रंगभूमि/१९

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रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
[ २२० ]

[१९]

सोफिया अपनी चिन्ताओं में ऐसी व्यस्त हो रही थी कि सूरदास को बिलकुल भूल-सी गई थी। उसकी फरियाद सुनकर उसका हृदय काँप उठा। इस दीन प्राणी पर इतना घोर अत्याचार! उसकी दयालु प्रकृति यह अन्याय न सह सकी। सोचने लगी-सूरदास को इस विपत्ति से क्योंकर मुक्त करूँ? इसका उद्धार कैसे हो? अगर पापा से कहूँ, तो वह हर्गिज न सुनेंगे। उन्हें अपने कारखाने की ऐसी धुन सवार है कि वह इस विषय में मेरे मुँह से एक शब्द सुनना भी पसन्द न करेंगे।

बहुत सोच-विचार के बाद उसने निश्चय किया-चलकर इन्दु से प्रार्थना करूँ। अगर वह राजा साहब से जोर देकर कहेगी, तो संभव है, राजा साहब मान जायँ। पिता से विरोध करके उसे बड़ा दुःख होता था; पर उसकी धार्मिक दृष्टि में दया का महत्त्व इतना ऊँचा था कि उसके सामने पिता के हानि-लाभ की कोई हस्ती न थी। जानती थी, राजा साहब दीन-वत्सल हैं और उन्होंने सूरदास पर केवल मि० क्लार्क की खातिर वज्राघात किया है। जब उन्हें ज्ञात हो जायगा कि मैं उस काम के लिए उनकी जरा भी कृतज्ञ न हूँगी, तो शायद वह अपने निर्णय पर पुनः विचार करने के लिए तैयार हो जायँ। यहाँ ज्यों ही यह बात खुलेगा, सारा घर मेरा दुश्मन हो जायगा; पर इसकी क्या चिन्ता? इस भय से मैं अपना कर्तव्य तो नहीं छोड़ सकती।

इसी हैसबैस में तीन दिन गुजर गये। चौथे दिन प्रातःकाल वह इन्दु से मिलने चली। सवारी किराये की थी। सोचती जाती थी-ज्यों ही अन्दर कदम रखूँगा, इन्दु दौड़कर गले लिपट जायगी, शिकायत करेगी कि इतने दिनों के बाद क्यों आई हो। हो सकता है कि आज मुझे आने भी न दे। वह राजा साहब को जरूर राजी कर लेगी। न जाने पापा ने राजा साहब को कैसे चकमा दिया।

यही सोचते-सोचते वह राजा साहब के मकान पर पहुँच गई और इंदु को खबर दी। उसे विश्वास था कि मुझे लेने के लिए इंदु खुद निकल आयेगी, किंतु १५ मिनट इंतजार करने के बाद एक दासी आई और उसे अंदर ले गई।

सोफिया ने जाकर देखा कि इंदु अपने बैठने के कमरे में दुशाला ओढ़े, अँगीठी के सामने एक कुर्सी पर बैठी हुई है। सोफिया ने कमरे में कदम रखा, तब भी इंदु कुर्सी से न उठी, यहाँ तक कि सोफिया ने हाथ बढ़ाया तब भी रुखाई से हाथ बढ़ा देने के सिवा इंदु मुँह से कुछ न बोली। सोफिया ने समझा, इसका जी अच्छा नहीं है। बोली-"सिर में दर्द है क्या?"

उसकी समझ ही में न आता था कि बीमारी के सिवा इस निष्ठुरता का और भी कोई कारण हो सकता है। [ २२१ ]इंदु ने क्षीण स्वर में कहा-"नहीं, अच्छी तो हूँ। इस सर्दी-पाले में तो तुम्हें बड़ा कष्ट हुआ।"

सोफिया मानशीला स्त्री थी। इंदु की इस निष्ठुरता से उसके दिल पर चोट-सी लगी। पहला विचार तो हुआ कि उलटे-पाँव वापस जाऊँ; मगर यह सोचकर कि यह बहुत ही हास्य-जनक बात होगी, उसने दुस्साहस करके एक कुर्सी खींची और उस पर बैठ गई।

“आपसे मिले साल-भर से अधिक हो गया।"

"हाँ, मुझे कहीं आने-जाने की फुरसत कम रहती है। मड़ियाहू की रानी साहब एक महीने में तीन बार आ चुकी हैं, मैं एक बार भी न जा सकी।”

सोफिया दिल में हँसती हुई व्यंग्य से बोली-“जब रानियों को यह सौभाग्य नहीं प्राप्त होता, तो मैं किस गिनती में हूँ! क्या कुछ रियासत का काम भी देखना पड़ता है?"

