कर्मभूमि/तीसरा भाग ७

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

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उसी रात को शांतिकुमार ने अमर के नाम खत लिखा। वह उन आदमियों में थे, जिन्हें और सभी कामों के लिए समय मिलता है, खत लिखने के लिए नहीं मिलता। जितनी अधिक घनिष्टता, उतनी ही बेफ़िक्री। उनकी मैत्री खतों से कहीं गहरी होती है। शांतिकुमार को अमर के विषय
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में सलीम से सारी बातें मालूम होती रहती थीं। खत लिखने की क्या जरूरत थी? सकीना से उसे प्रेम हुआ, इसकी जिम्मेदारी उन्होंने सुखदा पर रखी थी; पर आज सुखदा से मिलकर उन्होंने चित्र का दूसरा रुख भी देखा और सुखदा को उस जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। खत जो लिखा वह इतना लम्बा-चौड़ा कि एक ही पत्र में साल भर की कसर निकल गयी। अमरकान्त के जाने के बाद शहर में जो कुछ हुआ उसकी पूरी-पूरी कैफ़ियत बयान की, और अपने भविष्य के सम्बन्ध में उसकी सलाह भी पुछी। अभी तक उन्होंने नौकरी से इस्तीफा नहीं दिया था। पर इस आन्दोलन के बाद से उनको अपने पद पर रहना कुछ जँचता न था। उनके मन में बार-बार शंका होती, जब तुम गरीबों के वकील बनते हो तो तुम्हें क्या हक है कि तुम पाँच सौ रुपये माहवार सरकार से वसूल करो। अगर तुम ग़रीबों की तरह नहीं रह सकते, तो गरीबों की वकालत करना छोड़ दो। जैसे और लोग आराम करते हैं, वैसे तुम भी मजे से खाते-पीते रहो। लेकिन इस निर्द्वन्द्वता को उनकी आत्मा स्वीकार न करती थी। प्रश्न था, दिन गुज़र कैसे हो? किसी देहात में जाकर खेती करें, या क्या? यों रोटियाँ तो बिना काम किये भी मिल सकती थीं; क्योंकि सेवाश्रम को काफ़ी चन्दा मिलता था; लेकिन दान वृत्ति की कल्पना ही से उनके आत्माभिमान को चोट लगती थी।

लेकिन पत्र लिखे चार दिन हो गये, कोई जवाब नहीं। अब डाक्टर साहब के सिर पर एक बोझ सवार हो गया। दिन भर डाकिये की राह देखा करते; पर कोई खबर नहीं। यह बात क्या है? क्या अमर कहीं दूसरी जगह तो नहीं चला गया? सलीम ने पता तो ग़लत नहीं बता दिया? हरिद्वार से तीसरे दिन जबाब आना चाहिये। उसके आठ दिन हो गये। कितनी ताकीद कर दी थी कि तुरन्त जवाब लिखना। कहीं बीमार तो नहीं हो गया? दूसरा पत्र लिखने का साहस न होता था। पूरे दस पन्ने कौन लिखे ? वह पत्र भी कुछ वैसा पत्र न था, शहर का साल भर का इतिहास था। वैसा पत्र फिर न बनेगा। पूरे तीन घंटे लगे थे। इधर आठ दिन से सलीम भी नहीं आया। वह तो अब दूसरी दुनिया में है। अपने आई० सी० एस० की धुन में है। यहाँ क्यों आने लगा ? मुझे देखकर शायद
[ २३० ]आँखें चुराने लगे। स्वार्थ भी ईश्वर ने क्या चीज़ पैदा की है। कहाँ तो नौकरी के नाम से घृणा थी। नौजवान सभा के भी मेम्बर, कांग्रेस के भी मेम्बर। जहाँ देखिए, मौजूद। और मामूली मेम्बर नहीं, प्रमुख भाग लेनेवाला। कहाँ अब आई० सी० एस० की पड़ी हुई है। बचा पास तो क्या होंगे, वहाँ धोखा-धड़ी नहीं चलने की। मगर नामिनेशन तो हो ही जायगा। हाफि़जजी पूरा जोर लगायेंगे। एक इम्तहान में भी तो पास न हो सकता था। कहीं परचे उड़ाये, कहीं नकल की, कहीं रिश्वत दी, पक्का शोहदा है और ऐसे लोग आई० सी० एस० होंगे!

