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आदर्श हिंदू २/प्रकरण-३९ काशी की भलाई और बुराई

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आदर्श हिंदू दूसरा भाग
द्वारा मेहता लज्जाराम शर्मा

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प्रकरण--३९
काशी की भलाई और बुराई

काशी भारतवर्ष में दस्ती कारीगरी का केंद्र है। लखनऊ और दिल्ली को छोड़कर हिंदुस्तान में कदाचित् ही ऐसा कोई नगर हो जो काशी की समता कर सके। यद्दपि वहाँ का बना माल वहाँ ही बहुतायत से बिकता है किंतु भारत के अन्य बाजारों में भी वह जहाँ तहाँ बिकता हुआ देखा जाता है, यहाँ तक कि काशी के माल का नफासत में, उत्तमदा में और कारीगरी में, देश भर में सिक्का है। काशीवाले समय के अनुसार इस काम में उन्नति भी करने लगे हैं किंतु एक काम की और अभी तक उनका ध्यान नहीं गया है। यदि वहाँ के व्यवसायी भारतवर्ष के बड़े बड़े नगरों में, विलायत तक में बनारसी माल बेचने के लिये दुकानें खोलें तो माल की माँग बढ़ सकती है, आढ़तियों के नफे से खरीदारों का बचाव हो सकता है और कारीगरों को उत्तेजना मिल सकती है। इतने दिनों के अनुभव से पंडित प्रियानाथ को यही निश्चय हुआ। इन्होंने यह बात अपनी नोटबुक में लिख ली क्योंकि कांता- नाथ अजमेर में जो कार्य आरंभ करना चाहते थे उसके लिये यह लाभदायक थी। [ १६१ ]इतने दिनों के अनुभव से पंडित प्रियानाथ की जो बनारस- वालों के लिये राय हुई उसका मर्म यही है कि काशी यदि बदमाशी में सीमा को पार कर गई है तो यहाँ भलमानसी भी ऊँचे दर्जे की है। यहाँ यदि व्यभिचार के लिये जगह जगह अड्डे दिखलाई देते हैं तो पातित्रत की भी पराकाष्ठा है। एक मोहल्ले में रहकर मील दो मील के फासले पर दूसरे माहल्ले में अपनी आशना को रखाना और उसके पास जाकर नित्य मौज उड़ाना यहाँ के अमीरों का शेवा है, इसमें यदि निंदा नहीं समझी जाती तो ऐसे भी नरनारी यहाँ कम नहीं जो पाप कथाएँ सुनकर "हर हर महादेव" का नामोच्चारण करते हुए कानों में अँगु- लियाँ डाल लेते हैं। यह बात एक दिन प्रियानाथ ने दीनबंधु से स्पष्ट कह भी दी और दोनों को खेद कम न हुआ।

इस तरह काशी भलाई और बुराई का घर है। यह जन- समाज की प्रदर्शिनी है। यदि सब देशों के नर नारी, कम से कम भारतवर्ष के प्रत्येक प्रांत के निवासी एक जगह देखने हों तो इसके लिये काशी से बढ़कर कोई नगर नहीं! यहाँ बंगाली, बिहारी, गुजराती, दक्षिणी, मारवाड़ी, पंजाबी, उड़िया, मद- रासी, कच्छी, सिंधी सब मौजूद हैं। यहाँ युरोपियन, जापानी, चीनी, सिंहाली और दुनिया के पर्दे पर जितनी जातियाँ हैं लगभग उन सबका नमूना मौजूद है। ये लोग केवल यात्रा के लिये, तीर्थस्नान के लिये आकर चले जाते हों सो नहीं। कोई तीर्थ सेवन करके "काशी मरणान्मुक्तिः"
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इस सिद्धांत के अनुसार यहाँ मरने के लिये आते हैं, कोई व्यापार धंधे और नौकरी के लिए आते हैं और कोई विद्योपार्जन के लिये। काशीवासियों की तो कथा ही क्या? जब लोगों का विश्वास है और शास्त्रों के अनुसार विश्वास है कि काशी में आकर अथवा रहकर जा मरता वह फिर जन्म धारण नहीं करता, तो इसमें संदेह नहीं। प्राचीन काल में यह अक्षरश: सत्य था और अब भी इसमें मिथ्यात्व नहीं। हाँ अंतर इतना ही है कि जो यहाँ पर आकर अथवा रहकर सुकार्य में प्रवृत्त होते हैं उन्हें भगवान् शंकर जीवन्मुक्त करके कैलाश में ऊँचा आसन देते हैं और जो बुराई में घुस पड़ते हैं उन्हें मरने पर पिशाच योनि धारण करनी पड़ती है। वे भूत होते हैं, प्रेत होते हैं, नाना प्रकार की यातनाएँ भेगते हैं और फिर दोनों को सताकर पाप के गहरे से गहरे गढ़े में पड़ते हैं। देश के दुर्भाग्य से हमारी करनी से समय के अनुसार ये बातें थोड़ी और बहुत सर्वत्र है किंतु काशी ऐसा क्षेत्र है जहाँ से जैसे स्वर्ग एक सीढ़ी ऊँचा है वैसे ही नरक एक जीना नीचे को है। दोनों ही स्थान यहाँ पर स्वल्प साधन से प्राप्त हो सकते हैं।

