रंगभूमि/११

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रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
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भैरो पासी अपनी माँ का सपूत बेटा था। यथासाध्य उसे आराम से रखने की चेष्टा करता रहता था। इस भय से कि कहीं बहू सास को भूखा न रखे, वह उसकी थाली अपने सामने परसा लिया करता था और उसे अपने साथ ही बिठाकर खिलाता था। बुढ़िया तंबाकू पीती थी। उसके वास्ते एक सुन्दर, पीतल से मढ़ा हुआ, नारियल लाया था। आप चाहे जमीन पर सोये, पर उसे खाट पर सुलाता। कहता, इसने न जाने कितने कष्ट झेलकर मुझे पाला-पोसा है; मैं इससे जीते-जी कभी उरिन नहीं हो सकता। अगर माँ का सिर भी दर्द करता, तो बेचैन हो जाता, ओझे-सयाने बुला लाता। बुढ़िया को गहने-कपड़े का भी शौक था। पति के राज में जो सुख न पाये थे, वे बेटे के राज में भोगना चाहती थी । भैरो ने उसके लिए हाथों के कड़े, गले की हँसली और ऐसी ही कई चीज बनवा दी थीं। पहनने के लिए मोटे कपड़ों की जगह कोई रंगीन छीट लाया करता था। अपनी स्त्री को ताकीद करता रहता था कि अम्माँ को कोई तकलीफ न होने पाये। इस तरह बुढ़िया का मन बढ़ गया था। जरा-सी कोई बात इच्छा के विरुद्ध होती, तो रूठ जाती और बहू को आड़े हाथों लेती। बहू का नाम सुभागी था। बुढ़िया ने उसका नाम अभागी रख छोड़ा था। बट्ट ने जरा चिलम भरने में देर की, चारपाई बिछाना भूल गई, या मुँह से निकलते ही उसका पैर दबाने या सिर की जुएँ निकालने न आ पहुँची, तो बुढ़िया उसके सिर हो जाती। उसके बाप और भाइयों के मुँह में कालिख लगाती, सबों की दाढ़ियाँ जलाती, और उसे गालियों ही से संतोष न होता, ज्यों ही भैरो दूकान से आता, एक-एक की सौ-सौ लगाती। भैरो सुनते ही जल उठता, कभी जली-कटी बातों से और कभी डंडे से स्त्री की खबर लेता। जगधर से उसकी गहरी मित्रता थी। यद्यपि भैरो का घर वस्ती के पश्चिम सिरे पर था, और जगधर का घर पूर्व सिरे पर, किंतु जगधर को यहाँ बहुत आमद-रफ्त थी। यहाँ मुफ्त में ताड़ी पीने को मिल जाती थी, जिसे मोल लेने के लिए उसके पास पैसे न थे। उसके घर में खानेवाले बहुत थे, कमाने-वाला अकेला वही था। पाँच लड़कियाँ थीं, एक लड़का और स्त्री। खोंचे की बिक्री में इतना लाभ कहाँ कि इतने पेट भरे और ताड़ी-शराब भी पिये! वह भैरो की हाँ-में-हाँ मिलाया करता था। इसलिए सभागी उससे जलती थी।

दो-तीन साल पहले की बात है, एक दिन, रात के समय, भैरो और जगधर बैठे हुए ताड़ी पी रहे थे। जाड़ों के दिन थे। बुढ़िया खा-पीकर, अँगीठी सामने रखकर, आग ताप रही थी। भैरो ने सुभागी से कहा-“थोड़े-से मटर भून ला। नमक, मिर्च, प्याज भी लेती आना।" ताड़ी के लिए चिखने की जरूरत थी। सुभागी ने मटर तो भूने, लेकिन प्याज घर में न था। हिम्मत न पड़ी कि कह दे-"प्याज नहीं है।" दौड़ी हुई कुँजड़े की दूकान पर गई। कुँजड़ा दूकान बन्द कर चुका था। सुभागी ने बहुत चिरौरी की,
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पर उसने दूकान न खोली। विवश होकर उसने भुने हुए मटर लाकर भैरो के सामने रख दिये। भैरो ने प्याज न देखा, तो तेवर बदले। बोला—"क्या मुझे बैल समझती है। कि भुने हुए मटर लाकर रख दिये, प्याज क्यों नहीं लाई?"

सुभागी ने कहा—"प्याज घर में नहीं है, तो क्या मैं प्याज हो जाऊँ?"

जगधर—"प्याज के बिना मटर क्या अच्छे लगेंगे?"

बुढ़िया—"प्याज तो अभी कल ही धेले का आया था। घर में कोई चीज तो बचती ही नहीं। न जाने इस चुडैल का पेट है या भाड़।"

सुभागी—"मुझसे कसम ले लो, जो प्याज हाथ से भी छुआ हो। ऐसी जीभ होती, तो इस घर में एक दिन भी निबाह न होता।"

भैरो—“प्याज नहीं था, तो लाई क्यों नहीं?"

जगधर—"जो चीज घर में न रहे उसकी फिकर रखनी चाहिए।"

सुभागी—"मैं क्या जानती थी कि आज आधी रात को प्याज की धुन सवार होगी।

भैरो ताड़ी के नशे में था। नशे में भी क्रोध का-सा गुण है, निर्बलों ही पर उतरता है। डंडा पास ही धरा था, उठाकर एक डंडा सुभागी के मारा। उसके हाथ की मुत्र चूड़ियाँ टूट गई। घर से भागी। भैरो पीछे दौड़ा। सुभागी एक दूकान की आड में छिप गई। भैरो ने बहुत ढूँढा, जब उसे न पाया, तो घर जाकर किवाड़ बन्द कर लिये और फिर रात-भर खबर न ली। सुभागी ने सोचा, इस वक्त जाऊँगी, तो प्राण न बचंगे। पर रात-भर रहूँगी कहाँ? बजरङ्गी के घर गई। उसने कहा-"ना बाबा, मैं यद रंग नहीं पालता। खोटा आदमी है, कौन उससे रार मोल ले!” ठाकुरदीन के द्वार बन्द थे। सूरदास बैठा खाना पका रहा था। उसकी ओपड़ी में घुस गई और बोली-"सूरे, आज रात-भर मुझे पड़ रहने दो, मारे डालता है, अभी जाऊँगी, तो एक हड्डा भी न बचेगी!"