सहसा सलीम की मोटर आयी, और सलीम ने उतरकर हाथ मिलाते हुए कहा-अब तो आप अच्छे मालूम होते हैं। चलने-फिरने में तो दिक्कत नहीं होती ?

शांतिकुमार ने शिकवे के अन्दाज से कहा-मुझे दिक्कत होती है या नहीं तुम्हें इससे मतलब ! महीने भर के बाद तुम्हारी सूरत नज़र आयी है। तुम्हें क्या फ़िक्र कि मैं मरा या जीता हूँ। मुसीबत में कौन साथ देता है। तुमने कोई नई बात नहीं की।

'नहीं डाक्टर साहब, आज-कल इम्तिहान के झंझट में पड़ा हुआ हूँ। मुझे तो इससे नफ़रत है। खुदा जानता है, नौकरी से मेरी रूह काँपती है। करूँ क्या, अब्बाजान हाथ धोकर पीछे पड़े हुए हैं। यह तो आप जानते ही हैं, मैं एक सीधा जुमला ठीक नहीं लिख सकता; मगर लियाकत कौन देखता है। यहाँ तो सनद देखी जाती है। जो अफसरों का रुख देख कर काम कर सकता है, उसके लायक होने में शुबहा नहीं। आजकल यही फ़न सीख रहा हूँ।

शांतिकुमार ने मुसकराकर कहा-मुबारक हो; लेकिन आई०सी०एस० की सनद आसान नहीं है।

सलीम ने कुछ इस भाव से कहा, जिससे टपक रहा था, आप इन बातों को क्या जानें-जी हाँ, लेकिन सलीम भी इस फ़न में उस्ताद है। बी० ए० तक तो बच्चों का खेल था। आई० सी० एस० में ही मेरे कमाल का इम्तहान होगा। सबसे नीचे मेरा नाम गजट में न निकले, तो मुंह ‌‌‌न दिखाऊँ। [ २३१ ]
चाहूँ तो सबसे ऊपर भी आ सकता हूँ, मगर फ़ायदा क्या। रुपये तो बराबर ही मिलेंगे।

शांतिकुमार ने पूछा-तो तुम भी गरीबों का खून चूसोगे क्या?

सलीम ने निर्लज्जता से कहा-गरीबों के खून पर तो अपनी परवरिश हुई। अब और क्या कर सकता हूँ। यहाँ तो जिस दिन पढ़ने बैठे, उसी दिन से मुफ्तखोरी की धुन समाई; लेकिन आपसे सच कहता हूँ डाक्टर साहब मेरी तबीयत उस तरफ़ नहीं है। कुछ दिनों मुलाज़मत करने के बाद मैं भी देहात की तरफ चलूंगा। गाय-भैसें पालूंगा, कुछ फल-वल पैदा करूँगा। पसीने की कमाई खाऊँगा। मालूम होगा, मैं भी आदमी हूँ। अभी तो खटमलों की तरह दूसरों के खून पर ही ज़िन्दगी कटेगी, लेकिन मैं कितना ही गिर जाऊँ मेरी हमदर्दी गरीबों के साथ रहेगी। मैं दिखा दूंगा कि अफ़सरी करके भी पबलिक की खिदमत की जा सकती है। हम लोग खानदानी किसान हैं। अब्बाजान ने अपने बूते से यह दौलत पैदा की। मुझे जितनी मुहब्बत रिआया से हो सकती है, उतनी उन लोगों को नहीं हो सकती जो खानदानी रईस है। मैं तो कभी अपने गांवों में जाता हूँ, तो मुझे ऐसा मालूम होता है, कि यह लोग मेरे अपने हैं। उनको सादगी और मशक्कत देखकर दिल में उनकी इज्जत होती है। न जाने कैसे लोग उन्हें गालियाँ देते हैं, उन पर जुल्म करते हैं। मेरा बस चले, तो बदमाश अफसरों को कालेपानी भेज दूं।

