साहित्य का उद्देश्य/8

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साहित्य का उद्देश्य
द्वारा प्रेमचंद

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सज्जनो,आर्य समाज ने इस सम्मेलन का नाम आर्य भाषा सम्मे- लन शायद इसलिए रखा है कि यह समाज के अन्तर्गत उन भाषाओं का सम्मेलन है, जिनमे आर्यसमाज ने धर्म का प्रचार किया है। और उनमे उर्दू और हिन्दी दोनो का दर्जा बराबर है। मै तो आर्यसमाज को जितनी धार्मिक संस्था समझता हूँ उतनी तहजीबी (सास्कृतिक ) सस्था भी समझता हूँ । बल्कि आप क्षमा करे तो मै कहूँगा कि उसके तहजीबी कारनामे उसके धार्मिक कारनामो से ज्यादा प्रसिद्ध और रौशन है । आर्यसमाज ने साबित कर दिया है कि सेवा ही किसी धर्म के सजीव होने का लक्षण है । सेवा का ऐसा कौन सा क्षेत्र है जिसमे उसकी कीर्ति की ध्वजा न उड रही हो । कौमी जिन्दगी की समस्याओ को हल करने मे उसने जिस दूरदेशी का सबूत दिया है, उस पर हम गर्व कर सकते है। हरिजनो के उद्धार में सबसे पहले आर्यसमाज ने कदम उठाया। लड- कियो की शिक्षा की जरूरत को सबसे पहले उसने समझा । वर्ण-व्यवस्था को जन्मगत न मानकर कर्मगत सिद्ध करने का सेहरा उसके सिर है । नाति-भेद-भाव और खान-पान के छत-छात और चौके-चूल्हे की बाधाओं को मिटाने का गौरव उसी को प्राप्त है । यह ठीक है कि ब्रह्मसमाज ने इस दिशा में पहले कदम रखा, पर वह थोड़े से अग्रेजी पढे-लिखो तक ही रह गया । इन विचारों को जनता तक पहुँचाने का बीड़ा आर्यसमाज ने ही उठाया । अन्ध-विश्वास और धर्म के नाम पर किये जाने वाले हजारो अनाचारो की कब उसने खोदी, हालॉकि मुर्दे को उसमें दफन न कर सका और अभी तक उसका जहरीला दुर्गन्ध उड़-उडकर
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समाज को दूषित कर रहा है।समाज के मानसिक और बौद्धिक धरातल (सतह) को आर्यसमाज ने जितना उठाया है, शायद ही भारत की किसी संस्था ने उठाया हो । उसके उपदेशको ने वेदो और वेदागो के गहन-विषयो को जन-साधारण की सम्पत्ति बना दिया, जिन पर विद्वानों और आचार्यों के कई-कई लीवरवाले ताले लगे हुए थे। आज आर्य- समाज के उत्सवो और गुरुकुलो के जलसो मे हजारो मामूली लियाकत के स्त्री-पुरुष सिर्फ विद्वानो के भाषण सुनने का श्रानन्द उठाने के लिए खिंचे चले जाते है । गुरुकुलाश्रम को नया जन्म देकर आर्यसमाज ने शिक्षा को सम्पूर्ण बनाने का महान् उद्योग किया है। सम्पूर्ण से मेरा आशय उस शिक्षा का है जो सर्वाङ्गपूर्ण हो, जिसमे मन, बुद्धि, चरित्र और देह, सभी के विकास का अवसर मिले । शिक्षा का वर्तमान आदर्श यही है । मेरे खयाल मे वह चिरसत्य है । वह शिक्षा जो सिर्फ अक्ल तक ही रह जाय, अधूरी है । जिन सस्थाओ में युवको मे समाज से पृथक रहनेवाली मनोवृत्ति पैदा हो, जो अमीर और गरीब के भेद को न सिर्फ कायम रखे बल्कि और मजबूत करे, जहाँ पुरुषार्थ इतना कोमल बना दिया जाय कि उसमे मुशकिलो का सामना करने की शक्ति न रह जाय, जहाँ कला और सयम मे कोई मेल न हो, जहाँ की कला केवल केवल नाचने-गाने और नकल करने मे ही जाहिर हो, उस शिक्षा का मै कायल नहीं हूँ । शायद ही मुल्क मे कोई ऐसी शिक्षासंस्था हो जिसने कौम की पुकार का इतनी जवॉमर्दी से स्वागत किया हो। अगर विद्या हममे सेवा और त्याग का भाव न लाये, अगर विद्या हमे आदर्श के लिए सीना खोलकर खड़ा होना न सिखाये, अगर बिद्या हममे स्वाभि- मान न पैदा करे, और हमे समाज के जीवनप्रवाह से अलग रखे तो उस विद्या से हमारी अविद्या अच्छी । और समाज ने हमारी भाषा के साथ जो उपकार किया है उसका सबसे उज्ज्वल प्रमाण यह है कि स्वामी दयानन्द ने इसी भाषा में सत्यार्थप्रकाश लिखा और उस वक्त लिखा जब उसकी इतनी चर्चा न थी। उनकी बारीक नजर ने देख लिया
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कि अगर जनता मे प्रकाश ले जाना है तो उसके लिए हिन्दी भाषा ही अकेला साधन है, और गुरुकुलो ने हिन्दी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाकर अपने भाषा-प्रेम को ओर मी सिद्ध कर दिया है।

