रंगभूमि/३९

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रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
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तीसरे दिन यात्रा समाप्त हो गई, तो संध्या हो चुकी थी। सोफिया और विनय दोनों डरते हुए गाड़ी से उतरे कि कहीं किसी परिचित आदमी से भेंट न हो जाय। सोफिया ने सेवा-भवन (विनयसिंह का घर) चलने का विचार किया, लेकिन आज वह बहुत कातर हो रही थी, रानीजी न जाने कैसे पेश आयें। वह पछता रही थी कि नाहक यहाँ आई; न जाने कैसी पड़े, कैसी न पड़े। अब उसे अपने ग्रामीण जीवन की याद आने लगी। कितनी शांति थी, कितना सरल जीवन था; न कोई विघ्न था, न बाधा; न किसी से द्वेष था, न मत्सर। विनयसिंह उसे तस्कीन देते हुए बोले-"दिल मजबूत रखना, जरा भी मत डरना, सच्ची घटनाएँ बयान करना, बिलकुल सच्ची, तनिक भी अतिशयोक्ति न हो, जरा भी खुशामद न हो। दया-प्रार्थना का एक शब्द भी मुख से मत निकालना। मैं बातों को घटा-बढ़ाकर अपनी प्राण-रक्षा नहीं करना चाहता! न्याय और शुद्ध न्याय चाहता हूँ। यदि वह तुमसे अशिष्टता का व्यवहार करें, कटु वचनों का प्रहार करने लगें, तो तुम क्षण-भर भी मत ठहरना। प्रातःकाल आकर मुझसे एक-एक बात कहना। या कहो, तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूँ?”

सोफी उन्हें साथ ले चलने पर राजी न हुई। विनय तो पाँडेपुर की तरफ चले, वह सेवा-भवन की ओर चली। ताँगेवाले ने कहा- "मिस साहब, आप कहीं चली गई थीं क्या? बहुत दिनों बाद दिखलाई दीं।" सोफी का कलेजा धक-धक करने लगा। बोली---"तुमने मुझे कब देखा? मैं तो इस शहर में पहली ही बार आई हूँ।"

ताँगेवाले ने कहा-"आप ही जैसी एक मिस साहब यहाँ सेवक साहब की बेटी भी थीं। मैंने समझा, आप ही होंगी।"

सोफिया-"मैं ईसाई नहीं हूँ।"

जब वह सेवा-भवन के समीप पहुँची, तो ताँगे से उतर पड़ी। वह रानीजी से मिलने के पहले अपने आने की कानोंकान भी खबर न होने देना चाहती थी। हाथ में अपना बैग लिये हुए ड्योढ़ी पर गई और दरबान से बोली-'जाकर रानीजी से कहो, मिस सोफिया आपसे मिलना चाहती हैं।"

दरबान उसे पहचानता ही था। उठकर सलाम किया और बोला-"हजूर भीतर चले, इतला क्या करनी है! बहुत दिनों बाद आपके दरसन हुए।"

सोफिया-"मैं बहुत अच्छी तरह खड़ी हूँ। तुम जाकर इत्तिला तो दो।"

दरबान-“सरकार, उनका मिजाज आप जानती ही हैं। बिगड़ जायँगी कि उन्हें साथ क्यों न लाया, इतला क्यों देने आया।"

सोफिया-"मेरी खातिर से दो-चार बातें सुन लेना।"

दरबान अंदर गया, तो सोफिया क 'दिल इस तरह धडक रहा था, जैसे कोई पत्ता
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हिल रहा हो। मुख पर एक रंग आता था, एक रंग जाता था। धड़का लगा हुआ था “कहीं रानी साहब गुस्से में भरी वहीं से बिगड़ती हुई न आयें, या कहला दें, चली जा, नहीं मिलती! बिना एक बार उनसे मिले, तो मैं न जाऊँगी, चाहे वह हजार बार दुत्कारें।"

