लालटेने आदि ; किन्तु फूलमती को कोई चीज़
[ ५९ ]
नहीं दिखाई गई। नियमानुसार ये सब सामान उसके पास आने चाहिए थे। वह प्रत्येक वस्तु को देखती, उसे पसन्द करती, उसकी मात्रा में कमो-वेशी का फैसला करती ; तब इन चीज़ों छौ भण्डारे में रखा जाता है क्यों उसे दिखाने और उसको राय लेने की ज़रूरत नहीं समझो गई ? अच्छा ! वह आटा तीन ही बोरा क्यों आया है उसने तो पाँच चोरों के लिए कहा था। घी भी पाँच ही कनस्तर है। उसने तो इस नस्तर मँगवाये थे ? इसी तरह शा-भाजी, शक्कर, दही आदि में भी कम की गई होगी। किसने उसके हुक्म में हस्तक्षेप किया है जब उसने एक बात तय कर दी, तब किसे उसको घटाने-बढ़ाने का अधिकार है ?

आज चालीस वर्षों से घर के प्रत्येक मामले में फूलमती की बात सर्वमान्य थी। उसने सौं कहा तो सौ खर्च किये गये, एक कहा तो एक। किसी ने मीन-मेष को। यहाँ तक कि पं० अयोध्यानाथ भी उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ न करते थे; पर आज उसकी आंखों के सामने प्रत्यक्ष रूप से उसके हुई जा रही हैं। इसे यह क्योंकर स्वीकार कर सकती !

कुछ देर तक तो वह जब्त किये बैठी रही ; पर अन्त में न रहा गया। स्वायत्त शासन उसका स्वभाव हो गया था। वह क्रोध में भरी हुई आई और कामतानाथ से बोली---क्या आटा तीन ही बोरे लाचे ? मैंने तो पाँच बौरे के लिए कहा था। और बी भी पाँच ही दिन मंगवाया ! तुम्हें याद है, मैंने दस कनस्तर कहा है किफ़ायत को मैं बुरा नहीं समझती ; लेकिन जिसने यह कुआँ खोदा उसी की आत्मा पानी को तरसे, यह कितनी लज्जा की बात है।

कामतानाथ ने क्षमा-याचना न की, अपनी भूल भी स्वीकार न की, लज्जित भी नहीं हुआ। एक मिनट तो विद्रोही भाव से खड़ा रहा, फिर धोला--हम लोगों को पुलाह तीन ही वोरों की हुई और तीन छोरे के लिए पाँच टिन घो काफ़ी था। इसी हिसाब से और चीजें भी झूम कर दी गई हैं।

फूलमती उग्र होकर बोली --- किसकी राय से आटा कम किया गया ?

‘हम लोगों की राय से।’

‘तो मेरी राय कोई चीज़ नहीं है ?

‘है क्यों नहीं ; लेकिन अपना हानि-लाभ तो हम भी समझते हैं।'

फूलमतो इक्का-बक्का होकर उसका मुंह ताकने लगी । इस वाक्य का आशय उसकी
[ ६० ]
समझ में न आया। अपना हानि-लाभ ! अपने घर में हानि-लाभ को जिम्मेदार वह आप है। दूसरों को, चाहे वे उसके पेट के जन्मे पुत्र ही क्यों न हों, उसके काम में हस्तक्षेप करने का क्या अधिकार ? यह लौंडा तो इस ढिठाई से जवाब दे रहा है, मान घर उसी का है, उसी ने मर-मरकर गृहस्थी चौड़ी है, मैं तो गैर हूँ। ज़रा इसकी है तो देखो !

उसने तमतमाये हुए मुख से कहा---मेरे हानि-लाभ के जिम्मेदार तुम नहीं हो। सल्ले अख्तियार है, जो उचित खमझे इद्द करू। अभी जाकर दो बोरे आटा और पाँच दिन घी और लाओ और आगे के लिए खरदार, जो किसी ने मेरी बात कोटी।

अपने विचार में उसने काफो तम्बाह कर दी थी। शायद इतनी कठोरता अनावश्यक थी। उसे अपनी उग्रता पर खेद हुआ। लइके हो तो हैं, समझे होगे, कुछ किफायत करनी चाहिए। मुझसे इसलिए न पूछा होगा कि अम्म तो खुद हरेक क्रम में विकायत किया करती हैं। अगर इन्हें मालूम होता, कि इस काम में मैं किफायत पसन्द न करूंगी ; तो कभी इन्हें मेरो उपेक्षा करने का साहस न होता। यद्यपि कापतानाथ अब भी उसो जगह खड़ा था और उसकी भावभगी से ऐसा ज्ञात होता था कि इस आज्ञा का पालन करने के लिए वह बहुत उत्सुक नहीं, पर फूलमती निश्चिन्त होकर अपनी कोठरी में चली गई। इतनी तम्बीह पर भी किसी को उसकी अवज्ञा करने का सामर्थ्य हो सकता है, इसकी सम्भावना का ध्यान भो उसे न आया।

पर ज्यों-ज्य समय बीतने लगा, उस पर यह इकोक्रत खुलने लगी कि इस घर में अब उसकी वह हैसियत नहीं रही, जो दस-बारह दिन पहले थी। सम्बन्धियों के यहाँ से नेवते से शकर, मिठाई, दही, अचार आदि आ रहे थे। बड़ो बहू इन वस्तु को स्वामिनी-भाव से सँभाल-सँभालकर रख रही थी। कोई भी उम्रप्से पूछने नहीं अतः। विरादरी के लोग भी जो कुछ पूछनें हैं, कामतानाथ से, या बड़ी बहू से। कामतानाथ कहाँ का चढ़ा इन्तज़ामार है, रात-दिन भग पिये पड़ा रहता है। किसी तरह रो-धोकर दफ़्तर इला जाता है। उसमें भी महोने में पन्द्रह ना से कम नहीं होते। वह तो कहो, हुन पण्डितजी का लिहाज करता है, नहीं अब तक कभी झा निकाल देता है और वह बहू-जैसी फूहड़ औरत भला इन बातों को क्या समझेगी। अपने पदे लत्ते तक तो जतन से रख नहीं सकती, चलो है गृहस्थी चलाने। भद होगी। और क्या। सब मिलकर कुल की नाक कटवायेंगे। वक्त पर कोई-न-कोई चीज़ कम
[ ६१ ]
हो जायगी। इन कामों के लिए बड़ा अनुभव चाहिए। कोई चीज़ तो इतनी बन जायगी, कि मारी-मारी फिरेगी। कोई चीज़ इतनी कम बनेगी कि किसी पत्तल पर पहुँचेगी, किसी पर नहीं। आखिर इन सबों को हो क्या गया है। अच्छा, बहू तिजोरी क्यों खोल रही है ? वह मेरी आज्ञा के यिना तिजोरी खोलनेवाली कौन होती है ? कुञ्जो उसके पास है अवश्य ; लेकिन जब तक मैं रुपये न मिलबा, तिजोरी नहीं खुलती। आज तो इस तरह खोल रही है, मानों मैं कुछ है ही नहीं। यह मुझसे न बर्दाश्त होगा।

वह समझकर उठी और बड़ी बहू के पास जाकर कठोर स्वर में बोली तिजोरी क्यों खोलती हो बहु, मेंने तो खोलने को नहीं कहा ?

