साहित्य का उद्देश्य/3

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साहित्य का उद्देश्य
द्वारा प्रेमचंद

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है। यद्यपि हमारे समाचार-पत्रो की जबाने बन्द हैं और देश में जो कुछ हो रहा है, हमे उसकी ख़बर नहीं होने पाती, फिर भी कभी-कभी त्याग और सेवा, शौर्य और विनय के ऐसे-ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं जिन पर हम चकित हो जाते है। ऐसी ही दो-एक घटनाएँ हम अाज अपने पाठको को सुनाते है।

एक नगर मे कुछ रमणियॉ कपडे की दुकानो पर पहरा लगाये खड़ी थीं। विदेशी कपडों के प्रेमी दूकानो पर आते थे । पर उन रमणियों को देखकर हट जाते थे। शाम का वक्त था। कुछ अँधेरा हो चला था । उसी वक्त एक आदमी एक दूकान के सामने अाकर कपड़े खरीदने के लिये आग्रह करने लगा। एक रमणी ने जाकर उससे कहा-महाशय, मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ, कि आप विलायती कपड़ा न खरीदे ।

ग्राहक ने उस रमणी का रसिक नेत्रो से देखकर कहा-अगर तुम मेरी एक बात स्वीकार कर लो, तो मैं कसम खाता हूँ, कभी विलायती कपड़ा न खरीदूंगा।

रमणी ने कुछ सशक होकर उसकी ओर देखा और बोली-क्या आशा है ?

ग्राहक लम्पट था । मुसकराकर बोला-बस, मुझे एक बोसा दे दो।

रमणी का मुख अरुणवर्ण हो गया, लज्जा से नहीं, क्रोध से । दूसरी दूकानो पर और कितने ही वालटियर खड़े थे । अगर वह जरा-सा इशारा कर देती, तो उस लम्पट की धज्जियाँ उड़ जाती। पर रमणी विनय को अपार शक्ति से परिचित थी। उसने सजल नेत्रो से कहा-अगर आपकी यही इच्छा है, तो ले लीजिए, मगर विदेशी कपडा न खरीदिये । ग्राहक परास्त हो गया । वह उसी वक्त उस रमणी के चरणो पर गिर पड़ा और उसने प्रण किया कि कभी विलायती वस्त्र न लूँगा, क्षमा-प्रार्थना की और लज्जित तथा सस्कृत होकर चला गया।

एक दूसरे नगर की एक और घटना सुनिए । यह भी कपडे की
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दूकान और पिकेटिग ही की घटना है।एक दुराग्रही मुसलमान की दूकान पर जोरो का पिकेटिंग हो रहा था । सहसा एक मुसलमान सज्जन अपने कुमार पुत्र के साथ कपडा खरीदने आये । सत्याग्रहियो ने हाथ जोडे, पैरों पड़े दूकान के सामने लेट गये; पर खरीदार पर कोई असर न हुा । वह लेटे हुए स्वयंसेवको को रौदता हुआ दूकान मे चला गया। जब कपडे लेकर निकला, तो फिर वालंटियरो को रास्ते मे लेटे पाया। उसने क्रोध मे आकर एक स्वयसेवक के एक ठोकर लगाई। स्वयसेवक के सिर से खून निकल आया । फिर भी वह अपनी जगह से न हिला। कुमार पुत्र दूकान के जीने पर खड़ा यह तमाशा देख रहा था। उसका बाल-हृदय यह अमानुषीय व्यवहार सहन न कर सका। उसने पिता से कहा-बाबा,आप कपडे लौटा दीजिए।

बाप ने कहा-लौटा दूँ ! मै इन सबो की छाती पर से निकल जाऊँगा।

'नहीं,आप लौटा दीजिए !'

'तुम्हे क्या हो गया है ? भला लिये हुए कपड़े लौटा दूँ !'

'जी हाँ!'

'यह कभी नहीं हो सकता।'

'तो फिर मेरी छाती पर पैर रखकर जाइए।'

यह कहता हुआ वह बालक अपने पिता के सामने लेट गया । पिता ने तुरन्त बालक को उठाकर छाती से लगा लिया और कपड़े लौटाकर घर चला गया ।

तीसरी घटना कानपुर नगर की है। एक महाशय अपने पुत्र को स्वयसेवक न बनने देते थे। पुत्र के मन मे देश सेवा का असीम उत्साह था, पर माता-पिता की अवज्ञा न कर सकता था। एक ओर देश-प्रेम था, दूसरी ओर माता-पिता की भक्ति । यह अंतर्द्वन्द्व उसके लिए एक दिन असह्य हो उठा । उसने घर वालों से कुछ न कहा । जाकर रेल की
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चौथी घटना एक दूसरे नगर की है। मन्दिरो पर स्वयसेवकों का पहरा था । स्वयसेवक जिसे विलायती कपड़े पहने देखते थे उसे मन्दिर मे न जाने देते थे। उसके सामने लेट जाते थे। कही-कहीं स्त्रियाँ भी पहरा दे रही थीं । सहसा एक स्त्री खद्दर की साडी पहने आकर मन्दिर के द्वार पर खडी हो गई। वह कॉग्रेस की स्वयंसेविका न थी, न उसके अचल मे सत्याग्रह का बिल्ला ही था । वह मन्दिर के द्वार के समीप खड़ी तमाशा देख रही थी और स्वयसेविकाएँ विदेशी वस्त्र-धारियो से अनुनय-विनय करती थीं, सत्याग्रह करती थी। पर वह स्त्री सबसे अलग चुपचाप खड़ी थी । उसे आये कोई घटा-भर हुआ होगा, कि सड़क पर एक फिटन पाकर खड़ी हुई और उसमे से एक महाशय सुन्दर महीन रेशमी पाड़ की धोती पहने निकले । यह थे रायबहादुर हीरामल, शहर के सबसे बड़े रईस, आनरेरी मैजिस्ट्रेट, सरकार के परम भक्त और शहर की अमन-सभा के प्रधान । नगर मे उनसे बढ़कर कॉग्रेस का विरोधी न था । पुजारीजी ने लपककर उनका स्वागत किया और उन्हें गाड़ी मे उतारा । स्वयंसेविकालो की हिम्मत न पड़ी, कि उन्हे रोक ले । वह उनके बीच मे होते हुए द्वार पर आये और अन्दर जाना ही चाहते थे, कि वही खद्दरधारी रमणी श्राकर उनके सामने खड़ी हो गई और गम्भीर स्वर मे बोली-आप यह कपड़े पहनकर अन्दर नहीं जा सकते।।

हीरामलजी ने देखा, तो सामने उनकी पत्नी खड़ी है। कलेजे मे बरछी-सी चुभ गई । बोले-तुम यहाँ क्यो आई ?

रमणी ने दृढ़ता से उत्तर दिया-इसका जवाब फिर दूंगी। आप यह कपड़े पहने हुए मन्दिर मे नहीं जा सकते ।

'तुम मुझे नहीं रोक सकती।'

'तो मेरी छाती पर पॉव रखकर जाइएगा।'

यह कहती हुई वह मन्दिर के द्वार पर बैठ गई। [ ९५ ]'तुम मुझे बदनाम करना चाहती हो?'

'नहीं, मै आपके मुंह का कलक मिटाना चाहती हूँ।'

'मैं कहता हूँ, हट जाअो । पति का विरोध करना स्त्रियों का धर्म नहीं है । तुम क्या अनर्थ कर रही हो, यह तुम नहीं समझ सकतीं ।'

'मैं यहाँ आपकी पत्नी नहीं हूँ। देश की सेविका हूँ। यहाँ मेरा कर्तव्य यही है, जो मैं कर रही हूँ। घर मे मेरा धर्म आपकी आज्ञाओं को मानना था । यहाँ मेरा धर्म देश की आज्ञा को मानना है।'

हीरामलजी ने धमकी भी दी, मिन्नते भो की पर रमणी द्वार से न हटी। आख़िर पति को लज्जित होकर लौटना पड़ा । उसी दिन उनका स्वदेशी संस्कार हुआ।

पॉचवीं घटना उन गढ़वाली वीरों की है, जिन्होंने पेशावर के सत्या- अहियो पर गोली चलाने से इनकार किया। शायद हमारी सरकार को पहली बार राष्ट्रीय आन्दोलन की महत्ता का बोध हुआ । वह गोरखे जिन्हे हम लोग पशु समझते थे, जिनकी राज-भक्ति पर सरकार को अटल विश्वास था, जिनमे राष्ट्रीय भावों की जाग्रति की कोई कल्पना भी न कर सकता था, उन्हीं गोरखे योद्धाओ ने निःशस्त्र सत्याग्रहियों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया । उन्हे खूब मालूम था, कि इसका नतीजा कोर्टमार्शल होगा, हमे काले पानी भेजा जायगा, फासियों दी जायेंगी, शायद गोली मार दी जाय; पर यह जानते हुए भी उन्होने गोली चलाने से इनकार किया! कितना आसान था गोली चला देना। राइफल के घोडे को दबाने की देर थी। पर धर्म ने उनकी उँगलियो को बाँध दिया था। धर्म की वेदी पर इतने बडे बलिदान का उदाहरण ससार के इतिहास मे बहुत कम मिलेगा।

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साहित्य मे समालोचना का जो महत्व है उसको बयान करने की

