कर्मभूमि/पहला भाग ८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

[ ५३ ]

जीवन में कुछ सार है, अमरकान्त को इसका अनुभव हो रहा था। वह एक शब्द भी मुँह से ऐसा नहीं निकालना चाहता, जिससे सुखदा को [ ५४ ]दुःख हो, क्योंकि वह गर्भवती है। उसकी इच्छा के विरुद्ध वह छोटी-से छोटी बात भी नहीं कहना चाहता। वह गर्भवती है। उसे अच्छी-अच्छी किताबें पढ़कर सुनाई जाती हैं। रामायण, महाभारत और गीता से अब अमर को विशेष प्रेम है; क्योंकि सुखदा गर्भवती है। बालक के संस्कारों का सदैव ध्यान बना रहता है। सुखदा को निरंतर प्रसन्न रखने की चेष्टा की जाती है। उसे थियेटर, सिनेमा दिखाने में अब अमर को संकोच नहीं होता। कभी फूलों के गजरे आते हैं। कभी कोई मनोरंजन की वस्तु। सुबह-शाम वह दूकान पर भी बैठता है। सभाओं की ओर उसको रुचि नहीं है। वह पुत्र का पिता बनने जा रहा है इसकी कल्पना से उसमें ऐसा उत्साह भर जाता है, कि वह कभी-कभी एकान्त में नतमस्तक होकर कृष्ण के चित्र के सामने सिर झका लेता है। सूखदा तप कर रही है। अमर अपने को नई जिम्मेदारियों के लिये तैयार कर रहा है। अब तक वह समतल भूमि पर था, बहुत सँभलकर चलने की उतनी ज़रूरत न थी। अब वह ऊँचाई पर जा पहुँचा है। वहाँ बहुत सँभालकर पांव रखना पड़ता है।

लाला समरकान्त भी आज-कल बहुत खुश नज़र आते हैं। बीसों ही बार अन्दर जाकर सुखदा से पूछते हैं कि किसी चीज़ की जरूरत तो नहीं है। अमर पर उनकी कृपा दृष्टि हो गई है। उसके आदर्शवाद को वह उतना बुरा नहीं समझते। एक दिन काले खां को उन्होंने दुकान से खड़े-खड़े निकाल दिया। असामियों पर अब वे उतना नहीं बिगड़ते, उतनी नालिशें नहीं करते। उनका भविष्य उज्ज्वल हो गया है। एक दिन रेणुका से बातें हो रही थीं। अमरकान्त की निष्ठा की उन्होंने दिल खोलकर प्रशंसा की।

रेणुका उतनी प्रसन्न न थी। प्रसव के कष्टों को याद करके वह भयभीत हो जाती थी। बोली--लालाजी, मैं तो भगवान से यही मनाती हूँ कि जब हँसाया है, तो बीच में रुलाना मत। पहलौंठी में बड़ा संकट रहता है। स्त्री का दूसरा जन्म हो जाता है।

समारकान्त को ऐसी कोई शंका न थी। बोले--मैंने तो बालक का नाम सोच लिया है। उसका नाम होगा--रेणुकान्त।

रेणुका आशंकित होकर बोली--अभी नाम न रखिए लालाजी ! इस संकट से उद्धार हो जाय, तो नाम सोच लिया जायगा। मैं तो सोचती हूँ, [ ५५ ]दुर्गा-पाठ बैठा दीजिए। इस महल्ले में एक दाई रहती है ; उसे अभी रख लिया जाय, तो अच्छा हो। बिटिया अभी बहुत-सी बातें नहीं समझती। दाई उसे सँभालती रहेगी।

लालाजी ने इस प्रस्ताव को हर्ष से स्वीकार कर लिया। यहाँ से जब वह घर लौटे तो देखा--दूकान पर दो गोरे और एक मेम बैठे हैं और अमरकान्त उनसे बातें कर रहा है। कभी-कभी नीचे दरजे के गोरे यहाँ अपनी घड़ियाँ या कोई और चीज बेचने के लिए आ जाते थे। लालाजी उन्हें खूब ठगते थे। वह जानते थे कि ये लोग बदनामी के भय से किसी दूसरी दूकान पर न जायेंगे। उन्होंने जाते-ही-जाते अमरकान्त को हटा दिया और खुद पटाने लगे। अमरकान्त स्पष्टवादी था और यह स्पष्टवादिता का अवसर न था। मेमसाहब को सलाम करके पूछा--कहिए मेम साहब, क्या हुक्म है।

तीनों शराब के नशे में चूर थे। मेम साहब ने सोने की एक जंजीर निकालकर कहा--सेठजी, हम इसको बेचना चाहता है। बाबा बहुत बीमार है। उसका दवाई में बहुत खरच हो गया।

समरकान्त ने जंजीर लेकर देखा और हाथ में तौलते हुए बोले--इसका सोना तो अच्छा नहीं है मेम साहब ! आपने कहाँ बनवाया था?