शांतिकुमार को ऐसा जान पड़ा कि अफ़सरी का जहर अभी इस युवक के खून में नहीं पहुंचा। इसका हृदय अभी तक स्वस्थ है। बोले-जब तक रिआया के हाथ में अख्तियार न होगा, अफसरों की यही हालत रहेगी। तुम्हारी ज़बान से यह खयालात सुनकर मुझे खुशी हो रही है। मुझे तो एक भी भला आदमी कहीं नज़र नहीं आता। गरीबों की लाश पर सब-के-सब गिद्धों की तरह जमा होकर उनकी बोटियाँ नोच रहे हैं। मगर अपने बस की बात नहीं। इसी खयाल से दिल को तस्कीन देना पड़ता है कि जब खुदा की मरज़ी होगी, तो आप ही वैसे सामान हो जायेंगे। इस हाहाकार को बुझाने के लिए दो-चार घड़े पानी डालने से तो आग और भी बढ़ेगी। इनकलाब की ज़रूरत है, पूरे इनक़लाब की। इसलिए जले जितना
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जी चाहे। साफ हो जाय। जब कुछ जलाने को बाकी न रहेगा, तो आप आग ठण्डी हो जायगी। तब तक हम भी हाथ सेंकते हैं। कुछ अमर की भी खबर है? मैंने एक खत भेजा था, कोई जवाब नहीं आया।

सलीम ने जैसे चौंककर जेब में हाथ डाला और एक खत निकालता हुआ बोला-लाहौल विलाकूवत। इस खत की याद ही न रही। आज चार दिन से आया हुआ है। जेब में ही पड़ा रह गया। रोज सोचता था और रोज़ भूल जाता था।

शांतिकुमार ने जल्दी से हाथ बढ़ाकर खत ले लिया, और मीठे क्रोध के दो-चार शब्द कहकर पत्र पढ़ने लगे-

'भाई साहब, मैं ज़िन्दा हूँ। और आपका मिशन यथाशक्ति पूरा कर रहा हूँ। वहाँ के समाचार कुछ तो नैना के पत्रों से मुझे मिलते ही रहते थे; किन्तु आपका पत्र पढ़कर तो मैं चकित रह गया। इन थोड़े से दिनों में तो वहाँ क्रान्ति सी हो गयी। मैं तो इस सारी जाग्रति का श्रेय आपको देता हूँ। और सुखदा तो अब मेरे लिए पूज्य हो गयी है। मैंने उसे समझने में कितनी भयंकर भूल की, यह याद करके मैं विकल हो जाता हूँ। मैंने उसे क्या समझा था, और वह क्या निकली। मैं अपने सारे दर्शन और विवेक और उत्सर्ग से वह कुछ न कर सका, जो उसने एक क्षण में कर दिखाया। कभी गर्व से सिर उठा लेता हूँ, कभी लज्जा से सिर झुका लेता हूँ। हम अपने निकटतम प्राणियों के विषय में कितने अज्ञ हैं, इनका अनुभव करके मैं रो उठता हूँ। कितना महान् अज्ञान है। मैं क्या स्वप्न में भी सोच सकता था कि विलासिनी सुखदा का जीवन इतना त्यागमय हो जायगा? मुझे इस अज्ञान ने कहीं का न रखा। जी में आता है, आकर सुखदा से अपने अपराध क्षमा कराऊँ; पर कौन-सा मुँह लेकर आऊँ। मेरे सामने अन्धकार है, अभेद्य अन्धकार है। कुछ नहीं सूझता। मेरा सारा आत्म-विश्वास नष्ट हो गया है। ऐसा ज्ञात होता है, कोई अदेख शक्ति मुझे खिला-खिलाकर कुचल डालना चाहती है। मैं मछली की तरह काँटे में फँसा हुआ हूँ। काँटा मेरे कण्ठ में चुभ गया है। कोई हाथ मुझे खींच लेता है, खिंचा चला जाता है। फिर डोर ढीली हो जाती है और मैं भागता हूँ। अब जान पड़ा कि मनुष्य विधि के हाथ का खिलौना है। इसलिए
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अब उसकी निर्दय क्रीड़ा की शिकायत नहीं करूँगा। कहाँ हूँ, कुछ नहीं जानता; किधर जा रहा हूँ, कुछ नहीं जानता। अब जीवन में कोई भविष्य नहीं है। भविष्य पर विश्वास नहीं रहा । इरादे झूठे साबित हुए, कल्पनाएँ मिथ्या निकलीं। मैं आपसे सत्य कहता हूँ, सुखदा मुझे नचा रही है। उस मायाविनी के हाथों में कठपुतली बना हुआ हूँ। पहले एक रूप दिखाकर उसने मुझे भयभीत कर दिया और अब दूसरा रूप दिखाकर मुझे परास्त कर रही है। कौन उसका वास्तविक रूप है, नहीं जानता । सकीना का जो रूप देखा था, वह भी उसका सच्चा रूप था, नहीं कह सकता। मैं अपने ही विषय में कुछ नहीं जानता। आज क्या हूँ, कल क्या हो जाऊँगा, कुछ नहीं जानता। अतीत दुःखदायी है, भविष्य स्वप्न है। मेरे लिए केवल वर्तमान है।

