कर्मभूमि/पाँचवाँ भाग ९

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

[ ३८३ ]

अमरकान्त ने वहीं भूमि पर मस्तक रखकर शुद्ध अन्तःकरण से अपने कर्तव्य की जिज्ञासा की---भगवान्, मैं अन्धकार में पड़ा हुआ हूँ। मुझे सीधा मार्ग दिखाइये। [ ३८४ ]और इस शान्त, दीन प्रार्थना में उसकी ऐसी शान्ति मिली मानो उसके सामने कोई प्रकाश आ गया है और उसकी फैली हुई रोशनी में चिकना रास्ता साफ़ नज़र आ रहा है।

पठानिन की गिरफ्तारी ने शहर में ऐसी हलचल मचा दी, जैसी किसी को आशा न थी। जीर्ण वृद्धावस्था में इस कठोर तपस्या ने मृतकों में भी जीवन डाल दिया, भीरु और स्वार्थ-सेवियों को भी कर्मक्षेत्र में ला खड़ा किया। लेकिन ऐसे निर्लज्जों की अब भी कमी न थी, जो कहते थे--इसके लिए जीवन में अब क्या धरा है। मरना ही तो है। बाहर न मरी, जेल में मरी। हमें तो अभी बहुत दिन जीना है, बहुत कुछ करना है, हम आग में कैसे कूदें।

सन्ध्या का समय है। मजदूर अपने-अपने काम छोड़कर, छोटे दूकानदार अपनी-अपनी दुकानें बन्द करके, घटना-स्थल की ओर भागे चले जा रहे हैं। पठानिन अब वहाँ नहीं है, जेल पहुँच गयी होगी। हथियारबन्द पुलिस का पहरा है, कोई जलसा नहीं हो सकता, कोई भाषण नहीं हो सकता, बहुत से आदमियों का जमा होना भी खतरनाक है; पर इस समय कोई कुछ नहीं सोचता, किसी को कुछ दिखायी नहीं देता। सब किसी वेगमय प्रवाह में बहे जा रहे हैं। एक क्षण में सारा मैदान जन-समूह से भर गया।

सहसा लोगों ने देखा, एक आदमी ईंटों के एक ढेर पर खड़ा कुछ कह रहा है। चारों ओर से दौड़-दौड़ कर लोग वहाँ जमा हो गये--जन-समूह का एक विराट् सागर उमड़ा हुआ था। यह आदमी कौन है? लाला समरकान्त? जिसकी बहू जेल में है, जिसका लड़का जेल में है।

'अच्छा, यह लाला है! भगवान बुद्धि दे तो इस तरह। पाप से जो कुछ कमाया, वह पुन में लुटा रहे हैं।'

'है बड़ा भागवान।'

'भागवान न होता, तो बुढ़ापे में इतना जस कैसे कमाता!'

'सुनो, सुनो!'

'वह दिन आयेगा, जब इसी जगह गरीबों के घर बनेंगे और जहाँ हमारी माता गिरफ्तार हुई है, वहीं एक चौक बनेगा और उस चौक के बीच में माता की प्रतिमा खड़ी की जायगी। बोलो माता पठानिन की जय!'

दस हजार गलों से 'माता की जय!' की ध्वनि निकलती है, विकल, [ ३८५ ]उत्तप्त, गंभीर, मानो ग़रीबों की हाय, संसार में कोई आश्रय न पाकर आकाशवासियों से फ़रियाद कर रही है।

'सुनो सुनो!'

'माता ने अपने बालकों के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। हमारे और आपके भी बालक हैं। हम और आप अपने बालकों के लिए क्या करना चाहते हैं, आज इसका निश्चय करना होगा।'

शोर मचता है, हड़ताल, हड़ताल!

'हाँ, हड़ताल कीजिए; मगर वह हड़ताल एक या दो दिन की न होगी, वह उस वक्त तक रहेगी, जब तक हमारे नगर के विधाता हमारी आवाज न सुनेंगे। हम गरीब हैं, दीन हैं, दुखी हैं; लेकिन बड़े आदमी अगर जरा शान्तचित्त होकर ध्यान करेंगे, तो उन्हें मालूम हो जायगा कि इन्हीं दीन-दुखी प्राणियों ही ने उन्हें बड़ा आदमी बना दिया है। ये बड़े-बड़े महल जान हथेली पर रखकर कौन बनाता है? इन कपड़े की मिलों में कौन काम करता है? प्रातःकाल द्वार पर दूध और मक्खन लेकर कौन आवाज देता है? मिठाइयाँ और फल लेकर कौन बड़े आदमियों के नाश्ते के समय पहँचता है? सफ़ाई कौन करता है? कपड़े कौन धोता है? सबेरे अखबार और चिट्ठियाँ लेकर कौन पहुँचाता है? शहर के तीन चौथाई आदमी एक चौथाई के लिए अपना रक्त जला रहे हैं? इसका प्रसाद यहीं मिलता है कि उन्हें रहने के लिए स्थान नहीं! एक बँगले के लिए कई बीघे जमीन चाहिए। हमारे बड़े आदमी साफ-सुथरी हवा और खुली हुई जगह चाहते हैं। उन्हें यह खबर नहीं है कि जहाँ असंख्य प्राणी दुर्गन्ध और अन्धकार में पड़े भयंकर रोगों से मर-मरकर रोग के कीड़े फैला रहे हों, वहाँ खुले हुए बँगले में रह कर भी वह सुरक्षित नहीं हैं। यह किसकी ज़िम्मेदारी है कि शहर के छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी आदमी स्वस्थ रह सकें? अगर म्युनिसिपैलिटी इस प्रधान कर्तव्य को नहीं पूरा कर सकती हो उसे तोड़ देना चाहिए। रईसों और अमीरों की कोठियों के लिए, बग़ीचों के लिए, महलों के लिए क्यों इतनी उदारता से जमीन दे दी जाती है? इसलिए कि हमारी म्युनिसिपैलिटी गरीबों की जान का कोई मूल्य नहीं समझती। उसे रुपये चाहिए, इसलिए कि बड़े-बड़े अधिकारियों को बड़ी-बड़ी तलब दी जाय। वह शहर की [ ३८६ ]विशाल भवनों से अलंकृत कर देना चाहती है, उसे स्वर्ग की तरह सुंदर बना देना चाहती है; पर जहाँ की अँधेरी दुर्गन्धपूर्ण गलियों में जनता पड़ी कराह रही हो, वहाँ इन विशाल भवनो से क्या होगा? यह तो वहीं बात है कि कोई देह के कोढ़ को रेशमी वस्त्रों से छिपाकर इठलाता फिरे। सज्जनों! अन्याय करना जितना बड़ा पाप है, उतना ही बड़ा पाप अन्याय सहना भी है। आज निश्चय कर लो कि तुम यह दुर्दशा न सहोगे। यह महल और बँगले नगर की दुर्बल देह पर छाले हैं, मस वृद्धि हैं। इन मस वृद्धों को काटकर फेंकना होगा। जिस ज़मीन पर हम खड़े है, यहाँ कम-से-कम दो हजार छोटे-छोटे सुन्दर घर बन सकते हैं, जिनमें कम-से-कम दस हजार प्राणी आराम से रह सकते हैं। मगर यह सारी ज़मीन चार-पाँच बँगलों के लिए बेची जा रही है। म्युनिसिपैलिटी को दस लाख रुपये मिल रहे हैं। इन्हें वह कैसे छोड़े? शहर के दस हजार मज़दूरों की जान दस लाख के बराबर भी नहीं!'

