कर्मभूमि/दूसरा भाग ५

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

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गाँव में एक आदमी सगाई लाया है। उस उत्सव में नाच, गाना, भोज हो रहा है। उसके द्वार पर नगड़ियाँ बज रही है, गाँव भर के स्त्री, पुरुष, बालक जमा हैं और नाच शुरू हो गया है। अमरकान्त की पाठशाला आज बन्द है। लोग उसे भी खींच लाये हैं।

पयाग ने कहा--चलो भैया, तुम भी कुछ करतब दिखाओ। सुना है तुम्हारे देश में लोग खूब नाचते हैं।

अमर ने जैसे क्षमा-सी माँगी--भाई, मुझे तो नाचना नहीं आता।

उसकी इच्छा हो रही है कि नाचना आता, तो इस समय सबको चकित कर देता।

युवकों और युवतियों के जोड़ बँधे हुए हैं। हरेक जोड़ दस-पन्द्रह मिनट तक थिरककर चला जाता है। नाचने में कितना उन्माद, कितना आनन्द है, अमर ने न समझा था।

एक युवती घूँघट बढ़ाये हुए रङ्गभूमि में आती है। इधर से पयाग निकलता है। दोनों नाचने लगते हैं। युवती के अङ्गों में इतनी लचक है, उसके अङ्ग-विलास में भावों की ऐसी व्यंजना कि लोग मुग्ध हुए जाते हैं।

इस जोड़ के बाद दूसरा जोड़ आता है। युवक गठीला जवान है, चौड़ी छाती, उस पर सोने की मुहर, कछनी काछे हुए। युवती को देखकर अमर चौंक उठा। मुन्नी है। उसने घेरदार लहँगा पहना है, गुलाबी ओढ़नी ओढ़ी है, और
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पाँव में पैजनियाँ बाँध ली हैं। गुलाबी घूँघट में दोनों कपोल दो फूलों की भाति खिले हुए हैं। दोनों कभी हाथ में हाथ मिलाकर, कभी कमर पर हाथ रखकर, कभी कूल्हों को ताल में मटकाकर नाचने में उन्मत्त हो रहे हैं। सभी मुग्ध नेत्रों से इन कलाविदों की कला देख रहे हैं। क्या फुरती है, क्या लचक है ! और उनकी एक-एक लचक में एक-एक गति में कितनी मार्मिकता, कितनी मादकता! दोनों हाथ में हाथ मिलाये, थिरकते हुए रङ्गभूमि के उस सिरे तक चले जाते हैं और क्या मजाल कि एक गति भी बेताल हो।

पयाग ने कहा--देखते हो भैया, भाभी कैसा नाच रही हैं। अपना जोड़ नहीं रखतीं।

अमर ने विरक्त भाव से कहा--हाँ देख तो रहा हूँ।

'मन हो, तो उठो, मैं उस लौंडे को बुला लूँ।'

'नहीं, मुझे नहीं नाचना है।'

मुन्नी नाच ही रही थी कि अमर उठकर घर चला आया। वह बेशर्मी अब उससे नहीं सही जाती।

एक ही क्षण के बाद मुन्नी ने आकर कहा--तुम चले क्यों आये लाला? क्या मेरा नाचना अच्छा न लगा?

अमर ने मुँह फेरकर कहा--क्या मैं आदमी नहीं हूँ कि अच्छी चीज़ को बुरा समझूँ ?

मुन्नी और समीप आकर बोली--तो फिर चले क्यों आये ?

अमर ने उदासीन भाव से कहा--मझे एक पंचायत में जाना है। लोग बैठे मेरी राह देख रहे होंगे। तुमने क्यों नाचना बन्द कर दिया?

मुन्नी ने भोलेपन से कहा--तुम चले आये, तो नाचकर क्या करती?

अमर ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा--सच्चे मन से कह रही हो मुन्नी?

मुन्नी उससे आँखें मिलाकर बोली--मैं तुमसे कभी झूठ बोली ?

'मेरी एक बात मानो। अब फिर कभी मत नाचना ।'

मुन्नी उदास होकर बोली--तो तुम इतनी ज़रा-सी बात पर रूठ गये? ज़रा किसी से पूछो, मैं आज कितने दिनों के बाद नाची हूँ। दो साल से मैं
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नगाड़े के पास नहीं गयी, लोग कह-कहकर हार गये। आज तुम्हीं मुझे ले गये, और अब उलटे तुम्हीं नाराज़ होते हो!

मुन्नी घर में चली गयी। थोड़ी देर बाद काशी ने आकर कहा--भाभी, तुम यहाँ क्या कर रही हो? तुम्हें वहाँ सब लोग बुला रहे हैं।

मन्नी ने सिर-दर्द का बहाना किया।

काशी आकर अमर से बोला--तुम क्यों चले आये भैया? क्या गँवारों का नाच गाना अच्छा न लगा?

अमर ने कहा--नहीं जी, यह बात नहीं। एक पंचायत में जाना है। देर हो रही है।

काशी बोला--भाभी नहीं जा रही हैं। इसका नाच देखने के बाद अब दूसरों का रंग नहीं जम रहा है। तुम चलकर कह दो, तो साइत चली जाय। कौन रोज़-रोज़ यह दिन आता है। बिरादरीवाली बात है। लोग कहेंगे, हमारे यहां काम आ पड़ा, तो मुँह छिपाने लगे।

अमर ने धर्म-संकट में पड़कर कहा--तुमने समझाया नहीं?

फिर अन्दर जाकर कहा--मुझसे नाराज़ हो गयीं मुन्नी ?

मन्नी आँगन में आकर बोली--तुम मझसे नाराज़ हो गये, कि मैं तुमसे नाराज़ हो गयी ?

'अच्छा, मेरे कहने से चलो।'

'जैसे बच्चे मछलियों को खिलाते हैं, उसी तरह तुम मुझे खिला रहे हो, लाला! जब चाहा रुला दिया, जब चाहा हँसा दिया। लाला अब तो मुन्नी तभी नाचेगी, जब तुम उसका हाथ पकड़कर कहोगे--चलो हम-तुम नाचें। वह अब और किसी के साथ न नाचेगी।'

'तो अब नाचना सीखूँ ?'

मुन्नी ने अपनी विजय का अनुभव करके कहा--मेरे साथ नाचना चाहोगे, तो आप सीखोगे।

'तो सिखा दोगी?'

'तुम मुझे रोना सिखा रहे हो, मैं तुम्हें नाचना सिखा दूँगी।'

'अच्छा चलो।'

कालेज के सम्मेलनों में अमर कई बार ड्रामा खेल चुका था। स्टेज पर
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नाचा भी था, गाया भी था; पर उस नाच और इस नाच में बड़ा अन्तर था। वह विलासियों की काम-कीड़ा थी, यह श्रमिकों की स्वच्छन्द केलि। उसका दिल सहमा जाता था।

उसने कहा--मुन्नी, तुमसे एक वरदान माँगता हूँ।

मुन्नी ने ठिठककर कहा--तो तुम नाचोगे नहीं?

'यही तो तुमसे वरदान माँग रहा हूँ।'

अमर ठहरो ठहरो कहता रहा, पर मुन्नी लौट पड़ी।

अमर भी अपनी कोठरी में चला आया, और कपड़े पहनकर पंचायत में चला गया। उसका सम्मान बढ़ रहा है। आस-पास के गाँवों में भी जब कोई पंचायत होती है, तो उसे अवश्य बुलाया जाता है।