बड़ी बहू ने निस्सकोच भाव से उत्तर दिया-बाजार से सामान आया है, तो उसका दाम न दिया जायगा ?

'कौन चीज़ किस भाव से आई है, और कितनी आई है, यह मुझे कुछ नहीं मालूम ! जब तक हिसाब-किताब न हो जाय, रुपये कैसे दिये जाय?'

'हिसाब-किताब सब हो गया है।'

'किसने किया ?

'अब मैं क्या जानूँ किसने किया ? जाकर मरदों से पूछो। मुझे हुक्म मिला, रुपये लाकर दे दो, रुपये लिये जाती हूँ।'

फूलमती खून का चूंट पोकर रह गई। इस वक्त बिगड़ने का अवसर न था। घर में मेहमान स्त्री-पुरुष भरे हुए थे। अगर इस वक्त उसने लड़कों को डाँटा तो लोग यही कहेंगे कि इनके घर में पण्डितजो के मरते ही फूट पढ़ गई। दिल पर पत्थर रखकर फिर अपनी कोठरी में चली आई। जब मेहमान बिदा हो जायेंगे, तब्द वह एक-एक की खबर लेगी। तब देखेगी, कौन उसके सामने आता है और क्या कहता है। इनकी सारी चौकड़ी भुला देगी।

किन्तु कोठरी के एकान्त में भी वह निश्चित न बैठो थो। सारी परिस्थिति को गिद्ध-दृष्टि से देख रही थी, कहाँ सत्कार का कौन-सा नियम भग होता है, कहाँ मर्या- दाओं की उपेक्षा की जाती है। भोज भारम्भ हो गया। सारी विरादरी एक साथ पङ्गत में बिठा दी गई। आँगन में मुश्किल से दो सौ आदमी बैठ सकते हैं। ये पाँच सौ आदमी इतनी-सी जगह में कैसे बैठ जायँगे ? क्या आदमी के ऊपर आदमी
[ ६२ ]
बिठाये जायेंगे ? दो पगतोऔ में लोग विठाये जाते तो क्या बुराई हो जातो ? यही तो होता कि बारह बजे की जगह भोज दो बजे समाप्त होता; मगर यहाँ तो सबको सोने को जल्दी पड़ी हुई है। किसी तरह यह बला सिर से टलें और चैन से सोयें। लोग कितने सटकर बैठे हुए हैं कि किसी को हिलने की भी जगह नहीं। पत्तल एक-पर- एक रखे हुए हैं। पूरियां ठण्ढो हो गई, लोग गरम-गरम मांग रहे हैं। मैदे को पूरियां ठण्डी होकर चिमड़ी हो जाती हैं। इन्हें कौन खायेगा ? रसोइये को कड़ाव पर से न जाने क्यों उठा दिया गया ? यही सब बातें नाक कटाने को है।

सहसा शोर मचा, तरकारियों में नमक नहीं। बड़ी बह जल्दी-जल्दी नमक पीसने लगी। फूलमती क्रोध के मारे ओठ चवा रही थी, पर इस अवसर पर मुँह न खोल सकती थी। बारे नमक पिसा और पत्तलों पर डाला गया। इतने में फिर शोर मचा- पानी गरम है, ठण्डा पानी लाओ। ठण्डे पानी का कोई प्रबन्ध न था, बर्फ भी न मँगाई गई थी ! आदमी बाजार दौड़ाया गया, मगर बाजार में इतनी रात गये बर्फ कहाँ ! आदमी खाली हाथ लौट आया। मेहमानों को वही नल का गरम पानी पीना पड़ा। फूलमती का बस चलता, तो लड़कों का मुंह नोच लेती। ऐसी छीछालेदर उसके घर में कभी न हुई थी। उस पर सब मालिक बनने के लिए मरते हैं। बर्फ-जैसी जरूरी चीज़ मंगवाने को भी किसो को सुविन थी। सुधि कहां से रहे। जब किसी को गप लाने से फुर्सत मिले। मेहमान अपने दिल मे क्या कहेंगे कि चले हैं बिरादरी को भोज देने और घर में बर्फ तक नहीं।

अच्छा, फिर यह हलचल क्यों मच गई ! अरे, लोग पगत से उठे जा रहे हैं। क्या मामला है?

फूलमती उदासीन न रह सकी। कोठरी से निकलकर बामदे में आई और कामतानाथ से पूछा --- क्या बात हो गई लला ? लोग उठे क्यों जा रहे हैं ?

कामता ने कोई जवाब न दिया। वहाँ से खिसक गया। फूलमती हुँ मसलाकर रह गई। सहसा कहारिन मिल गई। फूलमती ने उससे भी वही प्रश्न किया। मालूम हुआ, किसी के शोरने में मरी हुई चुहिया निकल आई। फूज्मती चित्र-लिखित-सी वहीं खड़ी रह गई। भीतर ऐसा उबाल उठा कि दीवार से सिर टकरा ले। अभागे भोज का प्रान्ध करने चले थे। इस फूहड़पन की कोई हद है, कितने आदमियों का धर्म सत्यानाश हो गया। फिर पंगत नौ न उठ जाय ? आँखों से देखकर अपना धर्म
[ ६३ ]
कौन गॅवायेगा ? हा ! सारा किया-धरा मिट्टी में मिल गया ? सैकड़ों रूपये पर पानी फिर गया ! बदनामी हुई वह अलग। .

मेहमान उठ चुके थे। पत्तलों पर खाना ज्यों-का-त्यों पड़ा हुआ था। चारों लड़के आँगन में लज्जिर खड़े थे। एक दूसरे को इलज़ाम दे रहा था। बड़ी बहू अपनी देवनियों पर बिगड़ रही थीं। देवरानियों सारा दोष कुमुद के सिर डालतो थी। कुमु खड़ी रो रही थी। उसी वक फूलमती झल्लाई हुई आकर बोली-मुंह में कालिख लगो कि नहीं ? या अभी कुछ कसर बाकी है ? डूब मरो, सब-के-सब जाकर चिल्ल-भर पानी में ! शहर में कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहे !

