मानसरोवर १/बड़े भाई साहब

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मानसरोवर १  (1947) 
द्वारा प्रेमचन्द
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बड़े भाई साहब

मेरे भाई साबह मुझसे पांच साल बड़े थे; लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था, जब मैंने शुरू किया, लेशिन तालीम जैसे महत्त्व के मामले में वह जल्दीबाजी से काम लेना पसन्द न करते थे। इस भवन की बुनियाद खून मजबूत डालनी चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्ता न हो, तो मकान कैसे पायेदार बने !

मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की, वह चौदह साल के थे। उन्हें मेरी तम्बीह और निगरानी का पूरा और जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शाली- नता इसी में थी कि उनके हुक्म को क़ानून समझँ।

वह स्वभाव से बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते। और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशिर्यों पर चिढ़ियों, कुत्तों, बिल्लियों की तस्वीरें बनाया करते थे। कभी-कभी एक ही नाम या शब्द या वाक्य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्दा अक्षरों में नकल करते। कभी ऐसी शब्द-रचना करते, जिसमें न कोई अथ होता, न कोई सामजस्य। मसलन् एक बार उनको कापी पर मैंने यह इमारत देखी स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर असल, भाई-भाई, राधेश्याम, श्रीयुत राधेश्याम, एक घटे तक--- इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई अर्थ निकाल। लेकिन असफल रहा। और उनसे पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमाअत में थे, मैं पांचवीं में। उनको रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बड़ी बात थी।

मेरा जी पढ़ने में बिलकुल न लगता था। एक घण्टा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्टल से निकलकर मैदान में आ जाता, और कभी कक- रियां उछालता, कभी कागज़ की तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साधो मिल गया, तो पूछना ही क्या। कभी चारदीवारी पर चढ़कर नोचे कूद रहे हैं, कमी फाटक पर
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सवार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनन्द उठा रहे हैं, लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का वह रुद्र-रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-कहां थे?' हमेशा यही सवाल, इसी ध्वनि में हमेशा पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मेरे मुंह से यह बात क्यों न निक- लती कि रा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि स्नेह और रोष से मिले हुए शब्दों में मेरा सत्कार करें।

'इस तरह अंग्रेजी पढ़ोगे, तो जिन्दगी-भर पढ़ते रहोगे और एक हर्फ न आयेगा। अंग्रेजी पड़ना कोई हँसी-खेल नहीं है कि जो चाहे, पढ़ ले ; नहीं ऐरा गैरा नत्थू-खैरा सभी अंग्रेजी के विद्वान् हो जाते। यहाँ रात-दिन आँखे फोड़नी पड़ती हैं, और सून जलाना पड़ता है, तब कहीं यह विद्या आती है। और आती क्या है, हाँ, कहने को भा जाती है। बड़े बड़े विद्वान् भी शुद्ध अंग्रेजी नहीं लिख सकते, बोलना तो दूर रहा। और मैं कहता हूँ, तुम कितने घोंपा हो कि मुझे देखकर भी सबक नहीं लेते। मैं कितनी मिहनत करता हूँ, यह तुम अपनी आँखों देखते हो, अगर नहीं देखते, तो यह तुम्हारी आँखों का कसूर है, तुम्हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले- तमाशे होते हैं, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है ? रोज ही क्रिकेट और हाकी-मैच होते हैं। मैं पास नहीं फटकता। हमेशा पढ़ता रहता हूँ। उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पड़ा रहता हूँ; फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यो सेल-कूद में वक्त गँवाकर पास हो आओगे ? मुझे तो दो-ही-तीन साल लाते हैं, तुम उन्न-भर इसी दरजे में पड़े सड़ते रहोगे। अगर तुम्हें इस तरह उम्र गॅवानी है, तो मेहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्ली-डंडा खेलो। दादा की गाढ़ी कमाई के अपये क्यों बरबाद करते हो?

