साहित्य का उद्देश्य/5

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साहित्य का उद्देश्य
द्वारा प्रेमचंद

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भी जनता की श्रद्धा के पात्र है । यहा आप जनता की इस श्रद्धा को अपने समर्थन मे आगे क्यो रखते है।

आपने जो साहित्य के उद्देश्य गिनाये है, उन्हे पूरा करने मे सिनेमा साहित्य से कही आगे जाने की क्षमता रखता है । यूटिलिटी के दृष्टिकोण से सिनेमा साहित्य से कही अधिक ग्राह्य है; लेकिन यह सब होते हुए भी सिनेमा की उपयोगिता कुपात्रो के हाथो मे पड़कर दुरुपयोगिता मे परिणत हो रही है। इसमे दोष सिनेमा का नही, उनका है जिनके हाथ मे इसकी बागडोर है । इनसे भी अधिक उनका है जो इस चीज को बर्दाश्त करते है। बर्दाश्त करना भी बुरा नही होता, यदि इसके साथ मजबूरी की शर्त न लगी होती।

गले मे जयमाल पड़ने वाली बात भी बड़े मजे की है-'कितने ही साहित्यिको ने निशाने लगाये पर शायद ही कोई मछली बेध पाया हो। जयमाल गले मे कैसे पडती ?' बहुत खूब । जिस चीज़ के लिए साहित्यिको ने सिनेमा पर निशाने लगाये, वह चीज क्या उन्हे नहीं मिली-अपवाद को छोडकर ? आप या कोई और साहित्यिक यह बताने की कृपा करेंगे कि सिनेमा मे प्रवेश करने वाले साहित्यिको मे से ऐसा कौन है, जिसके सिनेमा प्रवेश का मुख्य उद्देश्य सिनेमा को अपने रग' मे रगना रहा हो ? क्या किसी भी साहित्यिक ने सिन्सीयरली इस ओर कुछ काम किया है ? फिर जयमाल गले मे कैसे पडती ? माना कि साहित्य संसार मे जयमाल और सम्राट की उपाधियाँ टके सेर बिकती हैं। लेकिन सभी जगह तो इन चीजो का यही भाव नहीं है । पहले सिनेमा- जगत को कुछ दीजिए, या यो ही गले मे जयमाल पड़ जाये ? या सिर्फ साहित्यिक होना ही गले मे जयमाल पड़ने क! क्वालिफिकेशन है ?

आप बम्बई मे रह चुके हैं। सिनेमा-जगत की आपने झाकी भी ली है। आपको यह बताने की आवश्यकता नहीं कि हमारे साहित्यिक भी, अपनी फिल्मो मे निर्दिष्ट रुचि का समावेश करने मे किसी से पीछे नहीं रहे हैं । या कहे कि आगे ही बढ़ गये है। औरो को छोड़ दीजिए, वे
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साहित्यिक भी जो कि एक तरह से कम्पनी के सर्वेसर्वा है, अपने फिल्म मे दो सौ लड़कियों का नाम रखने से बाज न आये, जो कि बज़िद थे, कि तालाब से पानी भरने वाले सीन मे हीरोइन अण्डरवियर न पहने, हीरो आये, उससे छेड़खानी करे और उसका घड़ा छीनकर उस पर डाल दे । बदन पर अण्डरवियर नहीं, वस्त्र भीगे, बदन से चिपके, और नग्नता का प्रदर्शन हो। यह सूझ उन्हीं साहित्यिको मे से एक की है, जिनके कि आपने नाम गिनाये हैं। ..."लेकिन मुझे कहना चाहिए कि इसमे साहित्यिक का दोष जरा भी नहीं है । .... और ऐसी ब्लैक- शीप मेन्टैलिटी साहित्यिक क्या और सिनेमा क्या, सभी जगह मिल जायेगी।

आपने अपने लेख में होली, कजली और बारहमासे, की पुस्तकों का जिक्र किया है । इन चीजो को साहित्य नहीं कहा जाता या साहित्यिक इन्हे रिकग्नाइज नहीं करते, यह ठीक है। लेकिन उनका अस्तित्व है और जिस प्रेरणा या उमंग को लेकर अन्य कलाओं का सृजन होता है उन्ही को लेकर यह होली, कजली और बारहमासे भी आये है । लेकिन आपका उन्हे अपने से अलग रखना भी स्वाभाविक है। यूटिलिटी के व्यक्तिगत दृष्टिकोण से। इसी तरह क्या आपने कभी यह जानने का कष्ट किया है कि सिनेमा- जगत में क्लासेज एड मासेज-दोनों की ही अोर से कौन-कौन सी कम्पनियों, कौन-कौन से डाइरेक्टरों और कौन-कौन से फिल्मो को रिक- ग्नाइज किया जाता है ? भारत की मानी हुई या सर्वश्रेष्ठ कम्पनियों कौन सी हैं, यह पूछने पर आपको उत्तर मिलेगा-प्रभात, न्यू थियेटर्स और रणजीत । डाइरेक्टरों की गणना मे शान्ताराम, देवकी बोस और चन्दू- लाल शाह के नाम सुनाई देगे । तब फिर आपका, या किसी भी व्यक्ति का, जो भी फिल्म या कम्पनी सामने आ जाये उसी से सिनेमा पर एक स्लैशिगफ़तवा देना कहाँ तक सगत है, यह आपही सोचें । यह तो वही बात हुई कि कोई आदमी किसी लाइब्रेरी मे जाता है । जिस पुस्तक पर हाथ पड़ता है, उसे उठा लेता है । और फिर उसी के आधार
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पर फतवा दे देता है कि हिन्दी मे कुछ नहीं है, निरा कूड़ा भरा है । क्या आप इस चीज को ठीक समझते है ?

अब दो एक शब्द आपके मादक या मतवालावाद पर भी । पहली बात तो यह कि केवल यूटिलिटेरियन एन्ड्स की दृष्टि से लिखा गया साहित्य ही साहित्य है, ऐसा कहना ठीक नही ! ऐसी रचना करने के लिए साहित्यिक से अधिक प्रोपेगेण्डिस्ट होने की जरूरत है। इतना ही नही । इन एन्डस को पूरा करने के लिए अन्य साधन मौजूद है, जो साहित्य से कही अधिक प्रभावशाली है । तब फिर, साहित्य के स्थान पर उन साधनो को प्रेफरेन्स क्यो न दिया जाये ? इसे भी छोड़िए। यूटिलिटेरियन एन्ड्स को अपनाने मे कोई हर्ज नहीं। उन्हे अपनाना चाहिए ही। लेकिन क्या सचमुच मे सेक्स-अपील उतना बड़ा हौवा है, जितना कि उसे बना दिया गया है ? क्या सेक्स अपील से अपने आपको, अपनी रचनाओ को, पाक रखा जा सकता है ? पाक रखना क्या स्वाभाविक और सजीव होगा ? अपवाद के लिए गुजाइश छोड़कर मैं आपसे पूछना चाहूँगा कि आप किसी भी ऐसी रचना का नाम बताएँ, जिसमें सेक्स अपील न हो । सेक्स अपील बुरी चीज नहीं है। वह तो होनी ही चाहिए । लोहा तो हमे उस मनोवृत्ति से लेना है, जो सेक्स अपील और सेक्स परवर्शन मे कोई भेद नहीं समझती।

