हीराबाई/ भाग 1

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हीराबाई  (1914) 
द्वारा किशोरीलाल गोस्वामी
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दूसरा परिच्छेद।

छुटकारा।

"दुर्जनं प्रथमं वन्दे सज़नं तदनन्तरम्।
मुखप्रक्षालनात्पूर्वं पादप्रक्षालनं वरम्॥"

(नीतिमञ्जर्याम्)

जब अ़लाउद्दीन का चचा जलालुद्दीन जीता था, उसी समय में [सन १२९४ ईस्वी] अ़लाउद्दीन ने आठ हज़ार सवारों के साथ दक्खिन के इलाकों पर चढ़ाई की थी। उस समय उसने देवगढ़ [दौलताबाद] के राजा रामदेव को जा घेरा था और बहुत सा सोना, चांदी और जवाहिरात लेकर तब उसका पिंड छोड़ा था; बल्कि कुछ सालाना नज़राना उससे मुक़र्रर कर लिया था। यह मुसलमानों का दक्खिन में पहला चढ़ाव था।

किन्तु अ़लाउद्दीन को रनथंभौर और चित्तौर की लड़ाइयों में ग़ाफ़िल देख, रामदेव ने एक कौड़ी नज़राना नहीं भेजा था। इस बात को जब ग्यारह बरस बीत गए और अ़लाउद्दीन चित्तौर का सत्यानाश करके दूसरे राज्यों के तहस-नहस करने का मन्सूबा बांधने लगा तो उसे रामदेव का ख़याल हुआ और उसने चिढ़कर [सन् १३०६] देवगढ़ पर अपनी फौज भेजी थी। [  ]बेचारा रामदेव शाही फ़ौज को देखकर घबरा गया और मुक़ाबले की ताक़त न देख, वह दिल्ली में हाज़िर होगया था। फिर बहुत सा नज़राना देकर उसने अ़लाउद्दीन को राजी कर लिया था। आख़िर, बादशाह ने अपनी फ़ौज के अफ़सर फ़तह ख़ां को देवगढ़ से घेरा उठाकर लौट आने का हुक्म लिख भेजा और रामदेव को बिदा किया था।

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तीसरा परिच्छेद।

बहकावट।

"मृगमीनसज्जनानां तृणजलसन्तोषविहितवृत्तीनाम्।
लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति॥"

(नीतिशतके)

अ़लाउद्दीन कुछ पढ़ा लिखा न था, बादशाह होने पर उसने कुछ पढ़ना लिखना शुरू किया था; पर तौभी वह घमंडी इतना बड़ा था कि अपने तई सारी दुनियां से बढ़कर पंडित और समझदार समझता था। ज़ालिम वह ऐसा था कि क्या मक़दूर कि कोई उसकी बात दुहरा सके। कभी वह अपना नया मत चलाना चाहता, कभी सारी दुनियां को अपने तहत में लाने का मन्सूबा बांधता, कभी अपनी ही फ़ौज को आप कटवा डालता और
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कभी अपनी ही रियाया के क़त्लेआम का हुक्म दे बैठता था। वह बादशाह क्या, हिन्दुस्तान का मानो मलकुलमौत था।

संध्या का सुहावना समय था, शाही बाग़ में एक संगमर्मर के चबूतरे पर ज़र्दोज़ी मसनद पर बैठा हुआ अ़लाउद्दीन हुक्क़ा पी रहा था और चालीस पचास मुसाहब उस चबूतरे के इर्दगिर्द दस्तबस्त: सिर झुकाए हुए खड़े थे। इतने ही में उसके वज़ीर-आज़म बहरामख़ां ने वहां आ और शाहानः आदाब बजा लाकर एक ख़लीता उसके सामने रख दिया और हाथ जोड़कर कहा,-

“जहांपनाह! यह ख़लीता हुजू़र की ख़िदमत में सिपहसालार फ़तहख़ां ने रवानः किया है।"

अ़लाउद्दीन,-"बेहतर! इसका मज़सून पढ़कर सुनाओ।"

"जो इर्शाद" कहकर वज़ीर ने उस ख़लीते के अन्दर से एक ख़त निकालकर पढ़ा, जो फ़ारसी भाषा में लिखा हुआ था; किन्तु उसका मतलब हम हिन्दी भाषा में अपने पाठकों को सुनाते हैं,-

"आलीजाह!

