पाँच फूल/⁠मंत्र

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
पाँच फूल  (१९२९) 
द्वारा प्रेमचंद

[ ७६ ]




पाँच फूल.djvu





[ ७७ ] [ ७८ ]





सन्ध्या का समय था। डाक्टर चड्ढा गोल्फ खेलने को तैयार हो रहे थे। मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली लिये आते दिखाई दिये। डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आता था। डोली औषधालय के सामने आकर रुक गई। बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर द्वार पर पड़ी हुई चिक से झाँका। ऐसी साफ-सुथरी जमीन पर पैर रखते हुए भय हो रहा था कि कोई घुड़क न बैठे। डाक्टर साहब को मेज़ के सामने खड़े देखकर भी उसे कुछ कहने का साहस न हुआ।

डाक्टर साहब ने चिक के अन्दर से गरजकर कहा--कौन है ? क्या चाहता है ? [ ७९ ]बूढ़े ने हाथ जोड़कर कहा--हजूर बड़ा गरीब आदमी हूँ। मेरा लड़का कई दिन से.....

डाक्टर साहब ने सिगार जलाकर कहा--कल सबेरे आओ, कल सबेरे ; हम इस वक्त मरीजों को नहीं देखते ।

बूढ़े ने घुटने टेककर जमीन पर सिर रख दिया और बोला--दुहाई है सरकार की, लड़का मर जायगा। हजूर, चार दिन से आँखें नहीं......

डाक्टर चड्ढा ने कलाई पर नजर डाली। केवल १० मिनट समय और बाकी था। गोल्फ-स्टिक खूँटी से उतारते हुए बोले--कल सबेरे आओ, कल सबेरे ; यह हमारे खेलने का समय है।

बूढ़े ने पगड़ी उतारकर चौखट पर रख दी और रोकर बोला--हजूर एक निगाह देख लें। बस एक निगाह ! लड़का हाथ से चला जायगा हजूर, सात लड़कों में यही एक बच रहा है हजूर, हम दोनों आदमी रो-रोकर मर जायँगे, सरकार, आपकी बढ़ती होय, दीनबन्धु।

ऐसे उजड्ड देहाती यहाँ प्रायः रोज ही आया करते थे। डाक्टर साहब उनके स्वभाव से खूब परिचित थे। कोई कितना ही कुछ कहे ; पर वे अपनी ही रट लगाते जायेंगे। किसी की सुनेंगे नहीं। धीरे से चिक उठाई और बाहर
[ ८० ]
निकलकर मोटर की तरफ चले। बूढ़ा यह कहता हुआ उनके पीछे दौड़ा--सरकार बड़ा धरम होगा, हजूर दया कीजिये, बड़ा दीन-दुखी हूँ, संसार में कोई और नहीं है, बाबूजी !

मगर डाक्टर साहब ने उसकी ओर मुँह फेरकर देखा तक नहीं। मोटर पर बैठकर बोले--कल सबेरे आना।

मोटर चली गई। बूढ़ा कई मिनट तक मूर्ति की भाँति निश्चल खड़ा रहा। संसार में ऐसे मनुष्य भी होते हैं, जो अपने आमोद-प्रमोद के आगे किसी की जान की भी परवा नहीं करते, शायद इसका उसे अब भी विश्वास न आता था। सभ्य-संसार इतना निर्मम, इतना कठोर है, इसका ऐसा मर्मभेदी अनुभव अब तक न हुआ था। वह उन पुराने जमाने के जीवों में था, जो लगी हुई आग को बुझाने, मुर्दे को कंधा देने, किसी के छप्पर को उठाने और किसी कलह को शान्त करने के लिये सदैव तैयार रहते थे। जब तक बूढ़े को मोटर दिखाई दी, वह खड़ा टकटकी लगाये उस ओर ताकता रहा। शायद उसे अब भी डाक्टर साहब के लौट आने की आशा थी। फिर उसने कहारों से डोली उठाने को कहा। डोली जिधर से आई थी, उधर ही चली गई। चारों ओर से निराश होकर वह डाक्टर चड्ढा के पास
[ ८१ ]
आया था। इनकी बड़ी तारीफ़ सुनी थी। यहाँ से निराश होकर फिर वह किसी दूसरे डाक्टर के पास न गया। किस्मत ठोक ली।

उसी रात को उसका हँसता-खेलता सात साल का बालक अपनी बाल-लीला समाप्त करके इस संसार से सिधार गया। बूढ़े माँ-बाप के जीवन का यही एक आधार था। इसी का मुँह देखकर जीते थे। इस दीपक के बुझते ही‌ जीवन की अँधेरी रात भाँय-भाँय करने लगी। बुढ़ापे की विशाल ममता टूटे हुए हृदय से निकलकर उस अन्धकार में आर्त-स्वर से रोने लगी।

