साहित्य का उद्देश्य/6

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साहित्य का उद्देश्य
द्वारा प्रेमचंद

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बीसवीं सदी के अग्रेजी ड्रामा के विषय मे अगर यह कहा जाय कि वह मौजूदा साहित्य का सबसे प्रभावशाली अग है, तो वेजा न होगा। एलिजाबीथन युग का ड्रामा अधिकतर अमीरो और रईसो के मनोरजन के लिए ही लिखा जाता था। शेक्सपियर, बेन जानसन और कई अन्य गुमनाम नाटककार उस युग को अमर कर गये हैं । यद्यपि उनके ड्रामे मे भी गौण रूप से समाज का चित्र खीचा गया है, और भाव, भाषा तथा विचार की दृष्टि से वे बहुत ही बड़ा महत्व रखते है। लेकिन यह निर्वि- वाद है कि उनका लक्ष्य समाज का परिष्कार नहीं, वरन् ऊँची सोसाइटी का दिल बहलाव था । उनके कथानक अधिकतर प्राचीन काल के महान पुरुषो का जीवन या प्राचीन इतिहास की घटनाप्रो अथवा रोम और यूनान की पौराणिक गाथाओ से लिये जाते थे । शेक्सपियर आदि के नाटको मे भिन्न भिन्न मनावृत्तियो के पात्रों का अत्यन्त सजीव चित्रण और बड़ा ही मार्मिक विश्लेषण अवश्य है । और उनके कितने ही चरित्र तो साहित्य मे ही नहीं साधारण जीवन मे भी अपना अमर प्रभाव डाल रहे है। लेकिन यथार्थ जीवन की आलोचना उनमे नहीं की गई है। उस समय ड्रामा का यह उद्देश्य नही समझा जाता था। तीन सदियो तक अग्रेजी ड्रामा इसी लीक पर चलता रहा । बीच मे शेरिडन ही एक ऐसा नाटककार पैदा हुआ, जिसके ड्रामे अधिकतर व्यग्यात्मक हैं, अन्यथा साहित्य का यह विभाग कुछ आगे न बढ सका । यकायक उन्नीसवी सदी की पिछली शताब्दी मे रग बदला और विज्ञान तथा
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व्यवसाय ने समाज मे क्रान्ति पैदा कर दी उसका प्रतिबिम्ब एक मौलिक प्रकाश के साथ साहित्य मे उदय हो गया और नवीन निर्णयात्मक विचारो से भरे हुए नाटककारो का एक नक्षत्र-समूह साहित्य के आकाश मे चमक उठा जिसकी दीप्ति आज भी अग्रेजी साहित्य को प्रकाशमान कर रही है । नए ड्रामा का ध्येय अब बिलकुल बदल गया है । वह केवल मनोरजन की वस्तु नहीं है, वह केवल घड़ी दो घड़ी हसाना नहीं चाहता, वह समाज का परिष्कार करना चाहता है, उसकी रूढियो के बन्धनो को ढीला करना चाहता है और उसके प्रमाद या भ्रान्ति को दूर करने का इच्छुक है। समाज की किसी न किसी समस्या पर निष्पक्ष रूप से प्रकाश डालना ही उसका मुख्य काम है और वह इस दुस्तर कार्य को इस खूबी से पूरा कर रहा है कि नाटक की मनोरजकता मे कोई बाधा न पडे, फिर भी वह जीवन की सच्ची अालोचना पेश कर सके।

लेकिन विचित्र बात यह है कि नवीन ड्रामा के प्रवर्तकों मे एक भी अग्रेज नहीं है । इबसेन, माटरलिंक, और स्ट्रिडबर्ग, स्वेडेन, बेल- जियम और जर्मनी के निवासी है, पर अग्रेजी ड्रामा ने इन्हे इतना अपनाया है कि आज ये तीनों महान पुरुष अग्रेजी साहित्य के उपास्य बने हुए है। इबसेन को तो नए ड्रामा का जन्मदाता ही कहना चाहिए। वह पहला व्यक्ति था जिसने ड्रामा को समाज की आलोचना का साधन बनाया। नए समाज मे स्त्रियो का स्थान ऊँचा करने मे उसने जो कीर्ति प्राप्त की है, वह अन्य किसी साहित्यकार को नहीं मिल सकी । और माटरलिंक अपने ड्रामो मे उन सत्यो का पर्दा खोलने की चेष्टा करता है, जो वर्तमान जड़वाद की व्यापकता के कारण विस्मृत से हो गये हैं। उसके पात्र हाड़-मास के मनुष्य नहीं, मनोभावो या आध्यात्मिक अनु- भूतियो ही के नाम होते है । अग्रेज नाटककारो मे बर्नार्ड शा का नाम सब से मशहूर है, यहाँ तक कि अग्रेजी-साहित्य मे उसी का डका बज रहा है ।वह आयरलैंड का निवासी है,और व्यंग परिहास और चुटकियाँ लेने की जो प्रतिभा आयरिश बुद्धि की विशेषता है,वह उसमे कूट-कूट कर
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भरी हुई है । अग्रेजी समाज की कमजोरियो और कृत्रिमताओ का उसने ऐसा पर्दा फाश किया है कि अग्रेजो जैसा स्वार्थान्ध राष्ट्र भी कुनमुना उठा है। सदियो की प्रभुता ने अग्रेज जाति मे जो अहमन्यता, जो बनावटी शिष्टता, जो मक्कारी और ऐयारी, जो नीच स्वार्थपरता ठूस दी है, वही शा के ड्रामो के विषय है । उसकी अमीरजादियो को देखिए, या धर्माचार्यों को, या राष्ट्र के उच्च पदाधिकारियो को, सब नकली जीवन का स्वाग भरे नजर आएँगे । उनका बहुरूप उतार कर उनको नग्न रूप मे खडा कर देना शा का काम है। समाज का कोई अग उसके कलम कुठार से नहीं बचा । वह आत्मा की तह मे प्रतिष्ठित रूढियों की भी परवाह नहीं करता । वह सत्य का उपामक है और असत्य को किसी भी रूप मे नहीं देख सकता।