आपने अपने विषय में मुझसे जो सलाह पूछी है, उसका मैं क्या जवाब दूं आप मुझसे कहीं बुद्धिमान् हैं। मेरा तो विचार है कि सेवा-व्रतधारियों को जाति से गुजारा-केवल गुजारा लेने का अधिकार है। यदि वह इस स्वार्थ को मिटा सकें, तो और भी अच्छा।'

शांतिकुमार ने असंतोष के भाव से पत्र को मेज़ पर रख दिया। जिस विषय पर उन्होंने विशेष रूप से राय पूछी थी, उसे केवल दो शब्दों में उड़ा दिया।

सहसा उन्होंने सलीम से पूछा-तुम्हारे पास भी कोई खत आया है?

'जी हाँ इसके साथ ही आया था।'

'कुछ मेरे वारे में लिखा था?'

'कोई खास बात तो न थी, बस, यही कि मुल्क को सच्चे मिशनरियों की जरूरत है और खुदा जाने क्या-क्या। मैंने खत को आखीर तक पढ़ा भी नहीं। इस किस्म की बातों को पागलपन समझता हूँ। मिशनरी होने का मतलब तो मैं यही समझता हूँ कि हमारी ज़िन्दगी खैरात पर बसर हो।

डाक्टर साहब ने गम्भीर स्वर में कहा-जिंदगी खैरात पर बसर होना इससे कहीं अच्छा है कि वह जब्र पर बसर हो। गवर्नमेण्ट तो कोई जरूरी चीज़ नहीं। पढ़े-लिखे आदमियों ने ग़रीबों को दबाये रखने के लिए एक
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संगठन बना लिया है। उसी का नाम गवर्नमेन्ट है। ग़रीब और अमीर का फ़र्क मिटा दो और गवर्नमेन्ट का ख़ातमा हो जाता है।

'आप तो खयाली बातें कर रहे हैं। गवर्नमेन्ट की ज़रूरत' उस वक्त न रहेगी, जब दुनिया में फ़रिश्ते आबाद होंगे।'

'आइडियल (आदर्श) को हमेशा सामने रखने की जरूरत है।'

'लेकिन तालीम का सीगा तो जब्र करने का सीमा नहीं है। फिर जो आप अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा सेवाश्रम में खर्च करते हैं, तो कोई वजह नहीं कि आप मुलाज़मत छोड़कर संन्यासी बन जायँ।'

यह दलील डाक्टर के मन में बैठ गयी। उन्हें अपने मन को समझाने का एक साधन मिल गया। बेशक, शिक्षा-विभाग का शासन से सम्बन्ध नहीं। गवर्नमेन्ट जितनी ही अच्छी होगी, उसका शिक्षाकार्य और भी विस्तृत होगा। तब इस सेवाश्रम की भी क्या जरूरत होगी। संगठित रूप से सेवाधर्म का पालन करते हुए, शिक्षा का प्रचार करना किसी दशा में भी आपत्ति की बात नहीं हो सकती। महीनों से जो प्रश्न डाक्टर साहब को बेचैन कर रहा था, आज हल हो गया।

