कर्मभूमि/दूसरा भाग ४

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

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तीन महीने तक अमर ने किसी को खत न लिखा। कहीं बैठने की मुहलत ही न मिली। सकीना का हाल-चाल जानने के लिए हृदय तड़प-तड़पकर रह जाता था। नैना की भी याद आ जाती थी। बेचारी रो-रोकर मरी जाती होगी। बच्चे का हँसता हुआ फूल-सा मुखड़ा याद आता रहता था; पर कहीं अपना पता-ठिकाना हो तब तो खत लिखे ! एक जगह तो रहना नहीं होता था। यहाँ आने के कई दिन बाद उसने तीन खत लिखे--सकीना, सलीम और नैना के नाम। सकीना का पत्र सलीम के लिफ़ाफे में ही बन्द कर दिया था। आज जवाब आ गये हैं। डाकिया अभी दे गया है। अमर गङ्गा-तट पर एकान्त में जाकर इन पत्रों को पढ़ रहा है। वह नहीं चाहता, बीच में कोई बाधा हो, लड़के आ आकर पूछें--किसका खत है।

नैना लिखती है--'भला, आपको इतने दिनों के बाद मेरी याद तो आई। मैं आपको इतना कठोर न समझती थी। आपके बिना इस घर में कैसे रहती हूँ, इसकी आप कल्पना नहीं कर सकते, क्योंकि आप आप हैं, और मैं मैं । साढ़े चार महीने और आपका एक पत्र नहीं, कुछ खबर भी नहीं! आँखों से कितना आँसू निकल गया, कह नहीं सकती। रोने के सिवा आपने और काम ही क्या छोड़ा। आपके बिना मेरा जीवन इतना सूना हो जायगा, मुझे यह न मालूम था।

'आपकी इतने दिनों की चुप्पी का कारण मैं समझती हूँ, पर वह आपका भ्रम है भैया! आप मेरे भाई हैं। संसार आप पर हँसे, सारे देश में आपकी निन्दा हो, पर आप मेरे भाई हैं। आज आप मुसलमान या ईसाई हो जायँ,
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तो क्या आप मेरे भाई न रहेंगे? जो नाता भगवान् ने जोड़ दिया है, क्या उसे आप तोड़ सकते हैं? इतना बलवान मैं आपको नहीं समझती। इससे भी प्यारा और कोई नाता संसार में है, मैं नहीं समझती। मां में केवल वात्सल्य है। बहन में क्या है, नहीं कह सकती, पर वह वात्सल्य से कोमल अवश्य है। मां अपराध का दण्ड भी देती है। बहन क्षमा का रूप है। भाई न्याय करे, डाँटे या प्यार करे, मान करे, अपमान करे, बहन के पास क्षमा के सिवा और कुछ नहीं है। वह केवल उसके स्नेह को भूखी है।

'जबसे आप गये हैं, किताबों की ओर ताकने की इच्छा नहीं होती। रोना आता है। किसी काम में जी नहीं लगता। चरखा भी पड़ा मेरे नाम को रो रहा है। बस अगर कोई आनन्द की वस्तु है, तो वह मुन्नू है। वह मेरे गले का हार हो गया है। क्षण-भर को भी नहीं छोड़ता। इस वक्त सो गया है, तब यह पत्र लिख सकी हूँ, नहीं उसने चित्रलिपि में वह पत्र लिखा होता, जिसको बड़े-बड़े विद्वान् भी न समझ सकते। भाभी को उससे अब उतना स्नेह नहीं रहा। आपकी चर्चा वह कभी भूलकर भी नहीं करतीं। धर्म-चर्चा और भक्ति से उन्हें विशेष प्रेम हो गया है। मुझसे भी बहुत कम बोलती है। रेणुका देवी उन्हें लेकर लखनऊ जाना चाहती थीं पर वह नहीं गयीं। एक दिन उनकी गऊ का विवाह था। शहर के हजारों देवताओं का भोज हुआ। हम लोग भी गये थे। यहां के गऊशाले के लिए उन्होंने दस हजार रुपये दान किये हैं।