गाल्जवर्दी भी उपन्यासकार और कवि होते हुए भी नाटककार के रूप मे अधिक सफल हुअा है। उसके ड्रामों में समाजवाद के सिद्धान्तो का ऐसा कलापूर्ण उपयोग किया गया है कि सामाजिक विषमता का चित्र ऑखों के सामने आ जाता है, और पाठक उनसे बिना असर लिये नहीं रह सकता। उसके तीन नाटकों के अनुवाद हिन्दी मे हो चुके है, जिन्हे प्रयाग की हिन्दुस्तानी एकाडेमी ने प्रकाशित किया है । 'चादी की डिबिया' में दिखाया गया है कि धन के बल पर न्याय की कितनी हत्या हो सकती है । 'न्याय' मे उसने एक ऐसे चरित्र की रचना की है, जो सहानुभूति और उदारता के भावो से प्रेरित होकर गबन करता है और अपना कर्मफल भोगने के बाद जब वह जेल से निकलता है, तब समाज उसे ठोकरे मारता है और अन्त मे वह विवश होकर आत्म- हत्या कर लेता है । 'हडताल' मे उसने मालिकों और मजदूरो की मना- वृत्तियो का बड़ा ही मर्मस्पर्शी चित्र खींचा है । उसने और भी कई ड्रामे लिखे है, पर ये तीनो रचनाएँ उसकी कीर्ति को अमर बनाने के लिए काफी हैं । मेसफील्ड, वार्फर, सिंज, सर जेम्स बैरी, पेटर आदि भी सफल नाटककार हैं । और सब के रंग अपनी अपनी विशेषताएँ लिये
[ १४३ ]हुए है। मेसफील्ड ने मानव जीवन के काले दागो पर प्रकाश डालने मे खूब ख्याति पाई है। वह घोर वास्तविकतावादी है और मानव जीवन मे जो क्षुद्रता धूर्तता, और लम्पटता व्याप्त हो रही है, इसकी अोर से वह ऑखे नही बन्द कर सकता । मनुष्य मे स्वभावतः कितनी पशुता है, इसका उसने बड़ी बारीकी से निरीक्षण किया है । पेटर के ड्रामो मे धर्म और नीति की प्रधानता है । वह नए युग की अश्रद्धा से दुखी है और ससार का कल्याण, धर्म और विश्वास के पुनर्जीवन मे ही समझता है । उसका अपना एक स्कूल है, जो ड्रामा मे काव्यमय प्रसगो को लाना आवश्यक समझता है, जिससे मनुष्य कुछ देर के लिए तो इस छल-कपट से भरे हुए ससार के जलवायु से निकलकर कविता के स्वच्छन्द लोक मे विचर सके । ड्रिंकवाटर, सिंज, आदि ड्रामेटिस्टो का भी यही रग है ।

सबसे बडी नवीनता जो वर्तमान ड्रामा मे नजर आती है, वह उसका प्रेम चित्रण है। नवीन ड्रामा मे प्रेम का वह रूप बिलकुल बदल गया है, जब कि वह भीषण मानसिक रोग से कम न था और नाटककार की सारी चतुराई प्रेमी और प्रेमिका के संयोग मे ही खर्च हो जाती थी। प्रेमिका किमी न किसी कारण से प्रेमी के हाथ नहीं पा रही है, और प्रेमी है कि प्रेमिका से मिलने के लिए जमीन और आसमान के कुलाबे मिलाये डालता है । प्रेमिका की सहेलियाँ नाना विधि से उसकी विर- हाग्नि को शान्त करने का प्रयत्न कर रही है और प्रेमी के मित्र-वृन्द इस दुर्गम समस्या को हल करने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। सारे ड्रामे मे मिलन-चेष्टा और उसके मार्ग मे आने वाली बाधाओ के सिवा और कुछ न होता था । नवीन ड्रामे ने प्रेम को व्यावहारिकता के पिंजड़े मे बन्द कर दिया है । रोमास के लिए जीवन मे गुञ्जायश नहीं रही और न साहित्य मे ही है। प्राचीन ड्रामा जीवन अनुभूतियो के अभाव को रोमास से पूरा किया करता था । नया ड्रामा अनुभूतियो से मालामाल है । फिर वह क्यो रोमास का श्राश्रय ले । मनुष्य को जिस वस्तु मे सबसे ज्यादा अनुराग है वह मनुष्य है, और खयाली, आकाश[ १४४ ]
गामी मनुष्य नहीं,बल्कि अपना ही जैसा,साधारण बल और बुद्धि वाला मनुष्य । नवीन ड्रामा ने इस सत्य को समझा है और सफल हुआ है। आज के नायक और नायिकानो मे बहुत कुछ परिवर्तन हो गया है। नवीन ड्रामा का नायक वीरता और शिष्टता का पुतला नही होता और न नायिका लज्जा और नम्रता और पवित्रता की देवी है । ड्रामेटिस्ट उसी चरित्र के नायक और नायिका को सृष्टि करता है, जिससे वह अपने विषय को स्वाभाविक और सजीव बनाने में कामयाब हो सके। नवीन ड्रामा के पात्र केवल व्यक्ति नहीं होते, वरन् अपने समुदाय के प्रतिनिधि होते है और उस समुदाय की सारी भलाइया और बुराइया उनमे कुछ उग्र रूप मे प्रकट होती है। शा की नायिकाए आम तौर पर त्वन्छन्द और तेजमयी होती है। वे कठिन से कठिन परिस्थितियो मे भी हिम्मत नहीं छोडती। प्रेम अपने व्यावहारिक रूप मे बहुधा कामुकता का रूप धारण कर लेता है। नये डामे मे प्रेम का यही रूप दर्शाया गया है । साराश यह कि आज का नायक कोई आदर्श चरित्र नही है और न नायिका ही। नायक केवल वह चरित्र है जिस पर ड्रामा का आधार हो ।

नई ट्रेजेडी का रूप भी बहुत कुछ बदल गया है। अब वही ड्रामा ट्रेजेडी नही समझा जाता, जो दुखान्त हो । सुखान्त ड्रामा भी ट्रेजेडी हो सकता है, अगर उसमे ट्रेजेडी का भाव मौजूद हो अर्थात्-समाज के विभिन्न अगो का सघर्ष दिखाया गया हो। कितनी ही बाते जो दुःख- जनक समझी जाती थीं, इस समय साधारण समझी जाती है, यहाँ तक कि कभी कभी तो स्वाभाविक तक समझी जाने लगी है । फिर नाटककार ट्रेजेडी कहाँ से उत्पन्न करे । पुरुष का पत्नी त्याग ट्रेजेडी का एक अच्छा विषय था, लेकिन आज की हीरोइन, जाते समय पति के मुंह पर थूककर हंसती हुई चली जायगी और पतिदेव भी मुंह पोछ पाछकर अपनी नई प्रेमिका के तलवे सहलाते नजर आयेंगे । काम प्रसंगो का ऐसा वीभत्स चित्रण भी किसी के कान नहीं खडे करता, जिस पर पहले लोग आखें बन्द कर लेते थे । तीन अंक के ड्रामों का भी धीरे धीरे बहिष्कार हो
[ १४५ ]रहा है । आज ड्रामे तो एक ही अंक के होते हैं। उपन्यास की मूरत उसके लघुरूप कहानी से कुछ मिलती है । ड्रामे भी अब एक ऐक्ट के हाने लगे है, जो दो ढाई घण्टो मे समाप्त हो जाते है ।

