कर्मभूमि/तीसरा भाग १३

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद
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१३


सुखदा घर पहुँची, तो बहुत उदास थी। सार्वजनिक जीवन में हार का उसे यह पहला ही अनुभव था और उसका मन किसी चाबुक खाये हुये अल्हड़ बछेड़े की तरह सारा साज और वम और बन्धन तोड़-ताड़कर भाग जाने के लिए व्यग्र हो रहा था। ऐसे कायरों से क्या आशा की जा सकती है! जो लोग स्थायी लाभ के लिए थोड़े से कष्ट नहीं उठा सकते, उनके लिए संसार में अपमान और दुःख के सिवा और क्या है?

नैना मन में इस हार पर खुश थी। अपने घर में उसकी कुछ पूछ न थी, और अब तक अपमान ही अपमान मिला था, फिर भी उसका भविष्य उसी घर से सम्बद्ध हो गया था। अपनी आँखें दुखती है, तो फोड़ नहीं दी जातीं। सेठ धनीराम ने जो जमीन हजारों में खरीदी थी, थोड़े ही दिनों में उसके लाखों में बिकने की आशा थी। वह सुखदा से कुछ कह तो न सकती थी; पर यह आन्दोलन उसे बुरा मालूम होता था। सुखदा के प्रति अब उसकी वह भक्ति न रही थी। अपनी द्वेष-तुष्णा शान्त करने के ही लिए तो वह नगर में आग लगा रही है! इन तुच्छ भावनाओं से दबकर सुखदा उसकी आँखों में कुछ संकुचित हो गयी थी।

नैना ने आलोचक बनकर कहा--अगर यहाँ के आदमियों को संगठित कर लेना इतना आसान होता, तो आज यह दुर्दशा ही क्यों होती।

सुखदा आवेश में बोली--हड़ताल तो होगी, चाहे चौधरी लोग मानें या न मानें। चौधरी मोटे हो गये हैं और मोटे आदमी स्वार्थी हो जाते हैं।

नैना ने आपत्ति की--डरना मनुष्य के लिये स्वाभाविक है। जिसमें पुरुषार्थ है, ज्ञान है, बल है, वह बाधाओं को तुच्छ समझ सकता है। जिसके पास व्यंजनों से भरा हुआ थाल है, वह एक टुकड़ा कुत्ते के सामने फेंक सकता है। जिसके पास एक ही टुकड़ा हो, वह तो उसी से चिमटेगा।

सुखदा ने मानों इस कथन को सुना ही नहीं--मन्दिर वाले झगड़े में न जाने सभों में कैसे साहस आ गया था। मैं एक बार फिर वही कांड दिखा देना चाहती हूँ।

नैना ने काँपकर कहा--नहीं भाभी, इतना बड़ा भार सिर पर मत
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लो। समय आ जाने पर सब कुछ आप ही हो जाता है। देखो, हम लोगों के देखते-देखते बाल-विवाह, छूत-छात का रिवाज कितना कम हो गया। शिक्षा का प्रचार कितना बढ़ गया। समय आ जाने पर गरीबों के घर भी बन जायेंगे।'

'यह तो कायरों की नीति है। पुरुषार्थ वह है, जो समय को अपने अनुकूल बनाये।

'इसके लिए प्रचार करना चाहिए।'

'छ: महीनेवाली राह है।'

'लेकिन जोखिम तो नहीं है।'

'जनता को मुझ पर विश्वास नहीं है।'

एक क्षण बाद उसने फिर कहा--अभी मैंने ऐसी कौन-सी सेवा की है कि लोगों को मुझ पर विश्वास हो। दो-चार घण्टे गलियों का चक्कर लगा, लेना कोई सेवा नहीं है।

'मैं तो समझती है, इस समय हड़ताल कराने से जनता की जो थोड़ी बहुत सहानुभूति है, वह भी गायब हो जायगी।'

सुखदा ने अपनी जाँघ पर हाथ पटककर कहा--सहानुभूति से काम चलता, तो फिर रोना किस बात का था। लोग स्वेच्छा से नीति पर चलते तो कानून क्यों बनाने पड़ते। मैं इस घर में रहकर और अमीर का ठाट रखकर जनता के दिलों पर काबू नहीं पा सकती। मुझे त्याग करना पड़ेगा। इतने दिनों से सोचती ही रह गई।

