रंगभूमि/१०

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रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
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बालकों पर प्रेम की भाँति द्वेष का असर भी अधिक होता है। जब से मिठुआ और घीसू को मालूम हुआ था कि ताहिरअली हमारा मैदान जबरदस्ती ले रहे हैं, तब से दोनों उन्हें अपना दुश्मन समझते थे। चतारी के राजा साहब और सूरदास में जो बातें हुई थीं, उनकी उन दोनों को खबर न थी। सूरदास को स्वयं शंका थी कि यद्यपि राजा साहब ने आश्वासन दिया, पर शीघ्र ही यह समस्या फिर उपस्थित होगी। जॉन सेवक साहब इतनी आसानी से गला छोड़नेवाले नहीं हैं। बजरंगी, नायकराम आदि भी इसी प्रकार की बातें करते रहते थे। मिठुआ और घीसू इन बातों को बड़े प्रेम से सुनते, और उनकी द्वेपाग्नि और भी प्रचंड होती थी। घीसू जब भैंस लेकर मैदान जाता तो जोर-जोर से पुकारता-"देग्नें, कौन हमारो जमीन लेता है, उठाकर ऐसा पटकूँ कि वह भी याद करे। दोनों टांग तोड़ दूँगा। कुछ खेल समझ लिया है!” वह जरा था भी कड़े-दम, कुश्ती लड़ता था। बजरंगी खुद भी जवानी में अच्छा पहलवान था। घीसू को वह शहर के पहलवानों की नाक बना देना चाहता था, जिससे पंजाबी पहलवानों को भी ताल ठोकने की हिम्मत न पड़े, दूर-दूर जाकर दंगल मारे, लोग कहें-“यह बजरंगी का बेटा है।" अभी से घीसू को अखाड़े भेजता था। घीसू अपने घमंड में समझता था कि मुझे जो पेच मालूम हैं, उनसे जिसे चाहूँ, गिरा दें। मिठुआ कुश्ती तो न लड़ता था; पर कभी-कभी अखाड़े की तरफ जा बैठता था। उसे अपनी पहलवानी की डींग मारने के लिए इतना काफी था। दोनों जब ताहिरअली को कहीं देखते, तो सुना-सुनाकर कहते-“दुश्मन जाता है, उसका मुँह काला।" मिठुआ कहता-"जै शंकर, काँटा लगे न कंकर, दुश्मन को तंग कर।" घीसू कहता-"बम भोला, बैरी के पेट में गोला, उससे कुछ न जाय बोला।"

ताहिरअली इन छोकरों की छिछोरी बातें सुनते, और अनसुनी कर जाते। लड़कों के मुँह क्या लगे। सोचते-"कहीं ये सब गालियाँ दे बैठे, तो इनका क्या बना लूँगा।" वे दोनों समझते, डर के मारे नहीं बोलते; और भी शेर हो जाते। घीसू मिठुआ पर उन पंचों का अभ्यास करता, जिनसे वह ताहिरअलो को पटकेगा। पहले यह हाथ पकड़ा, फिर अपनी तरफ खींचा; तब बह हाथ गरदन में डाल दिया, और अडंगी लगाई, बम चित। मिठुआ फौरन् गिर पड़ता था, और उसे इस पेच के अद्भुत प्रभाव का विश्वास हो जाता था।

एक दिन दोनों ने सलाह की-"चलकर मियाँजी के लड़कों की खबर लेनी चाहिए।” मैदान में जाकर जाहिर गौर जाबिर को खेलने के लिए बुलाया, और खूब चपतें लगाई। जाबिर छोटा था, उसे मिठुआ ने दावा। जाहिर और घीसू का जोड़ था; लेकिन घीसू अखाड़ा देखे हुए था, कुछ दाँव-पेच जानता ही था, आन-की-आन में जाहिर को दबा बैठा। मिठुआ ने जाबिर के चुटकियाँ काटनी शुरू की। बेचारा रोने लगा। [ ११० ]
घीसू ने जाहिर को कई घिस्से दिये, वह भी चौंधिया गया; जब देखा कि यह तो मार ही डालेगा, तो उसने फरियाद मचाई। इन दोनों का रोना सुनकर नन्हाँ सा साबिर एक पतली-सी टहनी लिये, अकड़ता हुआ पीड़ितों की सहायता करने आया, और घीस को टहनी से मारने लगा। जब इस शस्त्र प्रहार का घीसू पर कुछ असर न हुआ, तो उसने इससे ज्यादा चोट करनेवाला बाण निकाला-घीसू पर थूकने लगा। घीसू ने जाहिर को छोड़ दिया, और साबिर के दो-तीन तमाचे लगाये। जाहिर मौका पाकर फिर उठा, और अवको ज्यादा सावधान होकर घीसू से चिमट गया। दोनों में मल्ल-युद्ध होने लगा। आखिर घीसू ने उसे फिर पटका और मुश्क चढ़ा दी। जाहिर को अब रोने के सिवा कोई उपाय न सूझा, जो निर्बलों का अंतिम आधार है। तोनों की आर्त ध्वनि माहिरअली के कान में पहुँची। वह इस समय स्कूल जाने को तैयार थे। तुरन्त किताबें पटक दी और मैदान की तरफ दौड़े। देखा, तो जाबिर और जाहिर नीचे पड़े हाय-हाय कर रहे हैं और साबिर अलग बिलबिला रहा है! कुलीनता का रक्त खौल उठा; मैं सैयद, पुलिस के अफसर का बेटा, चुंगी के मुहर्रिर का भाई, अँगरेजी के आठ दरजे का विद्यार्थी! यह मूर्ख, उजड्ड, अहीर का लौंडा, इसकी इतनी मजाल कि मेरे भाइयों को नीचा दिखाये! घीसू के एक ठोकर लगाई और मिठुआ के कई तमाचे। मिठुआ तो रोने लगा; किंतु घीसू चिमड़ा था। जाहिर को छोड़कर उठा, हौसले बढ़े हुए थे दो मोरचे जीत चुका था, ताल ठोककर माहिरअली से भी लिपट गया। माहिर का सफेद पाजामा मैला हो गया, आज ही जूते में रोगन लगाया था, उस पर गर्द पड़ गई; सँवारे हुए बाल बिखर गये, क्रोधोन्मत्त होकर घीसू को इतनी जोर से धक्का दिया कि वह दो कदम पर जा गिरा। साबिर, जाहिर, जाबिर, सब हँसने लगे। लड़कों को चोट प्रतिकार के साथ ही गायब हो जाती है। घीसू इनको हँसते देखकर और भी झुँझलाया; फिर उठा और माहिरअली से लिपट गया। माहिर ने उसका टेटुआ पकड़ा, और जोर से दबाने लगे। घीसू ने समझा, अब मरा, यह बिना मारे न छोड़ेगा। मरता क्या न करता, माहिर के हाथ में दाँत जमा दिये; तीन दाँत गड़ गये, खून बहने लगा। माहिर चिल्ला उटे, उसका गला छोड़कर अपना हाथ छुड़ाने का ल करने लगे; मगर घीम किसी भौति न छोड़ता था। खून बहते देखकर तीनों भाइयों ने फिर रोना शुरु किया। जैनब और रकिया यह हंगामा सुनकर दरवाजे पर आ गई। दखा तो समरभमि रक्त से साबित हो रही है, गालियाँ देती हुई ताहिरअली के पास आई। जैनब ने तिरस्कार-भाव में कहा---"तुम यहाँ बैठे खालें नोच रहे हो, कुछ दीन-दुनिया की भी खबर है! वहां वह अहीर का लौंडा हमारे लड़कों का खून-खच्चर किये डालता है। मुए को पकड़ पाती, तो खून ही चूस लेती।"