सूरदास ने कहा—"आओ, लेट रहो, भोरे चली जाना, अभी नसे में होगा।"

दूसरे दिन जब भैरो को यह बात मालूम हुई, तो सूरदास से गाली-गलौज की और मारने की धमकी दी। सुभागी उसी दिन से सूरदास पर स्नेह करने लगी। जब अत्र-काश पाती, तो उसके पास आ बैठती, कभी-कभी उसके घर में झाड़ू, लगा जाती, कभी अरवालों की आँख बचाकर उसे कुछ दे जाती, मिठुआ को अपने घर बुला लें जाती और उसे गुड़ चबेना खाने को देती।

भैरो ने कई बार उसे सूरदास के घर से निकलते देखा। जगधर ने दोनों को बातें करते हुए पाया। भैरो के मन में सन्देह हो गया कि जरूर इन दोनों में कुछ साठ-गाँठ है। तभी से वह सूरदास से खार खाता था। उससे छेड़कर लड़ता। नायकराम के भय से उसकी मरम्मत न कर सकता था। सुभागी पर उसका अत्याचार दिनोदिन बढ़ता जाता था और जगधर, शांत स्वभाव होने पर भी, भैरो का पक्ष लिया करता था।

जिस दिन बजरंगी और ताहिरअली में झगड़ा हुआ था, उसी दिन भैरो और सूर-
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दास में संग्राम छिड़ गया। बुढ़िया ने दोपहर को नहाया था, सुभागी उसकी धोती छाँटना भूल गई। गरमी के दिन थे ही, रात को ९ बजे बुढ़िया को फिर गरमी मालूम हुई। गरमियों में दिन में दो बार स्नान करती थी, जाड़ों में दो महीने में एक बार! जब वह नहाकर धोती माँगने लगी, तो सुभागी को याद आई। काटो तो बदन में लहू नहीं। हाथ जोड़कर बोली-“अम्माँ, आज धोती धोने की याद नहीं रही, तुम जरा देर मेरो धोती पहन लो, तो मैं उसे छाँटकर अभी सुखाये देती हूँ।"

बुढ़िया इतनी क्षमाशील न थी, हजारों गालियाँ सुनाई और गीली धोती पहने बैठी रही। इतने में भैरो दूकान से आया और सुभागी से बोला-'चल्दी खाना ला, आज संगत होनेवाली है। आओ अम्माँ, तुम भी खा लो।"

बुढ़िया बोली-"नहाकर गीली धोती पहने बैठी हूँ। अब अपने हाथों धोती धो लिया करूँगी।”

भैरो-"क्या इसने धोती नहीं धोई?"

बुढ़िया-"वह अब मेरी धोतो क्यों धोने लगी। घर की मालकिन है। यही क्या कम है कि एक रोटी खाने को दे देती है!”

सुभागी ने बहुत कुछ उज्र किया; किन्तु भैरो ने एक न सुनी, डंडा लेकर मारने दौड़ा। सुभागी भागी और आकर सूरदास के घर में घुस गई। पीछे-पीछे भैरो भी वहीं पहुँचा। झोपड़े में घुसा और चाहता था कि सुभागी का हाथ पकड़कर खींच ले कि सूरदास उठकर खड़ा हो गया और बोला-"क्या बात है भैरो, इसे क्यों मार रहे हो?”

भैरो गर्म होकर बोला-"द्वार पर से हट जाओ, नहीं तो पहले तुम्हारी हड्डियाँ तोड़ूँगा, सारा बगुलाभगतपन निकल जायगा। बहुत दिनों से तुम्हारा रंग देख रहा हूँ, आज सारी कसर निकाल लूँगा।"

सूरदास-“मेरा क्या छैलापन तुमने देखा? बस, यही न कि मैंने सुभागी को घर से निकाल न ही दिया?"

भैरो-"बस, अब चुप ही रहना। ऐसे पापी न होते, तो भगवान् ने आँखें क्यों फोड़ दी होती। भला चाहते हो, तो सामने से हट जाओ।"

सूरदास-"मेरे घर में तुम उसे न मारने पाओगे; यहाँ से चली जाय, तो चाहे जितना मार लेना।" भैरो-"हटता है सामने से की नहीं?"

सूरदास-"मैं अपने घर यह उपद्रव न मचाने दूँगा।”

भैरो ने क्रोध में आकर सूरदास को धक्का दिया। बेचारा बेलाग खड़ा था, गिर पड़ा, पर फिर उठा और भैरो की कमर पकड़कर बोला-“अब चुपके-से चले जाओ, नहीं तो अच्छा न होगा।"

सूरदास था तो दुबला-पतला, पर उसकी हड्डियाँ लोहे की थीं। बादल-बूंदी, सरदी-गरमी झेलते-झेलते उसके अंग ठोस हो गये थे। भैरो को ऐसा ज्ञात होने लगा, मानों
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कोई लोहे का शिकंजा है। कितना ही जोर मारता, पर शिकंजा जरा भी ढीला न होता था। सुभागी ने मौका पाया, तो भागी। अब भैरो जोर-जोर से गालियाँ देने लगा। मुहल्लेवाले यह शोर सुनकर आ पहुँचे। नायकराम ने मजाक करके कहा-"क्यों सूरे, अच्छी सूरत देखकर आँखें खुल जाती है क्या? मुहल्ले ही में?"

सूरदास-"पण्डाजी, तुम्हें दिल्लगी सृझी है और यहाँ मुँह में कालिख लगाई जा रही है। अंधा था, अपाहिज था, भिखारी था, नीच था, पर चोरी-बदमासी के इलजाम से तो बचा हुआ था! आज वह इलजाम भी लग गया।"

बजरंगी-"आदमी जैसा आप होता है, वैसा ही दूसरों को समझता है।"

भैरो—“तुम कहाँ के बड़े साधृ हो। अभी आज ही लाठी चलाकर आये हो। मैं दो साल से देख रहा हूँ, मेरी घरवाली इससे आकर अकेले में घंटों बातें करती है।

जगधर ने भी उसे यहाँ से रात को आते देखा है। आज ही, अभी, उसके पीछे मुझसे लड़ने को तैयार था ।"

नायकराम-"सुभा होने की बात ही है, अंधा आदमी देवता थोड़े ही होता है, और फिर देवता लोग भी तो काम के तीर से नहीं बचे, सूरदास तो फिर भी आदमी है, और अभी उमर ही क्या है?"

ठाकुरदीन-"महाराज, क्यों अंधे के पीछे पड़े हुए हो। चलो, कुछ भजन-भाव हो।"

नायकराम-"तुम्हें भजन-भाव सूझता है, यहाँ एक भले आदमी की इज्जत का मुआमला आ पड़ा है। भैरो, हमारी एक बात मानो, तो कहें। तुम सुभागी को मारते बहुत हो, इससे उसका मन तुमसे नहीं मिलता। अभी दूसरे दिन बारी आती है, अब महीने में दो बार से ज्यादा न आने पावे।"

भैरो देख रहा था कि मुझे लोग बना रहे हैं। तिनककर बोला-"अपनी मेहरिया है, मारते-पीटते हैं, तो किसी का साज्ञा है? जो घोड़ी पर कभी सवार ही नहीं हुआ, वह दूसरों को सवार होना क्या सिखायेगा। वह क्या जाने, औरत कैसे काबू में रहता है।"

यह व्यंग्य नायकराम पर था, जिसका अभी तक विवाह नहीं हुआ था। घर में धन था, यजमानों की बदौलत किसी बात की चिंता न थी, किंतु न जाने क्यों अभी तक उसका विवाह नहीं हुआ था। वह हजार-पाँच सौ रुपये से गम ग्वाने को तैयार था; पर कहीं शिप्पा न जमता था। मेरो ने समझा था, नायकराम दिल में कट जायँगे; मगर वह छँटा हुआ शहरी गुंडा ऐसे व्यंग्यों को कब ध्यान में लाता था। बोला-'कहो बजरंगी, इसका कुछ जवाब दो, औरत कैसे बस में रहतो है?”