जरूरत नहीं। सद् साहित्य का निर्माण बहुत गम्भीर समालोचना पर ही मुनहसर है । योरप मे इस युग को समालोचना का युग कहते हैं। वहाँ प्रति-वर्ष सैकड़ो पुस्तकें केवल समालोचना के विषय की निकलती रहती हैं, यहाँ तक कि ऐसे ग्रन्थो का प्रचार, प्रभाव, अोर स्थान क्रियात्मक रचनात्रों से किसी प्रकार घटकर नहीं है । कितने ही पत्रो और पत्रिकाओ में स्थायी रूप से अालोचनायें निकलती रहती हैं, लेकिन हिन्दी में या तो समालोचना होती ही नहीं या होती है तो द्वेष या झूठी प्रशंसा से भरी हुई अथवा ऊपरी, उथली और बहिर्मुखी । ऐसे समालोचक बहुत कम हैं जो किसी रचना की तह मे डूबकर उसका तात्विक, मनोवैज्ञा- निक विवेचन कर सकें। हॉ कभी-कभी प्राचीन ग्रन्थो की आलोचना नजर आ जाती है जिसे सही मानो मे समालोचना कह सकते हैं, मगर हम तो इसे साहित्यिक मुर्दापरस्ती ही कहेगे । प्राचीन कवियों और साहित्याचार्यों का यशोगान हमारा धर्म है, लेकिन जो प्राणी केवल अतीत मे रहे, पुरानी सम्पदा का ही स्वप्न देखता रहे और अपने सामने आनेवाली बातो की तरफ से ऑखे बन्द कर ले, वह कभी अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है, इसमे हमे सन्देह है। पुरानों ने जो कुछ लिखा, सोचा और किया, वह पुरानी दशाओं और परिस्थितियो के अधीन किया । नए जो कुछ लिखते, सोचते, या करते हैं, वह वर्तमान परि- स्थितियों के अधीन करते हैं । इनकी रचनाओ मे वही भावनायें और
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आकाक्षायें होती है जिनसे वर्तमान युग आन्दोलित हो रहा है । यदि हम पुराने विशाल खण्डहरो ही को प्रतिमा को भॉति पूजते रहे और अपनी नई झोपड़ी की बिल्कुल चिन्ता न करें तो हमारी क्या दशा होगी, इसका हम अनुमान कर सकते हैं।

आइए देखें इस अभाव का कारण क्या है । हिन्दी-साहित्य मे ऐसे लेखको की ईश्वर की दया से कमी नहीं है जो संसार साहित्य से परि- चित है, साहित्य के मर्मज्ञ हैं, साहित्य के तत्वो को समझते हैं। साहित्य का पथ प्रदर्शन उन्हीं का कर्तव्य है। लेकिन या तो वह हिन्दी पुस्तकों की आलोचना करना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं या उन्हे हिन्दी-साहित्य मे कोई चीज आलोचना के योग्य मिलती ही नहीं या फिर हिन्दी भाषा उन्हें अपने गहरे विचारों को प्रकट करने के लिए काफी नहीं मालूम होती। इन तीनो ही कारणों मे कुछ न कुछ तत्व है, मगर इसका इलाज क्या हिन्दी-साहित्य से मुंह मोड़ लेना है ? क्या आखें बन्द करके बैठ जाने से ही सारी विपत्ति-बाधायें टल जाती हैं ? हमें साहित्य का निर्माण करना है, हमे हिन्दी को भारत की प्रधान भाषा बनाना है, हमे हिन्दी-द्वारा राष्ट्रीय एकता की जड़ जमाना है। क्या इस तरह उदासीन हो जाने से ये उद्देश्य पूरे होंगे ? योरोपीय भाषाओं की इसलिए उन्नति हो रही है कि वहाँ दिमाग और दिल रखने वाले व्यक्ति उससे दिलचस्पी रखते हैं, बडे-बड़े पदाधिकारी, लीडर, प्रोफेसर और धर्म के प्राचार्य साहित्य की प्रगति से परिचित रहना अपना कर्तव्य समझते हैं। यही नहीं बल्कि अपने साहित्य से प्रेम उनके जीवन का एक अग है, उसी तरह जैसे अपने देश के नगरो और दृश्यों की सैर। लेकिन हमारे यहाँ चोटी के लोग देशी साहित्य की तरफ ताकना भी हेय समझते है। कितने ही तो बडे रोब से कहते हैं, हिन्दी मे रखा ही क्या है। अगर कुछ गिने-गिनाये लोग हैं भी तो वह समझते हैं इस क्षेत्र मे आकर हमने एहसान किया है । वह यह आशा रखते है कि हिन्दी संसार उनकी हर एक बात को आखे बन्द करके स्वीकार
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करे, उनके कलम से जो कुछ निकले, ब्रह्मवाक्य समझा जाय । वह शायद समझते है, मौलिकता उपाधियो से आती है। वह यह भूल जाते हैं कि बिरला ही कोई उपाधिधारी मौलिक होता है। उपाधियाँ जानी हुई और पढी हुई बातो के प्रदर्शन या परिवर्तन से मिलती हैं। मौलिकता इसके सिवा और कुछ भी है। अगर कोई 'डाक्टर' या 'प्रोफेसर' लिखे तो शायद ऊँचे मस्तिष्क वालो की यह बिरादरी उसका स्वागत करे। लेकिन दुर्भाग्य-वश हिन्दी के अधिकाश लेखक न डाक्टर है, न फिलासफ़र, फिर उनकी रचनाये कैसे सम्मान पायें और कैसे आलोचना के योग्य समझी जायें । किसी वस्तु की प्रशसा तो और बात है, निन्दा भी कुछ न कुछ उसका महत्व बढाती है । वह निन्दा के योग्य तो समझी गई । हमारी यह दिमागवालो की बिरादरी किसी रचना की प्रशसा तो कर ही नही सकती; क्योकि इससे उसकी हेठी होती है, दुनिया कहेगी, यह तो शा। और शेली और शिलर की बातें किया करते थे, उस आकाश से इतने नीचे कैसे गिर गये ! हिन्दी मे भी कोई ऐसा चीज हो सकती है, जिसकी ओर वह ऑखे उठा सके, यह उनकी शिक्षा और गौरव के लिये लज्जास्पद है । बेचारे ने तीन वर्ष पेरिस और लन्दन की खाक छानी, इसीलिये कि हिन्दी लेखको की आलोचना करे ! फारसी पढ़कर भी तेल बेचे ! हम ऐसे कितने ही सज्जनो को जानते है जो डाक्टर या डी० लिट्० होने के पहले हिन्दी मे लिखते थे, लेकिन जब से डाक्टरेट की उपाधि मिली, वह पतंग की भाँति श्राकाश मे उड़ने लगे। अालोचना साहित्य की उनके द्वारा पूर्ति हो सकती थी; क्योकि रचना के लिये चाहे विशेष शिक्षा की जरूरत न हो, आलोचना के लिये संसार-साहित्य से परिचित होने की ज़रूरत है। हमारे पास कितने ही युवक लेखको की रचनाये, प्रकाशित होने के पहले, सम्मति के लिये आती रहती हैं । लेखक के हृदय मे भाव है, मस्तिस्क मे विचार हैं, कुछ प्रतिभा है, कुछ लगन, कुछ संस्कार, उसे केवल एक अच्छे सलाहकार की जरूरत है। इतना सहारा पाकर वह कुछ से कुछ हो जा सकता है;लेकिन यह सहारा उसे
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नहीं मिलता।न कोई ऐसे व्यक्ति है,न समिति,न मडल। केवल पुस्तक- प्रकाशको की पसन्द का भरोसा है। उसने रचना स्वीकार कर ली, तो खैर, नहीं सारी की-कराई मेहनत पर पानी फिर गया। प्रेरक शक्तियो मे यशोलिप्सा शायद सबसे बलवान है। जब यह उद्देश्य भी पूरा नहीं होता, तो लेखक कधा डाल देता है और इस भॉति न जाने कितने गुदडी के रत्न छिपे रह जाते है । या फिर वह प्रकाशक महोदय के आदेशानुसार लिखना शुरू करता है और इस तरह कोई नियन्त्रण न होने के कारण, साहित्य मे कुरुचि बढती जाती है । इस तरफ जैनेन्द्रकुमारजी की 'परख', प्रसादजी का 'कंकाल', प्रतापनारायणजी की 'विदा', निरालाजी की 'अप्सरा', वृन्दावनलालजी का 'गढ़कुण्डार' आदि कई सुन्दर रचनाये प्रकाशित हुई है । मगर इनमे से एक की भी गहरी, व्यापक, तात्त्विक अालोचना नही निकली । जिन महानुभावो मे ऐसी आलोचना की सामर्थ्य थी, उन्हे शायद इन पुस्तको की खबर भी नहीं हुई। इनसे कहीं घटिया किताबे अग्रेजी मे निकलती रहती है और उन्हे ऊँची बिरादरीवाले सजन शौक से पढ़ते और संग्रह करते है; पर इन रत्नो की ओर किसी का ध्यान आकृष्ट न हुआ। प्रशंसा न करते, दोष तो दिखा देते, ताकि इनके लेखक आगे के लिये सचेत हो जाते, पर शायद इसे भी वे अपने लिये जलील समझते है। इङ्गलैण्ड का रामजे मैकेडानेल्ड या बौनर ला अग्रेजी साहित्य पर प्रकाश डालनेवाला व्याख्यान दे सकता है, पर हमारे नेता खद्दर पहनकर अंग्रेज़ी लिखने और बोलने में अपना गौरव समझते हुए, हिन्दी-साहित्य का अलिफ़ बे भी नहीं जानते । यह इसी उदासीनता का नतीजा है, कि 'विजयी। विश्व तिरंगा प्यारा' जैसा भावशून्य गीत हमारे राष्ट्रीय जीवन मे इतना प्रचार पा रहा है। 'वन्देमातरम्' को यदि 'विजयी विश्व' के मुकाबले में रखकर देखिए, तो आपको विदित होगा कि आपकी लापरवाही ने हिन्दी-साहित्य को आदर्श से कितना नीचे गिरा दिया है । जहाँ अच्छी चीज़ की कद्र करने वाले और परखने वाले नहीं है वहाँ नकली, घटिया, जटियल चीजें ही बाज़ार में आवे, तो कोई
[ १०० ]आश्चर्य की बात नहीं । वास्तव में हमारे यहाँ साहित्यिक जीवन का पता ही नहीं। नीचे से ऊपर तक मुरदनी-सी छाई हुई है। यही मुख्य कारण है कि हिन्दी लेखको मे बहुत से ऐसे लोग आ गये है, जिनका स्थान कही और था । और, जब तक शिक्षित समुदाय अपने साहित्यिक कर्तव्य की यो अवहेलना करता रहेगा, यही दशा बनी रहेगी । जहाँ साहित्य सम्मेलन जैसी सार्वजनिक संस्था के सदस्यो की कुल संख्या दो सौ से अधिक नहीं, वहाँ का साहित्य बनने में अभी बहुत दिन लगेगे।