कई साल गुज़र गये। डाक्टर चड्ढा ने ख़ूब यश और धन कमाया ; लेकिन इसके साथ ही अपने स्वास्थ्य की रक्षा भी की, जो एक असाधारण बात थी। यह उनके नियमित जीवन का आशीर्वाद था कि ५० वर्ष की अवस्था में उनकी चुस्ती और फुर्ती युवकों को भी लज्जित करती थी। उनके हर एक काम का समय नियत था। इस नियम से वह जौ-भर भी न टलते थे। बहुधा लोग स्वास्थ्य के नियमों का पालन उस समय करते हैं, जब रोगी हो जाते हैं। [ ८२ ]
डाक्टर चड्ढा उपचार और संयम का रहस्य खूब समझते थे। उनकी संतान-संख्या भी इसी नियम के अधीन थी। उनके केवल दो बच्चे हुए, एक लड़का और एक लड़की। तीसरी सन्तान न हुई। इसलिये श्रीमती चड्ढा भी अभी जवान मालूम होती थीं। लड़की का तो विवाह हो चुका था। लड़का कालेज में पढ़ता था। वही माता-पिता के जीवन का आधार था। शील और विनय का पुतला, बड़ा ही रसिक, बड़ा ही उदार, विद्यालय का गौरव, युवक-समाज की शोभा, मुख-मण्डल से तेज की छटा-सी निकलती थी। आज उसी की बीसवीं साल-गिरह थी।

सन्ध्या का समय था। हरी-हरी घास पर कुरसियाँ बिछी हुई थीं। शहर के रईस और हुक्काम एक तरफ, कालेज के छात्र दूसरी तरफ, बैठे भोजन कर रहे थे। बिजली के प्रकाश से सारा मैदान जगमगा रहा था। आमोद-प्रमोद का सामान भी जमा था। छोटा-सा प्रहसन खेलने की तैयारी थी। प्रहसन स्वयं कैलासनाथ ने लिखा था। वही मुख्य ऐक्टर भी था। इस समय वह एक रेशमी कमीज पहने, नंगे सिर, नंगे पाँव, इधर-से-उधर मित्रों की आव-भगत में लगा हुआ था। कोई पुकारता--कैलास, जरा, इधर आना ; कोई उधर से बुलाता-–कैलास, क्या
[ ८३ ]
उधर ही रहोगे। सभी उसे छेड़ते थे, चुहलें करते थे। बेचारे को जरा दम मारने का अवकाश न मिलता था।

सहसा एक रमणी ने उसके पास आकर कहा--क्यों कैलास, तुम्हारे साँप कहाँ हैं ? ज़रा मुझे दिखा दो।

कैलास ने उससे हाथ हिलाकर कहा--मृणालिनी, इस वक्त क्षमा करो, कल दिखा दूँगा।

मृणालिनी ने आग्रह किया--जी नहीं, तुम्हें दिखाना पड़ेगा, मैं आज नहीं मानने की, तुम रोज़ कल-कल करते रहते हो।

मृणालिनी और कैलास दोनों सहपाठी थे और एक दूसरे के प्रेम में पगे हुए। कैलास को साँपों के पालने, खेलाने और नचाने का शौक था। तरह-तरह के साँप पाल रक्खे थे। उनके स्वभाव और चरित्र की परीक्षा करते रहते थे। थोड़े दिन हुए, उन्होंने विद्यालय में 'साँपों' पर एक मारके का व्याख्यान दिया था। साँपों को नचाकर दिखाया भी था। प्राणि-शास्त्र के बड़े-बड़े पण्डित भी यह व्याख्यान सुनकर दंग रह गये थे। यह विद्या उसने एक बूढ़े सपेरे से सीखी थी। साँपों की जड़ी-बूटियाँ जमा करने का उसे मरज़ था। इतना पता-भर मिल जाय कि किसी व्यक्ति के पास कोई अच्छी जड़ी है, फिर उसे चैन न आता था। उसे लेकर ही छोड़ता था। यही व्यसन
[ ८४ ]
था। इस पर हजारों रुपये फूँक चुका था। मृणालिनी कई बार आ चुकी थी ; पर कभी साँपों के देखने के लिये इतनी उत्सुक न हुई थी। कह नहीं सकते, आज उसकी उत्सुकता सचमुच जाग गई थी, या वह कैलास पर अपने अधिकार का प्रदर्शन करना चाहती थी ; पर उसका आग्रह बेमौक़ा था। उस कोठरी में कितनी भीड़ लग जायेगी, भीड़ को देखकर साँप कितने चौकेंगे और रात के समय उन्हें छेड़ा जाना कितना बुरा लगेगा, इन बातों का उसे ज़रा भी ध्यान न आया।

कैलास ने कहा--नहीं, कल जरूर दिखा दूंँगा। इस वक्त अच्छी तरह दिखा भी तो न सकूँगा, कमरे में तिल रखने की जगह भी न मिलेगी।

एक महाशय ने छेड़कर कहा--दिखा क्यों नहीं देते जी, ज़रा-सी बात के लिये इतना टालमटोल कर रहे हो। मिस गोविन्द, हर्गिज न मानना। देखें कैसे नहीं दिखाते !