एकाएक पीछे के आदमियों ने शोर मचाया--पुलिस! पुलिस आ गयी!

कुछ लोग भागे, कुछ लोग सिमट कर और आगे बढ़ आये।

लाला समरकान्त बोले--भागो मत, भागो मत, पुलिस मुझे गिरफ्तार करेगी। मैं उसका अपराधी हूँ। और मैं ही क्यों, मेरा सारा घर उसका अपराधी है। मेरा लड़का जेल में है, मेरी बहू और पोता जेल में है। मेरे लिए अब जेल के सिवा और कहाँ ठिकाना है। मैं तो जाता हूँ। (पुलिस से) वहाँ ठहरिये साहब, मै खुद आ रहा हूँ। मैं तो जाता हूँ मगर यह कहे जाता हूँ कि अगर लौटकर मैने वहाँ अपने गरीब भाइयों के घरों की पाँतियाँ फूलों की भाँति लहलहाती न देखीं, तो यहीं मेरी चिता बनेगी।

लाला समरकान्त कूदकर ईंटों के टीले से नीचे आये और भीड़ चीरते हुए जाकर पुलिस कप्तान के पास खड़े हो गये। लारी तैयार थी, कप्तान ने उन्हें लारी में बैठाया। लारी चल दी।

'लाला समरकान्त की जय!' की गहरी, हार्दिक वेदना से भरी हुई ध्वनि किसी बँधुए पशु की भाँति तड़पती, छटपटाती ऊपर को उठी, मानो परवशता के बन्धन को तोड़कर निकल जाना चाहती हो। [ ३८७ ]एक समुह लारी के पीछे दौड़ा--अपने नेता को छुड़ाने के लिए नहीं, केवल श्रद्धा के आवेश में, मानो कोई आशीर्वाद पाने की सरल उमंग में। जब लारी गर्द में लुप्त हो गयी, तो लोग लौट पड़े।

'यह कौन खड़ा बोल रहा है?'

'कोई औरत जान पड़ती है।'

'कोई भले घर की औरत है।'

'अरे यह तो वही हैं, लालाजी की समधिन, रेणुका देवी।'

'अच्छा! जिन्होंने पाठशाले' के नाम अपनी सारी जमा-जथा लिख दी?'

'सुनो! सुनो!'

'प्यारे भाइयो, लाला समरकान्त जैसा योगी जिस सुख के लोभ से चलायमान हो गया, वह कोई बड़ा भारी सुख होगा। फिर मैं तो औरत हूँ, और औरत लोभिन होती ही है। आपके शास्त्र-पुराण सब यही कहते हैं। फिर मैं उस लोभ को कैसे रोकूँ। मैं धनवान् की बहू, धनवान् की स्त्री, भोग विलास में लिप्त रहने वाली, भजन-भाव में मगन रहनेवाली, मैं क्या जानूं ग़रीबों को क्या कष्ट है, उन पर क्या बीतती है। लेकिन इस नगर ने मेरी लड़की छीन ली, और अब मैं भी तुम लोगों ही की तरह ग़रीब हूँ। अब मुझे इस विश्वनाथ की पुरी में एक झोपड़ा बनवाने की लालसा है। आपको छोड़कर मैं और किसके पास माँगने जाऊँ। यह नगर तुम्हारा है। इसकी एक-एक अंगुल जमीन तुम्हारी है। तुम्हीं इसके राजा हो। मगर सच्चे राजा की भाँति तुम भी त्यागी हो। राजा हरिश्चन्द्र की भाँति अपना सर्वस्व दूसरों को देकर, भिखारियों को अमीर बनाकर, तुम आप भिखारी हो गये हो। जानते हो वह छल से खोया हुआ राज्य तुमको कैसे मिलेगा? तुम डोम के हाथों बिक चुके। अब तुम्हें रोहितास और शैय्या को त्यागना पड़ेगा। तभी देवता तुम्हारे ऊपर प्रसन्न होंगे। मेरा मन कह रहा है कि देवताओं में तुम्हारा राज दिलाने की बातचीत हो रही है। आज नहीं तो कल तुम्हारा राज्य तुम्हारे अधिकार में आ जायगा। उस वक्त मुझे भूल न जाना। मैं तुम्हारे दरबार में अपना प्रार्थना-पत्र पेश किये जा रही हूँ।'