अब सिनेमा-मुधार की समस्या पर भी । यह समझना कि जिनके हाथ मे सिनेमा की बागडोर है, वे इनिशिएटिव ले-भारी भूल होगी। यह काम प्रेस और प्लेटफार्म का है, इससे भी बढ़कर उन नवयुवको का है, जो सिनेमा मे दिलचस्पी रखते है। चूंकि मै प्रेस से सम्बन्धित हूँ और फिलहाल एक सिनेमा-पत्रिका का सम्पादन कर रहा हूँ इसलिए मैंने इस दिशा मे कदम उठाने का प्रयत्न किया । लेखकों तथा अन्य साहित्यिकों को अप्रोच किया । कुछ ने कहा कि सिनेमा सुधार की जिम्मेदारी लेखको पर नहीं। अपने लेख पर दिये गये 'लेखक' के सम्पादक का नोट ही देखिए । कुछ ने इसे असम्भव-सा बताकर छोड़ दिया। सिनेमा-सुधार
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की आवश्यकता को तो सब महसूस करते है,सिनेमा का विरोध भी जी खाल कर करते है, पर क्रियात्मक सहयोग का नाम सुनते ही अलग हो जाते हैं । सिर्फ इसलिए कि सिनेमा बदनाम है ओर यह चीज़ हमारे रोम-राम मे धसी हुई है, कि बद अच्छा बदनाम बुरा । क्या यह विड- म्बना नहीं है ? इस चीज़ को दूर करने मे क्या आप हमारी सहायता न करेंगे।

यह सब होते हुए हम सिनेमा सुधार के काम को आगे बढ़ाना चाहते है। नवयुवक लेखको के सिनेमा ग्रुप की योजना के लिए जमीन तैयार हो चुकी है, हम विस्तृत योजना भी शीघ्र प्रकाशित कर रहे हैं। इसके लिए जरूरत होगी एक निष्पक्ष सिनेमा-पत्र की । जब तक नहीं निकलता तब तक काफी दूर तक 'रंगभूमि' हमारा साथ दे सकती है। मेरा तो यह निश्चित मत है और मै सगर्व कह सकता हूँ कि इस लिहाज से 'रंगभूमि' भारतीय सिनेमा पत्रो मे सबसे आगे है । मै आपसे अनुरोध करूंगा कि आप 'रंगभूमि' की आलोचनाएँ जरूर पढा करे । पढ़ने पर आपको भी मेरे जैसा मत स्थिर करने मे जरा भी देर न लगेगी । इसका मुझे पूर्ण निश्चय है।

अाशा है कि आप भी सिनेमा-ग्रुप को अपना आवश्यक सहयोग देकर कृतार्थ करेंगे।

आपका
 
नरोत्तम प्रसाद नागर
 

नागर जी ने हमारे सिनेमा-सम्बन्धी विचारो को ठीक माना है, केवल हमारा जेनरेलाइज़ करना अर्थात् सभी को एक लाठी से हाकना उन्हे अनुचित जान पड़ता है । क्या वेश्याओ मे शरीफ औरते नहीं हैं लेकिन इससे वेश्यावृत्ति पर जो दाग है वह नही मिटता । ऐसी वेश्याएँ अपवाद है, नियम नहीं।

साधुओ और वेश्याओ मे मौलिक अन्तर है । साधु कोई इसलिए नहीं हाता कि वह मौज उड़ाएगा और व्यभिचार करेगा, हालाकि ऐसे
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साधु निकल ही आते है, जो परले सिरे के लुच्चे कहे जा सकते हैं। साधु हम ज्ञान प्राप्ति या मोक्ष या जन-सेवा के ही विचार से होते है। इस गई गुजरी दशा मे भी ऐसे साधु मौजूद है, जिन्हे इम महात्मा कह सकते है। वेश्याश्रो के मूल मे दुर्वासना, अर्थ-लोलुपता, कामुकता और कपट होता है । इससे शायद नागर जी को भी इन्कार न हो।

सिनेमा की क्षमता से मुझे इनकार नहीं। अच्छे विचारो और आदशों के प्रचार मे सिनेमा से बढकर कोई दूसरी शक्ति नहीं है, मगर जैसा नागर जी खुद स्वीकार करते है, वह कुपात्रो के हाथ मे है और वह लोग भी इस जिम्मेदारी से बरी नही हो सकते, जो उसे बर्दाश्त करते है, अर्थात् जनता । मुझे इसके स्वीकार करने मे कोई आपत्ति नहीं। यही तो मै कहना चाहता हूँ । सिनेमा जिनके हाथ मे है, उन्हे आप कुपात्र कहे, मै तो उन्हे उसी तरह व्यापारी समझता हूँ, जैसे कोई दूसरा व्यापारी। और व्यापारी का काम जन-रुचि का पथ-प्रदर्शन करना नही, धन कमाना है। वह वही चीज जनता के सामने रखता है,जिसमे उसे अधिक से अधिक धन मिले ।एक फिल्म बनाने मे पचास हजार से एक लाख तक बल्कि इससे भी ज्यादा खर्च हो जाते है । व्यापारी इतना बड़ा खतरा नही ले सकता। गरीब का दीवाला निकल जाय । साहित्यकार का मुख्य उद्देश्य धन नहीं होता, नाम चाहे हो । हमारे खयाल मे साहित्य का मुख्य उद्देश्य जीवन को बल और स्वास्थ्य प्रदान करना है। अन्य सभी उद्देश्य इसके नीचे आ जाते है। हजारो साहित्यकार केवल इसी भावना से अपना जीवन तक साहित्य पर कुर्बान कर देते है। उन्हे घेला भी इससे नहीं मिलता । मगर ऐसा शायद ही कोई प्रोड्यूसर अवतरित हुअा हो, और शायद ही हो, जिसने इस ऊँची भावना से फिल्म बनाया हो।