दूसरे महाशय ने और रहा चढ़ाया--मिस गोविन्द इतनी सीधी और भोली हैं तभी आप इतना मिज़ाज करते हैं। दूसरी सुन्दरी होती, तो इसी बात पर बिगड़ खड़ी होती।

तीसरे साहब ने मजाक उड़ाया--अजी बोलना छोड़ देती। भला कोई बात है ! इस पर आपको दावा है कि मृणालिनी के लिये जान हाज़िर है। [ ८५ ]मृणालिनी ने देखा कि ये शोहदे उसे चंग पर चढ़ा रहे हैं, तो बोली--आप लोग मेरी वकालत न करें, मैं खुद अपनी वकालत कर लूंँगी। मैं इस वक्त साँपों का तमाशा नहीं देखना चाहती। चलो छुट्टी हुई।

इस पर मित्रों ने ठट्ठा लगाया। एक साहब बोले--देखना तो आप सब कुछ चाहें, पर कोई दिखाये भी तो ?

कैलास को मृणालिनी की झेंपी हुई सूरत देखकर मालूम हुआ कि इस वक्त उसका इनकार वास्तव में उसे बुरा लगा है। ज्यों ही प्रीति-भोज समाप्त हुआ और गाना शुरू हुआ, उसने मृणालिनी और अन्य मित्रों को साँपों के दरबे के सामने ले जाकर महुअर बजाना शुरू किया। फिर एक-एक खाना खोलकर एक-एक साँप को निकालने लगा। वाह ! क्या कमाल था ! ऐसा जान पड़ता था कि ये कीड़े उसकी एक-एक बात, उसके मन का एक-एक भाव समझते हैं। किसी को उठा लिया, किसी को गरदन में डाल लिया, किसी को हाथ में लपेट लिया। मृणालिनी बार-बार मना करती कि इन्हें गरदन में न डालो, दूर ही से दिखा दो। बस ज़रा नचा दो। कैलास की गरदन में साँपों को लिपटते देखकर उसकी जान निकली जाती थी। पछता रही थी कि मैंने व्यर्थ ही इनसे साँप दिखाने को कहा ; मगर कैलास एक न
[ ८६ ]
सुनता था। प्रेमिका के सम्मुख अपनी सर्प-कला-प्रदर्शन का ऐसा अवसर पाकर वह कब चूकता। एक मित्र ने टीका की--दाँत तोड़ डाले होगे ?

कैलास हँसकर बोला--दाँत तोड़ डालना मदारियों का काम है। किसी के दाँत नहीं तोड़े गये। कहिए तो दिखा दूंँ ? यह कहकर उसने एक काले साँप को पकड़ लिया और बोला--मेरे पास इससे बड़ा और जहरीला साँप दूसरा नहीं है। अगर किसी को काटले, तो आदमी आनन-फ़ानन मर जाय। लहर भी न आये। इसके काटे का मंत्र नहीं। इसके दाँत दिखा दूँ ?

मृणालिनी ने उसका हाथ पकड़कर कहा--नहीं, नहीं, कैलास, ईश्वर के लिये इसे छोड़ दो ! तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ !

इस पर एक दूसरे मित्र बोले--मुझे तो विश्वास नहीं आता, लेकिन तुम कहते हो तो मान लूंँगा।

कैलास ने साँप की गरदन पकड़कर कहा--नहीं साहब, आप आँखों से देखकर मानिये। दाँत तोड़कर बस में किया, तो क्या किया। साँप बड़ा समझदार होता है। अगर उसे विश्वास हो जाय कि इस आदमी से मुझे कोई हानि न पहुँचेगी, तो वह उसे हर्गिज़ न काटेगा।

मृणालिनी ने जब देखा कि कैलास पर इस वक्त भूत
[ ८७ ]
सवार है ; तो उसने यह तमाशा बंद करने के विचार से कहा--अच्छा भई, अब यहाँ से चलो, देखो गाना शुरू हो गया। आज मैं भी कोई चीज सुनाऊँगी। यह कहते हुए उसने कैलास का कंधा पकड़कर चलने का इशारा किया और कमरे से निकल गई ; मगर कैलास विरोधियों का शङ्का-समाधान करके ही दम लेना चाहता था। उसने साँप की गरदन पकड़कर जोर से दबाई, इतनी जोर से दबाई कि उसका मुँह लाल हो गया, देह की सारी नसें तन गई। साँप ने अब तक उसके हाथों ऐसा व्यवहार न देखा था। उसकी समझ में न आता था कि यह मुझसे क्या चाहते हैं। उसे शायद भ्रम हुआ कि यह मुझे मार डालना चाहते हैं। अतएव वह आत्मरक्षा के लिये तैयार हो गया।

