रंगभूमि/४

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रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
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चंचल-प्रकृति बालकों के लिए अंधे विनोद की वस्तु हुआ करते हैं। सूरदास को उनकी निर्दय बाल-क्रीड़ाओं से इतना कष्ट होता था कि वह मुँह-अँधेरे घर से निकल पड़ता, और चिराग जलने के बाद लौटता। जिस दिन उसे जाने में देर होती, उस दिन विपत्ति में पड़ जाता था। सड़क पर, राहगीरों के सामने, उसे कोई शंका न होती थी; किंतु बस्ती की गलियों में पग-पग पर किसी दुर्घटना की शंका बनी रहती थी। कोई उसकी लाठी छीनकर भागता; कोई कहता-"सूरदास, सामने गड्ढा है, बाई तरफ हो जाओ।" सूरदास बायें धूमता, तो गड्ढे में गिर पड़ता। मगर बजरंगी का लड़का घीसू इतना दुष्ट था कि सूरदास को छेड़ने के लिए घड़ी-भर रात रहते ही उठ पड़ता। उसकी लाठी छीनकर भागने में उसे बड़ा आनंद मिलता था।

एक दिन सूर्योदय के पहले सूरदास घर से चले, तो घीसू एक तंग गली में छिपी हुआ खड़ा था। सूरदास को वहाँ पहुँचते ही कुछ शंका हुई। वह खड़ा होकर आहंट लेने लगा। घीसू अब हँसी न रोक सका। झपटकर सूरे का डंडा पकड़ लिया। सूरदास डंडे को मजबूत पकड़े हुए था। घीसू ने पूरी शक्ति से खींचा। हाथ फिसल गया, अपने ही जोर में गिर पड़ा, सिर में चोट लगी, खून निकल आया। उसने खून देखा, तो चीखता-चिल्लाता घर पहुँचा। बजरंगी ने पूछा, क्यों रोता है रे? क्या हुआ? घीसू ने उसे कुछ जवाब न दिया। लड़के खूब जानते कि किस न्यायशाला में उनकी जीत होगी। आकर माँ से बोला-"सूरदास ने मुझे ढकेल दिया।”- माँ ने सिर की चोटी देखी, तो आँखों में खून उतर आया। लड़के का हाथ पकड़े हुए आकर बजरंगी के सामने खड़ी हो गई, और बोली-"अब इस अंधे की सामत आ गई है। लड़के को ऐसा ढकेला कि लहूलुहान हो गया। उसकी इतनी हिम्मत! रुपये का घमंड उतार दूँगी।"

बजरंगी ने शांत भाव से कहा-"इसी ने कुछ छेड़ा होगा, वह बेचारा तो इससे आप अपनी जान छिपाता फिरता है।"

जमुनी-"इसी ने छेड़ा था, तो भी क्या उसे इतनी बेदर्दी से ढकेलना चाहिए था कि सिर फूट जाय! अंधों को सभी लड़के छेड़ते हैं; पर वे सबसे लठियाँव नहीं करते फिरते।"

इतने में सूरदास भी आकर खड़ा हो गया। मुख पर ग्लानि छाई हुई थी। जमुनी लपककर उसके सामने आई, और बिजली की तरह कड़ककर बोली-"क्यों सूरे, साँझ होते ही रोज लुटिया लेकर दूध के लिए सिर पर सवार हो जाते हों, और अभी घिसुंआ ने जरा लाठी पकड़ ली, तो उसे इतनी जोर से धक्का दिया कि सिर फूट गया। जिस पत्तल में खाते हो, उसी में छेद करते हो। क्यों, रुपये का घमंड हो गया है क्या!”

सूरदास-"भगवान् जानते हैं, जो मैंने घीसू को पहचाना हो। समझा, कोई लौंडा होगा, लाठी को मजबूत पकड़ें रहा। घीसू का हाथ फिसल गया, गिर पड़ा। मुझे मालूम
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होता कि घीसू है, तो लाठी उसे दे देता। इतने दिन हो गये, लेकिन कोई कह दे कि मैंने किसी लड़के को झूठमूठ मारा है। तुम्हारा ही दिया खाता हूँ, तुम्हारे ही लड़के को मारूँगा?"

जमुनी—"नहीं, अब तुम्हें घमंड हुआ है। भीख माँगते हो, फिर भी लाज नहीं आती, सबकी बराबरी करने को मरते हो। आज मैं लहू का घूँट पीकर रह गई; नहीं तो जिन हाथों से तुमने उसे ढकेला है, उसमें लूका लगा देती।"

बजरंगी जमुनी को मना कर रहा था, और लोग भी समझा रहे थे, लेकिन वह किसी की न सुनती थी। सूरदास अपराधियों की भाँति सिर झुकाये यह वाग्बाण सह रहा था। मुँह से एक शब्द भी न निकलता था।

भैरो ताड़ी उतारने जा रहा था, रुक गया, और सूरदास पर दो-चार छींटे उड़ा दिये-"जमाना ही ऐसा है, सब रोजगारों से अच्छा भीख माँगना। अभी चार दिन पहले घर में पूँजी भाँग न थी, अब चार पैसे के आदमी हो गये हैं। पैसे होते हैं, तभी घमंड होता है। नहीं क्या घमंड करेंगे हम भोर तुम, जिनकी एक रुपया कमाई है, तो दो खर्च है!"

