रंगभूमि/७

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रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
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संध्या हो गई थी। किंतु फागुन लगने पर भी सरदी के मारे हाथ-पाँव अकड़ते थे। ठंडी हवा के झोंके शरीर की हड्डियों में चुभे जाते थे। जाड़ा, इंद्र की मदद पाकर, फिर अपनी बिखरी हुई शक्तियों का संचय कर रहा था, और प्राण-पण से समय-चक्र को पलट देना चाहता था। बादल भी थे, बूंदें भी थीं, ठंडी हवा भी थी, कुहरा भी था। इतनी विभिन्न शक्तियों के मुकाबिले में ऋतुराज की एक न चलती थी। लोग लिहाफ में यों मुँह छिपाये हुए थे, जैसे चूहे बिलों में से झाँकते हैं। दूकानदार अँगीठियों के सामने बैठे हाथ सेंकते थे। पैसों के सौदे नहीं, मुरौवत के सौदे बेचते थे। राह चलते लोग अलाव पर यों गिरते थे, मानों दीपक पर पतंग गिरते हों। बड़े घरों की स्त्रियाँ मनाती थीं-“मिसराइन न आये, तो आज भोजन बनायें, चूल्हे के सामने बैठने का अवसर मिले।" चाय की दुकानों पर जमघट रहता था। ठाकुरदीन के पान छबड़ी में पड़े सड़ रहे थे; पर उसकी हिम्मत न पड़ती थी कि उन्हें फेरे। सूरदास अपनी जगह पर तो आ बैठा था; पर इधर-उधर से सूखी टहनियाँ बटोरकर जला ली थीं, और हाथ सेंक रहा था। सवारियाँ आज कहाँ! हाँ, कोई इक्का-दुक्का मुसाफिर निकल जाता था, तो बैठे-बैठे उसका कल्याण मना लेता था। जब से सैयद ताहिरअली ने उसे धमकियाँ दी थीं, जमीन के निकल जाने की शंका उसके हृदय पर छाई रहती थी। सोचता-क्या इसी दिन के लिए मैंने इस जमीन का इतना जतन किया था? मेरे दिन सदा यों ही थोड़े ही रहेंगे कभी तो लच्छमी प्रसन्न होंगी। अंधों की आँखें न खुले; पर भाग तो खुल सकता है। कौन जाने, कोई दानी मिल जाय, या मेरे ही हाथ में धीरे-धीरे कुछ रुपये इकट्ठे हो जाय। बनते देर नहीं लगती। यही अभिलाषा थी कि यहीं एक कुओं और एक छोटा-सा मंदिर बनवा देता, मरने के पीछे अपनी कुछ निसानी रहती। नहीं तो कौन जानेगा कौन था। पिसनहारी ने कुओं खुदवाया था, आज तक उसका नाम चला जाता है। झक्कड़ साई ने बावली बनवाई थी, आज तक झक्कड़ की बावली मशहूर है। जमीन निकल गई, तो नाम डूब जायगा। कुछ रुपये मिले भी, तो किस काम के?

नायकराम उसे ढाढ़स देता रहता था-"तुम कुछ चिंता मत करो, कौन माँ का बेटा है, जो मेरे रहते तुम्हारी जमीन निकाल ले! लहू की नदी बहा दूँगा। उस किरंटे की क्या मजाल, गोदाम में आग लगा दूँगा, इधर का रास्ता छुड़ा दूँगा। वह है किस गुमान मे, बस तुम हामी न भरना।” किंतु इन शब्दों से जो तत्कोन हाती थो, वह भैरो और जगधर की ईर्ष्या-पूर्ण वितंडाओं से मिट जाती थी, और वह एक लंबी साँस खींच-कर रह जाता था।

वह इन्हीं विचारों में मग्न था कि नायकराम कंधे पर लट्ठ रखे, एक अंगोछा कंधे पर डाले, पान के बीड़े मुँह में भरे, आकर खड़ा हो गया और बोला-"सूरदास,
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बैठे तापते ही रहोगे? साँझ हो गई, हवा खानेवाले अब इस ठंड में न निकलेंगे। खाने-भर को मिल गया कि नहीं?"

