मानसरोवर १/दिल की रानी

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मानसरोवर १  (1947) 
द्वारा प्रेमचन्द
[ १७८ ]
दिल की रानी

जिन बोर तुर्कों के प्रखर प्रताप से ईसाई-दुनिया काँप रही थी, उन्हीं का रक आज कुन्दुनिया की गलियों में बह रहा है। वही कुस्तुन्तुलिया, सौ साल पहले तुर्की के आतङ्क से आहत हो रहा था, आज उनके गर्म रक्त से अपना कलेजा ठण्डा कर रहा है। सत्तर इआर तुर्क योद्धाओं की लाशें बसफरस को लहरों पर तैर रहो। हैं और तुर्की सेनापति एक चाख सिपाहियों के साथ तैमूरी तेज के सामने अपनी किस्मत का फैसला सुनने के लिए खा है।

तैमूर ने विजय से भरी अखें उठाई और सेनापति यदानों की ओर देखकर सिंह के समान गरजाक्या चाहते हो, ज़िन्दगी या मौत ?

यज़दानो ने गर्व से सिर उठाकर कहा --- इज्ज़त की ज़िन्दगी मिले तो ज़िन्दगी, वरना मौत।

तैमूर का क्रोध प्रचण्ड हो उठा । उसने बड़े-बड़े अभिघानियों का सिर नीच कर दिया था। यह जवाब इस अवसर पर सुनने की उसे ताव में थी। इन एक लाख आदमियों की जान इसकी मुट्ठों में हैं। उन्हें वह एक क्षण में मल सकती हैं। उस पर भी इतना अभिमान ! इज्जत को ज़िन्दगी ! इसका यही तो अर्थ है कि सरी का जोवन अमो के भोग-विलास पर बलिदान किया जाय, यही शराब को मजलि छमें यही अरमोनिया और काफ़ की परियाँ XXX नहीं तैमूर ने खीझा बायज़ोर का घमण्ड इसलिए नहीं तो है कि तुझ को फिर उसो मदान्ध स्वाधीनता में इस्लाम का नाम डुबाने को छोड़ दें। तब उसे इतना रक बहाने को क्या करत थौ ? मानव-रक का प्रवाह सङ्गीत का प्रवाई नहीं, रस का प्रवाई नहीं --एक वीभत्सं दृश्य है, जिसे देखकर आँखें मुंह फेर लेत हैं, हृदय सिर झुका लेता है। तैमूर कोई हिंसक पशु नहीं है, जो यह दृश्य देखने के जिए अपने जीवन को बाङ्गो ला दे।

वह अने शब्दों में धिकार भर कर बोला --- जिसे तुम इज्जत की ज़िन्दी कहते हो, वह गुनाह और जहन्नुम की ज़िन्दगी है।

यज़दानों को तैमूर से दया या क्षमा को आशा न थी। उसकी या चके योद्ध ? [ १७९ ]
की बान किसी तरह नहीं बच सकती। फिर वह क्यों दबे और क्यों न जान पर खेल- कर तैमर के प्रति उसके मन में को घृणा है, उसे प्रस्ट कर दे। उसने एक बार कातर नेत्रों से उस रूपवान् युवक की और देखा, जो उसके पीछे खड़ा जैसे अपनी भवानी की लगाम खींच रहा था। सान पर चढ़े हुए, इसपात के समान उसके अंग अंग से अतुल क्रोध की चिनगारियां निकल रही थी। यज़दानी ने उसकी सूरत देखी और से अपनी खींचो हुई तस्चार म्यान में कर ली और खून के घुट पीकर बोला- जहाँपनाह इस वक फ़तहमन्द हैं, लेकिन अपराध क्षमा हो तो कह दूं कि अपने बीवन के विषय में तुर्को को तातारियों से उपदेश लेने की ज़रूरत नहीं । दुनिया से अलग, तातार के असर मैदानों में, त्याग और व्रत की उपासना की जा सकती है, और न मयस्सर होनेवाले पदार्थों का बहिष्कार किया जा सकता है पर नहा खुदा है नेमतों की वर्षा की हो, वहाँ उन नेमतों का भोग न करना नाशुक्री है। अगर तलवार ही सभ्यता की सनद होती, तो गाल कौम रोमनों से कहीं ज्यादा सभ्य होती।