जगधर औरों से तो भीगी बिल्ली बना रहता था, सूरदास को धिक्कारने के लिए वह भी निकल पड़ा। सूरदास पछता रहा था कि मैंने लाठी क्यों न छोड़ दी, कौन कहे कि दूसरी लकड़ी न मिलती। जगधर और भैरो के कटु वाक्य सुन-सुनकर वह और भी दुखी हो रहा था। अपनी दोनता पर रोना आता था। सहसा मिठुआ भी आ पहुँचा। वह भी शरारत का पुतला था, घीसू से भी दो अंगुल बढ़ा हुआ। जगधर को देखते ही यह सरस पद गा-गाकर चिढ़ाने लगा

लालू का लाल मुँह, जगधर का काला,
जगधर तो हो गया लालू का साला।

भैरो को भी उसने एक स्वरचित पद सुनाया-

भैरो, भैरो, ताड़ी बेच,
या बीबी की साड़ी बेच,

चिड़नेवाले चिढ़ते क्यों हैं, इसकी मीमांसा तो मनोविज्ञान के पंडित ही कर सकते। हमने साधारणतया लोगों को प्रेम और भक्ति के भाव ही से चिढ़ते देखा है। कोई राम या कृष्ण के नामों से इसलिए चिढ़ता है कि लोग उसे चिढ़ाने ही के बहाने से ईश्वर के नाम लें। कोई इसलिए चिढ़ता है कि बाल-वृन्द उसे घेरे रहें। कोई बैंगन या मछली से इसलिए चिढ़ता है कि लोग इन अखाद्य वस्तुओं के प्रति घृणा करें। सारांश यह कि चिढ़ना एक दार्शनिक क्रिया है। इसका उद्देश्य केवल सत्-शिक्षा है। लेकिन भैरो और जगधर में यह भक्तिममी उदारता कहाँ। वे बाल-विनोद का रस लेना क्या जानें। दोनों झल्ला उठे। जगधर मिठुआ को गालियाँ देने लगा, लेकिन भैरो को गालियाँ देने से संतोष न हुआ। उसने लपककर उसे पकड़ लिया। दो-तीन तमाचे जोर-जोर से मारे
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और बड़ी निठुरता से उसके कान पकड़कर खींचने लगा। मिठुआ बिलबिला उठा। सूरदास अब तक दीन भाव से सिर झुकाये खड़ा था। मिठुआ का रोना सुनते ही उसकी त्योरियाँ बदल गई। चेहरा तमतमा उठा। सिर उठाकर फूटी हुई आँखों से ताकता हुआ बोला-"भैरो, भला चाहते हो, तो उसे छोड़ दो, नहीं तो ठीक न होगा। उसने तुम्हें कौन-सी ऐसी गोली मार दी थी कि उसकी जान लिये लेते हो। क्या समझते हो किउसके सिर पर कोई है ही नहीं! जब तक मैं जीता हूँ, कोई उसे तिरछी निगाह से नहीं देख सकता। दिलावरी तो जब देखता कि किसी बड़े आदमी से हाथ मिलाते। इस बालक को पीट लिया, तो कौन-सी बड़ी बहादुरी दिखाई!"

भैरो—"मार को इतनी अखर है, तो इसे रोकते क्यों नहीं? हमको चिढ़ायेगा, तो हम पीटेंगे-एक बार नहीं, हजार बार; तुमको जो करना हो, कर लो।" जगधर-"लड़के को डाँटना तो दूर, ऊपर से और सह देते हो। तुम्हारा दुलारा होगा, दूसरे क्यों............"

सूरदास"चुप भी रहो, आये हो वहाँ से न्याय करने। लड़कों को तो यह बान ही होतो है; पर कोई उन्हें मार नहीं डालता। तुम्हीं लोगों को अगर किसी दूसरे लड़के ने 'चिढ़ाया होता, तो मुँह तक न खोलते। देखता तो हूँ; जिधर से निकलते हो, लड़के तालियाँ बजाकर चिढ़ाते हैं, पर आँखें बंद किये अपनी राह चले जाते हो। जानते हो कि जिन लड़कों के माँ-बाप हैं, उन्हें मारेंगे, तो वे आँखें निकाल लेंगे। केले के लिए ठीकरा भी तेज होता है।"

भैरो—"दूसरे लड़कों की और उसकी बराबरी है? दरोगाजी की गालियाँ खाते हैं, तो क्या डोमड़ों की गालियाँ भी खायें? अभी तो दो ही तमाचे लगाये हैं, फिर चिढ़ाये, ता उठाकर पटक दूँगा, मरे या जिये।"

सूरदास—(मिठू का हाथ पकड़कर) "मिठुआ, चिढ़ा तो, देखूँ, यह क्या करते हैं। आज जो कुछ होना होगा, यहीं हो जायगा।"

लेकिन मिठुआ के गालों में अभी तक जलन हो रही थी, मुँह भी सूज गया था, सिसकियाँ बंद न होती थीं। भैरो का रौद्र रूप देखा, तो रहे-सहे होश भी उड़ गये। जब बहुत बढ़ावे देने पर भी उसका मुँह न खुला, तो सूरदास ने झुंझलाकर कहा-"अच्छा, मैं ही चिढ़ाता हूँ, देखूँ मेरा क्या बना लेते हो!"

यह कहकर उसने लाठी मजबूत पकड़ ली, और बार-बार उसी पद की रट लगाने लगा, मानों कोई बालक अपना सबक याद कर रहा हो-

भैरो, भैरो, ताड़ी बेच,
या बीबी की साड़ी बेच।

एक ही साँस में उसने कई बार यही रट लगाई। भैरो कहाँ तो क्रोध से उन्मत्त हो रहा था, कहाँ सूरदास का यह बाल-हठ देखकर हँस पड़ा। और लोग भी हँसने लगे। अब सूरदास को ज्ञात हुआ कि मैं कितना दीन और बेकस हूँ। मेरे क्रोध का यह सम्मान
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है! मैं सबल होता, तो मेरा क्रोध देखकर ये लोग थर-थर काँपने लगते। नहीं तो खड़े-खड़े हँस रहे हैं, समझते हैं कि हमारा कर ही क्या सकता है। भगवान् ने इतना अपंग न बना दिया होता, तो क्यों यह दुर्गत होती। यह सोचकर हठात् उसे रोना आ गया। बहुत जन्त करने पर भी आँसू रुक सके।

बजरंगी ने भैरो और जगधर दोनों को धिक्कारा-"क्या अंधे से हेकड़ी जताते हो! सरम नहीं आती? एक तो लड़के का तमाचों से मुँह लाल कर दिया, उस पर और गरजते हो। वह भी तो लड़का ही है, गरीब का है, तो क्या? जितना लाड़-प्यार उसका होता है, उतना भले घरों के लड़कों का भी नहीं होता। जैसे और सब लड़के चिढ़ाते हैं, वह भी चिढ़ाता है। इसमें इतना बिगड़ने की क्या बात है। (जमुनी की ओर देखकर) यह सब तेरे कारण हुआ। अपने लौंडे को डाँटती नहीं, बेचारे अंधे पर गुस्सा उतारने चली है।"

