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आदर्श महिला/५ चिन्ता/२

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आदर्श महिला  (1925) 
द्वारा नयनचंद्र मुखोपाध्याय, अनुवाद जनार्दन झा

[ २३५ ]निकाल सके, सैकड़ों मुसाहब जिस उलझन में सिर पर हाथ धरकर सोचते रह गये—यहाँ तक कि मैं भी इतनी देर सोच करके जिस मसले को हल नहीं कर सका—उसका फैसला महल में रहनेवाली तुम कैसे कर सकोगी?

चिन्ता—नाथ! यह तो मामूली बात है। इसका फैसला करना कुछ मुश्किल नहीं। समय बहुत बीत गया। आप नहाकर भोजन करें। आप विश्वास रक्खें, मैं इसका फै़सला कर दूँगी।

राजा की छाती से एक भारी बोझ-सा उतर गया।

खान-पान से छुट्टी पाकर राजा पलँग पर लेटे हुए हैं। चिन्ता रानी पैरों की ओर बैठकर पङ्खा झल रही हैं। इतने में राजा ने कहा—प्यारी! तुम इस नाजुक मामले का फै़सला कैसे करोगी? कुछ मेरी समझ में नहीं आता। मुझे हर घड़ी इसी का ध्यान है। तुम अब बताकर मेरे चित्त को शान्त करो।

चिन्ता ने कहा—स्वामी! आप इतनी फ़िक्र क्यों करते हैं? आपको कुछ भी कहना नहीं पड़ेगा। देवता लोग अपना निर्णय आप ही कर लेंगे। कल, शनि और लक्ष्मी के आने से पहले ही आप अपने सिंहासन के दाहिनी ओर एक सोने का और बाईं ओर एक चाँदी का सिंहासन रखवा दीजिएगा। शनि और लक्ष्मी के हाथ से ही फैसला हो जावेगा। उनमें जो बड़ा होगा वही बड़प्पन के कीमती आसन पर बैठेगा। आपको कुछ बोलना भी नहीं पड़ेगा; क्योंकि इज्ज़त आप सबको अपना आसन दिखा देती है। फिर वे तो देवता हैं।

राजा ने चिन्ता की यह चतुराई की बात सुनकर प्रसन्नता से कहा—देवी! मेरे हृदय-राज्य की रानी! तुम साक्षात् मीमांसा हो या मेरे पूर्वजन्म के पुण्य तुम्हारी सुरत में मेरी सहायता कर रहे हैं! [ २३६ ]आज तुमने मानवी रूप से, प्रेम-पूर्ण हाथ से मेरे संकट को दूर कर दिया और तुमने मुझे प्रेम-पूर्ण नये राज्य का राजा बना दिया।

चिन्ता ने मुसकुराकर कहा—अभी यह पण्डिताई रहने दीजिए। इसमें बहुत कुछ सोचने-समझने की बात है। आप सहज में इसमें छुटकारा नहीं पावेंगे। अपनी इज्ज़त के भूखे देवता इस झगड़े का फैपला अपने आप कर तो लेंगे परन्तु उनमें से जो लोगों के सामने लज्जित होगा—जिसे नीचा देखना पड़ेगा—उसका भयङ्कर कोप आपके ऊपर अवश्य होगा। सर्वनाश मानो आज देवी-देवता का रूप धरकर तुम्हारे सामने खेल रहा है! किन्तु इस समय उसके सोचने की ज़रूरत नहीं।

राजा को यह सुनकर बहुत फ़िक्र हुई। वह मुलायम सफे़द शय्या उनको काँटे-सी गड़ने लगी। दयारूपिणी चिन्ता देवी के झले हुए पंखे की मधुर बयार गरम लू के समान मालूम होने लगी। हारे हुए देवता के रोष की कल्पना करके वे घबरा उठे।

प्रेम में चतुर चिन्ता देवी ने राजा की कातरता को समझकर कहा—राजन्! खेद छोड़िए। आफ़त में अधीर होना आपके ऐसे स्थिर-बुद्धिवाले पुरुष के लिए कभी उचित नहीं है। आफ़त में घबरा जाने से वह मनुष्य को और भी जकड़ लेती है। दुःखों से जलती हुई इस धरती पर धीरज का हथियार लेकर मनुष्य को आफ़त का सामना करना पड़ेगा। आप राजा हैं, प्रजा के प्रत्यक्ष देवता हैं, देश के मङ्गल हैं और साधु के आदर्श हैं। होनहार के ख़याल से अधीर होना आपको लाज़िम नहीं। विधाता ने जो लिख दिया है वह तो होगी ही। होतव्यता के साथ लड़ने की शक्ति मनुष्य में नहीं है; क्योंकि मनुष्य तो कर्म के फल का दास है। प्रत्येक काम मनुष्य के पूर्व जन्म के कर्मफल की सिर्फ सूचना है। [ २३७ ]

राजा ने चिन्ता देवी की मङ्गलभरी बातें सुनकर बड़ी प्रसन्नता से कहा—चिन्ता! तुम मनुष्य नहीं, तुम तो साक्षात् देवी हो। तुम माया से अशुद्ध इस पृथिवी में तत्त्वज्ञान की अपूर्ण माधुरी लिये हुए शोभी पा रही हो। मेरा बहुत पुण्य था। उसी पुण्य के फल से तुम्हारे समान ज्ञानमयी सौभाग्य-लक्ष्मी को पाकर धन्य हुआ हूँ।