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[ १४६ ]रोमे-रोलॉ फ्रास के उन साहित्य-स्रष्टालओ मे है, जिन्होने साहित्य के प्रायः

सभी अङ्गो को अपनी रचनाओ से अलकृत किया है और उपन्यास-साहित्य मे तो वह विक्टर ह्य गो और टाल्सटाय के ही समकक्ष है । उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'जान क्रिस्टोफ़र' के विषय मे तो हम कह सकते है कि एक कलाकार की आत्मा का इससे सुन्दर चित्र उपन्यास-साहित्य मे नही है । रोमे रोलॉ आत्मा और हृदय के रहस्यो को व्यक्त करने मे सिद्धहस्त हैं। उनके यहाँ विचित्र घटनाएँ नहीं होती, असाधारण और आदर्श चरित्र नहीं होते । उनके उपन्यास जीवन-कथा मात्र होते है, जिनमे हम नायक को भिन्न पर रोज़ आने वाली परिस्थितियो मे सुख और दुःख, मैत्री और द्वेष, निन्दा और प्रशसा, त्याग और स्वार्थ के बीच से गुजरते हुए देखते है-उसी तरह मानो हम स्वय उन्हीं दशाओ मे गुजर रहे हो । एक ही चरित्र नई नई दशाओ मे पडकर इस तरह स्वाभाविक रूप मे हमारे सामने आता है, कि हमको उसमे लेश-मात्र भी असगति नहीं मालूम होती । इसमे सन्देह नहीं कि Interpretation की कला मे उनका कोई सानी नही है। इस उपन्यास मे दो हजार से ऊपर पृष्ठ है । इसमे सैकड़ो ही गौण पात्र आये है, पर हरेक अपना अलग व्यक्तित्व रखते है । लेखक उनकी मनोवृत्तियो और मनोभावो की तह मे जाकर ऐसे-ऐसे चमकते रत्न निकाल लाता है, कि हम मुग्ध भी हो जाते है और चकित भी । आपने क्रिस्टोफर के मुख से एक जगह साहित्य के विषय मे ये विचार प्रकट किये हैं[ १४७ ]
लिखता कि उससे पाठक का मनोरजन हो । उसकी कला का उद्देश्य केवल मनोरहस्य को समझाना है। जिस तरह वह स्वयं मनुष्यो को देखता है, मनुष्यो को समझाता है । वह अाशावादी है, मनुष्य के भविष्य मे उसे अटल विश्वास है। ससार की सारी विपत्तियो का मूल यह है कि मनुष्य मनुष्य को समझता नही, या समझने की चेष्टा नही करता। इसीलिए द्वेष, विरोध और वैमनस्य है। वह यथार्थवादी अवश्य है; लेकिन उसका यथार्थवाद गन्दी नालियो मे नहीं रहता । उसकी उदार आत्मा किसी वस्तु को उसके कलुषित रूप मे नही देखती । वह किसी का उपहास नही करता । किसी का मज़ाक नहीं उडाता, किसी को हेय नहीं समझता । मानव हृदय उसके लिए समझने की वस्तु है । यह बात नहीं है कि उसे अन्याय देखकर क्रोध नही अाता। उसने एक जगह लिखा है-मानव समाज की बुराइयो को दूर करने की चेष्टा प्राणीमात्र का कर्तव्य है । जिसे अन्याय को देखकर क्रोध नहीं आता, वह यही नहीं कि कन्नाकार नहीं है बल्कि वह मनुष्य भी नहीं है।

लेकिन अन्याय से सग्राम करने की उसकी नीति कुछ और है । वह मनुष्य को समझने की चेष्टा करता है, उस अन्याय भावना के उद्गम तक पहुंचना चाहता है, और इस तरह मानव-अात्मा मे प्रवाह लेकर उसकी सकीर्णतारो को दूर करके समन्वय करना ही उसकी कला है।

स्वातः सुखाय वाली मनोवृत्ति कला के विकास के लिए उत्तम समझी जाती है । हम प्रायः कहा करते है, कि अमुक व्यक्ति जो कुछ लिखता है, शोकिया लिखता है । वह अपनी क्ला पर अपनी जीविका का भार नही डालता । जिस कला पर जीविका का भार हो, वह इसलिए दूषित समझी जाती है कि कलाकार को जन-रुचि के पीछे चलना पड़ता है। मन और मस्तिष्क पर जोर डालकर कुछ लिखा तो क्या लिखा। कला तो वही है, जो स्वच्छन्द हो । रोमे रोलॉ का मत इसके विरुद्ध है । वह कहता है, जिस कला पर जीविका का भार नही, वह केवल
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शौक है, केवल व्यसन, जो मनुष्य अपनी बेकारी का समय काटने के लिए किया करता है । यह केवल मनोरजन है, दिमाग की थकन मिटाने के लिए । जीवन की मुख्य वस्तु कुछ और है; मगर सच्चे कलाकार की कला ही उसका जीवन है । इसी मे वह अपनी सम्पूर्ण श्रात्मा से मरता है, लिपटता है । अभाव की उत्तेजना के बगैर कला मे तीव्रता कहाँ से आयेगी। व्यसन खिलौने बना सकता है । मूर्तियो का निर्माण करना उसी कलाकार का काम है,जिसकी सम्पूर्ण आत्मा उसके काम मे हो ।

साकेतिकता ( Suggestiveness) कला की जान समझी जाती है और उसका सदुपयोग किया जाय, तो उससे कला अधिक मर्मग्राही हो जाती है । पाठक यह नही चाहता कि जो बाते वह खुद आसानी से कल्पना कर सकता है, वह उसे बताई जाये, लेकिन रोमे रोलॉ की कला सब कुछ स्पष्ट करती चलती है। हाँ, उसका स्पष्टीकरण इस दरजे का होता है, कि पाठक को उसमे भी विचार और बुद्धि से काम लेने का काफी अवसर मिल जाता है । वह पाठको के सामने पहेलियाँ नहीं रखना चाहता । उसकी कला का उद्देश्य मनोवृत्तियों को समझना है । जैसा उसने खुद समझा है, उसे वह पाठक के सम्मुख रख देता है और पाठक को तुरन्त यह मालूम हो जाता है, कि लेखक ने उसका समय नष्ट नहीं किया।