आप फरमाते हैं, सिनेमा मे जाने वाले साहित्यिकों मे ऐसा कौन था, जिसका मुख्य उद्देश्य सिनेमा को अपने रग मे रगना रहा हो ? हम गोरों से कह सकते हैं, कोई भी नहीं । वहाँ का जलवायु ही ऐसा है कि बड़ा आदर्शवादी भी जाय, तो नमक की खान मे नमक बन कर रह
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जायगा । वही लोग, जो साहित्य मे आदर्श को सृष्टि करते हैं सिनेमा में दो दो सौ वेश्याओं का नगा नाच करवाते है । क्यों ? इसीलिए कि वे ऐसे धन्धे मे पड़ गये है, जहाँ बिना नगा नाच नचाये धन से भेंट नहीं होती । मै आदर्शों को लेकर गया था, लेकिन मुझे मालूम हुआ कि सिनेमा वालो के पास बने-बनाये नुस्खे हैं, और श्राप उस नुस्खे के बाहर नहीं जा सकते । वहाँ प्रोड्यूसर यह देखता है कि जनता किस बात पर तालियों बजाती है । वही बात वह अपने फिल्म मैं लायेगा । अन्य विचार उसके लिए ढकोसले है, जिन्हें वह सिनेमा के दायरे के बाहर समझता है। और फिर सारा भेद तो एसोसिएशन का है । वेश्या के मुख से वैराग्य या निर्गुण सुनकर कोई तर नहीं जाता । रही उपाधियों के टके सेर की बात। हमारे खयाल मे सिनेमा मे वह इससे कहीं सस्ती है जहाँ अच्छे वेतन पर लोग इसीलिए नौकर रखे जाते हैं, जो अपने ऐक्टरों और ऐक्ट्रेसों की तारीफ मे जमीन आसमान के कुलाबे मिलायें ।

मैं यह नहीं कहता कि होली या कजली त्याज्य हैं और जो लोग होली या कजली गाते है वह नीच हैं और जिन भावो से प्रेरित होकर होली और कजली का सुजन होता है वह मूल रूप मे साहित्य की प्रेरक भावनाओं से अलग है । फिर भी वे साहित्य नहीं हैं । पत्र-पत्रिकाओ को भी साहित्य नहीं कहा जाता । कभी कभी उनमे ऐसी चीजे निकल जाती हैं, जिन्हे हम साहित्य कह सकते हैं। इसी तरह होली और कजली मे भी कभी- कभी अच्छी चीजे निकल जाती है, और वह साहित्य का अंग बन जाती हैं। मगर आम तौर पर ये चीजें अस्थायी होती है और साहित्य मे जिस परिष्कार, मौलिकता, शैली, प्रतिभा, विचार गम्भीरता की जरूरत होती है, वह उनमे नहीं पाई जाती । देहातों में दीवारो पर औरते जो चित्र बनाती है, अगर उसे चित्रकला कहा जाय तो शायद ससार मे एक भी ऐसा प्राणी न निकले जो चित्रकार न हो । साहित्य भी एक कला है और उसकी मर्यादाएँ हैं । यह मानते हुए भी कि श्रेष्ठ कला वही है जो
[ १२३ ]आसानी से समझी और चखी जा सके, जो सुबोध और जनप्रिय हो, उसमे ऊपर लिखे हुए गुणों का होना लाजमी है । आपने सिनमा-जगत मे जिन अपवादो के नाम लिये हैं, उनकी मैं भी इज्जत करता हूँ और उन्हें बहुत गनीमत समझता हूँ; मगर वे अपवाद हैं, जो नियम को सिद्ध करते है । और हम तो कहते है इन अपवादो को भी व्यापारिकता के सामने सिर झुकाना पडा है । सिनेमा मे एंटरटेनमेन्ट वैलू साहित्य के इसी अंग से बिलकुल अलग है । साहित्य मे यह काम शब्दो, सूक्तियों या विनोदों से लिया जाता है । सिनेमा मे वही काम, मारपीट, धर पकड़, मुंह चिढाने और जिस्म को मटकाने से लिया जाता है।

रही उपयोगिता की बात । इस विषय मे मेरा पक्का मत है कि परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सभी कला उपयोगिता के सामने घुटना टेकती है। प्रोपेगेन्डा बदनाम शब्द है; लेकिन आज का विचारोत्पादक, बलदायक, स्वास्थ्यवर्द्धक साहित्य प्रोपेगेन्डा के सिवा न कुछ है, न हो सकता है, न होना चाहिए, और इस तरह के प्रोपेगेन्डे के लिए साहित्य से प्रभाव- शाली कोई साधन ब्रह्मा ने नहीं रचा वर्ना उपनिषद् और बाइबिल दृष्टान्तो से न भरे होते ।

सेक्स अपील को हम हौवा नहीं समझते, दुनिया उसी धुरी पर कायम लेकिन शराबखाने मे बैठ कर तो कोई दूध नहीं पीता । सेक्स अपील की निन्दा तब होती है, जब वह विकृत रूप धारण कर लेती है। सुई कपडे मे चुभती है, तो हमारा तन ढंकती है, लेकिन देह मे चुभे तो उसे जख्मी कर देगी । साहित्य मे भी जब यह अपील सीमा से आगे बढ़ जाती है, तो उसे दूषित कर देती है। इसी कारण हिन्दी प्राचीन कविता का बहुत बड़ा भाग साहित्य का कलक बन गया है। सिनेमा मे वह अपील और भी भयंकर हो गई है, जो संयम और निग्रह का उप- हास है। हमें विश्वास नहीं आता कि आप आजकल के मुक्त प्रेम के अनुयायी हैं। उसे प्रेम कहना तो प्रेम शब्द को कलंकित करना है। उसे तो छिछोरापन ही कहना चाहिए। [ १२४ ]अन्त मे हमारा यही निवेदन है कि हम भी सिनेमा को इसके परिष्कृत रूप मे देखने के इच्छुक हैं, और आप इस विषय मे जो सराहनीय उद्योग कर रहे हैं, उसको गनीमत समझते है। मगर शराब की तरह यह भी यूरोप का प्रसाद है और हजार कोशिश करने पर भी भारत जैसे सूखे देश मे उसका व्यवहार बढता ही जा रहा है। यहाँ तक कि शायद कुछ दिनो मे वह यूरोप की तरह हमारे भोजन मे शामिल हो जाय । इसका सुधार तभी होगा जब हमारे हाथ मे अधिकार होगा, और सिनेमा जैसी प्रभावशाली, सद्विचार और सद्व्यवहार की मशीन कला-मर्मज्ञों के हाथ मे होगी, धन कमाने के लिए नहीं, जनता को आदमी बनाने के लिए, जैसा योरप मे हो रहा है। तब तक तो यह नाच तमाशे की श्रेणी से ऊपर न उठ सकेगा।

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सिनेमा का प्रचार दिन-दिन बढ रहा है । केवल इंग्लैंड मे दो