मैं यह लताड़ सुनकर आँसू बहाने लगता। जवान हो क्या था अपराध तो मैंने किया, लताड़ कौन सहे ? भाई साहब उपदेश की कला में निपुण थे। ऐसी ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्ति-वाण चलाते, कि मेरे जिगर के टुकड़े-टुकड़े हो जाते और हिम्मत टूट जाती। इस तरह जान तोड़कर मेहनत करने की शक्ति में अपने में न पाता था और उस निराशा में जरा देर के लिए मैं सोचने लगता क्यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमें हाथ डालकर क्यों अपनी ज़िन्दगी ख़राब
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करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मजूर था लेकिन उतनी मेहनत ! मुझे तो चक्कर मा जाता था, लेकिन घण्टे दो-घण्टे के बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जो लगाकर पढ़गा। चटपर्ट एक टाइम-टेबिल बनाडालता। बिना पहले से नकशा बनाये, कोई स्कीम तैयार किये काम कैसे शुरू करूँ। टाइम- टेबिल में खेल-कूद को मद बिलकुल उड़ जाती। प्रातःकाल उठना, छ: बजे मुँह-हाथ धो, नाश्ता कर, पढ़ने बैठ जाना। छ. से आठ तक अग्रेजो, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढ़े नौ तक इतिहास, फिर भोजन और स्कूल। साढ़े तीन बजे स्कूल से वापस होकर आध घण्टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छः तक ग्रामर, आध घण्टा होस्टल के सामने ही टहलना, साढ़े छः से सात तक भंप्रेज़ी कम्पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्दी, दस से ग्यारह तक विविध-विषय, फिर विश्राम।

मगर टाइम-टेविल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले हो दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोंके, फुटबाल को वह उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-त्राल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिवार्य रूप से खींच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आँख- फोड़ पुस्तके, किसी को याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आँखों से दूर रहने की चेष्टा करता, कमरे में इस तरह दबे पांव आता कि उन्हें खबर न हो। उनको नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर एक नगी तलवार-सौ लटकती मालूम होतो। फिर भी जैसे मौत और विपत्ति के बीच में भी आदमी मोह और माया के बन्धन में अकड़ा रहता है, मैं फटकार और घुइकियां खाकर भो खेल-कूद का तिरस्कार न कर सकता।

( २ )