बाहर से आकर यहाँ निवास करनेवाला यदि अपने द्रव्य से कालयापन करना चाहे तो उसका तो कहना ही क्या? किंतु भिक्षा से, मधुकारी से, अन्नसत्र में भोजन कर गंगा तीर पर पड़ रहना और दिन रात भगवान् के स्मरण में मन लगाना भी यहाँ अच्छा बन सकता है। केवल इसी के भरोसे यहाँ
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हजारो साधु संन्यास निवास करके वेदांत का अनुशीलन करते हैं और गृहस्थ ब्राह्मणों के बालक संस्कृत का अध्ययन करते हैं। काशी की बुरी हवा लग जाने में उनमें बिगड़ने- वाले, बिगड़कर प्रजापीड़न करनेवाले यदि काम नहीं हैं तो कर्तव्यदक्ष भी थोड़े नहीं। सच्च संन्यासी, सज्जन ब्रह्मचारी भी कम नहीं। यहा रहकर सचमुच सच्चे संन्यस्त आश्रम का पालन करते हुए जीवन्मुक्त हो जानेवाले साधु देखे जाते है और ब्रह्मचर्य इन के व्रती होकर, अन्नसत्र भोजन से अपनी क्षुधा तृप्त करने के सिवाय दिन रात अध्ययन-अध्यापन में बितानेवाले विरागी ब्राह्मण-बालक भी।