सलीम को बिदा करके वह लाला समरकान्त के घर चले। सुखदा को अमर का पत्र दिखाकर सुर्खरू बनना चाहते थे। जो समस्या अभी वह हल कर चुके थे, उसके विषय में फिर कुछ सन्देह उत्पन्न हो रहे थे। उन सन्देही को शान्त करना भी आवश्यक था। समरकान्त तो कुछ खुलकर उनसे न मिले। सुखदा ने उनकी खबर पाते ही बुला लिया। रेणुकाबाई भी आयी हुई थीं।

शांतिकुमार ने जाते ही अमरकान्त का पत्र निकालकर सुखदा के सामने रख दिया और बोले-सलीम ने चार दिनों से अपनी जेब में डाल रखा था और मैं घबरा रहा था कि बात क्या है।

सुखदा ने पत्र को उड़ती हुई आँखों से देखकर कहा-तो मैं इसे लेकर क्या करूं?

शांतिकुमार ने विस्मित होकर कहा-जरा एक बार इसे पढ़ तो जाइये। इससे आपके मन की बहुत-सी शंकाएँ मिट जायेंगी।

सूखदा ने रूखेपन के साथ जवाब दिया-मेरे मन में किसी की तरफ से
[ २३५ ]कोई शंका नहीं है। इस पत्र में भी जो कुछ लिखा होगा, वह मैं जानती हूँ। मेरी खूब तारीफें की गयी होंगी। मुझे तारीफ की ज़रूरत नहीं। जैसे किसी को क्रोध आ जाता है, उसी तरह मुझे वह आवेश आ गया। वह भी क्रोध के सिवा और कुछ न था ! क्रोध की कोई तारीफ नहीं करता।

'यह आपने कैसे समझ लिया कि इसमें आपकी तारीफ ही है ?'

'हो सकता है, खेद भी प्रकट किया हो।'

'तो फिर आप और चाहती क्या हैं ?'

'अगर आप इतना भी नहीं समझ सकते तो मेरा कहना व्यर्थ है।'

रेणुकाबाई अब तक चुप बैठी थीं। सूखदा का संकोच देखकर बोली- जब वह अब तक घर लौटकर नहीं आये, तो कैसे मालूम हो कि उनके मन के भाव वदल गये हैं। अगर सुखदा उनकी स्त्री न होती, तब भी तो उसकी तारीफ़ करते ! नतीजा क्या हुआ, जब स्त्री-पुरुष सुख से रहें, तभी तो मालूम हो कि उनमें प्रेम है। प्रेम को छोड़िये। प्रेम तो विस्ले ही दिलों में होता है। धर्म का निबाह तो करना ही चाहिये । पति हजार कोस पर बैठा हुआ स्त्री की बड़ाई करे, स्त्री हजार कोस पर बैठी हुई मियां की तारीफ़ करे। इससे क्या होता है ?

सुखदा खीझकर बोली- आप तो अम्मा बे-बात की बात करती हैं। जीवन तब सुखी हो सकता है, जब मन का आदमी मिले। उन्हें मुझसे अच्छी एक वस्तु मिल गयी। वह उसके वियोग में भी मगन हैं। मुझे उनसे अच्छा अभी तक कोई नहीं मिला और न इस जीवन में मिलेगा, यह मेरा दुर्भाग्य है। इसमें किसी का दोष नहीं।

रेणुका ने डाक्टर साहब की ओर देखकर कहा- सुना आपने बाबूजी! यह मुझे इसी तरह रोज़ जलाया करती है। कितनी बार कहा कि चल हम दोनों उसे वहाँ से पकड़ लायें। देखें, कैसे नहीं आता। जवानी की उम्र में थोड़ी-बहुत नादानी सभी करते हैं; मगर यह न खुद मेरे साथ चलती है, न मुझे अकेले जाने देती है। भैया, एक दिन भी ऐसा नहीं जाता कि बगैर रोये मुँह में अन्न जाता हो। तुम क्यों नहीं चले जाते भैया! तुम उसके गुरु हो, तुम्हारा अदब करता है । तुम्हारा कहना वह नहीं टाल सकता।