सूरदास-“कहाँ महाराज, आज तो एक भागवान् से भी भेंट न हुई।"

नायकराम-"जो भाग्य में था, मिल गया। चलो, घर चलें। बहुत ठंड लगती हो, तो मेरा यह अंगोछा कंधे पर डाल लो। मैं तो इधर आया था कि कहीं साहब मिल जायँ, तो दो-दो बातें कर लूँ। फिर एक बार उनकी और हमारी भी हो जाय।”

सूरदास चलने को उठा ही था कि सहसा एक गाड़ी की आहट मिली। रुक गया। आस बँधी। एक क्षण में फिटन आ पहुँची। सूरदास ने आगे बढ़कर कहा-"दाता, भगवान् तुम्हारा कल्यान कर, अंधे की खबर लीजिए।"

फिटन रुक गई, और चतारी के राजा साहब उतर पड़े। नायकराम उनका पण्डा था। साल में दो-चार सौ रुपये उनकी रियासत से पाता था। उन्हें आशीर्वाद देकर बोला- "सरकार का इधर से कैसे आना हुआ? आज तो बड़ी ठंड है।"

राजा साहब-“यही सूरदास है, जिसकी जमीन आगे पड़ती है? आओ, तुम दोनों आदमी मेरे साथ बैठ जाओ, मैं जरा उस जमीन को देखना चाहता हूँ।"

नायकराम-“सरकार चलें, हम दोनों पीछे-पीछे आते हैं।"

राजा साहब-"अजी, आकर बैठ जाओ, तुम्हें आने में देर होगी, और मैंने अभी सन्ध्या नहीं की है।"

सूरदास—“पण्डाजी, तुम बैठ जाओ, मैं दौड़ता हुआ चलूँगा, गाड़ी के साथ-ही-साथ पहुँचूँगा।"

राजा साहब-"नहीं-नहीं, तुम्हारे बैठने में कोई हरज नहीं है, तुम इस समय भिखारी सूरदास नहीं, जमींदार सूरदास हो।”

नायकराम-"बैठो सूरे, बैठो। हमारे सरकार साक्षात् देवरूप हैं।"

सूरदास-"पण्डाजी, में........."

राजा साहब-"पण्डाजी, तुम इनका हाथ पकड़कर बिठा दो, यों न बैठेगे।"

नायकराम ने सूरदास को गोद में उठाकर गद्दी पर बैठा दिया, आप भी बैठे, और फिटन चली। सूरदास को अपने जीवन में फिटन पर बैठने का यह पहला ही अवसर था, ऐसा जान पड़ता था कि मैं उड़ा जा रहा हूँ। तीन-चार मिनट में जब गोदाम पर गाड़ी रुक गई, और राजा साहब उतर पड़े, तो सूरदास को आश्चर्य हुआ कि इतनी जल्द क्योंकर आ गये।

राजा साहब—"जमीन तो बड़े मौके की है।"

सूरदास—"सरकार, बाप-दादों की निसानी है।"

सूरदास के मन में भाँति-भाँति की शंकाएँ उठ रही थीं-क्या साहब ने इनको यह जमीन देखने के लिए भेजा है? सुना है, यह बड़े धर्मात्मा पुरुष हैं, तो इन्होंने साहब को समझा क्यों न दिया? बड़े आदमी सब एक होते हैं, चाहे हिन्दू हों या तुर्क; तभी
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तो मेरा इतना आदर कर रहे हैं, जैसे बकरे की गरदन काटने से पहले उसे भर पेट दाना खिला देते हैं। लेकिन मैं इनकी बातों में आनेवाला नहीं हूँ।

राजा साहब-"असामियों के साथ बन्दोबस्त है?"