सहसा पीछे शोर मचा--फिर पुलिस आ गयी! [ ३८८ ]'आने दो। उनका काम है अपराधियों को पकड़ना। हम अपराधी हैं। गिरफ्तार न कर लिये गये, तो आज नगर में डाका मारेंगे, चोरी करेंगे, या कोई षड्यन्त्र रचेंगे। मैं कहती हूँ, कोई संस्था जो जनता पर न्यायबल से नहीं पशुबल से शासन करती है, वह लुटेरों की संस्था है। जो लोग ग़रीबों का हक़ लूटकर खुद मालदार हो रहे हैं, दूसरों के अधिकार छीनकर अधिकारी बने हुए हैं, वास्तव में वही लुटेरे हैं। भाइयो, मैं तो जाती हूँ, मगर मेरा प्रार्थना-पत्र आपके सामने है। इस लुटेरी म्युनिसिपैलिटी को ऐसा सबक दो कि फिर उसे ग़रीबों को कुचलने का साहस न हो। जो तुम्हें रौंदे, उसके पाँव में कांटे बनकर चुभ जाओ। कल से ऐसी हड़ताल करो कि धनियों और अधिकारियों को तुम्हारी शक्ति का अनुभव हो जाय, उन्हें विदित हो जाय कि तुम्हारे सहयोग के बिना वे धन को भोग सकते हैं न अधिकार को। उन्हें दिखा दो कि तुम्हीं उनके हाथ हो, तुम्ही उनके पांव हो, तुम्हारे बग़ैर वे अपंग हैं।

वह टीले से नीचे उतरकर पुलिस-कर्मचारियों की ओर चली तो सारा जनसमूह, हृदय में उमड़कर आँखों में रुक जानेवाले आँसुओं की भाँति, उसकी ओर ताकता रह गया। बाहर निकलकर मर्यादा का उल्लंघन कैसे करे। वीरों के आँसू बाहर निकलकर सूखते नहीं, वृक्षों के रस की भाँति भीतर ही रहकर वृक्ष को पल्लवित और पुष्पित कर देते हैं। इतने बड़े समूह में एक कण्ठ से भी जयघोष नहीं निकला। क्रिया-शक्ति अन्तर्मुखी हो गयी थी; मगर जब रेणुका मोटर में बैठ गयी और मोटर चली, तो श्रद्धा की वह लहर मर्यादाओं को तोड़कर एक पतलीं, गहरी, वेगमयी धारा में निकल पड़ी।

एक बूढ़े आदमी ने डाँटकर कहा--जय-जय बहुत कर चुके। अब घर जाकर आटा-दाल जमा कर लो। कल से लम्बी हड़ताल है।

दूसरे आदमी ने इनका समर्थन किया--और क्या। यह नहीं कि यहाँ तो गला फाड़-फाड़ चिल्लाये और सबेरा होते ही अपने-अपने काम पर चल दिये।

'अच्छा, यह कौन खड़ा हो गया?'

'वाह, इतना भी नहीं पहचानते? डाक्टर साहब है।'

'डाक्टर साहब भी आ गये। तब तो फ़तह है!' [ ३८९ ]'कैसे-कैसे शरीफ़ आदमी हमारी तरफ से लड़ रहे हैं! पूछो, इन बेचारों को क्या लेना है, जो अपना सुख-चैन छोड़कर, अपने बराबरावालों से दुश्मनी मोल लेकर जान हथेली पर लिये तैयार हैं।'

'हमारे ऊपर अल्लाह का रहम है। इन डाक्टर साहब ने पिछले दिनों जब प्लेग फैला था, ग़रीबों की ऐसी खिदमत की कि वाह! जिनके पास अपने भाई-बंद तक न खड़े होते थे, वहाँ बेधड़क चले जाते थे और दवा-दारू, रुपया पैसा, सब तरह की मदद तैयार! हमारे हाफिजजी तो कहते थे, यह अल्लाह का फ़रिश्ता है।'

'सुनो, सुनो, बकवास करने को रात भर पड़ी है।'

'भाइयो! पिछली बार जब आपने हड़ताल की थी, उसका क्या नतीजा हुआ? अगर फिर वैसी ही हड़ताल हुई, तो उससे अपना ही नुकसान होगा। हममें से कुछ लोग चुप रह जायँगे, बाकी आदमी मतभेद हो जाने के कारण आपस में लड़ते रहेंगे और असली उद्देश्य की किसी को सुधि न रहेगी। सरगनों के हटते ही पुरानी अदावतें निकाली जाने लगेंगी, गङे मुरदे उखाड़े जाने लगेंगे; न कोई संगठन रह जायगा, न कोई जिम्मेदारी। सभी पर आतंक छा जायगा, इसलिए अपने दिल को टटोलकर देख लो। अगर उसमें कच्चापन हो, तो हड़ताल का विचार दिल से निकाल डालो। ऐसी हड़ताल से दुर्गन्ध और गन्दगी में मरते जाना कहीं अच्छा है। अगर तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारा दिल भीतर से मजबूत है, उसमें हानि सहने की, भूखों मरने को, कष्ट झेलने की सामर्थ्य है, तो हड़ताल करो, प्रतिज्ञा कर लो कि जब तक हड़ताल रहेगी तुम अदावतें भूल जाओगे, नफे-नुकसान की परवाह न करोगे। तुमने कबड्डी तो खेली ही होगी। कबड्डी में अक्सर ऐसा होता है कि एक तरफ के सब गुइयाँ मर जाते हैं। केवल एक खिलाड़ी रह जाता है; मगर वह एक खिलाड़ी भी उसी तरह क़ानून-क़ायदे से खेलता चला जाता है। उसे अन्त तक आशा बनी रहती है कि वह अपने मरे गुइयों को जिला लेगा ओर सब-के-सब फिर पूरी शक्ति से बाजी जीतने का उद्योग करेंगे। हरेक खिलाड़ी का एक ही उद्देश्य होता है--पाला जीतना। इसके सिवा उस समय उसके मन में कोई भाव नहीं होता। किस गुइयाँ ने उसे कब गाली दी थी, कब उसका कनकौआ फाड़ डाला था, या कब उसको चूंसा मारकर भागा [ ३९० ]था, इसकी उसे ज़रा भी याद नहीं आती। उसी तरह इस समय तुम्हें अपना मन बनाना पड़ेगा। मैं यह दावा नहीं करता कि तुम्हारी जीत ही होगी। जीत भी हो सकती है, हार भी हो सकती है। जीत या हार से हमें प्रयोजन नहीं। भूखा बालक भूख से विकल होकर रोता है। वह यह नहीं सोचता कि रोने से उसे भोजन मिल ही जायगा। संभव है मां के पास पैसे न हों, या उसका जी अच्छा न हो; लेकिन बालक का स्वभाव है, कि भूख लगने पर रोये, इसी तरह हम भी रो रहे हैं। हम रोते-रोते थककर सो जायेंगे, या माता वात्सल्य से विवश होकर हमें भोजन दे देगी, यह कौन जानता है। हमारा किसी से बैर नहीं, हम तो समाज के सेवक हैं, हम वैर करना क्या जानें...