जमुनी सूरदास का रोना देखकर सहम जानती थी, दीन की हाय कितनी मोटी होती है। लजित होकर बोली-"मैं क्या जानती थी कि जरा-सी बात का इतना बखेड़ा हो जायगा। आ बेटा मिट्ठू, चल, बछवा पकड़ ले, तो दूध दुहूँ।”

दुलारे लड़के तिनके की मार भी नहीं सह सकते। मिट्ठू दूध की पुचकार से भी शांत न हुआ, तो जमुनी ने आकर उसके आँसू पोंछे, और गोद में उठाकर घर ले गई। उसे क्रोध जल्द आता था; पर जल्द ही पिघल भी जाती थी।

मिट्ठू तो उधर गया, भैरो और जगधर भी अपनी-अपनी राह चले; पर सूरदास सड़क की ओर न गया। अपनी झोपड़ी में जाकर अपनी बेकसी पर रोने लगा। अपने अंधेपन पर आज उसे जितना दुःख हो रहा था, उतना और कभी न हुआ था। सोचा, मेरी यह दुर्गत इसीलिए न है कि अंधा हूँ, भीख माँगता हूँ। मसक्कत की कमाई खाता होता, तो मैं भी गरदन उठाकर न चलता, मेरा भी आदर-मान होता; क्यों चिउँटी की भाँति पैरों के नीचे मसला जाता। आज भगवान् ने अपंग न बना दिया होता, तो क्या दोनों आदमी लड़के को मारकर हँसते हुए चले जाते, एक-एक की गरदन मरोड़ देता। बजरंगी से क्यों नहीं कोई बोलता। घिसुआ ने भैरो की ताड़ी का मटका फोड़ दिया था, कई रुपये का नुकसान हुआ लेकिन भैरों ने चूँ तक न की। जगधर को उसके मारे घर से निकलना मुश्किल है। अभी दस-ही-पाँच दिनों की बात है, उसका खोंचा उलट दिया था। जगधर ने जूं तक न की। जानते हैं न कि जरा भी गरम हुए कि बजरंगी ने गरदन पकड़ी। न जाने उस जनम में ऐसे कौन-से अपराध किये थे, जिसकी यह सजा मिल रही है। लेकिन भीख न माँगूँ, तो खाऊँ क्या? और फिर जिंदगी पेट ही पालने के लिए थोड़े ही है। कुछ आगे के लिए भी तो करना है। नहीं, इस जनम में तो अंधा हूँ ही, उस जनम में इससे भी बड़ी दुर्दशा होगी। पितरों का रिन सिर सवार है, गयाजी में उनका सराध न किया, तो वे भी क्या समझेंगे कि मेरे बंस में कोई है। मेरे साथ तो कुल का अंत ही है। मैं यह रिन न चुकाऊँगा, तो और कौन
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लड़का बैठा हुआ है, जो चुका देगा। कौन उद्दम करूँ? किसी बड़े आदमी के घर पंखा खींच सकता हूँ, लेकिन यह काम भी तो साल में चार ही महीने रहता है, बाकी आठ महीने क्या करूँगा? सुनता हूँ, अंधे कुर्सी, माढ़े, दरी, टाट बुन सकते हैं, पर यह काम किससे सीखूँ? कुछ भी हो, अब भीख न माँगूँगा।

चारों ओर से निराश होकर सूरदास के मन में विचार आया कि इस जमीन को क्यों न बेच दूँ। इसके सिवा अब मुझे और कोई सहारा नहीं है। कहाँ तक बाप-दादों के नाम को रोऊँ। साहब उसे लेने को मुँह फैलाये हुए हैं। दाम भीअ च्छा दे रहे हैं। उन्हीं को दे दूँ। चार-पाँच हजार बहुत होते हैं। अपने घर सेठ की तरह बैठा हुआ चैन की बंसी बजाऊँगा। चार आदमी घेरे रहेंगे, मुहल्ले में अपना मान होने लगेगा। ये ही लोग, जो आज मुझ पर रोब जमा रहे हैं, मेरा मुँह जोहेंगे, मेरी खुशामद करेंगे। यही न होगा, मुहल्ले की गउएँ मारी-मारी फिरेंगी फिरें, इसको मैं क्या करूँ। जब तक निभ सका, निभाया। अब नहीं निभता, तो क्या करूँ। जिनकी गायें चरती हैं, कौन मेरी बात पूछते हैं। आज कोई मेरी पीठ पर खड़ा हो जाता, तो भैरो मुझे रुलाकर यो मूछों पर ताव देता हुआ न चला जाता। जब इतना भी नहीं है, तो मुझे क्या पड़ी है कि दूसरों के लिए मरूँ। जी से जहान है; जब आबरू ही न रही, तो जीने पर धिक्कार है।

मन में यह विचार स्थिर करके सूरदास अपनी झोपड़ी से निकला, और लाठी टेकता हुआ गोदाम की तरफ चला। गोदाम के सामने पहुँचा, तो दयागिर से भेंट हो गई। उन्होंने पूछा- "इधर कहाँ चले सूरदास? तुम्हारी जगह तो पीछे छूट गई।"

सूरदास—"जरा इन्हीं मियाँ साहब से कुछ बातचीत करनी है।"

दयागिर—"क्या इसी जमीन के बारे में?"

सूरदास—“हाँ, मेरा विचार है कि यह जमीन बेचकर कहीं तीर्थयात्रा कस्ने चला जाऊँ। इस मुहल्ले में अब निबाह नहीं है।"

दयागिर---"सुना, आज भैरो तुम्हें मारने की धमकी दे रहा था।"

सूरदास—"मैं तरह न दे जाता, तो उसने मार ही दिया था। सारा मुहल्ला बैठा हँसता रहा, किसी की जबान न खुली की अंधे-अपाहिज आदमी पर यह कुन्याव क्यों करते हो। तो जब मेरा कोई हितू नहीं है, तो मैं क्यों दूसरों के लिए मरूँ?"