मेम हँसकर बोली--ओ ! तुम बराबर यही बात करता है। सोना बहुत अच्छा है। अंग्रेजी दूकान का बना हुआ है। आप इसको ले लें।

समरकान्त ने अनिच्छा का भाव दिखाते हुए कहा--बड़ी-बड़ी दूकानें ही तो गाहकों को उलटे छूरे से मूंड़ती हैं। जो कपड़ा यहाँ बाजार में छ: आने मिलेगा, वही अँगरेजी दुकान पर बारह आने गज से नीचे न मिलेगा। मैं तो इसके दाम दस रुपया तोले से बेशी नहीं दे सकता।

'और कुछ नहीं देगा?'

'और कुछ नहीं। यह भी आपकी खातिर है।'

यह गोरे उस श्रेणी के थे, जो अपनी आत्मा को शराब और जुए के हाथों बेच देते हैं, बेटिकट फर्स्ट क्लास में सफर करते हैं, होटल वालों को धोखा देकर उड़ जाते है और जब कुछ बस नहीं चलता, तो बिगड़े हुए शरीफ बनकर भीख माँगते हैं। तीनों ने आपस में सलाह की और जंजीर बेच डाली। रुपये [ ५६ ]लेकर दुकान से उतरे और ताँगे पर बैठे ही थे कि एक भिखारिन ताँगे के पास आकर खड़ी हो गयी। वह तीनों रुपये पाने की खुशी में भूले हुए थे कि सहसा उस भिखारिन ने छुरी निकालकर एक गोरे पर वार किया। छुरी उसके मुंह पर आ रही थी, उसने घबड़ाकर मुंह पीछे हटाया, तो छाती में चुभ गयी। वह तो ताँगे पर ही हाय-हाय करने लगा। शेष दोनों गोरे ताँगे से उतर पड़े और दुकान पर आकर प्राण रक्षा करना चाहते थे कि भिखारिन ने दूसरे गोरे पर वार कर दिया। छुरी उसकी पसली में पहुँच गयी। दूकान पर चढ़ने न पाया था, धड़ाम से गिर पड़ा। भिखारिन लपककर दुकान पर चढ़ गयी और मेम पर झपटी कि अमरकान्त हाँ हाँ करके उसकी छरी छीन लेने को बढ़ा। भिखारिन ने उसे देखकर छुरी फेंक दी और दुकान के नीचे कूदकर खड़ी हो गयी। सारे बाजार में हलचल पड़ गयी--एक गोरे ने कई आदमियों को मार डाला है, लाला समरकान्त मार डाले गये, अमरकान्त को भी चोट आयी है। ऐसी दशा में किसे अपनी जान भारी थी, जो वहाँ आता। लोग दुकानें बन्द करके भागने लगे।

दोनों गोरे जमीन पर पड़े तड़प रहे थे। ऊपर मेम सहसी हुई खड़ी थी और लाला समरकान्त, अमरकान्त का हाथ पकड़कर अन्दर घसीट ले जाने की चेष्टा कर रहे थे। भिखारिन भी सिर झुकाये जड़बत खड़ी थी--ऐसी भोली-भाली जैसे कुछ किया ही नहीं है।

वह भाग सकती थी, कोई उसका पीछा करने का साहस न करता; पर भागी नहीं। वह आत्मघात कर सकती थी। उसकी छुरी अब भी जमीन पर पड़ी हुई थी पर उसने आत्मघात भी न किया। वह तो इस तरह खड़ी थी, मानो उसे यह सारा दृश्य देखकर विस्मय हो रहा हो।

सामने के कई दूकानदार जमा हो गये। पुलिस के दो जवान भी आ पहुँचे। चारों तरफ से आवाज आने लगी--यही औरत है ! यही औरत है !