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[ १०१ ]अगर आज से पचीस तीस साल पहले की किसी पत्रिका को उठाकर

आज की किसी पत्रिका से मिलाइए, तो आप को मालूम होगा कि हिन्दी गल्प-कला ने कितनी उन्नति की है। उस वक्त शायद ही कोई कहानी छपती थी, या छपती भी थी, तो किसी अन्य भाषा से अनूदित । मौलिक कहानी तो खोजने से भी न मिलती थी । अगर कभी कोई मोलिक चीज निकल जाती थी, तो हमको तुरन्त सन्देह होने लगता था, कि यह अनु- बादित तो नहीं है । अनुवादित न हुई तो छाया तो अवश्य ही होगी। हमे अपनी रचना-शक्ति पर इतना अविश्वास हो गया था । मगर आज किसी पत्रिका को उठा लीजिए, उसमे अगर ज्यादा नहीं, तो एक तिहाई अश कहानियो से अलकृत रहता ही है । और कहानियों भी अनूदित नहीं, मौलिक । इस तेज चाल से दौड़ने वाले युग मे किसी को किसी से बात करने की मुहलत नहीं है, मनुष्य को अपनी आत्मा की प्यास बुझाने के लिए, कहानी ही एक ऐसा साधन है, जिससे वह जरा-सी देर मे-जितनी देर मे वह चाय का एक प्याला पीता या फ़ोन पर किसी से बाते करता है-प्रकृति के समीप जा पहुँचता है। साहित्य उस उद्योग का नाम है, जो आदमी ने आपस के भेद मिटाने और उस मौलिक एकता को व्यक्त करने के लिए किया है, जो इस जाहिरी भेद की तह मे, पृथ्वी के उदर मे व्याकुल ज्वाला की भाति, छिपा हुआ है । जब हम मिथ्या विचारो और भावनाओ मे पड़कर अस- लियत से दूर जा पडते है, तो साहित्य हमे उस सोते तक पहुँचाता है, [ १०२ ]
जहाँ Reality अपने सच्चे रूप मे प्रवाहित हो रही है।और यह काम अब गल्प के सिर आ पड़़ा है । कवि का रहस्य-मय संकेत समझने के लिए अवकाश और शाति चाहिए । निबन्धो के गूढ तत्व तक पहुँचने के लिए मनोयोग चाहिये । उपन्यास का आकार ही हमे भयभीत कर देता है, और ड्रामे तो पढने की नही बल्कि देखने की वस्तु है। इसलिए, गल्प ही आज साहित्य की प्रतिनिधि है, और कला उसे सजाने और सेवा करने के और अपनी इस भारी जिम्मेदारी को पूरा करने के योग्य बनाने मे दिलोजान से लगी हुई है । कहानी का आदर्श ऊँचा होता जा रहा है, और जैसी कहानियाँ लिख कर बीस-पच्चीस साल पहले लोग ख्याति पा जाते थे, आज उनसे सुन्दर कहानियों भी मामूली समझी जाती है। हमे हर्ष है कि हिन्दी ने भी इस विकास में अपने मर्यादा की रक्षा की है और आज हिन्दी मे ऐसे-ऐसे गल्पकार आ गये हैं, जो किसी भाषा के लिए गौरव की वस्तु हैं । सदियो की गुलामी ने हमारे आत्म-विश्वास को लुप्त कर दिया है, विचारो की आजादी नाम को भी नहीं रही । अपनी कोई चीज़ उस वक्त तक हमे नहीं जॅचती, जब तक यूरप के आलोचक उसकी प्रशंसा न करे । इसलिए हिन्दी के आने वाले गल्प- कारो को चाहे कभी वह स्थान न मिले, जिसके वे अधिकारी है, और इस कसमपुरसी के कारण उनका हतोत्साह हो जाना भी स्वाभाविक है लेकिन हमे तो उनकी रचनाओ मे जो आनन्द मिला है, वह पश्चिम से आई कहा- नियो मे बहुतो मे नहीं मिला । संसार की सर्वश्रेष्ठ कहानियो का एक पोथा अभी हाल मे ही हमने पढ़ा है, जिसमे यूरप की हरेक जाति, अमेरिका, ब्राज़ील, मिस्र आदि सभी की चुनी हुई कहानियाँ दी गई है, मगर उनमे आधी दरजन से ज्यादा ऐसी कहानियों नही मिली, जिनका हमारे ऊपर रोब जारी हो जाता । इस संग्रह मे भारत के किसी गल्लकार की कोई रचना नहीं है, यहाँ तक कि डॉ० रवीन्द्रनाथ की किसी रचना को भी स्थान नहीं दिया गया । इससे संग्रहकर्ता की नीयत साफ जाहिर हो जाती है । जब तक हम पराधीन हैं, हमारा साहित्य भी पराधीन
[ १०३ ]है, और अगर किसी भारतीय साहित्यकार को कुछ आदर मिला है तो उसमे भी पश्चिमवालो की श्रेष्ठता का भाव छिपा हुया है, मानो उन्होने हमारे ऊपर कोई एहसान किया है। हमारे यहाँ ऐसे लोगो की कमी नही है, जिन्हे यूरप की अच्छी बाते भी बुरी लगती हैं और अपनी बुरी बात भी अच्छी । अगर हम मे अात्म-विश्वास की कमी अपना आदर नहीं करने देती, तो जातीय अभिमान की अधिकता भी हमे असलियत तक नहीं पहुँचने देती । कम से कम साहित्य के विषय मे तो हमे निष्पक्ष होकर खोटे खरो को परखना चाहिए। यूरप और अमे- रिका मे ऐसे-ऐसे साहित्यकार और कवि हो गुजरे हैं और आज भी हैं, जिनके सामने हमारा मस्तक आप से अाप झुक जाता है । लेकिन इसका यह अर्थ नही है कि वहाँ सब कुछ सोना ही सोना है, पीतल है ही नहीं। कहानिया मे तो हिन्दी उनसे बहुत पीछे हर्गिज नही है, चाहे वे इसे माने या न माने । प्रसाद, कौशिक या जैनेन्द्र की रचनाओ के विषय मे तो हमे कुछ कहना नहीं है । उनकी चुनी हुई चीजे किसी भी विदेशी साहित्यकार को रचनात्रा से टक्कर ले सकती हैं। हम आज उन गल्पकारो का कुछ जिक्र करना चाहते है, जो हिन्दी-गल्य-कला के विकास मे श्रेय के साथ अपना पार्ट अदा कर रहे हैं, यद्यपि साहित्य समाज मे उनका उतना आदर नही है, जितना होना चाहिए।

इन गल्पकारो मे पहला नाम जो हमारे सामने आता है वह है- भारतीय एम० ए० । इनकी अभी तक पॉच-छः कहानियाँ पढ़ने का ही हमें अवसर मिला है और इनमे हमने भावो की वह प्रौढ़ता, निगाह की वह गहराई, मनोविज्ञान की वह बारीकी और भाषा की वह सरलता पाई है कि हम मुग्ध हो गये हैं । 'हस' को पिछलो संख्या मे 'मुनमुन' नाम की उनकी कहानी अद्भुत है और हम उसे 'मास्टरपीस' कह सकते है । वह नवीनता और ताजेपन के पीछे नहीं दौड़ते, कहीं चमकने की सचेत चेष्टा नही करते, ऊँचे उड़ जाने की हवस उन्हे नहीं है । वह उसी दायरे मे रहते है, जिसका उन्होने कलाकार की ऑखो से अनुभव किया है, [ १०४ ]और उनके हृदय की सरसता उन साधारण दृश्यों में कुछ ऐसी सजीवता, कुछ ऐसा रस भर देती है कि पाठक पढ़ने के वक्त ऑखे बन्द करके उसका आनन्द उठाता है, और उसका मन कहता है कि इन दस मिनिटो का इससे अच्छा इस्तेमाल वह न कर सकता था। भारतीय महोदय विद्वान् हैं, हिन्दी के एम० ए० । पुराने कवियो को उन्होने खूब पढ़ा है । और उनकी रचनात्रो की टीकाएँ भी लिखी हैं। मौलिक सृष्टि की ओर उनका ध्यान हाल मे पाया है, और हमारे खयाल मे यह अच्छा ही हुआ । कच्ची लेखनी इस क्षेत्र मे जो ठोकरे खाया करती है, वह उन्हें नहीं खानी पड़ी।

भारतीयजी की कहानियो को अगर किसी पुराने स्कूल की कुल- बधू की उपमा दें, जिसकी जीवन धारा सेवा और त्याग के बीच मे शाति के साथ बहती है, तो श्री वीरेश्वरसिंह की कहानियों मे नये स्कूल की युवती का लोच और सिंगार है, जिसके लिए ससार केवल मर्यादाओं का क्षेत्र नहीं, अानन्द और विनोद का क्षेत्र भी है। इनकी कहानियों मे कुछ ऐसी शोखी, कुछ ऐसी सजावट, कुछ ऐसा बाकपन होता है कि युवक फड़क जाते हैं, और युवतियाँ अॉखें मुका लेती हैं । मगर, इनका दायरा अभी फैलने नहीं पाया है । हमने इनकी जितनी कहानियाँ पढ़ी हैं, अतीत जीवन के दो एक रसीले अनुभवो की झलक मिली है, मगर उनमे यह कुछ ऐसा जादू-सा भर देते हैं कि एक-एक वाक्य को बार- बार पढ़ने को जी चाहता है । बात मे बात पैदा करने मे इन्हे कमाल है और मामूली-सी बात को यह ऐसे सुन्दर, चुलबुले शब्दो मे कह जाते हैं कि सामने फूल-सा खिल जाता है । जैसे-जैसे अनुभवो की सीमा फैलेगी, इनकी रचनाओं मे प्रौढ़ता और गहराई अायगी, मगर हमे आशा है, इनका चुलबुलापन बना रहेगा और इस अनोखे रङ्ग की रक्षा करता रहेगा।