सज्जनो, मैं यहाँ हिन्दी भाषा की उत्पत्ति और विकास की कथा नहीं कहना चाहता, वह सारी कथा भाषा-विज्ञान की पोथियों मे लिखी हुई है। हमारे लिए इतना ही जानना काफी है कि आज हिन्दुस्तान के पन्द्रह-सोलह करोड लोगो के सन्य व्यवहार और साहित्य की यही भाषा है। हॉ, वह लिखी जाती है दो लिपियों मे ओर उसी एतबार से हम उसे हिन्दी या उर्दू कहते है। पर है वह एक ही। बोलचाल मे तो उसमे बहुत कम फर्क है, हाँ लिखने मे वह फर्क बढ जाता है। मगर उस तरह का फर्क सिर्फ हिन्दी मे ही नही, गुजराती, बॅगला और मराठी वगैरह भाषाओ मे भी कमोबेश वैसा ही फर्क पाया जाता है । भाषा के विकास मे हमारी संस्कृति की छाप होती है, और जहाँ संस्कृति मे भेद होगा वहाँ भाषा मे भेद होना स्वाभाविक है। जिस भापा का हम और आप व्यवहार कर रहे है, यह देहली प्रात की भाषा है । उसी तरह जैसे ब्रजभाषा, अवधी, मैथिली, भोजपुरी और मारवाड़ी आदि भाषाएँ अलग-अलग क्षेत्रो मे बोली जाती है और सभी साहित्यिक भाषा रह चुकी है । बोली का परिमार्जित रूप ही भाषा है। सबसे ज्यादा प्रसार तो ब्रजभाषा का है क्योकि यह अागरा प्रात के बडे हिस्से को ही नही, सारे बुन्देलखण्ड की बोलचाल की भाषा है। अवधी अवध प्रात की भाषा है । भोजपुरी प्रान्त के पूर्वी जिलो मे बोली जाती है, और मैथिली बिहार प्रात के कई जिलो मे । ब्रजभाषा मे जो साहित्य रचा गया है, वह हिन्दी के पद्य-साहित्य का गौरव है । अववी का प्रमुख अथ तुलसीकृत रामायण और मलिक मुहम्मद जायसी का रचा हुआ पद्मावत है। मैथिली मे विद्यापति की रचनाएँ ही मशहूर है । मगर साहित्य मे आम तौर पर मैथिल का व्यवहार कम हुआ । साहित्य मे तो अवधी और ब्रजभाषा का व्यवहार होता था । हिन्दी के विकास के पहले ब्रजभाषा ही हमारी
[ १९० ]साहित्यिक भाषा थी और प्रायः उन सभी प्रदेशों में जहाँ आज हिन्दी का प्रगर है, पहले ब्रजभाषा का प्रचार था । अवध मे और काशी में भी कवि तोग अपने कवित्त ब्रजभाषा मे ह कहते थे। यहाँ तक कि गया मे भी ब्रजभाषा का ही प्रवार हता था।