पुलिसवालों ने उसे पकड़ लिया।

एक दस मिनट में सारा शहर और सारे अधिकारी वहाँ आकर जमा हो गये। सब तरफ लाल पगड़ियाँ दीख पड़ती थीं। सिविल सर्जन ने आकर आहतों को उठवाया और अस्पताल ले चले। इधर तहकीकात होने लगी। भिखारिन ने अपना अपराध स्वीकार किया।
[ ५७ ]पुलिस के सुपरिन्टेन्डेंट ने पूछा--तेरी इन आदमियों से कोई अदावत थी?---भिखारिन ने कोई जवाब न दिया।

सैकड़ों आवाजें आयीं--बोलती क्यों नहीं? हत्यारिनी!

भिखारिनी ने दृढ़ता से कहा--मैं हत्यारिनी नहीं हूँ।

'इन साहबों को तूने नहीं मारा ?'

'हाँ, मैने मारा।'

'तो तू हत्यारिनी कैसे नहीं है ?'

मैं हत्यारिनी नहीं हूँ। आज से छः महीने पहले ऐसे ही तीन आदमियों ने मेरी आवरू बिगाड़ी थी। मैं फिर घर नहीं गयी। किसी को अपना मुंह नहीं दिखाया। मुझे होश नहीं कि मैं कहाँ-कहाँ फिरी, कैसे रही, क्या-क्या किया। इस वक्त भी मुझे होश तब आया जब मैं इन दोनों गोरों को घायल कर चकी थी। तब मुझे मालूम हआ कि मैंने क्या किया। मैं बहत गरीब हूँ। मैं नहीं कह सकती, मुझे छुरी किसने दी, कहाँ से मिली, और मुझमें इतनी हिम्मत कहाँ से आयी। मैं यह इसलिए नहीं कह रही हूँ, कि मैं फाँसी से डरती हूँ। मैं तो भगवान् से मनाती हूँ कि जितनी जल्द हो सके, मुझे संसार से उठा लो! जब आबरू लुट गयी, तो जीकर क्या करूँगी।'

इस कथन ने जनता की मनोवृत्ति बदल दी। पुलिस ने जिन जिन लोगों के बयान लिये, सबने यही कहा--यह पगली है । इधर-उधर मारी-मारी फिरती थी। खाने को दिया जाता था, तो कुत्तों के आगे डाल देती थी। पैसे दिये जाते थे, तो फेंक देती थी।

एक तांगेवाले ने कहा--यह बीच सड़क पर बैठी हुई थी। कितनी ही घण्टी बजाई, पर रास्ते से हटी नहीं। मजबूर होकर पटरी से तांगा निकल गया।

एक पानवाले ने कहा--एक दिन मेरी दूकान पर आकर खड़ी हो गयी। मैने एक बीड़ा दिया। उसे जमीन पर डालकर पैरों से कुचलने लगी, फिर गाती हुई चली गयी।

अमरकान्त का बयान भी हुआ। लालाजी तो चाहते थे कि इस झंझट में न पड़ें, पर अमरकान्त ऐसा उत्तेजित हो रहा था, [ ५८ ]कि उन्हें दुबारा कुछ कहने का हौसला न हुआ। अमर ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया। रंग को चोखा करने के लिए दो-चार बातें अपनी तरफ से जोड़ दीं।

पुलिस के अफसर ने पूछा--तुम कह सकते हो, यह औरत पागल है ?

अमरकान्त बोला--जी हाँ, बिल्कुल पागल। बीसियों ही बार उसे अकेले हँसते या रोते देखा। कोई कुछ पूछता था, तो भाग जाती थी।

यह सब झूठ था। उस दिन के बाद आज यह औरत पहली बार यहाँ उसे नज़र आयी थी। संभव है, उसने कभी इधर-उधर देखा भी हो, पर वह उसे पहचान न सका था।

जब पुलिस पगली को लेकर चली, तो दो हजार आदमी थाने तक उसके साथ गये। अब वह जनता की दृष्टि में साधारण स्त्री न थी, देवी के पद पर पहुँच गयी थी। किसी दैवी शक्ति के बगैर उसमें इतना साहस कहाँ से आ जाता। रात-भर शहर के अन्य भागों के लोग आ-आकर घटना स्थल का मुआइना करते रहे। दो एक आदमी उस काण्ड की व्याख्या करने में हार्दिक आनन्द प्राप्त कर रहे थे। यों आकर ताँगे के पास खड़ी हो गयी, यों छुरी निकाली, यो झपटी, यों दोनों दुकान पर चढ़े, यों दूसरे गोरे पर टूटी। भैया अमरकान्त सामने न आ जायँ, तो मेम का काम भी तमाम कर देती। उस समय उसकी आँखों से लाल अंगारे निकल रहे थे। मुख पर ऐसा तेज था, मानों दीपक हो।

अमरकान्त अन्दर गया, तो देखा नैना भावज का हाथ पकड़े सहमी खड़ी है और सुखदा राजसी करुणा से आन्दोलित हो, सजल-नेत्र चारपाई पर बैठी हुई है। अमर को देखते ही वह खड़ी हो गई और बोली--यह वही औरत थी न?

