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आदर्श हिंदू २/प्रकरण-४४ श्राद्ध पर शास्त्रार्थ

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आदर्श हिंदू दूसरा भाग
द्वारा मेहता लज्जाराम शर्मा

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प्रकरण--४४
श्राद्ध पर शास्त्रार्थ

गत प्रकरण में लिखा हुआ नोटिस पढ़ते ही पंडित प्रिया- नाथ ने अपने बँधे बंधाए विस्तर खेल दिए, इक्कों में रक्खा हुआ सामान उतार लिया और निश्चय कर लिया कि जब तक इस चिनौती का निराकरण न हो जाय यहाँ से चलना उचित नहीं। इससे यह न समझ लेना चाहिए कि उनको १००० पाने का लोभ आ गया। नहीं! यह लोभी नहीं थे। उन्होंने उसी समय वाचस्पति से मिलकर प्रतिज्ञा कर ली, करा ली थी कि यह द्रव्य यदि मिल जाय और मिल ही जाना चाहिए, तो लोकोपकार में लगाना। वाचस्पति ने इस सिलसिले में और भी रूपया इकट्ठा हो जाने की आशा दी क्योंकि यह सवाल केवल एक हजार रुपए का ही नहीं था। इसके फैसले पर समस्त गयावालों की जीविका का दारमदार था। यदि हार हो जाय तो उनके चूल्हों में पानी पड़ जाने का भय था। इस कारण लोगों में बड़ा जोश फैल गया था। सबसे पहले मदद देने को पंडित जी के गयागुरू जी ही तैयार हुए। उनका अनुकरण औरों ने किया और इस तरह एक अच्छी रकम इकट्ठी हो गई। किंतु क्या केवल रुपया ही इकट्ठा होने से बाजी जीत सकते हैं? शास्त्रार्थ करने के लिये विद्वान् चाहिए
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और गयावालों में इने गिनें को छोड़कर पढ़ने लिखने की सौगंद थी। जो थोड़े बहुत पढ़े भी थे वे वैसे ही काम चलाऊ। बस इसलिये सारा भार प्रियानाथ और गौड़बोले पर आ पड़ा। इन दोनों में अग्रणी पंडित जी और सहायक गौड़बोले। परिणाम में प्रतिपक्षी दाँत न दिखला जाय इस- लिये रुपया एक जगह अमानत रखवा दिया गया। शास्त्रार्थ लेखबद्ध करना निश्चय हुआ, जबानी जमा खर्च से किसी न किसी के मुकर जाने का भय था। इतना होने पर मध्यस्थ नियत करने की पंचायत पड़ी। बहुत वाद विवाद के बाद बुध गया के बैद्ध पुरोहित मिस्टर अनुशीलन एम्. ए. मध्यस्थ बनाए गए। यह विलायत की आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एम. ए. थे। वहाँ इन्होंने संस्कृत में ही एम्. ए. पास किया था। इसके अतिरिक्त यह स्वर्गीय अध्यापक मैक्समूलर के शिष्य थे और आठ वर्ष तक काशीवास करके इन्होंने अध्य- यन अध्यापन से अच्छी योग्यता संपादन कर ली थी।

शास्त्रार्थ आरंभ हुआ। कार्यारंभ में परमेश्वर की स्तुति करके वादी ने कहा -- "हमारा प्रश्न नोटिस में स्पष्ट रूप से व्यक्त हो चुका है। अब उत्तर देने का आपको अधिकार है।"

"बेशक! परंतु उत्तर देने के पूर्व बातों का स्पष्टी- करण हो जाना चाहिए। आपके प्रश्न से यह तो साफ हो गया कि आप ईश्वर को निराकार मानते हैं किंतु यह भी बतला
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दीजिए कि आप पुनर्जन्म मानते है अथवा नहीं? स्वर्ग और नरक मानते हैं अथवा नहीं?"

"वास्तव में हम पुनर्जन्म को मानते हैं और बहस न बढ़ाकर अपने असली प्रश्न का उत्तर पाने के लिये स्वर्ग और नरक को भी मान लेंगे ताकि विषयांतर न हो जाय।"

"आप शायद चारों वेदों को, मनुस्मृति और गीता को और इतिहास दृष्टि से महाभारत तथा वाल्मीकीय रामायण को प्रामाणिक माननेवाले हैं? परंतु वेद शब्द से मंत्र और ब्राह्मण दोनों को मानते हैं अथवा कंवल मंत्रभाग को?"