दयागिर—"नहीं सूरे, मैं तुम्हें जमीन बेचने की सलाह न दूँगा। धर्म का फल इसा जीवन में नहीं मिलता। हमें आँखें बंद करके नारायन पर भरोसा रखते हुए धर्म-मार्ग पर चलते रहना चाहिए। सच पूछो, तो आज भगवान् ने तुम्हारे धर्म की परीक्षा की है। संकट ही में धीरज और धर्म की परीक्षा होती है। देखो, गुसाईजी ने कहा है—

'भापति-काल परखिए चारी; धीरम, धर्म, मित्र अरु नारी।'

जमीन पड़ी है, पड़ी रहने दो। गउएँ चरती हैं, यह कितना बड़ा पुण्य है। कौन जानता है, कभी कोई दानी, धर्मात्मा आदमी मिल जाय, धर्मशाला, कुआँ, मंदिर बनवा दे, तो
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मरने पर भी तुम्हारा नाम अमर हो आयगा। रही तीर्थ यात्रा, उसके लिए रुपये की जरूरत नहीं। साधु-संत जन्म-भर यही किया करते हैं; पर घर से रुपयों की थैली बाँध कर नहीं चलते। मैं भी शिवरात्रि के बाद बद्रीनारायन जानेवाला हूँ। हमारा-तुम्हारा साथ हो जायगा। रास्ते में तुम्हारी एक कौड़ी न खर्च होगी, इसका मेरा जिम्मा है।"

सूरदास-"नहीं बाबा, अब यह कुन्याव नहीं सहा जाता। भाग्य में धर्म करना नहीं लिखा हुआ है, तो कैसे धर्म करूँगा। जरा इन लोगों को भी तो मालूम हो जाय कि सूरे भी कुछ है।"

दयागिर-"सूरे, आँखें बंद होने पर भी कुछ नहीं सूझता? यह अहंकार है, इसे मिटाओ। नहीं तो यह जन्म भी नष्ट हो जायगा। यही अहंकार सब पापों का मूल है-

मैं अरु मोर तोर तैं माया, जेहि बस कीन्हें जीव निकाया।'

न यहाँ तुम हो, न तुम्हारी भूमि है; न तुम्हारा कोई मित्र है, न शत्रु है; जहाँ देखो, भगवान्-ही-भगवान् हैं-

'ज्ञान-मान जह एकौ नाही, देखत ब्रह्म रूप सब माहीं।'

इन झगड़ों में न पड़ो।"

सूरदास-“बाबाजी, जब तक भगवान् की दया न होगी, भक्ति और वैराग, किसी पर मन न जमेगा। इस घड़ी मेरा हृदय रो रहा है, उसमें उपदेश और ज्ञान की बातें नहीं पहुँच सकतीं। गीली लकड़ी खराद पर नहीं चढ़ती।"

दयागिर-"पछताओगे और क्या।"

यह कहकर दयागिर अपनी राह चले गये। वह नित्य गंगा-स्नान को जाया करते थे।

उनके जाने के बाद सूरदास ने मन में कहा-यह भी मुझी को ज्ञान का उपदेश करते हैं। दीनों पर उपदेश का भी दाँव चलता है, मोटों को कोई उपदेश नहीं करता। वहाँ तो जाकर ठकुरसुहाती करने लगते हैं। मुझे ज्ञान सिखाने चले हैं। दोनों जून भोजन "मिल जाता है न! एक दिन न मिले, तो सारा ज्ञान निकल जाय।

वेग से चलती हुई गाड़ी रुकावटों को फाँद जाती है। सूरदास समझाने से और भी जिद पकड़ गया। सीधे गोदाम के बरामदे में जाकर रुका। इस समय वहाँ बहुत-से चमार जमा थे। खालों की खरीद हो रही थी। चौधरी ने कहा-"आओ सूरदास, कैसे चले?"

सूरदास इतने आदमियों के सामने अपनी इच्छा न प्रकट कर सका। संकोच ने उसकी जबान बन्द कर दी। बोला-"कुछ नहीं, ऐसे ही चला आया।"

ताहिर-“साहब इनसे पीछेवाली जमीन माँगते हैं, मुँह माँगे दाम देने पर तैयार हैं; पर यह किसी तरह राजी नहीं होते। उन्होंने खुद समझाया, मैंने कितनी मिन्नत की लेकिन इनके दिल में कोई बात जमती ही नहीं।"

लजा अत्यन्त निर्लज होती है। अंतिम काल में भी, जब हम समझते हैं कि उसकी उलटी सॉसें चल रही हैं, वह सहसा चैतन्य हो जाती है, और पहले से भी अधिक कर्तव्यशील हो जाती है। हम दुरवस्था में पड़कर किसी मित्र से सहायता की याचना
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करने को घर से निकलते हैं, लेकिन मित्र से आँखें चार होते ही लज्जा हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती है, और हम इधर-उधर की बातें करके लौट आते हैं। यहाँ तक कि हम एक शब्द भी ऐसा मुँह से नहीं निकलने देते, जिसका भाव हमारी अंतर्वेदना का द्योतक हो।

ताहिरअली की बातें सुनते ही सूरदास की लज्जा ठट्ठा मारतो हुई बाहर निकल आई। बोला-"मियाँ साहब, वह जमीन तो बाप-दादों की निसानी है, भला मैं उसे बय या पट्टा कैसे कर सकता हूँ। मैंने उसे धरम-काज के लिए संकल्प कर दिया है।"

ताहिर—“धरम-काज बिना रुपये के कैसे होगा? जब रुपये मिलेंगे, तभी तो तोरथ करोगे, साधु-संतों की सेवा करोगे; मंदिर-कुआँ बनवाओगे।"

चौधरी—"सूरे, इस बखत अच्छे दाम मिलेंगे। हमारी सलाह तो यही है कि दे दो, तुम्हारा कोई उपकार तो उससे होता नहीं।"

सूरदास—"मुहल्ले-भर की गउएँ चरती हैं, क्या इससे पुन्न नहीं होता! गऊ की सेवा से बढ़कर और कौन पुन्न का काम है?"