धीरे-धीरे सन्ध्या हो गई। जगत् के पति ने प्रकृति के माथे में सेंदुर लगा दिया। फूलों ने सुगन्ध का झरना खोल दिया। पखेरू सन्ध्या समय का भजन करने लगे। मन्दिरों में भारती के घण्टे बजने लगे।

[७]

राजा ने सबेरे उठकर प्रातःकाल की प्रकृति की बाँकी शोभा में भी कुछ कमी सी पाई। प्रकृति की इस नई रङ्ग-भूमि पर मानो सब कुछ उनको बेसुरा मालूम होने लगा।

धीरे-धीरे दिन चढ़ा। राजसी पोशाक पहनकर श्रीवत्स राजदरबार में आये। राजा के सिंहासन की दाहिनी ओर एक सोने का और बाई ओर चाँदी का सिंहासन रक्खा गया। बीच में अपने सिंहासन पर, राजा श्रीवत्स रानी के साथ बैठकर राज-कार्य देखने लगे।

इतने में वहाँ शनि और लक्ष्मी का आगमन हुआ। उनको देखकर राजी और राजा सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये। नम्रता से दोनों को प्रणाम कर उन्होंने उनसे बैठने के लिए कहा। शनि अपनी "इच्छा से राजसिंहासन के बायें भाग में चाँदी के सिंहासन पर, और लक्ष्मी दाहिने भाग में सोने के सिंहासन पर बैठ गईं। राजा और रानी क्रम से शनि और लक्ष्मी के पास खड़े होकर उनकी सेवा करने लगे। [ २३८ ]

बहुतसी बातचीत हो चुकने पर शनि ने कहा-महाराज! तुम्हारी आव-भगत से हम बहुत प्रसन्न हुए। आशा है, अब हम लोगों के झगड़े का तुम फैसला कर दोगे।

श्रीवत्स का मुँह सूख गया। भयानक विपद् की शङ्का से उनके मुँह से बात न निकली। तब शनि ने फिर कहा—क्यों महाराज, इस बात का कुछ उत्तर क्यों नहीं देते? कल तुमने आज फै़सला कर देने का वादा किया था, अब अपनी वह प्रतिज्ञा पूरी करो।

राजा ने समझा कि सत्यानाश सिर पर आ गया, सुख की गृहस्थी में आग लग गई, अब सोचने विचारने का मौक़ा नहीं है। उन्होंने कहा—देव! भला देवता का विचार मनुष्य क्या करेगा! मनुष्य में इतनी शक्ति कहाँ? जो हो, जब आप लोगों ने मुझे वह अधिकार दिया ही है, तब मेरी राय में यह आता है—आप लोग, ही विचार कीजिए कि आप लोगों में कौन बड़ा है।

शनि—महाराज! चतुराई से काम नहीं होगा। तुम्हारी वचन-चातुरी को परखने के लिए हम लोग यहाँ नहीं आये हैं। जो तुम इसका समाधान नहीं कर सकते थे तो तुमने पहले ही से साफ़-साफ़ क्यों न कह दिया। कल से इतनी बातें क्यों बना रहे हो?

शनि की बात सुनकर श्रीवत्स चौंक पड़े। वे समझ गये कि मेरी इस दीनता से अपनी इज्ज़त चाहनेवाले शनैश्चर प्रसन्न होने के नहीं। अब राजा ने विनती कर कहा—हे सूर्य के पुत्र! यह विशाल जगत् प्रीति के एक गुप्त आकर्षण से चल रहा है। यहाँ प्रीति का आकर्षण शासन की त्यौरी से कहीं बढ़कर ताक़त रखता है। इस संसार में जो प्रीति-दान दे सकता है वही बड़ा है। दबाव से मनुष्य वश में नहीं होता, प्रेम की छाया से ही मनुष्य धन्य होता है। अब आप ही विचार कीजिए कि आप लोगों में कौन बड़ा है। [ २३९ ]

श्रीवत्स की इस बात से शनि का क्रोध और भी बढ़ गया। उन्होंने और भी रुखाई से कहा—महाराज! हम लोग तुमसे इन्साफ़ कराने आये हैं। साफ़ बताओ कि शनि बड़े या लक्ष्मी।

श्रीवत्स—देव! इस विषय का फैसला आप लोगों ने स्वयं कर लिया है। आप लोग अगर अपने-अपने आसन की ओर ध्यान दें तो समझ जायँगे कि आप लोगों में कौन बड़ा है।

शनि—महाराज! हम लोग तुम्हारे राज-दरबार में मेहमान के माफ़िक़ आये हैं। तुम्हारे दिये आसन पर हम लोग अपनी इच्छा से बैठ गये हैं इससे इस बात का फैसला नहीं हो सकता कि कौन बड़ा है और कौन छोटा। तुम खोलकर साफ़-साफ़ बताओ।

श्रीवत्स-देव! मामूली ढँग पर रहन-सहन, और आसन-भेद से बड़े-छोटे का विचार होता है। जो बड़ा होता है उसका आसन भी कीमती और दाहिनी ओर होता है। आपने लक्ष्मी को सुनहले आसन पर अपनी दाहिनी ओर स्थान दिया है। इसलिए, अब इसका विचार मैं क्या करूँगा? जगत् का धर्म ही यह है कि अपने से ऊँचे के आगे सब लोग सिर नवाते हैं। बर्फ़ का मुकुट पहननेवाला हिमाचल भी अनन्त महिमावाले भगवान् के सामने प्रणाम के बहाने सिर झुकाये हुए है। ऊँचा पेड़ भी भारी पहाड़ के सामने झुका हुआ है। वनस्पतियाँ भी विकट पर्वत के आगे सिर झुकाये हैं।