"अवश्य हम इन्ही ग्रंथों को प्रमाणभूत मानते हैं परंतु ब्राह्मण भाग को ईश्वर कृत नहीं, मनुष्य कृत मानते हैं। आपको मंत्र भाग के ही प्रमाण देने चाहिएँ।"

"यदि आप ब्राह्मण भाग को वह न मानें तो हमारा नहीं, आपका भी समस्त कर्मकांड लोप हो जाय। इसका पहले एक बार बूँदी में और एक बार काशी में निर्णय हो चुका है। काशी में राजा शिवप्रसाद सी. एस्. आई. की स्वामी दयानंद जी सरस्वती से लिखा पढ़ी थी और उसमें मध्यस्थ डाकृर थीयो थे और बूँदी में आपके दो विद्वानों से बूँदी के पंडितों का शास्त्रार्थ था और संस्कृत के धुरंधर विद्वान्, धाराप्रवाह संस्कृत संभाषण करनेवाले स्वर्गवासी महाराजाधिराज महाराज राजा श्रीरामसिंह जी बहादुर जी. सी. एस. आई., सी. आई. ई.
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माध्यम्थ थे। दोनों शास्त्रार्थों को पढ़ लीजिए। पिष्टपेषण करने से कुछ लाभ नहीं।"

इस पर मिस्टर अनुशीलन ने दोनों शास्त्रार्थ पढ़कर सुनाए और जब व्यवस्था दी कि "मंत्र और ब्राह्मण, दोनों भाग अपौरुषेय हैं, ईश्वर निर्मित हैं। तब फिर शास्त्रार्थ आरंभ हुआ। पंडित प्रियानाथ जी बोले --

"अच्छा हुआ। एक बहुत बड़ा झगड़ा सहज में निपट गया। हाँ! तो आपके विचार से तर्पणादि में दिया हुआ जल और श्राद्धादि में दिए हुए पिंडादि पित्तरों के पास नहीं पहुँच सकते। क्योंकि जब ईश्वर निराकार है तब पितर भी निराकार होने चाहिएँ और फिर पितरों के पास जल और पिंड पहुँचा देने के लिये कोई डाक का महक्मा भी तो नहीं जो पारसल बनाकर पहुँचा दे। अच्छा ठीक है। आप यों ही मानते रहिए। हमारे विचार से ईश्वर साकार भी है और निराकार भी है। समय पर निराकार का साकार हो जाता है और साकार से निराकार। परंतु यदि थोड़ी देर के लिये ईश्वर को और उसके साथ हमारे पितरों को भी निराकार ही मान लें तो प्रथम तो हम जो कुछ कराते हैं उसे "पितरस्वरूपी जनार्द्दन प्रीयताम्" इस सिद्धांत से परमेश्वर के अर्पण करते हैं। इस सिद्धांत में पितर निमित्त हैं और ईश्वर परिणाम। दूसरे आप देखते हैं कि तर्पण का जल और श्राद्ध के पिंड प्रत्यक्ष नहीं पहुँचते उनका फल, उनका सार पहुँचता है और वह निरा-
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कार है, फिर निराकार के निराकार में लय हो जाने में क्या आपत्ति हुई। यदि उनका फल भी पहुँचना न माना जाय तो आपके पूर्व पुरुषों को दस बीस गालियाँ दे देने दीजिए। आप स्वयं उछल पड़ेंगे। फिर जब गालियाँ पहुँचती हैं तब वेद मंत्रों से पवित्र किए हुए पदार्थों का फल क्यों नहीं पहुँ- चेगा? तीसरे जब साकार सूर्य भगवान् संसार को तपाकर जलीय पदार्थ को शोषण करते हैं, उस समय वह जल परमाणु रूप में निराकार ही बोध होता है किंतु फिर बादल बनकर वर्षा में जैसे साकार बन जाता है वैसे ही जन्तु और पिंडों का निराकार सार यदि पितरों के पास पहुँचकर सरकार बन जावे तो इसमें आपत्ति क्या है? चौथे हवन को तो आप भी मानते और हम भी मानते हैं। आपके और हमारे मानने में भेद अवश्य है। आप उस वायु शुद्ध करने के लिये करते हैं और हमारे हव्य का वही निराकार सार पवन को शुद्ध करता हुआ देवताओं को मिलता है। परंतु जब आपका होम केवल वायु को शुद्ध करनेवाला है तब आहुति आहुति पर वेद के मंत्रों का उच्चारण करने की क्या आवश्यकता है? वेदी बनाकर ढकोसला करने से क्या लाभ है? जब वायु का शुद्ध होना ही इसका फल है तब एक जगह आग जलाकर उसमें मन दो मन घृत, दो चार मन चंदन जला दीजिए और वेद मंत्रों के बदले यदि कबीर ही गाया जाय तो क्या हानि है? इसमें न त उन मंत्रों के देवताओं को अपना अपना
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भाग लेने का श्रम उठाना पड़ेगा और न अध्वर्यु होता ब्रह्मा बनने- वाले नई टकसाल के ब्राह्मणों को दक्षिणा हमारे देवताओं के पास यज्ञ की अग्नि डाक बनकर जैसे हवि पहुँचाती है वैसे ही सूर्यनारायण श्राद्ध का पिंडादि पहुँचाने में पोस्ट बन जाते हैं।"

