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वैदेही वनवास/२ चिन्तित चित्त

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वैदेही-वनवास  (1939)  द्वारा अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
चिन्तित चित्त
[ १८ ]
द्वितीय सर्ग
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चिन्तितः पृच्चित्तु
चतुष्पद

अवध के राज मन्दिरों मध्य ।
एक आलय था बहु-छबि-धाम ॥
खिंचे थे जिसमें ऐसे चित्र ।
जो कहाते थे लोक-ललाम ॥१॥

दिव्य-तम कारु-कार्य अवलोक ।
अलौकिक होता था आनन्द ।।
रत्नमय पञ्चीकारी देख ।
दिव विभा पड़ जाती थी मन्द ॥२॥

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१९
द्वितीय सर्ग

कला कृति इतनी थी कमनीय ।
दिखाते थे सब चित्र सजीव ॥
भाव की यथातथ्यता देख ।
दृष्टि होती थी मुग्ध अतीव ॥३॥

अंग-भंगी, आकृति की व्यक्ति ।
चित्र के चित्रण की थी पूर्ति ॥
ललित तम कर की खिंची लकीर ।
बनी थी दिव्य-भूति की मूर्ति ॥४॥

देखते हुए मुग्धकर - चिन्न ।
सदन में राम रहे थे घूम ।।
चाह थी चित्रकार मिल जाय ।
हाथ तो उसके लेवे चूम ॥५॥

इसी अवसर पर आया एक-
गुप्तचर वहाँ विकंपित - गात ।।
विनत हो चन्दन कर कर जोड़।
कही दुख से उसने यह बात ॥६॥

प्रभो यह सेवक प्रातःकाल ।
घूमता फिरता चारों ओर ।।
उस जगह पहुंचा जिसको लोग।
इस नगर का कहते हैं छोर ॥७॥

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वैदेही-वनवास

वहाँ पर एक रजक हो क्रुद्ध ।
रोक कर गृह प्रवेश का द्वार ॥
त्रिया को कड़ी दृष्टि से देख ।
पूछता था यह बारम्बार ॥८॥

बिताई गई कहाँ पर रात्रि ।
लगा कर लोक-लाज को लात ।।
पापिनी कुल में लगा कलंक ।
यहाँ क्यों आई हुए प्रभात ॥९॥

चली जा हो आँखों से दूर।
अब यहाँ क्या है तेरा काम ।।
कर रही है तू भारी भूल ।
जो समझती है मुझको राम ॥१०॥

रहीं जो पर-गृह में पट्मास ।
हुई है उनकी उन्हें प्रतीति ॥
वड़ों की बड़ी बात है किन्तु ।
कलंकित करती है यह नीति ॥११॥

प्रभो बतलाई थी यह बात ।
विनय मैंने की थी वहु वार ।।
नही माना जाता है ठीक ।
जनकजा पुनर्ग्रहण व्यापार ॥१२॥

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द्वितीय सर्ग

आदि में थी यह चर्चा अल्प ।
कभी कोई कहता यह वात ।।
और कहते भी वे ही लोग ।
जिन्हे था धर्म-मर्म अज्ञात ॥१३॥

अब नगर भर में वह है व्याप्त ।
बढ़ रहा है जन चित्त-विकार ।।
जनपदों ग्रामों में सब ओर ।
हो रहा है उसका विस्तार ॥१४॥

किन्तु साधारण जनता मध्य ।
हुआ है उसका अधिक प्रसार ।।
उन्ही के भावों का प्रतिविम्ब ।
रजक का है निन्दित - उद्गार ॥१५॥

विवेकी विज्ञ सर्व - बुध - वृन्द ।
कर रहे हैं सद्बुद्धि प्रदान ॥
दिखाकर दिव्य - ज्ञान - आलोक ।
दूर करते हैं तम अज्ञान ॥१६॥

अवांछित हो पर है यह सत्य ।
बढ़ रहा है वहु - वाद - विवाद ॥
प्रभो मैं जान सका न रहस्य ।
किन्तु है निद्य लोक - अपवाद ॥१७॥

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२२
वैदेही-वनवास

राम ने बनकर बहु - गंभीर ।
सुनी दुर्मुख के मुख की बात ।।
फिर उसे देकर गमन निदेश ।
सोचने लगे वन वहुत शान्त ॥१८॥

बात क्या है ? क्यों यह अविवेक? ।
जनकजा पर भी यह आक्षेप ।।
उस सती पर जो हो अकलंक ।
क्या बुरा है न पंक - निक्षेप ॥१९॥

निकलते ही मुख से यह बात ।
पड़ गई एक चित्र पर दृष्टि ।
देखते ही जिसके तत्काल ।
हगों में हुई सुधा की वृष्टि ॥२०॥

दारु का लगा हुआ अम्बार ।
परम-पावक-सय बन हो लाल ।
जल रहा था धू धू ध्वनि साथ ।
ज्वालमाला से हो विकराल ॥२१॥