श्रीवत्स की इस विनती से भी शनि सन्तुष्ट नहीं हो सके। उन्होंने सिंह की तरह गरजकर कहा—महाराज! मैं तुम्हारी चालाकी के फ़ैसले को समझ गया। घुमा-फिराकर मेरा अपमान करना ही तुम्हारी इस चालाकी का असल मतलब है। अच्छा, देखा जायगा। तुम अपनी रक्षा कैसे करते हो। जानते हो महाराज! मेरी इच्छा से सुख के मन्दिर में हाहाकार मच जाता है; विलास की फुलवाड़ी मरघट [ २४० ]बन जाती है। तुमने जैसा मेरा अपमान किया है, वैसा ही व्यवहार मैं तुम्हारे साथ करूँगा। महाराज! ठीक समझना कि मेरी नज़र तुम्हारे ऊपर पूरे तौर से पड़ेगी।

तब लक्ष्मी ने कोमल स्वर से कहा—"श्रीवत्स! कोई चिन्ता न करना। मैं तुम्हारे जीवन में सदा साथ रहूँगी। सुख में, दुःख में और कर्त्तव्य में, ध्यान को स्थिर रखना। फिर तो अशान्ति तुम्हारा बाल भी बाँका न कर पावेगी।" फिर उन्होंने प्रेम से रानी चिन्ता की ठुड्डी पर हाथ रखकर कहा—बेटी! तुम धन्य हो। आशीर्वाद देती हूँ कि तुम्हारा व्रत पूरा हो। स्वामी के जीवन को मङ्गल के रास्ते ले जाने में तुम्हारे उपाय सफल हों। आज तुम लोगों ने मुझे प्रीति के जिस बन्धन में बाँधा है वह किसी तरह नहीं टूटेगा।

चिन्ता ने कहा—माता! विपदाओं से भरी पृथिवी पर मनुष्य माया-मोह के भँवर में गोते खाया करते हैं। इसमें कोई सहाय है तो वह देवताओं का पवित्र आशीर्वाद है। माँ! आशीर्वाद दो कि हम देवता के चरणों में विश्वास रखकर चल सकें। सुख या दुःख तो कुछ भी नहीं है। वह केवल समझ का फेर है। ऐसा आशीर्वाद दो कि सुख से प्राण न तो फूल ही उठे और न दुःख से गड़बड़ हो जाय। यही प्रार्थना है कि संसार-सागर में दुर्दशा का अन्धकार जब रास्ता भुलाने को आवे तब तुम्हारे पवित्र चरण, ध्रुव-तारे की तरह, हम लोगों को रास्ता दिखावें।

"बेटी चिन्ता! वत्स श्रीवत्स! शोक छोड़ो। कर्मभूमि में कर्म की साधना ही बड़प्पन पाने का सबसे बढ़िया उपाय है। यही तुम लोगों के जीवन का मूल-मंत्र हो।" यह कहकर लक्ष्मी एकाएक गुप्त हो गईं।

लक्ष्मी और शनि के चले जाने पर राज-सभा में कुछ देर के लिए [ २४१ ]सन्नाटा छा गया। ऐसा सन्नाटा कि सुई गिरने की आवाज़ भी सुन पड़े। अचानक सन्नाटे को तोड़कर राजा ने प्रधान मंत्री से कहा—मंत्रिवर! देखी आपने देवताओं की लीला? बताइए, अब क्या करें।

मंत्री—राजन्! सब बातों में भाग्य ही बलवान् है। भाग्य के साथ झगड़ने की शक्ति मनुष्य में नहीं है। आपके भाग्य में अगर शनि का भोग लिखा होगा तो उसे भोगना ही पड़ेगा। उसके लिए अब चिन्ता करने से क्या होगा?

सभा के सब लोग रानी चिन्ता की बुद्धि की तेज़ी और शनि तथा लक्ष्मी की बातें सोचते-सोचते घर गये।

उस दिन के लिए सभा का काम बन्द हुआ।

इतना बड़ा अनर्थ हो गया, परन्तु रानी को कुछ परवा नहीं। उन्होंने सोचा—दुख किस बात का है? मनुष्य के माथे में विधाता ने जो लिख दिया उसे कौन मेट सकता है? उनके लिखे को तो भोगना ही पड़ेगा। इसके लिए हम लोगों को पहले ही से सावधान होना चाहिए। इसके लिए चिन्ता नहीं—बन्दोबस्त करना होगा—हृदय को बलवान् बनाना होगा। कर्तव्य के ज्ञान को सिर पर लेकर पृथिवी में सारी दिक्क़तों के सामने खड़ा होना ही सच्ची वीरता है।

रानी की ऐसी स्थिरता और उनके पक्के इरादे को देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सोचा कि जब यह सती मेरी बग़ल में है तब जगत् के अपार कष्टों को मैं बिना चूँ किये गले लगा सकता हूँ।

[८]