काशी में हजार बुराइयाँ हो किंतु इस गुण ने अब भी, इग गए बीते जमाने में भी संसार में काशी का मस्तक ऊँचा कर रखा है। यदि साधु ब्राह्मणों का अटल स्वार्थत्याग उनकी अप्रतिम धर्मभक्ति और असाधारण प्रतिभा काई देखना चाहे ना उसके लिये संसार में काशी से बढ़कर कोई जगह नहीं। देश के एक छोर से दूसरे छोर तक ब्राह्मणों को पानी पी पीकर कोसनेवाले हजारों नई रोशनीवाले मिलेंगे। वे यदि अपनी भ्रांति भेटना चाहें तो काशी में आकर देखें। ब्राह्मण बालकों का नि:स्वार्थ संस्कृत-प्रेम उनकी आँखों के सामने मूर्तिमान् आ खड़ा होगा। किसी अँगरेजी पाठशाला में जाकर एक अबोध बालक से पूछिए कि "बच्चा तू अँगरेजी पढ़कर क्या करेगा?" तो तुरंत उत्तर मिलेगा कि "हम
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डिपुटी कलक्टरी करेंग, वकालत करेंगे अथवा कोई सरकारी उहदा प्राप्त करेंगे।" उनकी यह आशा फलवती हो अथवा न हो, विशेष कर नहीं भी होती है क्योंकि शिक्षा प्रणाली को दोष से आजकल अँगरेजी शिक्षित टके के तीन बिक रहे है किंतु उन्हें जब आशा, ऊँचा पद पाने का लालच, कमाई कर के रुपयों से घर भर देने की आकांक्षा "पहाड़ खोदकर चूहे निकालने" प्रवृत्त करती है तब संस्कृत के विद्यार्थी ब्राह्मण पालकों के लिए कमाई के नाम पर वही ढाक के तीन पात। प्रथम संस्कृत महासागर को पार करना ही कफिन, "इंद्रायोपि यस्याति न यशुः शब्दयानिधे:", फिर यदि अच्छे नामी विद्वान् भी हो गए तो दर्भगा नरेश से एक धोती पा लेने में उनकी कमाई की इतिकर्त्तव्यता। साहित्याचार्य, ज्योतिषाचार्य, नैयायिक दर्शनवेत्ता, कर्मकांडी, तंत्रशास्त्री और सर्व शास्त्र- निष्णात बनकर यदि घ र गाए अथवा कमाई के लिये विदेश ही गए तो केवल भिक्षा, दान अथवा कथा-वार्ता के सिवाय उनकी जीविका नहीं। देशी रजवाड़ों में, देशहितैषी समाजों में उन्हें कोई पुछनेवाला नहीं। ऐसी दशा में, कष्ट सहकर भी, भविष्यत में आशा के नाम पर कसम खाने को कुछ न होने पर भी वे संस्कृत पढ़ने के लिये बीस बीस वर्ष तक सिर तोड़ परिश्रम करते हैं, रूखे सूखे अन्न और फटे पुराने कपड़ों से गुजर करते हैं। इससे बढ़कर स्वार्थत्याग क्या होगा? आजकल नए नए प्रबंध से नए नए गुरुकुल खोले जाते हैं
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किंतु मेरी समझ में यही प्राचीन गुरूकुल का नमूना है। यदि देशहित से झूठा दम भरनेवाले लोग सचमुच संस्कृत के उप- कार से देश का उपकार समझते हों तो वे इन विद्यार्थियों की, विपत्तिसागर में डूबनेवाले ब्राह्मण बालकों की बाँह गह- कर इनके अध्यापन को श्रृंखलाबद्ध करें, संस्कृत के साथ साथ इन्हें अर्थकरी विद्या सिखाने की योजना करें। लंबे लंबे स्कीम बनाने के सिवाय जब धर्म के ठेकेदार लोग गाढ़ निद्रा में सो रहे हैं तब यदि कहा भी जाय तो किससे! इस प्रकार की बातें करते करते पंडित प्रियानाथ और गौड़बोले पंडित दीन- बंधु के सामने रो उठे। उन दोनों के रूदन में अपने आँसू मिलाकर "वास्तव में तुम्हारा कथन यथार्थ है" कहते हुए पंडित दीनबंधु बोले --

"आपने जो कुछ कहा वह विद्यार्थियों के विषय में कहा। विद्यार्थियों की दशा का आपने अच्छा खाका खैंच दिखाया परंतु यहाँ के विद्वानों पर भी तो जरा दृष्टि डालिए। हमारे शास्त्रों में से ऐसा कोई विषय नहीं जिसके पारंगत यहाँ विद्य- मान न हों। साहित्य के, न्याय के, ज्योतिष के, वेद के, वेदांत के, वैद्दक के, दर्शनों के, मीमांसा के, सांख्य के और सब ही शास्त्रों के उत्कृष्ट विद्वान्, एक से एक बढ़कर यहाँ आप लोग देख चुके, इतने बढ़कर कि उनकी जोड़ के दुनिया के पर्दे पर नहीं। बड़े बड़े नामी युरोपियन उनसे शिक्षा लेने आते हैं। आने में आश्चर्य भी नहीं। प्रोफेसर मैक्समूलर
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जैसे विद्वान जो युरोपियन समाज में संस्कृत पढ़कर ऊँचा आसन पा चुके हैं स्वयं कहते थे कि "हम लोग संस्कृत महा- सागर की गहराई में घुसना तो दरकिनार किंतु उसके किनारे पर पहुँचने की भी अब तक योग्यता नहीं रखते। हम जो कुछ राय देते हैं वह दूर की कौड़ियाँ बीनकर।" अब जरा यहाँ के विद्वानों की सादगी की ओर नजर डालिए। थोड़े हेर फेर के अतिरिक्त उनका जीवन वही प्राचीन समय के ऋषियों का सा है। वैसे ही वे अल्प संतोषी वैसे ही ब्राह्म- णोचित पट्कर्मों में निरत। इनके यहाँ विद्यादान के लिये सदाव्रत, गुरुकुल मौजूद है। कोई भी विद्यार्थी चला आवे उसे पढ़ाने में कभी उन्हें इंकार नहीं। इनके घर बालकों के अध्ययन घोष से निनादित रहते हैं, जो वैश्वदेवादि नित्य और नैमित्तिक यज्ञों के समय "स्वाहा" से और आद्धादि की विरियाँ "स्वधा" के कर्णमधुर स्वरों से गुंजायमान हैं, जहाँ जाकर दस मिनट खड़े रहने से कहीं वेदमंत्रों से काम पवित्र होते हैं तो कहीं साहित्य शास्त्र की रचना "किंकवेस्तस्य काव्येन किं कांडेन धनुष्मता। परस्य हृदये लग्ने न धूर्णयति यच्छिरम्।।" इस लोकोक्ति से सिर हिल उठता है। उनकी दशा भी, आर्थिक स्थिति भी वैसी ही है जैसी विद्यार्थियों की। उनसे भी निकृष्ट। क्योंकि विद्यार्थियों को पेट पालने का कुछ भार नहीं किंतु उन्हें गृहस्थी का पालन करना है। ऐसी दशा में उनकी दी हुई व्यवस्था पर यदि लोग दोष देते हैं तो उनकी भूल है।" [ १६७ ]"हा महाराज सत्य है। परंतु तीर्थगुरुओं की यहाँ भी दुर्दशा देखी। उनके लिये कमाई का मार्ग खुला रहने पर भी वे अपने बालकों को नहीं पढ़ाते। और साधुओं को भी अध्ययन का कोई स्वतंत्र प्रबंध नहीं।"

