साहित्य का उद्देश्य/22

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साहित्य का उद्देश्य
द्वारा प्रेमचंद

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राष्ट्रभाषा का सवाल

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राष्ट्रभाषा हिन्दी और उसकी समस्याएँ

 

प्यारे मित्रों,

आपने मुझे जो यह सम्मान दिया है, उसके लिए मैं आपको सौ जबानों से धन्यवाद देना चाहता हूँ, क्योंकि आपने मुझे वह चीज दी है, जिसके मैं बिलकुल अयोग्य हूँ। न मैंने हिन्दी-साहित्य पढ़ा है, न उसका इतिहास पढ़ा है, न उसके विकासक्रम के बारे में ही कुछ जानता हूँ। ऐसा आदमी इतना मान पाकर फूला न समाय, तो वह आदमी नहीं है। नेवता पाकर मैंने उसे तुरन्त स्वीकार किया। लोगों में 'मन भाये ओर मुँड़िया हिलाये' की जो आदत होती है। वह खतरा मैं न लेना चाहता था। यह मेरी ढिठाई है कि मै यहाँ वह काम करने खड़ा हुआ हूँ, जिसकी मुझ में लियाकत नही है; लेकिन इस तरह की गदुमनुमाई का मैं अकेला मुजरिम नहीं हूँ। मेरे भाई घर-घर में, गली-गली में मिलेंगे। आपको तो अपने नेवते की लाज रखनी है। मैं जो कुछ अनाप-शनाप बकँ, उसकी खूब तारीफ कीजिये, उसमें जो अर्थ न हो वह पैदा कीजिये, उसमें अध्यात्म के और साहित्य के तत्त्व खोज निकालिए-जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ!

आपकी सभा ने पन्द्रह-सोलह साल के मुख्तसर से समय में जो काम कर दिखलाया है, उस पर मैं आपको बधाई देता हूँ, खासकर इसलिए कि आपने अपनी ही कोशिशों से यह नतीजा हासिल किया है। सरकारी इमदाद का मुँह नही ताका। यह आपके हौसलों की बुलन्दी की एक मिसाल है। अगर मै यह कहूँ कि आप भारत के दिमाग हैं, तो वह [ १५० ]
मुबालगा न होगा ।किसी अन्य प्रान्त मे इतना अच्छा सगठन हो सकता है और इतने अच्छे कार्यकर्ता मिल सकते है, इसमे मुझे सन्देह है ! जिन दिमागो ने अंग्रेजी राज्य की जड़ जमाई, जिन्होने अंग्रेजी भाषा का सिक्का जमाया, जो अंग्रेजी आचार-विचार मे भारत मे अग्रगण्य थे और हैं, वे लोग राष्ट्र भाषा के उत्थान पर कमर बाँध ले, तो क्या कुछ नहीं कर सकते ? ओर यह कितने बड़े सौभाग्य की बात है कि जिन दिमागो ने एक दिन विदेशी भाषा मे निपुण होना अपना ध्येय बनाया था, वे आज राष्ट्र-भाषा का उद्वार करने पर कमर कसे नजर आते है और जहाँ से मानसिक पराधीनता की लहर उठी थी, वहाँ से राष्ट्रीयता की तरंगे उठ रही है। जिन लोगो ने अंग्रेजी लिखने और बोलने मे अग्रेजो को भी मात कर दिया, यहाँ तक कि आज जहाँ कही देखिये अँग्रेजी पत्रों के सम्पादक इसी प्रान्त के विद्वान् मिलेगे, वे अगर चाहे तो हिन्दी बोलने और लिखने मे हिन्दी वालो को भी मात कर सकते है। और गत वर्ष यात्रीदल के नेताओ के भाषण सुनकर मुझे यह स्वीकार करना पड़ता है कि वह क्रिया शुरू हो गयी है। 'हिन्दी-प्रचारक' मे अधिकाश लेख आप लोगो ही के लिखे होते है और उनकी मॅजी हुई भाषा और सफाई और प्रवाह पर हममे से बहुतो को रश्क आता है। और यह तब है जब राष्ट्र-भाषा प्रेम अभी दिलो के ऊपरी भाग तक ही पहुंचा है,और आज भी यह प्रान्त अँग्रेजी भाषा के प्रभुत्व से मुक्त होना नही चाहता । जब यह प्रेम दिलो मे व्याप्त हो जायगा, उस वक्त उसकी गति कितनी तेज होगी, इसका कौन अनुमान कर सकता है ? हमारी पराधीनता का सबसे अपमानजनक, सबसे व्यापक, सबसे कठोर अग अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व है । कही भी वह इतने नंगे रूप मे नही नजर आती । सभ्य जीवन के हर एक विभाग मे अंग्रेजी भाषा ही मानो हमारी छाती पर मूंग दल रही है । अगर आज इस प्रभुत्व को हम तोड़ सके, तो पराधीनता का अाधा बोझ हमारी गर्दन से उतर जायगा । कैदी को बेड़ी से जितनी तकलीफ होती है, उतनी और किसी बात से नही होती। कैदखाना शायद उसके
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घर से ज्यादा हवादार, साफ-सुथरा होगा। भोजन भी वहाँ शायद घर के भोजन से अच्छा और स्वादिष्ट मिलता हो । बाल-बच्चों से वह कभी- कभी स्वेच्छा से बरसो अलग रहता है । उसके दण्ड की याद दिलाने- वाली चीज यही बेडी है, जो उठते-बैठते, सोते-जागते, हँसते-बोलते,कभी उसका साथ नहीं छोडती, कभी उसे मिथ्या कल्पना भी करने नहीं देती, कि वह आजाद है। पैरो से कही ज्यादा उसका असर कैदी के दिल पर होता है, जो कभी उभरने नहीं पाता, कभी मन की मिठाई भी नही खाने पाता । अंग्रेजी भाषा हमारी पराधीनता की वही बेडी है, जिसने हमारे मन और बुद्धि को ऐसा जकड़ रखा है कि उनमे इच्छा भी नही रही। हमारा शिक्षित समाज इस बेड़ी को गले का हार समझने पर मजबूर है । यह उसकी रोटियो का सवाल है और अगर रोटियो के साथ कुछ सम्मान, कुछ गौरव, कुछ अधिकार भी मिल जाय, तो क्या कहना! प्रभुता को इच्छा तो प्राणी-मात्र में होती है । अंग्रेजी भाषा ने इसका द्वार खोल दिया और हमारा शिक्षित समुदाय चिडियो के झुण्ड की तरह उस द्वार के अन्दर घुसकर जमीन पर बिखरे हुए दाने चुगने लगा और अब कितना ही फडफडाये, उसे गुलशन को हवा नसीब नही । मजा यह है कि इस मुएड की फड़फडाहट बाहर निकलने के लिए नही, केवल जरा मनोरजन के लिए है। उसके पर निर्जीव हो गये, और उनमे उड़ने की शक्ति नही रही, वह भरोसा भी नही रहा कि यह दाने बाहर मिलेगे भी या नहीं । अब तो वही कफ़स है, वही कुल्हिया है और वही सैयाद ।