किसी लड़के ने जवाब न दिया।

फूलमती और भी प्रचण्ड होकर बोलो --- तुम लोगों को क्या। किसी को शर्म- हया तो है नहीं। आत्मा तो उनको रो रही है, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगो घर की मरजाद बनाने में खराब कर दी। उनकी पवित्र आत्मा को तुमने यो कलङ्कित किया। सारे शहर मैं थुड़ो-थुई हो रही है। अब कोई तुम्हारे द्वार पर पेशाब करने तो आयेगा नहीं।

कामतानाथ कुछ देर तक तो चुपचाप खड़ा सुनता रहा। आखिर झुमलाकर बोला --- अच्छा, अब चुप रहो अम्मा भूल हुई, हम सब मानते हैं, बड़ी भय कर भूल हुई , लेकिन अब क्या उसके लिए घर के प्राणियों को हलाल दर डालोगी ? सभी से भूलें होती हैं। आदमी पछताकर रह जाता है। किसी को जान तो नहीं मारी जातो?

बड़ी बहू ने अपनी सफाई दी-हम क्या जानते थे कि बोबो (कुमुद) से इतना- सा काम भी न होगा। इन्हें चाहिए था कि देखकर तरकारी कढ़ाव में डालती। टोकरी उटाकर कढ़ाव में डाल दी। इसमें हमारा क्या दोष !

कामतानाथ ने पत्नी को डाँटा --- इसमें न कुमुद का कसूर है, न तुम्हाग, न मेरा। संयोग को बात है। वदनामी भाग में लिखौ यो वह हुई, इतने बड़े भोज में एक-एक मुट्ठी तरकारी कढ़ाव में नहीं डाली जात ! टोकरे-के-टोकरे उँडेल दिये जाते हैं। कभी-कभी ऐसी दुर्घटना हो ही जाती है। पर इसमें कैसी जग-ईसाई और कैसी नक-कटाई। तुम खामखाह जले पर नमक छिड़कती हो।

फूलमती ने दांत पीसकर कहा --- शरमाते तो नहीं, उलटे और बेहयाई की बातें करते हो। [ ६४ ]

कामतानाथ ने निस्सङ्कोच होकर कहा --- शरमाऊँ क्यों, किसी की चोरी की है? चीनी में चींटे और आटे में घुन, यह नहीं देखे जाते। पहले हमारी निगाह न पड़ी, बस यही बात बिगड़ गई। नहीं, चुपके-से चुहिया निकालकर फेंक देते। किसी को खबर भी न होती।

फूलमती ने चकित होकर कहा --- क्या कहता है, मरी चुहिया खिलाकर सबका धर्म बिगाड़ देता।

कामता हंसकर बोला --- क्या पुराने माने की बात करती हो अम्मा ? इन बातों से धर्म नहीं जाता ? यह धर्मात्मा लोग जो पत्तल पर से उठ गये हैं, इनमें ऐसा कौन है जो भेवकी का मांस न खात हो? तालाब के कछुए और घोंघे तक तो किसो से बचते नहीं। जग-सी चुहिया में क्या रखा था!

फूलमती को ऐसा प्रतीत हुआ कि अप प्रलय आने में बहुत देर नहीं है। जा पढ़े-लिखे आदमियों के मन में ऐसे अधामि भाव आने लगे, तो फिर धर्म को भग- वान् ही रक्षा करें। अपना-सा मुंह लेकर चली गई।

( २ )

दो महीने गुज़र गये हैं। रात का समय है। चारों भाई दिन के काम से छुट्टी पाकर कमरे में जेठे गप शप कर रहे हैं। बड़ो बहू भो षड्यंत्र में शरीक हैं। कुमुद के विवाह का प्रश्न छिड़ा हुआ है।

कामतानाथ ने मसनद पर टेक लगाते हुए कहा --- दादा को पात दादा के साथ गई। मुरारी पण्डित विद्वान् भी हैं और कुलीन भी होंगे। लेकिन जो आदमी अपनी विद्या और कुलीनता को रुपयों पर बेचे, बह नीच है। ऐसे नीच आदमी के लड़के से हम कुमुद का विवाह सेंत में भी न करेंगे, पांच हजार तो दूर की बात है। उसे बताभो धता और किसी दूसरे वर की तलाश करो। हमारे पास फुल बीस हजार हो तो हैं।ं एकाएक हिस्से में पांच-पांच हजार आते हैं। पांच हजार दहेज में दे दें, और पांच हजार नेग-न्योछावर, बाजे-गाजे में उड़ा दें, तो फिर हमारो बधिया ही बैठ जायगी।

उमानाथ बोले --- मुझे अपना औषधायल खोलने के लिए कम-से-कम पांच हज़ार की जरूरत है। में अपने हिस्से में से एक पाई भी नहीं दे सकता। फिर खुलते हो आमदनी तो होगी नहीं। कम-से-कम साल-भर घर से खाना पड़ेगा। [ ६५ ]

दयानाथ एक समाचार-पत्र देख रहे थे। आँखों से ऐनक उतारते हुए बोले --- मेरा विचार भी एक पत्र निकालने का है। प्रेस और पत्र में कम-से-कम दस हज़ार का कैपिटल चाहिए। पाँच हजार मेरे रहेंगे तो कोई-न-कोई साझेदार पांच हजार की मिल जायगा। पत्रों में लेख लिखकर मेरा निर्वाह नहीं हो सकता।

कामतानाथ ने सिर हिलाते हुए कहा --- अजी, राम भजो, सेत में कोई लेख छापता नहीं, रुपये कौन दिये देता है।

दयानाथ ने प्रतिवाद किया --- नहीं, यह बात तो नहीं है। मैं तो कहीं भी बिना पेशगी पुरस्कार लिये नहीं लिखता।

कामता ने जैसे अपने शब्द वापस लिये --- तुम्हारी बात मैं नहीं कहता भाई। तुम तो थोड़ा-बहुत मार लेते हो, लेकिन सबको तो नहीं मिलता।

बड़ी बहू ने श्रद्धा भाव से कहा-कन्या भाग्यवान हो तो दरिद्र घर में भी सुखी रह सकती है। अभागी हो, तो राजा के घर में भी रोयेगी। यह सम नसीबों का खेल है।

कामतानाथ ने स्त्री की और प्रशसा-भाव से देखा-फिर इसी साल हमें सीता का विवाह भी तो करना है।

सीतानाथ सबसे छोटा था। सिर झुकाये भाइयों को स्वार्थ-भरी बातें सुन-सुनकर कुछ कहने के लिए उतावला हो रहा था। अपना नाम सुनते ही बोला-मेरे विवाह की आप लोग चिन्ता न करें। मैं जब तक किसी धन्धे से न लग जाऊँगा, विवाह का नाम भी न लूंगा, और सच पूछिए तो मैं विवाह करना हो नहीं चाहता। देश को इस समय बालकों की ज़रूरत नहीं, काम करनेवालों की ज़रूरतरत है। मेरे हिस्से के रुपये आप कुमुद के विवाह में खर्च कर दें। सारी बातें तय हो जाने के बाद यह उचित नहीं है कि पण्डित मुरारीलाल से सम्बन्ध तोड़ लिया जाय।

उमा ने तीव्र स्वर में कहा-दस हजार कहाँ से आयेंगे ?

सीता ने डरते हुए कहा --- मैं तो अपने हिस्से के रुपये देने कहता हूँ।

'और शेष?'