"परंतु आपके पितर जब अपने अपने कर्मों के फल स्वयं- भोग रहे हैं फिर श्राद्ध करने से लाभ ही क्या?"

"बड़ा भारी लाभ है। यदि लाभ न हो तो मुसलमान और ईसाई आपने पूर्वजों की कवरों पर पुष्प क्यों चढ़ावें? कबरों के निकट बैठकर घंटों तक रोबें नहीं। इसलिये केवल श्राद्ध करनेवाले हम ही नहीं हैं, संसार की समस्त जातियां किसी न किसी रूप में श्राद्ध अवश्य करती हैं। श्राद्ध श्रद्धा से बना है। करनेवाले के अंतःकरण में यदि श्रद्धा हो, अपने पितरों पर वास्तविक भक्ति हो तो जिसके लिये किया जाय उसको और करनेवाले को, दोनों को फल मिलता है, उसकी मानसिक शक्ति बढ़ती है और उसका प्रभु-चरणों में प्रेम बढ़ता है। यह बात अनुभवगम्य है। करके देख लीजिए।"

"व्यर्थ ढकोसला है। जैसे मूर्तिपूजा ने देश को चौपट कर दिया वैसे ही श्राद्ध भी कर रहा है। दरिद्री देश है। फिजूल ठगा जाता है! यदि श्राद्ध का फल अवश्य ही मिलता हो तो कभी हमारे पूर्व जन्म के पुत्र द्वारा श्राद्ध किए जाने पर हमारा पेट बिना खाए इस जन्म में भर जाना चाहिए। डकारें आनी चाहिएँ।"

आ०हि० -- १४ [ २१७ ]"बेशक बिना खाए पेट भर जाता है, ढकारें आने लगती है।" इतने ही में दर्शकों ने एक स्वर से, उच्चस्वर से कहा -- "हाँ आती हैं। कभी कमी आती हैं।" और इसका मध्यस्थ महाशय ने भी अपने अनुभव से अनुमोदन किया। तब पंडित जी फिर कहने लगे --

"नहीं मूर्तिपूजा ढकोसला नहीं है। उसने देश का अप- कार नहीं, उपहार किया है। इसके लिये बहस करने से विषयांवर हो जायगा और तुरंत ही मध्यस्थ महाशय मुझे रोक देंगे किंतु इतना कहे बिना मैं आगे नहीं बढ़ सकता कि बिना मूर्ति के ध्यान नहीं हो सकता। इष्ट का आराधन करने के लिये लक्ष्य की आवश्यकता है। निराकार का लक्ष्य नहीं। और यदि निराकार भी माना जाय तो रेखागणितवाले निरा- कार बिंदु को बोर्ड पर साकार लिखे बिना कदापि आगे नहीं बढ़ सकते। जिसकी लंबाई चौड़ाई नहीं वह बिंदु, बिंदु की यही परिभाषा है किंतु खड़िया से बोर्ड पर जो बिंदु लिखा जाय उसका कम से कम आकार अवश्य होता है और अक्षर जो लिखे जाते हैं वे भी निराकार के आकार है।"