लेकिन मित्रो, विदेशी भाषा सीखकर अपने गरीब भाइयो पर रोब जमाने के दिन बड़ी तेजी से विदा होते जा रहे है। प्रतिभा का और बुद्धिबल का जो दुरुपयोग हम सदियो से करते आये हैं, जिसके बल पर हमने अपनी एक अमीरशाही स्थापित कर ली है, और अपने को साधा- रण जनता से अलग कर लिया है, वह अवस्था अब बदलती जा रही है । बुद्धि-बल ईश्वर की देन है, और उसका धर्म प्रजा पर धौस जमाना
[ १५२ ]नही, उसका खून चूसना नही, उसकी सेवा करना है। आज शिक्षित समुदाय पर से जनता का विश्वास उठ गया है । वह उसे उससे अधिक विदेशी समझती है, जितना विदेशियो को । क्या कोई आश्चर्य है कि यह समुदाय अाज दोनो तरफ से ठोकरे खा रहा है ? स्वामियो की ओर से इसलिये कि वह समझते है-मेरी चौखट के सिवा इनके लिए और कोई आश्रय नही, और जनता की ओर से इसलिए कि उनका इससे कोई अात्मीय सम्बन्ध नहीं। उनका रहन-सहन, उनकी बोल-चाल, उनकी वेश-भूषा, उनके विचार और व्यवहार सब जनता से अलग है और यह केवल इसलिए कि हम अग्रेजी भाषा के गुलाम हो गये। मानो परिस्थिति ऐसी है कि बिना अग्रेजी भाषा की उपासना किये काम नही चल सकता । लेकिन अब तो इतने दिनो के तजरवे के बाद मालूम हो जाना चाहिये कि इस नाव पर बैठकर हम पार नहीं लग सकते, फिर हम क्यो आज भी उसी से चिमटे हुए है १ अभी गत वर्ष एक इटर- युनिवर्सिटी कमीशन बैठा था कि शिक्षा सम्बन्धी विषयो पर विचार करे। उसमे एक प्रस्ताव यह भी था कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी की जगह पर मातृ-भाषा क्यो न रखी जाय । बहुमत ने इस प्रस्ताव का विरोध किया, क्यो ? इसलिए कि अग्रेजी माध्यम के बगैर अग्रेजी मे हमारे बच्चे कच्चे रह जायेंगे और अच्छी अंग्रेजी लिखने और बोलने मे समर्थ न होगे । मगर इन डेढ़ सौ वर्षों की घोर तपस्या के बाद आज तक भारत ने एक भी ऐसा ग्रन्थ नही लिखा, जिसका इगलैण्ड मे उतना भी मान होता, जितना एक तीसरे दर्जे के अग्रेजी लेखक का होता है । याद नहीं, पण्डित मदनमोहन मालवीयजी ने कहा था, या सर तेजबहादुर सपू ने, कि पचास साल तक अंग्रेजी से सिर मारने के बाद आज भी उन्हे अग्रेजी मे बोलते वक्त यह सशय होता रहता है कि कहीं उनसे गलती तो नही हो गयी ! हम अॉखे फोड़-फोड़कर और कमर तोड-तोडकर और रक्त जला-जलाकर अंग्रेजी का अभ्यास करते है, उसके मुहावरे रटते है; लेकिन बड़े से बडे भारती-साधक की रचना विद्यार्थियो की स्कूली एक्सर[ १५३ ]
साइज से ज्यादा महत्त्व नही रखती। अभी दो-तीन दिन हुए पजाब के ग्रेजुएटो की अग्रेजी योग्यता पर वहाँ के परीक्षको ने यह आलोचना की है कि अधिकाश छात्रो मे अपने विचारो के प्रकट करने की शक्ति नहीं है, बहुत तो स्पेलिग मे गलतियों करते है। और यह नतीजा है कम से कम बारह साल तक ऑखे फोडने का । फिर भी हमारे लिए शिक्षा का अग्रेजी माध्यम जरूरी है, यह हमारे विद्वानों की राय है। जापान, चोन और ईरान मे तो शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी नहीं है। फिर भी वे सभ्यता की हरेक बात मे हमसे कोसो आगे है, लेकिन अंग्रेजी माध्यम के बगैर हमारी नाव डूब जायगी। हमारे मारवाड़ी भाई हमारे धन्यवाद के पात्र है कि कम से कम जहाँ तक व्यापार मे उनका सम्बन्ध है। उन्होंने कौमियत की रक्षा की है।

मित्रो, शायद मै अपने विषय से बहक गया हूँ, लेकिन मेरा आशय केवल यह है कि हमे मालूम हो जाय, हमारे सामने कितना महान् काम है। यह समझ लीजिये कि जिस दिन आप अग्रेजी भाषा का प्रभुत्व तोड देगे और अपनी एक कौमी भाषा बना लेगे, उसी दिन आपको स्वराज्य के दर्शन हो जायेंगे । मुझे याद नहीं आता कि कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा के बल पर स्वाधीनता प्राप्त कर सका हो । राष्ट्र की बुनि- याद राष्ट्र को भापा है । नदी, पहाड़ समुद्र और राष्ट्र नहीं बनाते । भाषा ही वह बन्धन है, जो चिरकाल तक राष्ट्र को एक सूत्र मे बाँधे रहती है, और उसका शीराजा बिखरने नही देती । जिस वक्त अग्रेज आये, भारत की राष्ट्र-भावना लुप्त हो चुकी थी। यो कहिये कि उसमे राजनैतिक चेतना की गंध तक न रह गयी थी। अग्रेजी राज ने आकर आपको एक राष्ट्र बना दिया। आज अग्रेजी राज विदा हो जाय-और एक न एक दिन तो यह होना ही है तो फिर आपका यह राष्ट्र कहाँ जायगा ? क्या यह बहुत सभव नही है कि एक-एक प्रान्त एक-एक राज्य हो जाय और फिर वही विच्छेद शुरू हो जाय ? वर्तमान दशा मे तो हमारी कौमी चेतना को सजग और सजीव रखने के लिए अंग्रेजी राज को अमर
[ १५४ ]<brरहना चाहिए । अगर हम एक राष्ट्र बनकर अपने स्वराज्य के लिए उद्योग करना चाहते है तो हमे राष्ट्र भाषा का प्राश्रय लेना होगा और उसी राष्ट्र-भाषा के बस्तर से हम अपने राष्ट्र की रक्षा कर सकेगे । आप उसी राष्ट्र भाषा के भिन्न है, और इस नाते आप राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं। सोचिये, आप कितना महान् काम करने जा रहे है। आप कानूनी बाल की खाल निकालनेवाले वकील नहीं बना रहे है, आप शासन-मिल के मजदूर नहीं बना रहे हैं, आप एक बिखरी हुई कौम को मिला रहे हैं, आप हमारे बन्धुत्व की सीमाअो को फैला रहे है, भूले हुए भाइयो को गले मिला रहे है। इस काम की पवित्रता और गोरव को देखते हुए, कोई ऐसा कष्ट नही है, जिसका आप स्वागत न कर सके । यह धन का मार्ग नहीं है, सभव है कि कीर्ति का मार्ग भी न हो, लेकिन आपके आत्मिक सतोष के लिए इससे बेहतर काम नहीं हो सकता। यही अापके बलिदान का मूल्य है । मुझे अाशा है, यह आदर्श हमेशा आपके सामने रहेगा। आदर्श का महत्व आप खूब समझते है। वह हमारे रुकते हुए कदम को आगे बढ़ाता है, हमारे दिलो से सशय और सन्देह की छाया को मिटाता है और कठिनाइयो मे हमे साहस देता है ।।