बजरंगी-"मार-पीट से नन्हीं सा लड़का तो बस में आता ही नहीं, औरत क्या बस में आयेगी।"

भैरो–“बस में आये औरत का बाप, औरत किस खेत की मूली है! मार से भूत भागता है।"

बजरंगी-"तो औरत भी भाग जायगी, लेकिन काबू में न आयेगी।" [ १२५ ]नायकराम-"बहुत अच्छी कही बजरंगी, बहुत पक्की कही, वाह-वाह! मार से भूत भागता है, तो औरत भी भाग जायगी! अब तो कट गई तुम्हारी बात?"

भैरो–“बात क्या कट जायगी, दिल्लगी है? चूने को जितना ही कूटो, उतना ही चिमटता है।"

जगधर-“ये सब कहने की बातें हैं। ओरत अपने मन से बस में आती है, ओर किसी तरह नहीं।

नायकराम-"क्यों बजरंगी, नहीं है कोई जवाब?"

ठाकुरदीन—“पण्डाजी, तुम दोनों को लड़ाकर तभी दम लोगे; बिचारे अपाहिज आदमी के पीछे पड़े हो।"

नायकराम-"तुम सूरदास को क्या समझते हो, यह देखने ही में इतने दुबले हैं। अभी हाथ मिलाओ, तो मालूम हो भैरो, अगर इन्हें पछाड़ दो, तो पाँच रुपये इनाम दूँ।"

भैरो---"निकल जाओगे।"

नायकराम-"निकलनेवाले को कुछ कहता हूँ। यह देखो, ठाकुरदीन के हाथ में रखे देता हूँ।"

जगधर-"क्या ताकते हो भैरो, ले पड़ो।"

सूरदास-"मैं नहीं लड़ता।"

नायकराम-'सूरदास, देखो, नाम-हँसाई मत कराओ। मर्द होकर लड़ने से डरते हो? हार ही जाओगे या और कुछ!"

सूरदास-'लेकिन भाई, मैं पेंच-पाच नहीं जानता। पीछे से यह न कहना, हाथ क्यों पकड़ा। मैं जैसे चाहूँगा, वैसे लड़ूँगा।"

जगधर-"हाँ-हाँ, तुम जैसे चाहना, वैसे लड़ना।"

सूरदास-"अच्छा तो आओ, कौन आता है!"

नायकराम—"अंधे आदमी का जीवट देखना। चलो भैरो, आओ मैदान में।"

भैरो-अंधे से क्या लड़ूँगा!"

नायकराम—"बस, इसी पर इतना अकड़ते थे!”

जगधर-"निकल आओ भैरो, एक झट्टे में तो मार लोगे।"

भैरो---"तुम्हीं क्यों नहीं लड़ जाले, तुम्ही इनाम ले लेना।" जगबर को रुपयों की नित्य चिंता रहती थी। परिवार बड़ा होने के कारण किसी तरह चूल न बैठती थी, घर में एक-न-एक चीज घटी ही रहती थी। धनोपार्जन के किसी उपाय को हाथ से न छोड़ना चाहता था। बोला-"क्यों सूरे, हमसे लड़ोगे?"

सूरदास--"तुम्ही आ जाओ, कोई सही।”

जगधर—"क्यो, पण्डाजी, इनाम दोगे न?”

नायकराम—"इनाम तो भैरो के लिए था, लेकिन कोई हरज नहीं! हाँ, सर्त यह है कि एक ही झपट्टे में गिरा दो।" [ १२६ ]
जगधर ने धोती ऊपर चढ़ा ली, और सूरदास से लिपट गया। सूरदास ने उसकी एक टाँग पकड़ ली, और इतने जोर से खींचा कि जगधर धम से गिर पड़ा। चारों तरफ से तालियाँ बजने लगीं।

बजरंगी बोला-“वाह सूरदास, वाह!" नायकराम ने दौड़कर उसकी पीठ ठोंकी।

भैरो-"मुझे तो कहते थे, एक ही झपट्टे में गिरा दोगे, तुम कैसे गिर गये?"

जगधर-"सूरे ने टाँग पकड़ ली, नहीं तो क्या गिरा लेते। वह अडंगा मारता कि चारों खाने चित्त गिरते।"

नायकराम-"अच्छा तो एक बाजी और हो जाय।"

जगधर-"हाँ-हाँ, अब की देखना।"

दोनों योद्धओं में फिर मल्ल-युद्ध होने लगा। सूरदास ने अब की जगधर का हाथ पकड़-कर इतने जोर से ऐंठा कि वह आह! आह! करता हुआ जमीन पर बैठ गया। सूरदास ने तुरंत उसका हाथ छोड़ दिया और गरदन पकड़कर दोनों हाथों से ऐसा दबोचा कि जगधर की आँखें निकल आई। नायकराम ने दौड़कर सूरदास को हटा लिया। बजरंगी ने जगधर को उठाकर बिटाया और हवा करने लगा।

भैरो ने बिगड़कर कहा-"यह कोई कुरती है कि जहाँ पकड़ पाया, वहीं धर दबाया। यह तो गँवारों की लड़ाई है, कुस्ती थोड़े ही है।"

नायकराम-"यह बात तो पहले ही तय हो चुकी थी।"

जगधर सँभलकर उठ बैटा और चुपके से सरक गया। भैरो भी उसके पीछे चलता हुआ। उनके जाने के बाद यहाँ खूब कहकहे उड़े, और सूरदास की खूब पीठ ठोंकी गई। सबको आश्चर्य हो रहा था कि सूरदास-जैसा दुर्बल आदमी जगधर-जैसे मोटे-ताजे आदमी को कैसे दबा बैठा! ठाकुरदीन यंत्र-मंत्र का कायल था। बोला--"मरे को किसी देवता का इष्ट है। हमें भी बताओ सूरे, कौन-सा मंत्र जगाया था?"

सूरदास-"सौ मन्त्रों का मंत्र हिम्मत है। ये रुपये जगधर को दे देना, नहीं तो मेरी कुसल नहीं है!"

ठाकुरदीन-"रुपये क्यों दे दूँ, कोई लूट है? तुमने बाजी मारी है, तुमको मिलेंगे।"

नायकराम-“अच्छा सूरदास, ईमान से बता दो, सुभागी को किस मंत्र से बस में किया? अब तो यहाँ सब लोग अपने ही हैं, कोई दूसरा नहीं है। मैं भी कहीं कपा लगाऊँ।”

सूरदास ने करुण स्वर में कहा—"पण्डाजी, अगर तुम भी मुझसे ऐसी बातें करोगे, तो मैं मुँह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊँगा। मैं पराई स्त्री को अपनी माता, बेटी, बहन समझता हूँ। जिस दिन मेरा मन इतना चंचल हो जायगा, तुम मुझे जीता न देखोगे।" यह कहकर सूरदास फूट-फूटकर रोने लगा। जरा देर में आवाज सँभालकर बोला-“भैरो रोज उसे मारता है। बिचारी कभी-कभी मेरे पास आकर बैठ जाती है। मेरा अपराध इतना ही है कि मैं उसे दुत्कार नहीं देता। इसके लिए चाहे कोई मुझे बद-
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नाम करे, चाहे जो इलजाम लगाये, मेरा जो धरम था वह मैंने किया। बदनामी के डर से जो आदमी धरम से मुँह फेर ले, वह आदमी नहीं है।"