और बीच-बीच मे जीवन और समाज और कला और आत्मा और अनेक विषयो पर रोमे रोला जो भावनाएँ प्रकट करता है, उन पर जो प्रकाश डालता है, वह तो अद्भुत है, अनुपम है । हम उन की सूक्तियो को पढते है, तो विचारो मे डूब जाते है, अपने को भूल जाते हैं। और यह साहित्य का सबसे बड़ा आनन्द है । अगर यह सूक्तियाँ जमा की जाय, तो अच्छी खासी किताब बन सकती है । उनमे अनुभव का ऐसा गहरा रहस्य भरा हुआ है कि हमे लेखक की गहरी सूझ और विशाल अनुभवशीलता पर आश्चर्य होता है। इन सूक्तियो का उद्देश्य केवल अपना रचना-कौशल दिलाना नहीं है । वे मनोरहस्यो की
[ १४९ ]कुजियाॅ है, जो एक वाक्य मे सारा अन्धकार, सारी उलझन दूर कर देती है-

'अानन्द से भी हमारा जी भर जाता है । जब स्वार्थमय आनन्द ही जीवन का मुख्य उद्देश्य हो जाता है, तो जीवन निरुद्देश्य हो जाता है।'

'सफलता में एक ही दैवी गुण है। वह मनुष्य मे कुछ करने की शक्ति पैदा कर देती है।'

'सुशीला स्त्रियो मे भी कभी-कभी एक भावना होती है, जो उन्हें अपनी शक्ति की परीक्षा लेने और उसके आगे जाने की प्रेरणा करती है।'

'आत्मा का सब से मधुर संगीत सौजन्य है।'

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राष्ट्रभाषा का सवाल

[ १५१ ]प्यारे मित्रो,

आपने मुझे जो यह सम्मान दिया है, उसके लिए मै आपको सौ जबानो से धन्यवाद देना चाहता हूँ, क्योकि आपने मुझे वह चीज दी है, जिसके मै बिलकुल अयोग्य हूँ । न मैने हिन्दी-साहित्य पढा है, न उसका इतिहास पढ़ा है, न उसके विकासक्रम के बारे मे ही कुछ जानता हूँ। ऐसा आदमी इतना मान पाकर फूला न समाय, तो वह आदमी नही है । नेवता पाकर मैंने उसे तुरन्त स्वीकार किया । लोगो मे 'मन भाये ओर मुॅडिया हिलाये' की जो आदत होती है। वह खतरा मै न लेना चाहता था । यह मेरी ढिठाई है कि मै यहाँ वह काम करने खडा हुआ हूँ, जिसकी मुझ मे लियाकत नही है; लेकिन इस तरह की गदुमनुमाई का मै अकेला मुजरिम नही हूँ। मेरे भाई घर-घर मे, गली- गली मे मिलेगे । आपको तो अपने नेवते की लाज रखनी है । मै जो कुछ अनाप-शनाप बक, उसकी खूब तारीफ कीजिये, उसमे जो अर्थ न हो वह पैदा कीजिये, उसमे अध्यात्म के और साहित्य के तत्त्व खोज निकालिए-जिन खोजा तिन पाइयों, गहरे पानी पैठ !

आपकी सभा ने पन्द्रह-सोलह साल के मुख्तसर से समय मे जो काम कर दिखलाया है, उस पर मै आपको बधाई देता हूँ, खासकर इसलिए कि आपने अपनी ही कोशिशो से यह नतीजा हासिल किया है। सरकारी इमदाद का मुंह नही ताका । यह आपके हौसलो की बुलन्दी की एक मिसाल है। अगर मै यह कहूँ कि आप भारत के दिमाग हैं, तो वह [ १५२ ]
मुबालगा न होगा ।किसी अन्य प्रान्त मे इतना अच्छा सगठन हो सकता है और इतने अच्छे कार्यकर्ता मिल सकते है, इसमे मुझे सन्देह है ! जिन दिमागो ने अंग्रेजी राज्य की जड़ जमाई, जिन्होने अंग्रेजी भाषा का सिक्का जमाया, जो अंग्रेजी आचार-विचार मे भारत मे अग्रगण्य थे और हैं, वे लोग राष्ट्र भाषा के उत्थान पर कमर बाँध ले, तो क्या कुछ नहीं कर सकते ? ओर यह कितने बड़े सौभाग्य की बात है कि जिन दिमागो ने एक दिन विदेशी भाषा मे निपुण होना अपना ध्येय बनाया था, वे आज राष्ट्र-भाषा का उद्वार करने पर कमर कसे नजर आते है और जहाँ से मानसिक पराधीनता की लहर उठी थी, वहाँ से राष्ट्रीयता की तरंगे उठ रही है। जिन लोगो ने अंग्रेजी लिखने और बोलने मे अग्रेजो को भी मात कर दिया, यहाँ तक कि आज जहाँ कही देखिये अँग्रेजी पत्रों के सम्पादक इसी प्रान्त के विद्वान् मिलेगे, वे अगर चाहे तो हिन्दी बोलने और लिखने मे हिन्दी वालो को भी मात कर सकते है। और गत वर्ष यात्रीदल के नेताओ के भाषण सुनकर मुझे यह स्वीकार करना पड़ता है कि वह क्रिया शुरू हो गयी है। 'हिन्दी-प्रचारक' मे अधिकाश लेख आप लोगो ही के लिखे होते है और उनकी मॅजी हुई भाषा और सफाई और प्रवाह पर हममे से बहुतो को रश्क आता है। और यह तब है जब राष्ट्र-भाषा प्रेम अभी दिलो के ऊपरी भाग तक ही पहुंचा है,और आज भी यह प्रान्त अँग्रेजी भाषा के प्रभुत्व से मुक्त होना नही चाहता । जब यह प्रेम दिलो मे व्याप्त हो जायगा, उस वक्त उसकी गति कितनी तेज होगी, इसका कौन अनुमान कर सकता है ? हमारी पराधीनता का सबसे अपमानजनक, सबसे व्यापक, सबसे कठोर अग अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व है । कही भी वह इतने नंगे रूप मे नही नजर आती । सभ्य जीवन के हर एक विभाग मे अंग्रेजी भाषा ही मानो हमारी छाती पर मूंग दल रही है । अगर आज इस प्रभुत्व को हम तोड़ सके, तो पराधीनता का अाधा बोझ हमारी गर्दन से उतर जायगा । कैदी को बेड़ी से जितनी तकलीफ होती है, उतनी और किसी बात से नही होती। कैदखाना शायद उसके
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घर से ज्यादा हवादार, साफ-सुथरा होगा। भोजन भी वहाँ शायद घर के भोजन से अच्छा और स्वादिष्ट मिलता हो । बाल-बच्चों से वह कभी- कभी स्वेच्छा से बरसो अलग रहता है । उसके दण्ड की याद दिलाने- वाली चीज यही बेडी है, जो उठते-बैठते, सोते-जागते, हँसते-बोलते,कभी उसका साथ नहीं छोडती, कभी उसे मिथ्या कल्पना भी करने नहीं देती, कि वह आजाद है। पैरो से कही ज्यादा उसका असर कैदी के दिल पर होता है, जो कभी उभरने नहीं पाता, कभी मन की मिठाई भी नही खाने पाता । अंग्रेजी भाषा हमारी पराधीनता की वही बेडी है, जिसने हमारे मन और बुद्धि को ऐसा जकड़ रखा है कि उनमे इच्छा भी नही रही। हमारा शिक्षित समाज इस बेड़ी को गले का हार समझने पर मजबूर है । यह उसकी रोटियो का सवाल है और अगर रोटियो के साथ कुछ सम्मान, कुछ गौरव, कुछ अधिकार भी मिल जाय, तो क्या कहना! प्रभुता को इच्छा तो प्राणी-मात्र में होती है । अंग्रेजी भाषा ने इसका द्वार खोल दिया और हमारा शिक्षित समुदाय चिडियो के झुण्ड की तरह उस द्वार के अन्दर घुसकर जमीन पर बिखरे हुए दाने चुगने लगा और अब कितना ही फडफडाये, उसे गुलशन को हवा नसीब नही । मजा यह है कि इस मुएड की फड़फडाहट बाहर निकलने के लिए नही, केवल जरा मनोरजन के लिए है। उसके पर निर्जीव हो गये, और उनमे उड़ने की शक्ति नही रही, वह भरोसा भी नही रहा कि यह दाने बाहर मिलेगे भी या नहीं । अब तो वही कफ़स है, वही कुल्हिया है और वही सैयाद ।