ता यकायक ब्रजभाषा, अपर्ची, भाजपुरी अादि को पीछे हटाकर हिन्दी कैसे सबके ऊपर गालिब प्रायः यहाँ तक कि अब अवधी और भोजपुरी का तो साहित्य मे कही व्यवहार नही है। हाँ, ब्रजभाषा को अभी तक थोडे-से लोग सीने से चिपटाये हुए है । हिन्दी को यह गौरव प्रदान करने का श्रेय मुसलमानो को है । मुसलमानो ही ने दिल्ली. प्रात की इस बोली को, जिसको उस वक्त तक भाषा का पद न मिला था, व्यवहार मे लाकर उसे दरबार की भाषा बना दिया और दिल्ली के उमरा और सामंत जिन प्रातो मे गये, हिन्दी भाषा को साथ लेते गये। उन्हीं के साथ वह दक्खिन मे पहुँची और उसका बचपन दक्खिन ही मे गुजरा । दिल्ली में बहुत दिनो तक अराजकता का जोर रहा, और भाषा को विकास का अवसर न मिला । और दक्खिन मे वह पलती रही । गोलकुंडा, बीजापूर, गुलबर्गा आदि के दरबारो मे इसी भाषा मे शेर-शायरी हाती रही । मुसलमान बादशाह प्रायः साहित्यप्रेमी होते थे। बाबर, हुमायूँ, जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब, दाराशिकोह सभी साहित्य के मर्मज्ञ थे । सभी ने अपने-अपने रोजनामचे लिखे है। अकबर खुद शिक्षित न हो, मगर साहित्य का रसिक था। दक्खिन के बादशाहो मे अकसर ने कविताएँ की और कवियो को आश्रय दिया । पहले तो उनकी भाषा कुछ अजीब खिचड़ी सी थी जिसमे हिन्दी, फारसी सब कुछ मिला होता था। आपको शायद मालूम होगा कि हिन्दी की सबसे पहली रचना खुसरो ने की है, जो मुगलो से भी पहले' खिलजी राजकाल मे हुए । खुसरो की कविता का एक नमूना देखिये-

जब यार देखा नैन भर, दिल की गयी चिन्ता उतर,

ऐसा नही कोई अजब, राखे उसे समझाय कर।

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जब अॉख से अोझल भया, तडपन लगा मेरा जिया,

हक्का इलाही क्या किया ऑसू चले भरलायकर ।। तू तो हमारा यार है, तुम पर हमारा प्यार है, तुझ दोस्ती बिसियार है, यक शब मिलो तुम आय कर। मेरा जो मन तुमने लिया, तुमने उठा गम को दिया, गम ने मुझे ऐसा किया जैसे पतंगा आग पर ॥ खुसरा की एक दुसरी गजल देखिये- बह गये बालम, वह गये नदियो किनार, आप पार उतर गये हम तो रहे अरदार । भाई रे मल्लाहो हम को उतारो पार, हाथ का देऊँगी मुंदरी, गल का देऊँ हार ।

मुसलमानी जमाने मे अवश्य हो हिन्दी के तीन रूप होंगे। एक नागरी लिपि मे ठेठ हिन्दी, जिसे भाषा या नागरी कहते थे, दूसरी उर्दू यानी फारसा लिपि मे लिखी हुई, फारसी से मिली हुई हिन्दी और तीसरी ब्रजभाषा । लेकिन हिन्दी-भाषा का मोजूदा सूरत मे आते-आते सदियाँ गुजर गयी । यहाँ तक कि सन् १८०३ ई० से पहले का कोई ग्रन्थ नहीं मिलता । सदल मिश्र की 'चन्द्रावती' का रचना-काल १८०३ माना जाता है और सदल मिश्र ही हिन्दी के आदि लेखक ठहरते है। इसके बाद लल्लूजी, सैयद इशा अल्लाह खाँ वगैरह के नाम है । इस लिहाज से हिन्दी गद्य का जीवन सवा सौ साल से ज्यादा का नहीं है, और क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि सवा सौ साल पहले जिस जबान मे कोई गद्य-रचना तक न थी वह आज सारे हिन्दुस्तान की कोमी जबान बनी हुई है ? और इसमें मुसलमानो का कितना सहयोग है यह हम बता चुके है । हमे सन्देह है कि मुसलमानो का सहारा पाये बगैर हमको आज यह दरजा हासिल होता ।