करोड़ दर्शक प्रति सप्ताह सिनेमा देखने जाते है । इसलिए प्रत्येक राष्ट्र का फर्ज हो गया है कि वह सिनेमा की प्रगति पर कड़ी निगाह रखे और इसे केवल धन लुटेरों के ही हाथ मे न छोड़ दे । व्यवसाय का नियम है कि जनता मे जो माल ज्यादा खपे, उसकी तैयारी में लगे। अगर जनता को ताड़ी शराब से रुचि है, तो वह ताडी शराब की दुकानें खोलेगा और खूब धन कमाएगा। उसे इससे प्रयोजन नहीं कि ताड़ी शराब से जनता को कितनी दैहिक, आत्मिक, चारित्रिक, आर्थिक और पारिवारिक हानि पहुँचतो है । उसके जीवन का उद्देश्य तो धन है और धन कमाने का कोई भी साधन वह नहीं छोड़ सकता । यह काम उपदेशको और सन्तों का है कि वे जनता मे संयम और निषेध का प्रचार करें। व्यवसाय तो व्यवसाय है। "बिजनेस इज़ बिजनेस' यह वाक्य सभी की जबान पर रहता है। इसका अर्थ यही है कि कारोबार मे धर्म और अधर्म, उचित और अनुचित का विचार नहीं किया जा सकता । बल्कि उसका विचार करना बेवकूफी है।

इसमे विद्वानो को मतभेद हो सकता है कि आदमी का पूर्व पुरुष बन्दर है या भालू, लेकिन इसमे तो सभी सहमत होगे कि आदमी में दैविकता भी है और पाशविकता भी। अगर आदमी एक वक्त मे किसी की हत्या कर सकता है, तो दूसरे अवसर पर किसी की रक्षा मे अपने प्राणों का होम भी कर सकता है और आदि से साहित्य और काव्य और
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कलाओ का यही ध्येय रहा है कि आदमी में जो पशुत्व है उसका दमन करके, उसमे जा देवत्व है, उसको जगाया जाय । उसमे जो निम्न भावनाएँ हैं उनको दबाकर या मिटाकर कोमल और सुन्दर वृत्तियो को सचेत किया जाय । साहित्य और काव्य मे भी ऐसे समय आये हैं, और आते रहते है, जब सुन्दर का पक्ष निर्बल हो जाता है और वह असुन्दर, वीभत्स और दुर्वासना का राग अलापने लगता है। लेकिन जब ऐसा समय आता है तो हम उसे पतन का युग कहते हैं। इसी उद्देश्य से साहित्य और कला मे केवल मानव जीवन की नकल करने को बहुत ऊँचा स्थान नही दिया जाता और आदशों की रचना करनी पड़ती है । आदर्शवाद का ध्येय यही है कि वह सुन्दर और पवित्र की रचना करके मनुष्य मे जो कोमल और ऊँची भावनाएँ है, उन्हे पुष्ट करे और जीवन के सस्कारो से मन और हृदय मे जो गर्द और मैल जम रहा हो उसे साफ कर दे । किसी साहित्य की महत्ता की जाच यही है कि उसमे आदर्श चरित्रो की सृष्टि हो । हम सब निर्बल जीव हैं, छोटे-छोटे प्रलोभनों में पड़कर हम विचलित हो जाते है, छोटे-छोटे सकटों के सामने हम सिर झुका देते हैं। और जब हमे अपने साहित्य में ऐसे चरित्र मिल जाते हैं, जो प्रलोभनो को पैरो तले रौदते और कठिनाइयों को धकियाते हुए निकल जाते हैं, तो हमे उनसे प्रेम हो जाता है, हममें साहस का जागरण होता है और हमे अपने जीवन का मार्ग मिल जाता है।

अगर सिनेमा इसी आदर्श को सामने रखकर अपने चित्रों की सृष्टि करता, तो वह आज ससार की सबसे बलवान सचालक शक्ति होता, मगर खेद है कि इसे कोरा व्यवसाय बनाकर हमने उसे कला के ऊँचे आसन से खाँचकर ताड़ी या शराब की दुकान की सतह तक पहुंचा दिया है, और यही कारण है कि अब सर्वत्र यह अान्दोलन होने लगा है कि सिनेमा पर नियन्त्रण रखा जाय और उसे मनुष्य की पशुताओ को उत्तेजन देने की कुप्रवृत्ति से रोका जाय ।'

जिस जमाने मे बम्बई मे कांग्रेस का जलसा था, सिनेमा हाल
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अधिकाश मे खाली रहते थे,और उन दिनो जो चित्र दिखाये गये, उनमें घाटा ही रहा । इसका कारण इसके सिवा और क्या हो सकता है कि जनता के विषय मे जो खयाल है कि वह मारकाट और सनसनी पैदा करने वाली और शोर गुल से भरी हुई तस्वीरो को ही पसन्द करती है, वह भ्रम है । जनता प्रेम और त्याग और मित्रता और करुणा से भरी हुई तस्वीरो को और भी रुचि से देखना चाहती है, मगर हमारे सिनेमा- वालो ने पुलिसवालो की मनोवृत्ति से काम लेकर यह समझ लिया है कि केवल भद्दे मसखरेपन और अँडैती ओर बलात्कार और सौ फीट की ऊँचाई से कूदने, झूठमूठ टीन की तलवार चलाने मे ही जनता को आनन्द आता है और कुछ थोड़ा-सा आलिंगन और चुम्बन तो मानो सिनेमा के लिए उतना ही जरूरी है जितना देह के लिए ऑखें । बेशक जनता वीरता देखना चाहती है। प्रेम के दृश्यों से भी जनता को रुचि है, लेकिन यह ख्याल करना कि आलिंगन और चुम्बन के बिना प्रेम का प्रदर्शन हो ही नहीं सकता, और केवल नकली तलवार चलाना ही जवॉमर्दी है, और बिना जरूरत गीतो का लाना सुरुचि है, और मन और कर्म की हिंसा मे ही जनता को अानन्द आता है. मनोविज्ञान का बिलकुल गलत अनुमान है। कहा जाता है कि, शेक्सपियर के शब्दों मे, जनता अबोध बालक है । और वह जिन बातों पर एकान्त मे बैठकर घृणा करती है, या जिन घटनाओं को अनहोनी समझती है, उन्हीं पर सिनेमा हाल मे बैठकर उल्लास से तालियाँ बजाती है। इस कथन मे सत्य है । सामूहिक मनोविज्ञान की यह विशेषता अवश्य है। लेकिन अबोध बालक को क्या माँ की गोद पसन्द नहीं ? जनता नग्नता और फक्कड़ता और भंडैती ही पसन्द करती है, उसे चूमा-चाटी और बलात्कार में ही मजा आता है, तो क्या उसकी इन्हीं आवश्यकताओं को मजबूत बनाना हमारा काम है ? व्यवसाय को भी देश और समाज के कल्याण के सामने झुकना पड़ता है। स्वदेशी आन्दोलन के समय मे किसकी हिम्मत थी जो बिज़नेस इज़ बिज़नेस की दुहाई देता ? बिज़नेस
[ १२८ ]से अगर समाज का हित होता है, तो ठीक है; वर्ना ऐसे बिजनेस मे आग लगा देनी चाहिए । सिनेमा अगर हमारे जीवन को स्वस्थ आनन्द दे सके, तो उसे जिन्दा रहने का हक है। अगर वह हमारे क्षुद्र मनोवेगो को उकसाता है, हममे निर्लज्जता और धूर्तता और कुरुचि को बढ़ाता है, और हमे पशुता की ओर ले जाता है, तो जितनी जल्द उसका निशान मिट जाय, उतना ही अच्छा।