दूसरे दिन शहर में अच्छी खासी हड़ताल थी। मेहतर तो एक भी काम करता न नज़र आता था। कहारों और इक्के गाड़ीवालों ने भी काम बन्द कर दिया था। साग-भाजी की दूकानें भी आधी से ज्यादा बन्द थीं। कितने ही घरों में दूध के लिए हाय-हाय मची हुई थी। पुलिस दुकानें खुलवा रहीं थी और मेहतरों को काम पर लाने की चेष्टा कर रही थी। उधर जिले के अधिकारी-मंडल में इस समस्या को हल करने का विचार हो रहा था। शहर के रईस और अमीर आदमी भी उसमें शामिल थे।

दोपहर का समय था। घटा उमड़ी चली आती थी, जैसे आकाश पर पीला लेप किया जा रहा हो। सड़कों और गलियों में जगह-जगह पानी
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जमा था। उसी कीचड़ में जनता इधर-उधर दौड़ती फिरती थी। सुखदा के द्वार पर एक भीड़ लगी हुई थी कि सहसा शांतिकुमार घुटने तक कीचड़ लपेटे आकर बरामदे में खड़े हो गये। कल की बातों के बाद आज वहाँ आते उन्हें संकोच हो रहा था। नैना ने उन्हें देखा; पर अन्दर न बुलाया। सुखदा अपनी माता से बातें कर रही थी। शान्तिकुमार एक क्षण खड़े रहे, फिर हताश होकर चलने को तैयार हुए।

सुखदा ने उनकी रोनी सूरत देखी, फिर भी उन पर व्यंगप्रहार करने से न चूकी--किसी ने आपको यहाँ आते देख तो नहीं लिया डाक्टर साहब?

शांतिकुमार ने इस व्यंग्य की चोट को विनोद में रोका-खूब देखभालकर आया हूँ। कोई यहाँ देख भी लेगा, तो कह दूंगा, रुपये उधार लेने आया हूँ।

रेणुका ने डाक्टर साहब से देवर का नाता जोड़ लिया था। आज सुखदा ने कल का वृत्तान्त सुनाकर उसे डाक्टर साहब को आड़े हाथों लेने की सामग्री दे दी थी, हालाँकि अदृश्य रूप से डाक्टर साहब की नीति-भेद का कारण वह खुद थी। उसी ने ट्रस्ट का भार उनके सिर पर रखकर उन्हें सचिन्त कर दिया था।

उसने डाक्टर का हाथ पकड़कर कुरसी पर बैठाते हुए कहा-तो चूड़ियाँ पहनकर बैठो ना, यह मूछे क्यों बढ़ा ली है?

शांतिकुमार ने हंसते हुए कहा-मैं तैयार हूँ, लेकिन मुझसे शादी करने के लिए तैयार रहिएगा। आपको मर्द बनना पड़ेगा।

रेणुका ताली बजाकर बोली--मैं तो बूढ़ी हुई; लेकिन तुम्हारा खसम ऐसा ढूँढूगी, जो तुम्हें सात परदों के अन्दर रखे और गालियों से बात करे। गहने मैं बनवा दूंगी। सिर में सेंदुर डालकर घूंघट निकाले रहना। पहले खसम खा लेगा तो उसकी जूठन मिलेगी, समझ गये, और उसे देवता का प्रसाद समझकर खाना पड़ेगा। जरा भी नाक-भौं सिकोड़ी, तो कुलच्छनी कहलाओगे। उसके पाँव दबाने पड़ेंगे, उसकी धोती छाँटनी पड़ेगी। वह बाहर से आयेगा, तो उसके पाँव धोने पड़ेंगे, और बच्चे भी जनने पड़ेंगे। बच्चे न हुए, तो वह दूसरा ब्याह कर लेगा, फिर घर में लौंडी बनकर रहना पड़ेगा। [ २७४ ]शांतिकुमार पर लगातार इतनी चोटें पड़ी कि हँसी भूल गयी। मुंह जरा-सा निकल आया। मुर्दनी ऐसी छा गयी जैसे मुंह बँध गया। जबड़े फैलाने से भी न फैलते थे। रेणुका ने उसकी दो-चार बार पहले भी हँसी की थी; पर आज तो उसने उन्हें रुलाकर छोड़ा। परिहास में औरत अजेय होती है, खासकर जब वह बूढ़ी हो।