जिस तरह हिन्दुओं की हिन्दी का रूप विकसित हो रहा था, उसी तरह मुसलमानो की हिन्दी का रूप भी बदलता जा रहा था। लिपि
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तो शुरू से ही अलग थी, जबान का रूप भी बदलने लगा। मुसलमानो की सस्कृति ईरान और अरब की है । उसका जबान पर असर पडने लगा। अरबी और फारसी के शब्द उसमे अा-अाकर मिलने लगे, यहाँ तक कि आज हिन्द। और उर्दू दो अलग-अलग जबानें-सी हो गयी है । एक तरफ हमारे मौलवी साहबान अरबी और फारसी के शब्द भरते जाते है, दूसरी ओर पण्डितगण, सस्कृत और प्राकृत के शब्द ठूस रहे है और दोनो भाषाएँ जनता से दूर होती जा रही है। हिन्दुओ की खासी तादाद अभी तक उर्दू पढती जा रही है, लेकिन उनकी तादाद दिन-दिन घट रही है। मुसलमानो ने हिन्दी से कोई सरोकार रखना छोड दिया । तो क्या यह तै समझ लिया जाय कि उत्तर भारत मे उदू और हिन्दी दो भाषाएँ अलग-अलग रहेगी? उन्हे अपने-अपने ढग पर, अपनी-अपनी संस्कृति के अनुसार बढने दिया जाय उनको मिलाने की और इस तरह उन दोनो की प्रगति का रोकने की कोशिश न की जाय ? या ऐसा सन्भव है कि दोनो भाषानो को इतना समीप लाया जाय कि उनमे लिपि के सिवा कोई भेद न रहे। बहुमत पहले निश्चय की ओर है । हाँ, कुछ थोडे-से लोग ऐसे भी हैं जिनका खयाल है कि दोनो भाषाओं मे एकता लायी जा सकती है, और इस बढ़ते हुए फर्क को रोका जा सकता है, लेकिन उनकी आवाज नक्कारखाने मे तूती की आवाज है। ये लोग हिन्दी और उद नामो का व्यवहार नहीं करते, क्योकि दो नामो का व्यवहार उनके भेद को और मजबूत करता है । यह लोग दोनो को एक नाम से पुकारते है और वह 'हिन्दुस्तानी' है । उनका आदर्श है कि जहाँ तक मुमकिन हो लिखी जानेवाली जबान और बोलचाल की जबान की सूरत एक हो, और वह थोडे से पढ़े-लिखे आदमियो की जबान न रहकर सारी कौम की जबान हो । जो कुछ लिखा जाय उसका फायदा जनता भी उठा सके, और हमारे यहाँ पढे लिखों की जो एक जमाअत अलग बनती जा रही है, और जनता से उनका सम्बन्ध जो दूर होता जा रहा है, वह दूरी
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मिट जाय और पढे-बे-पढे सब अपने को एक जान,एक दिल समझे, और कौम में ताकत आवे। चूँकि उर्दू जबान अरसे से अदालती और सभ्य-समाज की भाषा रही है, इमलिए उममे हजारो फारसी और अरबी के शब्द इस तरह घुल मिल गये है कि बज देहाती भी उनका मतलब समझ जाता है। ऐसे शब्दो को अलग करके हिन्दी मे विशुद्धता लाने का जो प्रयत्न किया जा रहा है, हम उसे जबान और कौम दोनो ही के साथ अन्याय समझते है। इसी तरह हिन्दी या सस्कृत या अँगरेजी के जो बिगडे हुए शब्द उदू मे मिल गये, उनको चुन-चुनकर निकालने और उनकी जगह खालिम फारसी और अरवी के शब्दो के इस्तेमाल को भी उतना ही एतराज के लायक समझते हैं। दोनो तरफ से इस अलगौझे का सबब शायद यही है कि हमारा पढ़ा-लिखा समाज जनता से अलग-थलग होता जा रहा है, और उसे इसकी खबर ही नही कि जनता किस तरह अपने भावो और विचारो को अदा करती है। ऐसी जबान जिसके लिखने और समझनेवाले थोडे से पढे-लिखे लोग ही हो, मसनुई, बेजान और बोझल हो जाती है । जनता का मर्म स्पर्श करने की, उन तक अपना पैगाम पहुँचाने की, उसमे कोई शक्ति नहीं रहती। वह उस तालाब की तरह है जिसके घाट सगमरमर के बने हो जिसमे कमल खिले हों, लेकिन उसका पानी बन्द हो । क्या उस पानी मे वह मजा, वह सेहत देनेवाली ताकत, वह सफाई है जो खुली हुई धारा मे होती है ? कौम की जबान वह है जिसे कौम समझे, जिसमे कौम की आत्मा हो, जिसमें कौम के जजबात हो । अगर पढे-लिखे समाज की जबान ही कौम की जबान है तो क्यों न हम अंग्रेजी को कौम की जबान समझे क्योकि मेरा तजरबा है कि अाज पढा-लिखा समाज जिस बेतकल्लुफी से अंग्रेजी बोल सकता है, और जिस रवानी के साथ अंग्रेजी लिख सकता है, उर्दू या हिन्दी बोल या लिख नहीं सकता। बडे-बडे दफ्तरों मे और ऊँचे दायरे मे आज भी किसी को उर्दू-हिन्दी बोलने की महीनो, बरसों जरूरत नहीं होती । खानसामे और बैरे भी ऐसे रखे जाते हैं जो अंग्रेजी बोलते
[ १९४ ]और समझते है । जो लोग इस तरह की जिन्दगी बसर करने के शौकीन हैं उनके लिए तो उर्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तानी का कोई झगड़ा ही नहीं। वह इतनी बुलदी पर पहुँच गये है कि नीचे की धूल और गर्मी उन पर कोई असर नही कर सकती । वह मुअल्लक हवा मे लटके रह सकते हैं! लेकिन हम मब तो हजार कोशिश करने पर भी वहाँ तक नही पहुँच सकते। हमे तो इसी धूल और गर्मी मे जीना और मरना है । Intelligentsia मे जो कुछ शक्ति और प्रभाव है, वह जनता ही से आता है। उससे अलग रहकर वे हाकिम की सूरत मे ही रह सकते है, खादिम की सूरत मे, जनता के होकर नहीं रह सकते। उनके अरमान और मसूबे उनके है, जनता के नहीं । उनकी आवाज उनको है, उनमे जनसमूह की आवाज की गहराई और गरिमा और गम्भीरता नहीं है। वह अपने प्रतिनिधि है, जनता के प्रतिनिधि नहीं ।