तैमूर ज़ोर से हंसा और उसके सिपाहियों ने तलवारों पर हाथ रख लिये । तैमूर का टहाका मौत का ठहाका था, या गिरनेवाले वज्र का तडाका।

'तातारवाले पशु है, क्यों?'

'मैं यह नहीं कहता।

'तुम कहते हो, खुदा ने तुम्हें ऐश करने के लिए पैदा किया है। मैं कहता हूँ यह कुम है । खुदा ने इन्सान को बन्दगी के लिए पैदा किया है और इसके खिलाफ जो कोई कुछ करता है वह काफिर है, जहन्नुमो। रसूलेपाक हमारी ज़िन्दगी को पाक करने के लिए, हमें सच्चा इन्सान बनाने के लिए, आये थे, हमें दराम की तालीम देने नहीं ! तैमूर दुनिया को इस कुझ से पाक कर देने का बीड़ा उठा चुका है। रसूले- पाक के पदों को कसम, मैं बेरहम नहीं हूँ, झालिम नहीं हूँ, खूख्वार नहीं हूँ; लेकिन कुम को सजा मेरे ईमान में मौत के सिवा कुछ नहीं है।'

उसने तातारी सिपहसालार की तरफ क्रातिल नजरों से देखा और तत्क्षण एक देव-सा मादमी तलवार सोतकर यशदानी के सिर पर आ पहुँचा । तातारी सेना भी तलवारें खींच-सोचकर तुर्की सेना पर टूट पड़ी और दम-केदम में कितनी हो लाशें

ज़मीन पर फड़कने लगी। [ १८० ]

( २ )

सहसा वही रूपवान् युवक, जो यज़दानी के पीछे खदा था, आगे बढ़कर तैमूर के सामने आया और जैसे मौत को अपनी दोनों बँधी हुई मुट्टियों में मसलता हुआ बोला-ऐ अपने को मुसल्मान कहने वाले बादशाह ! क्या यही वह इसलाम है, जिसकी तबलीग का तने बीक्षा उठाया है ? इसलाम को यही तालीम है कि तू उन बहादुरों का इस बेददी से खून बहाये, जिन्होंने इसके सिवा कोई गुनाह नहीं किया कि अपने खलीफा और अपने मुल्क की हिमायत की।

चारों तरफ सन्नाटा छा गया। एक युवक, जिसको भभो मसे भी न भीगी थीं, तैमूर जैसे तेजस्वी बादशाह का इतने खुले हुए शब्दों में तिरस्कार करे और उनकी जबान तालु से न खिचवा ली जाय ! सभी स्तम्भित हो रहे थे भौर तैमूर सम्मोहित. सा बैठा उस युवक को ओर ताक रहा था।