ताहिर—“अपना पेट पालने के लिए तो भीख माँगते फिरते हो, चले हो दूसरों के साथ पुन्न करने। जिनकी गायें चरती हैं, वे तो तुम्हारी बात भी नहीं पूछते, एहसान मानना तो दूर रहा। इसी धरम के पीछे तुम्हारी यह दशा हो रही है, नहीं तो ठोकरें न खाते फिरते।”

ताहिरअली खुद बड़े दीनदार आदमी थे; पर अन्य धर्मों की अवहेलना करने में उन्हें संकोच न होता था। वारतव में वह इस्लाम के सिवा और किसी धर्म को धर्म ही नहीं समझते थे।

सूरदास ने उत्तेजित होकर कहा—"मियाँ साहब, धरम एहसान के लिए नहीं किया जाता। नेकी करके दरिया में डाल देना चाहिए।"

ताहिर—"पछताओगे और क्या। साहब से जो कुछ कहोंगे, वही करेंगे। तुम्हारे लिए घर बनवा देंगे, माहवार गुजारा देंगे, मिठुआ को किसी मदरसे में पढ़ने को भेज। देंगे, उसे नौकर रखा देंगे, तुम्हारी आँखों की दवा करा देंगे, मुमकिन है, सूझने लगे। आदमी बन जाओगे। नहीं तो धक्के खाते रहोगे।”

सूरदास पर और किसी प्रलोभन का असर तो न हुआ; हाँ, दृष्टि-लाभ की संभावना ने जरा नरम कर दिया। बोला—"क्या जनम के अंधों की दवा भी हो सकती है?"

ताहिर—"तुम जनम के अंधे हो क्या? तब तो मजबूरी है। लेकिन वह तुम्हारे आराम के इतने सामान जमा कर देंगे कि कि तुम्हें आँखों की जरूरत ही न रहेगी।"

सूरदास—"साहब, बड़ी नामूसी होगी। लोग चारों ओर से धिक्कारने लगेंगे।"

चौधरी—"तुम्हारी जायदाद है, बय करो, चाहे पट्टा लिखो, किसी दूसरे को दखल देने का क्या मजाज है!"

सूरदास—“बाप-दादों का नाम तो नहीं डुबाया जाता।" [ ६६ ]
मूखों के पास युक्तियाँ नहीं होती, युक्तियों का उत्तर वे हठ से देते हैं। युक्ति कायल हो सकती है, नरम हो सकती है, भ्रांत हो सकती है; हठ को कौन कायल करेगा?

सूरदास की जिद से ताहिरअली को क्रोध आ गया। बोले—"तुम्हारी तकदीर में भीख माँगना लिखा है, तो कोई क्या कर सकता। इन बड़े आदमियों से अभी पाल नहीं पड़ा है। अभी खुशामद कर रहे हैं, मुआवजा देने पर तैयार हैं, लेकिन तुम्हारा "मिजाज नहीं मिलता, और यही जब कानूनी दाँव-पेंच खेलकर जमीन पर कजा कर लेंगे, दो-चार सौ रुपये बरायनाम मुआवजा दे देंगे, तो सीधे हो जाओगे। मुहल्लेवालों पर भूले बैठे हो। पर देख लेना, जो कोई पास भी फटके। साहब यह जमीन लेंगे जरूर, चाहे खुशी से दो, चाहे रोकर।”

सूरदास ने गर्व से उत्तर दिया—“खाँ साहब, अगर जमीन जायगी, तो इसके साथ मेरी जान भी जायगी।”

यह कहकर उसने लकड़ी सँभाली, और अपने अड्ड पर आ बैठा।

उधर दयागिर ने जाकर नायकराम से यह समाचार कहा। बजरंगी भी बैठा था। यह खबर सुनते ही दोनों के होश उड़ गये। सूरदास के बल पर दोनों उछलते रहे, उस दिन ताहिरअली से कैसी बातें की, और आज सूरदास ही ने धोका दिया। बजरंगी ने चतित होकर कहा—"अब क्या करना होगा पण्डाजी, बताओ?"

नायकराम—“करना क्या होगा, जैसा किया है, वैसा भोगना होगा। जाकर अपनी घरवाली से पूछो। उसी ने आज आग लगाई थी। जानते तो हो कि सूरे मिठुआ पर जान देता है, फिर क्यों भैरो की मरम्मत नहीं की। मैं होता, तो कभी भैरो को दो-चार खरी-खोटी सुनाये बिना न जाने देता, और नहीं तो दिखाने के लिए सहो। उस बेचारे को भी मालूम हो जाता कि मेरी पीठ पर है कोई। आज उसे बड़ा रंज हुआ है। नहीं तो जमीन बेचने का कभी उसे ध्यान ही न आया था।”

बजरंगी—"अरे, तो अब कोई उपाय निकालोगे, या बैठकर पिछली बातों के नाम को रोयें!"

नायकराम—“उपाय यही है कि आज सूरे आये, तो चलकर उसके पैरों पर गिरो, उसे दिलासा दो, जैसे राजी हो, वैसे राजी करो, दादा-भैया करो, मान जाय तो अच्छा, नहीं तो साहब से लड़ने के लिए तैयार हो जाओ, उनका कब्जा न होने दो, जो कोई जमीन के पास आये, मारकर भगा दो। मैंने तो यही सोच रखा है। आज सूरे को अपने हाथ से बनाके दूधिया पिलाऊँगा, और मिठुआ को भर-नेट मिठाइयाँ खिलाऊँगा। जब न मानेगा, तो देखी जायगी।"

बजरंगी—"जरा मियाँ साहब के पास क्यों नहीं चले चलते? सूरदास ने उससे न जाने क्या-क्या बातें की हों। कहीं लिखा-पढ़ी कराने को कह आया हो, तो फिर चाहे कितनी ही आरजू-बिनती करोगे, कभी अपनी बात न पलटेगा।" [ ६७ ]नायकराम—"मैं उस मुंसी के द्वार पर न जाऊँगा। उसका मिजाज और भी आस-मान पर चढ़ जायगा।"

बजरंगी--"नहीं पण्डाजी, मेरी खातिर से जरा चले चलो।"

नायकराम आखिर राजी हुए। दोनों आदमी ताहिरअली के पास पहुँचे। वहाँ इस वक्त सन्नाटा था। खरीद का काम हो चुका था। चमार चले गये थे। ताहिरअली अकेले बैठे हुए हिसाब-किताब लिख रहे थे। मीजान में कुछ फर्क पड़ता था। बार-बार जोड़ते थे; पर भूल पर निगाह न पहुँचती थी। सहसा नायकराम ने कहा--"कहिए मुंसीजी, आज सूरे से क्या बातचीत हुई?"