लेकिन मित्रो, विदेशी भाषा सीखकर अपने गरीब भाइयो पर रोब जमाने के दिन बड़ी तेजी से विदा होते जा रहे है। प्रतिभा का और बुद्धिबल का जो दुरुपयोग हम सदियो से करते आये हैं, जिसके बल पर हमने अपनी एक अमीरशाही स्थापित कर ली है, और अपने को साधा- रण जनता से अलग कर लिया है, वह अवस्था अब बदलती जा रही है । बुद्धि-बल ईश्वर की देन है, और उसका धर्म प्रजा पर धौस जमाना
[ १५४ ]नही, उसका खून चूसना नही, उसकी सेवा करना है। आज शिक्षित समुदाय पर से जनता का विश्वास उठ गया है । वह उसे उससे अधिक विदेशी समझती है, जितना विदेशियो को । क्या कोई आश्चर्य है कि यह समुदाय अाज दोनो तरफ से ठोकरे खा रहा है ? स्वामियो की ओर से इसलिये कि वह समझते है-मेरी चौखट के सिवा इनके लिए और कोई आश्रय नही, और जनता की ओर से इसलिए कि उनका इससे कोई अात्मीय सम्बन्ध नहीं। उनका रहन-सहन, उनकी बोल-चाल, उनकी वेश-भूषा, उनके विचार और व्यवहार सब जनता से अलग है और यह केवल इसलिए कि हम अग्रेजी भाषा के गुलाम हो गये। मानो परिस्थिति ऐसी है कि बिना अग्रेजी भाषा की उपासना किये काम नही चल सकता । लेकिन अब तो इतने दिनो के तजरवे के बाद मालूम हो जाना चाहिये कि इस नाव पर बैठकर हम पार नहीं लग सकते, फिर हम क्यो आज भी उसी से चिमटे हुए है १ अभी गत वर्ष एक इटर- युनिवर्सिटी कमीशन बैठा था कि शिक्षा सम्बन्धी विषयो पर विचार करे। उसमे एक प्रस्ताव यह भी था कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी की जगह पर मातृ-भाषा क्यो न रखी जाय । बहुमत ने इस प्रस्ताव का विरोध किया, क्यो ? इसलिए कि अग्रेजी माध्यम के बगैर अग्रेजी मे हमारे बच्चे कच्चे रह जायेंगे और अच्छी अंग्रेजी लिखने और बोलने मे समर्थ न होगे । मगर इन डेढ़ सौ वर्षों की घोर तपस्या के बाद आज तक भारत ने एक भी ऐसा ग्रन्थ नही लिखा, जिसका इगलैण्ड मे उतना भी मान होता, जितना एक तीसरे दर्जे के अग्रेजी लेखक का होता है । याद नहीं, पण्डित मदनमोहन मालवीयजी ने कहा था, या सर तेजबहादुर सपू ने, कि पचास साल तक अंग्रेजी से सिर मारने के बाद आज भी उन्हे अग्रेजी मे बोलते वक्त यह सशय होता रहता है कि कहीं उनसे गलती तो नही हो गयी ! हम अॉखे फोड़-फोड़कर और कमर तोड-तोडकर और रक्त जला-जलाकर अंग्रेजी का अभ्यास करते है, उसके मुहावरे रटते है; लेकिन बड़े से बडे भारती-साधक की रचना विद्यार्थियो की स्कूली एक्सर[ १५५ ]
साइज से ज्यादा महत्त्व नही रखती। अभी दो-तीन दिन हुए पजाब के ग्रेजुएटो की अग्रेजी योग्यता पर वहाँ के परीक्षको ने यह आलोचना की है कि अधिकाश छात्रो मे अपने विचारो के प्रकट करने की शक्ति नहीं है, बहुत तो स्पेलिग मे गलतियों करते है। और यह नतीजा है कम से कम बारह साल तक ऑखे फोडने का । फिर भी हमारे लिए शिक्षा का अग्रेजी माध्यम जरूरी है, यह हमारे विद्वानों की राय है। जापान, चोन और ईरान मे तो शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी नहीं है। फिर भी वे सभ्यता की हरेक बात मे हमसे कोसो आगे है, लेकिन अंग्रेजी माध्यम के बगैर हमारी नाव डूब जायगी। हमारे मारवाड़ी भाई हमारे धन्यवाद के पात्र है कि कम से कम जहाँ तक व्यापार मे उनका सम्बन्ध है। उन्होंने कौमियत की रक्षा की है।