पंडित जी के मुख से इस विषय में और भी कुछ निकलने- वाला था किंतु मध्यस्थ महाशय ने -- "हाँ सत्य है। परंतु विषयांतर में चले जाइए।" कहकर उनको रोका तब वह फिर बोले --

"अच्छा मूर्तिपूजा के विषय में यदि आपको संदेह हो तो
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स्वर्गीय पंडित अंबिकादत्त व्यास कृत "मूर्ति-पूजा" पुस्तक देख लीजिए।"

"अपने युक्तियों ही युक्तियों से हमारा समय नष्ट कर डाला किंतु वेदादि शास्त्रों का प्रमाण अब तक एक भी देते न बना।"

"नहीं साहब, एक नहीं। दस बीस! अनेक! आप रामायण को मानते हैं। उसमें अगर भगवान् मर्यादापुरुषोत्तम रामचंद्र ने अपने पिता का श्राद्ध किया है। महाभारत में एक जगह नहीं, अनेक स्थलों पर ऐसा उल्लेख है। भगवग्दोता को तो आप मानते है ना? उसमें भगवान् श्रीकृष्ण- चंद्र से स्वयं अर्जुन ने कहा है। अच्छ -- "लुप्तपिंडोदक- किया:' का क्या मतलब है? खैर अनुस्मृति तो आपका प्रमाण ग्रंथ है। उसमें लिखा है कि --

ॠषिप्रज्ञं देवयज्ञ भूतयज्ञं च सर्वदा,
तृयज्ञं पितृयज्ञ च यथाशक्ति न हापयेत्॥
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञ पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।
होमो देवा बलिर्भौतो वृयज्ञोऽतिथि पूजनम्॥
स्वाध्यायेनार्चयेतर्धीन होमैर्देवान्यथाविधि।
पितृच्छाद्धैश्च नृनन्नैर्भूतानि बलिकर्मणा॥
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा।
पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन्॥"

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"ॠषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नरयज्ञ, पितृयज्ञ -- इन्हें सर्वदा

यथाशक्ति करते रहना चाहिए। विद्या पढ़ाना ब्रह्मयज्ञ, तर्पण पितृयज्ञ देवयज्ञ, होम, भूतयज्ञ बलि और नरयज्ञ अतिथि- पूजन है। ऋषियों का अर्चन स्वाध्याय से, देवताओं का यथाविधि होम करके, पितरों का श्राद्ध द्वारा, मनुष्यों का अन्नदान में और भूतों का बलि प्रदान से पूजन करना चाहिए। अन्न से, जल से, दूध से, मूल से और फल से पितरों की प्रीति सम्पादन करने के लिये श्राद्ध नित्य प्रति करना योग्य है।"

"नहीं! नहीं! असली ग्रंथों के ये बचन नहीं हैं। स्वार्थियों ने पीछे से बढ़ा दिए होंगे।"

"नहीं! जनाब नहीं! पीछे से नहीं बढ़ाए है! पीछे से बढ़ाने का प्रमाण क्या है ? यों "मीठा मीठा गप गप और क. डुवा क. डुवा थू थू" करने से काम नहीं चलेगा। ग्रंथ में अपने मतलब के वचन प्रमाण मानना और जिनसे अपनी हार होती हो उन्हें क्षेपक बतला देना अन्याय है। कोई भी बुद्धिमान् इसे स्वीकार नहीं करेगा।"

इस पर फिर मध्यस्थ महाशय ने कहा -- "वास्तव में यथार्थ है। यदि इन वचनों को नहीं मानना था तो मनु- स्मृति को ही क्यों माना?" तब फिर पंडित जी बोले --