'उसी उपमा की रक्षा करते हुए, हम श्री भुवनेश्वर प्रसाद 'भुवन' की रचनाओं में उस विधवा का तेज और कसक और विद्रोह पाते है, [ १०५ ]
जिसे समाज और ससार कुचल डालना चाहता हो । पर वह अकेली सारी दुनिया को चुनौती देने खड़ी हो । भुवनजी से हमारा परिचय विचित्र परिस्थिति मे हुआ ओर हमने उनके रोम-रोम मे वह असतोष, बह गहरी सूझ, और मनोभावों को व्यक्त करने की वह शक्ति पाई, जो अगर सयम से काम लिया गया, और परिस्थितियो ने प्रतिभा को कुचल न दिया, तो एक दिन हिन्दी का उन पर गर्व होगा। उनके मिजाज में एक सैलानोपन है और उन्हे अपने-आप मे डूबे रहने और अपनी कटुताओ से सरल जीवन का कटु बनाने का वह मरज है, जो अगर एक अोर साहित्य की जान है, तो दूसरी ओर उसकी मौत भी है। यह ड्रामे भी लिखते हैं और इनके कई एकाकी ड्रामे हस मे निकल चुके हैं। जिन्होने वह ड्रामे पढ़े हैं, उनको मालूम हुअा होगा कि उनमें कितनी चोट, कितना दर्द और कितना विद्रोह है । भुवनजी उर्दू भी अच्छी जानते है, उर्दू और हिन्दी दोनो ही भाषाओं में शायरी करते हैं, और साहित्य के मर्मज्ञ है। उन पर भास्कर वाइल्ड का गहरा रङ्ग चढ़ा हुआ है, जो अद्भुत प्रतिभाशाली होने पर भी कला की पवित्रता को निभा न सका।

इन तोना स्रष्टाओ से कुछ अलग श्री 'अज्ञेय' का रङ्ग है। उनकी रचनाओ मे यद्यपि 'आमद' नही 'आबुर्द है, पर उसके साथ ही गद्य- काव्य का रस है। वह भावना प्रधान होती है, गरिमा से भरी हुई, अतस्तल की अनुभूतियो से रञ्जित एक नये वातावरण मे ले जानेवाली, जिन्हे पढ़ कर, कुछ ऐसा आभास होता है कि हम ऊँचे उठ रहे है। लेकिन उनका आनन्द उठाने के लिए उन्हे ध्यान से पढ़ने की जरूरत है क्योकि वे जितना कहती हैं, उससे कहीं ज्यादा बे कहे छोड़ देती हैं। काश, अज्ञेयजी कल्पना-लोक से उतर कर यथार्थ के संसार मे आते ।

इन्हीं होनहार युवकों मे श्री जनार्दनराय नागर है। हमारे युवको मे ऐसे सरल, ऐसे शीलवान, ऐसे सयमशील युवक कम होंगे। उनके साथ बैठना और उनकी आत्मा से निकले हुए निष्कपट उद्गारों को सुनना
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अनुपम अानन्द है।कहीं बनावट नहीं, जरा भी तकल्लुफ नहीं । पक्का ब्रह्मचारी, जिसे आजकल का फैशन छू तक नही गया । मिजाज मे इन्तहा की सादगी इन्तहा की खाकसारी, जो दुनिया के बन्दों को भी मानो अपने प्रकाश से प्रकाशमान कर देती है। वह युनिवर्सिटी का छात्र होकर भी गुरुकुल के ब्रह्मचारियो का-सा आचरण रखता है । और उसे खुद खबर ही नहीं कि वह अपने अन्दर कितनी साधना रखता है। इनकी कई रचनाएँ हमने पढी है और प्रकाशित की है। इनके यहाँ ओज नही है, चुलबुलापन नहीं है; पर जीवन की सच्ची झलक है, सच्चा दर्द है ओर कलाकार की सच्ची अनुभूति है। इन्होने एक बडा उपन्यास भी लिखा है, जिसमे इनकी कला पूर्ण रूप से प्रस्फुटित हुई है, और उसे पढकर यह अनुमान भी नहीं किया जा सकता कि इसका लेखक एक बाइस-तेइस वर्ष का युवक है ।

इन्हीं रत्नो मे हम प्रयाग के श्री त्रिलोकीनाथ मिच्चू का जिक्र करना आवश्यक समझते हैं। इन्होने दो साल पहले 'दो मित्र' नाम की एक मनोहर पशु-जीवन की कहानी लिखी थी। वह हमे इतनी भायी कि हमने उसे तुरन्त 'जागरण' मे प्रकाशित किया। उसके बाद आपकी एक कहानी 'पहाड़ी' नाम से 'माया' मे निकली । वह है तो छोटी-सी मगर बडी ही मर्मस्पर्शी । इस अक मे आपकी जो 'आशा' नामक कहानी छपी है, वह उनकी कला का अच्छा नमूना है। आपकी रचनात्रो मे स्वस्थ यथार्थता और सहानुभूतिपूर्णता की अनुपम छटा होती है और यद्यपि आप बहुत कम लिखते है पर जो कुछ लिखते है; अच्छा लिखते है। आपकी इस कहानी मे सयत प्रणयं का इतना सुन्दर चित्र है कि विषय मे कोई नवीनता न होने पर भी कहानी यथार्थ बन गई है। हमारे पास ६० फीसदी कहानियाँ प्रणय-विषयक ही आती है; पर प्रणय का इतना वीभत्स रूप दिखाया जाता है, या इतना अस्वाभाविक-और बिहार के युवक लेखको ने मानों इस ढ़ग की कहानियों लिखने का ठीका-सा ले लिया है-कि हमे उनको छापते संकोच
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होता है और इस बात का खेद होता है कि इन भले आदमियों के हृदय मे प्रेम की कितनी गलत धारणा जमी हुई है। यह विषय जितना ही व्यापक है, उतना ही उसे निभाना मुश्किल है। छिछोरी लालसा को प्रेम जैसी पवित्र साधना से वही सम्बन्ध है, जो दूध को शराब से है । प्रेम का आदर्श रूप कुछ वही है, जो मिन्चू ने अपनी कहानी मे चित्रित किया है।

यह सूची गैर मुकम्मल रह जायगी अगर हम राची के श्री राधा- कृष्णजी का उल्लेख न करे । आपकी कई रचनाएँ 'हस' और 'जागरण' मे निकल चुकी हैं और रुचि के साथ पढ़ी गई हैं। आपकी शैली हास्य- प्रधान है और बड़ी ही सजीव । प्रतिकूल दशाओं मे रहकर भी आपकी तबीयत मे मज़ाक का रङ्ग फीका नहीं होने पाया।

हमारी गल्प-कला के विकास मे युवकों ने ही नहीं कदम आगे बढ़ाया है। युवतियों भी उनके साथ कथा मिलाए चल रही है । साहित्य और समाज मे बड़ा नज़दीकी सम्बन्ध होने के कारण अगर पुरुषो के हाथ मे ही कलम रहे, तो साहित्य के एकतरफ़ा हो जाने का भय है । ऐसे पुरुष किसी साहित्य मे भी ज्यादा नहीं हो सकते, जो रमणी हृदय की समस्याओ और भावो का सफल रूप दिखा सकें। एक ही स्थिति को स्त्री और पुरुष दोनों अलग-अलग ऑखो से देख सकते हैं और देखते है । पुरुष का क्षेत्र अब तक अधिकतर घर के बाहर रहा है, और आगे भी रहेगा । स्त्री का क्षेत्र घर के अन्दर है, और इसलिए उसे मनोरहस्याॅ की तह तक पहुँचने के जितने अवसर मिलते हैं, उतने पुरुषो को नहीं मिलते। उनकी निगाहो मे ज्यादा बारीकी, ज्यादा कोमलता, ज्यादा दर्द होता है । साहित्य को सर्वाग पूर्ण बनाने के लिए महिलाओं का सहयोग लाजिमी है, और मिल रहा है। इधर कई बहनों ने इस मैदान में कदम रखा है, जिनमे उषा, कमला और सुशीला, ये तीन नाम खास तौर पर सामने आते हैं। श्रीमती उषा मित्रा बगाली देवी है, और शायद उनकी पहली रचना डेढ़-दो साल पहले 'हंस' में
[ १०८ ]प्रकाशित हुई थी। तब से वह बराबर सभी पत्रिकाओं मे लिख रही हैं। उनकी रचनाओं में प्राकृतिक दृश्यो के साथ मानव-जीवन का ऐसा मनोहर सामजस्य होता है कि एक-एक रचना मे संगीत की माधुरी का आनन्द आता है। साधारण प्रसगों मे रोमास का रग भर देने मे उन्हे कमाल है। इधर उन्होने एक उपन्यास भी लिखा है, जिसमे उन्होने वर्तमान समाज की एक बहुत ही जटिल समस्या को हल करने का सफल उद्योग किया है और जीवन का ऐसा आदर्श हमारे सामने, पेश किया है जिसमे भारतीय मर्यादा अपने कल्याणमयरूप की छटा दिखाती है । हमे अाशा है, हम जल्द ही आपका उपन्यास प्रकाशित कर सकेंगे।

श्रीमती कमला चौधरी ने भी लगभग दो साल से इस क्षेत्र में पदार्पण किया है, और उनकी रचनाएँ नियमित रूप से 'विशाल-भारत' मे निकल रही है । नारी-हृदय का ऐसा सुन्दर चित्रण हिन्दी मे शायद ही और कहीं मिल सके । आप की हरेक रचना मे अनुभूति की-सी यथार्थता होती है । 'साधना का उन्माद', 'मधुरिमा' और 'भिखमंगे की बेटी' अादि उनकी वह कहानियाँ हैं, जो नारी हृदय की साधना, स्नेह और त्याग का रूप दिखाकर हमें मुग्ध कर देती हैं। आप कभी-कभी ग्रामीण बोली का प्रयाग करके अपने चरित्रों मे जान-सी डाल देती हैं। आपकी गल्पो का एक संग्रह 'साधना का उन्माद' नाम से हाल मे ही प्रकाशित हुआ है।