एक मिनट भी न गुजरने पाया था कि रानीजी एक शाल ओढ़े हुए द्वार पर आ गई और उससे टूटकर गले मिलीं, जैसे कोई माता ससुराल से आनेवाली बेटी को गले लगा ले। उनकी आँखों से आँसुओं की वर्षा होने लगी। अवरुद्ध कंठ से बोली-“तुम यहीं क्यों खड़ी हो गई बेटी, अंदर क्यों न चली आई! मैं तो नित्यप्रति तुम्हारी बाट जोहती रहती थी। तुमसे मिलने को जी तड़प-तड़पकर रह जाता था। मुझे आशा हो रही थी कि तुम आ रही हो, पर तुम आती न थीं। कई बार यों ही स्टेशन तक गई कि शायद तुम्हें देख पाऊँ। ईश्वर से नित्य मनाती थी कि एक बार तुमसे मिला दे। चलो, भीतर चलो। मैंने तुम्हें जो दुर्वचन कहे थे, उन्हें भूल जाओ। (दरबान से) यह बैग उठा ले। महरी से कह दे, मिस सोफिया का पुराना कमरा साफ कर दे। बेटी, तुम्हारे कमरे की ओर ताकने की हिम्मत नहीं पड़ती, दिल भर-भर आता है।"

यह कहते हुए सोफिया का हाथ पकड़े अपने कमरे में आई और उसे अपनी बगल में मसनद पर बैठाकर बोलीं-"आज मेरी मनोकामना पूरी हो गई। तुमसे मिलने के लिए जी बहुत बेचैन था।"

सोफिया का चिंता-पीड़ित हृदय इस निरपेक्षित स्नेह-बाहुल्य से विह्वल हो उठा। वह केवल इतना कह सकी-"मुझे भी आपके दर्शनों की बड़ी अभिलाषा थी। आपसे दया-भिक्षा माँगने आई हूँ।"

रानी-“बेटी, तुम देवी हो, मेरी बुद्धि पर परदा पड़ गया था। मैंने तुम्हें पहचाना न था। मुझे सब मालूम है बेटी, सब सुन चुकी हूँ। तुम्हारी आत्मा इतनी पवित्र है, यह मुझे न मालूम था। आह! अगर पहले से जानती।"

यह कहते-कहते रानीजी फूट-फूटकर रोने लगीं। जब चित्त शांत हुआ, तो फिर बोली-"अगर पहले से जान गई होती, तो आज इस घर को देखकर कलेजा ठंडा होता। आह! मैंने विनय के साथ घोर अन्याय किया। तुम्हें न मालूम होगा बेटी, ज़ब दुमने......( सोचकर) वीरपालसिंह ही नाम था न? हाँ, जब तुमने उसके घर पर रात के समय विनय का तिरस्कार किया, तो वह लजित होकर रियासत के अधिकारियों के पास कैदियों पर दया करने के लिए दौड़ता रहा। दिन-दिन-भर निराहार और निर्जल पड़ा रहता, रात-रात-भर पड़ा रोया करता, कभी दीवान के पास जाता, कभी एजेंट के पास, कभी पुलिस के प्रधान कर्मचारी के पास, कभी महाराजा के पास। सबसे अनुनय-विनय करके हार गया। किसी ने न सुनी। कैदियों की दशा पर किसी को दया न आई। बेचारा विनय हताश होकर अपने डेरे पर आया। न जाने किस सोच में बैठा था कि मेरा पत्र उसे मिला। हाय! (रोकर) सोफी, वह पन्न नहीं था; विष का
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प्याला था, जिसे मैंने अपने हाथों उसे पिलाया; कटार थी, जिसे मैंने अपने हाथों उसकी गरदन पर फेरा! मैंने लिखा था, तुम इस योग्य नहीं हो कि मैं तुम्हें अपना पुत्र समझूँ, तुम मुझे अपनी सूरत न दिखाना। और भी न जाने कितनी कठोर बातें लिखी थीं। याद करती हूँ, तो छाती फटने लगती है। यह पत्र पाते ही वह बिना किसी से कुछ कहे-सुने नायकराम के साथ यहाँ आने के लिए तैयार हो गया। कई स्टेशनों तक नायकराम उसके साथ आये। पण्डाजी को फिर नींद आ गई। और जब आँख खुली, तो विनय का कहीं गाड़ी में पता न था। उन्होंने सारी गाड़ी तलाश की। फिर उदयपुर तक गये। रास्ते में एक-एक स्टेशन पर उतरकर पूछ-ताछ की, पर कुछ पता न चला।बेटी, यह इस अभागिनी की राम-कथा है। मैं हत्यारिन हूँ! मुझसे बड़ी अभागिनी संसार में और कौन होगी? न जाने विनय का क्या हाल हुआ! कुछ पता नहीं। उसमें बड़ा आत्माभिमान था बेटी, बड़ा बात का धनी था। मेरी बातें उसके दिल पर चोट कर गई। मेरे प्यारे लाल ने कभी सुख न पाया। उसका सारा जीवन तपस्या ही में कटा।"

यह कहकर रानी फिर रोने लगी। सोफी भी रो रही थी। पर दोनों के मनोभावों में कितना अंतर था! रानी के आँसू दुःख, शोक और विषाद के थे, सोफी के आँसू हर्ष और उल्लास के।

एक क्षण में रानीजी ने पूछा-"क्यों बेटी, तुमने उसे जेल में देखा था, तो बहुत दुबला हो गया था?”