बजरंगी—“तुम्हें हट जाना था, उसकी औरत थी, मारता चाहे पीटता, तुमसे मतलब।"

सूरदास—"भैया, आँखों देखकर रहा नहीं जाता, यह तो संसार का व्यवहार है; पर इतनी सी बात पर कोई इतना बड़ा कलंक तो नहीं लगा देता। मैं तुमसे सच कहता हूँ, आज मुझे जितना दुःख हो रहा है, उतना दादा के मरने पर भी न हुआ था। मैं अपाहिज, दूसरों के टुकड़े खानेवाला और मुझ पर यह कलंक!” (रोने लगा)

नायकराम—"तो रोते क्या हो भले आदमी, अंधे हो, तो क्या मर्द नहीं हो? मुझे तो कोई यह कलंक लगाता, तो और खुश होता। ये हजारों आदमी, जो तड़के गंगा-स्नान करने जाते हैं, वहाँ नजरबाजी के सिवा और क्या करते हैं। मंदिरों में इसके सिवा और क्या होता है! मेले-ठेलों में भी यही बहार रहती है। यही तो मरदों के काम हैं। अब सरकार के राज में लाठी-तलवार का तो कहीं नाम नहीं रहा, सारी मनुसई इसी नजरबाजी में रह गई है। इसकी क्या चिंता! चलो, भगवान् का भजन हो, यह सब दुख दूर हो जायगा।

बजरंगी को चिंता लगी हुई थी—"आज की मार-पीट का न जाने क्या फल हो। कल पुलिस द्वार पर आ जायगी। गुस्सा हराम होता है।” नायकराम ने आश्वासन दिया-"भले आदमी, पुलीस से क्या उरते हो? कहो, थानेदार को बुलाकर नचाऊँ, कहो इसपेट्टर को बुलाकर चपतियाऊँ। निश्चित बैठे रहो, कुछ न होने पायेगा। तुम्हारा बाल भी बाँका हो जाय, तो मेरा जिम्मा।"

तीनों आदमी यहाँ से चले। दयागिर पहले ही से इनकी राह देख रहे थे। कई गाड़ीवान और बनिये भी आ बैठे थे। जरा देर में भजन की 'ताने उठने लगीं। सूरदास अपनी चिन्ताओं को भूल गया, मस्त होकर गाने लगा। कभी भक्ति से विह्वल होकर नाचता, उछलने-कूदने लगता, कभी रोता, कभी हँसता। सभा विसर्जित हुई, तो सभी प्राणी प्रसन्न थे, सबके हृदय निर्मल हो गये थे, मलीनता मिट गई थी, मानों किसी रमणीक स्थान की सैर करके आये हों। सूरदास तो मन्दिर के चबूतरे ही पर लेटा ओर लोग अपने-अपने घर गये। किन्तु थोड़ी ही देर बाद सूरदास को फिर उन्हीं चिन्ताओं ने आ घेरा-"मैं क्या जानता था कि भैरो के मन में मेरी ओर से इतना मैल है, नहीं तो सुभागी को अपने झोंपड़े में आने ही क्यों देता। जो सुनेगा, वही मुझपर थूकेगा। लोगों को ऐसी बातों पर कितनी जल्द विश्वास आ जाता है। मुहल्ले में कोई अपने दरवाजे पर खड़ा न होने देगा। ऊँह! भगवान तो सबके मन की बात जानते हैं। आपमी का धरम है कि किसी को दुःख में देखे, तो उसे तसल्ली दे। अगर अपना धरम पालने में भी कलंक लगता है, तो लगे, बला से। इसके लिए कहाँ तक रोऊँ। कभी-न-कभी तो लोगों को मेरे मन का हाल मालूम ही हो जायगा।" [ १२८ ]
किन्तु जगाधर और भैरो दोनों के मन में ईर्ष्या का फोड़ा पक रहा था। जगधर कहता था-"मैंने तो समझा था, सहज में पाँच रुपये मिल जायँगे; नहीं तो क्या कुत्ते ने काटा था कि उससे भिड़ने जाता। आदमी काहे को है, लोहा है।"

भैरो-“मैं उसकी ताकत की परीच्छा कर चुका हूँ। ठाकुरदोन सच कहता है, उसे किसी देवता का इंष्ट है।"

जगधर-"इट-विष्ट कुछ नहीं है, यह सब बेफिकरी है। हम-तुम गृहस्थी के जंजाल में फंसे हुए हैं, नोन-तेल लकड़ी की चिन्ता सिर पर सवार रहती है, घाटे-न के के फेर में पड़े रहते हैं । उसे कौन चिन्ता है? मजे से जो कुछ मिल जाता है, खाना है और मोठी नींद सोता है। हमको-तुमको रोटी-दाल भी दोनों जून नसीब नहीं होती। उसे क्या क्रमी है, किसी ने चावल दिये, कहीं मिठाई पा गया, घी-दूध बजरंगी के घर से मिल हो जाता है। बल तो खाने से होता है।"

भैरो-"नहीं, यह बात नहीं है। नसा खाने से बल का नास हो जाता है।"

जगधर-"कैसी उलटी बातें करते हो , ऐसा होता, तो फौज में गारों को बाराँडी क्यों पिलाई जाती। अँगरेज सभी सराब पीते हैं, तो क्या कमजोर होते हैं।"

भैरो-"आज सुभागी आती है, तो गला दबा देता हूँ।”

जगधर-"किसी के घर छिपी बैठी होगी।"

भैरो-“अंधे ने मेरी आबरू बिगाड़ दी। बिरादरी में यह बात फैलेगी, तो हुका बंद हो जायगा, भात देना पड़ जायगा।"

जगवर-"तुम्हीं तो हिंढोरा पीट रहे हो। यह नहीं, पटकनो खाई थी, तो चुके से घर चले आते। सुभागो घर आती, तो उससे समझते। तुम लगे वहीं दुहाई देने।"

भैरो-"इस अंधे को मैं ऐसा कपटी न समझता था, नहीं तो अब तक कभी उसका मजा चखा चुका होता। अब उस चुडैल को घर न रखूँगा। चमार के हाथों वह बे-आवरूई!"