'अब दादाजी का हाल सुनिये। वह आजकल एक ठाकुरद्वारा बनवा रहे हैं। ज़मीन तो पहले ही ले चुके थे। पत्थर जमा हो रहा है। ठाकुरद्वारे की बुनियाद रखने के लिए राजा साहब को निमन्त्रण दिया जायगा। न-जाने क्यों दादा अब किसी पर क्रोध नहीं करते। यहाँ तक कि ज़ोर से बोलते भी नहीं। दाल में नमक तेज़ हो जाने पर जो थाली पटक देते थे, अब चाहे कितना ही नमक पड़ जाय, बोलते भी नहीं। सुनती हूँ, असामियों पर भी उतनी सख्ती नहीं करते। जिस दिन बुनियाद पड़ेगी, बहुत से असामियों का बक़ाया मुआफ़ भी करेंगे। पठानिन को अब पाँच की जगह पच्चीस रुपये मिलने लगे हैं। लिखने की तो बहुत-सी बातें हैं; पर लिखूँगी नहीं। आप अगर यहाँ आयें, तो छिपकर आइएगा, क्योंकि लोग झल्लाये हए हैं। हमारे घर कोई नहीं आता-जाता।' [ १६५ ]
दूसरा खत सलीम का है : 'मैंने तो समझा था, तुम गंगाजी में डूब मरे और तुम्हारे नाम को, प्याज़ की मदद से, दो-तीन क़तरे आँसू बहा दिये थे और तुम्हारी रूह को नजात के लिए एक बरहमन को एक कौड़ी ख़ैरात भी कर दी थी, मगर यह मालूम करके रंज हुआ कि आप ज़िन्दा हैं और मेरा मातम बेकार हुआ। आँसुओं का तो ग़म नहीं, आँखों को कुछ फ़ायदा ही हुआ; मगर उस कौड़ी का जरूर ग़म है। भले आदमी, कोई पाँच-पाँच महीने तक यों खमोशी अख्तियार करता है ! खैरियत यही है कि तुम यहाँ मौजूद नहीं हो। बड़े क़ौमी खादिम की दुम हो। जो आदमी अपने प्यारे दोस्तों से इतनी बेवफ़ाई करे, वह क़ौम की खिदमत क्या खाक करेगा?

'खुदा की क़सम रोज तुम्हारी याद आती थी। कालेज जाता हूँ, जी नहीं लगता। तुम्हारे साथ कालेज की रौनक़ चली गयी। उधर अब्बाजान सिविल सर्विस की रट लगा-लगा कर और भी जान लिये लेते हैं। आख़िर कभी आओगे भी, या काले पानी की सज़ा भोगते रहोगे।

'कालेज के हाल साबिक़ दस्तूर हैं--वही ताश हैं, वही लेक्चरों से भागना है, वही मैच है। हाँ, कान्वोकेशन का ऐड्रेस अच्छा रहा। वाइस चांसलर ने सादा ज़िन्दगी पर जोर दिया। तुम होते, तो उस ऐड्रेस का मज़ा उठाते। मुझे तो वह फीका मालूम होता था। सादा ज़िन्दगी का सबक़ तो सब देते हैं पर कोई नमूना बनकर दिखाता नहीं। यह जो अनगिनती लेक्चरार और प्रोफ़ेसर हैं, क्या सब-के-सब सादा जिन्दगी के नमूने हैं ? वह तो लिविंग का स्टैंडर्ड ऊँचा कर रहे हैं, तो फिर लड़के भी क्यों न ऊँचा करें ? क्यों न बहती गंगा में हाथ धोयें ? वाइस चांसलर साहब, मालूम नहीं, सादगी का सबक़ अपने स्टाफ़ को क्यों नहीं देते ! प्रोफेसर भाटिया के पास तीस जोड़े जूते हैं और बाज़-बाज़ ५०) के हैं। खेर, उनकी बात छोड़ो। प्रोफ़ेसर चक्रवती तो बड़े किफ़ायतशार मशहूर हैं। जोरू न जाँता, अल्ला मियाँ से नाता। फिर भी जानते हो कितने नौकर हैं उनके पास ? कुल बारह ! तो भाई हम लोग तो नौजवान हैं, हमारे दिलों में नया शौक है, नये अरमान हैं, घरवालों से माँगेंगे, न देंगे तो लड़ेंगे, दोस्तों से क़र्ज लेंगे, दुकानदारों की खुशामद करेंगे; मगर शान से रहेंगे ज़रूर। वह जहन्नम में जा रहे हैं, तो हम भी जहन्नम जायँगे, मगर इनके पीछे-पीछे। [ १६६ ] 'सकीना का हाल भी कुछ सुनना चाहते हो? माँ को बीसों ही बार भेजा, कपड़े भेजे; पर कोई चीज़ न ली। माँ कहती है, दिन भर में एकाध चपाती खा ली तो खा ली, नहीं चुपचाप पड़ी रहती है। दादी से बोलचाल बन्द है। कल तुम्हारा खत पाते ही उसके पास भेज दिया था। उसका जवाब जो आया, उसकी हूबहू नक़ल यह है। असली खत उस वक्त देखने को पाओगे जब यहां आओगे---