"कुछ नहीं, सब कुछ। राजा साहब को जातीय कार्यों से अवकाश ही नहीं मिलता, तो घर का कारोबार देखनेवाला भी तो कोई चाहिए। मैं भी देखती हूँ कि जब इन्हीं कामों की बदौलत उनका वह सम्मान है, जो बड़े-से-बड़े हाकिमों को भी प्राप्त नहीं है, तो उनसे ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं करती।”

सोफिया अभी तक न समझ सकी कि इंदु की अप्रसन्नता का कारण क्या है। बोली-"आप बड़ी भाग्यशालिनी हैं कि इस तरह उनके सत्कार्यों में हाथ बटा सकती हैं। राजा साहब की सुकीर्ति आज सारे शहर में छाई हुई है, लेकिन बुरा न मानिएगा, कभी-कभी वह भी मुँह-देखी कर जाते हैं और बड़ों के आगे छोटों की परका नहीं करते।"

"शायद उनकी यह पहली शिकायत है, जो मेरे कान में आई है।"

"हाँ, दुर्भाग्यवश यह काम मेरे ही सिर पड़ा। सूरदास को तो आप जानती ही हैं। राजा साहब ने उसकी जमीन पापा को दे दी है। बेचारा आजकल गली-गली दुहाई देता फिरता है। पिता के विरुद्ध एक शब्द भी मुँह से निकालना मेरे लिए लजास्पद है, यह समझती हूँ। फिर भी यह कहे बिना नहीं रहा जाता कि इस मौके पर राजा साहब को एक दीन प्राणी पर ज्यादा दया करनी थी।"

इंदु ने सोफिया को प्रश्न-सूचक नेत्रों से देखकर कहा-"आजकल पिता से भी अनबन है क्या?"

सोफिया ने गर्व से कहा-"न्याय और कर्तव्य के सामने पिता, पुत्र या पति का पक्षपात न किया जाय, तो कोई लज्जा की बात नहीं है।"

"तो तुम्हें पहले अपने पिता ही को सन्मार्ग पर लाना चाहिए था। राजा साहब ने जो कुछ किया, तुम्हारी खातिर किया, और तुम्हीं उन पर इलजाम रखती हो? कितने शोक की बात है! उन्हें मि० सेवक, मि. क्लार्क या संसार के किसी अन्य व्यक्ति से। दबने की जरूरत नहीं है, किंतु इस अवसर पर उन्होंने तुम्हारे पापा का पक्ष न किया
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होता, तो शायद सबसे पहले तुम्ही उन पर कृतघ्नता का दोषारोपण करतीं। सूरदास पर यह अन्याय इसलिए किया गया कि तुमने एक संकट में विनय की रक्षा की है, और तुम अपने पिता की बेटी हो।"

सोफिया ये कठोर शब्द सुनकर तिलमिला गई। बोली-“अगर मैं जानती कि मेरी उस क्षुद्र सेवा का यों प्रतिकार किया जायगा, तो शायद विनयसिंह के समीप न जाती। क्षमा कीजिए, मुझसे भूल हुई कि आपके पास यह शिकायत लेकर आई। सुना करती थी, अमीरों में स्थिरता नहीं होती। आज उसका प्रमाण मिल गया। लीजिए, जाती हूँ। मगर इतना कहे जाती हूँ कि चाहे पापा मेरा मुँह देखना भी पाप समझें, पर मैं इस विषय में कदापि चुप न बैठूँगी।"

इन्दु कुछ नरम होकर बोली—“आखिर तुम राजा साहब से क्या चाहती हो?"