रकिया—"मुआ आदमी है कि देव-बच्चा है! माहिर के हाथ में इतनी जोर से दाँत काटा है कि खून के फौवारे निकल रहे हैं। कोई दूसरा मर्द होता, तो इसी बात पर मुए को जीता गाड़ देता।" [ १११ ]जैनब—"कोई अपना होता, तो इस वक्त मुडीकाटे को कच्चा ही चबा जाता।"

ताहिरअली घबराकर मैदान की ओर दौड़े। माहिर के कपड़े खून से तर देखे, तो जामे से बाहर हो गये। घीसू के दोनों कान पकड़कर जोर से हिलाये और तमाचे-पर-तमाचे लगाने शुरू किये। मिठुआ ने देखा, अब पिटने की बारी आई, मैदान हमारे हाथ से गया, गालियाँ देता हुआ भागा! इधर घीसू ने भी गालियाँ देनी शुरू की। शहर के लौंडे गाली की कला में सिद्धहस्त होते हैं। घीसू नई-नई अछूती गालियाँ दे रहा था और ताहिरअली गालियों का जवाब तमाचों से दे रहे थे। मिठुआ ने जाकर इस संग्राम की सूचना बजरंगी को दी-'सब लोग मिलकर घीसू को मार रहे हैं, उसके मुँह से लहू निकल रहा है। वह भैसें चरा रहा था, बस तीनों लड़के आकर भैसों को भगाने लगे। घीसू ने मना किया, तो सबों ने मिलकर मारा, और बड़े मियाँ भी निकल-कर मार रहे हैं।" बजरंगी यह खबर सुनते ही आग हो गया। उसने ताहिरअली की माताओं को ५०) दिये थे और उस जमीन को अपनी समझे बैठा था। लाठी उठाई और दौड़ा| देखा, तो ताहिरअली घीसू के हाथ-पाँव बँधवा रहे हैं। पागल हो गया, बोला-"बस, मुंशीजी, भला चाहते हो, तो हट जाओ; नहीं तो सारो सेखी भुला दूँगा, यहाँ जेहल का डर नहीं है, साल-दो साल वहीं काट आऊँगा, लेकिन तुम्हें किसी काम का न रखूँगा। जमीन तुम्हारे बाप की नहीं है। इसीलिए तुम्हें ५०) दिये हैं। क्या वे हराम के रुपये थे? बस, हट ही जाओ, नहीं तो कच्चा चबा जाऊँगा, मेरा नाम बजरंगी है!”

ताहिरअली ने अभी कुछ जवाब न दिया था कि घीसू ने बाप को देखते ही जोर से छलाँग मारी, और एक पत्थर उठाकर ताहिरअली की तरफ फेंका। वह सिर नीचा न कर लें, तो माथा फट जाय। जब तक घीसू दूसरा पत्थर उठाये, उन्होंने लपककर उसका हाथ पकड़ा और इतनी जोर से ऐंठा कि वह “आह मरा! आह मरा!” कहता हुआ जमीन पर गिर पड़ा। अब बजरंगी आपे से बाहर हो गया। झपटकर ऐसी लाठी मारी कि ताहिरअली तिरमिराकर गिर पड़े। कई चमार, जो अब तक इसे लड़कों का झगड़ा समझकर चुपचाप बैठे थे, ताहिरअली को गिरते देखकर दौड़े और बजरंगी को पकड़ लिया। समर-क्षेत्र में सन्नाटा छा गया। हाँ, जैनब और रकिया द्वार पर खड़ी शब्द-बाण चलाती जाती थीं-"मूड़ी काटे ने गजब कर दिया, इरा पर खुदा का कहर गिरे, दूसरा दिन देखना नसीब न हो, इसकी मैयत उठे, कोई दौड़कर साहब के पास क्यों जाकर इत्तिला नहीं करता। अरे-अरे चमारो, बैठे मुँह क्या ताकते हो, जाकर साहब को खबर क्यों नहीं देते; कहना-अभी चलिए। साथ लाना, कहना-पुलिस लेते चलिए, यहाँ जान देने नहीं आये हैं।"