उन्होंने घड़ी देखकर कहा--एक बज रहा है आज तो हड़ताल अच्छी रही।

रेणुका ने फिर चुटकी ली--आप तो घर में लेटे थे, आपको क्या खबर ?

शांतिकुमार ने अपनी कारगुजारी जताई--उन आराम से लेटनेवालों में मैं नहीं हैं। हरेक आन्दोलन में ऐसे आदमियों की भी जरूरत होती है, जो गुप्त रूप से उसकी मदद करते रहें। मैंने अपनी नीति बदल दी है और मझे अनुभव हो रहा है कि मैं इस तरह कुछ कम सेवा नहीं कर सकता। आज नौजवान-सभा के दस-बारह युवकों को तैनात कर आया हूँ, नहीं इसकी चौथाई हड़ताल भी न होती।

रेणुका ने बेटी की पीठ पर एक थपकी देकर कहा--तब तु इन्हें क्यों बदनाम कर रही थी। बेचारे ने इतनी जान खपाई, फिर भी बदनाम हुए। मेरी समझ में भी यह नीति आ रही है। सब का आग में कूदना अच्छा नहीं।

शांति कुमार कल के कार्य-क्रम का निश्चय करके और सुखदा को अपनी ओर से आश्वस्त करके चले गये।

सन्ध्या हो गयी थी। बादल खुल गये थे और चाँद की सुनहरी जोत पृथ्वी के आँसुओं से भीगे हुए मुख पर जैसे मातृ-स्नेह की वर्षा कर रही थी। सुखदा सन्ध्या करने बैठी हुई थी। उस गहरे आत्म-चिन्तन में उसके मन की दुर्बलता किसी हठीले बालक की भाँति रोती हुई मालूम हुई। क्या मनीराम ने उसका अपमान न किया होता तो वह हड़ताल के लिए इतना जोर लगाती ?

उसने अभिमान से कहा--हाँ-हाँ जरूर लगाती। यह विचार बहुत पहले उसके मन में आया था। धनीराम को हानि होती है, तो हो, इस भय से वह अपने कर्तव्य का त्याग क्यों करे। जब वह अपना सर्वस्व इस उद्योग के लिए होम करने को तुली हुई है, तो दूसरों के हानि-लाभ की उसे क्या चिन्ता हो सकती है। [ २७५ ]इस तरह मन को समझाकर उसने सन्ध्या समाप्त की और नीचे उतरी थी कि लाल समरकान्त आकर खड़े हो गये। उनके मुख पर विषाद की रेखा झलक रही थी और होंठ इस तरह फड़क रहे थे, मानों मन का आवेश बाहर निकलने के लिए विकल हो रहा हो।

सुखदा ने पूछा--आप कुछ घबराये हुए हैं दादाजी, क्या बात है?

समरकान्त की सारी देह जैसे काँप उठी। आँसुओं के वेग को बल-पूर्वक रोकने की चेष्टा करके बोले--एक पुलिस कर्मचारी अभी दुकान पर ऐसी सुचना दे गया है, कि क्या कहूँ. . . . . .

यह कहते-कहते उनका कंठ स्वर जैसे गहरे जल में डुबकियां खाने लगा।

सुखदा ने आशंकित होकर पूछा--तो कहिए न, क्या कह गया है। हरिद्वार में तो सब कुशल है?

समरकान्त ने उसकी आशंकाओं को दूसरी ओर बहकते देख जल्दी से कहा--नहीं-नहीं उधर की कोई बात नहीं है। तुम्हारे विषय में था। तुम्हारी गिरफ्तारी का वारण्ट निकल गया है।

सुखदा ने हँसकर कहा--अच्छा! मेरी गिरफ्तारी का वारण्ट है! तो उसके लिए आप इतना क्यों घबरा रहे हैं? मगर आखिर मेरा अपराध क्या है?