उधर पुलिस कप्तान थानेदार को डाँट रहा था--जल्द लारी मँगवाओ। तुम बोलता था, अब कोई आदमी नहीं है। अब यह कहाँ से निकल आया?

थानेदार ने मुंह लटकाकर कहा--हुजूर वह डाक्टर साहब तो आज पहली ही बार आये हैं। इनकी तरफ तो हमारा गुमान भी नहीं था। कहिए तो गिरफ्तार कर के ताँगे पर ले चलूं।

'तांँगे पर! सब आदमी ताँगे को घेर लेगा। हमें फ़ायर करना पड़ेगा। जल्दी दौड़कर कोई टैक्सी लाओ।'

डाक्टर शांतिकुमार कह रहे थे---

'हमारा किसी से बैर नहीं है! जिस समाज में गरीबों के लिये स्थान नहीं, वह उस घर की तरह है, जिसकी बुनियाद न हो। कोई हलका-सा धक्का भी उसे जमीन पर गिरा सकता है। मैं अपने धनवान् और विद्वान् सामर्थ्यवान् भाइयों से पूछता हूँ, क्या यही न्याय है कि एक भाई तो बंँगले में रहे, दूसरे को झोपड़ा भी नसीब न हो? क्या तुम्हें अपने ही जैसे मनुष्यों को इस दुर्दशा में देखकर शर्म नहीं आती? तुम कहोगे, हमने बुद्धि-बल से धन कमाया है क्यों न उसका भोग करें। इस बुद्धि का नाम स्वार्थ-बुद्धि है, और जब समाज का संचालन स्वार्थ-बुद्धि के हाथ में आ जाता है, न्याय-बुद्धि गद्दी से उतार दी जाती है, तो समझ लो कि समाज में कोई विप्लव होने वाला है। गरमी बढ़ जाती है, तो तुरन्त ही आँधी आती है! मानवता हमेशा कुचली नहीं जा सकती। समता जीवन का तत्व है। यही एक दशा है जो समाज को स्थिर रख सकती है। थोड़े-से धनवानों का हरगिज़ यह अधिकार [ ३९१ ]नहीं है, कि वे जनता की ईश्वरदत्त वायु और प्रकाश का अपहरण करें। यह विशाल जन समह उसी अनधिकार, उसी अन्याय का रोषमय रुदन है। अगर धनवानों की आँखें अब भी नहीं खुलती, तो उन्हें पछताना पड़ेगा। यह जागृति का युग है। जागृति अन्याय को सहन नहीं कर सकती। जागे हुए आदमी के घर में चोर और डाकू की गति नहीं...'

इतने में टैक्सी आ गयी। पुलिस कप्तान कई थानेदारों और कांसटेबलों के साथ समूह की तरफ चला।

थानेदार ने पुकार कर कहा--डाक्टर साहब आपका भाषण तो समाप्त हो चुका होगा। अब चले आइये हमें क्यों वहाँ आना पड़े।

शांतिकुंमार ने ईंट-मंच पर खड़े-खड़े कहा---मैं अपनी खुशी से तो गिरफ्तार होने न आऊँगा, आप ज़बरदस्ती कर सकते हैं। और फिर अपने भाषण का सिलसिला जारी कर दिया—

'हमारे धनवानों को किसका बल है? पुलिस का। हम पुलिस ही से पुछते है, अपने कांसटेबल भाइयों से हमारा सवाल है,क्या तुम भी ग़रीब नहीं हो? क्या तुम और तुम्हारे बाल-बच्चे सड़े हुए, अँधेरे, दुर्गन्ध और रोग से भरे हुए बिलों में नहीं रहते! लेकिन यह ज़माने की खूबी है कि तुम अन्याय की रक्षा करने के लिए, अपने ही बाल-बच्चों का गला घोंटने के लिए तैयार खड़े हो...'