सुखदा ने मुसकराकर कहा- हाँ यह तो तुम्हारे कहने से आज ही चले
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जायँगे। यह तो और खुश होते होंगे कि शिष्यों में एक तो ऐसा निकला, जो इनके आदर्श का पालन कर रहा है। विवाह को यह लोग समाज का कलंक समझते हैं। इनके पंथ में पहले तो किसी को विवाह करना ही न चाहिए, और अगर दिल न माने, तो किसी को रख लेना चाहिए। इनके दूसरे शिष्य मियाँ सलीम हैं। हमारे बाब साहब तो न-जाने किस दबाव में पड़कर विवाह कर बैठे। अब उसका प्रायश्चित कर रहे हैं।

शांतिकुमार ने झेंपते हुए कहा- देवीजी, आप मुझ पर मिथ्या आरोप कर रही हैं। अपने विषय में मैंने अवश्य यही निश्चय किया है, कि एकान्त जीवन व्यतीत करूँगा; इसलिए कि आदि से ही सेवा का आदर्श मेरे स़ामने था।

सुखदा ने पूछा- क्या विवाहित जीवन में सेवा-धर्म का पालन असंभव है? या स्त्री इतनी स्वार्थान्ध होती है कि आपके कामों में बाधा डाले बिना रह ही नहीं सकती ? गृहस्थ जितनी सेवा कर सकता है, उतनी एकान्तजीवी कभी नहीं कर सकता क्योंकि वह जीवन के कष्टों का अनुभव नहीं कर सकता।

शांतिकुमार ने विवाद से बचने की चेष्टा करके कहा- यह तो झगड़े का विषय है देवीजी, और तय नहीं हो सकता। मुझे आपसे एक विषय में सलाह लेनी है। आपकी माताजी भी हैं, यह और भी शुभ है। मैं सोच रहा हूँ, क्यों न नौकरी से इस्तीफा देकर सेवाश्रम का काम करूँ ?

सुखदा ने इस भाव से कहा, मानो यह प्रश्न करने की बात ही नहीं- अगर आप सोचते हैं, आप बिना किसी के सामने हाथ फैलाये अपना निर्वाह कर सकते हैं, तो जरूर इस्तीफा दे दीजिए। यों तो काम करनेवाले का भार संस्था पर होता है; लेकिन इससे भी अच्छी बात यह है कि उसकी सेवा में स्वार्थ का लेश भी न हो।

शांतिकुमार ने जिस तर्क से अपना चित्त शांत किया था, वह यहाँ फिर जवाब दे गया। फिर उसी उधेड़-बुन में पड़ गये।

सहसा रेणुका ने कहा- आपके आश्रम में कोई कोष भी है ?

आश्रम में अब तक कोई कोष न था। चन्दा इतना न मिलता था कि कुछ बचत हो सकती। शांतिकुमार ने इस अभाव को मानो अपने ऊपर
[ २३७ ]एक लांछन समझकर कहा- जी नहीं, अभी तक तो कोष नहीं बन सका, पर मैं युनिवर्सिटी से छुट्टी पा जाऊँ, तो इसके लिए उद्योग करूँ।

रेणुका ने पूछा- कितने रुपये हों, तो आपका आश्रम चलने लगे?

शांतिकुमार ने आशा की स्फूर्ति का अनुभव करके कहा- आश्रम तो एक युनिवर्सिटी भी बन सकता है; लेकिन मुझे तीन-चार लाख रुपये मिल जायें तो मैं उतना ही काम कर सकता हूँ, जितना युनिवर्सिटी में बीस लाख में भी नहीं हो सकता।

रेणका ने मुसकराकर कहा- अगर आप कोई ट्रस्ट बना सकें तो मैं आपकी कुछ सहायता कर सकती हूँ। बात यह है कि जिस सम्पत्ति को अब तक संचती आती थी, उसका अब कोई भोगनेवाला नहीं है। अमर का हाल आप देख ही चुके। सुखदा भी उसी रास्ते पर जा रही है। तो फिर मैं भी अपने लिए कोई रास्ता निकालना चाहती हूँ। मुझे आप गुज़ारे के लिए सौ रुपये महीने ट्रस्ट से दिला दीजिएगा। मेरे जानवरों के खिलाने-पिलाने का भार ट्रस्ट पर होगा।

शांतिकुमार ने डरते-डरते कहा- मैं तो आपकी आज्ञा तभी स्वीकार कर सकता हूँ, जब अमर और सुखदा मुझे सहर्ष अनुमति दें। फिर बच्चे का हक़ भी तो है?