'नहीं है! इन दोनों के लिये पाठशालाएँ खुली हैं और अब सबसे बढ़कर भरोसा हिंदू विश्वविद्यालय पर किया जाता है। तीर्थगुरुओं में जैसे आप मथुरा, प्रयाग और काशी, गया में निरक्षर भट्टाचार्य, कुकर्मी और खोटे पाते हैं वैसे इनमें अच्छे भी हैं और जो हैं वे बहुत ही अच्छे हैं।'

"बेशक ठीक है परंतु क्या हिंदू विश्वविद्यालय से यह काम सिद्ध हो सकता है? यदि हो सके तो समझना होगा कि देश का सौभाग्य है। नहीं तो काशी में बड़े बड़े कई एक कालेज हैं, भारतवर्ष में कोड़ियों कालेज हैं, हजारों स्कूल हैं।"

"आशा तो अच्छी ही करनी चाहिए।"

"भरोसा तो ऐसा ही है। परंतु महाराज जो सरस्वती प्रयाग में सितासित संगम के साथ गुप्त रूप होकर बहती हैं उसका यहाँ प्रकट प्रवाह देख पड़ा। जिधर निकल जाइए उधर ही संस्कृत का अँगरेजी का एवं अन्य भाषाओं का धारा प्रवाह है। वास्तव में काशी विद्यामंदिर है। जैसे यहाँ भगवान् भूतभावन का और भागवती भगोरथी का निवास है वैसे ही यहाँ के हजारों आदमियों के मुख में, हृदय में सरस्वती विराजमान है। प्रत्यक्ष है। जहाँ भगवती ने विद्वानों के,
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विद्यार्थियों के हृदयमंदिर में डेरा कर लिया है वहाँ यदि प्रत्यक्ष मंदिर न भी हो तो कुछ चिंता नहीं। मूर्तिपूजा का यह प्रत्यक्ष उदाहरण है।"

ये बातें उस समय की हैं जब ये तीनों एक साथ काशा की गलियों में, विद्वानों के विद्यामंदिरों में उनकी कुटियों में, गंगातट पर सरस्वती की आराधना करके अपने नयनों को तृप्त, अपने हृदयों को पवित्र और इस तरह कृतकृत्य करने के लिये विचर रहे थे। ऐसे आज का कार्य समाप्त हुआ। आज प्रियंवदा का साथ ले जाने की आवश्यकता नहीं थी। आज भगवानदास के साथ जाने से कुछ लाभ नहीं था किंतु आज की यात्रा का हाल उन लोगों को समझाकर उन्हें अवश्य संतुष्ट कर दिया गया और तब कल वरूणासंगम पर एक दो महात्माओं के दर्शन के लिये जाना निश्चय हुआ।


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आ० हिं० -- ११