समरकान्त ने मन को सँभालकर कहा--यही हड़ताल है। आज अफसरों में सलाह हुई है और वहाँ यही निश्चय हुआ कि तुम्हें और चौधरियों को पकड़ लिया जाय। इनके पास दमन ही एक दवा है। असंतोष के कारणों को दूर न करेंगे, बस पकड़-धकड़ से काम लेंगे, जैसे कोई माता भूख से रोते बालक को पीटकर चुप कराना चाहें।

सुखदा शांत भाव से बोली--जिस समाज का आधार ही अन्याय पर हो, उसकी सरकार के पास दमन के सिवा और क्या दवा हो सकती है? लेकिन इससे कोई यह न समझे कि यह आन्दोलन दब जायगा। उसी तरह जैसे कोई गेंद टक्कर खाकर और जोर से उछलता है, जितने ही जोर की टक्कर होगी, उतने ही जोर की प्रतिक्रिया भी होगी।

एक क्षण के बाद उसने उत्तेजित होकर कहा--मुझे गिरफ्तार कर लें। उन लाखों गरीबों को कहाँ ले जायेंगे, जिनकी आहे आसमान तक पहुँच रही
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है। यही आहें एक दिन किसी ज्वालामुखी की भाँति फटकर सारे समाज और समाज के साथ सरकार को भी विध्वंस कर देंगी। अगर किसी की आँखें नहीं खुलतीं, तो न खुलें, मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। एक दिन आयेगा, जब आज के देवता कल कंकड़-पत्थर की तरह उठा-उठा कर गलियों में फेंक दिये जायेंगे और पैरों से ठुकराये जायेंगे। मेरे गिरफ्तार हो जाने से चाहे कुछ दिनों के लिए अधिकारियों के कानों में हाहाकार की आवाजें न पहुँचे, लेकिन वह दिन दूर नहीं है, जब यही आँसू चिनगारी बनकर अन्याय को भस्म कर देंगे,इसी राख से वह अग्नि प्रज्वलित होगी, जिसकी आन्दोलित शिखाएँ आकाश तक को हिला देंगी।

समरकान्त पर इस प्रलाप का कोई असर न हुआ। वह इस संकट को टालने का उपाय सोच रहे थे। डरते-डरते बोले--एक बात कहूँ, बहू, बुरा न मानो। जमानत. . . . .

सुखदा ने त्योरियाँ बदलकर कहा--नहीं, कदापि नहीं। मैं क्यों जमानत दूँ ? क्या इसलिए कि अब मैं कभी जबान न खोलूँगी, अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लूँगी, अपने मुंह पर जाली लगा लूंगी। इससे तो यह कहीं अच्छा है कि अपनी आँखें फोड़ लूँ, जबान कटवा दूं।

समरकान्त की सहिष्णुता अब सीमा तक पहूँच चुकी थी। गरजकर बोले--अगर तुम्हारी ज़बान काबू में नहीं है, तो कटवा लो। मैं अपने जीते-जी यह नहीं देख सकता कि मेरी बहू गिरफ्तार की जाय और मैं बैठा देखूँ। तुमने हड़ताल करने के लिये मुझसे पूछ क्यों न लिया ? तुम्हें अपने नाम की लाज न हो, मुझे तो है। मैंने जिस मर्यादा-रक्षा के लिए अपने बेटे को त्याग दिया, उस मर्यादा को मैं तुम्हारे हाथों न मिटने दूँगा।

बाहर से मोटर का हार्न सुनायी दिया। सुखदा के कान खड़े हो गये। वह आवेश में द्वार की ओर चली। फिर दौड़कर लल्लू को नैना की गोद से लेकर उसे हृदय से लगाते हुए अपने कमरे में जाकर अपने आभूषण उतारने लगी। समरकान्त का सारा क्रोध कच्चे रंग की भांति पानी पड़ते ही उड़ गया। लपककर बाहर गये और आकर घबड़ाये हुए बोले--वह, डिप्टी आ गया। मैं जमानत देने जा रहा हूँ। मेरी इतनी याचना स्वीकार करो। [ २७७ ]
थोड़े दिनों का मेहमान हूँ। मुझे मर जाने दो, फिर जो कुछ जी में आये, करना।