'हाँ वही मालूम होती है।'

'तो अब फाँसी पा जायगी।'

'शायद बच जाय, आशा कम है।'

'अगर इसको फाँसी हो गयी तो मैं समझूँगी, संसार से न्याय उठ गया। उसने कोई अपराध नहीं किया। जिन दुष्टों ने उस पर ऐसा अत्याचार किया उन्हें यहीं दण्ड मिलना चाहिए था। मैं अगर न्याय के पद पर होती, तो उसे [ ५९ ]बेदाग छोड़ देती। ऐसी देवी की तो प्रतिमा बनाकर पूजनी चाहिए। उसने अपनी सारी बहनों का मुख उज्ज्वल कर दिया।

अमरकान्त ने कहा-–लेकिन यह तो कोई न्याय नहीं कि काम कोई करे, सज़ा कोई पाये।

सुखदा ने उग्र भाव से कहा--वे सब एक हैं। जिस जाति में ऐसे दुष्ट हों उस जाति का पतन हो गया है। समाज में एक आदमी कोई बुराई करता है तो सारा समाज बदनाम हो जाता है और उसका दण्ड सारे समाज को मिलना चाहिए। एक गोरी औरत को सरहद का कोई आदमी उठा ले गया था। सरकार ने उसका बदला लेने के लिये सरहद पर चढ़ाई करने की तैयारी कर दी थी। अपराधी कौन है, इसे पूछा भी नहीं। उसकी निगाह में सारा सूबा अपराधी था। इस भिखारिन का कोई रक्षक न था। उसने अपनी आबरू का बदला खुद लिया। तुम जाकर वकीलों से सलाह लो, फाँसी न होने पावे, चाहे कितने ही रुपये खर्च हो जायें। मैं तो कहती हूँ, वकीलों को इस मुक़दमे की पैरवी मुफ्त करनी चाहिए। ऐसे मुआमले में भी कोई वकील मेहनताना माँगे, तो मैं समझूँगी वह मनुष्य नहीं। तुम अपनी सभा में आज जलसा करके चन्दा लेना शुरू कर दो। मैं इस दशा में भी इसी शहर से हजारों रुपये जमा कर सकती हूँ; ऐसी कौन नारी है जो उसके लिए नाहीं करदे।

अमरकान्त ने उसे शान्त करने के इरादे से कहा--जो कुछ तुम चाहती हो, वह सब होगा। नतीजा कुछ भी हो; पर हम अपनी तरफ से कोई बात उठा न रखेंगे। मैं जरा प्रो० शान्तिकुमार के पास जाता हूँ। तुम जाकर आराम से लेटो।

'मैं भी अम्मा के पास जाऊँगी। तुम मुझे छोड़कर चले जाना।'

अमर ने आग्रह-पूर्वक कहा--तुम चलकर शान्ति से लेटो, मैं अम्माँ से मिलता चला जाऊँगा।

सुखदा ने चिढ़कर कहा--ऐसी दशा में जो शान्ति से लेटे वह मृतक है ! इस देवी के लिए तो मुझे प्राण भी देने पड़ें, तो खुशी से दूँ। अम्माँ से मैं जो कहूँगी, वह तुम नहीं कह सकते। नारी के लिए नारी के हृदय में जो तड़प होगी, वह पुरुषों के हृदय में नहीं हो सकती। मैं अम्माँ से इस मुक से के [ ६० ]लिए पाँच हज़ार से कम न लूँगी। मुझे उनका वन न चाहिए। चंदा मिले तो वाह-वाह, नहीं तो उन्हें खुद निकल आना चाहिए। ताँगा बुलवा लो।

अमरकान्त को आज ज्ञात हुआ, विलासिनी के हृदय में कितनी वेदना, कितना स्वजाति-प्रेम, कितना उत्सर्ग है।

ताँगा आया और दोनों रेणुका देवी से मिलने चले।