बजरंगी ने ताहिरअली को गिरते देखा, तो सँभल गया, दूसरा हाथ न चलाया। घीसू का हाथ पकड़ा और घर चला गया। यहाँ घर में कुहराम मचा। दो चमार जॉन सेवक के बँगले की तरफ गये। ताहिरअली को लोगों ने उठाया और चारपाई पर लाद-कर कमरे में लाये। कंधे पर लाठी पड़ी थी, शायद हड्डी टूट गई थी। अभी तक बेहोश
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थे। चमारों ने तुरंत हल्दी पीसी और उसे गुड़-चूने में मिलाकर उनके कंत्र में लगाया। एक आदमी लपककर पेड़ के पत्ते तोड़ लाया, दो आदमी बैठकर सेंकने लगे। जैनब और रकिया तो ताहिरअली की मरहम-पट्टी करने लगी, बेचारी कुलयूम दरवाजे पर खड़ी रो रही थी। पति की ओर उससे ताका भी न जाता था। गिरने से उनके सिर में चोट आ गई थी। लहू बहकर माथे पर जम गया था। बालों में लटें पड़ गई थीं, मानों किसी चित्रकार के ब्रुश में रंग सूख गया हो। हृदय में शूल उठ रहा था; पर पति के मुख की ओर ताकते ही उसे मूछा-सी आने लगती थी, दूर खड़ी थी; यह विचार भी मन में उठ रहा था कि ये सब आदमी अपने दिल में क्या कहते होंगे! इसे पति के प्रति जरा भी प्रेम नहीं, खड़ी तमाशा देख रही है। क्या करूँ, उनका चेहरा न जाने कैसा हो गया है। वही चेहरा, जिसकी कभी बलाएँ ली जाती थीं, मरने के बाद भयावह हो जाता है, उसकी ओर दृष्टिपात करने के लिए कलेजे को मजबृत करना पड़ता है। जीवन की भाँति मृत्यु का भी सबसे विशिष्ट आलोक मुख ही पर पड़ता है। ताहिरअली की दिन-भर सैक-बाँध हुई, चमारों ने इस तरह दौड़-धूर की, मानी उनका कोई अपना इष्ट-मित्र है। क्रियात्मक सहानुभूति ग्राम-निवासियों का विशेष गुण है। रात को भी कई चमार उनके पास बैठे सेंकते-बाँधते रहे। जेनब और रकिया बार-बार कुल्लूम को ताने देती-“बहन, तुम्हारा दिल भी गजब का है। शौहर का यहाँ बुरा हाल हो रहा है, और तुम यहाँ मजे से बैठी हो। हमारे मियाँ के सिर में जरा-सा दर्द होता था, तो हमारी जान नाखून में समा जातो थी। आजकल की औरतों का कलेजा सचमुच पत्थर का होता है।" कुल्सूम का हृदय इन बाणों से बिंध जाता था; पर यह कहने का साहस न होता था कितुम्हीं दोनों क्यों नहीं चली जाती? आखिर तुम भी तो उन्हीं की कमाई खाती हो, और मुझसे अधिक। किंतु इतना कहती, तो बचकर कहाँ जाती, दोनों उसके गले पड़ जातीं। सारी रात जागती रही। बार-बार द्वार पर जाकर आहट ले आती थी। किसी भाँति रात कटी। प्रातःकाल ताहिरअली की आँखें खुली; दर्द से अब भी कराह रहे थे; पर अब अवस्था उतनी शोचनीय न थी। तकिये के सहारे बैठ गये। कुल्लूम ने उन्हें चमारी से बातें करते सुना। उसे ऐसा जान पड़ा कि इनका स्वर कुछ विकृत हो गया है। चमारों ने ज्यों ही उन्हें होश में देखा, समझ गये कि अब हमारी जरूरत नहीं रहो, अब घरवालो की सेवा-शुश्रूषा का अवसर आ गया। एक-एक करके बिदा हो गये। अब कुल्सूम ने चित्त सावधान किया और पति के पास आ बैठी। ताहिरअली ने उसे देखा, तो क्षीण स्वर में बोले-"खुदा ने मुझे नमकहरामी की सजा दी है। जिनके लिए अपने आका का बुरा चेता, वही अपने दुश्मन हो गये।"

कुल्लम—"तुम यह नौकरी छोड़ क्यों नहीं देते? जब तक जमीन का मुआमला नय न हो जायगा, एक-न-एक झगड़ा-बखेड़ा रोज होता रहेगा, लोगों से दुश्मनी बढ़ती जायगी। यहाँ जान थोड़े ही देनी है। स्खुदा ने जैसे इतने दिन रोजी दी, वैसे ही फिर देगा। जान तो सलामत रहेगी।" [ ११३ ]ताहिर-"जान तो सलामत रहेगी, पर गुजर क्योंकर होगा, कौन इतना दिये देता, है? देखती हो कि अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे आदमी मारे-मारे फिरते हैं।"

कुल्सूम-"न इतना मिलेगा, न सही; इसका आधा तो मिलेगा! दोनों वक्त न खायेंगे, एक ही वक्त सही; जान तो आफत में न रहेगी।"

ताहिर-"तुम एक वक्त खाकर खुश रहोगी, घर में और लोग भी तो हैं, उनके दुखड़े रोज कौन सुनेगा? मुझे अपनी जान से दुश्मनी थोड़े ही है; पर मजबूर हूँ। स्नुदा को जो मंजूर होगा, वह पेश आयेगा।”

कुल्सूम-"घर के लोगों के पीछे क्या जान दे दोगे?"

ताहिर-"कैसी बातें करती हो, आखिर वे लोग कोई गैर तो नहीं हैं। अपने ही भाई हैं, अपनी माएँ हैं। उनकी परवरिश मेरे सिवा और कौन करेगा?"