सोफी-“जी हाँ, पहचाने न जाते थे।"

रानी-"उसने समझा, विद्रोहियों ने तुम्हारे साथ न जाने क्या व्यवहार किया हो। बस, इस बात पर उसे जिद पड़ गई। आराम से बैठो बेटी, अब यही तुम्हारा घर है। अब मेरे लिए तुम्हीं विनय को प्रतिच्छाया हो। अब यह बताओ, तुम इतने दिनों कहाँ थीं? इंद्रदत्त तो कहता था कि तुम विनय का तिरस्कार करने के तीन ही चार दिन बाद वहाँ से चली आई थीं। इतने दिनों कहाँ रहीं? साल-भर से ऊपर तो हो गया होगा।"

सोफिया का हृदय आनंद से गद्गद हो रहा था। जी में तो आया कि इसी वक्त सारा वृत्तांत कह सुनाऊँ, माता की शोकाग्नि शांत कर दूँ। पर भय हुआ कि कहीं इनका धर्माभिमान फिर न जाग्रत हो जाय। विनय की ओर से तो अब वह निरिमन हो गई थी। केवल अपने ही विषय में शंका थी। देवता को न पाकर हम पाषाण-प्रतिष्ठा करते हैं। देवता मिल जाय, तो पत्थर को कौन पूजे १ बोली-"क्या बताऊँ, कहाँ थी? इधर-उधर भटकती फिरती थी। और शरण ही कहाँ थी! अपनी भूल पर पछताती और रोती थी। निराश होकर यहाँ चली आई।"

रानी-"तुम व्यर्थ इतने दिनों कष्ट उठाती रहीं। तुम्हारा यह क्या घर न था? बुरा न मानना बेटी, तुमने विनय के साथ बड़ा अन्याय किया। उतना ही, जितना मैंने। तुम्हारी बात उसे और भी ज्यादा लगी; क्योंकि उसने जो कुछ किया था, तुम्हारे ही
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हित के लिए किया था। मैं तो अपने प्रियतम के साथ इतनी निर्दयता कभी न कर सकती! अब तुम स्वयं अपनी भूल पर पछता रही होगी। हम दोनों ही अभागिनी हैं। आह! बेचारे विनय को कहीं सुख न मिला। तुम्हारा हृदय अत्यंत कठोर है। सोचो, अगर तुम्हें खबर मिलती कि विनय को डाकुओं ने पकड़कर मार डाला है, तो तुम्हारी क्या दशा हो जाती। शायद तुम भी इतनी ही दया-शून्य हो जाती। यह मानवीय स्वभाव है। मगर अब पछताने से क्या होता है। मैं आप ही नित्य पछताया करती हूँ। अब तो वह काम सँभालना है, जो उसे अपने जीवन में सबसे प्यारा था। तुमने उसके लिए बड़े कष्ट उठाये; अपमान, लज्जा, दंड, सब कुछ झेला। अब उसका काम सँभालो। इसी को अपने जीवन का उद्देश्य समझो। तुम्हें क्या खबर होगी, कुछ दिनों तक प्रभु सेवक इस संस्था के व्यवस्थापक हो गये थे। काम करनेवाला हो, तो ऐसा हो। थोड़े ही दिनों में उसने सारा मुल्क छान डाला और पूरे पाँच सौ वालंटियर जमा कर लिये, बड़े-बड़े शहरों में शाखाएँ खोल दीं, बहुत-सा रुपया जमा कर लिया। मुझे इससे बड़ा आनंद मिलता था कि विनय ने जिस संस्था पर अपना जीवन बलिदान कर दिया, वह फल-फूल रही है। मगर ईश्वर को न जाने क्या मंजूर था। प्रभु सेवक और कुँवर साहब में अन-बन हो गई। प्रभु सेवक उसे ठीक उसी मार्ग पर ले जा रहा था, जिस पर विनय ले जाना चाहता था। कुँवर साहब और उनके परम मित्र डॉ० गंगुली उसे दूसरे ही रास्ते पर ले जाना चाहते थे। आखिर प्रभु सेवक ने पद-त्याग कर दिया। तभी से संस्था डाँवाडोल हो रही है, जाने बचती है या जाती है। कुँवर साहब में एक विचित्र परिवर्तन हो गया है। वह अब अधिकारियों से सशंक रहने लगे हैं। अफवाह थी कि गवर्नमेंट इनकी कुल जायदाद जब्त करनेवाली है। अधिकारिमंडल के इस संशय को शांत करने के लिए उन्होंने प्रभु सेवक के कार्य-क्रम से अपना विरोध प्रकाशित करा दिया। यही अनवन का मुख्य कारण था। अभी दो महीने भी नहीं गुजरे, लेकिन शीराजा बिखर गया। सैकड़ों सेवक निराश होकर अपने काम-धंधे में लग गये। मुश्किल से दो सौ आदमी और होंगे! चलो बेटी, तुम्हारा कमरा अब साफ हो गया होगा, तुम्हारे भोजन का प्रबंध करके तब इतमीनान से बातें करूँ। (महराजिन से) इन्हें पहचानती है न? तब यह मेरी मेहमान थीं, अब मेरी बहू हैं। जा, इनके लिए दो-चार नई चीजें बना ला। आह! आज विनय होता, तो मैं अपने हाथों से इसे उसके गले लगा देती, ब्याह रचाती। शास्त्रों में इसकी व्यवस्था है।"