कैलास ने उसकी गरदन खूब दबाकर उसका मुँह खोल दिया और उसके जहरीले दाँत दिखाते हुए बोला--जिन सज्जनों को शक हो, आकर देख लें। आया विश्वास, या अब भी कुछ शक है ? मित्रों ने आकर उसके दाँत देखे और चकित हो गये। प्रत्यक्ष प्रमाण के सामने सन्देह को स्थान कहाँ। मित्रों की शंका-निवारण करके कैलास ने साँप की गरदन ढीली कर दी और उसे जमीन पर रखना चाहा। पर वह काला गेहुवन क्रोध से पागल हो रहा था। गरदन
[ ८८ ]
नरम पड़ते ही उसने सिर उठाकर कैलास की उँगली में जोर से काटा और वहाँ से भागा। कैलास की उँगली से टप-टप खून टपकने लगा। उसने जोर से उँगली दबा ली और अपने कमरे की तरफ दौड़ा। वहाँ मेज़ की दराज में एक जड़ी रक्खी हुई थी, जिसे पीसकर लगा देने से घातक विष भी रफू हो जाता था। मित्रों में हलचल पड़ गई। बाहर महफ़िल में भी खबर हुई। डाक्टर साहब घबड़ाकर दौड़े। फौरन् उँगली की जड़ कसकर बाँधी गई और जड़ी पीसने के लिये दी गई। डाक्टर साहब जड़ी के कायल न थे। वह उँगली का डसा भाग नश्तर से काट देना चाहते थे ; मगर कैलास को जड़ी पर पूर्ण विश्वास था। मृणालिनी प्यानो पर बैठी हुई थी। यह खबर सुनते ही दौड़ी, और कैलास की उँगली से टपकते हुए खून को रूमाल से पोंछने लगी। जड़ी पीसी जाने लगी, पर उसी एक मिनट में कैलास की आँखें झपकने लगीं ; ओठों पर पीलापन दौड़ने लगा। यहाँ तक कि वह खड़ा न रह सका। फर्श पर बैठ गया। सारे मेहमान कमरे में जमा हो गये। कोई कुछ कहता था, कोई कुछ। इतने में जड़ी पिसकर आ गई। मृणालिनी ने उँगली पर लेप किया। एक मिनट और बीता। कैलास की आँखें बन्द हो गई। वह लेट गया और हाथ से पंखा झलने का इशारा किया। [ ८९ ]
माँ ने दौड़कर उसका सिर गोद में रख लिया और बिजली का टेबुल फैन लगा दिया गया।

डाक्टर साहब ने झुककर पूछा--कैलास कैसी तबीयत है ? कैलास ने धीरे से हाथ उठा दिया, पर कुछ बोल न सका ! मृणालिनी ने करुण-स्वर में कहा--क्या जड़ी कुछ असर न करेगी ? डाक्टर साहब ने सिर पकड़कर कहा--क्या बतलाऊँ, मैं इसकी बातों में आ गया। अब तो नश्तर से भी कुछ फायदा न होगा।

आध घण्टे तक यही हाल रहा। कैलास की दशा प्रति-क्षण बिगड़ती जाती थी। यहाँ तक कि उसकी आँखें पथरा गई, हाथ पाँव ठंडे हो गये, मुखकी कान्ति मलिन पड़ गई, नाड़ी का कहीं पता नहीं। मौत के सारे लक्षण दिखाई देने लगे। घर में कुहराम मच गया। मृणालिनी एक ओर सिर पीटने लगी, माँ अलग पछाड़ें खाने लगी। डाक्टर चड्ढा को मित्रों ने पकड़ लिया, नहीं तो वह नश्तर अपनी गरदन पर मार लेते।

एक महाशय बोले--कोई मंत्र झाड़नेवाला मिले, तो सम्भव है अब भी जान बच जाय।

एक मुसलमान सज्जन ने इसका समर्थन किया--अरे साहब, कब्र में पड़ी बुई लाशें जिन्दा हो गई हैं। ऐसे-ऐसे बाकमाल पड़े हुए हैं। [ ९० ]
डाक्टर चड्ढा बोले--मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गया था कि इसकी बातों में आ गया। नश्तर लगा देता तो यह नौबतं ही क्यों आती। बार-बार समझाता रहा कि बेटा साँप न पालो ; मगर कौन सुनता था ! बुलाइये, किसी झाड़-फूँक करनेवाले ही को बुलाइये। मेरा सब कुछ ले-ले, मैं अपनी सारी जायदाद उसके पैरों पर रख दूँगा। लंगोटी बाँधकर घर से निकल जाऊँगा ; मगर मेरा कैलास, मेरा प्यारा कैलास‌ उठ बैठे। ईश्वर के लिये किसी को बुलाइये।

एक महाशय का किसी झाड़नेवाले से परिचय था। वह दौड़कर उसे बुला लाये ; मगर कैलास की सूरत देखकर उसे मंत्र चलाने की हिम्मत न पड़ी। बोला--अब क्या हो सकता है सरकार, जो कुछ होना था, हो चुका !

