कर्मभूमि/दूसरा भाग ३

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

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दो महीने बीत गये।

पूस की ठंढी रात काली कमली ओढ़े पड़ी हुई थी। ऊँचा पर्वत किसी विशाल महत्वाकांक्षा की भाँति, तारिकाओं का मुकुट पहने खड़ा था। झोंपड़ियाँ जैसे उसकी वह छोटी-छोटी अभिलाषाएँ थीं, जिन्हें वह ठुकरा चुका था।

अमरकान्त की झोपड़ी में एक लालटेन जल रही है। पाठशाला खुली हुई है। पन्द्रह-बीस लड़के खड़े अभिमन्यु की कथा सुन रहे हैं। अमर खड़ा वह कथा कह रहा है। सभी लड़के कितने प्रसन्न हैं। उनके पीले चेहरे चमक रहे हैं, आँखें जगमगा रही हैं। शायद वे भी अभिमन्यु-जैसे वीर, वैसे ही कर्तव्य परायण होने का स्वप्न देख रहे हैं। उन्हें क्या मालूम, एक दिन उन्हें दुर्योधनों और जरासन्धों के सामने घुटने टेकने पड़ेंगे, माथे रगड़ने पड़ेंगे, कितनी बार वे चक्रव्यूहों से भागने की चेष्टा करेंगे, और भाग न सकेंगे।

गूदड़ चौधरी चौपाल में बोतल और कुञ्जी लिये कुछ देर तक विचार में
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डूबे बैठे रहे। फिर कुञ्जी फेंक दी। बोतल उठाकर आले पर रख दी और मुन्नी को पुकारकर कहा--अमर भैया से कह, आकर खाना खा लें। इस भले आदमी को जैसे भूख ही नहीं लगती, पहर रात गयी, अभी तक खाने पीने की सुधि नहीं।

मुन्नी ने बोतल की ओर देखकर कहा--तुम जब तक पी लो। मैंने तो इसीलिए नहीं बुलाया।

गूदड़ ने अरुचि से कहा--आज तो पीने का जी नहीं चाहता बेटी। कौन बड़ी अच्छी चीज़ है?

मुन्नी आश्चर्य से चौधरी की ओर ताकने लगी। उसे आये यहाँ तीन साल से अधिक हुए। कभी चौधरी को नागा करते नहीं देखा, कभी उनसे मुँह से ऐसी विराग की बात नहीं सुनी। सशंक होकर बोली--आज तुम्हारा जी अच्छा नहीं है क्या दादा?

चौधरी ने हँसकर कहा--जी क्यों नहीं अच्छा है। मँगायी तो थी पीने ही के लिए; पर अब जी नहीं चाहता। अमर भैया की बात आज मेरे मन में बैठ गयी। कहते हैं--जहाँ सौ में अस्सी आदमी भूखों मरते हों, वहाँ दारू पीना ग़रीबों का रक्त पीने के बराबर है। कोई दूसरा कहता, तो न मानता; पर उनकी बात न जाने क्यों दिल में बैठ जाती है।

मुन्नी चिन्तित हो गयी--तुम उनके कहने में न आओ, दादा! अब छोड़ना तुम्हें अवगुन करेगा। कहीं देह में दरद होने लगे।

चौधरी ने इन विचारों को जैसे तुच्छ समझकर कहा--चाहे दरद हो, चाहे बाई हो, अब पीऊँगा नहीं। जिन्दगी में हज़ारों रुपये की दारू पी गया। सारी कमाई नशे में उड़ा दी। उतने रुपये से कोई उपकार का काम करता, तो गाँव का भला होता और जस भी मिलता। मूरख को इसी से बुरा कहा है। साहब लोग सुना है, बहुत पीते हैं; पर उनकी बात निराली है। यहाँ राज करते हैं। लूट का धन मिलता है, वह न पीयें, तो कौन पीये। देखती है, अब काशी और पयाग को भी कुछ लिखने-पढ़ने का चस्का होने लगा है।

पाठशाला बन्द हुई। अमर, तेजा और दुर्जन की उँगली पकड़े हुए आकर चौधरी से बोला--मुझे तो आज देर हो गयी है दादा, तुमने खा-पी लिया न?