'मुरारीलाल से कहा जाय कि दहेज़ में कुछ कमी कर दें। वह इतने स्वार्थान्ध महीं हैं कि इस अवसर पर कुछ बल खाने को तैयार न हो जायें; अगर वह तीन इज़ार में सन्तुष्ट हो जाय, तो पांच हजार में विवाह हो सकता है। [ ६६ ]

उमा ने कामतानाथ से कहा --- सुनते हैं भाई साहब ; इसको आते हैं दयानाथ बोल उठे तो इसमें आप लोगों का क्या नुकसान है ? यह अपने रुयै दे रहे हैं, खर्च कीजिए। मुरारी पण्डित से हमारा कोई वैर नहीं है। मुझे तो इस बात से खुश हो रही है कि भला हममें कोई तो त्याग करने योग्य है। इन्हें तत्काल रुपये की ज़रूरत नहीं है। सरकार से वज़ोफा पाते ही हैं। पास होने पर कहीं-न-कहीं जगह मिल जायगी। हम लोगों की छालते तो ऐसी नहीं है ।

कामतानाथ ने दूरदर्शिता का परिचय दिया-नुक्क पान की एक ही कही। होममें से एक को छष्ट हो तो क्या और लोग बैठे देखेंगे ? यह अभी लड़के हैं, इन्हें क्या मालूम कि समय पर एक रुपया एक लाख का काम चरता है। कौन जानता है, कल इन्हें विलायत जार पढ़ने के सरकारी लिए वफा मिल जाए, या सिविल सर्विस में आ जायें। उस वक्त सफ़र तंरिय में चार-पाँच हज़र लग जायँगे। तर किसके सामने हाथ फैशते फिरेंगे ? मैं यह नहीं चाहता कि दहेज़ के पोछे इन जिन्दगी नष्ट हो जाय।

इस तर्क ने सीतानाथ को भी तोड़ लिया। सकुचाता हुआ बोला ---- हाँ, यदि ऐसा हुआ तो बेशक मुझे रुपये की ज़रूरत होगी।

‘क्या ऐसा होना असम्भव है ?’

असम्भव तो मैं नहीं समझा ; लेकिन झठिन अवश्य है। वज्रोफे उन्हें मिलते हैं, जिनके पास सिफारिशें होती हैं, मुझ कौन पूछता है।'

अभी-अभी सिफारिशें धरी रह जाती हैं और बिना सिफारिश वाले बाजी मार ले जाते हैं।

तो आप जैसा उचित समझे। मुझे य तक मजूर है कि चाहे मैं विलायत में जाऊ ; पर कुमुद अच्छे घर जाय।

कामतानाथ ने निछा भाव से कहा --- अच्छा घर दहेज़ देने हों से नहीं मिलता भैया। जैसा तुम्हारी भाभी ने कहा, यह नसो का खेल है। मैं तो चाहता हूँ छि मुरारीलाल को जवाब दे दिया जाये और कोई ऐपु चर खोज जाय, जो थोड़े में ज़ी हो जाये। इस विवाह में मैं एक हज़ार से प्रादा नहों खर्च कर सकता। पण्डित दोनदयाल कैसे हैं ? [ ६७ ]

उमा ने प्रसन्न होकर कहा-बहुत अच्छे। एम० ए०, बी० ए० न सही, यज- मानों से अच्छी आमदनी है।

दयानाथ ने आपत्ति की --- अम्मा से भी तो पूछ लेना चाहिए।

कामतानाथ को इसकी कोई जरूरत न म लूम हुई। बोले --- उनकी तो जैसे बुद्धि ही भ्रष्ट हो गई है। वही पुराने युग की बात ! मुरारीलाल के नाम पर उधार खाये बैठी हैं यह नहीं समझती कि वह जमाना नहीं रहा। उनको तो बस कुमुद मुरारी पण्डित के घर काय, चाहे हम लोग तबाह हो जायें।

उमा ने एक शका उपस्थित की --- अम्मा अपने सब गहने कुमुद को दे देंगी, देख लीजिएगा।

कामतानाथ का स्वार्थ नीति से विद्रोह न कर सका। बोले-गहनों पर उनका पूरा अधिकार है यह उनका स्त्री-धन है। जिसे चाहें, दे सकती हैं।

उमा ने कहा --- स्त्री-धन है तो क्या वह उसे लुटा देगी ! आखिर वह भी तो दादा ही की कमाई है।

‘किसी को कमाई हो। स्त्री-धन पर उनका पूरा अधिकार है।'

'यह कानूनी गोरखधन्धे हैं। बीस हजार में तो चार-हिस्सेदार हो और दस हजार के गहने अम्मा के पास रह जायें। देख लेना, इन्हीं के बल पर वह कुमुद का विवाह मुरारी पण्डित के घर करेंगी।'

उमानाथ इतनी बड़ी रकम को इतनी आसानी से नहीं छोड़ सकता। वह कपट- नीति में कुशल है। के ई कौशल रचकर माता से सारे गहने ले लेगा। उस वक्त तक कुमुद के विवाह की चर्चा करके फूलमती को भड़काना उचित नहीं। कामतानाथ ने सिर हिलाकर कहा --- भाई, में इन चालों को पसन्द नहीं करता।

उमानाथ ने खिसियाकर कहा --- गहने दस हजार से कम के न होंगे।

कामता अविचलित स्वर में बोले-कितने ही के हों, मैं अनीति में हाथ नहीं डालना चाहता।

'तो आप अलग बैठिए। हो, मीच में भांजी न मारिएगा।'

'मैं अलग रहूँगा।'

'और तुम सीता ?

'मैं भी अलग रहूँगा।' [ ६८ ]

लेकिन जब दयानाथ से यहो प्रश्न किया गया, तो वह उमानाथ से सहयोग करने को तैयार हो गया। दस हज़ार में ढाई हजार तो उसझे होंगे ही। इतनी बड़ी रकम के लिए यदि कुछ कौशल भी करना पड़े तो क्षम्य है।


फूलमती रात को भोजन काके लेटो थी कि उमा और दया उसके पास जाकर बैठ गये। दोनों ऐसा मुंह बनाये हुए थे, मानों कोई भारी विपत्ति आ पड़ी है। फूल- मतो ने सशक होकर पूछा तुम दोनों घबड़ाये हुए मालम होते हो ?

उमा ने सिर खुजलाते हुए कहा --- समाचार-पत्रों में लेख लिखना बड़े जोखिम का काम है अम्मा ! कितना हो बचकर लिखो। लेकिन कहीं-न-कहीं पकड़ हो ही जाती है। दयानाथ ने एक लेख लिखा था। उस पर पांच हजार की जमानत मांगी गई है। अगर कल तक जमानत न जमाकर दी गई, तो गिरफ्तार हो जायंगे और इस साल की सजा ढुक जायगी।

फूलमती ने सिर पीटकर कहा --- तो ऐसी बातें क्यों लिखते हो देटा ? जानते नहीं हो आजकल हमारे अदिन भाये हुए हैं। जमानत किसी तरह टल नहीं सकती ?