अरे मूर्ख, यह क्यों नहीं कहता कि जो कुछ न होना था हो चुका। जो कुछ होना था वह कहाँ हुआ ? माँ-बाप ने बेटे का सेहरा कहाँ देखा ! मृणालिनी का कामना-तरु क्या पल्लव और पुष्प से रंजित हो उठा ? मन के वह स्वर्ण-स्वप्न, जिनसे जीवन आनन्द का स्रोत बना हुआ था, क्या वह पूरे हो गये ? जीवन के नृत्यमय, तारिका-मण्डित सागर में आमोद की बहार लूटते हुए क्या उनकी नौका जलमग्न नहीं हो गई ? जो न होना था वह हो गया ! [ ९१ ]वही हरा-भरा मैदान था, वही सुनहरी चाँदनी एक निःशब्द संगीत की भाँति प्रकृति पर छाई हुई थी, वही मित्र-समाज था। वही मनोरंजन के सामान थे। मगर जहाँ हास्य की ध्वनि थी, वहाँ अब करुण-क्रन्दन और अश्रु-प्रवाह था।

शहर से कई मील दूर एक छोटे से घर में एक बूढ़ा और बुढ़िया अँगीठी के सामने बैठे जाड़े की रात काट रहे थे। बूढ़ा नारियल पीता था, और बीच-बीच में खाँसता था। बुढ़िया दोनों घुटनियों में सिर डाले आग की ओर ताक रही थी। एक मिट्टी के तेल की कुप्पी ताक पर जल रही थी ! घर में न चारपाई थी, न बिछौना। एक किनारे थोड़ी-सी पुआल पड़ी हुई थी। इसी कोठरी में एक चूल्हा था। बुढ़िया दिनभर उपले और सूखी लकड़ियाँ बटोरती थी। बूढ़ा रस्सी बटकर बाजार में बेच लाता था। यही उनकी जीविका थी। उन्हें न किसी ने रोते देखा, न हँसते। उनका सारा समय जीवित रहने में कट जाता था। मौत द्वार पर खड़ी थी, रोने या हँसने को कहाँ फुर्सत ! बुढ़िया ने पूछा--कल के लिये सन तो है ही नहीं, काम क्या करोगे ? [ ९२ ]'जाकर झगडू साह से दस सेर सन उधार लाऊँगा।'

'उसके पहले के पैसे तो दिये ही नहीं, और उधार कैसे देगा ?'

'न देगा न सही। घास तो कहीं नहीं गई है। दोपहर तक क्या दो आने की भी न काटूँगा ?'

इतने में एक आदमी ने द्वार पर आवाज़ दी--भगत, भगत, क्या सो गये ? ज़रा किवाड़ खोलो।

भगत ने उठकर किवाड़ खोल दिये। एक आदमी ने अन्दर आकर कहा--कुछ सुना, डाक्टर चड्ढा बाबू के लड़के को साँप ने काट लिया।

भगत ने चौंककर कहा--चड्ढा बाबू के लड़के को ! वही चड्ढा बाबू हैं न, जो छावनी में बंगले में रहते हैं ?

'हाँ हाँ वही। शहर में हल्ला मचा हुआ है। जाते हो तो जाओ, आदमी बन जाओगे ?'

बूढ़े ने कठोर भाव से सिर हिलाकर कहा--मैं नहीं जाता। मेरी बला जाय। वही चड्ढा हैं। खूब जानता हूँ। भैया को लेकर उन्हीं के पास गया था। खेलने जा रहे थे। पैरों पर गिर पड़ा कि एक नजर देख लीजिए ; मगर सीधे मुँह बात तक न की। भगवान बैठे सुन रहे थे। अब जान पड़ेगा कि बेटे का ग़म कैसा होता है। कई लड़के हैं ? [ ९३ ]'नहीं जी, यही तो एक लड़का था। सुना है सबने जवाब दे दिया है।'

'भगवान् बड़ा कारसाज है। उस बखत मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े थे ; पर इन्हें तनिक भी दया न आई थी। मैं तो उनके द्वार पर होता, तो भी बात न पूछता।'

'तो न जाओगे ? हमने तो सुना था सो कह दिया।'

'अच्छा किया अच्छा किया, कलेजा ठण्डा हो गया, आँखें ठंडी हो गई। लड़का भी ठण्डा हो गया होगा ! तुम जाओ। आज चैन की नींद सोऊँगा। (बुढ़िया से) जरा तमाखू ले ले। एक चिलम और पीऊँगा। अब मालूम होगा लाला को ! सारी साहिबी निकल जायगी, हमारा क्या बिगड़ा। लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया। जहाँ ६ बच्चे गए थे वहाँ एक और चला गया। तुम्हारा तो राज सूना हो जायगा। उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबाकर जोड़ा था न ! अब क्या करोगे। एक बार देखने जाऊँगा ; पर कुछ दिन बाद। मिजाज का हाल पूछूँगा।'