कुमारी सुशीला आगा की केवल दो कहानियों हमने पढ़ी हैं, लेकिन वह दोनो कहानियाँ पढ़कर हमने दिल थाम लिया । 'अतीत के चित्र' मे उन्होने नादिरा की सष्टि करके सिद्ध कर दिया है कि उनकी रचना- भूमि ज़रखेज़ है और उसमे मनोहर गुल-बूटे खिलाने को दैवी शक्ति है । कह नहीं सकते, वह इस शक्ति से काम लेकर साहित्य के उद्यान की शोभा बढ़ायेंगी, या उसे शिथिल हो जाने देगी । अगर ऐसा हुआ, तो साहित्य-प्रेमियों को दुःख होगा।

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[ १०९ ]साहित्य का वर्तमान युग मनोविज्ञान का युग कहा जा सकता है।

साहित्य और केवल मनोरजन की वस्तु नहीं है। मनोरंजन के सिवा उसका कुछ और भी उद्देश्य है । वह अब केवल विरह और मिलन के, राग नहीं अलापता । वह जीवन की समस्याओं पर विचार करता है, उनकी आलोचना करता है और उनको सुलझाने की चेष्टा करता है।

नीति-शास्त्र और साहित्य का कार्य-क्षेत्र एक है, केवल उनके रचना विधान मे अन्तर है । नीति-शास्त्र भी जीवन का विकास और परिष्कार चाहता है, साहित्य भी। नीतिशास्त्र का माध्यम तर्क और उपदेश है । वह युक्तियो और प्रमाणों से बुद्धि और विचार को प्रभावित करने की चेष्टा करता है । साहित्य ने अपने लिए मनो- भावनाओ का क्षेत्र चुन लिया है । वह उन्ही तत्वों को रागात्मक व्यंजना के द्वारा हमारे अंतस्तल' तक पहुँचाता है। उसका काम हमारी' सुन्दर भावनाओ को जगाकर उनमे क्रियात्मक शक्ति की प्रेरणा करना है। नीतिशास्त्री बहुत से प्रमाण देकर हमसे कहता है, ऐसा करो, नहीं तुम्हें पछताना पड़ेगा। कलाकार उसी प्रसग को इस तरह हमारे सामने उपस्थित करता है कि उससे हमारा निजत्व हो जाता है, ओर बह हमारे आनन्द का विषय बन जाता है ।

साहित्य की बहुत-सी परिभाषाएँ की गई हैं लेकिन मेरे विचार मे उसकी सबसे सुन्दर परिभाषा जीवन की आलोचना है । हम जिस रोमा[ ११० ]
से काम लेता था । स्वर्ग और नरक, पाप और पुण्य, उसके यन्त्र थे। साहित्य हमारी सौदर्य-भावना को सजग करने की चेष्टा करता है । मनुष्य- मात्र मे यह भावना होती है । जिसमे यह भावना प्रबल होती है, और उसके साथ ही उसे प्रकट करने का सामर्थ्य भी होता है, वह साहित्य का उपासक बन जाता है । यह भावना उसमे इतनी तीव्र हो जाती है कि मनुष्य मे, समाज मे, प्रकृति मे, जो कुछ असुन्दर, असौम्य, असत्य है, वह उसके लिए असह्य हो जाता है, और वह अपनी सौदर्यभावना से व्यक्ति और समाज मे सुरुचिपूर्ण जागृति डाल देने के लिए व्याकुल हो जाता है । यो कहिए कि वह मानवता का, प्रगति का, शराफत का वकील है । जो दलित हैं, मर्दित हैं, ज़ख्मी हैं, चाहे वे व्यक्ति हों या समाज उनकी हिमायत और वकालत उसकी धर्म है। उसकी अदालत समाज है। इसी अदालत के सामने वह अपना इस्त- गासा पेश करता है और अदालत की सत्य और न्याय-बुद्धि और उसकी सौन्दर्य-भावना को प्रभावित करके ही वह सन्तोष प्राप्त करता है । पर साधारण वकीलो की तरह वह अपने मुवक्किल की तरफ से जा और बेजा दावे नहीं पेश करता, कुछ बढ़ाता नहीं, कुछ घटाता नहीं, न गवाहों को सिखाता पढ़ाता है । वह जानता है, इन हथकण्डो से वह समाज की अदालत मे विजय नही पा सकता । इस अदालत मे तो तभी सुन- वाई होगी, जब आप सत्य से जौ-भर भी न हटे, नहीं अदालत उसके खिलाफ फैसला कर देगी और इस अदालत के सामने वह मुवक्किल का सच्चा रूप तभी दिखा सकता है, जब वह मनोविज्ञान की सहायता ले । अगर वह खुद उसी दलित समाज का एक अग है, तब तो उसका काम कुछ आसान हो जाता है क्योकि वह अपने मनोभावों का विश्ले- षण करके अपने समाज की वकालत कर सकता है। लेकिन अधिकतर वह अपने मुवक्किल की आन्तरिक प्रेरणाश्रो से, उसके मनोगत भावों से अपरिचित होता है । ऐसी दशा मे उसका पथ-प्रदर्शक मनोविज्ञान के सिवा कोई और नहीं हो सकता । इसलिए साहित्य के वर्तमान युग को
[ १११ ]हमने मनोविज्ञान का युग कहा है। मानव-बुद्धि की विभिन्नताओं को मानते हुए भी हमारी भावनाएँ सामान्यतः एक रूप होती हैं। अन्तर केवल उनके विकास मे होता है। कुछ लोगों में उनका विकास इतना प्रखर होता है कि वह क्रिया के रूप मे प्रकट होता है वर्ना अविकतर सुषुप्तावस्था में पड़ा रहता है । साहित्य इन भावनाओं को सुषुप्तावस्था से जाग्रतावस्था मे लाने की चेष्टा करता है। पर इस सत्य को वह कभी नहीं भूल सकता कि मनुष्य मे जो मानवता और सौदर्य-भावना छिपी हुई रहती है, वहीं उसका निशाना पडना चाहिए । उपदेश और शिक्षा का द्वार उसके लिए बन्द है । हाँ उसका उद्देश्य अगर सच्चे भावावेश मे डूबे हुए शब्दो से पूरा होता है, तो वह उनका व्यवहार कर सकता है।

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हमने गत मास के 'लेखक' मे 'सिनेमा और साहित्य' शीर्षक से एक

छोटा सा लेख लिखा था, जिसे पढ़कर हमारे मित्र श्री नरोत्तम प्रसाद जी नागर, सपादक 'रंगभूमि' ने एक प्रतिवाद लिख भेजने की कृपा की है। हम अपने लेखको 'लेखक' से यहाँ नकल कर रहे हैं, ताकि पाठकों को मालूमहो जाय कि हमारे और नरोत्तमप्रसाद जी के विचारो मे क्या अंतर पाठक स्वय अपना निर्णय कर लेंगे । नागर जो का मै कृतज्ञ हूँ, कि है । उन्होंने उस लेखको पढ़ा और उसपर कुछ लिखनेकी जरूरत समझी। वह खुद सिनेमा मे सुधार के समर्थक है और बरसों से यह अान्दोलन कर रहे हैं, इसलिए इस विषय पर। उन्हें सम्मति देने का पूरा अधिकार है । हम उनके प्रतिवाद को भी ज्यों का त्यो छापते हैं।