कुल्सूम-"तुम समझते होगे, वे तुम्हारे मुहताज हैं, मगर उन्हें तुम्हारी रत्ती-भर भी परवा नहीं। सोचती हैं, जब तक मुपत का मिले, अपने खजाने में क्यों हाथ लगायें। मेरे बच्चे पैसे-पैसे को तरसते हैं और वहाँ मिठाइयों की हाँड़ियाँ आती हैं, उनके लड़के मजे से खाते हैं। देखती हूँ और आँखें बन्द कर लेती हूँ।”

ताहिर-"मेरा जो फर्ज है, उसे पूरा करता हूँ। अगर उनके पास रुपये हैं, तो इसका मुझे क्यों अफसोस हो, वे शौक से खायें, आराम से रहें। तुम्हारी बातों से हसद की बू आती है। खुदा के लिए मुझसे ऐसी बातें न किया करो।"

कुल्सूम-"पछताओगे; जब समझाती हूँ, मुझ ही पर नाराज होते हो; लेकिन देख लेना, कोई बात न पूछेगा।"

ताहिर-“यह सब तुम्हारी नियत का कसूर है।"

कुल्सूम-"हाँ, औरत हूँ, मुझे अक्ल कहाँ! पड़े तो हो, किसी ने झाँका तक नहीं कलक होती, तो यों चैन से न बैठी रहती।"

ताहिरअली ने करवट ली, तो कन्धे में असह्य वेदना हुई, आह-आह! करके चिल्ला उठे। माथे पर पसीना आ गया। कुल्लूम घबराकर बोली-"किसी को भेजकर डॉक्टर को क्यों नहीं बुला लेते? कहीं हड्डी पर जरब न आ गया हो।"

ताहिर—"हाँ, मुझे भी ऐसा ही खोफ होता है, मगर डॉक्टर को बुलाऊँ, तो उसकी फीस के रुपये कहाँ से आगे?"

कुल्लूम—"तनख्वाह तो अभी मिली थी, क्या इतनी जल्द खर्च हो गई?"

ताहिर—"खर्च तो नहीं हो गई, लेकिन फीस की गुंजाइश नहीं है। अबकी माहिर की तीन महीने की फीस देनी होगी। १२) तो फीस ही के निकल जायँगे, सिर्फ १८) बचेंगे। अभी तो पूरा महीना पड़ा हुआ है। क्या फाके करेंगे?”

कुल्सूम—"जब देखो, माहिर की फीस का तकाजा सिर पर सवार रहता है। अभी दस दिन हुए, फीस दी नहीं गई?”

ताहिर—“दस दिन नहीं हुए, एक महीना हो गया।" [ ११४ ]कुल्सूम-"फीस अबकी न दी जायगी। डॉक्टर की फीस उनकी फीस से जरूरी है। वह पढ़कर रुपये कमायेंगे, तो मेरा घर न नरेंगे। मुझे तो तुम्हारी ही जात का भरोसा है।"

ताहिर--( बात बदलकर) "इन मृजियों को जब तक अच्छी तरह तंबीह न हो जायगी, शरारत से बाज न आयेंगे।"

कुल्सम-“सारी शरारत इसी माहिर की थी। लड़कों में लड़ाई-झगड़ा होता ही रहता है। यह वहाँ न जाता, तो क्यों मुआमला इतना तूल खींचता। इस पर जो अहीर के लौंडे ने जरा दाँत काट लिया, तो तुम भन्ना उठे।"

ताहिर--मुझे तो खून के छींटे देखते ही जैसे सिर पर भूत सवार हो गया।"

इतने में घीसू की माँ जमुनी आ पहुँची। जैनब ने उसे देखने ही तुरन्त बुला लिया और डाँटकर कहा- 'मालूम होता है, तेरी शामत आ गई है।'

जमुनी-"बेगम साहब, सामत नहीं आई है, बुरे दिन आये हैं, और क्या कहूँ।

मैं कल दही बेचकर लौटी, ता यह हाल सुना। सोधे आपकी खिदमत में दौड़ी; पर यहाँ बहुत-से आदमी जमा थे, लाज के मारे लौट गई। आज दही बेचने नहीं गई। बहुत डरते-डरते आई हूँ। जो कुछ भूल-चूक हुई, उसे माफ कीजिए, नहीं तो उजड़ जायँगे, कहीं ठिकाना नहीं है।"

जैनब-"अब हमारे किये कुछ नहीं हो सकता! साहब बिना मुकदमा चलाये न मानेंगे, और वह न चलायेंगे, तो हम चलायेंगे। हम कोई धुनिये-जुलाहे हैं? यो सबसे दबते फिरें, तो इजत कैसे रहे? मियाँ के बाप थानेदार थे, सारा इलाका उनके नाम से काँपता था, बड़े-बड़े रईस हाथ बाँधे सामने खड़े रहते थे। उनकी औलाद क्या ऐसी गई-गुजरी हो गई कि छोटे-छोटे आदमी बेइजती करें? तेरे लौंडे ने माहिर को इतनो जोर से दाँत काटा कि लह-लुहान हो गया पट्टी बाँधे पड़ा है। तेरे शौहर ने आकर लड़के को डाँट दिया होता, तो बिगड़ी बात बन जाती। लेकिन उसने तो आते-ही-आते लाठो का वार कर दिया। हम शरीफ लोग हैं, इतनी रियायत नहीं कर सकते।”

रकिया-"जब पुलिस आकर मारते-मारते कचूमर निकाल देगी, तब होश आयेगा; नजर-नियाज देनी पड़ेगी, वह अलग। तब आटे-दाल का भार मालूम होगा।"

जमुगी को अपने पति के हिस्से का व्यावहारिक ज्ञान भी मिला था। इन धमकियों से भयभीत न होकर बोली-“बेगम साहब, यहाँ इतने रुपये कहाँ धरे हैं, दूध-पानी करके दस-पाँच रुपये बटोरे हैं। वहीं तक अपनी दौड़ है। इस रोजगार में अब क्या रखा है! रुपये का तीन पसेरी तो भूसा मिलता है। एक रुपये में एक भैंस का पेट नहीं भरता। उस पर खली, बिनौला, भूसी, चोकर, सभी कुछ चाहिए। किसी तरह दिन काट रहे हैं। आपके बाल-बच्चों को साल-छ मदीन दूध पिला दूँगी।"