युवक ने तातारी सिपाहियों की तरफ, जिनके चेहरे पर कुतूहलमय प्रोत्साहन मालक रहा था, देखा और बोला तू हन मुसलमानों को काफिर कहता है और समझता है कि तू इन्हें कल करके खुदा और इसलाम की खिदमत कर रहा है। मैं तुमसे पूछता हूँ, भगर वह लोग जो ख़ुदा के सिवा और किसी के सामने सिजदा नहीं करते, जो रसूले पाक को अपना रहबर समझते हैं, मुसलमान नहीं है, तो कोन मुसलमान है ? मैं कहता हूँ हम काफिर सही, लेकिन तेरे तो हैं, क्या इसलाम अञ्जोर में बंधे हुए कैदियों के करल को इजाजत देता है ? खुदा ने अगर तुझे ताकत दो है, अख्तियार दिया है, तो क्या इसी लिए कि तू खुदा के बन्दों का खून बहाये ? क्या गुनहगारों को करल करके तू उन्हें सौधे रास्ते पर ले जायगा ? तूने कितनी बेरहमी से सत्तर हजार बहादुर तुर्कों को धोखा देकर सुरग से उदवा दिया, और उनके मासूम बच्चों और निरपराध स्त्रियों को अनाथ कर दिया, तुझे कुछ अनुमान है ? क्या बही कारनामे हैं, जिन पर तू अपने मुसलमान होने का गर्व करता है। क्या इसौ करल, खून और जुल्म को सियाही से तू दुनिया में अपना नाम रोशन करेगा ! तूने तुकों के खून के बहते दरिया में अपने घोड़ों के सुम नहीं भिगोये हैं, बल्कि इसलाम को जर से खोदकर फेंक दिया है। यह वीर तुर्को का ही आत्मोत्सर्ग है, जिसने यूरोप में इसलाम को तोहोद फैलाई। आज सोफ़िया के गिरजे में तुझे अल्लाह अकबर को सदा सुनाई दे रही है, सारा यूरोप इसलाम का स्वागत करने को तैयार है । क्या
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ये कारनामे इसी लायक है कि उनका यह इनाम मिले ? इस खयाल को दिल से निकाल दे कि तू खूरेली से इस्लाम की खिदमत कर रहा है। एक दिन तुझे भी परवरदिगार के सामने कर्मों का जवाब देना पड़ेगा और तेरा कोई उन न सुना जायगा क्योंकि अगर तुझमें अब भी नेक और बद की तमीज़ बाकी है, तो अपने दिल से पूछ ! तूने यह जिहाद खुदा की राह में किया या अपनी हवस के लिए, और मैं जानता हूँ, तुझे जो जवाम मिलेगा, वह तेरी गर्दन शर्म से झुका देगा।'

ख़लीफा अभी सिर झुकाये ही था कि यजदानी ने कांपते हुए शब्दों में अर्ज को-जहाँपनाह, यह गुलाम का लड़का। इसके दिमाग में कुछ फितूर है, हुजूर इसकी गुस्ताखियों को मुआफ करें। मैं उसकी सजा झेलने को तैयार हूँ।

तैमूर उस युवक के चेहरे की तरफ़ स्थिर नेत्रों से देख रहा था। आज जीवन में पहले बार उसे ऐसे निभीक शब्दों के सुनने का अवसर मिला। उसके सामने बड़े. बड़े सेनापतियों, मन्त्रियों और बादशाहों की ज़बान न खुलती थी। वह जो कुछ करता या कहता था, वही कानून था, किसी को उसमें यूँ करने की ताकत न थो उनकी खुशामदों में उसको अहम्मन्यता को आसमान पर चढ़ा दिया था। उसे विश्वास हो गया था कि खुदा ने उसे इस्लाम को जगाने और सुधारने के लिए ही दुनिया में भेजा है। उसने पैगम्बरी का दावा तो नहीं किया, पर उसके मन में यह भावना दृढ़ हो गई थी। इसलिए जब आज एक युवक ने प्राणों का मोह छोड़कर उसकी कोति का पश्दा खोल दिया तो उसकी चेतना जैसे जाग उठी। उसके मन में क्रोध और हिमा की जगह श्रद्धा का उदय हुआ। उसको आँखों का एक' इशारा इस युवक को जिन्दगी का चिराय गुल कर सकता था। उसको समार-विजयिनी शक्ति के सामने यह दुधमुंहा बालक मानों अपने नन्हे-नन्हें हार्थों से समुद्र के प्रवाह को रोकने के लिए खड़ा हो। कितना हास्यास्पद साहस था , पर उसके साथ हो कितना आत्मविश्वास से भरा हुआ। तैमूर को ऐसा जान पड़ा कि इस निहत्थे बालक के सामने वह कितना निर्बल है। मनुष्य में ऐसे साइस का एक ही स्रोत हो सकता है और वह सत्य पर अटल विश्वास है। उसको आत्मा दौड़कर उस युवक के दामन में चिमट जाने के लिए अधीर हो गई। वह दार्शनिक न था. जो सत्य में भी शक करता है। वह सरल सैनिक था.वो असत्य को भी अपने विश्वास से सत्य बना देता है। [ १८२ ]यज़दानो ने उसी स्वर में कहा --- जहाँपनाह, इसको बदलबानी का ख्याल न फरमाचे xxx।