चौधरी स्नेह में डूब गये--हाँ और क्या, मैं ही तो पहर रात से जुता

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हुआ हूँ, मैं ही तो जूते लेकर रिसीकेस गया था। इस तरह जान दोगे, तो मुझे तुम्हारी पाठशाला बन्द करनी पड़ेगी।

अमर की पाठशाला में अब लड़कियाँ भी पढ़ने लगी थीं। उसके आनन्द का पारावार न था।

भोजन करके चौधरी सोये। अमर चलने लगा, तो मुन्नी ने कहा--आज तो लाला तुमने बड़ा भारी पाला मारा। दादा ने आज एक घूँट भी नहीं पी।

अमर उछलकर बोला--कुछ कहते थे?

'तुम्हारा जस गाते थे, और क्या कहते। मैं तो समझती थी, मरकर ही छोड़ेंगे; पर तुम्हारा उपदेश काम कर गया।'

अमर के मन में कई दिन से मुन्नी का वृत्तान्त पूछने की इच्छा हो रही थी; पर अवसर न पाता था। आज मौका पाकर उसने पूछा--तुम मुझे नहीं पहचानती हो; लेकिन मैं तुम्हें पहचानता हूँ।

मुन्नी के मुख का रङ्ग उड़ गया। उसने चुभती हुई आँखों से अमर को देखकर कहा--तुमने कह दिया, तो मुझे याद आ रहा है, तुम्हें कहीं देखा है।

'काशी के मुक़दमे की बात याद करो।'

'अच्छा, हाँ याद आ गया। तुम्हीं डाक्टर साहब के साथ रुपये जमा करते फिरते थे; मगर तुम यहाँ कैसे आ गये ?'

'पिताजी से लड़ाई हो गयी। तुम यहाँ कैसे पहुँचीं और इन लोगों के बीच में कैसे आ पड़ी?'

मुन्नी घर में जाती हुई बोली--फिर कभी बताऊँगी; पर तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ, यहाँ किसी से कुछ न कहना।

अमर ने अपनी कोठरी में जाकर बिछावन के नीचे से धोतियों का एक जोड़ा निकाला और सलोनी के घर जा पहुँचा। सलोनी भीतर पड़ी नींद को बुलाने के लिए गा रही थी। अमर की आवाज़ सुनकर टट्टी खोल दी और बोली--क्या है बेटा! आज तो बड़ा अँधेरा है। खाना खा चुके? मैं तो अभी चर्खा कात रही थी। पीठ दुखने लगी, तो आकर पड़ रही।

अमर ने धोतियों का जोड़ा निकालकर कहा--मैं यह जोड़ा लाया हूँ। इसे ले लो। तुम्हारा सूत पूरा हो जायगा, तो मैं ले लूँगा।

सलोनी उस दिन अमर पर अविश्वास करने के कारण उससे सकुचाती

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थी। ऐसे भले आदमी पर उसने क्यों अविश्वास किया। लजाती हुई बोली--अभी तुम क्यों लाये भैया? सूत कत जाता, तो ले आते।

अमर के हाथ में लालटेन थी। बुढ़िया ने जोड़ा ले लिया और उसकी तहों को खोलकर ललचाई हुई आँखों से देखने लगी। सहसा वह बोल उठी--यह तो दो हैं बेटा, मैं दो लेकर क्या करूँगी। एक तुम लेते जाओ!

अमरकान्त ने कहा--तुम दोनों रख लो काकी! एक से कैसे काम चलेगा।

सलोनी को अपने जीवन के सुनहरे दिनों में भी दो धोतियाँ मयस्सर न हुई थीं। पति और पुत्र के राज में भी एक धोती से ज्यादा कभी न मिली। और आज ऐसी सुन्दर दो-दो साड़ियाँ मिल रही हैं, ज़बरदस्ती दी जा रही हैं। उसके अन्तःकरण से मानों दूध की धारा बहने लगी। उसका सारा वैधव्य, सारा मातृत्व, आशीर्वाद बनकर उसके एक-एक रोम को स्पन्दित करने लगा।

अमरकान्त कोठरी से बाहर निकल आया। सलोनी रोती रही।

अपनी झोपड़ी में आकर अमर कुछ अनिश्चित दशा में खड़ा रहा। फिर अपनी डायरी लिखने बैठ गया। उसी वक्त चौधरी के घर का द्वार खुला और मुन्नी कलसा लिये पानी भरने निकली। इधर लालटेन जलती देखकर वह इधर चली आई, और द्वार पर खड़ी होकर बोली--अभी सोये नहीं लाला, रात तो बहुत गयी।

अमर बाहर निकलकर बोला--हाँ, अभी नींद नहीं आयी। क्या पानी नहीं था?