जैनब समझ गई कि यह अहीरन कच्ची गोटी नहीं खेली है। इसके लिए किसी दूसरे ही मंत्र का प्रयोग करना चाहिए, नाक सिकोड़कर बोली-"तू अपना दूध अपने
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घर रख, यहाँ दूध-घी के ऐसे भूखे नहीं हैं। यह जमीन अपनी हुई जाती है; जितने जानवर चाहूँगी, पाल लूँगी। मगर तुझसे कहे देती हूँ कि तू कल से घर में न बैठने पायेगी। पुलिस की रपट तो साहब के हाथ में है; पर हमें भी खुदा ने ऐसा इल्म दिया है कि जहाँ एक नक्श लिखकर दम किया कि जिन्नात अपना काम करने लगे। जम हमारे मियाँ जिंदा थे, तो एक बार पुलिस के एक बड़े अँगरेज हाकिम से कुछ हुजत हो गई। बोला; हम तुमको निकाल देंगे। मियाँ ने कहा, हमें निकाल दोगे, तो तुम भी आराम से न बैठोगे। मियाँ ने आकर मुझसे कहा। मैंने उसी रात को सुलेमानी नक्श लिख कर दम किया, उसकी मेम का पूरा हमल गिर गया। दौड़ा हुआ आया, खुशामदे की, पैरों पर गिरा, मियों से कसूर मूआफ कराया, तब मेम की जान बची। क्यों रकिया तुम्हें याद है न?”

रकिया-"याद क्यों नहीं है, मैंने ही तो दुआ पढ़ी थी। साहब रात को दरवाजे पर पुकारता था।"

जैनब-"हम अपनी तरफ से किसी को बुराई नहीं चाहते। लेकिन जब जान पर आ बनती है, तो सबक भी ऐसा दे देते हैं कि जिंदगी भर न भूले। अभी अपने पीर से कह दें, तो नुदा जाने क्या गजब ढायें। तुम्हें याद है रकिया, एक अहोर ने उन्हें दूब में पानी मिलाकर दिया था। उनकी जबान से इतना ही निकला-'जा, तुझसे खुदा समझें।' अहीर ने घर आकर देखा, तो उसकी २००) की भैंस मर गई थी।"

जमुनी ने ये बातें सुनीं, तो होश उड़ गये। अन्य स्त्रियों की भाँति वह भी थाना, पुलिस, कचहरी ओर दरबार की अपेक्षा भूत पिशाचों से ज्यादा डरी रहती थी। पास-पड़ोस में पिशाच-लीला देखने के अवसर आये-दिन मिलते ही नइते थे। मुल्लाओं के यंत्र-मंत्र कहीं ज्यादा लागू होते हैं, यह भी मानती थी। जैनव बेगम ने उसकी पिशाच-भीरुता को लक्षित करके अपनी विषम चातुरी का परिचय दिया। जमुनी नयभीत होकर बोली- "नहीं बेगम साहब, आपको भी भगवान् ने बाल-बच्चे दिये हैं, ऐला जुलुम न कीजिएगा, नहीं तो मर जाऊँगी।”

जैनब-"यह भी न करें, वह भी न करें, तो इन्नत कैमे रहे? कल को तेरा अहेर फिर लट्ठ लेकर आ पहुँचे तो? खुदा ने चाहा, तो अब वह लट्ठ उठाने लायक रह हो न जायगा।"

जमुनी थरथराकर पैरों पर गिर पड़ी, और बोली-“बोबी, जो हुकुम हो उसके लिए हाजिर हूँ।"

जैनब ने चोट-पर-चोट लगाई और जमुनी के बहुत रोने-गिड़गिड़ाने पर २५) ले कर जिन्नात से उसे अभय-दान दिया। घर गई, रुपये लाकर दिये ओर पैंरो पर गिरी; मगर बजरंगी से यह बात न कही। वह चली गई, तो जैनब ने हँसकर कहा-"खुदा देता है, तो छप्पर फाड़कर देता है। इसका तो सान-गुमान भी न था। तुम बेसब्र हो जाती हो, नहीं तो मैंने कुछ-न-कुछ और ऐंठा होता। सवार को चाहिए बाग हमेशा कड़ी रखे।"

सहसा साबिर ने आकर जैनब से कहा-"आपकों अब्बा बुलाते हैं।" जैनब वहाँ
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गई, तो ताहिरअली को पड़े कराहते देखा। कुल्सूम से बोली-"बीबी, गजब का तुम्हारा जिगर है। अरे भले आदमी, जाकर जरा मूँग की दलिया पका दे। गरीब ने रात को कुछ नहीं खाया, इस वक्त भी मुँह में कुछ न जायगा, तो क्या हाल होगा?”

ताहिर-"नहीं, मेरा कुछ खाने को जी नहीं चाहता। आपको इसलिए तकलीफ दी है कि अगर आपके पास कुछ रुपये हों, तो मुझे कर्ज के तौर पर दे दीजिए। मेरे कंधों में बड़ा दर्द है, शायद हड्डी टूट गई है, डॉक्टर को दिखाना चाहता हूँ; मगर उसकी फीस के लिए रुपयों की जरूरत है।"

जैनब-"बेटा, भला सोचो तो, मेरे पास रुपये कहाँ से आयगे, तुम्हारे सिर की कसम खाकर कहती हूँ। मगर तुम डॉक्टर को बुलाओ ही क्यों। तुम्हें सीधे साहब के यहाँ जाना चाहिए। यह हंगामा उन्हीं की बदौलत तो हुआ है, नहीं तो यहाँ हमसे किमी से क्या गरज थी। एक इक्का मँगवा लो और साहब के यहाँ चले जाओ। वह एक रुक्का लिख देंगे, तो सरकारी शिफाखाने में खासी तरह इलाज हो जायगा। तुम्ही सोचो, हमारी हैसियत डॉक्टर बुलाने की है?"