उस वर्ष देश में कहीं अन्न नहीं उपजा। प्रजा भूखों मरने लगी। राजभाण्डार का अन्न प्रजा में बाँटा गया; किन्तु दूसरे वर्ष भी यही हाल रहा। तब राजा ने बहुत कुछ ख़र्च करके दूसरे राज्यों से अन्न [ २४२ ]मँगाकर भूखों मरती हुई प्रजा में बँटवाया। इससे प्रजा का बहुत कष्ट घटने तो लगा, किन्तु लगातार कई वर्ष वर्षा और उपज न होने से देश में भयानक दुर्भिक्ष पड़ा। चोरों और डाकुओं का दल बना। जान बचाने के लिए, सब लोग अधर्म के विचार को ताक़ में रखकर दूसरों की चीज़ें चुराने लगे। राजा का ख़ज़ाना खाली हो गया। अब प्रजा भूखों मरने लगी। देश में ख़ून बरसने लगा। चारों ओर बुरे लक्षण नज़र आने लगे। देश रेगिस्तान बन गया। कहीं ज़रा भी छाया या शीतलता नहीं। चारों ओर ऐसा मालूम होता है कि कोई खाने को दौड़ता सा है। भूख के मारे लोग जोही सोही चीज़ें खाकर बीमार पड़ने लगे। देश में महामारी फैल गई। प्रजा बे-मौत मरने लगी।

देश की यह दशा देखकर राजा-रानी का हृदय शोक से भर गया। राजा ने कहा—रानी! यह दृश्य अब देखा नहीं जाता। पुत्र-समान प्रजा की यह मर्म को छेदनेवाली चिल्लाहट और देश का यह भयानक दृश्य मेरे कलेजे को बेध रहा है। देवी! किसी तरह यहाँ से निकल चलना ही ठीक है।

रानी—महाराज! मुझसे भी यह मरघट का सा भयावना दृश्य देखा नहीं जाता। कहिए, कहाँ चलने का विचार है?

राजा—रानी! मेरी इच्छा है कि तुम इस समय कुछ दिनों के लिए मायके चली जाओ। मैं जहाँ शान्ति पाऊँगा—नदी के किनारे मैदान या घने जंगल में—वहीं जाऊँगा। शनि की दृष्टि बारह वर्ष रहती है। बारह वर्ष पूरे होने पर मेरी दशा फिर पलटेगी। तब मैं देश को लौटूँगा। तब तक तुम नैहर में रहना। इस समय मेरे साथ रहकर कष्ट पाने की क्या ज़रूरत है? [ २४३ ]

रानी ने गिड़गिड़ाकर कहा—नहीं महाराज! यह नहीं होगा। स्वामी के सिवा स्त्री के लिए और कुछ सहारा नहीं है। मुझे आपके साथ वन-वन घूमने में कुछ भी कष्ट नहीं होगा। उदासी या थकावट के समय हम लोग एक-दूसरे के आसरे रहकर हृदय में बल पावेंगे। महाराज! मुझे वैसी आज्ञा मत दीजिए।

राजा—रानी! वन बड़ा बीहड़ होता है। वह कठिनाई से तय किया जाता और काँटों से भरा होता है। तुम उसमें चल नहीं सकोगी।

रानी—नहीं महाराज! वहाँ मुझे कुछ भी कष्ट नहीं होगा। उलटे, आपके छोड़ जाने से, मैं अधिक दुःख पाऊँगी। महाराज! क्या आप मुझे केवल सुख की संगिनी-वसन्त की कोयल समझते हैं? आपका सुख ही मेरा सुख है और आपका दुःख ही मेरा दुःख है। क्या स्त्री का यही धर्म है कि सुख पाकर तो वह तृप्त हो और दुःख में साथ छोड़कर अधर्म बटोरे? राजन्! आप मुझे क्या इतनी खोटी समझते हैं? मैं तो जानती हूँ कि आप बड़े धर्मात्मा और विवेकी हैं; किन्तु राज्य की अवस्था बदलने के साथ-साथ क्या आपके मन का भाव भी बदल गया? नहीं तो, ऐसे प्रेम से भरे हृदय पर अनादर और रुखाई की छाया क्यों पड़ी? आप जिसको इतना प्यार करते हैं आज उसका इतना निरादर क्यों? महाराज! मैं कमसमझ स्त्री हूँ; अगर भूल से आपके साथ कोई बेजा बर्ताव किया हो तो क्षमा कीजिए। नाथ! मछली को पानी से बाहर निकालकर ख़ूब मुलायम राजगद्दी पर बिठा देने से क्या उसके साथ ठीक व्यवहार होगा? आप ज्ञान-गुरु बृहस्पति के समान हैं। भला आपसे मैं क्या कह सकती हूँ? फिर भी कहती हूँ कि मुझे नैहर जाने की आज्ञा मत दीजिए। स्वामी के साथ [ २४४ ]छाया की तरह रहने में ही स्त्री का मान है। स्वामी के मेहनत करने से, जब पसीना आ जावे तब उसे आँचल की हवा से दूर करना स्त्री का काम है। दया करके मेरे उस सौभाग्य को और कर्तव्य के अधिकार को छीन न लीजिए।

राजा और कुछ नहीं कह सके। उन्होंने कहा—चिन्ता! मेरी प्राणप्यारी चिन्ता! तुम मेरे साथ चलो। तुम मेरे काम में साधना हो, निराशा के समय ढाढ़स हो, जीवन में प्रेम हो; तुम मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें और कुछ नहीं कहूँगा। मैं समझ गया कि शक्ति के अंश से स्त्री उत्पन्न होती है, वह सुख के सरोवर में खिली हुई कमलिनी है और दुःखों के समुद्र में अकेली आश्रयरूपी नौका है।