बेशक, यह बड़ा जोरदार जवाब है कि जनता मे शिक्षा इतनी कम है, समझने की ताकत इतनी कम कि अगर हम उसे जेहन मे रखकर कुछ बोलना या लिखना चाहे, तो हमे लिखना और बोलना बन्द करना पड़ेगा । यह जनता का काम है कि वह साहित्य पढने और गहन विषयो को समझने की ताकत अपने मे लाये । लेखक का काम तो अच्छी-से अच्छी भाषा मे ऊँचे-से ऊँचे विचारो को प्रकट करना है । अगर जनता का शब्दकोष सौ दो-सौ निहायत मामूली रोजमर्रा के काम के शब्दो के सिवा और कुछ नहीं है, तो लेखक कितनी ही सरल भाषा लिखे, जनता के लिए वह कठिन ही होगी। इस विषय मे हम इतना अर्ज करेगे कि जनता को इस मानसिक दशा मे छोड़ने की जिम्मेदारी भी हमारे ही ऊपर है। हममे जिनके पास इल्म है, और फुरसत है, यह उनका फर्ज था कि अपनी तकरीरों से जनता मे जागृति पैदा करते, जनता मे ज्ञान के प्रचार के लिए पुस्तके लिखते और सफरी कुतुबखाने कायम करते । हममे जिन्हे मकदरत है, वह मदरसे खोलने के लिए लाखों रुपये खैरात करते है। मैं यह नहीं चाहता कि कौम को ऐसे
[ १९५ ]मुहसिनो को धन्यवाद न देना चाहिये, मगर क्या ऐसी सस्थाएँ न खुल सकती थी और क्या उनसे कौम का कुछ कम उपकार होता जो भाषणों और पुस्तको से जनता मे साहित्य और विज्ञान का प्रचार करती और उनको सभ्यता की ऊँची सतह पर लाती ? आर्यसमाज ने जिस तरह के विषयो का जनता मे प्रचार किया है उन विषयो को साधारण पढ़ा-लिखा आर्यसमाजी भी खूब समझता है । अदालतो मामलो को, या मुक्ति ओर आवागमन जैसे गम्भीर विषयों को गाव के किसान भी अगर ज्यादा नहीं समझते, तो साधारण पढे-लिखो के बराबर तो समझ ही लेते है। इसी तरह अन्य विषयो की चर्चा भी जनता के सामने होती रहती तो हमे यह शिकायत न होती कि जनता हमारे विचारो को समझनही सकती। मगर हमने जनता की परवाह ही कब की है ? हमने केवल उसे दुधार गाय समझा है । वह हमारे लिए अदालतो मे मुकदमे लाती रहे, हमारे कारखानों की बनी हुई चीजें खरीदती रहे । इनके सिवा हमने उससे कोई प्रयोजन नही रखा,जिसका नतीजा यह है कि आज जनता को अंग्रेजो पर जितना विश्वास है उतना अपने पढे-लिखे भाइयो पर नही ।

सयुक्त-प्रान्त के साबिक से पहले के गवर्नर सर विलियम मैरिस ने इलाहाबाद की हिन्दुस्तानी एकेडेमी खोलते वक्त हिन्दी-उर्दू के लेखकों को जो सलाह दी थी, उसे ध्यान मे रखने की आज भी उतनी ही जरूरत है, जितनी उस वक्त थी, शायद और ज्यादा । आपने फरमाया कि हिन्दी के लेखको को लिखते वक्त यह समझते रहना चाहिए कि उनके पाठक मुसलमान हैं । इसी तरह उर्दू के लेखको को यह खयाल रखना चाहिए कि उनके कारी हिन्दू है।