"अजी साहब, केवल मनुस्मृति में क्यों ये लोग तो अपने बनाए ग्रंथों में भी क्षेपक बताने लगते हैं। सत्यार्थ-
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प्रकाश को पहले संस्करण में श्राद्ध की विधि थी किंतु अपनी बात गिरती देखकर दूसरे संस्करण में उसे निकाल दिया, खारिज कर दिया गया।"

इस पर मध्यस्य महाशय मुसकुराए और साथ ही प्रतिवादी महाशय झेंपे भी। फिर उन्होंने कुछ खिसिया- कर कहा --

"अच्छा! आप वेद के प्रमाण तो दीजिए। यों टाल- मटोल करने से काम नहीं चलेगा। वृथा बकवाद करने से कोई लाभ नहीं।"

"हाँ साहब, लीजिए। लिखते जाइए। समझते जाइए घबड़ाइए नहीं। वेद मंत्र लीजिए --


ये च जीवा ये च मृता ये च जाता ये च याज्ञियाः,
तेभ्यो धृतस्य कुल्यैतु मधुधारा व्युदंती। अथर्व १८।४।५७
ये निखाता, ये परीप्ता, ये दग्धा, ये चोद्धिता:,
सर्वां स्तनग्न आहद पितृन् हविषे अन्तवे। अथर्व १२२।३४
ये अग्निदग्घा, ये अनग्निदग्घा, मध्ये दिवः स्वधया
मादयंते, स्वं ता निवेस्थयति ते जातवेदः स्वधया यज्ञं

स्वधिति जुषंताम्।
३५
 


स्वमग्नं ईडितः कव्यवाहना वाड्ढव्यानि सुरभोणि कृत्वी
प्रादा: पितृभ्यः स्वधयाते अक्षन्नद्विस्वंदेव प्रयाताहवीणषि।

ॠग्वेद ६६
 
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ये चक्ष पितरो ये च नेहयाश्च विद्मया णाँउचनप्रविद्म

वेत्ययति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञऽ सुंकृतंजुषस्व।

ऋग्वेद ६७"
 

मर्मानुवाद

"जो जीवित हैं, जो मृतक हो गए, जो उत्पन्न हुए हैं और जो यज्ञ करनेवाले हैं उनके लिये घृत की कुल्या मधु- धारा प्राप्त हो। हे अग्नि, जो पितर गाड़े गए हैं, जो पड़े रहे हैं, जो अग्नि से जलाए गए अथवा जो फेंके गए हैं उन सबके लिये हवि भक्षण करने को सम्यक् प्रकार से ले जाओ। जो अग्नि में जलाए गए हैं और जो नहीं जलाए गए हैं अथवा जा हवि भक्षण करके स्वर्ग में आनंन्दित है, है अग्नि, उनके अर्थ सेवन करने को ले जाओ क्योंकि तुम उन्हें जानते हो। हे कव्यवाहन अग्नि, तुम देवताओं और ॠत्विजों से स्तुत किए गए हो। तुमने हवियों को सुगंधित करके धारण किया है। पितृमंत्रों से पितरों के लिये दिया गया है और उन पितरों ने भी भक्षण किया है। अब तुम भी शुद्ध हवि को भक्षण करो। ये जो पितर इस लोक में (अन्य) देह धारण करके वर्तमान हैं, जो इस लोक में नहीं अर्थात् स्वर्ग में हैं, जिन पितरों को हम जानते अथवा स्मरण न होने से नहीं जानते, हे अग्नि, वे जितने पितर हैं उन सबको तुम सर्वज्ञ होकर जानते हो। उन पितरों को अन्नों से शुभ यज्ञ में सेवन करो।" अब इससे अधिक चाहिए तो पंडित ज्वालाप्रसाद मिश्र का "दयानंद
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तिमिर मारकर देख लीजिए, "महताब दिवाकर" देख लीजिए और छोटे मोटे नेक ग्रंथों का अनुशीलन कर लीजिए ताकि आपको वेदों में प्रमाण ढूँढ़ने में सुगमता पड़े।

"अजी हजरत, आपके पुरखा तो फल्गू में से हाथ निकाल- कर स्वयं पिंड ग्रहण क्रिया करते थे ना? अब कहाँ गए? अब भी तो कहीं दिखलाई देते होंगे।"