"क्या ऐश्वर्य पाकर बुद्धि भी मंद हो जाती है?"

“मैं प्यादे से वजीर नहीं बनी हूँ।"

"खेद है, आपने अब तक मेरा आशय नहीं समझा।"

"खेद करने से तो बात मेरी समझ में न आयेगी।"

“मैं चाहती हूँ कि सूरदास की जमीन उसे लौटा दी जाय।"

"तुम्हें मालूम है, इसमें राजा साहब का कितना अपमान होगा?"

"अपमान अन्याय से अच्छा है।"

"यह भी जानती हो कि जो कुछ हुआ, तुम्हारे......मि. क्लार्क की प्रेरणा से

"यह तो नहीं जानती; क्योंकि इस विषय में मेरी उनसे कभी बातचीत नहीं हुई। लेकिन जानती भी, तो राजा साहब की मान-हानि के विचार से पहले राजा साहब ही से अनुनय-विनय करना उचित समझती। अपनी भूल अपने ही हाथों सुधर जाय, तो यह उससे कहीं अच्छा है कि कोई दूसरा उसे सुधारे।"

इन्दु को चोट लगी। समझा, यह मुझे धमकी दे रही है। मि० क्लार्क के अधिकार पर इतना अभिमान! तनकर बोली— "मैं नहीं समझती कि किसी राज्याधिकारी को बोर्ड के फैसले में भी दखल देने का मजाज है, और चाहे एक दीन अंधे पर अत्याचार ही क्यों न करना पड़े, राजा साहब अपने फैसले को बहाल रखने के लिए कोई बात उठा न रखेंगे। एक राजा का सम्मान एक क्षुद्र न्याय से कहीं ज्यादा महत्व की वस्तु है।"

सोफिया ने व्यथित होकर कहा—"इसी क्षुद्र न्याय के लिए सत्यवादी पुरुषों ने सिर कटवा दिये हैं।"

इन्दु ने कुर्सी की बाँह पर हाथ पटककर कहा—"न्याय का स्वाँग भरने का युग अब नहीं रहा।”

सोफिया ने कुछ उत्तर न दिया। उठ खड़ी हुई और बोली—"इस कष्ट के लिए क्षमा कीजिएगा।" [ २२३ ]
इन्दु अँगीठी की आग उकसाने लगी। सोफिया की ओर आँख उठाकर भी न देखा।

सोफिया यहाँ से चली, तो इन्दु के दुर्व्यवहार से उसका कोमल हृदय विदीर्ण हो रहा था। सोचती जाती थी-वह हँसमुख, प्रसन्न-चित्त, विनोद-शील इन्दु कहाँ है? क्या ऐश्वर्य मानव-प्रकृति को भी दूषित कर देता है? मैंने तो आज तक कभी इसका दिल दुखानेवाली बात नहीं कही। क्या मैं ही कुछ और हो गई हूँ, या वही कुछ ओर हो गई है? इसने मुझसे सीधे मुँह बात भी नहीं की। बात करना तो दूर, उलटे और गालियाँ सुनाई। मैं इस पर कितना विश्वास करती थी। समझती थी, देवी है। आज इसका यथार्थ स्वरूप दिखाई पड़ा। लेकिन मैं इसके ऐश्वर्य के सामने क्यों सिर झुकाऊँ? इसने अकारण, निष्प्रयोजन ही, मेरा अपमान किया। शायद रानीजी ने इसके कान भरे हो। लेकिन सजनता भी कोई चीज है।

सोफिया ने उसी क्षण इस अपमान का पूरा, बल्कि पूरे से भी ज्यादा बदला लेने का निश्चय कर लिया। उसने यह विचार न किया-संभव है, इस समय किसी कारण इसका मन खिन्न रहा हो, अथवा किसी दुर्घटना ने इसे असमंजस में डाल रखा हो। उसने तो सोचा-ऐसी अभद्रता, ऐसी दुर्जनता के लिए दारुण-से-दारुण मानसिक कष्ट, बड़ी-से-बड़ी आर्थिक क्षति, तीव्र-से-तीव्र शारीरिक व्यथा का उज्र भी काफी नहीं। इसने मुझे चुनौती दी है, स्वीकार करती हूँ। इसे अपनी रियासत का घमण्ड है, मैं दिखा दूँगी कि यह सूर्य का स्वयं प्रकाश नहीं, चाँद की पराधीन ज्योति है। इसे मालूम हो जायगा कि राजा और रईस, सब-के-सब शासनाधिकारियों के हाथों के खिलौने हैं, जिन्हें वे अपनी इच्छा के अनुसार बनाते-बिगाड़ते रहते हैं।