एक स्वर्गीय - सुन्दरी स्वच्छ--
पूत - तम - बसन किये परिधान ॥
कर रही थी उसमें सुप्रवेश ।
कमला- मुख था उत्फुल्ल महान ।।२२।।

[ २३ ]
२३
द्वितीय सर्ग

परम - देदीप्यमान हो अंग।
बन गये थे वहु - तेज - निधान ।।
हगों से निकल ज्योति का पुंज ।
बनाता था पावक को म्लान ।।२३।।

सामने खड़ा रिक्ष कपि यूथ ।
कर रहा था बहु जय जय कार ।।
गगन मे विलसे विवुध विमान ।
रहे बरसाते सुमन अपार ॥२४॥

बात कहते अंगारक पुंज ।
बन गये विकच कुसुम उपमान ?
लसी दिखलाई उस पर सीय ।
कमल पर कमलासना समान ॥२५॥

देखते रहे राम यह दृश्य ।
कुछ समय तक हो हो उद्ग्रीव ॥
फिर लगे कहने अपने आप ।
क्या न यह कृति है दिव्य अतीव ॥२६।।

मैं कभी हुआ नही संदिग्ध ।
हुआ किस काल में अविश्वास ।।
भरा है प्रिया चित्त मे प्रेम ।
हृदय मे है सत्यता निवास ॥२७॥

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वैदेही-वनवास

राजसी विभवों से मुँह मोड़।
स्वर्ग - दुर्लभ सुख का कर त्याग ।।
सर्व प्रिय सम्बन्धों को भूल ।
ग्रहण कर नाना विपय विराग ॥२८॥

गहन विपिनों में चौदह साल।
सदा छाया सम रह मम साथ ।।
साँसते सह खा फल दल मूल ।
कभी पी करके केवल पाथ ॥२९।।

दुग्ध फेनोपम अनुपम सेज ।
छोड़ मणि-मण्डित- कञ्चन - धाम ।
कुटी में रह सह नाना कष्ट ।
बिताये हैं किसने वसुयाम ॥३०॥

कमलिनी - सी जो है सुकुमार।
कुसुम कोमल है जिसका गात ॥
चटाई पर या भू पर पौढ़ ।
बिताई उसने है सब रात ॥३१॥

देख कर मेरे मुख की ओर ।
भूलते थे सब दुख के भाव ॥
मिल गये कहीं कंटकित पंथ। .
छिदे किसके पंकज से पॉव.॥३२॥

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द्वितीय सर्ग

नही घबरा पाती थी कौन ।
देख फल दल के भाजन रिक्त ।
बनाती थी न किसे उद्विग्न ।
टपकती कुटी धरा जल सिक्त ॥३३॥

भूल अपना पथ का अवसाद।
बदन को बना विकच जलजात ।।
पास आ व्यजन डुलाती कौन ।
देख कर स्वेद-सिक्त मम गात ॥३४॥

हमारे सुख का मुख अवलोक ।
बना किसको वन सुर - उद्यान ।।
कुसुम कंटक, चन्दन, तप - ताप ।
प्रभंजन मलय - समीर समान ॥३५॥

कहाँ तुम और कहाँ वनवास ।
यदि कभी कहता चले प्रसंग ।।
तो विहँस कहती त्याग सकी न ।
चन्द्रिका चन्द्र देव का संग ॥३६॥

दिखाया किसने अपना त्याग ।
लगा लंका विभवों को लात ॥
सहे किसने धारण कर धीर ।
दानवों के अगणित - उत्पात ॥३७॥

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वैदेही-वनवास

दानवी दे दे नाना त्रास ।
बनाकर रूप बड़ा विकराल ॥
विकम्पित किसको बना सकी न ।
दिखाकर बदन विनिर्गत ज्वाल ॥३८॥

लोक-त्रासक-दशआनन भीति ।
उठी उसकी कठोर करवाल ॥
बना किसको न सकी बहु त्रस्त ।
सकी किसका न पतिव्रत टाल ॥३९।।

कौन कर नाना - व्रत - उपवास ।
गलाती रहती थी निज गात ।।
बिताया किसने संकट - काल ।
तरु तले बैठी रह दिन रात ॥४०॥

नहीं सकती जो पर दुख देख ।
हृदय जिसका है परम - उदार ।।
सवें जन सुख संकलन निमित्त ।
भरा है जिसके उर में प्यार ॥४१।।

सरलता की जो है प्रतिमूर्ति ।
सहजता है जिसकी प्रिय - नीति ।।
बड़े कोमल हैं जिसके भाव ।
परम - पावन है जिसकी प्रीति ।।४२॥

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द्वितीय सर्ग

शान्ति - रत जिसकी मति को देख ।
लोप होता रहता है कोप ।
मानसिक - तम करता है दूर ।
दिव्य जिसके आनन का ओप ॥४३॥

सुरुचिमय है जिसकी चित-वृत्ति ।
कुरुचि जिसको सकती है छू न ।।
हृदय है इतना सरस दया ।
तोड़ पाते कर नहीं प्रसून ॥४४॥