नायकराम-"नहीं सरकार, ऐसे ही परती पड़ी रहती है, सारे मुहल्ले की गउएँ यहीं चरने आती हैं। उठा दी जाय, तो ६००) से कम नफा न हो, पर यह करता है, जब भगवान् मुझे यों ही खाने-भर को दे देते हैं, तो इसे क्यों उठाऊँ।”

राजा साहब-"अच्छा, तो सूरदास दान लेता ही नहीं देता भी है। ऐसे प्राणियों के दर्शनों ही से पुण्य होता है।"

नायकराम की निगाह में सूरदास का इतना आदर कभी न हुआ था। बोले-"हुजूर, उस जनम का कोई बड़ा भारी महात्मा है।"

राजा साहब-"उस जन्म का नहीं, इस जन्म का महात्मा है।" सच्चा दानी प्रसिद्धि का अभिलाषी नहीं होता। सूरदास को अपने त्याग और दान के महत्व का ज्ञान ही न था। शायद होता, तो स्वभाव में इतनी सरल दीनता न रहती, अपनी प्रशंसा कानों को मधुर लगती। सभ्य दृष्टि में दान का यही सर्वोत्तम पुरस्कार है। सूरदास का दान पृथ्वी या आकाश का दान था, जिसे लुति या कीर्ति की चिन्ता नहीं होती। उसे राजा साहब की उदारता में कपट की गन्ध आ रही थी। वह यह जानने के लिए विकल हो रहा था कि राजा साहब का इन बातों से अभिप्राय क्या है।

नायकराम राजा साहब को खुश करने के लिए सूरदास का गुणानुवाद करने लगे- "धर्मावतार, इतने पर भी इन्हें चैन नहीं है, यहाँ धर्मशाला, मन्दिर और कुआँ बनवाने का विचार कर रहे हैं।"

राजा साहब-"वाह, तब तो बात ही बन गई। क्या सूरदास, तुम इस जमीन में से ९ बीवे मि:टर जॉन सेवक को दे दो। उनसे जो रुपये मिलें, उन्हें धर्म-कार्य में लगा दो। इस तरह तुम्हारी अभिलाषा भी पूरी हो जायगी, और साहब का काम भी निकल जायगा। दूसरों से इतने अच्छे दाम न मिलेंगे। बोलो, कितने रुपये दिला हूँ?"

नायकराम सूरदास को मौन देखकर डरे कि कहीं यह इनकार कर बैठा, तो मेरी बात गई! बोले-"सूरे, हमारे मालिक को जानते हो न, चतारी के महाराज है। इसी दरबार से हमारी परवरिस होती है। मिनिस पलटी के सबसे बड़े हाकिम हैं। आपके हुक्म बिना कोई अपने द्वार पर खूटा भी नहीं गाड़ सकता। चाहे, तो सब इक्केवालों को पकड़वा लें, सारे शहर का पानी बंद कर दें।"

सूरदास-"जब आपका इतना बड़ा अखतियार है, तो साहब को कोई दूसरी जमीन क्यों नहीं दिला देते?"

राजा साहब-"ऐसे अच्छे मौके पर शहर में दूसरी जमीन मिलनी मुश्किल है। लेकिन तुम्हें इसके देने में क्या आपत्ती है? इस तरह न जाने कितने दिनों में तुम्हारी
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मनोकामनाएं पूरी होंगी। यह तो बहुत अच्छा अवसर हाथ आया है, रुपये लेकर धर्म-कार्य में लगा दो।”

सूरदास-"महाराज, मैं खुशी से जमीन न बेचूँगा।"

नायकराम-"सूरे, कुछ भंग तो नहीं खा गये हो? कुछ खयाल है, किससे बातें कर रहे हो!"