जगधर-"अब इससे बड़ी और क्या बदनामो होगो, गला काटने का काम है।"

भैरो-"बस, यही मन में आता है कि चलकर, गंडासा मारकर काम तमाम कर दूँ। लेकिन नहीं, मैं उसे खेला-खेलाकर मारूँगा। सुभागी का दास नहीं है। सारा तूफान इसी ऐबी अंधे का खड़ा किया हुआ है।"

जगधर-“दोस दोनों का है।"

भैरो-"लेकिन छेड़छाड़ तो पहले मर्द ही करता है। उससे तो अब मुझे कोई वास्ता नहीं रहा, जहाँ चाहे जाय, जैसे चाहे रहे। मुझे तो अब इस अंधे से भुगतना है। सूरत से कैसा गरीब मालूम होता है, जैसे कुछ जानता ही नहीं, और मन में इतना काट भरा हुआ है। भीख माँगते दिन जाते हैं, उस पर भी अभागे की आँख नहीं खुलती। जगधर, इसने मेरा सिर नीचा कर दिया, मैं दूसरों पर हँसा करता था, आ जमाना मुझ पर हँसेगा। मुझे सबसे बड़ा माल तो यह है कि अभागिन गई भो, तो चमार के साथ गई। [ १२९ ]
अगर किसी ऐसे आदमी के साथ जाती, जो जात-पात में, देखने-सुनने में, धन-दौलत

मुझसे बढ़कर होता, तो मुझे इतना रंज न होता। जो सुनेगा, अपने मन में यही कहेगा कि मैं इस अंधे से भी गया-बीता हूँ।"

जगधर-"औरतों का सुभाव कुछ समझ में नहीं आता। नहीं तो, कहाँ तुम और कहाँ वह अंधा, मुँह पर मक्खियाँ भिनका करती हैं, मालूम होता, जूते खाकर आया है।"

भैरो-“और बेहया कितना बड़ा है! भीख माँगता है, अंधा है; पर जब देखो, हँसता ही रहता है। मैंने उसे कभी रोते ही नहीं देखा।”

जगधर-वर में रुपये गड़े हैं, रोये उसकी बला। भीख तो दिखाने को माँगता है।"

भैरो-“अब रोयेगा। ऐसा रुलाऊँगा कि छठी का दूध याद आ जायगा।" यो बातें करते हुए दोनों अपने-अपने घर गये। रात के दो बजे होंगे कि अकस्मात् सूरदास की झोपड़ी से ज्वाला उठी। लोग अपने-अपने द्वारों पर सो रहे थे। निद्रावस्था में भी उपचेतना जागती रहती है। दम-के-दम में सैकड़ों आदमी जमा हो गये। आसमान पर लाली छाई हुई थी, ज्वालाएँ लपक-लपककर आकाश की ओर दौड़ने लगीं। कभी उनका आकार किसी मंदिर के स्वर्ण-कलश का-सा हो जाता था, कभी वे वायु के झोंकों से यो कंपित होने लगती थीं, मानों जल में चाँद का प्रतिबिंब है। आग बुझाने का प्रयत्न किया जा रहा था; पर झोपड़े की आग, ईर्ष्या की आग की भाँति कभी नहीं बुझती। कोई पानी ला रहा था, कोई यों ही शोर मचा रहा था; किंतु अधिकांश लोग चुपचाप खड़े नैराश्य-पूर्ण दृष्टि से अग्निदाह को देख रहे थे, मानों किसी मित्र की चिताग्नि है। सहसा सूरदास दौड़ा हुआ आया, और चुपचाप ज्वाला के प्रकाश में खड़ा हो गया।

बजरंगी ने पूछा—"यह कैसे लगी सूरे, चूल्हे में तो आग नहीं छोड़ दी थी?"

सूरदास—"झोपड़े में जाने का कोई रास्ता नहीं है?"

बजरंगी—"अब तो अंदर-बाहर सब एक हो गया। दीवारें जल रही हैं।"

सूरदास—"किसी तरह नहीं जा सकता?"

बजरंगी—"कैसे जाओगे? देखते नहीं हो, यहाँ तक लपटें आ रही हैं।"

जगधर--"सूरे, क्या आज चूल्हा टंडा नहीं किया था?”

नायकराम-"चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुसमनों का कलेजा कैसे ठंडा होता।"

जगधर-“पण्डाजी, मेरा लड़का काम न आये, अगर मुझे कुछ भी मालूम हो, तुम मुझ पर नाहक सुभा करते हो।"

नायकराम-“मैं जानता हूँ, जिसने लगाई है। बिगाड़ न दूँ, तो कहना।"

ठाकुरदीन-"तुम क्या बिगाड़ोगे, भगवान आप ही बिगाड़ देंगे। इसी तरह जक मेरे घर में चोरी हुई थी, तो सब स्वाहा हो गया था।"

जगधर-"जिसके मन में इतनी खुटाई हो, भगवान उसका सत्यानास कर दें।"

सूरदास-"अब तो लपट नहीं आती।”

बजरंगी-"हाँ, फूस जल गया, अब धरन जल रही है।" [ १३० ]सूरदास--"अब तो अंदर जा सकता हूँ।"

नायकराम-"अंदर तो जा सकते हो; पर बाहर नहीं निकल सकते। अब चलो आराम से सो रहो; जो होना था, हो गया। पछनाने से क्या होगा।"

सूरदास-"हाँ, सो रहूँगा, जल्दी क्या है।”

थोड़ी देर में रही-सही आग भी बुझ गई। कुशल बाद हुई कि और किसी के घर में आग न लगी। सब लोग इस दुर्घटना पर आलोचनाएँ करते हुए विदा हुए। सन्नाटा छा गया। किंतु सूरदास अब भी वहीं बैठा हुआ था। उसे झोपड़े के जल जाने का दुःख न था, बरतन आदि के जल जाने का भी दुःख न था दुःख था उसके पोटली का, जो उसकी उम्र-भर की कमाई थी, जो उसके जीवन की सारी आमाओं का आधार थी जो उसकी सारी यातनाओं और रचनाओं का निष्कर्ष थी। इस छोटी-सी पोटली में उसका, उसके पितरों का और उसके नामलेवा का उद्धार संचित था। यही उसके लोक और परलोक, उसकी दोन-दुनिया का आशा-दीपक थी। उसने सोचा-पोटली के साथ रुपये थोड़े ही जल गये होंगे। अगर रुपये पिघट भी गये होंगे, तो चाँदी कहाँ जायगा! क्या जानता था कि आज यह विपत्ति आनेवाली है, नहीं तो यहीं न सोता। पहले तो कोई झोपड़ी के पास आता ही न; और अगर आग लगाता भी, तो पोटली को पहरे ही निकाल लेता। सच तो यों है कि मुझे यहाँ रुपये रखने ही न चाहिए थे। पर रखता कहाँ? मुहल्ले में ऐसा कौन है, जिसे रखने को देता। हाय! पूरे पांच सौ रुपये थे, कुछ पैसे ऊपर हो गये थे। क्या इसी दिन के लिए पैसे-वैसे बटोर रहा था। खा लिया होता, तो कुछ तस्कीन होती। क्या सोचता था और क्या हुआ। गश जाकर पितरों को पिंडा देने का इरादा किया था। अब उनसे कैसे गला छूटेगा? सोचता था, कहीं मिठुआ की सगाई ठहर जाय, तो कर डालूँ। बहू घर में आ जा तो एक रोटी खाने को मिले। अपने हाथों ठोंक-ठोंककर खाते एक जुग बीत गया! बड़ी भूल हुई। चाहिए था कि जैसे-जैसे हाथ रुपये आते, एक-एक काम पूरा करता जाता। बहुत पाँव फैलाने का यही फल है!