कल्पित विरह के दुःख से रानी के मुख पर जो मलिनता आ गई थी वह दूर हो गई, उस पर फिर हँसी की झलक आ गई।

राजा ने कहा—रानी! यह शोक-दृश्य अब देखा नहीं जाता। चलो, आज ही हम लोग यहाँ से निकल चलें। कुछ धन-दौलत साथ में ले लें। साथ में धन रहने से कष्ट कुछ घट सकता है।

[९]

अँधेरी रात है। निद्रा देवी की गोद में पृथिवी सोई हुई है। चारों ओर सन्नाटा है। बीच-बीच में रात को घूमनेवाले दो-एक पक्षियों के पंखों की फरफराहट और नगर के बाहर मैदान में गीदड़ों का "हुआँ-हुआँ' शब्द उस सन्नाटे में बाधा डालता है। राजा और रानी दोनों, इसी समय, राजमहल से निकलकर नगर के बाहर आ गये। इस बात का निश्चय नहीं है कि कहाँ जायँगे, तो भी चल पड़े हैं। उस घने अन्धकार में राजा के सिर पर धन की एक गठरी है। रानी चिन्ता स्वामी का हाथ थामकर जा रही है। दोनों में किसी के मुँह से कोई बात नहीं निकलती। राजा के [ २४५ ]हृदय में अचरज है और रानी के हृदय में यह आशङ्का है कि न जाने आज भाग्य में क्या हो।

राजा और रानी ने अचानक नूपुरों की आवाज़ सुनी। इस जङ्गल के रास्ते में, इस अँधेरी रात में, किसके नूपुरों का शब्द है! राजा और रानी ने देखा कि एक बालिका स्वर्गीय किरण से रास्ते में उजेला किये उनके आगे-आगे जा रही है।

राजा ने पूछा—"माँ! तुम कौन हो? इस अँधेरी रात में, हम लोगों के रास्ते में, आगे-आगे रोशनी दिखाती चल रही हो?

वीणा को मात करनेवाले सुर में उत्तर मिला—श्रीवत्स! मैं लक्ष्मी हूँ। मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ। इस अँधेरे में तुम लोग रास्ता भूलकर कष्ट पा रहे थे, इससे मैं रास्ता दिखाने आई हूँ।

श्रीवत्स—माँ, मैं सचमुच रास्ता भूल गया हूँ। माता! क्या मेरे जीवन का रास्ता सदा के लिए छूट गया?

लक्ष्मी—नहीं बेटा! तुम उस रास्ते को नहीं भूले। बग़ल में यह रोशनी की बत्ती है, यही तुमको रास्ता दिखावेगी; आशा को तोड़ो मत। कर्त्तव्य का पालन करते रहो, ग्रह-पीड़ा से घबरा जाना पुरुष का काम नहीं। होतव्यता के साथ झगड़ा करके मनुष्य को असाध्य साधन करना पड़ता है। तुम इस शक्तिमयी की सहायता से असाध्य (जो सिद्ध नहीं होता, उसे) साधने को तैयार हुए हो। बेटा! और तो क्या कहूँ, देवताओं की देवियाँ भी उत्सुकता से तुम्हारी इस साधना की सिद्धि देखने के लिए बाट जोह रही हैं। वत्स! निराश मत हो! ग्रह की पीड़ा को ब्रह्मा भी दूर नहीं कर सकते। तुमको बारह वर्ष तक यह कष्ट भोगना ही पड़ेगा। इसके लिए चिन्ता मत करना। हर घड़ी शुभ अवसर की बाट देखते रहना।

इतने में चन्द्रमा का उदय हुआ। अँधेरे पाख के चन्द्रमा की [ २४६ ]पतलीसी किरण से हाट-बाट में उजेला हुआ। लक्ष्मी ने कहा—श्रीवत्स! चाँदनी हो गई। अब तुम लोगों को रास्ता दिखाई देता है। अब मैं जाती हूँ, किन्तु बेटा! सामने विकट उलझन है, सावधान रहना।

बस लक्ष्मी ग़ायब हो गई।

राजा और रानी ने उस लम्बे-चौड़े मैदान में जाते-जाते देखा कि सामने एक डरावनी नदी तरंगें मार रही है।

पार होने का कोई उपाय न देखकर राजा और रानी उदास मन से नदी-किनारे खड़े हैं। इतने में एक बूढ़ा-सा मल्लाह वहाँ झाँझरी नाव ले आया। राजा ने कहा—मल्लाह! क्या तुम हम लोगों को पार उतार दोगे?

मल्लाह—तुम, इस नदी के पार जाने की हिम्मत करते हो?

राजा—क्यों? क्या यह बात अनहोनी है? नदी पार तो सभी होते हैं। इसमें हिम्मत करने की बात ही क्या है?