आदमी चला गया। भगत ने किवाड़ बन्द कर लिये, तब चिलम पर तमाखू रखकर पीने लगा।

बुढ़िया ने कहा--इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जायगा। [ ९४ ]'अरे दोपहर ही होता, तो मैं न जाता। सवारी दरवाजे पर लेने आती, तो भी न जाता। भूल नहीं गया हूँ। पन्ना की सूरत आज भी आँखों में फिर रही है। इस निर्दयी ने उसे एक नजर देखा तक नहीं ! क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा ? खूब जानता था। चड्ढा भगवान् नहीं थे कि उसके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता। नहीं, खाली मन की दौड़ थी। जरा तसल्ली हो जाती ; बस, इसीलिये उनके पास दौड़ा गया था। अब किसी दिन जाऊँगा और कहूँगा, क्यों साहब, कहिए क्या रंग है ? दुनिया बुरा कहेगी, कहे ; कोई परवाह नहीं। छोटे आदमियों में तो सब ऐब होते ही हैं। बड़ों में कोई ऐब नहीं होता। देवता होते हैं।'

भगत के लिये जीवन में यह पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पाकर वह बैठा रह गया हो। ८० वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ कि साँप की खबर पाकर वह दौड़ा न गया हो। माघ-पूस की अँधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों के चढ़े हुए नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की। वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था, निस्वार्थ, निष्काम। लेने-देने का विचार कभी दिल में आया ही नहीं। यह ऐसा काम ही न था। [ ९५ ]
जान का मूल्य कौन दे सकता है ? यह एक पुण्य-कार्य था। सैकड़ों निराशों को उसके मन्त्रों ने जीवन-दान दे दिया था ; पर आज वह घर से कदम नहीं निकाल सका। यह खबर सुनकर भी सोने जा रहा है।

बुढ़िया ने कहा--तमाखू अँगीठी के पास रक्खी हुई है। उसके भी आज ढाई पैसे हो गये। देती ही न थी।

बुढ़िया यह कहकर लेटी। बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया। अन्त को लेट गया ; पर यह खबर उसके हृदय पर बोझ की भाँति रक्खी हुई थी। उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गये हैं, या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से निकलने के लिये कुरेद रहा है। बुढ़िया जरा देर में खर्राटे लेने लगी। बूढ़े बातें करते-करते सोते हैं और जरा-सा खटका होते ही जागते हैं। तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले।

बुढ़िया ने पूछा--कहाँ जाते हो ?

'कहीं नहीं, देखता था कितनी रात है।'

'अभी बहुत रात है, सो जाओ।'

'नींद नहीं आती' [ ९६ ]'नींद काहे को आयेगी ? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है।'

'चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है जो वहाँ जाऊँ। वह आकर पैरों पड़े, तो भी न जाऊँ।'

'उठे तो तुम इसी इरादे से हो।'

'नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूँ कि जो मुझे काँटे बोवे, उसके लिये फूल बोता फिरूँ।'

बुढ़िया फिर सो गई। भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा ; पर उसके मन की कुछ वही दशा थी जो बाजे की आवाज कान में पड़ते ही, उपदेश सुननेवालों की होती है। आँख चाहे उपदेशक की ओर हों ; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं। दिल में भी बाजे की ध्वनि गूँजती रहती है। शर्म के मारे जगह से नहीं उठता। निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिये उपदेशक था ; पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था जो इस समय मर रहा था, जिसके लिये एक-एक पल का विलम्ब घातक था।

उसने फिर किवाड़ खोले, इतने धीरे से कि बुढ़िया को‌ भी खबर न हुई। बाहर निकल आया। उसी वक्त गाँव का चौकीदार गश्त लगा रहा था। बोला--कैसे उठे भगत, आज तो बड़ी सरदी है ! कहीं जा रहे हो क्या ? [ ९७ ]भगत ने कहा--नहीं जी, जाऊँगा कहाँ ! देखता था अभी कितनी रात है, भला कै बजे होंगे ?

चौकीदार बोला--एक बजा होगा और क्या, अभी थाने से आ रहा था ; तो डाक्टर चड्ढा बाबू के बँगले पर बड़ी भीड़ लगी हुई थी। उनके लड़के का हाल तो तुमने सुना होगा, कीड़े ने छू लिया है। चाहे मर भी गया हो। तुम चले जाओ, तो साइत बच जाय। सुना दस हजार तक देने को तैयार हैं।

भगत--मैं तो न जाऊँ, चाहे वह दस लाख भी दें। मुझे दस हजार या दस लाख लेकर करना क्या है ? कल मर जाऊँगा, फिर कौन भोगनेवाला बैठा हुआ है !