सोफिया की प्रबल इच्छा हुई कि रहस्य खोल दूँ। बात ओठों तक आई और रुक गई।

सहसा शोर मचा--"लाल साहब आ गये! लाल साहब आ गये! भैया विनयसिंह आ गये!” नौकर- चाकर चारों ओर से दौड़े, लौडियाँ महरियाँ काम छोड़-छोड़कर भागीं। एक क्षण में विनय ने कमरे में कदम रखा। रानी ने उसे सिर से पाँव तक देखा, मानों निश्चय कर रही थीं कि मेरा ही विनय है या कोई और; अथवा देखना चाहती थीं
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कि उस पर कोई आघात के चिह्न तो नहीं हैं। तब उठी और बोलीं-"बहुत दिनों में आये बेटा! आओ, छाती से लगा लूँ।" लेकिन विनय ने तुरंत उनके चरणों पर सिर रख दिया। रानीजी को अश्रु-प्रवाह में न कुछ सूझता था और न प्रेमावेश में कोई बात मुंह से निकलती थी, झुकी हुई विनय का सिर पकड़ कर उठाने की चेष्टा कर रही थीं। भक्ति और वात्सल्य का कितना स्वर्गीय संयोग था।

लेकिन विनय को रानी की बातें भूली न थीं। माता को देखकर उसके दिल में जोश उठा कि इनके चरणों पर आत्मसमर्पण कर दूं। एक विवशकारी उद्गार या प्राण दे देने के लिए, वहीं माता के चरणों पर जीवन का अंत कर देने के लिए, दिखा देने के लिए कि यद्यपि मैंने अपराध किये हैं, पर सर्वथा लज्जाहीन नहीं हूँ, जीना नहीं जानता, लेकिन मरना जानता हूँ। उसने इधर-उधर निगाह दौड़ाई। सामने ही दीवार पर तलवार लटक रही थी। वह कौंदकर तलवार उतार लाया और उसे सर्र से खोंच कर बोला-अम्माँ, इस योग्य तो नहीं हूं कि आपका पुत्र कहलाऊँ, लेकिन आपकी अंतिम आज्ञा शिरोधार्य करके अपनी सारी अपकीर्ति का प्रायश्चित्त किये देता हूँ। मुझे आशीर्वाद दीजिए।"

सोफिया चिल्लाकर विनय से लिपट गई। जाह्नवी ने लपककर उसका हाथ पकड़ लिया और बोलीं-विनय, ईश्वर साक्षी है, मैं तुम्हें कब का क्षमा कर चुकी। तलवार छोड़ दो। सोफी, तू इनके हाथ से तलवार छीन ले, मेरी मदद कर।"

विनयसिंह की मुखाकृति तेजोमय हो रही थी, आँखें बीरबहूटी बनी हुई थीं। उसे अनुभव हो रहा था कि गरदन पर तलवार मार लेना कितना सरल है। सोफिया ने दोनों हाथों से उसकी कलाई पकड़ ली और अश्रु-पूरित लोचनों से ताकती हुई बोली-"विनय, मुझ पर दया करो!"