कप्तान ने भीड़ के अन्दर जाकर शांतिकुमार का हाथ पकड़ लिया और उन्हें साथ लिये हुए लौटा। सहसा नैना सामने से आकर खड़ी हो गयी।

शांतिकुमार ने चौंककर पूछा---तुम किधर से नैना? सेठ जी और देवी जी तो चल दिये। अब मेरी बारी है।

नैना मुसकराकर बोली--और आपके बाद मेरी।

'नहीं, कहीं ऐसा अनर्थ न करना। सब कुछ तुम्हारे ऊपर है।'

नैना ने कुछ जवाब न दिया। कप्तान डाक्टर को लिये हए आगे बढ़ गया। उधर सभा में शोर मचा हुआ था। अब उनका क्या कर्त्तव्य है, इसका निश्चय वह लोग न कर पाते थे। उनकी दशा पिघली हुई धातु की सी थी। उसे जिस तरफ चाहें मोड़ सकते हैं। कोई भी चलता हुआ आदमी उनका नेता बनकर उन्हें जिस तरफ चाहे ले जा सकता था--सबसे ज्यादा आसानी [ ३९२ ]के साथ शान्ति-भंग की ओर। चित्त की उस दशा में, जो इन ताबड़तोड़ गिरफ्तारियों से शान्ति-पथ-विमुख हो रहा था, बहुत संभव था कि वे पुलिस पर पत्थर फेंकने लगते, या बाजार लूटने पर आमादा हो जाते। उसी वक्त नैना उनके सामने जाकर खड़ी हो गयी। वह अपनी बग्घी पर सैर करने निकली थी। रास्ते में उसने लाला समरकान्त और रेणुका देवी के पकड़े जाने की खबर सुनी। उसने तुरन्त कोचवान को इस मैदान की ओर चलने को कहा और दौड़ी हुई चली आ रही थी। अब तक उसने अपने पति और ससुर की मर्यादा का पालन किया था। अपनी ओर से कोई ऐसा काम न करना चाहती थी कि ससुरालवालों का दिल दुखे, या उनके असंतोष का कारण हो; लेकिन यह खबर पाकर वह संयत न रह सकी। मनीराम जामे से बाहर हो जायँगे, लाला धनीराम छाती पीटने लगेंगे, उसे ग़म नहीं। कोई उसे रोक ले, तो वह कदाचित् आत्म-हत्या कर बैठे। वह स्वभाव से ही लज्जाशील थी। घर के एकान्त में बैठकर वह चाहे भूखों मर जाती, लेकिन बाहर निकलकर किसी से सवाल करना उसके लिए असाध्य था। रोज़ जलसे होते थे। लेकिन उसे कभी कुछ भाषण करने का साहस नहीं हुआ। यह नहीं कि उसके पास विचारों का अभाव था, अथवा वह अपने विचारों को व्यक्त न कर सकती थी। नहीं, केवल इसलिए कि जनता के सामने खड़े होने में उसे संकोच होता था। या यों कहो कि भीतर की पुकार कभी इतनी प्रबल न हुई कि मोह और आलस्य के बन्धनों को तोड़ देती। बाज़ ऐसे जानवर भी होते हैं, जिनमें एक विशेष आसन होता है। उन्हें आप मार डालिए पर आगे कदम न उठायेंगे। लेकिन उस मार्मिक स्थान पर उँगली रखते ही उनमें एक नया उत्साह, एक नया जीवन चमक उठता है। लाला समरकान्त की गिरफ्तारी ने नैना के हृदय में उसी मर्मस्थल को स्पर्श कर लिया। वह जीवन में पहली बार जनता के सामने खड़ी हुई, निश्शंक, निश्चल, एक नयी प्रतिभा, एक नयी प्रांजलता से आभासित। पूर्णिमा के रजत प्रकाश में ईंटों के टीले पर खड़ी जब उसने अपने कोमल किन्तु गहरे कंठ-स्वर से जनता को संबोधन किया, तो जैसे सारी प्रकृति नि:स्तब्ध हो गयी।

'सज्जनो, मैं लाला समरकान्त की बेटी और लाला धनीराम की बहू [ ३९३ ]हूँ। मेरा प्यारा भाई जेल में है, मेरी प्यारी भावज जेल में है, मेरा सोने-सा भतीजा जेल में है, आज मेरे पिताजी भी वहीं पहुँच गये।'

जनता की ओर से आवाज़ आयी---रेणुका देवी भी!

'हाँ, रेणुका देवी भी, जो मेरी माता के तुल्य थीं। लड़की के लिए वही मैका है, जहाँ उसके माँ-बाप, भाई-भावज रहें। और लड़की को मैका जितना प्यारा होता है, उतनी ससुराल नहीं होती। सज्जनों, इस ज़मीन के कई टुकड़े मेरे ससुरजी ने खरीदे हैं। मुझे विश्वास है, मै आग्रह करूँ, तो वह यहाँ अमीरों के बँगले न बनवा कर गरीबों के घर बनवा देंगे; लेकिन हमारा उद्देश्य यह नहीं है। हमारी लड़ाई इस बात पर है कि जिस नगर में आधे से ज्यादा आबादी गन्दे बिलों में मर रही हो, उसे कोई अधिकार नहीं है कि महलों और बँगलों के लिए ज़मीन बेचे। आपने देखा था, यहाँ कई हरे-भरे गाँव थे। म्युनिसिपैलिटी ने नगर-निर्माण-संघ बनाया। गांव के किसानों की जमीन कौड़ियों के दाम छीन ली गयी, और आज वही ज़मीन अशर्फियों के दाम बिक रही है, इसलिए कि बड़े आदमियों के बँगले बनें। हम अपने नगर के विधाताओं से पूछते हैं, क्या अमीरों हो के जान होती है? गरीबों के जान नहीं होती? अमीरों ही को तन्दुरुस्त रहना चाहिए। गरीबों को तन्दुरुस्ती की जरूरत नहीं? अब जनता इस तरह मरने को तैयार नहीं है। अगर मरना ही है तो इस मैदान में, खुले आकाश के नीचे, चन्द्रमा के शीतल प्रकाश में मरना बिलों में मरने से कहीं अच्छा है! लेकिन पहले हमें नगर-विधाताओं से एक बार और पूछ लेना है, कि वह अब भी हमारा निवेदन स्वीकार करेंगे,या नहीं। अब भी इस सिद्धान्त को मानेंगे, या नहीं। अगर उन्हें घमण्ड हो कि हथियार के जोर से गरीबों को कुचलकर उनकी आवाज बन्द कर सकते हैं तो यह उनकी भूल है। गरीबों का रक्त जहाँ गिरता है, वहाँ हरेक बूंँद की जगह एक-एक आदमी उत्पन्न हो जाता है। अगर इस वक्त नगर-विधाताओं ने गरीबों की आवाज़ सुन ली, तो उन्हें सेंत का यश मिलेगा; क्योंकि गरीब बहुत दिनों गरीब नहीं रहेंगे और वह ज़माना दूर नहीं है, जब ग़रीबों के हाथ में शक्ति होगी। विप्लव के जन्तु को छेड़-छेड़कर न जगाओ। उसे जितना ही छेड़ोगे, उतना ही झल्लायेगा और जब वह उठकर जम्हाई लेगा और जोर से दहाड़ेगा, तो फिर तुम्हें भागने [ ३९४ ]को राह न मिलेगी। हमें बोर्ड के मेम्बरों को यही चेतावनी देनी है। इस वक्त बहुत ही अच्छा अवसर है। सभी भाई म्युनिसिपैलिटी के दफ़्तर चलें। अब देर न करें, नहीं मेम्बर अपने-अपने घर चले जायँगे। हड़ताल में उपद्रव का भय है; इसलिए हड़ताल उसी हालत में करनी चाहिए, जब और किसी तरह काम न निकल सके।'