चौकीदार चला गया। भगत ने आगे पैर बढ़ाया। जैसे नशे में आदमी की देह अपने काबू में नहीं रहती, पैर कहीं रखता है, पड़ता कहीं है, कहता कुछ है, जबान से निकलता कुछ है, वही हाल इस समय भगत का था। मन में प्रतिकार था, दम्भ था, हिंसा थी ; पर कर्म मन के अधीन न था। जिसने कभी तलवार नहीं चलाई, वह इरादा करने पर भी तलवार नहीं चला सकता। उसके हाथ काँपते हैं, उठते ही नहीं !

भगत लाठी खट-खट करता लपका चला जाता था। [ ९८ ]
चेतना रोकती थी, उपचेतना ठेलती थी। सेवक स्वामी पर हावी था।

आधी रात निकल जाने के बाद सहसा भगत रुक गया। हिंसा ने क्रिया पर विजय पाई--मैं यों ही इतनी दूर चला आया। इस जाड़े पाले में मरने की मुझे क्या पड़ी थी ? आराम से सोया क्यों नहीं ? नींद न आती न सही, दो-चार भजन ही गाता। व्यर्थ इतनी दूर दौड़ा आया। चड्ढा का लड़का रहे, या मरे, मेरी बला से, मेरे साथ उन्होंने ऐसा कौन-सा सलूक किया था कि मैं उनके लिये मरूँ। दुनिया में हजारों मरते हैं, हजारों जीते हैं। मुझे किसी के मरने-जीने से मतलब !

मगर उपचेतना ने अब एक दूसरा रूप धारण किया, जो हिंसा से बहुत-कुछ मिलता-जुलता था--वह झाड़-फूँक करने नहीं जा रहा है, वह देखेगा कि लोग क्या कर रहे हैं, ज़रा डाक्टर साहब का रोना-पीटना देखेगा, किस तरह सिर पीटते हैं, किस तरह पछाड़ें खाते हैं। वह देखेगा कि बड़े लोग भी छोटों की भाँति रोते हैं या सबर कर जाते हैं। वह लोग तो विद्वान होते हैं, सबर कर जाते होंगे। हिंसा भाव को यों धीरज देता हुआ वह फिर आगे बढ़ा।

इतने में दो आदमी आते दिखाई दिये। दोनों बातें करते
[ ९९ ]
चले आ रहे थे--चड्ढा बाबू का घर उजड़ गया, यही तो एक लड़का था। भगत के कान में यह आवाज़ पड़ी। उसकी चाल और भी तेज़ हो गई। थकन के मारे पाँव न उठते थे। शिरोभाग इतना बढ़ा जाता था मानो अब मुँह के बल गिर पड़ेगा। इस तरह वह कोई १० मिनट चला होगा कि डाक्टर साहब का बँगला नजर आया। बिजली की बत्तियाँ जल रही थीं ; मगर सन्नाटा छाया हुआ था। रोने-पीटने की आवाज़ भी न आती थी। भगत का कलेजा धक-धक करने लगा। कहीं मुझे बहुत देर तो नहीं हो गई। वह दौड़ने लगा। अपनी उम्र में वह इतना तेज कभी न दौड़ा था। बस, यही मालूम होता था मानो उसके पीछे मौत दौड़ी आ रही है।

दो बज गये थे। मेहमान बिदा हो गये थे। रोनेवालों में केवल आकाश के तारे रह गये थे। और सभी रो-रोकर थक गये थे। बड़ी उत्सुकता के साथ लोग रह-रहकर आकाश की ओर देखते थे कि किसी तरह सुबह हो और लाश गंगा की गोद में दी जाय।

सहसा भगत ने द्वार पर पहुँचकर आवाज़ दी। डाक्टर साहब समझे कोई मरीज़ आया होगा। किसी
[ १०० ]
और दिन उन्होंने उस आदमी को दुत्कार दिया होता ; मगर आज बाहर निकल आये। देखा, एक बूढ़ा आदमी खड़ा है, कमर झुकी हुई, पोपला मुँह, भौंहें तक सफेद हो गई थीं। लकड़ी के सहारे काँप रहा था। बड़ी नम्रता से बोले--क्या है भई, आज तो हमारे ऊपर ऐसी मुसीबत पड़ गई है कि कुछ कहते नहीं बनता, फिर कभी आना। इधर एक महीना तक तो शायद मैं किसी मरीज़ को न देख सकूँगा।

भगत ने कहा--सुन चुका हूँ बाबूजी, इसीलिये आया हूँ। भैया कहाँ हैं, ज़रा मुझे भी दिखा दीजिये। भगवान् बड़ा कारसाज़ है, मुरदे को भी जिला सकता है। कौन जाने, अब भी उसे दया आ जाय !