'लेखक' में प्रकाशित हमारा लेख

अकसर लोगों का खयाल है कि जब से सिनेमा 'सवाक्' हो गया है, वह साहित्य का अंग हो गया, और साहित्य सेवियों के लिए कार्य का एक नया क्षेत्र खुल गया है । साहित्य भावो को जगाता है, सिनेमा भी भावो को जगाता है, इसलिए वह भी साहित्य है । लेकिन प्रश्न यह होता है-कैसे भावो को १ साहित्य वह है जो ऊँचे और पवित्र भावो को जगाये, जो सुन्दरम् को हमारे सामने लाये । अगर कोई पुस्तक हमारी पशु भावनाओं को प्रबल करती है, तो हम उसे साहित्य में स्थान न देगे । पारसी स्टेज के ड्रामो को हमने साहित्य का गौरव नहीं दिया । इसीलिए कि सुन्दरम् का जो साहित्यिक आदर्श अव्यक्त
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रूप से हमारे मन मे है,उसका वहाँ कहीं पता न था।होली और कजली और बारहमासे की हजारो पुस्तके आये दिन छपा करती है, हम उन्हे साहित्य नहीं कहते । वह बिकती बहुत है, मनोरंजन भी करती है, पर साहित्य नहीं है । साहित्य मे भावो की जो उच्चता, भाषा की जो प्रौढ़ता और स्पष्टता, सुन्दरता की जो साधना होती है, वह हमे वहाँ नही मिलती। हमारा खयाल है कि हमारे चित्रपटो मे भी वह बात नहीं मिलती। उनका उद्देश्य केवल पैसा कमाना है । सुरुचि या सुन्दरता से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं । वह तो जनता को वही चीज़ देंगे जो वह मॉगती है। व्यापार, व्यापार है । वहाँ अपने नफे के सिवा और किसी बात का ध्यान करना ही वर्जित है। व्यापार मे भावुकता आई और व्यापार नष्ट हुआ। वहाँ तो जनता की रुचि पर निगाह रखनी पड़ती है और चाहे संसार का सचालन देवताअो ही के हाथो मे क्यों न हो, मनुष्य पर निम्न मनो- बृत्तियों का राज्य होता है। अगर आप एक साथ दो तमाशों की व्यवस्था करे-एक तो किसी महात्मा का व्याख्यान हो, दूसरा किसी वेश्या का नग्न नृत्य, तो आप देवेगे कि महात्मा जी तो खाली कुरसियों को अपना भाषण सुना रहे हैं और वेश्या के पण्डाल में तिल रखने को जगह नहीं । मुँह पर राम-राम मन मे छुरी वाली कहावत जितनी ही लोकप्रिय है, उतनी ही सत्य भी है । वही भोला भाला ईमानदार ग्वाला जो अभी ठाकुरद्वारे से चरणामृत लेकर आया है, बिना किसी झिझक के दूध मे पानी मिला देता है । वही बाबूजी, जो अभी किसी कवि की एक सूक्ति पर सिर धुन रहे थे, अवसर पाते ही एक विधवा से रिश्वत के दो रूपये बिना किसी झिझक के लेकर जेब मे दाखिल कर लेते हैं। उपन्यासो मे भी ज्यादा प्रचार डाके और हत्या से भरी हुई पुस्तको का होता है । अगर पुस्तको मे कोई ऐसा स्थल है जहाँ लेखक ने संयम की लगाम ढीली कर दी हो तो उस स्थल को लोग बड़े शोक से पढ़ेगे, उस पर लाल निशान बनायेगे, उस पर मित्रों से मुबाहसे करेंगे। सिनेमा मे भी वही तमाशे खूब चलते है, जिनसे निम्न-भावनाओं की
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विशेष तृप्ति हो ।वही सन्जन,जो सिनेमा की कुरुचि की शिकायत करते फिरते है, ऐसे तमाशो मे सबसे पहले बैठे नजर आते है। साधु तो गली गली भीख माँगते है पर वेश्याश्रो को भीख मांगते किसी ने न देखा होगा। इसका आशय यह नहीं कि ये भिखमगे साधु वेश्याश्रो से ऊँचे है-लेकिन जनता की दृष्टि मे वे श्रद्धा के पात्र है। इसीलिये हर एक सिनेमा प्रोडयूसर, चारे वह समाज का कितना बडा हितैषी क्यो न हो, तमाशे मे नीची मनोवृत्तियो के लिए काफी मसाला रखता है नही तो उसका तमाशा ही न चले । बम्बई के एक प्रोड्यूसर ने ऊँचे भावो से भरा हुअा एक खेल तैयार किया, मगर बहुत हाय हाय करने पर भी जनता उसकी ओर आकर्षित न हुई । 'पास' के अन्धाधुन्ध वितरण से रुपये तो नहीं मिलते । आमन्त्रित सज्जनो और देवियों ने तमाशा देखकर मानो प्रोड्यूसर पर एहसान किया और बखान करके मानो उसे मोल ले लिया । उसने दूसरा तमाशा जो तैयार किया, वह वही बाजारू ढग का और वह खूब चला। पहले तमाशे से जो घाटा हुआ था, वह इस दूसरे तमाशे से पूरा हो गया। जिस शौक से लोग शराब और ताडी पीते है, उसके आधे शौक से दूध नहीं पीते । 'साहित्य' दूध होने का दावेदार है, सिनेमा, ताड़ी या शराब की भूख को शान्त करता है। जब तक साहित्य अपने स्थान से उतर कर और अपना चोला बदलकर शराब न बन जाय, उसका वहाँ निर्वाह नहीं। साहित्य के सामने अादर्श है, सयम है, मर्यादा है। सिनेमा के लिये इसमे से किसी वस्तु की जरूरत नही । सेंसर बोर्ड के नियन्त्रण के सिवा उस पर कोई नियन्त्रण नहीं । जिसे साहित्य की 'सनक' है वह कभी कुरुचि की ओर जाना स्वीकार न करेगा। मर्यादा की भावना उसका हाथ पकड़े रहती है, इसलिए हमारे साहित्यकार के लिये, जो सिनेमा मे हैं, वहाँ केवल इतना ही काम है कि वे डाइरेक्टर साहब के लिखे हुए गुजराती, मराठी या अग्रेजी कथोपकथन को हिन्दी मे लिख दे । डाइ- रेक्टर जानता है कि सिनेमा के लिए जिस 'रचना कला' की जरूरत
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है वह लेखका मे मुश्किल से मिलेगी; इसलिए वह लेखकों से केवल उतना ही काम लेता है जितना वह बिना किसी हानि के ले सकता है। अमेरिका और अन्य देशो मे भी साहित्य और सिनेमा मे साम- न्जस्य नहीं हो सका और न शायद ही हो सकता है । साहित्य जन-रुचि का पथ-प्रदर्शक होता है, उसका अनुगामी नहीं। सिनेमा जन-रुचि के पीछे चलता है, जनता जो कुछ माँगे वही देता है । साहित्य हमारी सुन्दर भावना को स्पर्श करके हमे आनन्द प्रदान करता है । सिनेमा हमारी कुत्सित भावनाशो को स्पर्श करके हमे मतवाला बनाता है और इसकी दवा प्रोड्यूसर के पास नहीं । जब तक एक चीज की मॉग है, वह बाजार मे आएगी । कोई उसे रोक नहीं सकता। अभी वह जमाना बहुत दूर है जब सिनेमा और साहित्य का एक रूप होगा। लोक-रुचि जब इतनी परिष्कृत हो जायगी कि वह नीचे ले पाने वाली चीजो से घृणा करेगी, तभी सिनेमा मे साहित्य की सुरुचि दिखाई पड़ सकती है।

हिन्दी के कई साहित्यकारों ने सिनेमा पर निशाने लगाये लेकिन शायद ही किसी ने मछली बेध पाई हो । फिर गले मे जयमाल कैसे पड़ता? आज भी पडित नारायण प्रसाद बेताब, मुन्शी गौरीशकर लाल अख्तर, श्री हरिकृष्ण प्रेमी, मि० जमना प्रसाद काश्यप, मि० चन्द्रिका प्रसाद श्रीवास्तव, डाक्टर धनीराम प्रेम, सेठ गोविन्द दास, पडित द्वारका प्रसाद जी मिश्र आदि सिनेमा की उपासना करने में लगे हुए है । देखा चाहिए सिनेमा इन्हे बदल देता है या ये सिनेमा की काया-पलट कर

श्री नरोत्तम प्रसाद जी की चिट्ठी

श्रद्धेय प्रेमचन्द जी,

'लेखक' में आपका लेख 'फिल्म और साहित्य' पढा । इस चीज को लेकर रगभूमि मे अच्छी खासी कन्ट्रोवर्सी चल चुकी है। रगभूमि के वे
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अंक अापको भेजे भी गए थे।पता नहीं अापने उन्हे देखा कि नहीं। अस्तु।

आपने सिनेमा के सम्बन्ध मे जो कुछ लिखा है, वह ठीक है । साहित्य को जो स्थान दिया है, उससे भी किसी का मतभेद नहीं हो सकता। निश्चय ही सिनेमा ताड़ी और साहित्य दूध है; पर इस चीज को जेनेरलाइज करना ठीक न होगा। सिनेमा के लिए भी और साहित्य के लिए भी। साहित्य भी इसी ताडीपन से अछूता नहीं है । सिनेमा को मात करने वाले उदाहरण भी उसमे मिल जायेंगे-एक नहीं अनेक । और ऐसे व्यक्तियो के जिनको कि साहित्यिक ससार ने रिकग्नाइज किया है। और तो और, पाठ्यकोर्स तक मे जिनकी पुस्तकें हैं । अपने समर्थन मे महात्मा गान्वी के वे वाक्य उद्धत करने होगे क्या, जो कि उन्होंने इन्दौर साहित्य सम्मेलन के सभापति की हैसियत से कहे है ? लेकिन प्रत्यक्ष किम् प्रमाणम् । यही बात सिनेमा के साथ है । सिनेमा के साथ तो एक और भी गड़बड़ है। वह यह कि बदनाम है । आपके ही शब्दों में भिखमगे साधु वेश्याओं से अच्छे न होते हुए भी श्रद्धा के पात्र हैं। श्रद्धा के पात्र है, इसलिए टालरेबुल है या उतने विरोध के पात्र नहीं है, जितने कि वेश्याएँ । इसी तर्क शैली को लेकर आप सिद्ध करते हैं कि सिनेमा ताड़ी है और साहित्य दूध | ताडी ताड़ी है और दूध दूध । आपने इन दोनो के दर्मियान एक वेल मार्ड एन्ड वेल डिफाइन्ड लाइन आप डिफरेन्स खीच दी है।

मेरा आपसे यहाँ सैद्धान्तिक मतभेद है । मेरा ख्याल है कि यह विचारधारा ही गलत है, जो इस तरह की तर्क शैली को लेकर चलती है । कभी जमाना था, जब इस तर्क शैली का जोर था, सराहना थी पर अब नहीं है । इस चीज को हमे उखाड़ फेकना ही होगा।

एक जगह आप कहते है कि साहित्य का काम जनता के पीछे चलना नहीं, उसका पथ-प्रदर्शक बनना है । आगे चलकर आप साधु और वेश्याओं की मिसाल देते हैं। साधु वेश्याओ से अच्छे न होते हुए
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भी जनता की श्रद्धा के पात्र है । यहा आप जनता की इस श्रद्धा को अपने समर्थन मे आगे क्यो रखते है।

आपने जो साहित्य के उद्देश्य गिनाये है, उन्हे पूरा करने मे सिनेमा साहित्य से कही आगे जाने की क्षमता रखता है । यूटिलिटी के दृष्टिकोण से सिनेमा साहित्य से कही अधिक ग्राह्य है; लेकिन यह सब होते हुए भी सिनेमा की उपयोगिता कुपात्रो के हाथो मे पड़कर दुरुपयोगिता मे परिणत हो रही है। इसमे दोष सिनेमा का नही, उनका है जिनके हाथ मे इसकी बागडोर है । इनसे भी अधिक उनका है जो इस चीज को बर्दाश्त करते है। बर्दाश्त करना भी बुरा नही होता, यदि इसके साथ मजबूरी की शर्त न लगी होती।

गले मे जयमाल पड़ने वाली बात भी बड़े मजे की है-'कितने ही साहित्यिको ने निशाने लगाये पर शायद ही कोई मछली बेध पाया हो। जयमाल गले मे कैसे पडती ?' बहुत खूब । जिस चीज़ के लिए साहित्यिको ने सिनेमा पर निशाने लगाये, वह चीज क्या उन्हे नहीं मिली-अपवाद को छोडकर ? आप या कोई और साहित्यिक यह बताने की कृपा करेंगे कि सिनेमा मे प्रवेश करने वाले साहित्यिको मे से ऐसा कौन है, जिसके सिनेमा प्रवेश का मुख्य उद्देश्य सिनेमा को अपने रग' मे रगना रहा हो ? क्या किसी भी साहित्यिक ने सिन्सीयरली इस ओर कुछ काम किया है ? फिर जयमाल गले मे कैसे पडती ? माना कि साहित्य संसार मे जयमाल और सम्राट की उपाधियाँ टके सेर बिकती हैं। लेकिन सभी जगह तो इन चीजो का यही भाव नहीं है । पहले सिनेमा- जगत को कुछ दीजिए, या यो ही गले मे जयमाल पड़ जाये ? या सिर्फ साहित्यिक होना ही गले मे जयमाल पड़ने क! क्वालिफिकेशन है ?