राष्ट्र-भाषा से हमारा क्या प्राशय है, इसके विषय मे भी मै आपसे दो शब्द कहूँगा । इसे हिन्दी कहिए, हिन्दुस्तानी कहिए, या उर्दू कहिए, चीज एक है। नाम से हमारी कोई बहस नही । ईश्वर भी वही है, जो खुदा है, और राष्ट्र-भाषा मे दोनो के लिए समान रूप से सम्मान का स्थान मिलना चाहिए। अगर हमारे देश मे ऐसे लोगो की काफी तादाद निकल आये, जो ईश्वर को 'गाड' कहते है, तो राष्ट्र-भाषा उनका भी स्वागत करेगी । जीवित भापा तो जीवित देह की तरह बराबर बनती रहती है। शुद्ध हिन्दी तो निरर्थक शब्द है। जब भारत शुद्ध हिन्दू होता तो उसकी भाषा शुद्ध हिन्दी होती । जब तक यहाँ मुसल- मान, ईसाई, पारसी, अफगानो सभी जातियों मौजूद है, हमारी भाषा भो
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व्यापक रहेगी । अगर हिन्दी भाषा प्रान्तीय रहना चाहती है और केवल हिन्दुओ की भाषा रहना चाहती है, तब तो वह शुद्ध बनायी जा सकती है। उसका अङ्गभङ्ग करके उसका कायापलट करना होगा। प्रौढ से वह फिर शिशु बनेगी, यह असम्भव है, हास्यास्पद है। हमारे देखते-देखते सैकड़ो विदेशी शब्द भाषा मे आ घुसे, हम उन्हे रोक नही सकते । उनका अाक्रमण रोकने की चेष्टा ही व्यर्थ है। वह भाषा के विकास मे बाधक होगी । वृक्षो को सीधा और सुडौल बनाने के लिए पौधों को एक थूनी का सहारा दिया जाता है। श्राप विद्वानो का ऐसा नियन्त्रण रख सकते है कि अश्लील, कुरुचिपूर्ण, कर्णकटु, भहे शब्द व्यवहार मे न पा सकें; पर यह नियंत्रण केवल पुन्तको पर हो सकता है। बोल-चाल पर किसी प्रकार का नियन्त्रण रखना मुश्किल होगा। मगर विद्वानो का भी अजीब दिमाग है। प्रयाग में विद्वानो और पण्डितो की सभा 'हिन्दुस्तानी एकेडमी' मे तिमाही, सेहमाही और त्रैमासिक शब्दो पर बरसो से मुबाहमा हो रहा है और अभी तक फैसला नही हुआ । उर्दू के हामी 'सेहमाही की ओर है, हिन्दी के हामी 'त्रमासिक' की ओर, वेचारा 'तिमाही' जो सबसे सरल. यासानी से बोला और समझा जानेवाला शब्द है, उसका दोनो ही अोर से बहिष्कार हो रहा है।भाषा सुन्दरी को कोठरी मे बन्द करके आप उसका सतीत्व तो बचा सकते है, लेकिन उसके जीवन का मूल्य देकर । उसकी आत्मा स्वय इतनी बलवान बनाइये, कि वह अपने सतीत्व और स्वास्थ्य दोनो ही की रक्षा कर सके । बेशक हमे ऐसे ग्रामीण शब्दो को दूर रखना होगा, जो किसी स्वास इलाके मे बोले जाते है। हमाग आदर्श तो यह होना चाहिए, कि हमारी भापा अधिक से अधिक आदमी समझ सकें। अगर इस आदर्श को हम अपने सामने रखे,तो लिखते समय भी हम शब्द-चातुरी के मोह मे न पडेगे । यह गलत है, कि फारसी शब्दो से भाषा कठिन हो जाती है । शुद्ध हिन्दी के ऐसे पदों के उदाहरण दिये जा सकते हैं जिनका अर्थ निकालना पण्डितो के लिए भी लोहे
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के चने चबाना है । वही शब्द सरल है, जो व्यवहार मे आ रहा है, इससे कोई बहस नहीं कि वह तुर्को है, या अरबी, या पुर्तगाली। उर्द और हिन्दी मे क्यो इतना मौतिया डाह है, यह मेरी समझ में नहीं आता। अगर एक समुदाय के लोगो को 'उर्दू' नाम प्रिय है तो उन्हे उसका इस्तेमाल करने दोजिए । जिन्हे 'हिन्दी' नाम से प्रेम है, वह हिन्दी ही कहे । इसमे लडाई काहे को ? एक चीज के दो नाम देकर ख्वामख्वाह आपस मे तडना ओर उसे इतना महत्व दे देना कि वह राष्ट्र की एकता मे बाधक हो जाय, यह मनोवृत्ति रोगो ओर दुर्बल मन की है। मैं अपने अनुभव से इतना अवश्य कह सकता हूँ, कि उर्दू को राष्ट्र-भाषा के स्टैण्डर्ड पर लाने में हमारे मुसलमान भाई हिन्दुओ से कम इच्छुक नही हैं। मेरा मतलब उन हिन्द-मुसलमानों से है, जो कौमियत के मतवाले है । कट्टर पन्थियो से मेरा कोई प्रयोजन नही । उर्दू का योर मुसलिम संस्कृति का कैम्प आज अलीगढ़ है। वहाँ उर्दू और फारसी के प्राफेसरो और अन्य विषयो के प्राफेसरा से मेरी जो बातचीत हुई, उससे मुझे मालूम हुआ कि मौलवियाऊ भाषा से वे लोग भी उतने ही बेजार है, जितने पाए इताऊ भाषा से, और कौमी भाषा-सघ आन्दोलन में शरीक होने के लिए दिल से तैयार है। मै यह भी माने लेता हूँ कि मुसलमानो का एक गिरोह हिन्दुओ से अलग रहने मे ही अपना हित समझता है हालाकि उस गिरोह का जोर और असर दिन- दिन कम होता जा रहा है--ओर वह अपनी भाषा को अरबी से गले तक ठूस देना चाहता है, तो हम उससे क्यो झगडा करे ? क्या आप समझत है, ऐसो जटिल भाषा मुसलिम जनता मे भी प्रिय हो सकती है ? कभी नही । मुसलमानो मे वही लेखक सर्वोपरि है, जो अामफहम भाषा लिखते है। मौलवियाऊ भापा लिखनेवालो के लिए वहाँ भी स्थान नही है । मुसलमान दोस्तो से भी मुझे कुछ अर्ज करने का हक है क्योकि मेरा सारा जीवन उर्दू की सेवकाई करते गुजरा है और भी मै जितनी उर्दू लिखता हूँ, उतनी हिन्दी नही लिखता, और कायस्थ होने
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और बचपन से फारसी का अभ्यास करने के कारण उर्दू मेरे लिए जितनी स्वाभाविक है, उतनो हिन्दी नही है । मै पूछता हूँ, आप इसे हिन्दी की गर्दनजदनी समझते है ? क्या आपको मालूम है, और नहीं है तो होना चाहिए, कि हिन्दी का सबसे पहला शायर, जिसने हिन्दी का साहित्यिक बीज बोया (व्यावहारिक बीज सदियो पहले पड चुका था) वह अमीर खुसरो था ? क्या आपको मालूम है, कम से कम पाँच सौ मुसलमान शायरो ने हिन्दी को अपनी कविता से धनी बनाया है, जिनमे कई तो चोटी के शायर हैं ? क्या आपको मालूम है, अकबर, जहाँगीर और औरगजेब तक हिन्दी की कविता का जौक रखते थे और औरगजेब ने ही अामो का नाम 'रसना-विलास' और 'सुधा रस' रखा था ? क्या आपको मालूम है, आज भी हसरत और हफीज जालन्धरी जैसे कवि कभी-कभी हिन्दी मे तबााजमाइ करते हैं ? क्या आपको मालूम है हिन्दी मे हजारो शब्द, हजारों क्रियाएँ अरबी और फारसी से आयी है और ससुराल में आकर घर की देवी हो गयी है ? अगर यह मालूम होने पर भी आप हिन्दी को उदु से अलग समझते हैं, तो आप देश के साथ और अपने साथ बेइन्साफो करते है । उर्दू शब्द कब और कहाँ उत्पन्न हुआ, इसकी काई तारीखो सनद नहीं मिलती । क्या आप समझते है वह 'बडा खराब आदमी है' और वह 'बडा दुर्जन मनुष्य है' दो अलग भाषाएँ हैं ? हिन्दुओ को 'खराब' भी अच्छा लगता है और 'श्रादमी' तो अपना भाई हो है । फिर मुसलमान का 'दुर्जन' क्यो बुरा लगे, और 'मनुष्य' क्यो शत्रु-सा दीखे ? हमारी कौमो भाषा मे दुर्जन और सज्जन, उम्दा और खराब दोनों के लिये स्थान है, वहाँ तक जहाँ तक कि उसकी सुबोधता मे बावा नहीं पडती । इसक अागे हम न उर्दू के दास्त है, न हिन्दी के । मजा यह कि 'हिन्दी' मुसलमानों का दिया हुआ नाम है और अभी पचास साल पहले तक जिसे आज उर्दू कहा जा रहा है, उसे मुसल- मान भी हिन्दी कहते थे । और आज 'हिन्दी' मरदूद है । क्या आपको नजर नहीं आता, कि 'हिन्दी' एक स्वाभाविक नाम है ? इगलैंडवाले
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इगलिश बोलते है, फ्रासवाले फ्रेंच, जर्मनीवाले जर्मन, फारसवाले फारसी, तुर्कीवाले तुर्की, अरबवाले अरबी, फिर हिन्दवाले क्यों न हिन्दी बोले ? उर्दू तो न काफिये मे आती है न रदीफ मे,न बहर मे न वजन मे। हाँ, हिन्दुस्तान का नाम उर्दूस्तान रखा जाय, तो बेशक यहाँ की कौमी भाषा उर्दू होगी। कौमी भाषा के उपासक नामो से बहस नहीं करते, वह तो असलियत से बहस करते है । क्यों दोनों भाषाओं का कोष एक नहीं हो जाता ? हमे दोनों ही भाषाओ मे एक आम लुगत (कोष ) की जरूरत है, जिसमे श्रामफहम शब्द जमा कर दिये जायें । हिन्दी मे तो मेरे मित्र पण्डित रामनरेश त्रिपाठी ने किसी हद तक यह जरूरत पूरी कर दी है । इस तरह का एक लुगत उर्दू मे भी होना चाहिए । शायद वह काम कौमी-भाषा-सघ बनने तक मुल्तवी रहेगा । मुझे अपने मुसलिम दोस्तों से यह शिकायत है कि वह हिन्दी के प्रामफहम शब्दो से भी परहेज करते है, हालॉ कि हिन्दी मे अामफहम फारसी के शब्द आजादी मे व्यवहार किये जाते हैं।