ताहिरअली के दिल में यह बात बैठ गई। माता को धन्यवाद दिया। सोचा, न जाने यही बात मेरी समझ में क्यों नहीं आई। इक्का मँगवाया, लाठी के सहारे बड़ी मुश्किल से उस पर सवार हुए और साहब के बँगले पर पहुँचे।

मिस्टर सेवक, राजा महेंद्रकुमार से मिलने के बाद, कंपनी के हिस्ले बेचने के लिए बाहर चले गये थे और उन्हें लोटे हुए आज तीन दिन हो गये थे। कल बह राजा साहब से फिर मिले थे; मगर जब उनका फैसला सुना, तो बहुत निराश हुए। बहुत देर तक बैठे तर्क-वितर्क करते रहे; लेकिन राजा साइब ने कोई संतोष जनक उत्तर न दिया। निराश होकर आये और मिसेज सेवक से सारा वृनांत कह सुनाया।

मिसेज सेवक को हिदुस्थानियों से चिढ़ थी। यदि इसी देश के अन्न-जल से उनकी सृष्टि हुई थी, पर अपने विचार, हजरत इसा की शरण में आकर, वह हिंदुस्थानियों के अवगुणों से मुक्त हो चुकी थीं। उनके विचार में यहाँ के आदमियों को खुदा ने सज्जनता, सहृदयता, उदारता, शालीनता आदि दिव्य गुणों से संपूर्णतः बंचित रग्बा है। यह यारपीय सभ्यता की भक्त थीं और आहार-व्यवहार में उमी का अनुसरण करती थी। खान-पान, बेप-भूषा, रहन सहन, सब आँगरेजी थी; मजबूरी केवल अपने साँवले रंग से थी। साबुन के निरंतर प्रयोग और अन्य रासायनिक पदार्थों का व्यवहार करने पर भी मनोकामना पूरी होती न थी। उनके जीन की एकमात्र यही अभिलाषा थी कि हम ईसाइयों की श्रेणी से निकलकर अँगरेजी में जा मिले, हमें लोग साहब समझें, हमारा रब्त-जब्त अँगरेजों से हो, हमारे लड़कों की शादियाँ एंग्लो इंडियन या कम-से-कम उच्च श्रेणा के यूरेशियन लोगों से हो। सोफी की शिक्षा-दीक्षा अँगरेजी ढंग पर हुई थी; किंतु वह माता के बहुत आग्रह करने पर भी अँगरेजी दास्तों और पार्टियों में शरीक होती थी, और नाच से तो उसे घृणा ही था। किंतु मिसेज सेवक इन अवसरों को हाथ से न
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जाने देती थीं; यो काम न चलता तो विशेष प्रयत्न करके निमंत्रण-पत्र मँगवाती थीं। अगर स्वयं उनके मकान पर दावतें और पार्टियाँ बहुत कम होती थीं, तो इसका कारण ईश्वर सेवक की कृपणता थी।

यह समाचार सुनकर मिसेज सेवक बोलीं—“देख ली हिंदुस्थानियों की सजनता? फूले न समाते थे। अब तो मालूम हुआ कि ये योग कितने कुटिल और विश्वासघातक हैं। एक अंधे भिखारी के सामने तुम्हारी यह इज्जत है। पक्षपात तो इन लोगों की घुट्टी में पड़ा हुआ है, और यह उन बड़े-बड़े आदमियों का हाल है, जो अपनी जाति के नेता समझे जाते हैं, जिनकी उदारता पर लोगों को गर्व है। मैंने मिस्टर क्लार्क से एक बार यह चर्चा की थी। उन्होंने तहसीलदारों को हुक्म दे दिया कि अपने-अपने इलाके में तम्बाकू की पैदावार बढ़ाओ। यह सोफी के आग में कूदने का पुरस्कार है! जरा-सा म्युनिसिपैलिटी का अख्तियार क्या मिल गया, सबों के दिमाग फिर गये। मिस्टर क्लार्क कहते थे कि अगर राजा साहब जमीन का मुआमला न तय करेंगे, तो मैं जाब्ते से उसे आपको दिला दूँगा।"

मिटर जोजफ क्लार्क जिला के हाकिम थे। अभी थोड़े ही दिनों से यहाँ आये थे। मिसेज सेवक ने उनसे रन्त-जन्त पैदा कर लिया था। वास्तव में उन्होंने क्लार्क को सोफी के लिए चुना था। दो-एक बार उन्हें अपने घर बुला भी चुकी थीं। गृह-निर्वासन से पहले दो-तीन बार सोफी से उनकी मुलाकात भी हो चुकी थी; किन्तु वह उनकी ओर विशेष आकृष्ट न हुई थी। तो भी मिलेज सेवक इस विषय में अभी निराश न हुई थीं। क्लार्क से कहती थीं-"सोफी मेहमानी करने गई है।" इसी प्रकार अवसर पाकर उनकी प्रेमाग्नि को भड़काती रहती थीं।

जॉन सेवक ने लजित होकर कहा—“मैं क्या जानता था, यह महाशय भी दगा देगे, यहाँ उनकी बड़ी ख्याति है, अपने बचन के पक्के समझे जाते हैं। खैर, कोई मुजायका नहीं, अब कोई दूसरा उपाय सोचना पड़ेगा।”

मिसेज सेवक—"मैं मिस्टर क्लार्क से कहूँगी। पादरी साहब से भी सिफारिश कराऊँगी।"

जॉन सेवक—"मिस्टर क्लार्क को म्युनिसिलिटी के मुआमलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं।”

जॉन सेवक इसी चिन्ता में पड़े हुए थे कि इस हंगामे की खबर मिली। सन्नाटे में आ गये। पुलिस को रिपोर्ट की। दूसरे दिन गोदाम जाने का विचार कर ही रहे थे कि ताहिरअली लाठी टेकते हुए आ पहुँचे। आते-आते एक कुरसी पर बैठ गये। इक्के के हचकोलों ने अधमुआ-सा कर दिया था।

मिसेज सेवक ने अँगरेजी में कहा—"कैसी सूरत बना ली है, मानों विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है!"