आप बम्बई मे रह चुके हैं। सिनेमा-जगत की आपने झाकी भी ली है। आपको यह बताने की आवश्यकता नहीं कि हमारे साहित्यिक भी, अपनी फिल्मो मे निर्दिष्ट रुचि का समावेश करने मे किसी से पीछे नहीं रहे हैं । या कहे कि आगे ही बढ़ गये है। औरो को छोड़ दीजिए, वे
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साहित्यिक भी जो कि एक तरह से कम्पनी के सर्वेसर्वा है, अपने फिल्म मे दो सौ लड़कियों का नाम रखने से बाज न आये, जो कि बज़िद थे, कि तालाब से पानी भरने वाले सीन मे हीरोइन अण्डरवियर न पहने, हीरो आये, उससे छेड़खानी करे और उसका घड़ा छीनकर उस पर डाल दे । बदन पर अण्डरवियर नहीं, वस्त्र भीगे, बदन से चिपके, और नग्नता का प्रदर्शन हो। यह सूझ उन्हीं साहित्यिको मे से एक की है, जिनके कि आपने नाम गिनाये हैं। ..."लेकिन मुझे कहना चाहिए कि इसमे साहित्यिक का दोष जरा भी नहीं है । .... और ऐसी ब्लैक- शीप मेन्टैलिटी साहित्यिक क्या और सिनेमा क्या, सभी जगह मिल जायेगी।

आपने अपने लेख में होली, कजली और बारहमासे, की पुस्तकों का जिक्र किया है । इन चीजो को साहित्य नहीं कहा जाता या साहित्यिक इन्हे रिकग्नाइज नहीं करते, यह ठीक है। लेकिन उनका अस्तित्व है और जिस प्रेरणा या उमंग को लेकर अन्य कलाओं का सृजन होता है उन्ही को लेकर यह होली, कजली और बारहमासे भी आये है । लेकिन आपका उन्हे अपने से अलग रखना भी स्वाभाविक है। यूटिलिटी के व्यक्तिगत दृष्टिकोण से। इसी तरह क्या आपने कभी यह जानने का कष्ट किया है कि सिनेमा- जगत में क्लासेज एड मासेज-दोनों की ही अोर से कौन-कौन सी कम्पनियों, कौन-कौन से डाइरेक्टरों और कौन-कौन से फिल्मो को रिक- ग्नाइज किया जाता है ? भारत की मानी हुई या सर्वश्रेष्ठ कम्पनियों कौन सी हैं, यह पूछने पर आपको उत्तर मिलेगा-प्रभात, न्यू थियेटर्स और रणजीत । डाइरेक्टरों की गणना मे शान्ताराम, देवकी बोस और चन्दू- लाल शाह के नाम सुनाई देगे । तब फिर आपका, या किसी भी व्यक्ति का, जो भी फिल्म या कम्पनी सामने आ जाये उसी से सिनेमा पर एक स्लैशिगफ़तवा देना कहाँ तक सगत है, यह आपही सोचें । यह तो वही बात हुई कि कोई आदमी किसी लाइब्रेरी मे जाता है । जिस पुस्तक पर हाथ पड़ता है, उसे उठा लेता है । और फिर उसी के आधार
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पर फतवा दे देता है कि हिन्दी मे कुछ नहीं है, निरा कूड़ा भरा है । क्या आप इस चीज को ठीक समझते है ?

अब दो एक शब्द आपके मादक या मतवालावाद पर भी । पहली बात तो यह कि केवल यूटिलिटेरियन एन्ड्स की दृष्टि से लिखा गया साहित्य ही साहित्य है, ऐसा कहना ठीक नही ! ऐसी रचना करने के लिए साहित्यिक से अधिक प्रोपेगेण्डिस्ट होने की जरूरत है। इतना ही नही । इन एन्डस को पूरा करने के लिए अन्य साधन मौजूद है, जो साहित्य से कही अधिक प्रभावशाली है । तब फिर, साहित्य के स्थान पर उन साधनो को प्रेफरेन्स क्यो न दिया जाये ? इसे भी छोड़िए। यूटिलिटेरियन एन्ड्स को अपनाने मे कोई हर्ज नहीं। उन्हे अपनाना चाहिए ही। लेकिन क्या सचमुच मे सेक्स-अपील उतना बड़ा हौवा है, जितना कि उसे बना दिया गया है ? क्या सेक्स अपील से अपने आपको, अपनी रचनाओ को, पाक रखा जा सकता है ? पाक रखना क्या स्वाभाविक और सजीव होगा ? अपवाद के लिए गुजाइश छोड़कर मैं आपसे पूछना चाहूँगा कि आप किसी भी ऐसी रचना का नाम बताएँ, जिसमें सेक्स अपील न हो । सेक्स अपील बुरी चीज नहीं है। वह तो होनी ही चाहिए । लोहा तो हमे उस मनोवृत्ति से लेना है, जो सेक्स अपील और सेक्स परवर्शन मे कोई भेद नहीं समझती।

अब सिनेमा-मुधार की समस्या पर भी । यह समझना कि जिनके हाथ मे सिनेमा की बागडोर है, वे इनिशिएटिव ले-भारी भूल होगी। यह काम प्रेस और प्लेटफार्म का है, इससे भी बढ़कर उन नवयुवको का है, जो सिनेमा मे दिलचस्पी रखते है। चूंकि मै प्रेस से सम्बन्धित हूँ और फिलहाल एक सिनेमा-पत्रिका का सम्पादन कर रहा हूँ इसलिए मैंने इस दिशा मे कदम उठाने का प्रयत्न किया । लेखकों तथा अन्य साहित्यिकों को अप्रोच किया । कुछ ने कहा कि सिनेमा सुधार की जिम्मेदारी लेखको पर नहीं। अपने लेख पर दिये गये 'लेखक' के सम्पादक का नोट ही देखिए । कुछ ने इसे असम्भव-सा बताकर छोड़ दिया। सिनेमा-सुधार
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की आवश्यकता को तो सब महसूस करते है,सिनेमा का विरोध भी जी खाल कर करते है, पर क्रियात्मक सहयोग का नाम सुनते ही अलग हो जाते हैं । सिर्फ इसलिए कि सिनेमा बदनाम है ओर यह चीज़ हमारे रोम-राम मे धसी हुई है, कि बद अच्छा बदनाम बुरा । क्या यह विड- म्बना नहीं है ? इस चीज़ को दूर करने मे क्या आप हमारी सहायता न करेंगे।

यह सब होते हुए हम सिनेमा सुधार के काम को आगे बढ़ाना चाहते है। नवयुवक लेखको के सिनेमा ग्रुप की योजना के लिए जमीन तैयार हो चुकी है, हम विस्तृत योजना भी शीघ्र प्रकाशित कर रहे हैं। इसके लिए जरूरत होगी एक निष्पक्ष सिनेमा-पत्र की । जब तक नहीं निकलता तब तक काफी दूर तक 'रंगभूमि' हमारा साथ दे सकती है। मेरा तो यह निश्चित मत है और मै सगर्व कह सकता हूँ कि इस लिहाज से 'रंगभूमि' भारतीय सिनेमा पत्रो मे सबसे आगे है । मै आपसे अनुरोध करूंगा कि आप 'रंगभूमि' की आलोचनाएँ जरूर पढा करे । पढ़ने पर आपको भी मेरे जैसा मत स्थिर करने मे जरा भी देर न लगेगी । इसका मुझे पूर्ण निश्चय है।

अाशा है कि आप भी सिनेमा-ग्रुप को अपना आवश्यक सहयोग देकर कृतार्थ करेंगे।

आपका
 
नरोत्तम प्रसाद नागर
 

नागर जी ने हमारे सिनेमा-सम्बन्धी विचारो को ठीक माना है, केवल हमारा जेनरेलाइज़ करना अर्थात् सभी को एक लाठी से हाकना उन्हे अनुचित जान पड़ता है । क्या वेश्याओ मे शरीफ औरते नहीं हैं लेकिन इससे वेश्यावृत्ति पर जो दाग है वह नही मिटता । ऐसी वेश्याएँ अपवाद है, नियम नहीं।

साधुओ और वेश्याओ मे मौलिक अन्तर है । साधु कोई इसलिए नहीं हाता कि वह मौज उड़ाएगा और व्यभिचार करेगा, हालाकि ऐसे
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साधु निकल ही आते है, जो परले सिरे के लुच्चे कहे जा सकते हैं। साधु हम ज्ञान प्राप्ति या मोक्ष या जन-सेवा के ही विचार से होते है। इस गई गुजरी दशा मे भी ऐसे साधु मौजूद है, जिन्हे इम महात्मा कह सकते है। वेश्याश्रो के मूल मे दुर्वासना, अर्थ-लोलुपता, कामुकता और कपट होता है । इससे शायद नागर जी को भी इन्कार न हो।