ताहिर—'अहा, आइए पण्डाजी, मुआफ कीजिएगा, मैं जरा मीजान लगाने में मस- रूप था, इस मोड़े पर बैठिए। सूरे से कोई बात तय न होगी। उसकी तो शामतें आई हैं। आज तो धमकी देकर गया है कि जमीन के साथ मेरी जान भी जायगी। गरीब आदमी है, मुझे उस पर तरस आता है। आखिर यही होगा कि साहब किसी कानून की रू से जमीन पर काबिज हो जायँगे। कुछ मुआवजा मिला, तो मिला, नहीं तो उसकी भी उम्मीद नहीं।"

नायकराम—"जब सूरे राजी नहीं है, तो साहब क्या खाके यह जमीन ले लेंगे! देख बजरंगी, हुई न वही बात, सूरे ऐसा कच्चा आदमी नहीं है।”

ताहिर—“साहब को अभी आप जानते नहीं हैं।”

नायकराम—"मैं साहब और साहब के बाप, दोनों को अच्छी तरह जानता हूँ। हाकिमों की खुशामद की बदौलत आज बड़े आदमी बने फिरते हैं।”

ताहिर—"खुशामद ही का तो आजकल जमाना है। वह अब इस जमीन को लिये वगैर न मानेंगे।"

नायकराम—"तो इधर भी यही तय है कि जमीन पर किसी का कब्जा न होने देंगे, चाहे जान जाय। इसके लिए मर मिटेंगे। हमारे हजारां यात्री आते हैं। इसी खेत में सबको टिका देता हूँ। जमीन निकल गई, तो क्या यात्रियों को अपने सिर पर ठहराऊँगा? आप साहब से कह दीजिएगा, यहाँ उनकी दाल न गलेगी। यहाँ भो कुछ दम रखते हैं। बारहों मास खुले-खजाने जुआ खेलते हैं। एक दिन में हजारों के वारे-न्यारे हो जाते हैं। थानेदार से लेकर सुपरोडंट तक जानते हैं, पर मजाल क्या कि कोई दौड़ लेकर आये। खून तक छिपा डाले हैं।”

ताहिर—"तो" आप ये सब बातें मुझसे क्यों कहते हैं, क्या मैं जानता नहीं हूँ? आपन सैयद रजाअली थानेदार का नाम तो सुना ही होगा, मैं उन्हीं का लड़का हूँ। यहाँ कान पण्डा है, जिसे मैं नहीं जानता।”

नायकराम—"लीजिए, घर ही बैद, तो मरिए क्यों। फिर तो आप अपने घर ही के आदमी हैं। दरोगाजी की तरह भला क्या कोई अफसर होगा। कहते थे, बेटा, जो चाहे करो, 'लेकिन मेरे पंजे में न आना।' मेरे द्वार पर फड़ जमती थी, वह कुर्सी पर
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देखा करते थे। बिलकुल घराँव हो गया था। कोई बात बनी-बिगड़ी, जाके सारी कथा सुना देता था। पीठ पर हाथ फेरकर कहते--'बस जाओ, अब हम देख लेंगे। ऐसे आदमी अब कहाँ। सतजुगी लोग थे। आप तो अपने भाई ही ठहरे, साहब को धता क्यों नहीं बताते? आपको भगवान् ने विद्या-बुद्धि दी है, बीसों बहाने निकाल सकते हैं। बरसात में पानी जमता है, दीमक बहुत, लोनी लगेगी, ऐसे ही और कितने बहाने हैं।"

ताहिर-"पण्डाजी, जब आपसे भाईचारा हो गया, तो क्या परदा है। साहब पल्ले सिरे का घाघ है। हाकिमों से उसका बड़ा मेल-जोल है। मुपत में जमीन ले लेगा। सूरे को तो चाहे सौ-दो-सौ मिल भी रहे, मेरा इनाम-इकराम गायब हो जायगा। आप सूरे से मुआमला तय करा दीजिए, तो उसका भी फायदा हो, मेरा भी फायदा हो, और आपका भी फायदा हो।"

नायकराम-"आपको वहाँ से जो इनाम-इकराम मिलनेवाला हो, वह हमी लोगों से ले लीजिए। इसी बहाने कुछ आपकी खिदमत करेंगे। मैं तो दारोगाजी को जैसा समझता था, वैसा ही आपको समझता हूँ।"

ताहिर-"मुआजल्लाह, पण्डाजी, ऐसी बात न कहिए। मैं मालिक की निगाह बचा कर एक कौड़ी लेना भी हराम समझता हूँ। वह अपनी खुशी से जो कुछ दे देंगे, हाथ फैलाकर ले लूँगा; पर उनसे छिपाकर नहीं। खुदा उस रास्ते से बचाये। वालिद ने इतना कमाया, पर मरते वक्त घर में एक कौड़ी कफन को भी न थी।"

नायकराम-"अरे यार, मैं तुम्हें रुसवत थोड़े ही देने को कहता हूँ। जब हमारा-आपका भाईचारा हो गया, तो हमारा काम आपसे निकलेगा, आपका काम हमसे। यह कोई रुसवत नहीं।"

ताहिर-"नहीं पण्डाजी, खुदा मेरी नीयत को पाक रखे, मुझसे नमकहरामी न होगी। मैं जिस हाल में हूँ, उसी में खुश हूँ। जब उसके करम की निगाह होगी, तो मेरी भलाई की कोई सूरत निकल ही आयेगो।”

नायकराम-"सुनते हो बजरंगी, दरोगाजी की बातें? चलो, चुपके से घर बैठो, जो कुछ आगे आएगी, देखी, जायगी। अब तो साहब ही से निबटना है।”