यह एक सुनहरी सलाह है और अगर हम इसे गॉठ बाँध लें, तो जबान का मसला बहुत कुछ तय हो जाय । मेरे मुसलमान दोस्त मुझे माफ फरमाये अगर मै कहूँ कि इस मुआमले मे वह हिन्दू लेखको से ज्यादा खतावार है । सयुक्तप्रान्त की कॉमन लैग्वेज रीडरों को देखिए । [ १९६ ]
आप सहल किस्म की उर्दू पायेगे । हिन्दी की अदबी किताबो मे भी- अरबी और फारसी के सैकडो शब्द धड़ल्ले से लाये जाते हैं। मगर उर्दू साहित्य मे फारसीयत की तरफ ही ज्यादा मुकाव है । इसका सबब यही है कि मुसलमानो ने हिन्दी से कोई ताल्लुक नहीं रखा है और न रखना चाहते है। शायद हिन्दी से थोड़ी-सी वाकफियत हासिल कर लेना भी वह बरसरे-शान समझते है, हालाकि हिन्दी वह चीज है, जो एक हफ्ते मे आ जाती है। जब तक दोनो भाषाश्रीं का मेल न होगा, हिन्दुस्तानी जबान की गाड़ी जहाँ जाकर रुक गयी है, उससे आगे न बढ सकेगी। और यह सारी करामात फोर्ट विलियम की है जिसने एक ही जबान के दो रूप मान लिये । इसमे भी उस वक्त कोई राजनीति काम कर रही थी या उस वक्त भी दोनो जबानों मे काफी फर्क आ गया था, यह हम नहीं कह सकते। लेकिन जिन हाथों ने यहाँ की जबान के उस वक्त दो टुकड़े कर दिये उसने हमारी कौमी जिन्दगी के दो टुकडे कर दिये । अपने हिन्दू दोस्तो से भी मेरा यही नम्र निवेदन है कि जिन शब्दो ने जन साधारण मे अपनी जगह बना ली है, और उन्हे लोग आपके मॅह या कलम से निकलते ही समझ जाते है, उनके लिए सस्कृत-कोष की मदद लेने की जरूरत नहीं । 'मौजूद' के लिए 'उपस्थित', 'दादा' के लिए 'सकल्प', 'बनावटी' के लिए 'कृत्रिम' शब्दो को काम मे लाने की कोई खास जरूरत नही। प्रचलित शब्दों को उनके शुद्ध रूप मे लिखने का रिवाज भी भाषा को अकारण ही कठिन बना देता है। खेत को क्षेत्र, बरस का वर्ष, छेद को छिद्र, काम को कार्य, सूरज को सूर्य, जमना को यमुना लिखकर आप मुॅह और जीभ के लिए ऐसी कसरत का सामान रख देते है जिसे नब्बे फी सदी आदमी नहीं कर सकते । इसी मुश्किल को दूर करने और भाषा को सुबोध बनाने के लिए कवियों ने व्रजभाषा और अवधी मे शब्दों के प्रचलित रूप ही रखे थे । जनता मे अब भी उन शब्दों का पुराना बिगड़ा हुआ रूप चलता है, मगर हम विशुद्धता की धुन मे पड़े हुए है।