तैमूर ने तुरन्त तख्त से उठकर यज़दानी को गले लगा लिया और बोला --- काश ऐसी गुस्ताखियों और मदानियों के सुनने का पहले इत्तफाक होता, तो आज इतने बेगुनाह का खून मेरी गर्दन पर न होता। मुझे इस जवान में किसी फरिश्ते की रूह का जलवा नजर आता है, जो मुझ जैसे गुमराहों को सच्चा रास्ता दिखाने के लिए सेलो गई है। मेरे दोस्त, तुम खुशनशीष हो कि ऐसे रिश्ता- सित बेटे के बाप हो। क्या उसका नाम पूछ सकता हूँ।

यज़दानो पहले भातशपरस्त था, पीछे मुसलमान हो गया था, पर अभी तक कभी कभी उसके मन में शकाएँ उटती रहती थी कि उसने क्यों इस्लाम कबूल किया। जो कैदी फांसी के तख्ते पर खड़ा सूखा जा रहा था कि एक क्षण में रस्सो उसको गर्दन में पड़ेगी और वह लटकता रह जायगा, उसे जैसे किसी रिश्ते ने गोद में ले लिया। वह गद्गद कण्ठ से बोला-उसे हबीब कहते हैं।

तैमूर ने युवक के सामने जाकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे लाखों से लगाता हुआ बोला --- मेरे जवान दोस्त, तुम सचमुच खुदा के हबोत्र हो। मैं वह शुनहगार है, जिसने अपनी हालत में इमशा अपने गुनाहों को सवाब समझा, इसलिए कि मुझसे कहा जाता था तेरी लात बेऐष है। आज मुझे मालूम हुआ कि मेरे हाथों इस्लाम को कितना नुक्रमान पहुंचा। आज से मैं तुम्हारा ही दामन पकड़ता हूँ। तुम्हीं मेरे खिज, तुम्ही मेरे रहनुमा हो। मुझे यकीन हो गया कि तुम्हारे ही वसोळे से मैं खुदा के दर्गाह तक पहुंच सकता हूँ।

यह कहते हुए उसने युवक के चेहरे पर नजर डालो, तो उस पर शर्म की लाली छाई हुई थी उस कठ रता की जगह मधुर संकोच मलक रहा था।

युवक ने सिर झुकाकर कहा --- यह हुजूर को कदरदानी है, वरना मेरी क्या

तैमूर ने उसे खींचकर अपनी बगल में तख्त पर बैठा दिया और अपने सेनापति को हुक्म दिया, सारे तुर्क कैदी छोड़ दिये जायें, उनके हथियार वापस कर दिये जायँ और जो माल लूटा गया है, वह सिपाहियों में बराबर बाट दिया जाय।

वज़ीर तो उधर इस हुक्म की तामील करने लगा, उघर तैमर हबीब का हाथ
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पकड़े हुए अपने खीमे में गया और दोनों मेहमानो की दावत का प्रबन्ध करने लगा। और जब भोजन समाप्त हो गया, तो उसने अपने जीवन की सारी कथारोनौकर कर सुनाई, जो आदि से अन्त तक अमिश्रित पशुता और बर्षरता के कृत्यां से भरी हुई थी। और उसने यह सब कुछ इस भ्रम में किया कि वह इश्वरीय आदेश का पालन कर रहा है। वह खुद को कौन मुँह दिखायेगा। रोते-रोते उसकी हिचकियां बंध गई।