उस समय तक राख ठंडी हो चुकी थी। सूरदास अटकल से द्वार की ओर झोपड़े में घुसा; पर दो-तीन पग के बाद एकारक पांव नवल में पड़ गया। ऊपर राख थी, लेकिन नीचे आग। तुरंत पाँव खींच लिया और अपनी लकड़ी से राख को उलटने पलटने लगा, जिसमें नीचे की आग भी जन्द राख हो जाय। आध घंटे में उसने सारी राख नीचे से ऊपर कर दी, और तब फिर डरते डरते राख में पैर रखा। राख गरम थी, पर असह्य न थी। उसने उसी जगह की सीध में राख को टटोलना शुरू किया, जहाँ छप्पर में पोटली रखी थी। उसका दिल धड़क रहा था। उसे विश्वास था कि रुपये मिलें, या न मिलें, पर चाँदी तो कहीं गई ही नहीं। सहमा वह उछल पड़ा, कोई भारी चीज हाथ लगी। उठा लिया; पर टटोलकर देखा, तो मालूम हुआ, ईट का टुकड़ा है। फिर टटोलने लगा, जैसे कोई आदमी पानी में मछलियाँ टटाले। कोई चोज
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हाथ न लगी। तब तो उसने नैराश्य की उतावली और अधीरता के साथ सारी राख छान डाली। एक-एक मुट्ठी राख हाथ में लेकर देखी। लोटा मिला, तत्रा मिला, किंतु पोटली न मिली। उसका वह पैर, जो अब तक सीढ़ी पर था, फिसल गया और अब वह अथाह गहराई में जा पड़ा। उसके मुख से सहसा एक चीख निकल आई। वह वहीं राख पर बैठ गया और बिलख-बिलखकर रोने लगा। यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलापाओं की राख थी। अपनी बेबसी का इतना दुःख उसे कभी न हुआ था।

तड़का हो गया, सूरदास अब राख के ढेर को बटोरकर एक जगह एकत्र कर रहा था। आशा से ज्यादा दीर्घजीवी और कोई वस्तु नहीं होती।

उसी समय जगधर आकर बोला-"सूरे, सच कहना, तुम्हें मुझ पर तो सुभा नहीं है?"

सूरे को सुभा तो था; पर उसने इसे छिपाकर कहा-"तुम्हारे ऊपर क्यों सुभा करूँगा। तुमसे मेरी कौन-सी अदावत थी।"

जगधर-"मुहल्लेबाले तुम्हें भड़कायेंगे, पर मैं भगवान से कहता हूँ, मैं इस नारे में कुछ नहीं जानता।"

सूरदास-“अब तो जो कुछ होना था, हो चुका। कौन जाने, किसी ने लगा दी, या किसी की चिलम से उड़कर लग गई। यह भी तो हो सकता है कि चूल्हे में आग रह गई हो। बिना जाने-बूझे किस पर सुभा करूँ?"

जगधर-"इसी से तुम्हें चिता दिया कि कहीं सुभे में मैं भी न मारा जाऊँ।”

सूरदास--"तुम्हारी तरफ से मेरा दिल साफ है।"

जगधर को भैरो की बातों से अब यह विश्वास हो गया कि उसी की शरारत है। उसने सूरदास को रुटाने की बात कही थी। उस धमको को इस तरह पूरा किया। वह वहाँ से सीधे भैरो के पास गया। वह चुपचाप बैठा नारियल पी रहा था, पर मुख से चिता और घबराट झलक रही थी। जगधर को देखते ही बोला-"कुछ सुना; लोग क्या बातचीत कर रहे हैं?

जगधर---"सब लोग तुम्हारे ऊपर सुभा करते हैं। नानकराम की धमकी तो तुमने अपने कानों से सुनी।"

भैरो—"यहाँ ऐसो धमकियों की परवा नहीं है। सबूत क्या है कि मैंने लगाई?"

जगधर---"सच कहो, तुम्हों ने लगाई?”

भैरो—"हाँ, चुपके से एक दियासलाई लगा दी।"

जगधर—"मैं कुछ-कुछ पहले ही समझ गया था; पर यह तुमने बुरा किया। झोपड़ी जलाने से क्या मिला? दो-चार दिन में फिर दूसरी झोपड़ी तैयार हो जायगी।"

भैरो—"कुछ हो, दिल की आग तो ठण्डी हो गई। यह देखो!"

यह कहकर उसने एक थैली दिखाई, जिसका रंग धुएँ से काला हो गया था। जगधर ने उत्सुक होकर पूछा--"इसमें क्या है? अरे! इसमें तो रुपये भरे हुए हैं।" [ १३२ ]भैरो—“यह सुभागी को बहका ले जाने का जरीबाना है।"

जगधर—"सच बताओ, ये रुपये कहाँ मिले?"

भैरो—"उसी झोपड़े में। बड़े जतन से धरन की आड़ में रब हुए थे। पाजी रोज राहगीरों को ठग-टगकर पैसे लाता था, और इसी थैली में रखता था। मैंने गिने हैं। पाँच सौ रुपये से ऊपर हैं। न जाने कैसे इतने रुपये जमा हो गये! बचा को इन्हीं रुपयों की गरमी थी। अब गरमी निकल गई। अब देखूँ किस बल पर उछलते हैं। बिरादरी को भोज-भात देने का सामान हो गया। नहीं तो, इस बचत इतने रुपये कहाँ मिलते? आजकल तो देखते ही हो, बल्लमटेरों के मारे बिकरी कितनी मंदी है।"

जगधर— "मेरी तो सलाह है कि रुपये उसे लौटा दो। बड़ी मसकत की कमाई है। हजम न होगी।”

जगधर दिल का खोटा आदमी नहीं था; पर इस समय उसने यह सलाह उसे नेक-नीयती से नहीं, हसद से दी थी। उसे यह असह्य था कि भैरो के हाथ इतने रुपये लग जायँ। भैरो आधे रुपये उसे देता, तो शायद उसे तस्कीन हो जाती पर भैरो से यह आशा न की जा सकती थी। बेपरवाई से बोला--"मुझे अच्छी तरह हजम हो जायगी। हाथ में आये हुए रुपये को नहीं लौटा सकता। उसने तो भीख ही माँगकर जमा किये हैं, गेहूँ तो नहीं तौला था।"

जगधर--"पुलिस सब खा जायगी।"

भैरो-"सूरे पुलिस में न जायगा। रो-धोकर चुप हो रहेगा।"

जगधर-"गरीब की हाय बड़ी जान-लेवा होती है।”

भैरौ-"वह गरीब है! अंधा होने ही से गरीब हो गया? जो आदमी दूसरों की औरतों पर डोरे डाले, जिसके पास सैकड़ों रुपये जमा हों, जो दूसरों को रुपये उधार देता हो बह गरीब है? गरीब जो कहो, तो हम-तुम है। घर में ढूँढ आओ, एक पूरा रुपया न निकलेगा। ऐसे पापियों को गरीब नहीं कहते। अब भी मेरे दिल का काँटा नहीं निकला। जब तक उसे रोते न देखूँगा, यह काँटा न निकलेगा। जिसने मेरी आबरू बिगाड़ दी, उसके साथ जो चाहे करूँ, मुझे पान नहीं लग सकता।"