मित्रो, शायद मै अपने विषय से बहक गया हूँ, लेकिन मेरा आशय केवल यह है कि हमे मालूम हो जाय, हमारे सामने कितना महान् काम है। यह समझ लीजिये कि जिस दिन आप अग्रेजी भाषा का प्रभुत्व तोड देगे और अपनी एक कौमी भाषा बना लेगे, उसी दिन आपको स्वराज्य के दर्शन हो जायेंगे । मुझे याद नहीं आता कि कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा के बल पर स्वाधीनता प्राप्त कर सका हो । राष्ट्र की बुनि- याद राष्ट्र को भापा है । नदी, पहाड़ समुद्र और राष्ट्र नहीं बनाते । भाषा ही वह बन्धन है, जो चिरकाल तक राष्ट्र को एक सूत्र मे बाँधे रहती है, और उसका शीराजा बिखरने नही देती । जिस वक्त अग्रेज आये, भारत की राष्ट्र-भावना लुप्त हो चुकी थी। यो कहिये कि उसमे राजनैतिक चेतना की गंध तक न रह गयी थी। अग्रेजी राज ने आकर आपको एक राष्ट्र बना दिया। आज अग्रेजी राज विदा हो जाय-और एक न एक दिन तो यह होना ही है तो फिर आपका यह राष्ट्र कहाँ जायगा ? क्या यह बहुत सभव नही है कि एक-एक प्रान्त एक-एक राज्य हो जाय और फिर वही विच्छेद शुरू हो जाय ? वर्तमान दशा मे तो हमारी कौमी चेतना को सजग और सजीव रखने के लिए अंग्रेजी राज को अमर
[ १५६ ]<brरहना चाहिए । अगर हम एक राष्ट्र बनकर अपने स्वराज्य के लिए उद्योग करना चाहते है तो हमे राष्ट्र भाषा का प्राश्रय लेना होगा और उसी राष्ट्र-भाषा के बस्तर से हम अपने राष्ट्र की रक्षा कर सकेगे । आप उसी राष्ट्र भाषा के भिन्न है, और इस नाते आप राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं। सोचिये, आप कितना महान् काम करने जा रहे है। आप कानूनी बाल की खाल निकालनेवाले वकील नहीं बना रहे है, आप शासन-मिल के मजदूर नहीं बना रहे हैं, आप एक बिखरी हुई कौम को मिला रहे हैं, आप हमारे बन्धुत्व की सीमाअो को फैला रहे है, भूले हुए भाइयो को गले मिला रहे है। इस काम की पवित्रता और गोरव को देखते हुए, कोई ऐसा कष्ट नही है, जिसका आप स्वागत न कर सके । यह धन का मार्ग नहीं है, सभव है कि कीर्ति का मार्ग भी न हो, लेकिन आपके आत्मिक सतोष के लिए इससे बेहतर काम नहीं हो सकता। यही अापके बलिदान का मूल्य है । मुझे अाशा है, यह आदर्श हमेशा आपके सामने रहेगा। आदर्श का महत्व आप खूब समझते है। वह हमारे रुकते हुए कदम को आगे बढ़ाता है, हमारे दिलो से सशय और सन्देह की छाया को मिटाता है और कठिनाइयो मे हमे साहस देता है ।।