लेकिन प्रश्न उठता है कि राष्ट्र-भाषा कहाँ तक हमारी जरूरते पूरी कर सकती है ? उपन्यास, कहानियों, यात्रा-वृत्तान्त, समाचार-पत्रों के लेख, आलोचना अगर बहुत गूढ न हो, यह सब तो राष्ट्र-भाषा मे अभ्यास कर लेने से लिखे जा सकते है। लेकिन साहित्य में केवल इतने ही विषय तो नहीं है । दर्शन और विज्ञान की अनन्त शाखाएँ भी तो हैं जिनको आप राष्ट्र-भाषा मे नहीं ला सकते । साधारण बाते तो साधारण और सरल शब्दों मे लिखी जा सकती है । विवेचनात्मक विषयो मे यहाँ तक कि उपन्यास मे भी जब वह मनोवैज्ञानिक हो जाता है, आपको मजबूर होकर संस्कृत या अरबो-फारसी शब्दों की शरण लेनी पडती है । अगर हमारी राष्ट्र-भाषा सर्वाङ्गपूर्ण नहीं है, और उसमे श्राप हर एक विषय, हर एक भाव नहीं प्रकट कर सकते, तो उसमे यह बडा भारी दोष है, और यह हम सभी का कर्तव्य है कि हम राष्ट्र-भाषा को उसी तरह सर्वाङ्गपूर्ण बनावें, जैसी अन्य राष्ट्रो की सम्पन्न भाषाएँ है। यों तो अभी हिन्दी और उर्दू
[ १५९ ]अपने सार्थक रूप मे भी पूर्ण नही है । पूर्ण क्या, अधूरी भी नही है । जो राष्ट्र-भाषा लिखने का अनुभव रखते है, उन्हे स्वीकार करना पड़ेगा कि एक-एक भाव के लिए उन्हे कितना सिर-मगजन करना पडता है । सरल शब्द मिलते ही नहीं, मिलते है, तो भाषा मे खपते नही, भाषा का रूप बिगाड़ देते है, खीर मे नमक के डले की भॉति आकर मजा किरकिरा कर देते है। इसका कारण ता स्पष्ट ही है कि हमारी जनता मे भाषा का ज्ञान बहुत ही थोड़ा है और आमफहम शब्दो की संख्या बहुत ही कम है। जब तक जनता मे शिक्षा का अच्छा प्रचार नहीं हो जाता, उनकी व्यवहारिक शब्दावली बढ नही जातो, हम उनके समझने के लायक भाषा मे तात्विक विवेचनाएँ नहीं कर सकते । हमारी हिन्दी भाषा ही अभी सौ बरस की नही हुइ, राष्ट्र-भाषा तो अभी शैशवावस्था में है, और फिलहाल यदि हम उसमे सरल साहित्य ही लिख सके, तो हमको सतुष्ट हाना चाहिये । इसके साथ ही हमे राष्ट्र-भाषा का कोष बढाते रहना चाहिये । वही सस्कृत और अरबी फारसी के शब्द, जिन्हे देखकर अाज हम भयभीत हो जाते हैं, जब अभ्यास मे आ जायेंगे, तो उनका हौआपन जाता रहेगा। इस भाषा-विस्तार की क्रिया, धीरे-धीरे ही होगी। इसके साथ हमे विभिन्न प्रान्तीय भाषाओ के ऐसे विद्वानो का एक बोर्ड बनाना पडेगा, जो राष्ट्र-भाषा की जरूरत के कायल हैं । उस बोर्ड में उर्दू, हिन्दी, बॅगला, मराठी, तामिल आदि सभी भाषाओं के प्रतिनिधि रखे जाये और इस क्रिया को सुव्यवस्थित करने और उसकी गति को तेज करने का काम उनको सौपा जाय । अभी तक हमने अपने मनमाने ढग से इस आन्दोलन को चलाया है । औरो का सहयोग प्राप्त करने का यत्न नहीं किया । आपका यात्री मडल भी हिन्दी के विद्वानो तक ही रह गया । मुसलिम केन्द्रो मे जाकर मुसलिम विद्वानो की हमदर्दी हासिल करने की उसने कोशिश नहीं की ? हमारे विद्वान् लोग तो अँगरेजी मे मस्त है । जनता के पैसे से दर्शन और विज्ञान और सारी दुनिया की विद्याएँ सीखकर भी वे जनता की तरफ से ऑखे बन्द किये बैठे है । [ १६० ]
उनकी दुनिया अलग है, उन्होने उपजीवियो की मनोवृत्ति पैदा कर ली है। काश उनमे भी राष्ट्रीय चेतना होती, काश वे भी जनता के प्रति अपने कर्त्तव्य को महसूस करते, तो शायद हमारा काम सरल हो जाता। जिस देश मे जन शिक्षा की सतह इतनी नीची हो, उसमे अगर कुछ लोग अँगरेजो मे अपनी विद्वत्ता का सेहरा बॉध ही ले, तो क्या? हम तो तब जाने, जब विद्वत्ता के साथ साथ दूसरों को भी ऊँची सतह पर उठाने का भाव मौजूद हो । भारत मे केवल अंग्रेजीदों ही नहीं रहते । हजार मे ६६६ आदमी अंग्रेजी का अक्षर भी नही जानते । जिस देश का दिमाग विदेशी भाषा मे सोचे और लिखे, उस देश को अगर संसार राष्ट्र नही ममझता तो क्या वह अन्याय करता है ? जब तक आपके पास राष्ट्र भाषा नहीं, आपका कोई राष्ट्र भी नहीं । दोनो में कारण और कार्य का सम्बन्ध है । राजनीति के माहिर अँग्रेज शासको को आप राष्ट्र की हॉक लगाकर धोखा नही दे सकते । वे आपकी पोल जानते हैं और आप के साथ वैसा ही व्यवहार करते है।