नैना ने झण्डा उठा लिया और म्युनिसिपैलिटी के दफ़्तर की ओर चली। उसके पीछे बीस-पचीस हज़ार आदमियों का एक सागर उमड़ता हुआ चला। और यह दल मेलों की भीड़ की तरह अशृंखल नहीं, फ़ौज की कतारों की तरह शृंखलाबद्ध था। आठ-आठ आदमियों की असंख्य पंक्तियाँ गंभीर भाव से, एक विचार, एक उद्देश्य, एक धारणा की आन्तरिक शक्ति का अनुभव करती हुई चली जा रही थीं, और उनका ताँता न टूटता था, मानो भूगर्भ से निकलती चली आती हों। सड़क के दोनों ओर छज्जों और छतों पर दर्शकों की भीड़ लगी हुई थी। सभी चकित थे। उफ्फ़ोह! कितने आदमी हैं! अभी चले ही आ रहे हैं!

तब नैना ने यह गीत शरू कर दिया, जो इस समय बच्चे-बच्चे की जबान पर था---

'हम भी मानव-तनधारी हैं...'

कई हजार गलों से संयुक्त, सजीव और व्यापक स्वर गगन में गूंज उठा---

'हम भी मानव-तनधारी हैं!'

नैना ने उस पद की पूर्ति की---'क्यों हमको नीच समझते हो?'

कई हजार गलों ने साथ दिया---

'क्यों हमको नीच समझते हो?'

नैना---क्यों अपने सच्चे दासों पर?

जनता---क्यों अपने सच्चे दासों पर?

नैना---इतना अन्याय बरतते हो!

जनता---इतना अन्याय बरतते हो!

इधर म्युनिसिपल बोर्ड में यही प्रश्न छिड़ा हुआ था।

हाफ़िज़ हलीम ने टेलीफोन का चोंगा मेज़ पर रखते हए कहा--डाक्टर शान्तिकुमार भी गिरफ्तार हो गये। [ ३९५ ]मि० सेन ने निर्दयता से कहा---अब इस आन्दोलन की जड़ कट गयी। शगुन कह रहे हैं।

पं० ओंकारनाथ ने चुटकी ली--उस ब्लाक पर अब बँगले न बनेंगे। शगुन कह रहे हैं।

सेन बाबू भी अपने लड़के के नाम से उस ब्लाक के एक भाग के खरीदार थे। जल उठे--अगर बोर्ड में अपने पास किये हुए प्रस्तावों पर स्थिर रहने की शक्ति नहीं है, तो उसे इस्तीफ़ा देकर अलग हो जाना चाहिए।

मि० शफीक ने जो युनिवर्सिटी के प्रोफेसर और डाक्टर शान्तिकुमार के मित्र थे, सेन को आड़े हाथों लिया--बोर्ड के फ़ैसले खुदा के फ़ैसले नहीं हैं। उस वक्त बेशक बोर्ड ने उस ब्लाक को छोटे-छोटे प्लाटों में नीलाम करने का फैसला किया था; लेकिन उसका नतीजा क्या हआ? आप लोगों ने वहाँ जितना इमारती सामान जमा किया, उसका कहीं पता नहीं है, हज़ार आदमी से ज्यादा रोज रात को वहीं सोते हैं। मुझे यकीन है कि वहाँ काम करने के लिए मज़दूर भी राजी न होगा। मैं बोर्ड को ख़बरदार किये देता हूँ कि अगर उसने अपनी पालिसी बदल न दी,तो शहर पर बहुत बड़ी आफ़त आ जायगी। सेठ समरकान्त और शान्तिकुमार का शरीक होना बतला रहा है कि यह तहरीक बच्चों का खेल नहीं है। उसकी जड़ बहुत गहरी पहुँच गयी है और उसे उखाड़ फेंकना अब करीब-करीब गैरमुमकिन है। बोर्ड को अपना फ़ैसला रद करना पड़ेगा। चाहे अभी करे, या सौ-पचीस जानों की नज़र लेकर करे। अब तक का तजरबा तो यही कह रहा है कि बोर्ड की सख्तियों का बिल्कुल असर नहीं हुआ; बल्कि उलटा ही असर हुआ। अब जो हड़ताल होगी, वह इतनी खौफनाक होगी कि उसके खयाल से रोंगटे खड़े होते हैं। बोर्ड अपने सिर पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी ले रहा है।