बजरंगी के विचार में नायकराम ने उतनो मिन्नत-समाजत न की थी, जितनी करनी चाहिए थी। आये थे अपना काम निकालने कि हेकड़ी दिखाने। दोनता से जो काम निकल जाता है, वह डींग मारने से नहीं निकलता। नायकराम ने तो लाठो कंधे पर रखो, और चले। बजरंगो ने कहा-“मैं जरा गोरुओं को देखने जाता हूँ, उधर से होता हुआ आऊँगा।” यो बड़ा अक्खड़ आदमी था, नाक पर मक्खो न बैठने देता। सारा मुहल्ला उसके क्रोध से काँपता था, लेकिन कानूनी काररवाइयों से डरता था। पुलीस और अदालत के नाम ही से उसके प्राण सूख जाते थे। नायकराम को नित्य ही अदालत से काम रहता था, वह इस विषय में अभ्यस्त थे। बजरंगी को अपनी जिंदगी में कभी
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गवाही देने की भी नौबत न आई थी। नायकराम के चले आने के बाद ताहिरअली भी घर गये; पर बजरंगी वहीं आस-पास टहलता रहा कि वह बाहर निकलें, तो अपना दुखड़ा सुनाऊँ।

ताहिरअली के पिता पुलिस विभाग में कांस्टेबिल से थानेदारी के पद तक पहुँचे थे। मरते समय कोई जायदाद तो न छोड़ी, यहाँ तक कि उनको अंतिम क्रिया कर्ज से की गई; लेकिन ताहिरअल्ली के सिर पर दो विधवाओं और उनकी संतानों का भार छोड़ गये। उन्होंने तीन शादियाँ की थीं। पहली स्त्री से ताहिरअली थे, दूसरी से माहिरअली और जाहिरअली, और तीसरी से जाविरअली। ताहिरअली धैर्यशील और विवेकी मनुष्य थे। पिता का देहांत होने पर साठ-भर तक ता रोजगार की तलाश में मारे मारे फिरे। कहीं मवेशीखाने को सुइर्रिरी मिल गई, कहीं किसी दवा बेचनेवाले के एजेंट हो गये, कहीं चुंगी-घर के मुंसी का पद मिल गया। इधर कुछ समय से मिटर जॉन सेवक के यहाँ स्थायी रूप से नौकर हो गये थे। उनके आचार-विचार अपने पिता से बिलकुल निराले थे। रोजा-नमाज के पावंद और नीयत के साफ थे। हराम की कमाई से कोसों भागते थे। उनकी माँ तो मर चुकी थी; पर दोनों विमाताएँ जीवित थी। विवाह भी हो चुका था; स्त्री के अतिरिक्त एक लड़का था-साविरअकी, और एक लड़की-नसीमा। इतना बड़ा कुटुंब था, और ३०) मासिक आय! इम महँगी के समय में, जब कि इससे पचगुनी आमदनी में सुचारु रूप से निर्वाह नहीं होता, उन्हें बहुत कष्ट झेलन पड़ते थे; पर नीयत खोटी न होता थी। ईश्वर-भीरुता उनके चरित्र का प्रधान गुण थी। घर में पहुँचे, तो माहिरअली बैठा पढ़ रहा था जाहिर ओर जागिर मिठाई के लिए रो रहे थे, आर साबिर अंगन में उछल-उछलकर बाजरे की रोटियाँ खा रहा था। ताहिरअली तख्त पर बैठ गये, और दोनों छोटे भाइयों को गोद में उठाकर चुप कराने लगे। उनकी बड़ी घिमाता ने, जिनका नाम जैनब था, द्वार पर खड़ा होकर नायकराम और बजरंगी की बातें सुनी थी। बजरंगी दस ही पाँच कदम चला था कि माहिरअली न पुकारा-"सुनोजी, आ आदमी! जरा यहाँ आना, तुम्हे अम्माँ बुला रही हैं।”

बजरंगी लौट पड़ा, कुछ आस बँधी। आकर फिर बरामदे में खड़ा हो गया। जैनत्र टाट के परदे की आड़ में खड़ी थीं, पूछा- क्या बात थी जी?"

बजरंगी-"वही जमीन की बात बीत थी। साहब इसे लेने को कहते हैं। हमार, गुजर-बसर इसी जमोन से होता है। मुंसीजी से कह रहा हूँ, किसी तरह इस झगड़े को मिटा दीजिए। नजर-नियाज दने को भी तैयार हूँ, मुदा मुंसीजी सुनते ही नहीं।"

जैनब-"सुनेंगे क्यों नहीं, सुनेंगे न तो गरीबों की हाय किस पर पड़ेगी? तुम भतो गँवार आदमी हो, उनसे क्या कहने गये? ऐसी बातें मरदों से कहने की थोड़ी ही होती हैं। हमसे कहते, हम तय करा देते।”

जाबिर की माँ का नाम था रकिया। वह भी आकर खड़ी हो गई। दोनों महिलाएँ साये की तरह साथ-साथ रहती था। दोनों के भाव एक, दिल एक, विचार एक, सौतिन

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का जलापा नाम को न था। बहनों का-सा प्रेम था। बोली—“और क्या, भला ऐसी बातें मरदों से की जाती हैं?”

बजरंगी—“माताजी, मैं गँवार आदमी, इसका हाल क्या जानूँ। अब आप ही तय करा दीजिए। गरीब आदमी हूँ, बाल-बच्चे जियेंगे।"

जैनब—“सच-सच कहना, यह मुआमला दब जाय, तो कहाँ तक दोगे?"

बजरंगी—"बेगम साहब, ५०) तक देने को तैयार हूँ।"

जैनब—"तुम भी गजब करते हो। ५०) ही में इतना बड़ा काम निकालना चाहते हो?”

रकिया—(धीरे से ) "वहन, कहीं बिदक न जाय।”

बजरंगी—"क्या करूँ, बेगम साहब, गरीब आदमी हूँ। लड़की को दूध-दही जो कुछ हुकुम होगा, खिलाता रहूँगा; लेकिन नगद तो इससे ज्यादा मेरा किया न होगा।"

रकिया—"अच्छा, तो रुपयों का इंतजाम करो। खुदा ने चाहा, तो सब तय हो जायगा।"

जैनव—(धीरे से) "रकिया, तुम्हारी जल्दबाजी से मैं आजिज हूँ।"

बजरंगी—"मांजी, यह काम हो गया, तो सारा मुहल्ला आपका जस गायगा।"

जैनब—"मगर तुम तो ५०) से आगे बढ़ने का नाम ही नहीं लेते। इतने तो साहब ही दे देंगे, फिर गुनाह बेलज्जत क्यों किया जाय।”

बजरंगी—माँजी, आपसे बाहर थोड़े ही हूँ। दस-पाँच रुपये और जुटा दूँगा।"

जैनव--"तो कब तक रुपये आ जायँगे?"