सालाना इम्तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गये, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच में केवल दो साल का अन्तर रह गया। जो में आया, भाई साहब को आहे हाथों लू --- आपकी वह घोर तपस्या कहाँ गई ? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में औवल भी हूँ। लेकिन वह इतने दुखी
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और उदास थे कि मुझे उनसे दिकी हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिड़कने का विचार ही लज्जास्पद जान पड़ा। हाँ, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्माभिमान भी बढ़ा। भाई साहब का वह रोब मुझ पर न रहा। आज़ादों से खेल-कूद में शरीक होने लगी। दिल मज़बूत था। अगर उन्होंने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह देंगा --- आपने अपना खून जलाकर कौन सा तर मार लिया। मैं त खेलते-कूदते दरजे में औवल आ गया। ज़बान से यह हेक) जताने का साहस ने होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ़ ज़ाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया--लनको सहज बुद्धि बड़ी तीव्र थी। और एक दिन जब मैं भौर का सारा समय गुल्ली-डडे की भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साहब ने मान तलवार खींच ली और मुझ पर टूट पड़े-- देखता हैं, इस साल पास हो गये और दरजे में औवल आ गये, तो तुम्हें दिमास हो गया है। मगर भाई जान, घमंड तो बड़े-बडौं का नहीं रहा, 'तुम्हारी क्या हस्ती है ? इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन सा उपदेश लिया है थ य ही पढ़ गये ? महज़ इम्तहान पास कर लेना कोई चीज़ नहीं, असल चीज़ हैं बुद्धि का विकास। जो कुछ पढ़ो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमण्डल का स्वामी था। ऐसे राज को चक्रवर्ती कहते हैं। आज-कल अग्रेजों के राज्य का विस्तार बहुत बढ़ा हुआ है। पर इन्हें चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेक राष्ट्र अंग्रेज़ी का आधिपत्य स्वीकार नहीं करते। बिलकुल स्वाधीन हैं। रावण चक्रवती राजा था, ससार के सभी महीप उसे कर देते थे। बड़े-बड़े देवता उसकी गुलामी करदे थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे ; मगर उसका अन्त क्या हुआ है घमण्ड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दियो, कोई उसे एक चित्लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी और जो कुकर्म प्याहे करे; पर अभिमान न करे, इतरा नहीं। अभिमान किया, और दीन-दुनिया दोनों से गया। शैतान का हाल भी पढ़ा ही होगा। उसे यह अभिमान हुआ था कि ईश्वर की उससे बढ़कर सच्चा भक्त कोई है ही नहीं। अन्त में यह हुआ कि वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार इको विया था। भीख माँग-माँगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है, और अभी से तुम्हारे सिर पर गया, तब तो तुम आगे बढ़ चुके। अइ ६मझ लो कि तुम अपनी मेहनत से न नहीं पास हुए, अन्धे के हाथ बटेर लग गई। [ ८२ ]
मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बारबार नहीं लग सकती। कभी-कभी गुस्ली-डंडे में भी अन्धा-चोट निशाना पड़ जाता है। इससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाती। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशाना खाली न जाय। मेरे फेल होने पर मत जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतों पसीना जायगा, जब अलजबर। और जामेट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे, और ईगलिस्तान का इतिहास पढ़ना पड़ेगा। बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी हो गुजरे हैं। कौन-सा काण्ड किस हेनरी के समय में हुआ, क्या यह याद कर लेना आसान समझते हो ? हेनरी सातवें की जगह, हेनरी आठवाँ लिखा और सन नम्बर पायब ! सुप्फाचट ! सिफर भी न मिलेगा, फिर भी। हो किस खाल में। दर ते जेम्स हुए हैं, दरजन विलियम, कोड़ियों चाल्र्स ! दिमास चक्कर खाने लगता है। आँधो रोग हो जाता है। इन अभाग को नाम भो न जुड़ते थे। एक ही नाम के पोछे दोयम, सेयम, चहारम, पचम लगाते चक्रे गये। मुझसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता। और जामेट्री तो बस खुद को पनाह। अ ब ज को जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्मर कट गये। कोई इन निर्दयी मुमतहि से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज व में क्या फर्क है, और व्यर्थ की बात के लिए के छात्रों का खून करते हो। दाल-भात-रोटी खाई या भात-दाल रोट खाई, इसमें क्या रखा है ; मगर इन परीक्षकों को क्या परवाह‌। वेई तो वह देखते हैं, जो पुस्तक में लिखा है। चाहते हैं। कि लड़के अक्षर-अक्षर रट हाले। और इसी रटने का नाम शिक्षा का छोड़ा है। और आखिर इन बे-सिर पैर की बात के पढ़ने से फायदा है इस रेखा पर चइ लम्ब गिरा द, तो आधार लम्ब से दुना होगा। पूछिए, इसे प्रयोजन ? दुगना नहीं, चौगुना हो जाय, या आधा ही रहे, मेरी बला से , लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद रखनी पड़ेगी। कह दिया---'समय को पाबन्दी’ पर एक निबन्धु लिखौ, जें चार पन्नों से कम न हो। अब आप काॅपी सामने खोले, काम हाथ में जिये, उसके नाम को रोइए। कौन नहीं जानता कि समय को पाबन्दी बहुत अच्छी बात है, इससे आदमी के जीवन में सयम आ जाता है, दूअरों की बस पर स्नेह होने लगता है और उसके कारोबार में उन्नति होती है। लेकिन इस धरा-सी बात पर चार पन्ने कैसे लिखें। जो बात एक वाक्य में कहा जा सके, इसे चार पक्षों में लिखने को, ज़रूरत ? मैं तो इसे दिमाक इतः हूँ। यह तो समय को किफायत नहीं ; बल्कि
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उसका दुरुपयोग है कि व्यर्थ में किसी बात को ढूंस दिया जाय। हम चाहते हैं, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नहीं, भापको चार पन्ने रंगने पड़ेंगे, चाहे जैसे लिखिए। और पन्ने भी पूरे फुल्के प के -आकर के। यह छात्रों पर अत्याचार नहीं तो और क्या है ? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है। संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्दी पर संक्षेप में एक निबन्ध लिखो, जो चार पन्ने से कम न हो। ठीक ! संक्षेप में तो चार पन्ने हुए, नहीं शायद सौ-दो सौ पन्ने लिख- वाले। तेज भी दौड़िए और धीरे-धीरे भी। है उल्टी बात या नहीं ? बालक भी इतनी-' सी बात समम सकता है, लेकिन इन अध्यापकों को इतनी तमीज़ भी नहीं। उन पर दावा है कि हम अध्यापक हैं। मेरे दरजे में पाओगे लाला, तो ये सारे पापद बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दाजे में अव्वल आ गये हो, तो जमीन पर पांव नहीं रखते। इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूँ, संसार का मुझे तुमसे ज्यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूँ, उसे गिरह बाधिए, नहीं पछताइएगा।