[ ११८ ]जॉन सेवक—“कहिए मुंशीजी, मालूम होता है, आपको बहुत चोट आई। मुझे इसका बड़ा दुःख है।"

ताहिर—"हुजूर, कुछ न पूछिए, कंबख्तों ने मार डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।"

जॉन सेवक—"और इन्हीं दुष्टों की आप मुझसे सिफारिश कर रहे थे।"

ताहिर—"हुजूर, अपनी खता की बहुत सजा पा चुका। मुझे ऐसा मालूम होता है कि मेरी गरदन की हड्डी पर जरब आ गया है।”

जॉन सेवक—"यह आपकी भूल है। हड्डी टूट जाना कोई मामूली बात नहीं है। आप यहाँ तक किसी तरह न आ सकते थे। चोट जरूर आई है, मगर दो-चार रोज मालिश कर लेने से आराम हो जायगा। आखिर यह मारपीट हुई क्यों?"

ताहिर—“हुजूर, यह सब उसी शैतान बजरंगी अहीर की हरकत है।"

जॉन सेवक—"मगर चोट खा जाने ही से आप निरपराध नहीं हो सकते। मैं इसे आपकी नादानी और असावधानी समझता हूँ। आप ऐसे आदमियों से उलझे ही क्यों?

आपको मालूम है, इसमें मेरी कितनी बदनामी है?"

ताहिर—"मेरी तरफ से ज्यादती तो नहीं हुई।"

जॉन सेवक—"जरूर हुई, वरना देहातों के आदमी किसी से छेड़कर लड़न नहीं आते। आपको इस तरह रहना चाहिए कि लोगों पर आपका रोब रहे। यह नहीं कि छोटे-छोटे आदमियों को आपसे मार-पीट करने की हिम्मत हो।"

मिसेज सेवक—"कुछ नहीं, यह सब इनकी कमजोरी है। कोई राह चलते किसी को नहीं मारता।"

ईश्वर सेवक कुरसी पर पड़े-पड़े बोले-"खुदा के बेटे, मुझे अपने साये में ले, सच्च दिल से उसकी बंदगी न करने की यही सजा है।"

ताहिरअली को ये बातें घाव पर नमक के समान लगी। ऐसा क्रोध आया कि इमी वक्त कह दूँ, जहन्नुम में जाय तुम्हारी नौकरी; पर जान सेवक को उनकी दुरवस्था से लाभ उठाने की एक युक्ति सूझ गई। फिटन तैयार कराई और ताहिरअली को लिये हुए राजा महेंद्रकुमार के मकान पर जा पहुँचे। राजा साहब शहर का गश्त लगाकर मकान पर पहुँचे ही थे कि जॉन सेवक का कार्ड पहुँचा। अदाला ये, लेकिन शील आ गया, बाहर निकल आये। मिस्टर सेवक ने कहा-श्रमा कीजिएगा, आपको कुसमय कष्ट हुआ; किंतु पाँडेपुरवालों ने इतना उपद्रव मचा रखा है कि मेरी समझ में नहीं आता, आपके सिवा किसका दामन पकड़ूँ। कल सयों ने मिलकर गोदाम पर धावा कर दिया। शायद आग लगा देना चाहते थे, पर आग तो न लगा सके हाँ, यह मेरे एजेंट है, सब-के-सब इन पर टूट पड़े। इनको और इनके भाइयों को मारते-मारते बेदम कर दिया। इतने पर भी उन्हें तस्कीन न हुई, जनाने मकान में घुस गये; और अगर स्त्रियाँ अन्दर से द्वार न बन्द कर लें, तो उनकी आबरू बिगड़ने में कोई संदेह न था। [ ११९ ]
इनके तो ऐसी चोटें लगी हैं कि शायद महीनों चलने-फिरने लायक न हों, कंधे की हड्डी ही टूट गई है।"

महेंद्र कुमारसिंह स्त्रियों का बड़ा सम्मान करते थे। उनका अपमान होते देखकर श में आ जाते थे। रौद्र रूप धारण करके बोले-"सब जनाने में घुस गये?"

जॉन सेवक-"किवाड़ तोड़ना चाहते थे, मगर चमारों ने धमकाया, तो हट गये।"

महेंद्र कुमार-"कमीने! स्त्रियों पर अत्याचार करना चाहते थे!"

जॉन सेवक—“यही तो इस ड्रामा का सबसे लज्जास्पद अंश है।"

महेंद्रकुमार-लज्जास्पद नहीं महाशय, घृणास्पद कहिए।”

जॉन सेवक—"अब यह वेचारे कहते हैं कि या तो मेरा इस्तीफा लीजिए, या गोदाम की रक्षा के लिए चौकीदारों का प्रबन्ध कीजिए। स्त्रियाँ इतनी भयभीत हो गई हैं कि वहाँ एकक्षण भी नहीं रहना चाहतीं। यह सारा उपद्रव उसी अंधे की बदौलत हो रहा है।"

महेंद्र कुमार—"मुझे तो वह बहुत ही गरीब, सीधा-सा आदमी मालूम होता है; मगर है छँटा हुआ। उसी की दीनता पर तरस खाकर मैंने निश्चय किया था कि आपके लिए कोई दूसरी जमीन तलाश करूँ। लेकिन जब उन लोगों ने शरारत पर कमर बाँधी है और आपको जबरदरती वहाँ से हटाना चाहते हैं, तो इसका उन्हें अवश्य दंड मिलेगा।"

जॉन सेवक—"बस, यही बात है, वे लोग मुझे वहाँ से निकाल देना चाहते हैं। अगर रिआयत की गई, तो मेरे गोदाम में जरूर आग लग जायगी।"