मगर सवाल यह है, क्या इस हिन्दुस्तानी मे क्लासिकल भाषाओ
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के शब्द लिये ही न जाये १ नही, यह तो हिन्दुस्तानी का गला घोट देना होगा । आज साएस की नयी-नयी शाखें निकलती जा रही है और नित नये शब्द हमारे सामने आ रहे हैं, जिन्हे जनता तक पहुँचाने के लिए हमे सस्कृत या फारसी की मदद लेनी पड़ती है। किस्से-कहानियों मे तो आप हिन्दुस्तानी जबान का व्यवहार कर सकते है, वह भी जब आप गद्य-काव्य न लिख रहे हो, मगर अालोचना या तनकीद, अर्थशास्त्र, राजनीति, दर्शन और अनेक साएस के विषयो मे क्लासिकल भाषाओं से मदद लिये बगैर काम नही चल सकता । तो क्या सस्कृत और अरबी या फारसी से अलग-अलग शब्द बन जाय । ऐसा हुआ तो एकरूपता कहाँ आयी ? फिर तो वही होगा जो इस वक्त हो रहा है। जरूरत तो यह है कि एक ही शब्द लिया जाय, चाहे वह सस्कृत से लिया जाय, या फारसी से, या दोनों को मिलाकर कोई नया शब्द गढ़ लिया जाय । Sex के लिए हिन्दी मे कोई शब्द अभी तक नहीं बन सका । आम तौर पर 'स्त्री-पुरुष सम्बन्ध' इतना बड़ा शब्द उस भाव को जाहिर करने के लिए काम मे लाया जा रहा है। उर्दू मे 'जिन्स' का इस्तेमाल होता है । जिसी, जिसियत आदि शब्द भी उसी से निकले है । कई लेखकों ने हिन्दी मे भी जिसी, जिस, जिंसियत का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है । लेकिन यह मसला आसान नहीं है । अगर हम इसे मान ले कि हिन्दु- स्तान के लिए एक कौमी जबान की जरूरत है, जिसे सारा मुल्क समझ सके तो हमे उसके लिए तपस्या करनी पडेगी । हमे ऐसी सभाएँ खोलनी पड़ेगी जहाँ लेखक लोग कभी-कभी मिलकर साहित्य के विषयो पर, या उसकी प्रवृत्तियों पर आपस मे खयालात का तबादला कर सकें। दिलो की दूरी भाषा की दूरी का मुख्य कारण है। अापस के हेल-मेल से उस दूरी को दूर करना होगा । राजनीति के पण्डितो ने कौम को जिस दुर्दशा मे डाल दिया है, वह आप और हम सभी जानते है । अभी तक साहित्य के सेवको ने भी किसी-न-किसी रूप मे राजनीति के पण्डितों को अगुआ माना है, और उनके पीछे-पीछे चले हैं । मगर अब साहित्यकारों को
[ १९८ ]अपने विचार से काम लेना पडेगा । सत्य, शिवं, सुन्दर के उसूल को यहाँ भी बरतना पडेगा । सियासियात ने सम्प्रदायो को दो कैम्पो मे खड़ा कर दिया है । राजनीति की हस्ती ही इस पर कायम है कि दोनों आपस मे लड़ते रहे । उनमे मेल होना उसकी मृत्यु है। इसलिए वह तरह-तरह के रूप बदलकर और जनता के हित का स्वॉग भरकर अब तक अपना व्यवसाय चलाती रही है। साहित्य धर्म को फिकाबन्दी की हद तक गिग हुआ नहीं देख सकता । वह समाज को सम्प्रदायो के रूप मे नही, मानवता के रूप मे देखता है। किसी धर्म की महानता और फजीलत इसमे है कि वह इन्सान को इन्सान का कितना हमदर्द बनाता है, उसमे मानवता ( इन्सानियत ) का कितना ऊँचा आदर्श है, और उस आदर्श पर वहाँ कितना अमल होता है । अगर हमारा धर्म हमे यह सिखाता है कि इन्सानियत और हमदर्दी और भाईचारा सब कुछ अपने ही धर्मवालो के लिए है, और उस दायरे से बाहर जितने लोग है, सभी गैर हैं, और उन्हे जिन्दा रहने का कोई हक नहीं, तो मै उस धर्म से अलग होकर विधर्मी होना ज्यादा पसन्द करूँगा। धर्म नाम है उस रोशनी का जो कतरे को समुद्र मे मिल जाने का रास्ता दिखाती है, जो हमारी जात को इमाअोस्त मे, हमारी आत्मा को व्यापक सर्वात्म मे, मिले होने की अनुभूति या यकीन कराती है। और चूकि हमारी तबीयतें एक-सी नही हैं, हमारे संस्कार एक-से नहीं हैं, हम उसी मंजिल तक पहुँचने के लिए अलग-अलग रास्ते अख्तियार करते हैं। इसीलिए भिन्न-भिन्न धर्मों का ज़ हर हुश्रा है । यह साहित्यसेवियो का काम है कि वह सच्चो धार्मिक जाग्रति पैदा करें। धर्म के प्राचार्यों और राजनीति के पण्डितो ने हमे गलत रास्ते पर चलाया है। मगर मैं दूसरे विषय पर आ गया । हिन्दुस्तानी को व्याव- हारिक रूप देने के लिए दूसरी तदबीर यह है कि मैट्रिकुलेशन तक उर्दू और हिन्दी हरेक छात्र के लिए लाजमी कर दी जाय । इस तरह हिन्दुओ को उर्दू मे और मुसलमानों को हिन्दी मे काफी महारत हो जायगी, [ १९९ ]