सूरदास-"पण्डाजी, सब खियाल है, आँखें नहीं हैं, तो क्या अकिल भी नहीं है। पर जब मेरी चीज है ही नहीं, तो मैं उसका बेचनेवाला कौन होता हूँ?"

राजा साहब-"यह जमीन तो तुम्हारी ही है?"

सूरदास-"नहीं सरकार, मेरी नहीं, मेरे बाप-दादों की है। मेरी चोज वही है, जो मैंने अपने बाँह-बल से पैदा की हो। यह जमीन मुझे धरोहर मिली है, मैं इसका मालिक नहीं हूँ।"

राजा साहब-"सूरदास, तुम्हारी यह बात मेरे मन में बैठ गई। अगर और जमीदारों के दिल में ऐसे ही भाव होते, तो आज सैकड़ों घर यों तबाह न होते। केवल भोग विलास के लिए लोग बड़ी-बड़ी रियासतं बरबाद कर देते हैं। पण्डाजी, मैंने सभा में यही प्रस्ताव पेश किया है कि जमींदारों को अपनी जायदाद बेचने का अधिकार न रहे। लेकिन जो जायदाद धर्म-कार्य के लिए बेची जाय, उसे मैं बेचना नहीं कहता।"

सूरदास-"धरमावतार, मेरा तो इस जमीन के साथ इतना ही नाता है कि जब तक जिऊँ, इसकी रक्षा करूँ, और मल, तो इसे ज्यों-का-त्यों छोड़ जाऊँ।”

राजा साहब-"लेकिन यह तो सोचा कि तुम अपनी जमीन का एक भाग केवल इसलिए दूसरे को दे रहे हो कि मंदिर आदि बनवाने के लिए रुपये मिल जायँ।”

नायकराम-“बोलो सूरे, महाराज की इस बात का क्या जवाब देते हो?"

सूरदास-"मैं सरकार की बातों का जबाव देने जोग हूँ कि जबाब दूँ? लेकिन इतना तो सरकार जानते ही है कि लोग उँगली पकड़ते-पकड़ते पहुँचा पकड़ लेते हैं। साहब पहले तो न बोलेंगे, फिर धीरे-धीरे हाता बना लेंगे, कोई मंदिर में जाने न पायेगा, उनमें कौन राज-रोज लड़ाई करेगा।"

नायकराम—“दीनबंधु, सूरदास ने यह बात पकी कही, बड़े आदमियों से कौन लड़ता फिरेगा?"

राजा साहब—"साहब क्या करेंगे, क्या तुम्हारा मंदिर खोदकर फेंक देंगे?"

नायकराम—"बोलो सूरे, अब क्या कहते हो?"

सूरदास—"सरकार, गरीब की घरवाली गाँव-भर की भावज होती है। साहब किरस्तान हैं, धरमशाले में तमाकू का गोदाम बनायेंगे, मंदिर में उनके मजर सोयेंगे, कुएँ पर उनके मजूरों का अड्डा होगा, बहू-बेटियाँ पानी भरने न जा सकेंगी। साहब न करेंगे, साहब के लड़के करेंगे। मेरे बाप-दादों का नाम डूब जायगा सरकार, मुझे इस दलदल में न फँसाइए।" [ ८६ ]नायकराम-"परमावतार, सूरदास की बात मेरे मन में भी बैठती है। थोड़े दिनों में मंदिर, धरमशाला, कुआँ, सब साहय का हो जायगा, इसमें संदेह नहीं।"

राजा साहब-"अच्छा, यह भी माना; लेकिन जरा यह भी तो सोचो कि इस कारखाने से लोगों को क्या फायदा होगा। हजारों मजदूर, मिस्त्री, बाबू, मुंशी, लुहार, बढ़ई आकर आबाद हो जायँगे, एक अच्छी बत्तो हो जायगी, बनियों की नई-नई दूकानें खुल जायँगी, आस-पास के किसानों को अपनी शाक-भाजी लेकर शहर न जाना पड़ेगा, यहीं खरे दाम मिल जायँगे। कुजड़े, स्खटिक, ग्वाले, धोबी, दरजी, सभी को लाभ होगा। क्या तुम इस पुण्य के भागी न बनोगे?"