हुजू़र का हुक्मनामा पाते ही गुलाम देवगढ़ से घेरा उठाकर इलाके गुजरात से गुजरा
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और फ़ौज के सुस्ता लेने के ख़याल से काठियावाड़ के इलाके़ में ठहर गया; लेकिन काठियावाड़ के राजा विशालदेव ने रसद देने से इन्कार किया और शाही फ़ौज को अपनी सहर्द से बाहर चले जाने का हुक्म दिया; मगर ग़ुलाम ने उसके कहने पर कुछ भी अमल न किया और उसके इलाक़े को लूटकर फ़ौजी सिपाहियों का काम चलाया। अब इस नीयत से ग़ुलाम अभी तक यहां ठहरा हुआ है कि विशालदेव को उसकी इस सर्कशी की सज़ा ज़रूर दी जानी चाहिए। उसकी रानी, जिस का नाम कमलादेवी है, निहायत हसीन और नौजवान औरत है। उसके हुस्न की तारीफ़ मैंने यहांके हर ख़ासोआम के मुंह सुनी है और उम्मीद कामिल है कि उसे पाकर हुज़ूर पद्मिनी रानी के गम को बिल्कुल भूल जायंगे; आगे जो इर्शाद, बंदेनेवाज।"

अ़लाउद्दीन उस ख़त के सुनते ही फड़क उठा और उसने उसी समय अपने हाथ से फ़तहख़ा को यह हुक्म लिख भेजा कि,-"अगर विशालदेव अपनी रानी को बिला उज्र देखके तो उससे बगैर छेड़छाड़ किए, उस औरत को बाइज्ज़त अपने साथ लेकर तुम लौट आओ; बर न जिस तरह होसके,
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काठियावाड़ को तहस-नहस करके कमला को पकड़ लाओ।"

पाठकों को समझना चाहिए कि बेचारे विशालदेव ने न तो बादशाही फ़ौज को अपने इलाके में ठहरने ही को मना किया था और न रसद देने में ही कोई हीला पेश किया था। असल बात यह थी कि कमलादेवी के रूप का बखान सुनकर दुष्ट फ़तहख़ां ने यह झूठा प्रपंच रचकर बादशाह को बहकाया था, जिसमें देवगढ़ नहीं, तो यहीं मनमानी लूट-खसोट-कर वह अपनी थैली भरे और बादशाह को अपनी मुर्खरूई दिखलाकर कोई बड़ा वहदा हासिल करे।

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चौथा परिच्छेद।

धमकी।

"सम्पदो महतामेव महतामेव चापदः।
वर्द्धते क्षीयते चन्द्रो न च तारागणः क्वचित्॥"

(पञ्चतन्त्रे)

काठियावाड़, अर्थात् काठियों का देश, जो गुजरात के प्रायद्वीप का मध्य भाग है, बिलकुल जंगल-पहाड़ों से भरा हुआ है; पर पहाड़ प्रायः नीचे हैं और धरती रेतीली तथा कम उपजाऊ है। [ १० ]
स्त्रियां वहांकी बड़ी सुन्दरी और लंबे क़द की होती हैं। वहांवाले अपने काठी होने का कारण यह बतलाते हैं कि “जब पांचो पांडव दुर्योधन से जुए में हारकर बारह बरस के लिये वहां आकर छिपे, तो उन्हें ढूंढ निकालने का दुर्योधन ने यह ढंग निकाला कि,-"वहांकी गौवें हरी जायं तो पांडव क्षत्री होकर चुप न रहेंगे और गौवों के छुड़ाने के लिए आकर ज़रूर प्रगट हो जायंगे।" पर किसी क्षत्री ने जब गौ चुराना मंजूर न किया तो कर्ण ने अपनी काठ की छड़ी धरती में पटकी, जिससे एक क्षत्री पैदा हुआ; इसलिये उसका या उसके वंशवालों का नाम काठी [काष्ठी] पड़ा। उस वंश के लोग कर्ण के पिता सूर्य को अबतक मानते, पूजते और अपने काग़ज़ों पर उस [सूर्य] की छाप देते हैं।