"हाँ हाँ! केवल हाथ निकालकर ही क्यों? स्वयं समक्ष खड़े होकर ले सकते हैं। पितर तो पितर, ब्रह्मादिक देवता ले सकते हैं। स्वयं आपके निराकार परमात्मा साकार बनकर ले सकते हैं। उन्होंने एक बार नहीं हजारों बार अवतार लेकर भक्तों का उपकार किया है। श्रद्धा मात्र चाहिए, सदाचार चाहिए, अनन्य भक्ति चाहिए और परमेश्वर के चरणारविदों में लैा लगाने के लिये मानसिक शक्ति चाहिए। जनाव, हाथी के दाँत दिखाने के और और खाने के और हैं। आपमें से यह (एक की ओर इंगित करके) स्वयं श्राद्ध करा- कर दक्षिणा ले रहे थे और यह (दूसरे को दिखाकर) श्राद्ध कर रहे थे। किंतु सच मानिए आप जैसे अश्रद्ध आस्तिकों से नास्तिक और डावाँडोल नास्तिक से आस्तिक अच्छा है। आप न इधर में न उधर में। जो आज डंका पीटने आए हो तो कल श्राद्ध करने कराने क्यों गए थे ?"

"केवल आप जैसे हठधर्मियों के दबाव से, घरवालों के संकोच से अथवा निंदा के भय से। नहीं तो श्राद्ध में कुछ लाभ नहीं।" [ २२३ ]
तब आप लोगों में मानसिक शाक्ति बिलकुल नहीं! शायद माता पिता जब अति वृद्ध हो जायँ तब उन्हें आप खाने को भी न दें। क्योंकि उन्हें देने से कुछ लाभ नहीं। बेशक आप लाभ के बिना बात भी नहीं करते। मुशकिल तो यह है कि उन लाभों का सुझाने के लिये कोई शिक्षक भी परदेशी होना चाहिए जो आपको बतलावे कि गले का कफ हटाने को आचमन और सुस्ती छुड़ाने को मार्जन किया जाता है। और जब आपसे पूछा जाय कि गले का काफ हटाने के लिये आच- मन की जगह लोटा भर पानी पी लो और यदि स्नान से सुस्ती न छूटी तो मार्जन से क्या छूटेगी तो आप बगलें झाँकने लगें। खैर इसी तरह कोई दिन कोई न कोई श्राद्ध का भी ऐसा ही मतलब समझानेवाला मिल जायगा, तब तक किए जाइए। छोड़िए मत। "अकरणान्मंदकरण श्रेय:।"

"अच्छा आप ही बतलाइए"

"हमें तो जो कुछ बतलाना था बतला दिया। वेद मत से, जिस सिद्धांत के अनुकूल धर्म समझकर हम लोग करते हैं सो सब कह दिया। हमारी पूर्व पुरुषों पर भक्ति है इसलिये करते हैं, इस सिलसिले में उनके गुणों का स्मरण करके अपना मन पवित्र करते हैं, उनके गुणों का अनुकरण करने का प्रयत्न करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार शास्त्र के प्रमाणों से उनका उद्धार करने के लिये करते हैं। जैसी श्रद्धा वैसा फल। फल जो मिल रहा है प्रत्यक्ष है, अनु-
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भवगम्य है। अभ्यास करके देखिए। चित्त की एका- ग्रता चाहिए।"

इस तरह के वाद विवाद के बाद मध्यस्थ महाशय ने जो फैसला सुनाया उसका सार यही है --

"श्राद्ध युक्ति प्रमाणों से, वेदादि ग्रंथों के मत से सिद्ध हो गया। नोटिस के अनुसार एक हजार रुपया पंडित प्रिया- नाथ को दिला दिया जावे।"

इस पर पंडितजी ने मध्यस्थ को, प्रतिपक्षियों को और श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए कह दिया कि "यह एक हजार और एक हजार रूपया मेरी ओर से, यों दो हजार रुपया यहाँ ही गयाजी में किसी लोकोपकार के लिये है।" ऐसा कहते ही "वाह वाह! धन्य! शाबाश!" के गगनभेदी उच्चा- रण के साथ सभा विसर्जित हुई।


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