और अब यह बात धीरे-धीरे समझ मे आने लगी है कि अर्धनग्न तस्वीरें दिखाकर और नगे नाचो का प्रदर्शन करके जनता को लूटना इतना आसान नहीं रहा । ऐसी तस्वीरें अब आम तौर पर नापसन्द की जाती हैं, और यद्यपि अभी कुछ दिनों जनता की बिगडी हुई रुचि आदर्श चित्रो को सफल न होने देगी लेकिन प्रतिक्रिया बहुत जल्द होने वाली है और जनमत अब सिनेमा मे सच्चे और सस्कृत जीवन का प्रतिबिम्ब देखना चाहता है, राजाओ के विलासमय जीवन और उनकी ऐयाशियो और लड़ाइयों से किसी को प्रेम नही रहा ।

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जिस तरह सस्कृति के और सभी अंगों मे यूरोप हमारा पथ-प्रदर्शक

है, उसी तरह साहित्य मे भी हम उसी के पद चिन्हो पर चलने के श्रादी हो गये है। यूरोप अाजकल नग्नता की ओर जा रहा है । वही नग्नता जो उसके पहनावे मे, उसके मनोरजनों मे, उसके रूप प्रदर्शन मे नजर आती है, उसके साहित्य मे भी व्याप्त हो रही है । वह भूला जा रहा है कि कला सयम और संकेत मे है। वही बात जो संकेतों और रहस्यो मे आकर कविता बन जाती है, अपने स्पष्ट या नग्न रूप में वीभत्स हो जाती है । वह नगे चित्र और मूर्ति बनाना कला का चमत्कार समझता है । वह भूल जाता है कि वही काजल जो अॉखों को शोभा प्रदान करता है, अगर मुंह पर पोत दिया जाय तो रूप को विकृत कर देता है । मिठाई उसी वक्त तक अच्छी लगती है, जब तक वह मुंह मीठा करने के लिए खाई जाय । अगर वह मुह मे ठूंस दी जाय, तो हमें उससे अरुचि हो जायगी । ऊषा की लाली मे जो सुहानापन है, वह सूरज के सम्पूर्ण प्रकाश मे हरगिज नहीं । मगर वर्तमान साहित्य उसी खुलेपन की ओर चला जा रहा है । जिन प्रसंगों मे जीवन का माधुर्य है, उन्हे स्पष्ट और नग्न रूप मे दिखाकर वह उस माधुर्य को नष्ट कर रहा है। वही प्रवृत्ति जो आज युवतियों को रेल और ट्राम मे बार बार आईना देखकर अोठो और गालो के धूमिल होते हुए रग को फिर से चमका देने पर प्रेरित करती है, हमारे साहित्य मे भी उन विषयों और भावो को खोलकर
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रख देने की गुदगुदी पैदा करती है, जिसके गुप्त और अस्पष्ट रहने में ही कला का आनन्द है।