अब हमे यह विचार करना है कि राष्ट्र-भाषा का प्रचार कैसे बढ़े। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि हमारे नेताओ ने इस तरफ मुजरिमाना गफलत दिखायी है । वे अभी तक इसी भ्रम मे पडे हुए हैं कि यह कोई बहुत छोटा-मोटा विषय है, जो छोटे-मोटे आदमियो के करने का है, और उनके जैसे बडे-बडे आदमियों को इतनी कहाँ फुरसत कि वह झंझट मे पडे । उन्होंने अभी तक इस काम का महत्व नहीं समझा, नहीं तो शायद यह उनके प्रोग्राम की पहली पॉती मे होता। मेरे विचार में जब तक राष्ट्र मे इतना सगठन, इतना ऐक्य, इतना एकात्मपन न होगा कि वह एक भाषा में बात कर सके, तब तक उसमे यह शक्ति भी न होगी कि स्वराज्य प्राप्त कर सके। गैर- मुमकिन है । जो राष्ट्र के अगुवा हैं, जो एलेक्शनों मे खड़े होते है और फतह पाते हैं, उनसे मैं बड़े अदब के साथ गुजारिश करूँगा कि हजरत इस तरह के एक सौ एलेक्शन अायॅगे और निकल जायॅगे, आप कभी
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हारेगे,कभी जीतेगे,लेकिन स्वराज्य आपसे उतनी ही दूर रहेगा, जितनी दूर स्वर्ग है । अंग्रेजी मे आप अपने मस्तिष्क का गूदा निकालकर रख दे लेकिन आपकी आवाज मे राष्ट्र का बल न होने के कारण कोई आपकी उतनी परवाह भी न करेगा, जितनी बच्चो के रोने की करता है। बच्चो के रोने पर खिलौने और मिठाइयाँ मिलती हैं। वह शायद आपको भी मिल जावे, जिसमे आपकी चिल्ल-पो से माता-पिता के काम मे विन न पडे । इस काम को तुच्छ न समझिये । यही बुनियाद है, आपका अच्छे से अच्छा गारा, मसाला, सीमेट और बड़ी से बड़ी निर्माण-योग्यता जब तक यहाँ खर्च न होगी, आपकी इमारत न बनेगी। घरौदा शायद बन जाय, जो एक हवा के झोके मे उड़ जायगा। दरअसल अभी हमने जो कुछ किया है, वह नहींके बराबर है। एक अच्छा-सा राष्ट्र-भाषा का विद्यालय तो हम खोल नहीं सके । हर साल सैकड़ो स्कूल खुलते हैं, जिनकी मुल्क को बिलकुल जरूरत नहीं । 'उसमानिया विश्व विद्यालय' काम की चीज है, अगर वह उर्दू और हिन्दी के बीच की खाई को और चौड़ी न बना दे । फिर भी मै उसे और विश्व-विद्यालयो पर तरजीह देता हूँ। कम से कम अंग्रेजी की गुलामी से तो उसने अपने को मुक्त कर लिया। और हमारे जितने विद्यालय है सभी गुलामी के कारखाने हैं जो लड़कों को स्वार्थ का, जरूरतो का, नुमाइश का, अक- र्मण्यता का गुलाम बनाकर छोड देते हैं और लुत्फ यह है, कि यह तालीम भी मोतियो के मोल बिक रही है। इस शिक्षा की बाजारी कीमत शून्य के बराबर है, फिर भी हम क्यो भेड़ो की तरह उसके पीछे दौडे चले जा रहे है ? अंग्रेजी शिक्षा हम शिष्टता के लिए नहीं ग्रहण करते । इसका उद्देश्य उदर है । शिष्टता के लिए हमे अंग्रेजी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं । शिष्टता हमारी मीरास है, शिष्टता हमारी घुट्टी मे पडी है । हम तो कहेंगे, हम जरूरत से ज्यादा शिष्ट है। हमारी शिष्टता दुर्बलता की हद तक पहुँच गयी है । पश्चिमी शिष्टता मे जो कुछ है, वह उद्योग और पुरुषार्थ है । हमने यह चीजें तो उसमे से छोटी
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नही।छोटा क्या, लोफरपन, अहंकार, स्वार्थान्धता, बेशर्मी, शराब और दुर्व्यसन । एक मूर्ख किसान के पास जाइये। कितना नम्र, कितना मेह- मॉनवाज, कितना ईमानदार, कितना विश्वासी। उसी का भाई टामी है, पश्चिमी शिष्टता का सच्चा नमूना, शराबी, लोफर, गुण्डा, अक्खड, हया से खाली । शिष्टता सीखने के लिए हमे अँग्रेजी की गुलामी करने की जरूरत नहीं । हमारे पास ऐसे विद्यालय होने चाहिए जहाँ ऊँची से ऊँची शिक्षा राष्ट्र-भाषा मे सुगमता से मिल सके । इस वक्त अगर ज्यादा नही तो एक ऐसा विद्यालय किसी केन्द्र-स्थान मे होना ही चाहिए । मगर हम आज भी वही भंडचाल चले जा रहे है, वही स्कूल, वही पढ़ाई । कोई भला आदमी ऐसा पैदा नही होता, जो एक राष्ट्र-भाषा का विद्यालय खोले । मेरे सामने दक्खिन से बीसो विद्यार्थी भाषा पढ़ने के लिए काशी गये, पर वहाँ कोई प्रबन्ध नही । वही हाल अन्य स्थानो मे भी है । बेचारे इधर उधर ठोकरे खाकर लौट आये। अब कुछ विद्यार्थियो की शिक्षा का प्रवन्ध हुअा है, मगर जो काम हमे करना है, उसके देखते नहीं के बराबर है । प्रचार के और तरीको मे अच्छे ड्रामो का खेलना अच्छे नतीजे पैदा कर सकता है। इस विषय मे हमारा सिनेमा प्रशंस- नीय काम कर रहा है, हाला कि उसके द्वारा जो कुरुचि, जो गन्दापन, जो विलास-प्रेम, जो कुवासना फैलायी जा रही है, वह इस काम के महत्व को मिट्टी मे मिला देती है । अगर हम अच्छे भावपूर्ण ड्रामे स्टेज कर सके, तो उससे अवश्य प्रचार बढ़ेगा । हमे सच्चे मिशनरियो की जरूरत है और आपके ऊपर इस मिशन का दायित्व है । बड़ी मुश्किल यह है कि जब तक किसी वस्तु की उपयोगिता प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे,कोई उसके पीछे क्यों अपना समय नष्ट करे ? अगर हमारे नेता और विद्वान् जो राष्ट्र-भाषा के महत्व से बेखबर नहीं हो सकते, राष्ट्र-भाषा का व्यवहार कर सकते तो जनता मे उस भाषा की ओर विशेष आकर्षण होता । मगर,यहाँ तो अँग्रेजियत का नशा सवार है । प्रचार का एक और साधन है कि भारत के अँग्रेजी और अन्य भाषाओ के पत्रो को हम
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इस पर अमादा कर सके कि वे अपने पत्रो के एक दो कानप नियमित रूप से राष्ट्र-भाषा के लिए दे सके । अगर हमारी प्राथना वे स्वीकार करें, तो उससे भी बहुत फायदा हो सकता है । हम तो उस दिन का स्वप्न देख रहे है, जब राष्ट्र-भाषा-पूर्ण रूप से अंग्रेजी का स्थान ले लेगा, जब हमारे विद्वान् राष्ट्रभाषा मे अपनी रचनाएँ करेगे, जब मद्रास और मैसूर, ढाका और पूना सभी स्थानो से राष्ट्र भाषा के उत्तम ग्रन्थ निकलेगे, उत्तम पत्र प्रकाशित होगे और भू-मण्डल की भाषाओ और साहित्यो की मजलिस मे हिन्दुस्तानी साहित्य और भाषा को भी गौरव स्थान मिलेगा, जब हम मंगनी के सुन्दर कलेवर मे नहीं, अपने फटे वस्त्रो मे ही सही, ससार साहित्य मे प्रवेश करेगे। यह स्वप्न पूरा होगा या अन्धकार मे विलीन हो जायगा, इसका फैसला हमारी राष्ट्रभावना के हाथ है। अगर हमारे हृदय मे वह बीज पड़ गया है, हमारी सम्पूर्ण प्राण-शक्ति से फले- फूलेगा। अगर केवल जिह्वा तक ही है, तो सूख जायगा ।