नायकराम-"अब बोलो सूरे, अब तो कुछ नहीं कहना है? हमारे सरकार की भलमंसी है कि तुमसे इतनी दलील कर रहे हैं। दूसरा हाकिम होता, तो एक हुकुमनाम में सारी जमीन तुम्हारे हाथ से निकल जाती।

सूरदास-"भैया, इसीलिए न लोग चाहते हैं कि हाकिम धरमात्मा हो, नहीं तो क्या देखते नहीं हैं कि हाकिम लोग बिना डाम-फूल-सुअर के बात नहीं करते। उनके सामने खड़े होने का तो हियाव ही नहीं होता, पातें कौन करता। इसीलिए तो मनाते हैं कि हमारे राजों-महाराजों का राज होता, जो हमारा दुख-दर्द सुनते। सरकार बहुत ठीक कहते हैं, मुहल्ले की रौनक जरूर बढ़ जायगी, रोजगारी लोगों को फायदा भी खूब होगा। लेकिन जहाँ यह रौनक बढ़ेगी, वहाँ ताड़ो-शराब का भी तो परचार बढ़ जायगा, कसवियाँ भो तो आकर बस जायँगी, परदेसी आदमी हमारी बहू-बेटियों को घूरेंगे, कितना अधरम होगा! दिहात के किसान अपना काम छोड़कर मजूरी के लालच से दोड़ेंगे, यहाँ बुरी-बुरी बातें सीखेंगे, और अपने बुरे आचरन अपने गाँव में फैलायेंगे। दिहातों की लड़कियाँ, बहुएँ मजूरी करने आयेंगी, और यहाँ पैसे के लोभ में अपना धरम बिगाडगी। यही रौनक शहरों में है। वही रौनक यहाँ हो जायगी। भगवान न करें, यहाँ वह रौनक हो। सरकार, मुझे इस कुकरम और अधरम ने बचाये। यह सारा पाप मेरे सिर पड़ेगा।"

नायकराम-"दीनबंधु, सूरदास बहुत पकी बात कहता है। कलकत्ता, बंबई, अहमदाबाद, कानपुर, आपके अकवाल से सभी जगह घूम आया हूँ, जजमान लोग बुलाते रहते हैं। जहाँ-जहाँ कल-कारखाने है, वहाँ यही हाल देखा है।"

गजा साहब-"क्या ये बुराइयाँ तीर्थ-स्थानों में नहीं हैं?”

सूरदास-“सरकार, उनका सुधार भी तो बड़े आदमियों ही के हाथ में है, जहाँ बुरी बातें पहले ही से हैं, वहाँ से हटाने के बदले उन्हें और फैलाना तो ठीक नहीं है।"

राजा साहब-"ठीक कहते हो सूरदास, बहुत ठोक कहते हो। तुम जीते, मैं हार गया। तुम्हारी बातों से चिच प्रसन्न हो गया। कभी शहर आना, तो मेरे यहाँ अवश्य आना। जिस वक्त मैंने साहब से इस जमीन को तय करा देने का वादा किया था, ये बातें मेरे ज्यान में न आई थीं। अब तुम निश्चिन्त हो जाओ, मैं साहब से कह दूँगा, सूरदास अपनी जमीन नहीं देता। नायकराम, देखो, सूरदास को किसी बात की तकलीफ
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न होने पाये, अब मैं चलता हूँ। यह लो सूरदास, यह तुम्हारी इतनी दूर आने की मजबूरी है।”

यह कहकर उन्होंने एक रुपया सूरदास के हाथ में रखा, और चल दिये। नायकराम ने कहा—"सूरदास, आज राजा साहब भी तुम्हारी खोपड़ी को मान गये।