और यह प्रवृत्ति और कुछ नहीं, केवल समाज की वर्तमान व्यवस्था का रूप मात्र है । जब नारी को इसका निराशाजनक अाभास होता है कि उसके पास रूप के आकर्षण के सिवा और कुछ नहीं रहा, तो वह नाना प्रकार से उसी रूप को संवार कर नेत्रो को आकर्षित करना चाहती है । उसमे वह सौन्दर्य नही रहा, जो काजल और पाउडर की- परवाह न करके, केवल श्राखो को खुश करने मे ही अपना सार न समझकर अन्तस्तल की गहराइयों से अपना प्रकाश फैलाता है। वही व्यापार बुद्धि जो आज गली गली, कोने कोने में अपना जौहर दिखा रही है, साहित्य अोर कला के क्षेत्र मे भी अपना आधिपत्य जमा रही है। आप जिधर जाइए आपको दीवारो पर, तख्तियो पर व्यापारियो के बड़े-बड़े भड़कीले पोस्टर नजर आयेगे । समाचार-पत्रो मे भी तीन चौथाई स्थान केवल विज्ञापनो से भरा रहता है। स्वामी को अच्छी सामग्री देने की उतनी चिन्ता नहीं रहती, जितनी नफा देने वाले विज्ञापनहासिल करने की । उसके कनवेसर लेखको के पास लेख के लिए नही जाते । इसके लिए तो एक कार्ड काफी है । मगर विज्ञापन-दाताअो की सेवा मे वे बराबर अपने कनवेसर भेजता है, उनकी खुशामद करता है, और उसी देवता को प्रसन्न करने मे अपना उद्धार पाता है । कितने ही अच्छे अच्छे पत्र तो केवल विज्ञापन के लिए ही निकलते हैं, लेख तो केवल गौण रूप से इसलिए दे दिये जाते हैं कि साहित्य के रसिकों को उन विज्ञापनो को पढ़ने के लिए प्रलोभन दे सके । व्यापार ने कला को एक तरह से खरीद लिया है। व्यापार के युग मे जिस चीज़ का सबसे ज्यादा महत्व होता है, वह धन है । जिसके अन्दर जो शक्ति है, चाहे वह देह की हो या मन की, या रूप की या बुद्धि की, वह उसे धन-देवता के चरणों पर ही चढ़ा देता है । हमारा साहित्य भी, जो कला का ही एक अंग है उसी व्यापार-बुद्धि का शिकार हो गया है । हम
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किसी चीज़ की रचना इसलिए नहीं करते कि हमे कुछ कहना है, कोई सन्देश देना है, जीवन के किसी नये दृष्टिकोण को दिखाना है, समाज और व्यक्ति मे ऊँचे भावो को जगाना है अथवा हमने अपने जीवन मे जो कुछ अनुभव किया है, उसे जनता को देना है, बल्कि केवल इसलिए कि हमे धन कमाना है और हम बाजार मे ऐसी चाज रखना चाहते है जो ज्यादा से ज्यादा बिक सके । जब एक बार यह ख्याल दिल मे जम गया, तो फिर हम विचार-स्वातन्त्र्य और भाव-स्वातन्त्र्य के नाम से ऐसी चीजे लिखते हैं, जिनके विषय मे जनता को सदैव कुतूहल रहा है और सदैव रहेगा । ड्रामेटिस्ट और उपन्यासकार और कवि सभी नग्न लालसा और चूमाचाटी से भरी हुई रचनाएँ करने के लिए मैदान मे उतर आते है, और आपस मे होड-सी होने लगती है कि कौन नई से नई चौकाने वाली बाते कह सुनाये, ऐसे-ऐसे प्रसग उपस्थित करे कि कामुकता के छिपे हुए अड्डो मे जो व्यापार होते है वह प्रत्येक स्त्री पुरुष के सामने आ जायें । कोई अाजाद प्रेम के नाम से, कोई पतितो के उद्धार के नाम से, कामोद्दीपन की चेष्टा करता है, और सयम और निग्रह को दकियानूसी कहकर मुक्त विलास का उपदेश देता है । सत्य और असत्य की उसे परवाह नहीं होती । वह तो चौकाने वाली और कान खड़े करने वाली बाते कहना चाहता है, ताकि जनता उसकी कृतियों पर टूट पड़े और उसकी पुस्तके हाथो-हाथ बिक जायें । उसे गुप्त से गुप्त प्रसंगो के चित्रण मे जरा भी संकोच या झिझक नही होती । इन्हीं रहस्यों को खोलने मे ही शायद उसके विचार मे समाज का बेडा पार होगा । व्रत और त्याग जैसी चीज़ की उसकी निगाह मे कुछ भी महिमा नहीं है। नहीं, बल्कि वह व्रत, त्याग और सतीत्व को ससार के लिए घातक समझता है। उसने वासनाओ को बेलगाम छोड़ देने में ही मानवी जीवन का सार समझा है । हक्सले और डी० एच० लारेन्स और डिकोबरा श्रादि, आज अग्रेजी साहित्य के चमकते हुए रत्न समझे जाते हैं, लेकिन इनकी रचनाएँ क्या हैं ? केवल उपन्यास रूपी कामशास्त्र । जब
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लेखक देखता है कि अमुक की रचना नग्नता और निर्लज्जता के कारण धड़ाधड बिक रही है, तो वह कलम हाथ मे लेकर बैठता है और उससे भी दस कदम आगे जा पहुँचता है । और इन पुस्तको की समाज मे खूब अालोचनाएँ होती है, उनकी निर्भीक सत्यवादिता के खूब ढोल पीटे जाते है । इस प्रवृत्ति को यथार्थवाद का नाम दे दिया जाता है, और यथार्थवाद की आड़ मे आप व्यभिचार की, निर्लज्जता की, चाहे जितनी मीमासा कीजिए, कोई नहीं बोल सकता। एक महिला कलम लेकर बैठती है और अपने कुत्सित प्रेम-रहस्यो का कच्चा चिट्ठा लिख जाती हैं । समाज मे उनकी रचना की धूम मच जाती है, दूसरे महोदय अपनी ऐयाशियो की झूठी सच्ची कहानी लिखकर समाज मे हलचल पैदा कर देते हैं । पुस्तको को अधिक से अधिक लाभप्रद बनाने के लिए, सम्भव है, अपनी आत्म-चर्चा को खूब बढ़ा-बढा कर बयान किया जाता हो । कामुकता का ऐसा नगा नाच शायद किसी युग में न हुआ हो। दुकानो पर रूपवती युवतियाँ बैठाई जाती है । इसलिए कि ग्राहको की कामुकता को उत्तेजित करके एक पैसे की चीज के दो पैसे वसूल कर लिये जायें। ये युवतियों मानो वह चारा है, जिसे काटे में लगाकर मछलियो को फसाया जाता है । जब सारे कुएँ मे ही भग पड़ गई है तो कला और साहित्य क्यों अछूते बच जाते ? मगर यह सब उस सामाजिक व्यवस्था का प्रसाद है, जो इस वक्त ससार मे फैली है। और वह व्यवस्था है-'धन का कहीं जरूरत से ज्यादा और कहीं जरूरत से कम होना । जिनके पास जरूरत से ज्यादा है, वह मानो समाज के देवता हैं और जिनके पास जरूरत से कम है, वह हर मुमकिन तरीको से धनवानों को खुश करना चाहते हैं। और धन की वृद्धि सदैव विषय विलास की ओर जाती है । इसीलिए रूप के बाजार सजाए जाते हैं, इसीलिए नम चित्र बनाए जाते हैं इसीलिए साहित्य कामुकता-प्रधान हो जाता है। साहित्य के इस नए पतन। का एक कारण यह भी हो सकता है कि आज कल पश्चिमी समाज मे फैशन की गुलामी और भोग लालसा के
[ १३३ ]कारण कितने ही लोग विवाह से कॉपते हैं, और उनकी रसिकता और कोई मार्ग न पाकर कामोद्दीपक साहित्य पढ़कर ही अपने दिल को तसल्ली दे लेती है। रूसी समाज को जिन लोगो ने देखा है, वे कहते है वि वहाँ की स्त्रियों रंग और पाउडर पर जान नहीं देतीं और न रेशम और लेस के लिए मरती है । उनके सिनेमा घरो के दरवाजो पर अर्ध नग्न पोस्टरो का वह प्रदर्शन नहीं होता, जो अन्य देशों मे नजर आता है। इसका कारण यह है कि वहाँ धन की प्रभुता किसी हद तक जरूर नष्ट हो गई है, और उनकी कला अब धन की गुलामी न करके समाज के परिष्कार मे लगी हुई है । हम ऊपर कह आये है कि आज यथार्थवाद के पर्दे मे बेशर्मी का नंगा नाच हो रहा है । यथार्थवाद के माने ही यह हो गए हैं कि वह समाज और व्यक्ति के नीच से नीच अधम से अधम और पतित से पतित व्यवहारो का पर्दा खोले, मगर क्या यथार्थता अपने क्षेत्र मे समाज और व्यक्ति की पवित्र साधनाओ को नहीं ले सकती ? एक विधवा के पतित जीवन की अपेक्षा क्या उसके सेवामय, तपमय जीवन का चित्रण ज्यादा मगलकारी नहीं है ? क्या साधु प्रकृति मनुष्यो का यथार्थ जीवन हमारे दिलो पर कोई असर नहीं करता ? साहित्य मे असुन्दर का प्रवेश केवल इसलिए होना चाहिए कि सुन्दर को और भी सुन्दर बनाया जा सके। अन्धकार की अपेक्षा प्रकाश ही ससार के लिए ज्यादा कल्याण- कारी सिद्ध हुआ है। [ १३४ ]
गत ७ अगस्त को मास्को मे सोवियत के सभी साहित्यिकों की एक विराट् सभा हुई थी जिसके सभापति ससार प्रसिद्ध मैक्सिम गोर्की थे । इस अवसर पर मैक्सिम गोर्की ने जो भाषण दिया, वह विषय और उसके निरूपण और मौलिक विचारो के लिहाज से बडे महत्व का था। आपने दन्तकथाओ और ग्राम्य गीतो को बिलकुल एक नए दृष्टिकोण से देखा जिसने इन कथाप्रो और गीतो का महत्व सैकडो गुना बढ़ा दिया है । ग्राम्य साहित्य और पौराणिक कथाओं मे बहुधा मानव जीवन के आदिकाल की कठिनाइयो घटनाओ और प्राकृतिक रहस्यो का वर्णन है। कम से कम हमने अब तक ग्राम्य साहित्य को इसी दृष्टि से देखा है । मैक्सिम गोर्की साहब और गहराई मे जाते है और यह नतीजा निकालते है कि 'यह उस उद्योग का प्रमाण है, जो पुराने जमाने के मजदूरो को अपनी मेहनत की थकावट का बोझा हल्का करने, थोडे समय मे ज्यादा काम करने,अपने को दो या चार टॉगो वाले शत्रुओ से बचाने और मन्त्रो द्वारा दैवी बाधाओ को दूर करने के लिए करना पड़ा।