जगधर का मन आज खोंचा लेकर गलियों का चकर लगाने में न लगा। छाती पर साँप लोट रहा था--"इसे दम-के-दम में इतने रुपये मिल गये, अब मौज उड़ा देगा। तकदीर इस तरह स्तुलती है। यहाँ कभी पड़ा यू पैसा भी न मिला। पाप पुन्न की कोई बात नहीं। मैं ही कौन दिन-भर पुन्न किया करता हूँ। दमड़ी-छदाम कोड़ियों के लिए टेनी मारता हूँ! बाट खोटे रखता हूँ, तेल की मिठाई को घी कहकर बचता हूँ। ईमान गँवाने पर भी हाथ कुछ नहीं लगता। जानता हूँ, यह बुरा काम है; पर बाल-बच्चों को पालना भी तो जरूरी है। इसने ईमान खोया, तो कुछ लेकर खोया, गुनाह बेलजत नहीं रहा। अव दो-तीन दुकानों का और ठेका ले लेगा। ऐसा ही कोई माल मेरे हाथ भी पड़ जाता, तो जिंदगानी सुफल हो जाती।" [ १३३ ]
जगधर के मन में ईर्ष्या का अंकुर जमा। वह भैरो के घर से लौटा, तो देखा कि सूरदास राख को बटोरकर उसे आटे की भाँति गूंध रहा है। सारा शरीर भस्म से ढका हुआ है और पसीने की धार निकल रही हैं। बोला-"सूरे, क्या ढूँढते हो?"

सूरदास-"कुछ नहीं। यहाँ रखा ही क्या था! यही लोटा-तवा देख रहा था।"

जगधर-“और वह थैली किसकी है, जो भैरो के पास है?"

सूरदास चौंका। क्या इसीलिए भैरो आया था? जरूर यही बात है। घर में आग लगाने के पहले रुपये निकाल लिये होंगे।

लेकिन अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है, जितना धन। सरदास जगधर से अपनी आर्थिक हानि को गुप्त रखना चाहता था। वह गया करना चाहता था, मिठुआ का ब्याह करना चाहता था, कुआँ बनवाना चाहता था; किंतु इस ढंग से कि लोगों को आश्चर्य हो कि इसके पास रुपये कहाँ से आये, लोग यही समझें कि भगवान् दीन-जनों की सहायता करते हैं। भिखारियों के लिए धन-संचय पाप-संचय से कम अपमान की बात नहीं है। बोला -"मेरे पास थैली-वैली कहाँ। होगी किसी की। थैली होती, तो भीख माँगता?"

जगधर-“मुझसे उड़ते हो! भैरो मुझसे स्वयं कह रहा था कि झोपड़े में धरन के ऊपर यह थैली मिली। पाँच सौ रुपये से कुछ बेसी हैं।"

सूरदास -"वह तुमसे हँसी करता होगा। साढ़े पाँच रुपये तो कभी जुड़े ही नहीं, साढ़े पाँच सौ कहाँ से आते!"

इतने में सुभागी वहाँ आ पहुँची। रात-भर मंदिर के पिछवाड़े अमरूद के बाग में छिपी बैठी थी। वह जानती थी, आग भैरो ने लगाई है। भैरो ने उस पर जो कलंक लगाया था, उसकी उसे विशेष चिंता न थी; क्योंकि वह जानती थी, किसी को इस पर विश्वास न आयगा। लेकिन मेरे कारण सूरदास का यों सर्वनाश हो जाय, इसका उसे बड़ा दुःख था। वह इस समय उसको तस्कीन देने आई थी। जगधर को वहाँ खड़े देखा, तो झिझकी। भय हुआ, कहीं यह मुझे पकड़ न ले। जगधर को वह भैरो ही का दूसरा अवतार समझती थी। उसने प्रण कर लिया था कि अब भैरो के घर न जाऊँगी, अलग रहूँगी और मेहनत-मजूरी करके जीवन का निर्वाह करूँगी; यहाँ कौन लड़के रो रहे हैं, एक मरा ही पेट उसे भारी है न? अब अकेले ठोके और खाय, और बुढ़िया के चरण धो-धोकर पिये, मुझसे तो यह नहीं हो सकता। इतने दिन हुए, इसने कभी अपने मन से घेले का सेंदुर भी न दिया होगा, तो मैं क्यों उसके लिए मरूँ।

वह पीछ लौटा ही चाहती थी कि जगधर ने पुकारा-"सुभागी, कहाँ जाती है? देखी अपने खसम की करतूत, बेचारे सूरदास को कहीं का न रखा।"

सुभागी ने समझा-मुझे झाँसा दे रहा है। मेरे पेट की थाह लेने के लिए यह जाल फ़ेका है। व्यंग्य से बोली--"उसके गुरू तो तुम्ही हो, तुम्हीं ने मंत्र दिया होगा।" [ १३४ ]जगधर-"हाँ, यही मेरा काम है, चोरी-डाका न सिखाऊँ, तो रोटियाँ क्योंकर चलें!"

सुभागी ने फिर व्यंग्य किया-"क्या रात ताड़ी पीने को नहीं मिली क्या?"

जगधर-"ताड़ी के बदले क्या अपना ईमान बेच दूंगा। जब तक समझता था, भला आदमी है, साथ बैठता था, हँसता-बोलता था, ताड़ी भी पी लेता था, कुछ ताड़ी के लालच से नहीं जाता था (क्या कहना है, आप ऐसे ही धर्मात्मा तो हैं!); लेकिन आज से कभी उसके साथ बैठते देखना, तो कान पकड़ लेना। जो आदमी दूसरों के घर में आग लगाये, गरीबों के रुपये चुरा ले जाय, वह अगर मेरा बेटा भी हो तो उसकी सूरत न देखूँ। सूरदास ने न जाने कितने जतन से पाँच सौ रुपये बटोरे थे। वह सब उड़ा ले गया। कहता हूँ, लौटा दे, तो लड़ने पर तैयार होता है।

सूरदास-"फिर वही रट लगाये जाते हो। कह दिया कि मेरे पास रुपये नहीं थे, कहीं और जगह से मार लाया होगा। मेरे पास पाँच सौ रुपये होते, तो चैन की बंसी न बजाता, दूसरों के सामने हाथ क्यों पसारता?”

जगधर-"सूरे, अगर तुम भरी गंगा में कहो कि मेरे रुपये नहीं है, तो मैं न मानूँगा। मैंने अपनी आँखों से वह थेली देखी है। भैरो ने अपने मुँह से कहा है कि यह थैली झोपड़े में धरन के ऊपर मिली। तुम्हारी बात कैसे मान लूँ?"

सुभागी-"तुमने थैली देखी है?"

जगधर-"हाँ, देखी नहीं, तो क्या झूठ बोल रहा हूँ!"

सुभागी-"सूरदास, सच-सच बता दो, रुपये तुम्हारे हैं!"

सूरदास-“पागल हो गई है क्या? इनकी बातों में आ जाती है! भला मेरे पास रुपये कहाँ से आते?"