दुसरे ही दिन से सोफिया ने अपनी कपट-लीला आरम्भ कर दी। मि० क्लार्क से उसका प्रेम बढ़ने लगा। द्वेष के हाथों की कठपुतली बन गई। अब उनकी प्रेम-मधुर बातें सिर झुकाकर सुनती, उमकी गरदन में बाहें डालकर कहती—"तुमने प्रेम करना किससे सीखा?” दोनों अब निरन्तर साथ नजर आते, सोफिया दफ्तर में भी साहब का गला न छोड़ती, बार-बार चिट्ठियाँ लिखती-"जल्द आओ, मैं तुम्हारी बाट जोह रही हूँ।" और यह सारा प्रमाभिनय केवल इसलिए था कि इन्दु से अपमान का बदला लूँ। न्याय-रक्षा का अब उसे लेश-मात्र ध्यान न था, केवल इन्दु का दर्प-मर्दन करना चाहती थी।

एक दिन वह मि० क्लार्क को पाँड़ेपुर की तरफ सैर कराने ले गई। जब मोटर गोदाम के सामने से होकर गुजरी, तो उसने ईंट और कंकड़ के ढेरों की ओर संकेत करके कहा—“पापा बड़ी तत्परता से काम कर रहे हैं।"

क्लार्क-"हाँ, मुस्तैद आदमी हैं। मुझे तो उनकी श्रमशीलता पर डाह होती है।"

सोफी--"पापा ने धर्म-अधर्म का विचार नहीं किया। कोई माने या न माने, मैं तो, यही कहूँगी कि अन्धे के साथ अन्याय हुआ।”

क्लार्क--"हाँ, अन्याय तो हुआ। मेरी तो बिलकुल इच्छा न थी।" [ २२४ ]सोफी-"तो आपने क्यों अपनी स्वीकृति दी?"

क्लार्क-"क्या करता?"

सोफी-"अस्वीकार कर देते। साफ लिख देना चाहिए था कि इस काम के लिए किसी की जमीन नहीं जब्त की जा सकती।"

क्लार्क-"तुम नाराज न हो जाती?”

सोफी-"कदापि नहीं। आपने शायद मुझे अब तक नहीं पहचाना।"

क्लार्क-"तुम्हारे पापा जरूर ही नाराज हो जाते।”

सोफी-मैं और पाना एक नहीं हैं। मेरे और उनके आचार-व्यवहार में दिशाओं का अन्तर है।"

क्लार्क- "इतनी बुद्धि होती, तो अब तक तुम्हें कब का पा गया होता। मैं तुम्हारे स्वभाव और विचारों से परिचित न था। समझा, शायद यह अनुमति मेरे लिए हितकर हो।”

सोफी-“सारांश यह कि मैं ही इस अन्याय की जड़ हूँ। राजा साहब ने मुझे प्रसन्न करने के लिए बोर्ड में यह प्रस्ताव रखा। आपने भी मुझी को प्रसन्न करने के लिए स्वीकृति प्रदान की। आप लोगों ने मेरी तो मिट्टी ही खराब कर दी।"

क्लार्क-'मेरे सिद्धान्तों से तुम परिचित हो। मैंने अपने ऊपर बहुत जब करके यह प्रस्ताव स्वीकार किया है।”

सोफी-"आपने अपने ऊपर जब नहीं किया है, मेरे ऊपर किया है, और आपको इसका प्रायश्चित्त करना पड़ेगा।”

क्लार्क-"मैं न जानता था कि तुम इतनी न्यायप्रिय हो।”

सोफी-"मेरी तारीफ करने से इस पाप का प्रायश्चित्त न होगा।"

क्लार्क-"मैं अंधे को किसी दूसरे गाँव में इतनी ही जमीन दिला दूँगा।"

सोफिया--"क्या उसी की जमीन उसे नहीं लौटाई जा सकती?"