पुराणो और दन्तकथाओं में जो देवी-देवता आते है, वह सभी स्वभाव मे मनुष्यो के से ही होते हैं । उनमे भी ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध, प्रेम और अनुराग आदि मनोभाव लाये जाते है जो सामान्य मनुष्यो मे है। इस दलील से यह बात गलत हो जाती है कि ये देवी-देवता केवल ईश्वर के भिन्न रूप हैं, अथवा मनुष्य ने जल, अग्नि, मेघ आदि से बचने के लिए उन्हे देवता का रूप देकर पूजना शुरू किया। मैक्सिम
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गोर्की साहब की राय मे इसकी उत्पत्ति सामाजिक व्यवस्था से हुई । समाज मे जो विशिष्ट लोग थे, वही देवताओ के नमूने बन गये। आदिम मनुष्यो की कल्पना मे देवता काई निराकार वस्तु या कोई अजूबा चीज न था, बल्कि वह मजदूर था, जिसके अस्त्रो मे हसिया या बसूला या कोई दूसरा औजार होता था । वह किसी न किसी उद्योग का जान कार होता था और मजदूरो की ही भांति मेहनत करता था । आप आगे कहते है :

'ईश्वर केवल उनकी कलात्मक रचना था, जिसके द्वारा उन्होने अपने उद्योग की सफलताओ और विजयो का प्रदर्शन किया। दन्त- कथाओ मे मानव शक्तियो और उसके भावी विकास को देवत्व तक पहुँचा दिया गया है, पर असल मे वास्तविक जीवन ही उनका स्रोत है और उनकी उक्तियो से यह पता लगाना कठिन नहीं है कि उनकी प्रेरणा परिश्रम की व्यथा को कम करने के लिए हुई है।

तो मैक्सिम गोर्की के कथनानुसार मजदूरो ने ईश्वर को एक साधारण, सहृदय मजदूर के रूप मे देखा, लेकिन धीरे धीरे जब शक्तिवान् व्यक्तियो ने खुद ही मजदूरी छोड़कर मजदूरो से मालिक का दर्जा पा लिया तो यही ईश्वर मजदूरो स कठिन से कठिन काम लेने के लिए उपयुक्त होने लगा।