दयानाथ ने अपराधी-भाव से उत्तर दिया --- मैंने तो अम्मा ऐसा कोई नहीं लिखी थी। लेकिन किस्मत को क्या करूँ। हाकिम जिला इतना कहा है कि जा भी रिआयत नहीं करता। मैंने जितनी दौड़ धूप हो सकती थी, वह सब कर लो।

'तो तुमने कामता से रुपये का प्रबन्ध करने को नहीं कहा ?'

उमा ने मुंह बनाया --- उनका स्वभाव तो तुम जानती हो अम्माँ, उन्हे रुपये प्राणों से प्यारे हैं इन्हे चाहे काला पानी ही हो जाय, वह एक पाई न देंगे।

दया ने समर्थन किया --- मैंने तो उनसे इसका जिक्र ही नहीं किया।

फूलमती ने चारपाई से उठते हुए कहा-चलो, मैं शहती हूँ, देगा कैसे नहीं ? रुपये इसो दिन के लिए होते हैं कि गाड़कर रखने के लिए?

उमानाथ ने माता को रोककर कहा नहीं अम्मा, उनसे कुछ न कहो। रुपये तो न देंगे, उलटे और हाय हाय मनायेंगे। उनको अपनी नौकरी की खैरियत मनानी है, इन्हें घर में रहने भी न देंगे। अफसरों में जाकर खबर दे दे तो आश्चर्य नहीं।

फूलमती ने लाचार होकर कहा --- तो फिर जमानत का क्या प्रबन्ध करोगे ? मेरे पास तो कुछ नहीं है। हाँ, मेरे गहने हैं, इन्हे ले जाव, कहीं गिरों रखकर ज़मा-
[ ६९ ]
नत दे दो। और आज से छान पकड़ो कि झिल्ली पत्र में एक शब्द भी न लिखोगे।

दयानाथ कानों पर हाध रखकर बोला --— यह तो नहीं हो सकता अम्माँ कि तुम्हारे जेवर लेकर मैं अपनी जान बचाऊँ। दस-च साल की कैद ही तो होगो, झेल हूँगा। यही बैठा-बैठा क्या कर रहा हूँ। फूलमती छाती पीटते हुए बोली-कैसी बातें मुंह से निकालते हो बेटा, मेरे जीते जी तुम्हें कौन गिरफ्तार कर सकता है ? उसका मुँह झुलस देंगी। गहने इसी दिन के लिए हैं या और किसी दिन के लिए। जव तुम्हीं न रहोगे, तो गहने लेकर क्या आज मैं झकू गी।

उसने पिटारी लाकर उसके सामने रख दी।

दया ने जमा की ओर जैसे फ़रियाद की आँखों से देखा, और बोला-आपको क्या राय है भाई साहब ! इस मारे मैं कहता था, अम्माँ को जताने की ज़रूरत नहीं। जेल ही तो हो जाती या और कुछ।

उमा ने जैसे सिफ़ारिश करते हुए कहा --- यह कैसे हो सकता था कि इतनी बड़ी वारदात हो जाती और अम्म को खबर न होती। मुझसे यह नहीं हो सकता था कि सुनकर पेट में डाल दैती ; मगर अब झरना क्या चाहिए, यह मैं खुद निर्णय नहीं कर सकता। न त यही अच्छा लगता है कि तुम जेल जाओ और न यही अच्छा लगता है कि अम्माँ के गहने गि रखे जायँ।

फूलमति ने व्यथित कुण्ठ से पूछा --- क्या तुम समझते हो, मुझे गहने तुमसे ज्यादा प्यारे हैं? मैं तो अपने प्राण तक तुम्हारे ऊपर न्योछावर कर दें, गहनों की विसात ही क्या है।

दया ने दृढ़ता से कहा --- अम्मा, तुम्हारे गहने तो न हूँगा, चाहे मुझ पर कुछ ही क्यों न आ पड़े। जब आज तक तुम्हारी झुछ सेवा न कर सका, तो किस मुंह से तुम्हारे गहने उठा ले जाऊँ। मुझ जैसे सुपूत को ते तुम्हारी कोख से जन्म ही न लेना चाहिए था। सदा तुम्हें कष्ट ही देता रहा।

फूलमती ने भी उतनी ही दृढ़ता से कहा --- तुम अगर य न लोगे, तो मैं खुद जाकर इन्हें गिरौं रख देंगी और खुद हाकिम जिला के पास जाकर जमानत जमा कर भाऊँगी ; अगर इच्छा हो तो यह परीक्षा भी ले लो। आखें बन्द हो जाने के
[ ७० ]
बाद क्या होगा, भगवान् जाने , लेकिन जब तक जीती हूँ, तुम्हारो ओर कोई तिरको भाखों से देख नहीं सकता।

उमानाथ ने मानों माता पर एहसान रखकर कहा- अब त हमारे लिए कोई रास्ता नहीं रहा दयानाथ। क्या हरज है, ले लो ; मगर याद रखो, ज्यों हो हाथ में रुपये आ जायें, गहने छुड़ाने पड़ेंगे। सच कहते हैं, मातृत्व दीर्घ तपस्या है। माता के सिवाय इतना स्नेह और कौन कर सकता है। हम बड़े अभागे है कि माता के प्रति जितनी श्रद्धा रखनी चाहिए, उसका शताश भी नहीं रखते।

दोनों ने जैसे बड़े धर्म-संकट में पड़कर गहनों को पिटारी संभालो और चलते बने। माता वात्सल्य-भरी आँखों से उनकी ओर देख रहो थो, और उसको सम्पूर्ण आत्मा का आशीर्वाद जैसे उन्हें अपनी गोद में समेट लेने के लिए व्याकुल हो रहा था। आज कई महीने के बाद उसके भन्न मातृ-हृश्य को अपना सर्वस्व अर्पण करके जैसे आनन्द की विभूति मिली। उपकी स्वामिनो-कपना इसो त्याग के लिए, इसो आत्म-समर्पण के लिए जैसे कोई मार्ग ढूँढ़ती रहती थी। अधिकार या लोभ था ममता को वहाँ गन्ध तक न थी। त्याग ही उसका आनन्द औररांग हो उसका अधिकार है। आज अपना खोया हुआ अधिकार पाकर अपनी सिरजी हुई प्रतिमा पर अपने प्राणों को भेंट करके वह निहाल हो गई हो।

( ४ )

तीन महीने और गुज़र गये। मां के गहनों पर हाथ साफ कर चारों भाई उसकी दिल-जोई करने लगे थे। अपनी स्त्रियों को भी समझाते रहते थे कि उसका दिल न दुखायें। अगर थोड़े से शिष्टाचार से उसकी आत्मा को शान्ति मिलती है, तो इसमें क्या हानि है। चारों करते अपने मन को ; पर माता से सलाह ले लेते। या ऐसा जाल फैलाते कि वह सरला उनकी पातों में आ जातो और हरेक काम में सह- मत हो जाती। बाय को बेचना उसे बहुत बुरा लगता था, लेकिन चारों ने ऐसो माया रचो कि वह उसे बेचने पर राजी हो गई। फिन्तु कुमुद के विवाह के विषय में मतैक्य न हो सका। मां प० मुरारीलाल पर ममो हुई थो, लड़के दोनदयाल पर भड़े हुए थे। एक दिन आपस में कलह हो गया।

फूलमती ने कहा --- माँ-बाप की कमाई में बेटी का हिस्सा भी है। तुम्हें सोलह
[ ७१ ]
हज़ार का एक बार मिला, पच्चीस हजार का एक मकान। बीस हजार नकद में क्या पांच हज़ार भी कुमुद का हिस्सा नहीं है ?