क्लार्क-"कठिन है।”

सोफिया-"असंभव तो नहीं है?"

क्लार्क-"असंभव से कुछ ही कम है।”

सोफिया—"तो समझ गई, असंभव नहीं है, आपको यह प्रायश्चित्त करना ही पड़ेगा। कल ही उस प्रस्ताव को मंसूख कर दीजिए।"

क्लार्क—"प्रिये, तुम्हें मालूम नहीं, उसका क्या परिणाम होगा।"

सोफिया—"मुझे इसकी चिंता नहीं। पापा को बुरा लगेगा, लगे। राजा साहब का अपमान होगा, हो। मैं किसी के लाभ या सम्मान-रक्षा के लिए अपने ऊपर पाप का भार क्यों लूँ? क्यों ईश्वरीय दंड की भागिनी बनूँ? आप लोगों ने मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरे सिर पर एक महान् पातक का बोझ रख दिया है। मैं इसे सहन नहीं कर सकती। आपको अंधे की जमीन वापस करनी पड़ेगी।" [ २२५ ]ये बातें हो ही रही थीं कि सैयद ताहिरअली ने सोफिया को मोटर पर बैठे जाते देखा, तो तुरंत आकर सामने खड़े हो गये और सलाम किया। सोफी ने मोटर रोक दी और पूछा-“कहिए मुंशीजी, इमारत बनने लगी?"

ताहिर—"जी हाँ, कल दाग-बेल पड़ेगी; पर मुझे यह बेल मुड़े चढ़ती नहीं नजर आती।"

सोफिया—"क्यों? क्या कोई वारदात हो गई?"

ताहिर-हुजूर, जब से इस अंधे ने शहर में आह-फरियाद शुरू की है, तब से

अजीब मुसीबत का सामना हो गया है। मुहल्लेवाले तो अब नहीं बोलते, लेकिन शहर के शोहदे-लुच्चे रोजाना आकर मुझे धमकियाँ देते हैं। कोई घर में आग लगाने को अमादा होता है, कोई लूटने को दौड़ता है, कोई मुझे कत्ल करने की धमकी देता है। आज सुबह कई सौ आदमी लाठियाँ लिये आ गये और गोदाम को घेर लिया। कुछ लोग सीमेंट और चूने के ढेरों को बखेरने लगे, कई आदमो पत्थर की सिलों को तोड़ने लगे। मैं तनहा क्या कर सकता था? यहाँ के मजदूर खौफ के मारे जान लेकर भागे। कयामत का सामना था। मालूम होता था, अब आन-को-आन में महशर बरया हो जायगा। दरवाजा बंद किये बैठा अल्लाह-अल्लाह कर रहा था कि किसी तरह हंगामा फरो हो। बारे, दुआ कबूल हुई। ऐन उसी वक्त अंधा न जाने किधर से आ निकला और बिजली की तरह कड़ककर बोला-"तुम लोग यह उधम मचाकर मुझे क्यों कलंक लगा रहे हो? आग लगाने से मेरे दिल को आग न बुझेगी, लहू बहाने से मेरा चित्त शांत न होगा। आप लोगों की दुआ से यह आग और जलन मिटेगी। परमात्मा से कहिए, मेरा दुःख मिटायें। भगवान् से विनती कीजिए, मेरा संकट हरें। जिन्होंने मुझ पर जुलुम किया है, उनके दिल में दया-धरम जागे, बस मैं आप लोगों से और कुछ नहीं चाहता।" इतना सुनते ही कुछ लोग तो हट गये; मगर कितने ही आदमी बिगड़कर बोले-"तुम देवता हो, तो बने रहो; हम देवता नहीं हैं, हम तो जैसे के साथ तैसा करेंगे। उन्हें भी तो गरीबों पर जुल्म करने का मजा मिल जाय।" यह कहकर वे लोग पत्थरों को उठा-उठाकर पटकने लगे। तब इस अंधे ने वह काम किया, जो औलिया हो कर सकते हैं। हुजूर, मुझे तो कामिल यकीन हो गया कि कोई फरिश्ता है। उसकी बातें अभी तक कानों में गूँज रही हैं। उसकी तसवीर अभी तक आँखों के सामने खिंची हुई है। उसने जमोन से एक बड़ा-सा पत्थर का टुकड़ा उठा लिया और उसे अपने माथे के सामने रखकर बोला-"अगर तुम लोग अब भी मेरी बिनती न सुनोगे, तो इसी दम इस पत्थर से सिर टकराकर जान दे दूँगा। मुझे मर जाना मंजूर है, पर यह अंधेर नहीं देख सकता।" उसके मुँह से इन बातों का निकलना था कि चारों तरफ सन्नाटा छा गया। जो जहाँ था, वह वहीं बुत बन गया। जरा देर में लोग आहिस्ता-आहिस्ता रुखसत होने लगे और कोई आध घंटे में सारा मजमा गायब हो गया। सुरदास उठा और लाठी टेकता हुआ जिधर से आया था, उसी तरफ चला गया। हुजूर, मुझे तो पूरा यकीन है कि वह इंसान नहीं, कोई फरिश्ता है।" [ २२६ ]सोफी—"उसे किसी से इन दुष्टों के आने की खबर मिल गई होगी।"