"नदी पार तो सभी होते हैं, किन्तु भाग्य की नदी को क्या सब कोई पार कर सकते हैं?" यह कहकर मल्लाह गीत गाने लगा—'करम-गति टारेहु नाहिं टरे।'

राजा ने कहा—अजी मल्लाह! तुम तो बड़े ज्ञानी जँचते हो। हम लोग भटके हुए हैं, हर घड़ी सब बातें समझ में नहीं आतीं। इसी से ग़ोते खाते हैं।

मल्लाह—ग़ोते तो खा ही रहे हो। अब सोच काहे का? अगर नदी पार जाना चाहो तो तुरन्त आओ।

रत्नों की गठरी लिये हुए रानी के साथ राजा आगे बढ़े।

मल्लाह ने कहा—मेरी नाव टूटी हुई है। मुश्किल से दो [ चित्र ]
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राजा-रानी उदास-मन से नदी-किनारे खड़े हैं। इतने में एक बूढ़ा सा मल्लाह, एक टूटी फूटी नाव लेकर वहाँ आया—पृ॰ २४६।

इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग। [ २४७ ]आदमियों को पार उतार सकता हूँ। जो तुम यह गठरी साथ ले चलोगे तो मेरी नाव डूब जायगी।

राजा—अच्छा मल्लाह! एक काम करो। तुम इस गठरी को पहले उस पार रख आना; फिर लौटकर हम लोगों को ले चलना।

बूढ़े ने हँसकर कहा—यही सही।

राजा ने धन-रत्नों की गठरी बूढ़े के हाथ में दे दी। बूढ़ा मन ही मन खुश होकर गुनगुनाता चला—'सुध-बुध सकल भुलानी।'

अचानक राजा ने देखा कि न वह नदी है, न नाव है, न वह मल्लाह है और न वह धन की गठरी ही है। पलक मारते-मारते सब गायब। राजा के कानों में भनक पड़ी—करम-गति टारेहु नाहिं टरै।

तब राजा ने कहा—चिन्ता! सच समझो, यह बूढ़ा और कोई नहीं स्वयं शनि थे। माया फैलाकर, यत्न से बटोरे हुए, मेरे रत्नों को हर ले गये। अब उसके लिए फ़िक्र करना वृथा है। मैं भाग्य की हँसी उड़ाने चला था, किन्तु हँसी करने में वीरता नहीं है—वीरता साधना में है।

रानी ने कहा—पहले जो यह सोचा था कि धन-दौलत विपद को दूर करती है, सो वह बात ठीक नहीं निकली। अच्छा जाने दीजिए, भला ही हुआ। कोई उपाय होने से हो हृदय का बल बढ़ता है, हिम्मत आती है। प्राणनाथ! अब कहाँ जाइएगा?

राजा—कहाँ जाऊँ देवी! चलो, यह जो सामने वन की हरियाली दिखाई देती है उधर ही चलें।

रानी—चलिए महाराज! वन के ऐसी आराम की जगह कहीं नहीं है। वह कोमलता और मधुरता बड़ी सुखदायक होती है। भाव-रस में मन को आराम देती है। वह सुन्दरता तथा गम्भीरता में बहुत बढ़ कर है। चलिए नाथ! इसी वन में चलें। [ २४८ ]

[१०]

राजा और रानी कुछ दूर आगे जाकर, वन में पहुँचे। उन्होंने देखा कि वह वन तरह-तरह के फलदार वृक्षों से पूर्ण है। भूखे श्रीवत्स जङ्गली फलों को बटोरकर एक नदी के किनारे पहुँचे। उन फलों को खाकर तथा नदी के निर्मल जल को पीकर वे कुछ ठण्ढे हुए। रानी चिन्ता ने भी स्वामी की आज्ञा से कुछ जङ्गली फल खाकर पानी पिया। इस प्रकार, वे कुछ स्वस्थ और शान्त होकर बातचीत करने लगे। रानी ने कहा—महाराज! भगवान् का दान अनन्त है, भाग्य का विचार उनके सामने नहीं है। जगत्-पति ने जीवों के लिए दया की अनन्त धारा बहा रक्खी है। उन्होंने अपने बनाये हुए मीठे फलों को, नदियों के नीर को, हवा के झोकों को, नीले आकाश की निर्मलता को, फूलों की सुगन्ध को और चिड़ियों की चहक को—सब जीवों के लिए, समभाव से, बाहर लूटने योग्य बना दिया है, लेकिन जीव, सब समय, उसे भोगकर अपनी ग्लानि को दूर करने नहीं पाता। यह उसका भाग्य है। उस भाग्य के बनानेवाले वे नहीं हैं—कोई और है। महाराज! धिक्कार है हम लोगों को कि जगत्-पिता के मङ्गल-युक्त काम में दोष लगाकर अपने पाप का बोझ बढ़ाते हैं।

राजा—रानी! तुम में ज्ञान ख़ूब है। मैं इस विषय में तुमको अधिक क्या समझाऊँगा। इस असार संसार में माया के बन्धन से मनुष्य सदा व्याकुल रहते हैं। इसी से वे अक्सर जगदीश्वर की निन्दा करते हैं। कर्म-फल से ही भाग्य बनता है। उस भाग्य का विधाता, घट-घट में समाये हुए अनन्त का अंशमात्र है।

रानी—महाराज! आपकी बातों से मुझे सब विषयों में अच्छा [ २५० ]के न पतियाने और क्रोध करने का ख़याल करके वह बहुत घबराई। सोचने लगी कि यह सब शनि की चालें हैं। जो हो, सत्य के रास्ते में मनुष्य को विपद नहीं है।

रानी ने व्याकुल चित्त से राजा के पास जाकर सब हाल कह सुनाया। सुनकर राजा ने कहा—रानी! इसके लिए चिन्ता करने की क्या ज़रूरत? यह सभी, इस अभागे के साथ, निठुर देवता की दिल्लगी है! नहीं तो कहीं भुनी मछली जीकर भागी है? कहीं भयानक बाढ़वाली नदी को नाव और मल्लाह सहित ग़ायब होते देखा है! जो हो, सोच मत करो। अगर तुम मेरे हृदय को पहचानती हो तो खेद करना छोड़ो।