करेगा उस पर शंका कौन ।
क्यों न उसका होगा विश्वास ।
यही था अग्नि - परीक्षा मर्म ।
हो न जिससे जग मे उपहास ।।४५।।

अनिच्छा से हो खिन्न नितान्त ।
किया था मैंने ही यह काम ।।
प्रिया का ही था यह प्रस्ताव ।
न लाञ्छित हो जिससे मम नाम ॥४६।।

पर कहाँ सफल हुआ उद्देश ।
लग रहा है जब वृथा कलंक ।।
किसी कुल - वाला पर वन वक्र ।
जब पड़ी लोक - दृष्टि निशंक ॥४७॥

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वैदेही-वनवास

सत्य होवे या वह हो झूठ।
या कि हो कलुपित चित्त प्रमाद ।।
निद्य है है अपकीर्ति - निकेत ।
लांछना - निलय लोक - अपवाद ॥४८॥

भले ही कुछ न कहें बुध-वृन्द ।
सज्जनों को हो सुने विषाद ।
किन्तु है यह जन-रव अच्छा न ।
अवांछित है यह वाद - विवाद ॥४९॥

मिल सका मुझे न इसका भेद ।
हो रहा है क्यों अधिक प्रसार ॥
बन रहा है क्या साधन - हीन ।
लोक - आराधन का व्यापार ॥५०॥

प्रकृति गत है, है उर में व्याप्त ।
प्रजा - रंजन की नीति - पुनीत ।।
दण्ड में यथा - उचित सर्वत्र ।
है सरलता सद्भाव गृहीत ॥५१॥

न्याय को सदा मान कर न्याय ।
किया मैंने न कभी अन्याय ॥
दूर की मैंने पाप - प्रवृत्ति ।
पुण्यमय करके प्रचुर - उपाय ।।५२।।

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द्वितीय सर्ग

सवल के सारे अत्याचार ।
शमन में हूँ अद्यापि प्रवृत्त ।
निर्बलों का बल बन दल दुःख ।
विपुल पुलकित होता है चित्त ॥५३॥

रहा रक्षित उत्तराधिकार ।
छिना मुझसे कब किसका राज ॥
प्रजा की बनी प्रजा - सम्पत्ति ।
ली गई कभी न वह कर व्याज ॥५४॥

मुझे है कूटनीति न पसंद ।
सरलतम है मेरा व्यवहार ॥
वंचना विजितों को कर व्योंत ।
बचाया मैंने वारंवार ॥५५॥

समझ नृप का उत्तर - दायित्व ।
जान कर राज-धर्म का मर्म ।।
ग्रहण कर उचित नम्रता भाव ।
कर्मचारी करते हैं कर्म ॥५६॥

भूल कर भेद भाव की बात ।
विलसिता समता है सर्वत्र ।।
तुष्ट है प्रजामात्र बन शिष्ट ।
सीख समुचित स्वतंत्रता मंत्र ॥५७॥

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वैदेही-वनवास

परस्पर प्रीति का समझ लाभ ।
हुए मानवता की अनुभूति ॥
सुखित है जनता सुख - मुख देख ।
पा गये वांछित सकल - विभूति ॥५८।।

दानवों का हो गया निपात ।
तिरोहित हुआ प्रबल आतंक ॥
दूर हो गया धर्म का द्रोह ।
शान्तिमय बना मेदिनी अंक ॥५९॥

निरापद हुए सर्व - शुभ - कर्म ।
यज्ञ - वाधा का हुआ विनाश ॥
टल गया पाप - पुंज तम - तोम ।
विलोके पुण्य - प्रभात - प्रकाश ॥६०॥

कर रहे हैं सब कर्म स्वकीय ।
समझ कर वर्णाश्रम का मर्म ॥
बन गये हैं मर्यादा - शील ।
धृति सहित धारण करके धर्म ॥६१॥

विलसती है घर घर में शांति ।
भरा है जन जन में आनन्द ॥
कही है कलह न कपटाचार ।
न निन्दित-वृत्ति-जनित छल-छन्द ॥६२।।

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द्वितीय सर्ग

हुए उत्तेजित मन के भाव ।
शान्त बन जाते हैं तत्काल ॥
याद कर मानवता का मंत्र ।
लोक नियमन पर ऑखें डाल ॥६३॥

समय पर जल देते हैं मेघ ।
सताती नहीं ईति की भीति ॥
दिखाते कही नही दुर्वृत्त ।
भरी है सब में प्रीति प्रतीति ॥६४॥

फिर हुई जनता क्यों अप्रसन्न ।
हुआ क्यों प्रबल लोक - अपवाद ॥
सुन रहे हैं क्यों मेरे कान ।
असंगत अ - मनोरम सम्वाद ॥६५॥

लग रहा है क्यो वृथा कलंक ।
खुला कैसे अकीर्ति का द्वार ॥
समझ मे आता नही रहस्य ।
क्या करूँ मैं इसका प्रतिकार ॥६६॥

दोहा


इन बातों को सोचते, कहते सिय गुण ग्राम ।
गये दूसरे गेह में, धीर धुरंधर राम ॥६७।।