जगधर-"इनसे पूछ, रुपये न थे, तो इस घड़ी राख बटोरकर क्या ढूँढ रहे थे।"

सुभागी ने सूरदास के चेहरे की तरफ अन्वेषण की दृष्टि से देखा। उसकी बीमार की-सी दशा थी, जो अपने प्रिय जनों की तस्कीन के लिए अपनी असह्य वेदना को छिपाने का असफल प्रयत्न कर रहा हो। जगधर के निकट आकर बोली-"रुपये जरूर थे, इसका चेहरा कहे देता है।"

जगधर-"मैंने थैली अपनी आँखों से देखी है।"

सुभागी-“अब चाहे वह मुझे मारे या निकाले, पर रहँगी उसी के घर। कहाँ-कहां थैली को छिपायेगा? कभी तो मेरे हाथ लगेगी। मेरे ही कारण इस पर यह विपत पड़ी है। मैंने ही उजाड़ा है, मैं ही बसाऊँगी। जब तक इसके रुपये न दिला दूँगी, मुझे चैन न आयेगी।"

यह कहकर वह सूरदास से बोली-"तो अब रहोगे कहाँ?"

सूरदास ने यह बात न सुनी। वह सोच रहा था-"रुपये मैंने ही तो कमाये थे,
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क्या फिर नहीं कमा सकता? यही न होगा, जो काम इस साल होता, वह कुछ दिनों के बाद होगा। मेरे रुपये थे ही नहीं, शायद उस जन्म में मैंने भैरो के रुपये चुराये होंगे। यह उसी का दंड मिला है। मगर बिचारी सुभागी का अब क्या हाल होगा। भैरो उसे अपने घर में कभी न रखेगा। बिचारी कहाँ मारी-मारी फिरेगी। यह कलंक भी मेरे सिर लगना था। कहीं का न हुआ। धन गया, घर गया, आबरू गई; जो जमीन बच रही है, यह भी न जाने जायगी या बचेगी। अंधापन ही क्या थोड़ी बिपत थी कि नित ही एक-न-एक चपत पड़ती रहती है। जिसके जी में आता है, चार खोटी-खरी सुना देता है।"

इन दुःखजनक विचारों से मर्माहत-सा होकर वह रोने लगा। सुभागी जगधर के साथ भैरो के घर की ओर चली जा रही थी और यहाँ सूरदास अकेला बैठा हुआ रो रहा था।

सहसा वह चौंक पड़ा। किसी ओर से आवाज आई-"तुम खेल में रोते हो!" मिठुआ घीसू के घर से रोता चला आता था, शायद घीसू ने मारा था। इस पर घीसू उसे चिढ़ा रहा था-"खेल में रोते हो!”

सूरदास कहाँ तो नैराश्य, ग्लानि, चिंता और क्षोभ के अपार जल में गोते खा रहा था, कहाँ यह चेतावनी सुनते ही उसे ऐसा मालूम हुआ, किसी ने उसका हाथ पकड़कर किनारे पर खड़ा कर दिया। “वाह! मैं तो खेल में रोता हूँ। कितनी बुरो बात है। लड़के भी खेल में रोना बुरा समझते हैं, रोनेवाले को चिढ़ाते हैं, और मैं खेल में रोता हूँ। सच्चे खिलाड़ी कमी रोते नहीं, बाजी-पर-बाजी हारते हैं, चोट-पर-चोट खाते हैं, धक्के-पर-धक्के सहते हैं, पर मैदान में डटे रहते हैं, उनकी त्योरियों पर बल नहीं पड़ते। हिमत उनका साथ नहीं छोड़ती, दिल पर मालिन्य के छीटे भी नहीं आते, न किप्ती से जरते हैं, न चिढ़ते हैं। खेल में रोना कैसा। खेल हँसने के लिए, दिल बहलाने के लिए है, रोने के लिए नहीं।"

सूरदास उठ खड़ा हुआ, और विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा। आवेग में हम उद्दिष्ट स्थान से आगे निकल जाते हैं। वह संयम कहाँ है, जो शत्रु पर विजय पाने के बाद तलवार को म्यान में कर ले।

एक क्षण में मिटुआ, घीसू और मुहल्ले के बीसों लड़के आकर इस भस्म स्तूप के चारों और जमा हो गये और मारे प्रश्नों के सूरदास को परेशान कर दिया। उसे राख फेंकते देखकर सबों को खेल हाथ आया। राख की वर्षा होने लगी। दम-के-दम में सारी राख पिखर गई, भूमि पर केवल काला निशान रह गया।

मिठुआ ने पूछा—"दादा, अब हम रहेंगे कहाँ?"

सूरदास—"दूसरा घर बनायेंगे।"

मिठुआ—"और कोई फिर आग लगा दे?” [ १३६ ]सूरदास—"तो फिर बनायेंगे।"

मिठुआ--"और फिर लगा दे?

सूरदास—"तो हम भी फिर बनायेंगे।"

मिठुआ--"और जो कोई हजार बार लगा दे?"

सूरदास—"तो हम हजार बार बनायेंगे।"

बालकों को संख्याओं से विशेष रुचि होती है। मिठुआ ने फिर पूछा--"और जो कोई सौ लाख बार लगा दे?"

सूरदास ने उसी बालोचित सरलता से उत्तर दिया-"तो हम भी सौ लाख बार बनायेंगे।"

जब वहाँ राख की चुटकी भी न रही, तो सब लड़के किसी दूसरे खेल की तलाश में दौड़े। दिन अच्छी तरह निकल आया था। सूरदास ने भी लकड़ो सँभाली और सड़क की तरफ चला। उधर जगधर यहाँ से नायकराम के पास गया; और यहाँ भी यह वृत्तांत सुनाया। पण्डा ने कहा-"मैं भैरो के बाप से रुपये वसूल करूँगा, जाता कहाँ है, उसकी हड्डियों से रुपये निकालकर दम लूँगा, अंधा अपने मुँह से चाहे कुछ कहे या न कहे।"

जगधर वहाँ से बजरंगी, दयागिर, ठाकुरदीन आदि मुहल्ले के सब छोटे-बड़े आदमियों से मिला और यह कथा सुनाई। आवश्यकतानुसार यथार्थ घटना में नमक-मिर्च भी लगाता जाता था। सारा मुहल्ला भैरो का दुश्मन हो गया।

सूरदास तो सड़क के किनारे राहगीरों की जय मना रहा था, यहाँ मुहल्लेवालों ने उसकी झोपड़ी बसानी शुरू की। किसी ने फूस दिया, किसी ने बाँस दिये, किसी ने धरन दी, कई आदमी झोपड़ी बनाने में लग गये। जगधर ही इस संगठन का प्रधान मंत्री था। अपने जीवन में शायद ही उसने इतना सदुत्साह दिखाया हो। ईर्ष्या में तम-ही-तम नहीं होता, कुछ सत् भी होता है। संध्या तक झोपड़ी तैयार हो गई, पहले से कहीं ज्यादा बड़ी और पायदार। जमुनी ने मिट्टी के दो घड़े और दो-तीन हाँड़ियाँ लाकर रख की जरा भी खबर न हो, जब वह शाम को आये, तो घर देखकर चकित हो जाय, और पूछने लगे, किसने बनाया, तब सब लोग कहें, आप-ही-आप तैयार हो गया।