हिन्दी और उर्दू-साहित्य की विवेचना का यह अवसर नहीं है, और करना भी चाहे, तो समय नहीं । हमारा नया साहित्य अन्य प्रान्तीय साहित्यो की भॉति ही अभी सम्पन्न नहीं है । अगर सभी प्रातो का साहित्य हिन्दी मे आ सके, तो शायद वह सम्पन्न कहा जा सके । बॅगला साहित्य से तो हमने उसके प्रायः सारे रत्न ले लिये हैं और गुजरातो, मराठी साहित्य से भी थोड़ी-बहुत सामग्री हमने ली है। तमिल, तेलगु आदि भाषाओ से अभी हम कुछ नही ले सके, पर आशा करते है कि शीघ्र ही हम इस खजाने पर हाथ बढ़ायेगे, बशर्ते कि घर के भेदिया ने हमारी सहायता की । हमारा प्राचीन साहित्य सारे का सारा काव्यमय है, और यद्यपि उसमे शृङ्गार और भक्ति की मात्रा ही अधिक है, फिर भी बहत कुछ पढ़ने योग्य है। भक्त कवियो की रचनाएँ देखनी है, तो तुलसी, सूर और मीरा आदि का अध्ययन कीजिये, ज्ञान मे कबीर अपना सानी नहीं रखता और शृङ्गार तो इतना अधिक है कि उसने एक प्रकार से हमारी पुरानी कविता को कलकित कर दिया है । मगर, वह उन कवियों का
[ १६४ ]दोष नही, परिस्थितियो का दोष है जिनके अन्दर उन कवियो को रहना पड़ा। उस जमाने मे कला दरबारो के आश्रय से जीती थी और कलाविदो को अपने स्वामियो की रुचि का ही लिहाज करना पड़ता था। उर्दू कवियो का भी यही हाल है। यही उस जमाने का रग था । हमारे रईस लोग विलास मे मग्न थे, और प्रेम, विरह और वियोग के सिवा उन्हे कुछ न सूझता था । अगर कहीं जीवन का नकशा है भी, तो यह कि ससार चद-रोजा है, अनित्य है, और यह दुनिया दुःख का भण्डार है और इसे जितनी जल्दी छोड़ दो, उतना ही अच्छा । इस थोथे वैराग्य के सिवा और कुछ नहो । हाँ, सूक्तियो और सुभाषितों की दृष्टि से वह अमूल्य है । उर्दू की कविता आज भी उसी रग पर चली जा रही है, यद्यपि विषय मे थोड़ी-सी गहराई आ गयी है। हिन्दी मे नवीन ने प्राचीन से बिलकुल नाता तोड़ लिया है। और आज की हिन्दी कविता भावों की गहराई, आत्मव्यजना और अनुभूतियों के एतबार से प्राचीन कविता से कहीं बढ़ी हुई है । समय के प्रभाव ने उस पर भी अपना रंग जमाया है और वह प्रायः निराशावाद का रुदन है । यद्यपि कवि उस रुदन से दुःखी नही होता, बल्कि उसने अपने धैर्य और सतोष का दायरा इतना फैला दिया है कि वह बड़े से बड़े दुःख और बाधा का स्वागत करता है । और चूँकि वह उन्हीं भावों को व्यक्त करता है, जो हम सभी के हृदयो मे मौजूद हैं, उसकी कविता में मर्म को स्पर्श करने की अतुल शक्ति है । यह जाहिर है कि अनुभूतियों सबके पास नहीं होती और जहाँ थोड़े-से कवि अपने दिल का दर्द कहते हैं, बहुत से केवल कल्पना के आधार पर चलते हैं।