सिनेमा की क्षमता से मुझे इनकार नहीं। अच्छे विचारो और आदशों के प्रचार मे सिनेमा से बढकर कोई दूसरी शक्ति नहीं है, मगर जैसा नागर जी खुद स्वीकार करते है, वह कुपात्रो के हाथ मे है और वह लोग भी इस जिम्मेदारी से बरी नही हो सकते, जो उसे बर्दाश्त करते है, अर्थात् जनता । मुझे इसके स्वीकार करने मे कोई आपत्ति नहीं। यही तो मै कहना चाहता हूँ । सिनेमा जिनके हाथ मे है, उन्हे आप कुपात्र कहे, मै तो उन्हे उसी तरह व्यापारी समझता हूँ, जैसे कोई दूसरा व्यापारी। और व्यापारी का काम जन-रुचि का पथ-प्रदर्शन करना नही, धन कमाना है। वह वही चीज जनता के सामने रखता है,जिसमे उसे अधिक से अधिक धन मिले ।एक फिल्म बनाने मे पचास हजार से एक लाख तक बल्कि इससे भी ज्यादा खर्च हो जाते है । व्यापारी इतना बड़ा खतरा नही ले सकता। गरीब का दीवाला निकल जाय । साहित्यकार का मुख्य उद्देश्य धन नहीं होता, नाम चाहे हो । हमारे खयाल मे साहित्य का मुख्य उद्देश्य जीवन को बल और स्वास्थ्य प्रदान करना है। अन्य सभी उद्देश्य इसके नीचे आ जाते है। हजारो साहित्यकार केवल इसी भावना से अपना जीवन तक साहित्य पर कुर्बान कर देते है। उन्हे घेला भी इससे नहीं मिलता । मगर ऐसा शायद ही कोई प्रोड्यूसर अवतरित हुअा हो, और शायद ही हो, जिसने इस ऊँची भावना से फिल्म बनाया हो।

आप फरमाते हैं, सिनेमा मे जाने वाले साहित्यिकों मे ऐसा कौन था, जिसका मुख्य उद्देश्य सिनेमा को अपने रग मे रगना रहा हो ? हम गोरों से कह सकते हैं, कोई भी नहीं । वहाँ का जलवायु ही ऐसा है कि बड़ा आदर्शवादी भी जाय, तो नमक की खान मे नमक बन कर रह
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जायगा । वही लोग, जो साहित्य मे आदर्श को सृष्टि करते हैं सिनेमा में दो दो सौ वेश्याओं का नगा नाच करवाते है । क्यों ? इसीलिए कि वे ऐसे धन्धे मे पड़ गये है, जहाँ बिना नगा नाच नचाये धन से भेंट नहीं होती । मै आदर्शों को लेकर गया था, लेकिन मुझे मालूम हुआ कि सिनेमा वालो के पास बने-बनाये नुस्खे हैं, और श्राप उस नुस्खे के बाहर नहीं जा सकते । वहाँ प्रोड्यूसर यह देखता है कि जनता किस बात पर तालियों बजाती है । वही बात वह अपने फिल्म मैं लायेगा । अन्य विचार उसके लिए ढकोसले है, जिन्हें वह सिनेमा के दायरे के बाहर समझता है। और फिर सारा भेद तो एसोसिएशन का है । वेश्या के मुख से वैराग्य या निर्गुण सुनकर कोई तर नहीं जाता । रही उपाधियों के टके सेर की बात। हमारे खयाल मे सिनेमा मे वह इससे कहीं सस्ती है जहाँ अच्छे वेतन पर लोग इसीलिए नौकर रखे जाते हैं, जो अपने ऐक्टरों और ऐक्ट्रेसों की तारीफ मे जमीन आसमान के कुलाबे मिलायें ।

मैं यह नहीं कहता कि होली या कजली त्याज्य हैं और जो लोग होली या कजली गाते है वह नीच हैं और जिन भावो से प्रेरित होकर होली और कजली का सुजन होता है वह मूल रूप मे साहित्य की प्रेरक भावनाओं से अलग है । फिर भी वे साहित्य नहीं हैं । पत्र-पत्रिकाओ को भी साहित्य नहीं कहा जाता । कभी कभी उनमे ऐसी चीजे निकल जाती हैं, जिन्हे हम साहित्य कह सकते हैं। इसी तरह होली और कजली मे भी कभी- कभी अच्छी चीजे निकल जाती है, और वह साहित्य का अंग बन जाती हैं। मगर आम तौर पर ये चीजें अस्थायी होती है और साहित्य मे जिस परिष्कार, मौलिकता, शैली, प्रतिभा, विचार गम्भीरता की जरूरत होती है, वह उनमे नहीं पाई जाती । देहातों में दीवारो पर औरते जो चित्र बनाती है, अगर उसे चित्रकला कहा जाय तो शायद ससार मे एक भी ऐसा प्राणी न निकले जो चित्रकार न हो । साहित्य भी एक कला है और उसकी मर्यादाएँ हैं । यह मानते हुए भी कि श्रेष्ठ कला वही है जो
[ १२३ ]आसानी से समझी और चखी जा सके, जो सुबोध और जनप्रिय हो, उसमे ऊपर लिखे हुए गुणों का होना लाजमी है । आपने सिनमा-जगत मे जिन अपवादो के नाम लिये हैं, उनकी मैं भी इज्जत करता हूँ और उन्हें बहुत गनीमत समझता हूँ; मगर वे अपवाद हैं, जो नियम को सिद्ध करते है । और हम तो कहते है इन अपवादो को भी व्यापारिकता के सामने सिर झुकाना पडा है । सिनेमा मे एंटरटेनमेन्ट वैलू साहित्य के इसी अंग से बिलकुल अलग है । साहित्य मे यह काम शब्दो, सूक्तियों या विनोदों से लिया जाता है । सिनेमा मे वही काम, मारपीट, धर पकड़, मुंह चिढाने और जिस्म को मटकाने से लिया जाता है।

रही उपयोगिता की बात । इस विषय मे मेरा पक्का मत है कि परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सभी कला उपयोगिता के सामने घुटना टेकती है। प्रोपेगेन्डा बदनाम शब्द है; लेकिन आज का विचारोत्पादक, बलदायक, स्वास्थ्यवर्द्धक साहित्य प्रोपेगेन्डा के सिवा न कुछ है, न हो सकता है, न होना चाहिए, और इस तरह के प्रोपेगेन्डे के लिए साहित्य से प्रभाव- शाली कोई साधन ब्रह्मा ने नहीं रचा वर्ना उपनिषद् और बाइबिल दृष्टान्तो से न भरे होते ।

सेक्स अपील को हम हौवा नहीं समझते, दुनिया उसी धुरी पर कायम लेकिन शराबखाने मे बैठ कर तो कोई दूध नहीं पीता । सेक्स अपील की निन्दा तब होती है, जब वह विकृत रूप धारण कर लेती है। सुई कपडे मे चुभती है, तो हमारा तन ढंकती है, लेकिन देह मे चुभे तो उसे जख्मी कर देगी । साहित्य मे भी जब यह अपील सीमा से आगे बढ़ जाती है, तो उसे दूषित कर देती है। इसी कारण हिन्दी प्राचीन कविता का बहुत बड़ा भाग साहित्य का कलक बन गया है। सिनेमा मे वह अपील और भी भयंकर हो गई है, जो संयम और निग्रह का उप- हास है। हमें विश्वास नहीं आता कि आप आजकल के मुक्त प्रेम के अनुयायी हैं। उसे प्रेम कहना तो प्रेम शब्द को कलंकित करना है। उसे तो छिछोरापन ही कहना चाहिए। [ १२४ ]अन्त मे हमारा यही निवेदन है कि हम भी सिनेमा को इसके परिष्कृत रूप मे देखने के इच्छुक हैं, और आप इस विषय मे जो सराहनीय उद्योग कर रहे हैं, उसको गनीमत समझते है। मगर शराब की तरह यह भी यूरोप का प्रसाद है और हजार कोशिश करने पर भी भारत जैसे सूखे देश मे उसका व्यवहार बढता ही जा रहा है। यहाँ तक कि शायद कुछ दिनो मे वह यूरोप की तरह हमारे भोजन मे शामिल हो जाय । इसका सुधार तभी होगा जब हमारे हाथ मे अधिकार होगा, और सिनेमा जैसी प्रभावशाली, सद्विचार और सद्व्यवहार की मशीन कला-मर्मज्ञों के हाथ मे होगी, धन कमाने के लिए नहीं, जनता को आदमी बनाने के लिए, जैसा योरप मे हो रहा है। तब तक तो यह नाच तमाशे की श्रेणी से ऊपर न उठ सकेगा।

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सिनेमा का प्रचार दिन-दिन बढ रहा है । केवल इंग्लैंड मे दो

करोड़ दर्शक प्रति सप्ताह सिनेमा देखने जाते है । इसलिए प्रत्येक राष्ट्र का फर्ज हो गया है कि वह सिनेमा की प्रगति पर कड़ी निगाह रखे और इसे केवल धन लुटेरों के ही हाथ मे न छोड़ दे । व्यवसाय का नियम है कि जनता मे जो माल ज्यादा खपे, उसकी तैयारी में लगे। अगर जनता को ताड़ी शराब से रुचि है, तो वह ताडी शराब की दुकानें खोलेगा और खूब धन कमाएगा। उसे इससे प्रयोजन नहीं कि ताड़ी शराब से जनता को कितनी दैहिक, आत्मिक, चारित्रिक, आर्थिक और पारिवारिक हानि पहुँचतो है । उसके जीवन का उद्देश्य तो धन है और धन कमाने का कोई भी साधन वह नहीं छोड़ सकता । यह काम उपदेशको और सन्तों का है कि वे जनता मे संयम और निषेध का प्रचार करें। व्यवसाय तो व्यवसाय है। "बिजनेस इज़ बिजनेस' यह वाक्य सभी की जबान पर रहता है। इसका अर्थ यही है कि कारोबार मे धर्म और अधर्म, उचित और अनुचित का विचार नहीं किया जा सकता । बल्कि उसका विचार करना बेवकूफी है।

इसमे विद्वानो को मतभेद हो सकता है कि आदमी का पूर्व पुरुष बन्दर है या भालू, लेकिन इसमे तो सभी सहमत होगे कि आदमी में दैविकता भी है और पाशविकता भी। अगर आदमी एक वक्त मे किसी की हत्या कर सकता है, तो दूसरे अवसर पर किसी की रक्षा मे अपने प्राणों का होम भी कर सकता है और आदि से साहित्य और काव्य और


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