कामतानाथ ने नम्रता से कहा --- अम्माँ, कुमुद आपको लड़को है, तो हमारी बहिः है। आप दो-चार साल में प्रस्थान कर जायेंगो; पर हमारा और उसका पहुत दिन तक सम्बन्ध रहेगा। तब यथाशक्ति कोई ऐसी बात न करेंगे, जिससे उसका अमर हो । लेकिन हिस्से की बात कहती हो, तो कुमुद का हिस्सा कुछ नहीं। दादा जोविर थे तष और वात थी। वह उसके विवाह में जितना चाहते, खर्च करते। कोई उनक हाथ न पकड़ सकता था लेकिन अब तो हमें एक-एक पैसे की किफायत करनं पड़ेगी। जो काम एक हजार में हो जाय उसके लिए पांच हजार खर्च करना कहाँ क बुद्धिमानी है?

उमानाथ ने सुधारा --- पांच हजार क्यों दस हजार कहिए।

कामता ने भवें सिकोड़कर कहा --- नहीं, मैं पाँच हजार हो कहूँगा। एक विवाह में पाँच हजार खर्च करने की हमारी हैसियत नहीं है।

फूलमती ने जिद पकड़कर कहा --- विवाह तो मुरारीलाल के पुत्र से ही होगा पाँच हजार खर्च हो, चाहे दस हजार। मेरे पति की कमाई है। मैंने मर-मरका जोड़ा है। अपनी इच्छा से खर्च करूंगी। तुम्ही ने मेरी कोख से नहीं जन्म लिय है। कुमुद भी उसी कोख से आई है। मेरी आँखों में तुम सब एक बराबर हो। मैं किसी से कुछ मांगती नहीं। तुम बैठे तमाशा देखो, मैं सब कुछ कर लूंगी। बोस हजार में पाँच हज़ार कुमुद का है।

कामतानाथ को अब कड़वे सत्य की शरण लेने के सिवा और कोई मार्ग न रहा। बोला-अम्मा, तुम बरबस बात बढ़ाती हो। जिन रुपयों को तुम अपना समझती हो, वह तुम्हारे नहीं हैं, हमारे हैं। तुम हमारी अनुमति के बिना उनमें से कुछ नहीं खई कर सकतीं।

फूलमती को जैसे सर्प ने डस लिया-क्या कहा ! फिर तो कहना ! मैं अपने , ही सच्चे रुपये अपनी इन्छा से नहीं खर्च कर सकती ?

'वह रुपये तुम्हारे नहीं रहे, हमारे हो गये।'

'तुम्हारे होंगे, लेकिन मेरे मरने के पीछे।'

'नही. दादा के मरते ही हमारे हो गये।' [ ७२ ]

उमानाथ ने बेहयाई से कहा --- अम्माँ कानून-कायदा तो जानती नहीं, नाहक उलझती है।

फूलमत क्रोध-विहल होकर बोली-भाड़ में जाय तुम्हारा कानून। मैं ऐसे कानून को नहीं मानती। तुम्हारे दादा ऐसे कोई बड़े धन्नासेठ न थे। मैंने ही पेट और तन काटकर यह गृहस्यो जोड़ी है, नहीं आज चैठने को छह न मिलतो ! मेरे जोते-जो तुम मेरे रुपये नहीं छू सकते। मैंने तीन भाइयों के विवाह में दस दस इजार खर्च किये हैं। वही मैं कुमुद से विवाह में भो खर्च करूंगी। कामतानाथ भो गर्म पड़ा-आपको कुछ भी खर्च करने का अधिकार नहीं है।

उमानाथ ने बड़े भाई को डाँटा, आप खामख्वाह अम्मा के मुँह लाते हैं भाई साहब। मुरारीलाल को पत्र लिख दीजिए कि तुम्हारे यहाँ कुमुद का विवाह न होगा। बस, छुट्टी हुई । यह कायदा कानून तो जानती नहीं, व्यर्थ को वहस करती हैं।

फूलमती ने सयमित स्वर में कहा --- अच्छा, क्या कानून है, परा में भी सुन ?

उमा ने निगेह भाव से कहा --- कानून यही है कि बार के मरने के बाद जाय- दाद बेटों की हो जाती है। मां का हक केवल रोटी-कपड़े का है !

फूलमती ने तड़पकर पूछा --- किसने यह कानून बनाया है ?

उमा शान्त स्थिर स्वर में बोला --- हमारे ऋषियों ने, महाराज मनु ने, और किसने ?

फूलमती एक क्षण अवाक रहकर आहत हुण्ठ से बोली --- तो इस घर में में तुम्हारे टुकड़ों पर पड़ी हुई हूँ?

उमानाध ने न्यायाधीश की निर्ममता से कहा --- तुम जैसा समझो।

फूलमती को सम्पूर्ण आत्मा मानों इस वज्राघात से चीत्कार करने लगी। उसके मुन से जलती हुई चिनगारिमा को भाति यह शब्द निकल पड़े-मैंने पर बनवाया, मैंने सम्पत्ति जोली, मैंने तुम्हें जन्म दिया, पाला और आज में इस घर में गैर हूँ? मनु का यहो कानून है और तुम उसी कानून पर चलना चाहते हो ? अच्छी बात है। अपना घर-द्वार लो। मुझे तुम्हारी पाश्रिता बनकर रहना स्वीकार नहीं। इससे कहीं अच्छा है कि मर जाऊँ। वाह रे अन्धेर ! मैने पेड़ लगाया और में हो उसको छह में सड़ी नदी हो सकती ; अगर यही कानून है, तो इसमें आग लग जाय।

चारों युवकों पर माता के इस झोघ और भात का कोई असर न हुआ। [ ७३ ]
कानून का फौलादी कवच उनकी रक्षा कर रहा था। इन कीटों का उन पर क्या असर हो सकता था।