महेंद्रकुमार—मैं खूब समझ रहा हूँ। यों मैं स्वयं जनवादी हूँ ओर उस नीति का हृदय से समर्थन करता हूँ, पर जनवाद के नाम पर देश में जो अशांति फैली हुई है, उसका मैं घोर विरोधी हूँ। ऐसे जनवाद से तो धनवाद, एकवाद, सभी वाद अच्छे हैं। आप निश्चिंत रहिए।"

इसी भाँति कुछ देर और बातें करके और राजा साहब को खूब भरकर जॉन सेवक विदा हुए। रास्ते में ताहिरअली सोचने लगे-साहब को मेरी दुर्गति से अपना स्वार्थ सिद्ध करने में जरा भी संकोच नहीं हुआ। क्या ऐसे धनी-मानी, विशिष्ट, विचारशील-विद्वान् प्राणी भी इतने स्वार्थ भक्त होते हैं?

जॉन सेवक अनुमान से उनके मन के भाव ताड़ गये। बोले—"आप सोच रह होंगे, मैंने बातों में इतना रंग क्यों भरा, केवल घटना का यथार्थ वृत्तांत क्यों न कह मुनाया; किंतु सोचिए, बिना रंग भरे मुझे यह फल प्राप्त हो सकता? संसार में किसी काम का अच्छा या बुरा होना उसकी सफलता पर निर्भर है। एक व्यक्ति राजसत्ता का विरोध करता है। यदि अधिकारियों ने उसका दमन कर दिया, तो वह राजद्रोही कहा जाता है, और प्राण-दंड पाता है। यदि उसका उद्देश्य पूरा हो गया, तो वह अपनी जाति का उद्धारकर्ता और विजयो समझा जाता है, उसके स्मारक बनाये जाते हैं। सफलता में दोषों को मिटाने की विलक्षण शक्ति है। आप जानते हैं, दो साल पहले मुस्तफा कमाल ज्या था? बागी, देश उसके खून का प्यामा था। आज वह अपनी जाति का प्राण है। [ १२० ]
क्यों? इसलिए कि वह सफल-मनोरथ हुआ। लेनिन कई साल पहले प्राण-भय से अमेरिका भागा था, आज वह रूस का प्रधान है। इसीलिए कि उसका विद्रोह सफल हुआ। मैंने राजा साहब को स्वपक्षी बना लिया, फिर रंग भरने का दोष कहाँ रहा?"

इतने में फिटन बँगले पर आ पहुँची। ईश्वर सेवक ने आते-ही-आते पूछा- "कहो, क्या कर आये?"

जॉन सेवक ने गर्व से कहा-“राजा को अपना मुरीद बना आया। थोड़ा सा रंग तो जरूर भरना पड़ा, पर उसका असर बहुत अच्छा हुआ।"

ईश्वर सेवक-"जुदा, मुझ पर दया-दृष्टि कर। बेटा, रंग मिलाये बगैर भी दुनिया का कोई काम चलता है? सफलता का यही मूल-मंत्र है, और व्यवसाय की सफलता के लिए तो यह सर्वथा अनिवार्य है। आपके पास अच्छी-से-अच्छी वस्तु है; जब तक आप स्तुति नहीं करते, कोई ग्राहक खड़ा ही नहीं होता। अपनी अच्छी वस्तु को अमूल्य, दुर्लभ, अनुपम कहना बुरा नहीं। अपनी ओपधि को आप सुधा-तुल्य, रामवाण, अक्सीर, ऋषि-प्रदत्त, संजीवनी, जो चाहें, कह सकते हैं, इसमें कोई बुराई नहीं। किमी उपदेशक से पूछो, किसी वकील से पूछो, किसी लेखक से पूछो, सभी एक स्वर से कहेंगे कि रंग और सफलता समानार्थक हैं। यह भ्रम है कि चित्रकार ही को रंगों की जरूरत होती है। अब तो तुम्हें निश्चय हो गया कि वह जमीन मिल जायगी?"

जॉन सेवक-"जी हाँ, अब कोई संदेह नहीं।"

यह कहकर उन्होंने प्रभु सेवक को पुकारा और तिरस्कार करके बोले-“बैठे-बैट क्या कर रहे हो? जरा पाँड़ेपुर क्यों नहीं चले जाते? अगर तुम्हारा यही हाल रहा, तो मैं कहाँ तक तुम्हारी मदद करता फिरूँगा।"

प्रभु सेवक—"मुझे जाने में कोई आपनि नहीं; पर इस समय मुझे सोफी के पास जाना है।"

जॉन सेवक—“पाँडेपुर से लौटते हुए सोफी के पास बहुत आसानी से जा सकते हो।"

प्रभु सेवक—"मैं सोफी से मिलना ज्यादा जरूरी समझता हूँ।"

जॉन सेवक--"तुम्हारे रोज-रोज मिलने से क्या फायदा, जब तुम आज तक उसे घर लाने में सफल नहीं हो सके?"

प्रभु सेवक के मुँह से ये शब्द निकलते-निकलते रह गये-"मामा ने जो आग लगा दी है, वह मेरे बुझाये नहीं बुझ सकती।" तुरंत अपने कमरे में आये, कपड़े पहन और उसी वक्त ताहिरअली के साथ पाँडेपुर चलने को तैयार हो गये। ग्यारह बज चुके थे, जमीन से आग की लपक निकल रही थी, दोपहर का भोजन तैयार था, मेज लगा दी गई थी; किंतु प्रभु सेवक माता और पिता के बहुत आग्रह करने पर भी भोजन पर न बैठे। ताहिरअली खुदा से दुआ कर रहे थे कि किसी तरह दोपहरी यहीं कट जाय, पंखे के नीचे टट्टियों से छनकर आनेवाली शीतल वायु ने उनकी पीड़ा को बहुत शांत कर दिया था; किंतु प्रभु सेवक के हठ ने उन्हें यह आनंद न उठाने दिया।