सुखदा कमरे के द्वार पर आकर दृढ़ता से बोली--मैं जमानत न दूंगी, न इस मुआमले की पैरवी करूँगी! मैंने कोई अपराध नहीं किया हैं।

समरकान्त ने जीवन भर में कभी हार न मानी थी; पर वह आज इस अभिमानिनी रमणी के सामने परास्त खड़े थे। उसके शब्दों ने जैसे उनके मुँह पर जाली लगा दी। उन्होंने सोचा--स्त्रियों को संसार अबला कहता है। कितनी बड़ी मूर्खता है। मनुष्य जिस वस्तु को प्राणों से भी प्रिय समझता है, वह स्त्री की मुट्ठी में है।

उन्होंने विनय के साथ कहा--लेकिन अभी तुमने भोजन भी तो नहीं किया। खड़ी मुँह क्या ताकती हो नैना, क्या भंग खा गयी है! जा, बहू को खाना खिला दे। अरे ओ महरा! महरा! यह ससुरा न जाने कहां मर रहा। समय पर एक भी आदमी नज़र नहीं आता। तू बहू को ले जा रसोई में नैना, मैं कुछ मिठाई लेता आऊँ। साथ-साथ कुछ खाने को ले जाना ही पड़ेगा।

कहार ऊपर बिछावन लगा रहा था। दौड़ा हुआ आकर खड़ा हो गया। समरकान्त ने उसे जोर से एक धौल मारकर कहा--कहाँ था तू? इतनी देर से पुकार रहा हूँ, सुनता नहीं! किसके लिए बिछावन लगा रहा है ससुरा! बहु जा रही है। जा दौड़कर बाजार से अच्छी मिठाई ला। चौकवाली दूकान से लाना।

सुखदा आग्रह के साथ बोली--मिठाई को मुझे बिलकुल जरूरत नहीं है और न कुछ खाने ही की इच्छा है। कुछ कपड़े लिये जाती हूँ। वही मेरे लिये काफ़ी है।

बाहर से आवाज आई--सेठजी, देवीजी को जल्द भेजिए, देर हो रही है।

समरकान्त बाहर आये और अपराधी की भाँति खड़े हो गये।

डिप्टी दुहरे बदन का, रोबदार, पर हँसमुख आदमी था, जो और किसी विभाग में अच्छी जगह न पाने के कररण पुलीस में चला आया था। अनाव [ २७८ ]
श्यक अशिष्टता से उसे घृणा थी और यथासाध्य रिश्वत न लेता था। पूछा--कहिए, क्या राय हुई?

समरकान्त ने हाथ बाँधकर कहा--कुछ नहीं सुनती हुजूर, समझाकर हार गया। और मैं उसे क्या समझाऊँ; मुझे वह समझती ही क्या है। अब तो आप लोगों की दया का भरोसा है। मुझसे जो खिदमत कहिए, उसके लिए हाज़िर हूँ। जेलर साहब से तो आपका रब्त-जब्त होगा ही, उन्हें भी समझा दीजिएगा। कोई तकलीफ न होने पाये। मैं किसी तरह बाहर नहीं हूँ। नाजुक मिजाज औरत है, हुजूर।

डिप्टी ने सेठजी को बराबर की कुरसी पर बैठाते हुए कहा--सेठजी, यह बातें उन मुआमलों में चलती हैं जहाँ कोई काम बुरी नीयत से किया जाता है। देवीजी अपने लिए कुछ नहीं कर रही है। उनका इरादा नेक है, वह हमारे ग़रीब भाइयों के हक के लिए लड़ रही हैं। उन्हें किसी तरह की तकलीफ न होगी। नौकरी से मजबूर हूँ; वरना यह देवियां तो इस लायक है कि उनके कदमों पर सिर रखें। खुदा ने सारी दुनिया की नेमतें दे रखी हैं; मगर उन सब पर लात मार दी और हक के लिए सब कुछ झेलने को तैयार है। इसके लिए गुर्दा चाहिए साहब! मामूली बात नहीं है।