अगर आप दुःख का विकास चाहते है, तो महादेवी, 'प्रसाद', पंत, सुभद्रा, 'लली', 'द्विज' 'मिलिन्द', 'नवीन', प० माखनलाल चतुर्वेदी आदि कवियो की रचनाएँ पढ़िये । मैंने केवल उन कवियो के नाम दिये हैं, जो मुझे याद आये, नहीं तो और भी ऐसे कई कवि है, जिनकी रचनाएँ पढ़कर आप अपना दिल थाम लेगे, दुःख के स्वर्ग मे पहुँच जायेंगे। [ १६५ ]काव्यो का आनन्द लेना चाहे ता मैथिलीशरण गुप्त और त्रिपाठीजी के काव्य पढिये। ग्राम्य-साहित्य का दफीना भी त्रिपाठीजी ने खाद कर आपके सामने रख दिया है। उसमे से जितने रत्न चाहे शाक से निकाल ले जाइये और देखिये उस देहाती गान मे कवित्व की कितनी माधुरी और कितना अनूठापन है । ड्रामे का शोक है, तो लक्ष्मीनारायण मिश्र के सामाजिक और क्रातिकारी नाटक पढ़िये । ऐतिहासिक और भावमय नाटकों की रुचि है, तो 'प्रसाद' जी की लगायी हुई पुष्पवाटियो की सैर कोजिए । उर्दू मे सबसे अच्छा नाटक जो मेरी नजर से गुजरा, वह 'ताज' का रचा हुआ 'अनारकली है । हास्य-रस के पुजारी है, तो अन्नपूर्णानन्द की रचनाएँ पढिये । राष्ट्र-भाषा के सच्चे नमूने देखना चाहते है, तो जी० पी० श्रीवास्तव के हँसानेवाले नाटको की सैर कीजिये । उर्दू मे हास्य-रस के कई ऊँचे दरजे के लेखक है और पडित रतननाथ दर तो इस रङ्ग मे कमाल कर गये है। उमर खैयाम का मजा हिन्दी मे लेना चाहे तो 'बच्चन' कवि की मधुशाला मे जा बैठिये। उसकी महक से ही आपको सरूर आ जायगा। गल्प-साहित्य मे 'प्रसाद', 'कौशिक', जैनेन्द्र, 'भारतीय', 'अज्ञेय', विशेश्वर आदि की रचनात्रो मे आप वास्तविक जीवन की झलक देख सकते है । उर्दू के उपन्यासकारो में शरर, मिजों रुसवा, सज्जाद हुसेन, नजीर अहमद आदि प्रसिद्ध है, और उर्दू मे राष्ट्र-भाषा के मबसे अच्छे लेखक ख्वाजा हसन निजामी है, जिनकी कलम मे दिल को हिला देने की ताकत है । हिन्दी के उपन्यास-क्षेत्र मे अभी अच्छी चीजे कम आयी है, मगर लक्षण कह रहे है कि नयी पौध इस क्षेत्र मे नये उत्साह, नये दृष्टिकोण, नये सन्देश के साथ भा रही है। एक युग की इस तरक्की पर हमे लज्जित होने का कारण नही है।