उसकी दृष्टि इतनी करुण, इतनी दीन थी कि विनय का हृदय पसीज गया। मुट्ठी ढोली पड़ गई। सोफिया ने तलवार लेकर खूटी पर लटका दी। इतने में कुँवर भरतसिंह आकर खड़े हो गये और विनय को हृदय से लगाते हुए बोले-“तुम तो बिलकुल पहचाने नहीं जाते, मूंछे कितनी बढ़ गई हैं। इतने दुबले क्यों हो? बीमार थे क्या?”

विनय—"जी नहीं, बीमार तो नहीं था। ऐसा दुबला भी नहीं हूँ। अब माताजी के हाथों के पकवान खाकर मोटा हो जाऊँगा।"

कुँवर—"तुम दूर क्यों खड़ी हो सोफिया? आओ, तुम्हें भी प्यार कर लूँ। रोज ही तुम्हारी याद आती थी। विनय बड़ा भाग्यशाली था कि तुम-जैसी रमणी पाई। संसार में तो मिलती नहीं, स्वर्ग की मैं नहीं कहता। अच्छा संयोग है कि तुम दोनों एक ही दिन आये। बेटी, मैं तुमसे विनय की सिफारिश करता हूँ। तुमने इन्हें जो फटकार बताई थी, उसे सुनकर बेचारा नायकराम स्त्रियों से इतना डर गया है कि तय की-कराई ‘सगाई से इनकार कर गया। उम्र-भर स्त्री के लिए तरसता रहा, पर अब नाम भी नहीं
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लेता। कहता है—यह बेवफा जात होती है। भैया विनयसिंह ने जिसके लिए बदनामी सही, जान पर खेले, वही उनसे आँखें फेर ले! कान पकड़े, अब तो मर जाऊँगा, पर ब्याह न करूँगा। अपना हाथ बढ़ाओ विनय! सोफी, यह हाथ लो, तो मुझे इतमीनान हो जाय कि तुम्हारे दिल साफ हो गये। जाह्नवी, चलो, हम लोग बाहर चलें, इन्हें एक दूसरे को मनाने दो। इन्हें कितनी हो शिकायतें करनी होंगी, बातें करने के लिए विकल हो रहे होंगे। आज बड़ा शुभ दिन है।"

जब एकांत हुआ, तो सोफी ने पूछा-"तुम इतनी जल्द कैसे आ गये?"

विनय ने सकुचाते हुए कहा-"सोफ़ी, मुझे यहाँ मुँह छिपाकर बैठते हुए शर्म आती थी। प्राण-भय से दबक जाना कायरों का काम है। माताजी की जो इच्छा हो, वही सही। नायकराम कहता रहा, पहले मिस साहब को आ जाने दो, लेकिन मुझसे न रहा गया।"

सोफिया-"खैर, अच्छा ही हुआ, खूब आ गये। माताजी तुम्हारी चर्चा करके आठ-आठ आँसू रोती थीं। उनका दिल तुम्हारी तरफ से साफ हो गया है।"

विनय-"तुम्हें तो कुछ नहीं कहा?”

सोफिया-"मुझसे तो ऐसा टूटकर गले मिली कि मैं चकित हो गई। यह उन्हीं कठोर वचनों का प्रभाव है, जो मैंने तुम्हें कहे थे। माता आप चाहे पुत्र को कितनी ही ताड़ना दे, यह गवारा नहीं करती कि कोई दूसरा उसे कड़ी निगाह से भी देखे। मेरे अन्याय ने उनकी न्याय-भावना को जाग्रत कर दिया।”

विनय-"हम लोग बड़े शुभ मुहूर्त में चले थे।"

सोफ़िया-"हाँ विनय, अभी तक तो कुशल से बीती। आगे की ईश्वर जाने।"

विनय—"हम अपना दुःख का हिस्सा भोग चुके।"

सोफिया ने आशंकित स्वर से कहा-"ईश्वर करें, ऐसा ही हो।"

किन्तु सोफिया के अंतःस्थल में अनिष्ट-शंका का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था। वह उसे प्रकट न कर सकती थी, पर उसका चित्त उदास था। संभव है कि जन्मगत धार्मिक संस्कारों से विमुख हो जाने का खेद इसका कारण हो। अथवा वह इसे वह अतिवृष्टि समझ रही हो, जो अनावृष्टि की सूचना देती है। कह नहीं सकते, पर जब सोफा रात को भोजन करके सोई, तो उसका चित्त किसी बोझ से दबा हुआ था।