सेठजी ने सन्दूक से दस अशर्फियां निकाली और चुपके से डिप्टी की जेब में डालते हुए बोले--यह बच्चों के मिठाई खाने के लिए है।

डिप्टी ने अशर्फियां जेब से निकालकर मेज पर रख दी और बोला--आप पुलिसवालों को बिल्कुल जानवर ही समझते हैं क्या सेठजी? क्या लाल पगड़ी सिर पर रखना ही इन्सानियत का खुन करना है। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि देवीजी को तकलीफ न होने पावेगी। तकलीफ उन्हें दी जाती है जो दूसरों को तकलीफ देते हैं। जो गरीबों के हक़ के लिए अपनी ज़िन्दगी कुरबान कर दे, उसे अगर कोई सताये, तो वह इन्सान नहीं, हैवान भी नहीं, शैतान है। हमारे सीगे में ऐसे आदमी हैं और कसरत से हैं। मैं खुद फरिश्ता नहीं हूँ; लेकिन ऐसे मुआमले में मैं पान तक खाना हराम समझता हूँ। मन्दिर वाले मुआमले में देवीजी जिस दिलेरी से मैदान में आकर गोलियों के सामने खड़ी हो गयी थीं, वह उन्हीं का काम था।

सामने सड़क पर जनता का समूह प्रतिक्षण बढ़ता जाता था। बार-बार [ २७९ ]
जयजयकार-ध्वनि उठ रही थी स्त्री और पुरुप देवीजी के दर्शनों को भागे चले आते थे।

भीतर सुखदा और नैना में समर छिड़ा हूआ था।

सुखदा ने सामने से थाली हटाकर कहा---मैंने कह दिया, मैं कुछ न खाऊँगी।

नैना ने उसका हाथ पकड़ कर कहा---दो-चार कौर ही खा लो भाभी, मैं तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ। फिर न जाने यह दिन कब आये।

उसकी आंखें सजल हो गयीं।

सुखदा निष्ठुरता से बोली---तुम मुझे व्यर्थ में दिक कर रही हो बीबी, मुझे अभी बहुत-सी तैयारियां करनी हैं और उधर डिप्टी जल्दी मचा रहा है। देखती नहीं हो, द्वार पर डोली खड़ी है। इस वक्त खाने की किसे सूझती है।

नैना प्रेम-विह्वल कण्ठ से बोली---तुम अपना काम करती रहो, मैं तुम्हें कौर बनाकर खिलाती जाऊँगी।

जैसे माता खेलन्दे बच्चे के पीछे दौड़ दौड़कर उसे खिलाती है, उसी तरह नैना भाभी को खिलाने लगी। सुखदा कभी इस आलमारी के पास जाती, कभी उस सन्दूक के पास। किसी सन्दूक से सिन्दूर की डिबिया निकालती, किसी से साड़ियाँ। नैना एक कौर खिलाकर फिर थाल के पास जाती और दूसरा कौर लेकर दौड़ती।

सुखदा ने पाँच-छ: कौर खाकर कहा---बस अब पानी पिला दो।

नैना ने उसके मुँह के पास कौर ले जा कर कहा---बस, यही और ले लो, मेरी अच्छी भाभी!

सुखदा ने मुँह खोल दिया और ग्रास के साथ आँसू भी पी गयी।

'बस एक और!'

'अब एक कौर भी नहीं।'

'मेरी खातिर से।'

सुखदा ने ग्रास ले लिया।

'पानी भी दोगी या खिलाती ही जाओगी?'