बजरंगी—"बस, दो दिन की मोहन्त मिल जाय। तब तक मुंसीजी से कह दीजिए, साहब से कहें सुनें।”

जैनव---"वाह महतो, तुम तो बड़े होशियार निकले। सेंत ही में काम निकालना चाहते हो। पहले रुपये लाओ, फिर तुम्हारा काम न हो, तो हमारा जिम्मा।”

बजरंगी दूसरे दिन आने का वादा करके खुश-खुश चला गया, तो जैनब ने रकिया से कहा—"तुम बेसब्र हो जाती हो। अभी चमारों से दो पैसे फी खाल लेने पर तैयार हो गई। मैं दो आने लेती, और वे खुशी से देते। यही अहीर पूरे सौ गिनकर जाता। देखत्री से गरजमंद चौकन्ना हो जाता है। समझता है, शायद हमें बेवकूफ बना रही है। जितनी ही देर लगाओ, जितनी बेरुखी से काम लो, उतना ही एतबार बढ़ता है।"

रकिया—"क्या करूँ बहन, मैं डरती हूँ कि कहीं बहुत सख्ती से निशाना खता न कर जाय।”

जैनव—"वह अहीर रुपये जरूर लायेगा। ताहिर को आज ही से भरना शुरू कर दो। बस, अजाब का खौफ दिलाना चाहिए। उन्हें हत्थे चढ़ाने का यही ढंग है।"

रकिया—"और कहीं साहब न मानें, तो?"

जैनव—"तो कौन हमारे ऊपर कोई नालिश करने जाता है!" [ ७१ ]
ताहिरअली खाना खाकर लेटे थे कि जैनब ने जाकर कहा-"साहब दूसरों की जमीन क्यों लिये लेते हैं? बेचारे रोते फिरते हैं।”

ताहिर-"मुफ्त थोड़े ही लेना चाहते हैं। उसका माकूल मुआवजा देने पर तैयार हैं।"

जैनब-'यह तो गरीबों पर जुल्म है।"

रकिया—“जुल्म ही नहीं है, अजाब है। भैया, तुम साहब से साफ-साफ कह दो, सुझे इस अजाब में न डालिए। खुदा ने मेरे आगे भी बाल-बच्चे दिये हैं; न जाने कैसी पड़े, कैसी न पड़े; मैं यह अजाब सिर पर न लूँगा।"

जैनब - "गगार तो हैं ही, तुम्हारे ही सिर हो जायें। तुम्हें साफ कह देना चाहिए कि मैं मुहल्ले बालों से दुश्मनी मोल न लूँगा, जान-जोखिम की बात है।"

रकिया-"जान-जोखिम तो है ही, ये गवार किसी के नहीं होते।"

ताहिर--"क्या आपने भी कुछ अफवाह सुनी है?”

रकिया—'हाँ, ये सब चमार आपस में बातें करते जा रहे थे कि साहब ने जमीन ली, तो खून की नदी बह जायगी। मैंने तो जब से सुना है, होश उड़े हुर है।"

जैनब--"होश उड़ने की बात ही है।”

ताहिर--"मुझे सब नाहक बदनाम कर रहे हैं। मैं लेने में न देने में! साहब ने उस अंधे से जमीन की निस्बत बातचीत करने का हुक्म दिया था। मैंने हुक्म की तामील की जो मेरा फर्ज था, लेकिन ये अहमक यही समझ रहे हैं कि मैंने ही साहब को इस जमोन की खरीदारी पर आमादा किया है, हालाँकि खुदा जानता है, मैंने कभी उनसे इसका जिक ही नहीं किया।”

जैनब-"मुझे बदनामी का खौफ तो नहीं है; हाँ, खुदा के कहर से डरती हूँ। बेकसों की आह क्यों सिर पर लो।"

ताहिर--मेरे ऊपर क्या अजाय पड़ने लगा?"

जैनब-"और किसके ऊपर पड़ेगा बेटा? यहाँ तो तुम्ही हो, साहब तो नहीं बैठे हैं। वह तो भुस में आग लगाकर दूर से तमाशा देखेंगे, आई-गई तो तुम्हारे सिर जायगी। इस पर कब्जा तुम्हें करना पड़ेगा। मुकदमे चलेंगे, तो पैरवी तुम्हें करनी पड़ेगी। ना भैया, मैं इस आग में नहीं कुदना चाहती।”

रकिया--"मेरे मैके में एक कारिन्दे ने किसी काश्तकार की जमीन निकाल ली थी। दूसरे ही दिन जवान बेटा उठ गया। किया उसने जमींदार ही के हुक्म से, मगर बला आई उस गरीब के सिर। दौलतबालों पर अजाब भी नहीं पड़ता। उसका वार भी गरीबों ही पर पड़ता है। हमारे बच्चे रोज ही नजर और आसेब की चपेट में आते रहते हैं; पर आज तक कभी नहीं सुना कि किसी अँगरेज के बच्चे को नजर लगी हो। उन पर बलैयात का असर ही नहीं होता।”

यह पते की बात थी। ताहिरअली को भी इसका तजुर्बा था। उनके घर के सभी
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बच्चे गण्डों और ताबीजों से मढ़े हुए थे, उस पर भी आये-दिन झाड़-फूँक और राई-जोन की जरूरत पड़ा ही करती थी।

धर्म का मुख्य स्तंभ भय है। अनिष्ट की शंका को दूर कर दीजिए, फिर तीर्थ यात्रा, पूजा-पाठ, स्नान-ध्यान, रोजा-नमाज, किसी का निशान भी न रहेगा। मसजिदें खाली नजर आयेंगी, और मंदिर वीरान!

ताहिरअली को भय ने परास्त कर दिया। स्वामिभक्ति और कर्तव्य-पालन का भाव ईश्वरीय कोप का प्रतिकार न कर सका।