'हाँ आज सब पानी उठ गया। अब जो प्यास लगी, तो कहीं एक बूंद नहीं !'

'लाओ, मैं खींच ला दूँ। तुम इस अँधेरी रात में कहाँ जाओगी।'

'अँधेरी रात में शहरवालों को डर लगता है। हम तो गाँव के हैं।'

'नहीं मुन्नी, मैं तुम्हें न जाने दूँगा।'

'तो क्या मेरी जान से तुम्हारी जान प्यारी है ?'

'मेरी जैसी एक लाख जानें तुम्हारी जान पर न्यौछानर हैं।'

मुन्नी ने उसकी ओर अनुरक्त नेत्रों से देखा--तुम्हें भगवान् ने मेहरिया

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क्यों नहीं बनाया लाला। इतना कोमल हृदय तो किसी मर्द का न देखा। मैं तो कभी-कभी सोचती हूँ, तुम यहाँ न आते, तो अच्छा होता।

अमर मुस्कराकर बोला--मैंने तुम्हारे साथ क्या बुराई की है मुन्नी ?

मुन्नी काँपते हुए स्वर में बोली--बुराई नहीं की ? जिस अनाथ बालक का कोई पूछने वाला न हो, उसे गोद और खिलौनों और मिठाइयों का चसका डाल देना क्या बुराई नहीं? यह सुख पाकर क्या वह बिना लाड़-प्यार के रह सकता है ?

अमर ने करुण स्वर में कहा--अनाथ तो मैं था मुन्नी ! तुमने मुझे गोद और प्यार का चसका डाल दिया। मैंने तो रो-रोकर तुम्हें दिक ही किया है।

मुन्नी ने कलसा ज़मीन पर रख दिया और बोली--मैं तुमसे बातों में न जीतूँगी लाला; लेकिन तुम न थे, तब मैं बड़े आनन्द से थी। घर का धन्धा करती थी, रूखा-सूखा खाती थी और सो रहती थी। तुमने मेरा वह सुख छीन लिया। अपने मन में कहते होगे, बड़ी चंचल नार है। कहो, जब मर्द औरत हो जाय, तो औरत को मर्द बनना ही पड़ेगा। जानती हूँ, तुम मुझसे भागे-भागे फिरते हो, मुझसे गला छुड़ाते हो। यह भी जानती हूँ, तुम्हें पा नहीं सकती। मेरे ऐसे भाग्य कहाँ ? पर छोड़ूँगी नहीं। मैं तुमसे और कुछ नहीं माँगती। बस इतना ही चाहती हूँ, कि तुम मुझे अपनी समझो। मुझे मालूम हो कि में भी स्त्री हूँ, मेरे सिर पर भी कोई है, मेरी ज़िन्दगी भी किसी के काम आ सकती है।

अमर ने अब तक मुन्नी को उसी तरह देखा था, जैसे हर एक युवक किसी सुन्दरी स्त्री को देखता है--प्रेम से नहीं, केवल रसिक भाव से, पर इस आत्म-समर्पण ने उसे विचलित कर दिया। दुधार गाय के भरे हुए थनों को देखकर हम प्रसन्न होते हैं--इनमें कितना दूध होगा। केवल उसकी मात्रा का भाव हमारे मन में आ जाता है। हम गाय को पकड़कर दुहने के लिए तैयार नहीं हो जाते; लेकिन दूध का सामने कटोरे में आ जाना दूसरी बात है। अमर ने दूध के कटोरे की ओर हाथ बढ़ा दिया--आओ हम तुम कहीं चले चलें मुन्नी, वहाँ मैं कहूँगा यह मेरी...

मुन्नी ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया और बोली–-बस, और कुछ न कहना। मर्द सब एक-से होते हैं। मैं क्या कहती थी, तुम क्या समझ गये। [ १६३ ]
मैं तुमसे सगाई नहीं करूँगी, तुम्हारी रखेली भी नहीं बनूंगी। तुम मुझे अपनी चेरी समझते रहो, यही मेरे लिये बहुत है।

मुन्नी ने कलसा उठा लिया और कुएँ की ओर चल दी। अमर रमणीहृदय का यह अद्भुत रहस्य देखकर स्तम्भित हो गया।

सहसा मुन्नी ने पुकारा--लाला, ताजा पानी लाई हूँ। एक लोटा लाऊँ ?

पीने की इच्छा होने पर भी अमर ने कहा--अभी तो प्यास नहीं है मुन्नी!