'बस, एक ग्रास भैया के नाम का और ले लो।'

'ना। किसी तरह नहीं।' [ २८० ]नैना की आँखों में आंसू थे, प्रत्यक्ष। सुखदा की आँखों में भी आँसू थे; मगर छिपे हुए। नैना शोक से विह्वल थी, सुखदा उसे मनोबल से दबाये हुए थी। वह एक बार निष्ठुर बनकर चलते-चलते नैना के मोह-बन्धन को तोड़ देना चाहती थी, पैने शब्दों से हृदय के चारों ओर खाई खोद देना चाहती थी, मोह और शोक और वियोग-व्यथा के आक्रमणों से उसकी रक्षा करने के लिए। पर नैना की वह छलछलाती हुई आंखें, वह काँपते हुए ओठ, यह विनय-दीन मुखश्री, उसे नि:शस्त्र किये देती थी।

नैना ने जल्द-जल्द पान के बीड़े लगाये और भाभी को खिलाने लगी, तो उसके दब हुए आँसू फव्वारे की तरह उबल पड़े। मुंह ढाँप कर रोने लगी। सिसकियाँ और गहरी होकर कंठ तक जा पहुंची।

सुखदा ने उसे गले से लगाकर सजल शब्दों में कहा--क्यों रोती हो बीबी। बीच-बीच में मुलाकात तो होती ही रहेगी। जेल में मुझसे मिलने आना, तो खूब अच्छी-अच्छी चीजें बनाकर लाना। दो-चार महीने में तो मैं फिर आ जाऊँगी।

नैना ने जैसे डूबती हुई नाव पर से कहा--मैं ऐसी अभागिन हूँ कि आप तो डूबी ही थी, तुम्हें भी ले डूबी।

ये शब्द फोड़े की तरह उसी समय से उसके हृदय में टीस रहे थे, जबसे उसने सुखदा की गिरफ्तारी की खबर सुनी थी, और यह टीस उसकी मोह-वेदना को और भी दुर्दान्त बना रही थी।

सुखदा ने आश्चर्य से उसके मुंह की ओर देखकर कहा--यह तुम क्या कह रही हो बीबी, क्या तुमने पुलिस बुलाई है?

नैना ने ग्लानि से भरे कष्ट से कहा--वह पत्थर की हवेलीवालों का कुचक्र है। (सेठ धनीराम शहर में इसी नाम से प्रसिद्ध थे) मैं किसी को गालियाँ नहीं देती, पर उनका किया उनके आगे आयेगा। जिस आदमी के लिये एक मुँह से भी आशीर्वाद न निकलता हो, उसका जीना वृथा है।

सुखदा ने उदास होकर कहा--उनका इसमें क्या दोष है बीबी? वह सब हमारे समाज का, हम सबों का दोष है। अच्छा आओ अब विदा हो जाँय। वादा करो, मेरे जाने पर रोओगी नहीं।
[ २८१ ]नैना ने उसके गले से लिपटकर सूजी हुई लाल आँखों से मुस्कराकर कहा--नहीं रोऊँगी भाभी!

अगर मैंने सुना कि तुम रो रही हो, तो मैं अपनी सजा बढ़वा लूंगी।'

'भैया को तो यह समाचार देना ही होगा?'

'तुम्हारी जैसी इच्छा हो, करना। अम्मा को समझाती रहना।'

'उनके पास कोई आदमी भेजा गया या नहीं!'

'उन्हें बुलाने से और देर ही तो होती। घण्टों न छोड़तीं।'

'सुनकर दौड़ी आयेंगी।'

'हाँ, आयेंगी तो; पर रोयेंगी नहीं। उनका प्रेम आँखों में है। हृदय तक उसकी जड़ नहीं पहुँचती।'

दोनों द्वार की ओर चली। नैना ने लल्लू को माँ की गोद से उतारकर प्यार करना चाहा; पर वह न उतरा। नैना से बहुत हिला था; पर आज वह अबोध आँखों से देख रहा था--माता कहीं जा रही है। उसकी गोद से कैसे उतरे। उसे छोड़कर वह चली जाय, तो बेचारा क्या कर लेगा?

नैना ने उसका चुम्बन लेकर कहा--बालक बड़े निर्दयी होते हैं।

सुखदा ने मुस्कराकर कहा-लड़का किसका है!