स्वामी के न पतियाने के ख़याल से सती का हृदय व्याकुल था। जब उन्होंने ऐसी बात कही तब रानी ने पुलकित होकर भूखे स्वामी के भोजन के लिए कुछ फल-मूल ला दिया। राजा-रानी दोनों एक जगह बैठकर बातचीत कर रहे हैं। इतने में एक बूढ़ा लकड़हारा आया। उसने प्रणाम कर कहा—क्यों महाशय! आप इतना कष्ट क्यों पा रहे हैं। चलिए, हम लोगों के साथ लकड़ी चुनकर बाज़ार में बेचा कीजिए। तब आप लोगों को कोई कष्ट नहीं होगा।

राजा ने रानी से कहा—"यह सलाह तो बुरी नहीं है।" लकड़ियों का बोझ सिर पर रखकर राजा बाज़ार में बेचने जायँगे, यह सुनकर रानी की छाती टूक-टूक हो फटने लगी। रानी कुछ कह नहीं सकी। राजा ने कहा—देवी! मैं तुम्हारे मन का भाव समझ गया, किन्तु रानी! इस संसार में मनुष्य धन-दौलत लेकर नहीं आया है। जाते समय भी वह कुछ ले नहीं जायगा। पृथिवी का जो कुछ ऐश्वर्य, है, जो कुछ धन-दौलत है, सब अन्त को यहीं पड़ा रहेगा। इस पृथिवी पर आने के पवित्र दिन में, प्रेम-मय परमेश्वर से मनुष्य जो [ २५१ ]प्रीति लाया था कर्मभूमि में उसी प्रीति को घटा-बढ़ाकर वह साथ ले जायगा। देवी! फिर इतना अभिमान और इतना संकोच क्यों? जगत्-पिता ने मुझे यह परिश्रमी शरीर और मन दिया है। यहाँ मेहनत करके जीविका चलाने में दोष नहीं है, बल्कि इसी में बड़प्पन है।

रानी ने आँसू पोंछकर कहा—राजन्! मैं सब समझती हूँ। फिर भी महाराज, मन नहीं मानता। हृदय व्याकुल होकर शोक की धारा बहाता है। क्षमा कीजिए महाराज! भूखों भले ही मर जाऊँगी, परन्तु आपको इतना छोटा काम न करने दूँगी।

राजा—रानी! उतावली मत हो। इससे मुझको कुछ कष्ट नहीं होगा। मैं तुमको पाकर शक्ति पा गया हूँ। मेरे हृदय में बड़ा बल आ गया है। देवी! तुम्हारे प्रेम का कभी न टूटनेवाला कवच मुझे सदा जितावेगा, तुम बेफ़िक्र रहो।

रानी को समझा-बुझाकर राजा बूढ़े लकड़हारे के साथ वन में गये। वहाँ देखा कि वन में बहुतसे चन्दन के वृक्ष लगे हैं। राजा चन्दन की कुछ लकड़ियाँ चुनकर बाज़ार में ले जाते और साथ के लकड़हारों से अधिक दाम पाते। इस तरह कुछ दिन में राजा के पास कुछ रक़म जमा हो गई।

एकदिन रानी ने कहा—"महाराज! आपने लकड़ियाँ बेचकर जो पैसा पाया है वह ज़रूरी ख़र्च से कुछ बच गया है। आपकी आज्ञा हो तो उससे एक दिन सब लकड़हारों और उनकी स्त्रियों को भोजन कराऊँ।" राजा ने खुशी से मंज़ूर कर लिया।

रानी ने राजा से कुल सामान मँगवाया। राजा सब तैयारी करके लकड़हारों को मय जन-बच्चों के न्योता दे आये। लकड़हारों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं है। अब तक वे रानी को केवल 'माँजी[ २५२ ]माँजी' कहकर प्रसन्न होते थे। आज, माता के दिये हुए प्रसाद को पाने की इच्छा से, वे अत्यन्त पुलकित होकर राजा की कुटी में आये और अनेक कामों में उनका साथ देने लगे।

रानी चिन्ता ने तरह-तरह की रसोई बनाई। न्यौते हुए लकड़हारे स्त्री, पुरुष, बालक आदि ठीक वक्त पर भोजन करने बैठे। राजा पास खड़े होकर देखने लगे। चिन्ता साक्षात् अन्नपूर्णा होकर परोसने लगी।

राजा और रानी ने, उस विजन वन में, आनन्द की गृहस्थी बना ली। अब उनको कुछ कष्ट नहीं है। उन सीधे-सादे लकड़हारों का पड़ोस मिलने से राजा का जीवन आनन्द से कटने लगा, किन्तु राजा-रानी का यह सुख शनि देवता से देखा नहीं गया।

[११]