ताहिर—"हुजूर, मेरा तो कयास है कि उसे इल्म गैब है।"

सोफी—(मुस्किराकर) "आपने पापा को इसका इत्तिला नहीं दी?"

ताहिर—"हुजूर, तब से मौका ही नहीं मिला। खुद बाल-बच्चों को तनहा छोड़कर नहीं जा सकता। आदमो सब पहले ही भाग गये थे। इसी फिक्र में खड़ा था कि इजूर की मोटर नजर आई।"

क्लार्क—"यह अन्धा जरूर कोई असाधारण पुरुष है।"

सोफी--"तुम उससे दो-चार बातें करके देखो। उसके आध्यात्मिक और दार्शनिक विचार सुनकर चकित हो जाओगे। साधु भी है और दार्शनिक भी। कहीं हम उसके विचारों को व्यवहार में ला सकते, तो निश्चय सांसारिक जीवन सुखमय हो जाता। जाहिल है, बिलकुल निरक्षर; लेकिन उसका एक-एक वाक्य विद्वानों के बड़े-बड़े ग्रंथों पर भारी है।"

मोटर चली, तो सोफी बोली—“आप लोग ऐसे साधुजनों पर भी अन्याय करने से बाज नहीं आते, जो अपने शत्रुओं पर एक कंकड़ भी उठाकर नहीं फेंकता! प्रभु मसीह में भी तो यही गुण सर्व-प्रधान था।”

क्लार्क--"प्रिये, अव लजित न करो। इसका प्रायश्चित्त निश्चय होगा।"

मोफी--"राजा साहब इसका घोर विरोध करेंगे।"

क्लार्क—"थुह! उनमें इतना नैतिक साहस नहीं है। वह जो कुछ करते हैं, हमारा रुख देखकर करते हैं। इसा वजह से उन्हें कभी असफलता नहीं होती। हाँ, उनमें यह विशेष गुण है कि वह हमारे प्रस्तावों का रूपांतर करके अपना काम बना लेते हैं और उन्हें जनता के सामने ऐसी चतुरता से उपस्थित करते हैं कि लोगों की दृष्टि में उनका सम्मान बढ़ जाता है। हिन्दुस्तानी रईसों और राजनीतिज्ञों में आत्मविश्वास का बड़ा अभाव होता है। वे हमारी सहायता से वह कर सकते हैं, जो हम नहीं कर सकते; पर हमारी सहायता के बिना कुछ भी नहीं कर सकते।"

मोटर सिगरा आ पहुँची। सोफिया उतर पड़ी। क्लार्क ने उसे प्रेम की दृष्टि से देखा, हाथ मिलाया और चले गये।