अन्त में उसने हबीब से कहा --- मेरे जवान दोस्त, अब मेरा बेड़ा आप ही पार कगा सकते हैं। आपने मुझे गह दिखाई है तो मजिक पर पहुँचाइए। मेरी बाद- शाहत को अब आप ही संभाल सकते हैं। मुझे अब मालूम हो गया कि मैं उसे तावाही के रास्ते पर लिए जाता था। मेरी आप से यही इल्तमास (प्रार्थना) है कि आप उसको वजारत कबूल करें। देखिए खुदा के लिए इन्कार न कीजिएगा, वरना मैं कहीं का न रहूँगा।

यज़दानी ने अरज़ को-हुजूर, इतनी कदरदानी फरमाते हैं, यह आपको इना- यत है। लेकिन अभी इस लड़के की उम्र ही क्या है। वजारत को खिदमत यह क्या अञ्जाम दे सकेगा ? अभी तो इसकी तालीम के दिन है।

इधर से इन्कार होता रहा और उधर तैमूर आग्रह करता रहा। यज़दानी इनकार तो कर रहे थे ; पर छाती फूली जाती थी, मूसा आग लेने गये थे, पैगम्बरी मिल गई। यहाँ मौत के मुंह में जा रहे थे, वजारत मिल गई, लेकिन यह श का भी थी कि ऐसे अस्थिर-चित्त आदमी का क्या ठिकाना ? आज खुश हुए, वजारत देने को तैयार है, कल नाराज हो गये तो जान को खैरियत नहीं। उन्हें हमोज को लियाकत पर भरोसा तो था, फिर भी जी घरता था कि बिराने देश में न आने केपी पड़े, कैसी न पड़े। दरवारवालों में षड्यन्त्र होते ही रहते हैं। हबीब नेक है, समझदार है, अवसर पहचानता है। लेकिन वह तजरबा कहाँ से लायेगा, जो उन ही से आता है ?

उन्होंने इस प्रश्न पर विचार करने के लिए एक दिन की मुहलत मांगी और रुखसत हुए।

( ३ )

हबीब यज़दानी का लड़का नहीं, लड़की थी। उसका नाग उम्मतुल हबीब था। जिस वक यज़दानी और उसकी पत्नी मुसलमान हुए, तो सड़को को उन कुल बारह साल की थी ; पर प्रकृति ने उसे बुद्धि और प्रतिभा के साथ विचार-स्वातन्त्र्य भी
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प्रदान किया था। वह जब तक सत्यासत्य की परीक्षा न कर लेती, कोई बात स्वीकार न करती ; मां-बाप के धर्म-परिवर्तन से उसे अशान्ति त हुईपर जब तक इस्लाम का अच्छी तरह अध्ययन न कर ले, वह केवल मां-बाप को खुश करने के लिए इस्लाम की दीक्षा न ले सकती थी। माँ-बाप भी उस पर किसी तरह का दवाव डालना चाहते थे। जैसे उन्हें अपने धर्म को बदल देने का अधिकार है, वैसे ही उसे अपने धर्म पर आरूढ़ रहने का भी अधिकार है। लड़को को सन्तोष हुआ; लेकिन उसने इस्लाम और ज़रतरत धर्म-दोनों ही का तुलनात्मक अध्ययन आरम्भ किया, और पूरे दो साल के अन्वेषण और परीक्षण के बाद उसने भी इस्लाम की देक्षा ली। माता-पिता फूले न समाये। लड़की उनके दबाव से मुसलमान नहीं हुई है बल्कि स्वेच्छा से, स्वाध्याय से और ईमान से । दो साल तक उन्हें जो एक शा घेरे रहती थी, वह मिट गई।