मित्रो, मै आपका बहुत-सा समय ले चुका; लेकिन एक झगडे की बात बाकी है, जिसे उठाते हुए मुझे डर लग रहा है। इतनी देर तक उसे टालता रहा पर अब उसका भी कुछ समाधान करना लाजिम है। [ १६६ ]
वह राष्ट्रलिपि का विषय है । बोलने की भाषा तो किसी तरह एक हो सकती है, लेकिन लिपि कैसे एक हो ? हिन्दी और उर्द लिपियो मे तो पूरब-पच्छिम का अन्तर है । मुसलमाना को अपनी फारसी लिपि उतनी ही प्यारा है, जितनी हिन्दुओ को अपनी नागरी लिपि । वह मुसलमान भी जो तमिल, बॅगला या गुजराती लिखते-पढ़ते है, उर्दू को धार्मिक श्रद्धा की दृष्टि से देखते है; क्योकि अरबी और फारसी लिपि मे वही अन्तर है, जो नागरी और बॅगला मे है, बल्कि उससे भी कम । इस फारसी लिपि मे उनका प्राचीन गौरव, उनकी सरकृति, उनका ऐतिहासिक महत्व सब कुछ भरा हुआ है। उसमे कुछ कचाइयों है, तो खूबियाँ भी है, जिनके बल पर वह अपनी हस्ती कायम रख सकी है। वह एक प्रकार का शार्टहैड है । हमे अपनी राष्ट्र-भाषा और राष्ट्रलिपि का प्रचार मित्र-भाव से करना है, इसका पहला कदम यह है कि हम नागरी लिपि का संगठन करे । बंगला, गुजराती, तमिल, श्रादि अगर नागरी लिपि स्वीकार कर लें, तो राष्ट्रीय लिपि का प्रश्न बहुत कुछ हल हो जायगा और कुछ नही तो केवल संख्या ही नागरी को प्रधानता दिला देगी । और हिन्दी लिपि का सीखना इतना आसान है और इस लिपि के द्वारा उनकी रचनाओ और पत्रो का प्रचार इतना ज्यादा हो सकता है कि मेरा अनुमान है, वे उसे आसानी से स्वीकार कर लेंगे। हम उर्दू लिपि को मिटाने तो नहीं जा रहे हैं। हम तो केवल यही चाहते है कि हमारी एक कौमी लिपि हो जाय । अगर सारा देश नागरी लिपि का हो जायगा, तो सम्भव है मुसलमान भी उस लिपि को कुबूल कर लें । राष्ट्रीय चेतना उन्हे बहुत दिन तक अलग न रहने देगी। क्या मुसलमानो मे यह स्वाभाविक इच्छा नहीं होगी कि उनके पत्र और उनकी पुस्तकें सारे भारतवर्ष मे पढ़ी जायें ? हम तो किसी लिपि को भी मिटाना नहीं चाहते । हम तो इतना ही चाहते हैं कि अन्तान्तीय व्यवहार नागरी मे हो । मुसलमानों मे राजनैतिक जागृति के साथ यह प्रश्न आप हल हो जायगा । यू० पी० मे यह आन्दोलन
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भी हो रहा है कि स्कूलो मे उर्दू के छात्रो को हिन्दी और हिन्दी के छात्रो को उर्दू का इतना ज्ञान अनिवाय कर दिया जाय कि वह मामूली पुस्तके पढ सके और खत लिख सके । अगर वह अान्दोलन सफल हुआ, जिसकी अाशा है, तो प्रत्येक बालक हिन्दी और उर्दू दोनो ही लिपियो से परिचित हो जायगा । और जब भाषा एक हो जायगी तो हिन्दी अपनी पूर्णता के कारण सर्वमान्य हो जायगी और राष्ट्रीय योज- नारो मे उसका व्यवहार होने लगेगा । हमारा काम यही है कि जनता मे राष्ट्र-चेतना को इतना सजीव कर दे कि वह राष्ट्र हित के लिए छोटे-छोटे स्वार्थों को बलिदान करना सीखे। आपने इस काम का बीडा उठाया है, और मै जानता हूँ अापने क्षणिक आवेश मे अाकर यह साहस नही किया है बल्कि आपका इस मिशन मे पूरा विश्वास है, और आप जानते है कि यह विश्वास कि हमारा पक्ष सत्य और न्याय का पक्ष है, आत्मा को कितना बलवान् बना देता है। समाज मे हमेशा ऐसे लोगो की कसरत होती है जो खाने-पीने, धन बटोरने और जिन्दगी के अन्य धन्धो मे लगे रहते है। यह समाज की देह है। उसके प्राण वह गिने-गिनाये मनुष्य है, जो उसकी रक्षा के लिए सदैव लड़ते रहते है-कभी अन्धविश्वास से, कभी मूर्खता से, कभी कुव्यवस्था से, कभी पराधीनता से । इन्हीं लडन्तियो के साहस और बुद्धि पर समाज का आधार है । आप इन्हीं सिपाहियो मे है। सिपाही लड़ता है, हारने-जीतने की उसे परवाह नहीं होती। उसके जीवन का ध्येय ही यह है कि वह बहुतो के लिए अपने को होम कर दे । आपको अपने सामने कठिनाइयो की फौजे खड़ी नजर आयेगी । बहुत सम्भव है, आपको उपेक्षा का शिकार होना पडे । लोग आपको सनकी और पागल भी कह सकते है। कहने दीजिए। अगर आपका संकल्प सत्य है, तो आप मे से हरेक एक-एक सेना का नायक हो जायगा। आपका जीवन ऐसा होना चाहिये कि लोगों को आप मे विश्वास और श्रद्धा हो । आप अपनी बिजली से दूसरों मे भी बिजली भर दें, हर एक
[ १६८ ]पन्थ की विजय उसके प्रचारको के आदर्श-जीवन पर ही निर्भर होती है। अयोग्य व्यक्तियो के हाथों मे ऊँचे-से-ऊँचा उद्देश्य भी निंद्य हो सकता है। मुझे विश्वास है, आप अपने को अयोग्य न बनने देंगे।

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दक्षिण-भारत हिन्दी-प्रचार सभा, मद्रास के चतुर्थ उपाधिवितरणोत्सव के अवसर पर, २६ दिसम्बर, १९३४ ई० को दिया गया दीक्षान्त भाषण ।