जरा देर में फूलमती उठकर चली गई। आज जीवन में पहली बार उसका वात्सल्य-मग्न मातृत्व अभिशाप बनकर उसे धिक्कारने लगा। जिस मातृत्व को उसने जीवन को विभूति समझा था, जिसके चरणों पर वह सदैव अपनी समस्त अभिलाषाओं और कामनाओं को अर्पित करके अपने को धन्य मानती थी, वही मातृत्व आम उसे उस अग्निकुण्ड-सा जान पड़ा, जिसमें उसका जीवन जलकर भस्म हो रहा था।

( ५ )

सन्ध्या हो गई थी। द्वार पर नीम का वृक्ष सिर झुकाये निःस्तब्ध खड़ा था, सानों संसार की गति पर क्षुब्ध हो रहा हो। अस्ताचल की ओर प्रकाश और जीवन का देवता फूलमती के मातृत्व ही की भांति अपनी चिता में जल रहा था। फूलमती अपने कमरे में जाकर लेटो, तो उसे मालूम हुआ, उसकी कमर टूट गाई है। पति के मरते ही अपने पेट के लड़के उसके शत्र, हो जायेंगे, उसको स्वप्न में भी गुमान न था। जिन लड़कों को उसने अपना हृदय-रक्त विला-पिलाकर पाला, वही आज उसके हृदय पर आघात कर रहे हैं। अब यह घर उसे कोटरों को सेज हो रहा था। जहां उसकी कुछ कद्र नहीं, कुछ गिनती नहीं, वहाँ अनाओं की भौति पड़ी रोटियाँ खाये, यह उसकी अभिमानी प्रकृति के लिए असह्य था।

पर उपाय ही श्या था। वह लड़कों से अलग होकर रहे भो तो नाक किसकी कटेगी ! संधार उसे थूके तो क्या, और लड़कों को थूके तो क्या ; बदनामी तो उसी की है। दुनिया यही तो कहेगी कि चार जवान बेटों के होते बुढ़िया अलग पड़ी हुई मजूरा करके पेट पाल रही है। जिन्हे उसने हमेशा नीच समझा, वही उस पर हँसेंगे। नहीं, वह अपमान इस अनादर से कहीं ज्यादा हृदय-विदारक था। अब अपना और घर का परदा ढका रखने में हो कुशल है। हाँ, अब उसे अपने को नई परिस्थितियों के अनुकूल बनाना पड़ेगा। समय बदल गया है। अब तक स्वामिनी बनकर रही, अब लौंडी बनकर रहना पड़ेगा। ईश्वर की यही इच्छा है , अपने बेटों की बाते और लाते गरों की बातों और लातों की अपेक्षा फिर भी गनीमत हैं।

वह बड़ी देर तक मुँह ढापे अपनी दशा पर रोती रही। सारी रात इसो आत्म- वेदना में कट गई। शरद् का प्रभात ढरता-डरता ऊषा की गोद से निकला, जैसे कोई
[ ७४ ]
कैदी छिपकर जेल से भाग आया हो। फूलमतो अपने नियम के विरुद्ध आज तड़के ही उठी, रात-भर में उसका मानसिक परिवर्तन हो चुका था। सारा घर सो रहा था और वह आँगन में झाडू लगा रही थी। रात-भर ओस में भीगी हुई पकी ज़मीन उसके नगे पैरों में काँटों की तरह चुभ रहो थी। पण्डितजी उसे कभी इतने सवेरे उठने न देते थे। शोत उसके लिए बहुत हानिकर था; पर अब वह दिन नहीं रहे। प्रकृति को भी समय के साथ बदल देने का प्रयत्न कर रही थी। झाडू से फुर्सत पाकर उसने आग जलाई और चावल-दाल की ककड़ियाँ चुनने लगी। कुछ देर में लड़के जागे। बहु उठी। सभों ने बुढ़िया को सर्दी से सिकुड़े हुए काम करते देखा, पर किसी ने यह न कहा कि अम्मा, क्यों हलकान होती हो ? शायद सब-के-सव बुढ़िया के इस मान-मर्दन पर प्रसन्त थे।

आज से फूलमती का यही नियम हो गया कि जी तोड़कर घर का काम करना, और अन्तरग नीति से अलग रहना , उसके मुख पर जो एक आत्मगौरव झलकता रहता था, उसकी जगह अव गहरो वेदना छाई हुई नज़र आती थी। जहाँ बिजली जलती थी, वहाँ अब तेल का दिया टिमटिमा रहा था, जिसे बुझा देने के लिए हवा का एक हलकासा झोंका काफ़ी है।

मुरारीलाल को इन्कारी पत्र लिखने की बात पक्को हो ही चुकी थी। दूसरे दिन पत्र लिख दिया गया। दीनदयाल से कुमुद का विवाह निश्चित हो गया, दोनदयाल की उम्र चालीस से कुछ अधिक थी, मर्यादा मे भी कुछ हेठे थे , पर रोटी-दाल से खुश थे। बिना किसी ठहराव के विवाह करने पर राजो हो गये। तिथि नियत हुई, बारात आहे, विवाह हुआ और कुमुद बिदा कर दी गई। फूलमती के दिल पर क्या गुजर रही थी, उसे कौन जान सकता है। कुमुद के दिल पर क्या गुज़र रही थी, इसे कौन जान सकता है, पर चारों भाई बहुत प्रसन्न थे, मानों उनके हृदय का कोटा निकल गया हो। ऊँचे कुल की कन्या, मुंह केसे खोलती। भाग्य में सुख भोगना लिखा होगा, सुख भोगेगी, दुख भोगना लिखा होगा, दुःख झेलेगी। हरि-इच्छा बेकों का अन्तिम अवलम्व है। घरवालों ने जिससे विवाह कर दिया, उसमें हजार ऐब हो, तो भी वह उपका उपास्य, उसका स्वामी है। प्रतिरोध उसकी कल्पना से परे था।

फूलमती ने किसी काम में दखल न दिया। कुमुद को क्या दिया गया, मेहमानों का कैसा सत्कार किया गया, किसके यहाँ से नेवते में क्या आया, किसी बात से भी
[ ७५ ]
उसे सरोकार न था। उससे कोई सलाह भी ली गई तो यही कहा --- बेटा, तुम लोग जो करते हो, अच्छा ही करते हो, मुझसे क्या पूछते हो।

जब कुमुद के लिए द्वार पर डोली आ गई और कुमुद माँ के गले लिपटकर रोने लगी, तो वह बेटी को अपनी कोठरी में ले गई और जो कुछ सौ-पचास रुपये और दो-चार मासूली गहने उसके पास बच रहे थे, बेटो के अञ्चल में डालकर बोली-बेटी, . मेरी तो मन की मन में रह गई ; नहीं, क्या आज तुम्हारा विवाह इस तरह होता और तुम इस तरह विदा की जाती।