यज़दानी के कोई पुत्र न था और उस युग में, जब कि आदमी की तलवार हो सबसे बड़ी अदालत थो, पुत्र का न रहना ससार का सबसे बड़ा दुर्भाग्य था। यजदानी बेटे का अरमान बेटो से पूरा करने लगा। लड़को हो की भांति उसको शिक्षा-दीक्षा होने लगी। वह बालकों के-से कपड़े पहनती, घोड़े पर सवार होती, शस्त्र विद्या सोखती और अपने माप के साथ अक्सर खलीफा वायनीद के महलों में जाती और राज- कुमारी के साथ शिकार खेलने जाती ! इसके साथ हो वह दर्शन, काव्य, विज्ञान और अध्यात्म का भी अभ्यास करती थी। यहां तक कि सोलहवें वर्ष में वह फौजी विद्यालय में दाखिल हो गई और दो साल के अन्दर यहाँ को सबसे ऊँचो परीक्षा पास काके फौज में नौकर हो गई। शस्त्र-विद्या और सेना सञ्चालन-कला में वह इतनी निपुण थी और खलीफा वायज़ीद उसके चरित्र से इतना प्रसन्न था कि पहले हो पहल उसे एक हजारी मन्सब मिल गया। ऐसी युवती के चाहने वालों की क्या कमी ? उसके साथ के कितने ही अफसर, राज-परिवार के कितने ही युवक उस पर प्राण देते थे ; पर कोई उसको नजरों में न अँचता था। नित्य ही निकाह के पैगाम आते रहते थे ; पर वह हमेशा इन्कार कर देती थी। वैवाहिक जीवन ही से उसे अरुचि थी। उसकी समाधीन प्रकृति इस बन्धन में न पड़ना चाहती थी। फिर नित्य ही वह देखती थी कि युवतियाँ- कितने अरमानों से ब्याह कर लाई जाती हैं और फिर कितने निरादर से महकों में बन्द कर दी जाती हैं। उनका भाग्य पुरुषों की दया के अधीन है। अक्सर ऊँचे
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घराने की महिलाओं से उसको मिलने-जुलने का अवसर मिलता था। उनके मुख से उनकी करुण कथा सुन सुनकर वह वैवाहिक पराधीनता से और भी धृणा करने लगती थी और यजदानी उसको स्वाधीनता में बिल्कुल गधा न देता था। लड़की स्वाधीन है उसकी इच्छा हो विवाह करे या क्वारी रहे, वह अपनी आप मुखतार है । उसके पास पेशाम आते, तो बह साफ जवाब दे देता --- मैं इस बारे में कुछ नहीं जानता, इसका फमला वही करेगी। यद्यपि एक युवती का पुरुष वेष में रहना, युवकों से मिलना-जुलना समाज में आलोचना का विषय था; पर यजदानी और उसकी स्त्री दोनों ही को उसके सतीत्व पर विश्वास था। हसीब के व्यवहार और आचार में उन्हें कोई ऐसी बात नज़र न आती थी, जिससे उन्हें किसी तरह को शका होती। यौवन की आंधी और लालसाओं के तूफान में थी वह चौबीस वर्षों को बोलबाला अपने हृदय को सम्पत्ति लिये अटल और अजेय खड़ो थो, मानों सभो युवक उसके सगे भाई हैं।

( ४ )