मि० हामिद अली कपड़े की मिल के मैनेजर थे। उनकी मिल घाटे पर चल रही थी। डरते थे, कहीं लम्बी हड़ताल हो गयी, तो बघिया ही बैठ जायगी। थे तो बेहद मोटे; मगर बेहद मेहनती। बोले--हक़ को तसलीम करने में बोर्ड को क्यों इतना पसोपेश हो रहा है, यह मेरी समझ में नहीं आता। शायद इसलिए कि उसके ग़रूर को झुकना पड़ेगा। लेकिन हक़ के सामने झुकना कमजोरी नहीं, मजबूती है। अगर आज इसी मसले पर बोर्ड
[ ३९६ ]का नया इन्तखाब हो, तो मैं दावे से कह सकता हूँ कि बोर्ड का यह रिजोल्युशन हर्फ़े ग़लत की तरह मिट जायगा। बीस-पचीस हज़ार ग़रीब आदमियों की बेहतरी और भलाई के लिए अगर बोर्ड को दस-बारह लाख का नुकसान उठाना और दस-पांच मेम्बरों की दिलशिकनी करनी पडे तो उसे . . .

फिर टेलीफ़ोन की घंटी बजी। हाफ़िज हलीम ने कान लगाकर सुना और बोले--पच्चीस हजार आदमियों की फ़ौज हमारे ऊपर धावा करने आ रही है। लाला समरकान्त की साहबजादी और सेठ धनीराम की बहू उसकी लीडर हैं। डी० एस० पी० ने हमारी राय पूछी है और यह भी कहा है कि फायर किये बग़ैर जूलूस पीछे हटनेवाला नहीं। मैं इस मुआमले में बोर्ड की राय जानना चाहता हूँ। बेहतर है कि वोट ले लिये जायँ। जाबते की पाबन्दियों का मौका नहीं है, आप लोग हाथ उठायें---फॉर?

बारह हाथ उठे।

'अगेन्स्ट?'

दस हाथ उठे। लाला धनीराम निउट्रल रहे।

'तो बोर्ड की राय है कि जुलस को रोका जाय, चाहे फ़ायर करना पड़े।'

सेन बोले--क्या अब भी कोई शक है।

फिर टेलीफोन की घंटी बजी। हाफ़िज़जी ने कान लगाया! डी० एस० पी० कह रहा था---बड़ा ग़ज़ब हो गया। अभी लाला मनीराम ने अपनी बीबी को गोली मार दी।

हाफ़िज़जी ने पूछा---क्या बात हुई!

'अभी कुछ मालूम नहीं। शायद मिस्टर मनीराम गुस्से में भरे हुए जुलूस के सामने आये और अपनी बीबी को वहां से हट जाने को कहा। लेडी ने इनकार किया। इस पर कुछ कहा-सुनी हई। मिस्टर मनीराम के हाथ में पिस्तौल थी। फ़ौरन शूट कर दिया। अगर वह भाग न जायँ, तो धज्जियाँ उड़ जायँ! जुलस अपने लीडर की लाश उठाये फिर म्युनिसिपल बोर्ड की तरफ जा रहा है।'

हाफ़िज़जी ने मेम्बरों को यह खब़र सुनाई, तो सारे बोर्ड में सनसनी दौड़ गयी मानो किसी जादू से सारी सभा पाषाण हो गयी हो। [ ३९७ ]सहसा लाला धनीराम खड़े होकर भर्राई हई आवाज़ में बोले---सज्जनों जिस भवन को एक-एक कंकड़ जोड़-जोड़ कर पचास साल से बना रहा था, वह आज एक क्षण में ढह गया, ऐसा ढह गया कि उसकी नींव का पता नहीं। अच्छे-से-अच्छे मसाले दिये, अच्छे-से-अच्छे कारीगर लगाये, अच्छे-से-अच्छे नक़शे बनवाये, भवन तैयार हो गया था, केवल कलस बाकी था। उसी वक्त एक तूफान आता है और उस विशाल भवन को इस तरह उङा ले जाता है, मानो फूस का ढेर हो! मालूम हुआ कि वह भवन केवल मेरे जीवन का एक स्वप्न था; स्वप्न कहिये, चाहे काला स्वप्न कहिए पर था स्वप्न ही। वह स्वप्न भंग हो गया---भंग हो गया!

यह कहते हुए वह द्वार की ओर चले।

हाफ़िज़ हलीम ने शोक के साथ कहा---सेठजी, मुझे और मैं उम्मीद करता हूँ कि बोर्ड को आपसे कामिल हमदर्दी है।

सेठजी ने पीछे फिरकर कहा---अगर बोर्ड को मेरे साथ हमदर्दी है, तो इसी वक्त मुझे यह अख्तियार दीजिये कि जाकर लोगों से कह दूँ, बोर्ड ने तुम्हें वह जमीन दे दी। वरना वह आग कितने ही घरों को भस्म कर देगी, कितनों ही के स्वप्नों को भंग कर देगी।

बोर्ड के कई मेम्बर बोले---चलिए, हम लोग भी आपके साथ चलते हैं।

बोर्ड के बीस सभासद उठ खड़े हुए। सेन ने देखा कि वहाँ कुल चार आदमी रहे जाते हैं, तो वह भी उठ पड़े, और उनके साथ उनके तीनों मित्र भी उठे। अन्त में हाफ़िज़ हलीम का नम्बर आया।

जुलस उधर से नैना की अर्थी लिये चला आ रहा है। एक शहर में इतने आदमी कहाँ से आ गये! मीलों लम्बी घनी क़तार है--शान्त, गंभीर, संगठित जो मर मिटना चाहती है। नैना के बलिदान ने उन्हें अजेय, अभेद्य बना दिया है।