आज तक फूलमती ने अपने गहनों को मात किसी से न हो थी। लड़कों ने उसके साथ जो कण्ट व्यवहार किया था, इसे चाहे वह अब तक न समझो हो लेकिन इतना जानती थी कि गहने फिर न मिलेंगे और मनोमालिन्य बढ़ने के सिवा कुछ हाथ न लगेगा, लेकिन इस अवसर पर उसे अपनी सफाई देने की ज़रत मालूम हुई। कुमुद यह भाव मन में लेकर जाये कि अम्मा ने अपने गहने बहुओं के लिए रख छोड़े, इसे वह किस तरह न सह सकती थी, इसीलिए वह अग्नी कोठरी में ले गई थी। लेकिन कुमुद को पहले ही इस कौशल की टोह मिल चुको थौ ; उसने गहने और रुपये अञ्चल से निकालकर माता के चरणों पर रख दिये और बालो --- अम्माँ, मेरे लिए तुम्हारा आशीर्वाद लाखों रुपयों के बराबर है। तुम इन चीजों को अपने पास रखो। न जाने अभी तुम्हें किन विपत्तियों का सामना करना पड़े।

फूलमती कुछ कहना ही चाहती थी कि उमानाथ ने आकर कहा-क्या कर रहो है कुमुद ? चल, जल्दी कर। साइत टली जाती है। वह लोग हाय-हाय कर रहे हैं, फिर तो दो-चार महीने में आयेगो हो, जो कुछ लेना-देना हो, ले लेना।

फूलमती के घाव पर जैसे मनों नमक पड़ गया। बोली --- मेरे पास अब क्या है भैया, जो मैं इसे दंगो ? जाओ बेटी, भगवान् तुम्हारा सोहाग अमर करें।

कुमुद विदा हो गई। फूलमती पछाड़ खाकर गिर पड़ी। जीवन की अन्तिम लालसा नष्ट हो गई।

( ६ )

एक साल बीत गया।

फूलमती का कमरा घर में सब कमरों से बह और हवादार था। कई महीनों से उसने उसे बड़ी बहू के लिए खाली कर दिया था और खुद एक छोटी-सी कोठरी में
[ ७६ ]
रहने लगी थी, जैसे कोई भिखारिन हो। बेटा और बहुओं से अब उसे जरा भी स्नेह न था। वह अब घर की लौंडी थी। घर के किसी प्राणी, किमी वस्तु, किसी प्रङ्ग से उसे प्रयोजन न था। वह केवल इसलिए जोती थी कि मौत न आती थी। सुख या दुःख का अब उसे लेशमात्र भी ज्ञान न था। उमानाथ का औषधालय खुला, मित्रों को दावत हुई, नाच-तमाशा हुआ। दयानाथ का प्रेस खुला, फिर जलसा हुआ। सौतानाथ को वजीफा मिला और विलायत गया। फिर उत्सव हुआ। कामतानाथ के बड़े लड़के का यज्ञोपवीत-सस्कार हुआ, फिर धूम-धाम हुई , लेकिन फूलमतो के मुख पर आनन्द की छाया तक न आई। कामतानाथ टाइफाइड में महीने-भर बोमार रहा और मरकर उठा। दयानाथ ने अबको अपने पत्र का प्रचार बढ़ाने के लिए वास्तव में एक आपत्ति- जनक लेख लिखा और छ महीने की सज़ा पाई। उमानाथ ने एक फौजदारी के माखले में रिश्वत लेकर राहत रिपोर्ट लिखी और उनकी सनद छीन ली गई , पर फूल- मती के चेहरे पर रज की परछाई तक न पड़ी। उसके जीवन में अब कोई आशा, कोई दिलचस्पी, कोई चिन्ता न थी। वस, पशुओं की तरह काम करना और खाना, यही उसकी ज़िन्दगी के दो काम थे। जानवर मारने से काम करता है ; पर खाता है मन से। फूलमती बेकहे काम करतो थी, पर खाती थी विष के कौर की तरह। महीनो सिर में तेल न पड़ता महीनों कपड़े न धुलते, कुछ परवाह नहीं। वह चेतना- शून्य हो गई थी।

सावन की झड़ी लगी हुई थी। मलेरिया फैल रहा था। आकाश में मटियाले बादल थे। ज़मीन पर मटियाला पानी। आ वायु शात-ज्वर और सास का वितरण चरती फिरती थी। घर को महरो बीमार पड़ गई। फूलमती ने घर के सारे वर्तन मांजे, पानी में भीग-भीगकर सारा काम किया। फिर आग जलाई, और चूल्हे पर पतोलियां चढ़ा दी। लड़कों को समय पर भोजन तो मिलना ही चाहिए।

सहसा उसे याद आया, कामतानाथ नल का पानी नहीं पीते । उसी वर्षा में गङ्गा- जल लाने चली।

कामतानाथ ने पलङ्ग पर लेटे-लेटे कहा --- रहने दो अम्माँ, मैं पानी भर लाऊँगा, आज महरी खूब बैठ रही।

फूलमती ने मटियाले आकाश की ओर देखकर कहा --- तुम भीग जाओगे बेटा, सर्दी हो जायगी। [ ७७ ]कामतानाथ बोले --- तुम भी तो भीग रही हो। कहाँ बीमार न पड़ जाव। फूलमती निर्मम भाव से बोली --- मैं बीमार न पड़ूँगी। मुछे भगवान् ने अमर कर दिया है।

उमानाथ भी वहीं बैठा हुआ था। उसके औषधालय में कुछ आमदनी न होती थी। इसीलिए बहुत चिन्तित रहता था। भाई-भावज की मुंह देखी करता रहता था। बोला-जाने भी दो भैया बहुत दिनों बहुओं पर राज कर चुकी हैं, उसका प्रायश्चित्त तो करने दो।

गङ्गा बढ़ी हुई थी, जैसे समुद्र हो। क्षितिज सामने के कूल से मिला हुआ था। किनारों के वृक्षों को केवल फुजगियाँ पानी के ऊपर रह गई थी। घाट ऊपर तक पानी में डूब गये थे। फूलमती कलसा लिये नीचे उत्तरी। पानी भरा और ऊपर जा रही थी कि पाँव फिसला। संभल न सकी। पानी में गिर पड़ी। पल-भर हाथ-पाव चलाये, फिर लहरें उसे नीचे खींच ले गई। किनारे पर दो चार पण्डे चिल्लाये--- 'अरे दौड़ो, बुढ़िया डूबी जाती है।' दो-चार भादमो दौड़े भी; लेकिन फूलमती लहरों में समा गई थी, उन बल खातो हुई लहरों में, जिन्हें देखकर ही हृदय कॉप उठता था।

एक ने पूछा --- यह कौन बुढ़िया थी ?

'अरे, वही पण्डित अयोध्यानाथ की विधवा है।'

'अयोध्यानाथ तो बड़े आदमी थे ?'

'हाँ, थे तो ; पर इसके भाग्य में ठोकर खाना लिखा था।'

'उनके तो कई लड़के बड़े-बड़े हैं और सम कमाते हैं।'

'हाँ, सब हैं भाई ; मगर भाग्य भी तो कोई वस्तु है।'