'बाबूजी, आपको मुझ बदनसीब के कारण यह सजा मिली, इसका मुझे बड़ा रंज है। और क्या कहूँ। जीती हूँ और आपको याद करती हूँ। इतना अरमान है, कि मरने के पहले एक बार आपको देख लेती; लेकिन इसमें भी आपकी बदनामी ही है, और मैं तो बदनाम हो ही चुकी। कल आपका खत मिला, तबसे कितनी ही बार सौदा उठ चुका है कि आपके पास चली आऊँ। क्या आप नाराज़ होंगे? मुझे तो यह खौफ़ नहीं है। मगर दिल को समझाऊँगी और शायद कभी मरूँगी भी नहीं। कुछ देर तो गुस्से के मारे तुम्हारा खत न खोला। पर कब तक? खत खोला, पढ़ा, रोयी, फिर पढ़ा, फिर रोयी। रोने में इतना मज़ा है कि जी नहीं भरता। अब इन्तज़ार की तकलीफ़ नहीं झेली जाती। खुदा आपको सलामत रखे।'

'देखा, यह खत कितना दर्दनाक है! मेरी आँखों में बहुत कम आँसू आते है; लेकिन यह खत देखकर ज़ब्त न कर सका। कितने खुशनसीब हो तुम !'

अमर ने सिर उठाया, तो उसकी आँखों में नशा था, वह नशा जिसमें आलस्य नहीं, स्फूर्ति है; लालिमा नहीं, दीप्ति है; उन्माद नहीं, विस्मृति नहीं, जागृति है। उसके मनोजगत् में ऐसा भूकम्प कभी न आया था। उसकी आत्मा कभी इतनी उदार, इतनी विशाल, इतनी प्रफुल्ल न थी। आँखों के सामने दो मूर्तियाँ खड़ी हो गयीं, एक विलास में डूबी हुई, रत्नों से अलंकृत, गर्व में चूर; दूसरी सरल माधुर्य से भूषित, लज्जा और विनय से सिर झुकाये हुए। उसका प्यासा हृदय उस खुशबूदार, मीठे शरबत से हटकर इस शीतल जल की ओर लपका। उसने पत्र के उस अंश को फिर पढ़ा, फिर आवेश में जाकर गंगा-तट पर टहलने लगा। सकीना से कैसे मिले? यह ग्रामीण जीवन उसे पसन्द आयेगा? कितनी सुकुमार है, कितनी कोमल! वह और यह कठोर जीवन? कैसे जाकर उसकी दिलजोई करे। उसकी वह सूरत याद आयी, जब उसने
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कहा था--बाबूजी, मैं भी चलती हूँ। ओह ! कितना अनुराग था। किसी मजूर को गढ़ा खोदते-खोदते जैसे कोई रत्न मिल जाय। और वह अपने अज्ञान में उसे काँच का टुकड़ा समझ रहा था!

'इतना अरमान है, कि मरने के पहले आपको देख लेती'--यह वाक्य जैसे उसके हृदय में चिमट गया था। उसका मन जैसे गङ्गा की लहरों पर तैरता हुआ सकीना को खोज रहा था। लहरों की ओर तन्मयता से ताकते-ताकते उसे मालूम हुआ मैं बहा जा रहा हूँ। वह चौंककर घर की तरफ़ चला। दोनों आँखें तर, नाक पर लाली और गालों पर आर्द्रता।'