राजा-रानी जहाँ रहते थे उसके पास हो एक छोटीसी नदी थी। बहुतसे सौदागरों की नावें, उस नदी के रास्ते, देशावर को, व्यापार करने आया-जाया करतीं। एक दिन एक सौदागर उसी नदी से जा रहा था। अचानक उसकी नाव रेती में अटक गई। सौदागर ने बड़ी-बड़ी कोशिशें कों; डाँड़ खेनेवाले मल्लाहों ने पानी में उतरकर नाव को ठेलने के लिए बहुत ज़ोर मारा पर नाव किसी तरह नहीं टसकी। इस तरह एक दिन, दो दिन, तीन दिन करके बहुत दिन बीत गये। सौदागर सोचने लगा, यह नाव कैसे चलेगी, किस प्रकार इस विपत्ति से उद्धार होगा।

एक दिन, एक बूढ़ा ब्राह्मण बग़ल में पोथी दबाये और हाथ में छड़ी लिये उस सौदागर के पास आकर बोला—"अजी सौदागर! मैं ज्योतिषी हूँ; मैं बता सकता हूँ कि तुम्हारी नाव कैसे चलेगी।" सौदागर बहुत ख़ुश हुआ। उसने कहा—बाबाजी! अगर आप कृपा [ २५३ ]करके मेरी नाव चलने का उपाय बता दें तो मैं आपको बहुत धन दूँगा।

बूढे ज्योतिषी ने कहा—देखो भैया! पास ही लकड़हारों का एक गाँव है। उस गाँव में एक सती स्त्री है। वह इस नाव को छू दे तो यह तुरन्त चलने लगे। तुम्हारी नाव और किसी तरह नहीं चलेगी।

यह सुनकर सौदागर ख़ुश हुआ। उसने ज्योतिषी को बहुतसा रुपया देकर बिदा किया।

सौदागर ने सोचा कि लकड़हारों के गाँव में बहुतेरी स्त्रियाँ हैं। यह पता लगाना बड़ा कठिन है कि उनमें कौन सती है। उसने उसी दिन उस गाँव की स्त्रियों को न्यौता देने के लिए एक आदमी भेजा।

इसके पहले एक दिन लकड़हारे लोग रानी के न्यौते में राजसी भोजन पाकर तृप्त हुए थे। आज सौदागर के न्यौते को पाकर बड़ी ख़ुशी से न्यौता मानकर वे सौदागर की नाव पर पहुँचे, परन्तु नाव किसी भी तरह नहीं चली। सौदागर ने फ़िक्र करके जो आदमी न्यौता देने गया था उससे पूछा—"क्या तुमने लकड़हारों की सब स्त्रियों को न्यौता दिया था?" उसने विनती कर कहा—हाँ, महाशय! मैंने सबको न्यौता दिया था। केवल एक स्त्री ने न्यौता नहीं लिया। उसने कहा कि बेटा! मेरे स्वामी इस समय बाज़ार में लकड़ी बेचने गये हैं। उनकी आज्ञा बिना मैं तुम्हारा न्यौता कैसे ले सकती हूँ? सिर्फ उसी ने न्यौता नहीं लिया।

सौदागर ने सोचा कि हो न हो वही स्त्री सती है। उसी के छूने से मेरी नाव चलेगी। यह सोचकर वह तुरन्त नाव से उतरकर उस नौकर के साथ श्रीवत्स की कुटी के पास पहुँचा। चिन्ता ने, दोनों अतिथियों के सत्कार के लिए आसन और हाथ-मुँह धोने को [ २५४ ]पानी दिया। सौदागर ने उस सती को साष्टाङ्ग प्रणाम करके कहा—देवी! मैं बड़ी विपत्ति में फँस गया हूँ। मेरी नाव इस नदी की रेती में अटक गई है। एक पखवारा हो गया, मैं यहाँ बड़ा कष्ट पा रहा हूँ। आज एक ज्योतिषी कह गये हैं कि आप उस नाव को छू देंगी तभी वह नाव चलेगी; नहीं तो नहीं। माताजी! एक बार चलकर मेरी नाव को छू दीजिए।

रानी ने कहा—आपके कहने से मुझे अभी वहाँ जाकर आपकी विपद दूर करना चाहिए, किन्तु महाशय! स्वामी की आज्ञा बिना मैं कैसे जा सकती हूँ?

सौदागर ने कहा—माताराम! हम इतने आदमी इतने दिन से कष्ट पा रहे हैं, यह सुनकर भी आपके मन में दया नहीं आती?

चिन्ता और कुछ नहीं कह सकीं। माता का सम्बोधन सुनकर उनकी सारी आशङ्का दूर हो गई। चिन्ता ने सोचा कि मेरी सन्तान पर विपद पड़ी है, मुझे जाना ही चाहिए। धन्य स्त्री का हृदय! प्रेम, आदर और ममता का—स्त्री के हृदय में—त्रिवेणी-सङ्गम है। प्रीति ही स्त्री का प्राण है। स्त्री मातृत्व से ही सार्थक और धन्य है। इसी से आज उसे जंगल में चिन्ता स्वामी की आज्ञा की बाट न देखकर सन्तान की विपद दूर करने चलीं। विकट अभाग्य उनको जाते देख, पीछे से उनकी हँसी करने लगा। मातृत्व के गर्व में भूली हुई चिन्ता देवी, उस ताने-भरी, हँसी को नहीं सुन सकीं।

[१२]

चिन्ता ने नदी में उतरकर स्नान किया। फिर वे भगवान् सूर्य्यदेव को प्रणाम करके बोली—"हे अन्तर्यामी! मुझे ज्योतिषी-द्वारा सौदागर की विपद दूर करने की आज्ञा हुई है। हे लीलामय! सब तुम्हारी ही लीला है।" भगवान् का मधुर नाम