राष्ट्र-भाषा से हमारा क्या प्राशय है, इसके विषय मे भी मै आपसे दो शब्द कहूँगा । इसे हिन्दी कहिए, हिन्दुस्तानी कहिए, या उर्दू कहिए, चीज एक है। नाम से हमारी कोई बहस नही । ईश्वर भी वही है, जो खुदा है, और राष्ट्र-भाषा मे दोनो के लिए समान रूप से सम्मान का स्थान मिलना चाहिए। अगर हमारे देश मे ऐसे लोगो की काफी तादाद निकल आये, जो ईश्वर को 'गाड' कहते है, तो राष्ट्र-भाषा उनका भी स्वागत करेगी । जीवित भापा तो जीवित देह की तरह बराबर बनती रहती है। शुद्ध हिन्दी तो निरर्थक शब्द है। जब भारत शुद्ध हिन्दू होता तो उसकी भाषा शुद्ध हिन्दी होती । जब तक यहाँ मुसल- मान, ईसाई, पारसी, अफगानो सभी जातियों मौजूद है, हमारी भाषा भो
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व्यापक रहेगी । अगर हिन्दी भाषा प्रान्तीय रहना चाहती है और केवल हिन्दुओ की भाषा रहना चाहती है, तब तो वह शुद्ध बनायी जा सकती है। उसका अङ्गभङ्ग करके उसका कायापलट करना होगा। प्रौढ से वह फिर शिशु बनेगी, यह असम्भव है, हास्यास्पद है। हमारे देखते-देखते सैकड़ो विदेशी शब्द भाषा मे आ घुसे, हम उन्हे रोक नही सकते । उनका अाक्रमण रोकने की चेष्टा ही व्यर्थ है। वह भाषा के विकास मे बाधक होगी । वृक्षो को सीधा और सुडौल बनाने के लिए पौधों को एक थूनी का सहारा दिया जाता है। श्राप विद्वानो का ऐसा नियन्त्रण रख सकते है कि अश्लील, कुरुचिपूर्ण, कर्णकटु, भहे शब्द व्यवहार मे न पा सकें; पर यह नियंत्रण केवल पुन्तको पर हो सकता है। बोल-चाल पर किसी प्रकार का नियन्त्रण रखना मुश्किल होगा। मगर विद्वानो का भी अजीब दिमाग है। प्रयाग में विद्वानो और पण्डितो की सभा 'हिन्दुस्तानी एकेडमी' मे तिमाही, सेहमाही और त्रैमासिक शब्दो पर बरसो से मुबाहमा हो रहा है और अभी तक फैसला नही हुआ । उर्दू के हामी 'सेहमाही की ओर है, हिन्दी के हामी 'त्रमासिक' की ओर, वेचारा 'तिमाही' जो सबसे सरल. यासानी से बोला और समझा जानेवाला शब्द है, उसका दोनो ही अोर से बहिष्कार हो रहा है।भाषा सुन्दरी को कोठरी मे बन्द करके आप उसका सतीत्व तो बचा सकते है, लेकिन उसके जीवन का मूल्य देकर । उसकी आत्मा स्वय इतनी बलवान बनाइये, कि वह अपने सतीत्व और स्वास्थ्य दोनो ही की रक्षा कर सके । बेशक हमे ऐसे ग्रामीण शब्दो को दूर रखना होगा, जो किसी स्वास इलाके मे बोले जाते है। हमाग आदर्श तो यह होना चाहिए, कि हमारी भापा अधिक से अधिक आदमी समझ सकें। अगर इस आदर्श को हम अपने सामने रखे,तो लिखते समय भी हम शब्द-चातुरी के मोह मे न पडेगे । यह गलत है, कि फारसी शब्दो से भाषा कठिन हो जाती है । शुद्ध हिन्दी के ऐसे पदों के उदाहरण दिये जा सकते हैं जिनका अर्थ निकालना पण्डितो के लिए भी लोहे
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के चने चबाना है । वही शब्द सरल है, जो व्यवहार मे आ रहा है, इससे कोई बहस नहीं कि वह तुर्को है, या अरबी, या पुर्तगाली। उर्द और हिन्दी मे क्यो इतना मौतिया डाह है, यह मेरी समझ में नहीं आता। अगर एक समुदाय के लोगो को 'उर्दू' नाम प्रिय है तो उन्हे उसका इस्तेमाल करने दोजिए । जिन्हे 'हिन्दी' नाम से प्रेम है, वह हिन्दी ही कहे । इसमे लडाई काहे को ? एक चीज के दो नाम देकर ख्वामख्वाह आपस मे तडना ओर उसे इतना महत्व दे देना कि वह राष्ट्र की एकता मे बाधक हो जाय, यह मनोवृत्ति रोगो ओर दुर्बल मन की है। मैं अपने अनुभव से इतना अवश्य कह सकता हूँ, कि उर्दू को राष्ट्र-भाषा के स्टैण्डर्ड पर लाने में हमारे मुसलमान भाई हिन्दुओ से कम इच्छुक नही हैं। मेरा मतलब उन हिन्द-मुसलमानों से है, जो कौमियत के मतवाले है । कट्टर पन्थियो से मेरा कोई प्रयोजन नही । उर्दू का योर मुसलिम संस्कृति का कैम्प आज अलीगढ़ है। वहाँ उर्दू और फारसी के प्राफेसरो और अन्य विषयो के प्राफेसरा से मेरी जो बातचीत हुई, उससे मुझे मालूम हुआ कि मौलवियाऊ भाषा से वे लोग भी उतने ही बेजार है, जितने पाए इताऊ भाषा से, और कौमी भाषा-सघ आन्दोलन में शरीक होने के लिए दिल से तैयार है। मै यह भी माने लेता हूँ कि मुसलमानो का एक गिरोह हिन्दुओ से अलग रहने मे ही अपना हित समझता है हालाकि उस गिरोह का जोर और असर दिन- दिन कम होता जा रहा है--ओर वह अपनी भाषा को अरबी से गले तक ठूस देना चाहता है, तो हम उससे क्यो झगडा करे ? क्या आप समझत है, ऐसो जटिल भाषा मुसलिम जनता मे भी प्रिय हो सकती है ? कभी नही । मुसलमानो मे वही लेखक सर्वोपरि है, जो अामफहम भाषा लिखते है। मौलवियाऊ भापा लिखनेवालो के लिए वहाँ भी स्थान नही है । मुसलमान दोस्तो से भी मुझे कुछ अर्ज करने का हक है क्योकि मेरा सारा जीवन उर्दू की सेवकाई करते गुजरा है और भी मै जितनी उर्दू लिखता हूँ, उतनी हिन्दी नही लिखता, और कायस्थ होने
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और बचपन से फारसी का अभ्यास करने के कारण उर्दू मेरे लिए जितनी स्वाभाविक है, उतनो हिन्दी नही है । मै पूछता हूँ, आप इसे हिन्दी की गर्दनजदनी समझते है ? क्या आपको मालूम है, और नहीं है तो होना चाहिए, कि हिन्दी का सबसे पहला शायर, जिसने हिन्दी का साहित्यिक बीज बोया (व्यावहारिक बीज सदियो पहले पड चुका था) वह अमीर खुसरो था ? क्या आपको मालूम है, कम से कम पाँच सौ मुसलमान शायरो ने हिन्दी को अपनी कविता से धनी बनाया है, जिनमे कई तो चोटी के शायर हैं ? क्या आपको मालूम है, अकबर, जहाँगीर और औरगजेब तक हिन्दी की कविता का जौक रखते थे और औरगजेब ने ही अामो का नाम 'रसना-विलास' और 'सुधा रस' रखा था ? क्या आपको मालूम है, आज भी हसरत और हफीज जालन्धरी जैसे कवि कभी-कभी हिन्दी मे तबााजमाइ करते हैं ? क्या आपको मालूम है हिन्दी मे हजारो शब्द, हजारों क्रियाएँ अरबी और फारसी से आयी है और ससुराल में आकर घर की देवी हो गयी है ? अगर यह मालूम होने पर भी आप हिन्दी को उदु से अलग समझते हैं, तो आप देश के साथ और अपने साथ बेइन्साफो करते है । उर्दू शब्द कब और कहाँ उत्पन्न हुआ, इसकी काई तारीखो सनद नहीं मिलती । क्या आप समझते है वह 'बडा खराब आदमी है' और वह 'बडा दुर्जन मनुष्य है' दो अलग भाषाएँ हैं ? हिन्दुओ को 'खराब' भी अच्छा लगता है और 'श्रादमी' तो अपना भाई हो है । फिर मुसलमान का 'दुर्जन' क्यो बुरा लगे, और 'मनुष्य' क्यो शत्रु-सा दीखे ? हमारी कौमो भाषा मे दुर्जन और सज्जन, उम्दा और खराब दोनों के लिये स्थान है, वहाँ तक जहाँ तक कि उसकी सुबोधता मे बावा नहीं पडती । इसक अागे हम न उर्दू के दास्त है, न हिन्दी के । मजा यह कि 'हिन्दी' मुसलमानों का दिया हुआ नाम है और अभी पचास साल पहले तक जिसे आज उर्दू कहा जा रहा है, उसे मुसल- मान भी हिन्दी कहते थे । और आज 'हिन्दी' मरदूद है । क्या आपको नजर नहीं आता, कि 'हिन्दी' एक स्वाभाविक नाम है ? इगलैंडवाले
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इगलिश बोलते है, फ्रासवाले फ्रेंच, जर्मनीवाले जर्मन, फारसवाले फारसी, तुर्कीवाले तुर्की, अरबवाले अरबी, फिर हिन्दवाले क्यों न हिन्दी बोले ? उर्दू तो न काफिये मे आती है न रदीफ मे,न बहर मे न वजन मे। हाँ, हिन्दुस्तान का नाम उर्दूस्तान रखा जाय, तो बेशक यहाँ की कौमी भाषा उर्दू होगी। कौमी भाषा के उपासक नामो से बहस नहीं करते, वह तो असलियत से बहस करते है । क्यों दोनों भाषाओं का कोष एक नहीं हो जाता ? हमे दोनों ही भाषाओ मे एक आम लुगत (कोष ) की जरूरत है, जिसमे श्रामफहम शब्द जमा कर दिये जायें । हिन्दी मे तो मेरे मित्र पण्डित रामनरेश त्रिपाठी ने किसी हद तक यह जरूरत पूरी कर दी है । इस तरह का एक लुगत उर्दू मे भी होना चाहिए । शायद वह काम कौमी-भाषा-सघ बनने तक मुल्तवी रहेगा । मुझे अपने मुसलिम दोस्तों से यह शिकायत है कि वह हिन्दी के प्रामफहम शब्दो से भी परहेज करते है, हालॉ कि हिन्दी मे अामफहम फारसी के शब्द आजादी मे व्यवहार किये जाते हैं।