निदान, अ़लाउद्दीन की फ़ौज ने काठियावाड़ की राजधानी बड़ोदे के शहर को, जो विश्वामित्र नदी के बाएं किनारे पर, शहरपनाह के अन्दर बसा है, घेर लिया और वहांके राजा विशालदेव से सिपहसालार फ़तहख़ां ने यह कहला भेजा कि,-“या तो अपनी रानी कमलादेवी को फ़ौरन बादशाह की नज़र करो, या लड़ने के लिये तैयार
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होजाओ। तीन दिन तक तुम्हारे जवाब का आसरा हम देखेंगे, बाद इसके शहर के अन्दर घुस आवेंगे और बड़ोदे की एक-एक ईंट बर्बाद करके कमलादेवी को जीती पकड़ लेजायंगे।"

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पांचवां परिच्छेद।

दृढ़ता।

"कुसुमस्तवकस्येव द्वयो वृत्तिर्मनस्विनाम्।
मूर्ध्न्दि वा सर्वलोकस्य शीर्यते वन एव वा॥"

(नीतिशतके)

इसीसे आज सारे शहर में कोहराम मचा हुआ है, शहर के सभी औरत-मर्द अपने जान-माल, इज्ज़त-आबरू और अपने-पराये का ख़याल करके रो-कलप रहे हैं। राजा विशालदेव के रनिवास में हाहाकार मचा हुआ है और ख़ुद राजा बादशाही फ़ौज से मुक़ाबला करने की ताकत न देख बदहवास होरहा है। शहर के सभी छोटे-बड़े राजसभा में आ-आ-कर अपने बचाव के लिये रोरहे हैं, राजा सभीको ढाढ़स देता और समझा-बुझा-कर बिदा कर रहा है, पर वह हैरान है, उसके मंत्री भी परेशान हैं कि यह आफ़त, यह बला, और यह मलकुलमौत का रिसाला क्योंकर यहांसे टाला जाय!!! [ १२ ]योहीं होते-होते दो दिन बीत गए, आज तीसरा दिन है और इस शहर या शहरवालों के भाग्य के वारे-न्यारे होने का यही आख़िरी दिन है। फ़तहख़ां की फ़ौज में आज सबेरे से ही जंग की तैयारियां होने लगी हैं, जिनका हाल सुनकर राजा, प्रजा और रनिवांस की दशा बहुत ही बुरी दिखलाई देरही है।

दो दिन बीतने पर आज कमलादेवी ने राजा विशालदेव से रोकर कहा,-"नाथ! यदि मेरे ही देडालने से इस नगर के लाखों आदमियों की जान और आपका राज्य बचता है तो मुझे देडालिए और समझ लीजिए कि आपकी प्यारी कमला मर गई।"

विशालदेव रानी के मुंह से ऐसी बात सुन धीरज छोड़कर बालकों की नाईं रोने लगा और बोला,-"प्यारी! हाय! क्षत्रिय होकर प्राण रहते हम अपनी प्रियतमा पत्नी को आततायी यवन के हवाले करेंगे? धिक्कार है, ऐसे जीवन पर! इससे तो अपने हाथों तुम्हें मार शत्रुओं से जूझकर मर जाना कड़ोर गुना अच्छा है।"

कमला,--“आपका कहना तो ठीक है, किन्तु नाथ! नीति कहती है कि-'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे०'
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इसलिये यदि मेरे ही जाने से आप, आप के राज्य और इन निरपराध लाखों जीवों का धन-मान बचता है तो मेरा दे डालना ही अच्छा है। आप इस बात का विश्वास रक्खें कि आपको छोड़कर कमला जीती हुई कभी दिल्ली न पहुंचेगी। हां! मेरी मरी मट्टी को लेकर दुराचारी अ़लाउद्दीन जो चाहे सो करे।"

विशालदेव,---[रोते-रोते] "प्रियतमे! हा! भगवन् भास्कर! तुम्हारे वंशधरों की, पवित्र भारतभूमि की और महावीर क्षत्रियजाति की यह लाञ्छना!!! प्रियतमे! हमे अपने जीने न जीने, या राजपाट की कुछ भी पर्वा नहीं है, किन्तु इन निरपराध प्रजाओं के विनाश का ध्यान जब होआता है, तो हमारी बुरी दशा हो जाती है! हा! सिवाय मर मिटने के, हम बादशाही फ़ौज का किसी भांति भी सामना नहीं कर सकते।"

कमला,---"इसीसे तो-नाथ! कहती हूं कि आप समझ लीजिए कि आपकी सारी दुर्दशा की जड़ निगोड़ी कमला आज मर गई!"

विशालदेव,---"प्यारी! ऐसा काम तो हम प्राण रहते, कभी नहीं करेंगे, इसमें चाहे जो होय!"


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