इसके बाद जब ईश्वर और देवताओ की सृष्टि का गौरव मज- दूर सेवको के हाथ से निकलकर धनी स्वामियो के हाथ मे आ गया, तो ईश्वर और देवता भी मजदूरो की श्रेणी से निकलकर महाजनो और राजाओ की श्रेणी मे जा पहुँचे, जिनका काम अासराओ के साथ विहार करना, स्वर्ग के सुख लूटना, और दुखियो पर दया करना था। भारत मे तो मजदूर देवताओ का कही पता नही है। यहाँ के देवता तो शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण करते है । कोई फरसा लिये पापियो का कल्ल आम करता फिरता है, कोई बैल पर चढा भग चढ़ाये, भभूत रमाये, ऊल जलूल बकता नजर आता है। जाहिर है कि ऐसे ऐशपसन्द
[ १३६ ]या सैलानी देवताओ की सृष्टि करने वाले मजदूर नहीं हो सकते । ये देवता तो उस वक्त बने है, जब मजदूरो पर धन का प्रभुत्व हो चुका था और जमीन पर कुछ लोग अधिकार जमाकर राजा बन बैठे थे । यहाँ तो सभी पुराण आत्मवाद और आदर्शवाद से भरे हुए है । लेकिन, मैक्सिम गोर्की ने दिखाया है कि ईसा के पूर्व जो प्रतिमावादी थे, उनमें आत्मवाद का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नही मिलता । अात्मवाद, जिसका सबसे पहले योरप में प्लेटो ने प्रचार किया, वास्तव मे मजदूर समाज की देव कथाअो का ही एक परिवर्तित रूप था और जब ईसा ने अपने धर्म का प्रचार किया, तो उनके अनुयायियो ने प्राचीन यथार्थवाद के बचे- खुचे चिन्हो को भी मिटा डाला और उसकी जगह भक्ति और प्रार्थना और रहस्यवाद की स्थापना की, जिसने आज तक जनता को सम्मोहित कर रखा है, और मानव जाति की विचार शक्ति का बहुत बडा भाग मुक्ति और पुनर्जन्म और विधि के मामलो मे पड़ा हुआ है, जिससे न व्यक्ति का कोई उपकार होता है,न समाज का । [ १३७ ]
प्रत्येक समाज मे धर्म और आचरण की रक्षा जितनी ग्राम्य- साहित्य और ग्राम्य गीतो द्वारा होती है, उतनी कदाचित् और किसी साधन से नही होती । हमारी पुरानी कहावतें और लोकोक्तियाँ अाज भी हममे से ६६ फीसदी मनुष्यो के लिए जीवन-मार्ग के दीपक के समान है। अपने व्यवहारो मे हम उन्ही आदर्शों से प्रकाश लेते है। अगर हमारे ग्राम्य- गीत, ग्राम्य-कथाएँ और लोकोक्तियाँ हमे स्वार्थ, अनुदारता और निर्ममता का उपदेश देती है तो उनका हमारे जीवन-व्यवहारो पर वैसा ही असर पड़ना स्वाभाविक है । इस दृष्टि से जब हम अपने ग्राम्य-गीतो की परीक्षा करते है, तो हमे यह देखकर खेद होता है कि उनमे प्रायः वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष और प्रपच ही की शिक्षा दी गई है। सास जहाँ आती है, वहाँ उसे पिशाचिनी के रूप मे ही देखते है, जो बातचीत मे बहू को ताने देती है, गालियाँ सुनाती है, यहाँ तक कि बहू को निस्सतानरह ने पर उसे बाझिन कहकर उसका तिरस्कार करती है । ननद का रूप तो ओर भी कठोर है । शायद ही कोई ऐसा ग्राम्य-गीत हो, जिससे ननद और भावज मे प्रेम और सौहार्द का पता चलता हो । ननद को भावज से न जाने क्यो जानी दुश्मनी रहती है । वह भावज का खाना-पहनना, हँसना-बोलना कुछ नहीं देख सकती और हमेशा ओठडे खोज-खोजकर उसे जलाती रहती है । देवरानियों, जेठानियो और गोतिनो ने तो मानो उसका अनिष्ट करने के लिए कसम खा रखी है। वे उसके पुत्रवती होने पर जलती हैं, और उसे भी पुत्र जन्म का या अपनी सुदशा का
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केवल इसीलिए आनन्द होता है कि इससे देवरानियो, जेठानियो और गोतिनो का घमण्ड टूटेगा। उसका पति भी उससे प्रेम ना करता है, मगर जब सन्तान होने मे देर होती है, तो कोसने लगता है । जो गीत जन्म, मुण्डन विवाह सभी उत्सवो मे गाये जाते है, और प्रत्येक छोटे बडे घर मे गाये जाते है, उनमे अक्सर समाज और घर के यही चित्र दिखाये जाते हैं, और इसका हमारे घर और जीवन पर अप्रत्यक्ष रूप से असर पड़ना स्वाभाविक है । जब लडकी मे बात समझने की शक्ति आ जाती है, तभी से उसे ननद के नाम से घृणा होने लगती है । ननद से उसे किसी तरह की सहानुभूति, सहायता या सहयोग की आशा नहीं होती । वह मन मे ईश्वर से मनाती है कि उसका साबिका किसी ननद से न पड़े। ससुराल जाते समय उसे सबसे बड़ी चिन्ता यही होती है कि वहाँ दुष्टा ननद के दर्शन होगे, जो उसके लिए छुरी तेज किये बैठी है। जब मन मे ऐसी भावनाएँ भरी हुई है, तो ननद की ओर से कोई छोटी- सी शिकायत हो जाने पर भी भावज उसे अपनी बैरिन समझ लेती है और दोनो मे वह जलन शुरू हो जाती है, जो कभी शान्त नहीं होती। अाज हमारे घरो मे ऐसी बहुत कम मिसाले मिलेगी, जहाँ ननद भावज मे प्रेम हो । सास और बहू मे जो मन मुटाव प्रायः देखने में आता है, उसका सूत्र भी इन्हीं गीतो मे मिलता है, और यह भाव उस वक्त दिल मे जम जाते हैं, जब हृदय कोमल और ग्रहणशील होता है और इन पत्थर की लकीरों को मिटाना कठिन होता है । इस तरह के गीत एक तरह से दिलो मे कटुता और जलन की बारूद जमा कर देते है, जो केवल एक चिनगारी के पड़ जाने से भड़क उठती है । युवती बधू को ससुराल मे चारो तरफ दुश्मन ही दुश्मन नजर आते हैं, जो मानो अपने अपने हथियार तेज किये उस पर घात लगाये बैठे हैं। फिर क्यो न हमारे घरो मे अशान्ति और कलह हो । बहू सुख-नींद सोई हुई है । सास और ननद दोनो तड़प तड़पकर बोलती हैं-बहू तुझे क्या गुमान हो गया है, जो सुख- नीद सो
[ १३९ ]रही है। भौजी हमेशा 'बोलइ विष बोल करेजवा मे साल' यानी ऐसे तीखे बचन बोलती है जो हृदय मे शूल पैदा कर देते हैं। 'ननदिया' हमेशा 'विष बोले । एक गीत मे सीता और उसकी ननद पानी भरने के लिए जाती है। ननद भावज से कहती है-रावन की तस्वीर खीचकर दिखा दे । भावज कहती है-राम सुन पायेगे, तो मेरे प्राण ही ले लेगे। ननद कसम खाती है कि वह भैया से यह बात न कहेगी। भावज चकमे मे आ जाती है और रावन की तस्वीर खींचती है। चित्र आधा ही बन पाया है कि राम आ जाते हैं । सीता चित्र को अचल से छिपा लेती है । इस पर ननद अपने बचन का जरा भी लिहाज नही करती और भाई से कह देती है कि यह तो 'रवना उरे हैं।' जो रावन तुम्हारा बैरी है, उसी की यहा तस्वीर बनाई जाती है । ऐसी औरत क्या घर मे रखने योग्य है । राम तरह-तरह के हीले करते हैं; पर ननद राम के पीछे पड़ जाती है । आखिर हार कर राम सीता को घर से निकाल देते है। ननद का ऐसा अभिनय देखकर किस भावज को उससे घृणा न हो जायगी।

मगर इसके साथ ही ग्राम्य गीतो में स्त्री-पुरुषों के प्रेम, सास-ससुर के आदर, पति पत्नी के ब्रत और त्याग के भी ऐसे मनोहर चित्रण मिलते हैं कि चित्त मुग्भ हो जाता है। अगर कोई ऐसी युक्ति होती, जिससे विष और सुधा को अलग-अलग किया जा सकता और हम विष को अग्नि की भेट करके सुधा का पान करते तो समाज का कितना कल्याण होता।

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बीसवीं सदी के अग्रेजी ड्रामा के विषय मे अगर यह कहा जाय

कि वह मौजूदा साहित्य का सबसे प्रभावशाली अग है, तो वेजा न होगा। एलिजाबीथन युग का ड्रामा अधिकतर अमीरो और रईसो के मनोरजन के लिए ही लिखा जाता था। शेक्सपियर, बेन जानसन और कई अन्य गुमनाम नाटककार उस युग को अमर कर गये हैं । यद्यपि उनके ड्रामे मे भी गौण रूप से समाज का चित्र खीचा गया है, और भाव, भाषा तथा विचार की दृष्टि से वे बहुत ही बड़ा महत्व रखते है। लेकिन यह निर्वि- वाद है कि उनका लक्ष्य समाज का परिष्कार नहीं, वरन् ऊँची सोसाइटी का दिल बहलाव था । उनके कथानक अधिकतर प्राचीन काल के महान पुरुषो का जीवन या प्राचीन इतिहास की घटनाप्रो अथवा रोम और यूनान की पौराणिक गाथाओ से लिये जाते थे । शेक्सपियर आदि के नाटको मे भिन्न भिन्न मनावृत्तियो के पात्रों का अत्यन्त सजीव चित्रण और बड़ा ही मार्मिक विश्लेषण अवश्य है । और उनके कितने ही चरित्र तो साहित्य मे ही नहीं साधारण जीवन मे भी अपना अमर प्रभाव डाल रहे है। लेकिन यथार्थ जीवन की आलोचना उनमे नहीं की गई है। उस समय ड्रामा का यह उद्देश्य नही समझा जाता था। तीन सदियो तक अग्रेजी ड्रामा इसी लीक पर चलता रहा । बीच मे शेरिडन ही एक ऐसा नाटककार पैदा हुआ, जिसके ड्रामे अधिकतर व्यग्यात्मक हैं, अन्यथा साहित्य का यह विभाग कुछ आगे न बढ सका । यकायक उन्नीसवी सदी की पिछली शताब्दी मे रग बदला और विज्ञान तथा


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