लेकिन प्रश्न उठता है कि राष्ट्र-भाषा कहाँ तक हमारी जरूरते पूरी कर सकती है ? उपन्यास, कहानियों, यात्रा-वृत्तान्त, समाचार-पत्रों के लेख, आलोचना अगर बहुत गूढ न हो, यह सब तो राष्ट्र-भाषा मे अभ्यास कर लेने से लिखे जा सकते है। लेकिन साहित्य में केवल इतने ही विषय तो नहीं है । दर्शन और विज्ञान की अनन्त शाखाएँ भी तो हैं जिनको आप राष्ट्र-भाषा मे नहीं ला सकते । साधारण बाते तो साधारण और सरल शब्दों मे लिखी जा सकती है । विवेचनात्मक विषयो मे यहाँ तक कि उपन्यास मे भी जब वह मनोवैज्ञानिक हो जाता है, आपको मजबूर होकर संस्कृत या अरबो-फारसी शब्दों की शरण लेनी पडती है । अगर हमारी राष्ट्र-भाषा सर्वाङ्गपूर्ण नहीं है, और उसमे श्राप हर एक विषय, हर एक भाव नहीं प्रकट कर सकते, तो उसमे यह बडा भारी दोष है, और यह हम सभी का कर्तव्य है कि हम राष्ट्र-भाषा को उसी तरह सर्वाङ्गपूर्ण बनावें, जैसी अन्य राष्ट्रो की सम्पन्न भाषाएँ है। यों तो अभी हिन्दी और उर्दू
[ १६१ ]अपने सार्थक रूप मे भी पूर्ण नही है । पूर्ण क्या, अधूरी भी नही है । जो राष्ट्र-भाषा लिखने का अनुभव रखते है, उन्हे स्वीकार करना पड़ेगा कि एक-एक भाव के लिए उन्हे कितना सिर-मगजन करना पडता है । सरल शब्द मिलते ही नहीं, मिलते है, तो भाषा मे खपते नही, भाषा का रूप बिगाड़ देते है, खीर मे नमक के डले की भॉति आकर मजा किरकिरा कर देते है। इसका कारण ता स्पष्ट ही है कि हमारी जनता मे भाषा का ज्ञान बहुत ही थोड़ा है और आमफहम शब्दो की संख्या बहुत ही कम है। जब तक जनता मे शिक्षा का अच्छा प्रचार नहीं हो जाता, उनकी व्यवहारिक शब्दावली बढ नही जातो, हम उनके समझने के लायक भाषा मे तात्विक विवेचनाएँ नहीं कर सकते । हमारी हिन्दी भाषा ही अभी सौ बरस की नही हुइ, राष्ट्र-भाषा तो अभी शैशवावस्था में है, और फिलहाल यदि हम उसमे सरल साहित्य ही लिख सके, तो हमको सतुष्ट हाना चाहिये । इसके साथ ही हमे राष्ट्र-भाषा का कोष बढाते रहना चाहिये । वही सस्कृत और अरबी फारसी के शब्द, जिन्हे देखकर अाज हम भयभीत हो जाते हैं, जब अभ्यास मे आ जायेंगे, तो उनका हौआपन जाता रहेगा। इस भाषा-विस्तार की क्रिया, धीरे-धीरे ही होगी। इसके साथ हमे विभिन्न प्रान्तीय भाषाओ के ऐसे विद्वानो का एक बोर्ड बनाना पडेगा, जो राष्ट्र-भाषा की जरूरत के कायल हैं । उस बोर्ड में उर्दू, हिन्दी, बॅगला, मराठी, तामिल आदि सभी भाषाओं के प्रतिनिधि रखे जाये और इस क्रिया को सुव्यवस्थित करने और उसकी गति को तेज करने का काम उनको सौपा जाय । अभी तक हमने अपने मनमाने ढग से इस आन्दोलन को चलाया है । औरो का सहयोग प्राप्त करने का यत्न नहीं किया । आपका यात्री मडल भी हिन्दी के विद्वानो तक ही रह गया । मुसलिम केन्द्रो मे जाकर मुसलिम विद्वानो की हमदर्दी हासिल करने की उसने कोशिश नहीं की ? हमारे विद्वान् लोग तो अँगरेजी मे मस्त है । जनता के पैसे से दर्शन और विज्ञान और सारी दुनिया की विद्याएँ सीखकर भी वे जनता की तरफ से ऑखे बन्द किये बैठे है । [ १६२ ]
उनकी दुनिया अलग है, उन्होने उपजीवियो की मनोवृत्ति पैदा कर ली है। काश उनमे भी राष्ट्रीय चेतना होती, काश वे भी जनता के प्रति अपने कर्त्तव्य को महसूस करते, तो शायद हमारा काम सरल हो जाता। जिस देश मे जन शिक्षा की सतह इतनी नीची हो, उसमे अगर कुछ लोग अँगरेजो मे अपनी विद्वत्ता का सेहरा बॉध ही ले, तो क्या? हम तो तब जाने, जब विद्वत्ता के साथ साथ दूसरों को भी ऊँची सतह पर उठाने का भाव मौजूद हो । भारत मे केवल अंग्रेजीदों ही नहीं रहते । हजार मे ६६६ आदमी अंग्रेजी का अक्षर भी नही जानते । जिस देश का दिमाग विदेशी भाषा मे सोचे और लिखे, उस देश को अगर संसार राष्ट्र नही ममझता तो क्या वह अन्याय करता है ? जब तक आपके पास राष्ट्र भाषा नहीं, आपका कोई राष्ट्र भी नहीं । दोनो में कारण और कार्य का सम्बन्ध है । राजनीति के माहिर अँग्रेज शासको को आप राष्ट्र की हॉक लगाकर धोखा नही दे सकते । वे आपकी पोल जानते हैं और आप के साथ वैसा ही व्यवहार करते है।

अब हमे यह विचार करना है कि राष्ट्र-भाषा का प्रचार कैसे बढ़े। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि हमारे नेताओ ने इस तरफ मुजरिमाना गफलत दिखायी है । वे अभी तक इसी भ्रम मे पडे हुए हैं कि यह कोई बहुत छोटा-मोटा विषय है, जो छोटे-मोटे आदमियो के करने का है, और उनके जैसे बडे-बडे आदमियों को इतनी कहाँ फुरसत कि वह झंझट मे पडे । उन्होंने अभी तक इस काम का महत्व नहीं समझा, नहीं तो शायद यह उनके प्रोग्राम की पहली पॉती मे होता। मेरे विचार में जब तक राष्ट्र मे इतना सगठन, इतना ऐक्य, इतना एकात्मपन न होगा कि वह एक भाषा में बात कर सके, तब तक उसमे यह शक्ति भी न होगी कि स्वराज्य प्राप्त कर सके। गैर- मुमकिन है । जो राष्ट्र के अगुवा हैं, जो एलेक्शनों मे खड़े होते है और फतह पाते हैं, उनसे मैं बड़े अदब के साथ गुजारिश करूँगा कि हजरत इस तरह के एक सौ एलेक्शन अायॅगे और निकल जायॅगे, आप कभी


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