उसी वक्त बोर्ड के पचीसों मेम्बरों ने सामने से आकर अर्थी पर फूल बरसाये और हाफ़िज हलीम ने आगे बढ़कर ऊँचे स्वर में कहा--भाइयों! आप म्युनिसिपलटी के मेम्बरों के पास जा रहे हैं, मेम्बर खुद आपका इस्तक़बाल करने आये हैं। बोर्ड ने आज इत्तफाक राय से पूरा प्लाट आप लोगों को देना मंजूर कर लिया। मैं इस पर बोर्ड को मुबारकबाद देता हूँ और [ ३९८ ]आपको भी। आज बोर्ड ने तस्लीम कर लिया कि गरीबों की सेहत, आराम और जरूरत को वह अमीरों के शौक, तकल्लुफ और हबिस से ज्यादा लिहाज के काबिल समझता है। उसने तस्लीम कर लिया कि ग़रीबों का उस पर उससे कहीं ज्यादा हक है जितना अमीरों का। उसने तस्लीम कर लिया कि बोर्ड रुपये की निस्बत रिआया की जान की ज्यादा कद्र करता है। उसने तस्लीम कर लिया कि शहर की जीनत बड़ी-बड़ी कोठियों और बंगलों से नहीं, छोटे-छोटे आरामदेह मकानों से है जिनमें मजदूर और थोड़ी आमदनी के लोग रह सकें। मैं खुद उन आदमियों में हूँ, जो इस उसूल को तसलीम न करते थे। बोर्ड का बड़ा हिस्सा मेरे ही ख्याल के आदमियों का था; लेकिन आपकी कुर्बानियों ने और आपके लीडरों की जाँबाजियों ने बोर्ड पर फतह पायी और आज उस फ़तह पर आपको मुबारकबाद देता हूँ और इस फ़तह का सेहरा उस के सिर है, जिसका जनाजा आपके कन्धों पर है। लाला समरकान्त मेरे पुराने रफीक हैं। उनका सपूत बेटा मेरे लड़के का दिली दोस्त है। अमरकान्त जैसा शरीफ नौजवान मेरी नजर से नहीं गुजरा। उसी की सोहबत का असर है कि आज मेरा लड़का सिविल सर्विस छोड़कर जेल में बैठा हुआ है। नैना देवी के दिल में जो कशमकश हो रही थी, उसका अन्दाजा हम और आप नहीं कर सकते। एक तरफ बाप और भाई और भावज जेल में कैद, दूसरी तरफ शौहर और ससुर मिलकियत और जायदाद की धुन में मस्त। लाला धनीराम मुझे मुआफ करेंगे। मैं उन पर फिकरा नहीं कसता। जिस हालत में वह गिरफ्तार थे उसी हालत में हम और आप और सारी दुनिया गिरफ्तार है। उनके दिल पर इस वक्त एक ऐसे ग़म की चोट है, जिससे ज्यादा दिलशिकन कोई सदमा नहीं हो सकता। हमको और मैं यकीन करता हूँ, आपको भी उनसे कामिल हमदर्दी है। हम सब उनके ग़म में शरीक हैं। नैना देवी के दिल में मैके और ससुराल की लड़ाई शायद इस तहरीक के शुरू होते ही शुरू हुई और आज उसका यह हसरतनाक अंजाम हुआ। मुझे यकीन है कि उनकी इस पाक कुरबानी की यादगार हमारे शहर में उस वक्त तक रहेगी, जब तक इसका वजूद कायम रहेगा। मैं बुतपरस्त नहीं हूँ, लेकिन सबसे पहले मैं तजवीज करूँगा कि उस प्लाट पर जो महल्ला आबाद हो, उसके बीचो-बीच इस देवी की [ ३९९ ]यादगार नसब की जाय, ताकि आनेवाली नसलें उसकी शानदार कुरबानी की याद ताजा करती रहें।

दोस्तो, मैं इस वक्त आपके सामने कोई तकरीर नहीं करता हूँ। यह न तकरीर करने का मौका है न सुनने का, रोशनी के साथ तारीकी है, जीत के साथ हार और खुशी के साथ गम। तारीकी और रोशनी का मेल सुहानी सुबह होती है, और जीत और हार का मेल सुलह! यह खुशी और ग़म का मेल एक नये दौर का आगाज़ है और खुदा से हमारी दुआ है, कि यह दौर हमेशा कायम रहे, हममें ऐसे ही हक पर जान देनेवाली पाक रूहें पैदा होती रहें, क्योंकि दुनिया ऐसी ही रूहों की हस्ती से कायम है। आपसे हमारी गुजारिश है कि इस जीत के बाद हारनेवालों के साथ वही बर्ताव कीजिए, जो बहादुर दुश्मन के साथ किया जाना चाहिए। हमारी इस पाक सरजमीन में हारे हुए दुश्मनों को दोस्त समझा जाता था। लड़ाई खत्म होते ही हम रंजिश और गुस्से को दिल से निकाल डालते थे, और हम दिल खोलकर दुश्मन से गले मिल जाते थे। आइए, हम और आप गले मिलकर उस देवी की रूह को खुश करें, जो हमारी सच्ची रहनुमा, तारीकी में सुबह का पैगाम लाने वाली सुफेदी थी। खुदा हमें तौफीक दे कि इस सच्चे शहीद से हम हक़परस्ती और खिदमत का सबक हासिल करें।

हाफिज़जी के चुप होते ही 'नैना देवी की जय!' की ऐसी श्रद्धा में डूबी हुई ध्वनि उठी कि आकाश तक हिल उठा। फिर हाफिज हलीम की भी जय जयकार हुई और जलूस गंगा की तरफ रवाना हो गया। बोर्ड के सभी मेम्बर जलूस के साथ थे। सिर्फ हाफिज हलीम म्युनिसिपैलिटी के दफ्तर में जा बैठे और पुलीस के अधिकारियों से कैदियों की रिहाई के लिये परामर्श करने लगे।

जिस संग्राम को छः महीने पहले एक देवी ने आरंभ किया था, उसे आज एक दूसरी देवी ने अपने प्राणों की बलि देकर अन्त कर दिया।