चड्ढा ने व्यथित स्वर से कहा--चलो देख लो ; मगर तीन-चार घण्टे हो गये। जो कुछ होना था हो चुका। बहुतेरे झाड़ने-फूँकनेवाले देख-देखकर चले गये।

डाक्टर साहब को आशा तो क्या होती, हाँ बूढ़े पर दया आ गई ; अन्दर ले गये। भगत ने लाश को एक मिनट तक देखा। तब मुसकराकर बोला--अभी कुछ नहीं बिगड़ा है बाबूजी। वाह ! नारायन चाहेंगे, तो आध घण्टे में भैया उठ बैठेंगे। आप नाहक दिल छोटा कर रहे हैं। ज़रा कहारों से कहिये, पानी तो भरें। [ १०१ ]कहारों ने पानी भर-भरकर कैलास को नहलाना शुरू किया। पाइप बन्द हो गया था। कहारों की संख्या अधिक न थी। इसलिये मेहमानों ने अहाते के बाहर के कुएँ से पानी भर-भर कहारों को दिया। मृणालिनी कलसा लिये पानी ला रही थी। बूढ़ा भगत खड़ा मुसकिरा-मुसकिरा कर मंत्र पढ़ रहा था, मानो विजय उसके सामने खड़ी है। जब एक बार मंत्र समाप्त हो जाता, तब वह एक जड़ी कैलास को सुंँघा देता। इस तरह न जाने कितने घड़े कैलास के सिर पर डाले गये और न जाने कितनी बार भगत ने मंत्र फूंँका। आखिर जब उषा ने अपनी लाल-लाल आँखें खोली, तो कैलास की लाल-लाल आँखें भी खुल गई ! एक क्षण में उसने अँगड़ाई ली और पानी पीने को माँगा। डाक्टर चड्ढा ने दौड़कर नारायणी को गले लगा लिया, नारायणी दौड़कर भगत के पैरों पर गिर पड़ी और मृणालिनी कैलास के सामने आँखों में आँसू भरे पूछने लगी--अब कैसी तबीयत है ?

एक क्षण में चारों तरफ खबर फैल गई। मित्रगण मुबारकबाद देने आने लगे। डाक्टर साहब बड़े श्रद्धा-भाव‌ से हर एक के सामने भगत का यश गाते फिरते थे। सभी लोग भगत के दर्शनों के लिये उत्सुक हो उठे ; मगर अन्दर जाकर देखा, तो भगत का कहीं पता न था। नौकरों ने
[ १०२ ]
कहा--अभी तो यहीं बैठे चिलम पी रहे थे। हम लोग तमाखू देने लगे, तो नहीं ली, अपने पास से तमाखू निकालकर भरी। यहाँ तो भगत की चारों ओर तलाश होने लगी, और भगत लपका हुआ घर चला जा रहा था कि बुढ़िया के उठने से पहले घर पहुँच जाऊँ !

जब मेहमान लोग चले गये, तो डाक्टर साहब ने नारायणी से कहा--बुड्ढा न-जाने कहाँ चला गया। एक चिलम तमाखू का भी रवादार न हुआ ?

नारायणी--मैंने तो सोचा था, इसे कोई बड़ी रकम दूंँगी।

चड्ढा--रात को तो मैंने नहीं पहचाना ; पर जरा साफ हो जाने पर पहचान गया। एक बार यह एक मरीज़ को लेकर आया था। मुझे अब याद आता है कि मैं खेलने जा रहा था और मरीज़ को देखने से इनकार कर दिया था। आज उस दिन की बात याद करके मुझे जितनी ग्लानि हो रही है, उसे प्रकट नहीं कर सकता। मैं उसे अब खोज निकालूँगा और उसके पैरों पर गिरकर अपना अपराध क्षमा कराऊँगा। वह कुछ लेगा नहीं, यह जानता हूँ। उसका जन्म यश की वर्षा करने ही के लिये हुआ है। उसकी सज्जनता ने मुझे ऐसा आदर्श दिखा दिया है, जो अबसे जीवन-पर्यन्त मेरे सामने रहेगा।


PD-icon.svg यह कार्य भारत में सार्वजनिक डोमेन है क्योंकि यह भारत में निर्मित हुआ है और इसकी कॉपीराइट की अवधि समाप्त हो चुकी है। भारत के कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अनुसार लेखक की मृत्यु के पश्चात् के वर्ष (अर्थात् वर्ष 2020 के अनुसार, 1 जनवरी 1960 से पूर्व के) से गणना करके साठ वर्ष पूर्ण होने पर सभी दस्तावेज सार्वजनिक प्रभावक्षेत्र में आ जाते हैं।

यह कार्य संयुक्त राज्य अमेरिका में भी सार्वजनिक डोमेन में है क्योंकि यह भारत में 1996 में सार्वजनिक प्रभावक्षेत्र में आया था और संयुक्त राज्य अमेरिका में इसका कोई कॉपीराइट पंजीकरण नहीं है (यह भारत के वर्ष 1928 में बर्न समझौते में शामिल होने और 17 यूएससी 104ए की महत्त्वपूर्ण तिथि जनवरी 1, 1996 का संयुक्त प्रभाव है।

Flag of India.svg