सुखदा ने कहा- मेरी तरफ से इस्तीफा है। और बच्चे के दादा का धन क्या थोड़ा है? औरों की मैं नहीं कह सकती।

रेणुका खिन्न होकर बोली- अमर को धन की परवाह अगर है तो औरों से भी कम। दौलत कोई दीपक तो है नहीं, जिससे प्रकाश फैलता रहे। जिन्हें उसकी ज़रूरत नहीं उनके गले क्यों लगाई जाय । रुपये का भार कुछ कम नहीं होता। मैं खुद नहीं सँभाल सकती। किसी शुभ कार्य में लग जाय, वह कहीं अच्छा। लाला समरकान्त तो मन्दिर और शिवाले की राय देते है; पर मेरा जी उधर नहीं जाता। मन्दिर तो यों ही इतने हो रहे हैं, कि पूजा करनेवाले नहीं मिलते। शिक्षादान महादान है और वह भी उन लोगों में, जिनका समाज ने हमेशा बहिष्कार किया हो। मैं कई दिन से सोच रही हूँ, और आपसे मिलने वाली थी। अभी मैं दो-चार महीने और दुविधे में पड़ी रहती; पर आपके आ जाने से मेरी दुविधाएँ मिट गयीं। [ २३८ ]धन देनेवालों की कमी नहीं है, लेनेवालों की कमी है। आदमी यही चाहता है, कि धन सुपात्रों को दे, जो दाता के इच्छानुसार खर्च करें; यह नहीं कि मुफ्त का धन पाकर उड़ाना शुरू कर दें। दिखाने को दाता के इच्छानसार थोड़ा-बहुत खर्च कर दिया, बाकी किसी-न-किसी बहाने से घर में रख लिया।

यह कहते हुए उसने मुसकराकर शांतिकुमार से पूछा- आप तो धोखा न देंगे?

शांतिकुमार को यह प्रश्न, हँसकर पूछे जाने पर भी, बुरा मालूम हुआ- मेरी नियत क्या होगी, यह मैं खुद नहीं जानता । आप को मुझ पर इतना विश्वास कर लेने का कोई कारण भी नहीं है।

सुखदा ने बात सँभाली- यह बात नहीं है डाक्टर साहब ! अम्मा ने तो हँसी की थी।

'विष मधु के साथ भी अपना असर करता है।'

'यह तो बुरा मानने की बात न थी ?'

'मैं बुरा नहीं मानता । अभी दस-पाँच वर्ष मेरी परीक्षा होने दीजिए। अभी मैं इतने बड़े विश्वास के योग्य नहीं हुआ।

रेणुका ने परास्त होकर कहा- अच्छा साहब, मैं अपना प्रश्न वापस लेती हूँ। आप कल मेरे घर आइएगा। मैं मोटर भेज दूँगी। ट्रस्ट बनना पहला काम है। मुझे अब कुछ नहीं पूछना है। आपके ऊपर मुझे पूरा विश्वास है ।

डाक्टर साहब ने धन्यवाद देते हुए कहा- मैं आपके विश्वास को बनाये रखने की चेष्टा करूँगा।

रेणुका- मैं चाहती हूँ, जल्द ही इस काम को कर डालूँ। फिर नैना का विवाह आ पड़ेगा, तो महीनों फुरसत न मिलेगी।

शांतिकुमार ने जैसे सिहरकर कहा- अच्छा, नैना देवी का विवाह होने वाला है ? यह तो बड़ी शुभ सूचना है। मैं कल ही आपसे मिलकर सारी बातें तय कर लूंगा। अमर को भी सूचना दे दूँ?

सुखदा ने कठोर स्वर में कहा- कोई ज़रूरत नहीं।

रेणुका बोली- नहीं, आप उनको सूचना दे दीजिए। शायद आयें। मुझे तो आशा है, ज़रूर आयेंगे। [ २३९ ]
डाक्टर साहब यहाँ से चले, तो नैना बालक को लिये मोटर से उतर रही थी।

शांतिकुमार ने आहत कण्ठ से कहा-तुम अब चली जाओगी नैना । नैना ने सिर झुका लिया; पर उसकी आँखें सजल थीं।