और अज्ञानता के कारण जो बदगुमानी और सन्देह है,वह दूर हो जायगा। चूकि इस वक्त भी तालीम का सीगा हमारे मिनिस्ट्रो के हाथ मे है और करिकुलम मे इस तब्दीली से कोई जायद खर्च न होगा, इसलिए अगर दोनो भाई मिलकर यह मुतालबा पेश करें तो गवर्नमेट को उसके स्वीकार करने मे कोई इन्कार न हो सकेगा । मै यकीन दिलाना चाहता हूँ कि इस तजवीज मे हिन्दी या उर्दू किसी से भी पक्षपात नहीं किया गया है । साहित्यकार के नाते हमारा यह धर्म है कि हम मुल्क में ऐसी फिजा, ऐसा वातावरण लाने की चेष्टा करे जिससे हम जिन्दगी के हरेक पहलू मे दिन-दिन आगे बढे । साहित्यकार पैदाइश से सौन्दर्य का उपासक होता है। वह जीवन के हरेक अङ्ग मे, जिन्दगी के हरेक शोबे मे, हुस्न का जलवा देखना चाहता है । जहाँ सामञ्जस्य या हम-अाहेंगी है वही सौन्दर्य है, वही सत्य है, वही हकीकत है। जिन तत्वों से जीवन की रक्षा होती है, जीवन का विकास होता है, वही हुस्न है । वह वास्तव मे हमारी आत्मा की बाहरी सूरत है। हमारी प्रात्मा अगर स्वस्थ है, तो वह हुस्न की तरफ बेअख्तियार दौड़ती है। हुस्न मे उनके लिए न रुकने- वाली कशिश है । और क्या यह कहने की जरूरत है कि नेफाक और हसद, और सन्देह और संघर्ष, यह मनोविकार हमारे जीवन के पोषक नहीं बल्कि घातक हैं, इसलिए वह सुन्दर कैसे हो सकते हैं ? साहित्य ने हमेशा इन विकारो के खिलाफ आवाज उठायी है। दुनिया से मानव-जाति के कल्याण के जितने अान्दोलन हुए है, उन सभी के लिए साहित्य ने ही जमीन तैयार की है, जमीन ही नहीं तैयार की, बीज भी बोये और उसकी सिंचाई भी की। साहित्य राजनीति के पीछे चलनेवाली चीज नहीं, उसके आगे-आगे चलनेवाला 'एडवास गार्ड' है । वह उस विद्रोह का नाम है जो मनुष्य के हृदय मे अन्याय, अनीति, और कुरुचि से होता है। और लेखक अपनी कोमल भावनाओं के कारण उस विद्रोह की जबान बन जाता है। और लोगों के दिलों पर भी चोट लगती है, पर अपनी व्यथा को, अपने दर्द को दिल हिला देनेवाले शब्दों मे वे जाहिर
[ २०० ]नह कर सकते । साहित्य का स्रष्टा उन चोटो को हमारे दिलों पर इस तरह अकित करता है कि हम उनको तीव्रता को सौगुने वेग के साथ महसूस करने लगते हैं। इस तरह साहित्य की आत्मा आदर्श है और उसकी देह यथार्थ चित्रण । जिस साहित्य मे हमारे जीवन की समस्याएँ न हो, हमारी आत्मा को स्पर्श करने की शक्ति न हो, जो केवल जिन्सी भावो मे गुदगुदी पैदा करने के लिए, या भाषा-चातुरी दिखाने के लिए रचा गया हो वह निर्जीव साहित्य है, सत्यहीन, प्राणहीन । साहित्य मे हमारी आत्माओ को जगाने की, हमारी मानवता को सचेत करने की, हमारी रसिकता को तृप्त करने की शक्ति होनी चाहिए। ऐसी ही रचनाओ से कौमे बनती हैं । वह साहित्य जो हमे विलासिता के नशे मे डुबा दे, जो हमे वैराग्य, पस्तहिम्मती, निराशावाद की ओर ले जाय, जिसके नजदीक ससार दुःख का घर है और उससे निकल भागने मे हमारा कल्याण है, जो केवल लिप्सा और भावुकता मे डूबी हुई कथाएँ लिखकर कामुकता को भड़काये, निर्जीव है । सजीव साहित्य वह है, जो प्रेम से लबरेज हो, उस प्रेम से नहीं, जो कामुकता का दूसरा नाम है, बल्कि उस प्रेम से जिसमे शक्ति है, जीवन है, आत्म-सम्मान है। अब इस तरह की नीति से हमारा काम न चलेगा।

रहिमन चुप ह बैठिये, देखि दिनन को फेर

अब तो हमे डा० इकबाल का शंखनाद चाहिए-

ब शाखे ज़िन्दगिये मा नमीजे तिश्ना बसस्त

तलाशे चश्मए हैबॉ दलीले ब तलबीस्त । १

ता कुजा दर तहे बाले दिगरॉ मी बाशी,

दर हवाये चमन आज़ाद परीदन् अामोज़ ।२


१) मेरे जीवन की डाली के लिए तृषा की तरी ही काफी है । अमृतकुंड की खोज मे भटकना आकाक्षा के अभाव का प्रमाण है। २) दूसरो के डैनो का आश्रय तुम कब तक लोगे ? चमन की हवा मे आजाद होकर उड़ना सीखो।


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