द्वार पर पहुँचकर फिर दोनों गले मिलीं। समरकान्त भी ड्योढ़ी पर खड़े थे। सुखदा ने उनके चरणों पर सिर झुकाया। उन्होंने काँपते हुए हाथों से उसे उठाकर आशीर्वाद दिया। फिर लल्लू को कलेजे से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगे। यह सारे घर को रोने का सिग्नल था। आँसू तो पहले ही से निकल रहे थे। वह मूक रुदन अब जैसे बन्धनों से मुक्त हो गया। शीतल, धीर, गंभीर बुढ़ापा जब विह्वल हो जाता है, तो मानों पिंजरे के द्वार खुल जाते हैं और पक्षियों को रोकना असंभव हो जाता है। जब सत्तर वर्ष तक संसार के समर में जमा रहनेवाला नायक हथियार डाल दे, रंगरूटों को कौन रोक सकता है।

सूखदा मोटर में बैठी। जयजयकार की ध्वनि हई। फूलोंकी वर्षा की गयी। मोटर चल दी।

हजारों आदमी मोटर के पीछे दौड़ रहे थे और सुखदा हाथ उठाकर उन्हें प्रणाम करती जाती थी। यह श्रद्धा, यह प्रेम, यह सम्मान, क्या धन से मिल सकता है? या विद्या से? इसका केवल एक ही साधन है, और वह
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सेवा है, और सुखदा को अभी इस क्षेत्र में आये हुए ही कितने दिन थे?

सड़क के दोनों ओर नर-नारियों की दीवार खड़ी थी और मोटर मानों उनके हृदय को कुचलती-मचलती चली जाती थी।

सुखदा के हृदय में गर्व न था, उल्लास न था, द्वेष था, केवल वेदना थी; जनता की इस दयनीय दशा पर, इस अधोगति पर जो डूबती हुई दशा में तिनके का सहारा पाकर भी कृतार्थ हो जाती है।

कुछ दूर के बाद सड़क पर सन्नाटा था, सावन की निद्रा सी काली रात संसार को अपने अंचल में सुला रही थी और मोटर अनन्त में स्वप्न की भाँति उड़ी चली जाती थी। केवल देह में ठण्डी हवा लगने से गति का ज्ञान होता था। इस अन्धकार में सुखदा के अन्तस्तल में एक प्रकाश-सा उदय हुआ। कुछ वैसा ही प्रकाश, जो हमारे जीवन की अन्तिम घड़ियों में उदय होता है, जिसमें मन की सारी कालिमाएँ, सारी ग्रन्थियाँ, सारी विषमतायें अपने यथार्थ रूप में नजर आने लगती हैं। तब हमें मालूम होता है कि जिसे हमने अन्धकार में काला देव समझा था, वह केवल तृण का ढेर था, जिसे काला नाग समझा था, वह रस्सी का टुकड़ा था। आज उसे अपनी पराजय का ज्ञान हुआ, अन्याय के सामने नहीं, असत्य के सामने नहीं, बल्कि त्याग के सामने और सेवा के सामने। इसी सेवा और त्याग के पीछे तो उसका पति से मतभेद हुआ था, जो अन्त में इस वियोग का कारण हुआ। उन सिद्धांतों में अभक्ति रखते हुए भी वह उनकी ओर खिचती चली आती थी और आज वह अपने पति की अनुगामिनी थी। उसे अमर के उस पत्र की याद आयी जो उसने शांतिकुमार के पास भेजा था और पहली बार पति के प्रति क्षमा का भाव उसके मन में प्रस्फुटित हुआ। इस क्षमा में दया नहीं, सहानुभूति थी, सहयोगिता थी। अब दोनों एक ही मार्ग के पथिक है, एक ही आदर्श के उपासक हैं। उनमें कोई भेद नहीं है, कोई वैषम्य नहीं है, आज पहली बार उसका अपने पति से आत्मिक सामंजस्य हुआ। जिस देवता को अमंगलकारी समझ रखा था, उसी की आज धूप-दीप से पूजा कर रही थी।

सहसा मोटर रुकी और डिप्टी ने उतर कर सुखदा से कहा—देवीजी, जेल आ गया। मुझे क्षमा कीजिएगा।

सुखदा ऐसी प्रसन्न थी, मानो अपने जीवन-धन से मिलने आयी है।