स्कूल का समय निकट था, नहीं ईश्वर जाने यह उपदेश-माला कब समाप्त होती। भोजन आज मुझे निस्स्वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिये जायें। भाई साहब ने अपने दरजे की पढ़ाई का जो भयंकर चित्र खींचा था, उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्कूल छोड़कर घर नहीं भागा, यही ताज्जुब है। लेकिन इतने तिरस्कार पर भी पुस्तकों से मेरी अरुचि ज्यों-को-त्यों बनी रही। खेल कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था; मगर बहुत कम, बस इतना कि रोज का टास्क पूरा हो जाय और दरजे मे जलील न होना पड़े। अपने ऊपर जो विश्वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्त हो गया और फिर चोरों का-सा जीवन कटने लगा।

'( ३ )

फिर सालाना इम्तहान हुआ, और कुछ ऐसा सयोग हुभा कि मैं फिर पास हुभा और भाई साहब फिर फेल हो गये। मैंने बहुत मेहनत नहीं की। पर न जाने कैसे दरजे में अव्वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्द चाट गये थे, दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उधर, छ: है साढ़े नौ तक रकूल जाने के पहले । मुद्रा ति हौन हो गई थी। [ ८४ ]
मगर बेचारे फेल हो गये। मुझे उन पर दया माती थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने की खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दुःख न होता; लेकिन विधि को बात कौन टाले।

मेरे मोर भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कहीं भाई साइब एक साल और फेल हो भाये, तो मैं उनके बराबर हो जाऊँ, फिर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेंगे, लेकिन मैंने इस फमीने विचार को दिल से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर बह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डाँटते हैं। मुझे इस वक अप्रिय लगता है अवश्य ; मगर यह शायद उनके उपदशों का ही असर हो कि मैं दनादन पास होता जाता हूँ और इतने अच्छे नम्बरों से।

अबकी भाई साहब बहुत कुछ नर्म पड़ गये थे। कई बार मुझे डाटने का अवसर पाकर भी उन्होंने धौरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे ढाटने का अधिकार उन्हें नहीं रहा, या रहा, तो बहुत कम। मेरो स्वच्छन्दता भी बढ़ी। मैं उनकी सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास हो हो जाऊँगा, पढ़ें या न पढ़ें, मेरो तकदीर बलवान है। इस लिए भाई साहब के घर से जो थोड़ा-बहुत पढ़ लिया करता था, वह भी बन्द हुआ। मुझे कनकौए वहाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतगबाजी हो को भेंट होता था; फिर भी मैं भाई साहब का अदा करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मामा देना, कने बाँधना, पतंग-दूरनामेंट की तैयारियाँ भादि समस्याएँ सब गुप्त रूप से हल की जाती थी। मैं भाई साहब को यह सदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्मान और लिहान मेरी नज़रों में कम हो गया है।

एक दिन सन्ध्या समय, होस्टल से दूर, मैं एक कनकौआ लूटने बेतहाशा दौड़ा जा रहा था। आँखे आसमान की ओर थी और मन उस आकाशगामी पथिक की भोर, जो मन्द गति से क्षमता पतन को भोर चला रहा था, मानों कोई आत्मा स्वर्ग से निकलकर विरक मन से नये संस्कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों को एक पूरी सेना करगे और मारदार बाँस लिये उनका स्वागत करने को दौड़ी भा रही थी। किसी
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को अपने आगे-पीछे को खबर न थी। सभी मानों उस पतंग के साथ ही भाकाश में उड़ रहे थे, जहां सब कुछ समतल है, न मोटरकारें है, न टाम, न गाड़ियाँ।

सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड़ हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्होंने वहाँ मेरा हाथ पकड़ लिया और उग्र भाव से बोले-इन बाज़ारी लौडों के साथ घेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्हें शर्म नहीं आतो ? तुम्हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमाअत में नहीं हो। बल्कि आठवीं जमाअत में आ गये हो और मुम्हसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपने प्रोमोशन का खयाल करना चाहिए। एक जमाना था कि लेग आठवाँ दरजा पाठ करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडिलचियों को जानता हूँ, जो आज अन्वल दरजे के डिप्टी मैजिस्ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने हो आठवीं जमाअतवाले हमारे लोडर और समाचारपत्रों के सम्पादक है। बड़े-बड़े विद्वान् उनको मातहती में फाम करते हैं। और तुम उसी आठचे दरजे में आकर बाजारी लौड़ों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्हारी इस कमअक्कली पर दुख होता है। तुम ज़हीन हो, इसमें शक नहीं , लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्म-गौरव की हत्या कर डाले। तुम अपने दिल में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज़ एक दरजा नीचे हूँ, और अब उन्हें मुसको कुछ कहने का हक नहीं है। लेकिन यह तुम्हारी पालती है। मैं तुमसे पांच साल बड़ा हूँ और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्सन्देह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे, और शायद एक साल बाद मुझसे आगे भी निकल जाओ-लेकिन मुझमें और लुममे जो पांच साल का अन्तर है, उसे तुम क्या, खुदा भी नहीं मिटा सकता। में तुमसे पांच साल बड़ा हूँ और हमेशा रहूँगा। मुझे दुनिया का और जिन्दगी का जो तसरमा है, तुम उसको बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम० ए० और डो० लिट, न और की० फिल ही क्यों न हो जाओ। समझ किताबें पढ़ने से नहीं आती, दुनिया देखने से आती है। हमारी अम्माँ ने कोई दरजा नहीं पास किया, और दादा भी शायद पाँचवी-छठी जमाअत के भागे नहीं गये; लेकिन हम दोनों चाहे सारी दुनिया को विद्या पढ़ लें, अम्मां और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नहीं कि वे हमारे जन्मदाता हैं ; बल्कि इसलिए कि उन्हें दुनिया का हमसे ज्यादा तजरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस तरह की राम-
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व्यवस्था है, और आठवें हेनरो ने कितने ब्याह किये और आकाश में कितने नक्षत्र हैं, यह बातें चाहे उन्हें न मालूम हो, लेकिन हतारों ऐसी बातें हैं, जिनका ज्ञान उन्हें हमसे और तुमसे ज़्यादा है। दैव न करे, आज मैं बीमार हो जाऊँ, तो तुम्हारे हाथ-पांव फूल जायंगे। दादा को तार देने के सिवा तुम्हें और कुछ न सूमेगा, लेकिन तुम्हारी जगह वादा हो, तो किसी को तार न दें, न पराये, न पदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डाक्टर को बुलायेंगे। बीमारी तो खैर बड़ी बीा है। हम-तुम तो इतना भी नहीं जानते कि महीने भर का खर्च महीना-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते हैं, उसे हम बीस- बाईस तक खर्च कर डालते हैं, और फिर पैसे पैसे को मुहताज हो जाते हैं। नाश्ता बन्द हो जाता है, धोकी और नाई से मुँह चुराने लगते हैं, लेकिन जितना आज हम और तुम खर्च कर रहे हैं, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बहा माग इज्जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्म का पालन किया है जिसमें सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्टर साहन दो को देखो। एम० ए० हैं कि नहीं और यहां के एम० ए० नहीं, आक्सफोर्ड के। एक हजार रुपये पाते हैं। लेकिन उनके घर का इन्तजाम कौन करता है ? उनको बूढ़ो मौ । हेडमास्टर साहन को दियो यही बेकार हो गई। पहले खुद घर का इन्तजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनको माताजी ने प्रसन्ध अपने हाथ में ले लिया है, भैसे घर में लक्ष्मी आ गई है। तो भाई जान, यह हर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब सतत्र हो। मेरे देखते तुम बेराइ न चलने पाओगे। अगर तुम यो न मानोगे तो मैं (थप्पड़ दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूँ। मैं जानता हूँ, तुम्हें मेरी बातें जहर लग रही है।

मैं उनकी इस नई युक्ति से नतमस्तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे मन में श्रद्धा उत्पन्न हुई। मैंने सजल आँखों से कहा-हरगिज़ नहीं। आप, जो कुछ फरमा रहे हैं, वह बिलकुल सच है और आपको उसके कहने का अधिकार है।

भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बोले --- मैं कनकौए उड़ाने को मना नहीं करता। मेरा जो भो ललचता है। लेकिन करूँ क्या, खुद बेराह चलू, तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ ! यह कर्तव्य भी तो मेरे सिर है। [ ८७ ]
संयोग से उसी वक एक कटा हुआ कानकौआ हमारे ऊपर से गुज़रा। उसको डोर लटक रही थी। लर्को का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साह, कम्बे हैं ही। उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ़ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।