कुस्तुन्तुनिया में कितनी खुशियां मनाई गई, हबीब का कितना सम्मान और स्वागत हुआ, उसे कितनी बधाइयाँ मिलों, यह सब लिखने की बात नहीं। शहर तबाह हुआ जाता था। सम्भव था, आज उपके महलों और बाजारों से आग की -लपटें निकलती होती। राज्य और नगर को उस कल्पनातीत विपत्ति से बचानेवाला आदमी कितने आदर, प्रेम, श्रद्धा और नल्लास का पात्र होगा, इसको तो कल्पना भी नहीं की जा सकती उस पर कितने फूलों और कितने लाल जवाहर की वर्षा हुई, इसका अनुमान तो कोई कवि ही कर सकता है। और नगर को महिलाएं दृश्य के अक्षय भण्डार से असासे निकाल-निकालकर उस पर लुटाती थी और गर्व से फूली हुई उसका मुख निहारकर अपने को धन्य मानती थी। उसने देवियों का मस्तक ऊँचा कर दिया था।

रात को तैमूर के प्रस्ताव पर विचार होने लगा। सामने गहे दार कुर्सी पर यज- दानो था-सौम्य, विशाल और तेजस्वी। उसको दाहिनी तरफ उसकी पत्नी थी, ईरानी लिबास में, आंखों में दया और विश्वास को ज्योति भरे हुए। बाई तरफ उम्मुतुल हबीब थी, जो इस समय रमणी-वेष में मोहिनी बनी हुई थी, ब्रह्मचर्य के तेज से 'दीप्त।

यज़दानी ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा --- मैं अपनी तरफ़ से कुछ नहीं
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कहना चाहता; लेकिन यदि मुझे सलाह देने का अधिकार है, तो मैं स्पष्ट कहता हूँ कि तुम्हें इस प्रस्ताव को कभी स्वीकार न करना चाहिए । तैप से यह गत बहुत दिन तक छिपी नहीं रह सकतो कि तुम क्या हो। उस बक क्या परिस्थिति होगी, में नहीं कहता। और यहां इस विषय में जो कुछ टोकाएं होंगो, वह तुम मुझसे ज्यादा जानती हो। यहाँ में मौजूद था और कुत्सा को मुंह न खोलने देता था , पर वहा तुम अकेली रहोगी और कुत्ता को मनमाने आरोप करने का अवघर मिलता रहेगा।

उसकी पत्नी स्वेच्छा को इतना महत्व न देना चाहती थी। बोली --- मैंने सुना है, तैमूर निगाहों का अच्छा आदमी नहीं है। मैं किसी तरह तो न ज ने दूंगी कोई बात हो जाय तो सारी दुनिया हंसे। योही हँसनेवाले क्या कम हैं ?

इसी तरह स्त्री पुरुष बड़ी देर तक ऊँच-नीच सुझाते और तरह-तरह को शकाएँ करते रहे , लेकिन हमोष मौन पाधे बैठी हुई थी। यजदानी ने समका, हबीब भी उनसे सहमत है । इन्कार की सूचना देने के लिए उठा ही था कि हमोव ने पूछा --- आप तैमूर से क्या कहेंगे।

'यही, जो यहां तय हुआ है।'

'मैंने तो सभी कुछ नहीं कहा ।'

'मैंने तो समझा, तुम भी हमसे सहमत हो।'

'जी नहीं। आप उनसे जाकर कह दें, मैं स्वीकार करती हूँ।'

माता ने छाती पर हाथ रखकर कहा --- यह क्या गजन करतो है बेटो, सोच तो दुनिया क्या कहेगो?

यज़दानी भी सिर थामकर बैठ गये, मानौ हृदय में गोली लग गई हो। मुंह से एक शब्द भो न निकला।

होम त्योरियों पर बल डालकर बोली --- अम्मीजान, मैं आपके हुक्म से औ भर भी मुंह नहीं फेरना चाहती। आपको पूरा अख्तियार है, मुझे जाने दे या न दें, लेकिन खल्क की खिदमत का ऐसा मौका शायद मुझे जिन्दगी मैं फिर न मिले। इस मौके को हाथ से खो देने का अफसोस मुझे उम्र भर रहेगा। मुझ यकीन है कि. अमीर तैमूर को मैं अपनी दियानत, चेयरलो और सच्चो वफादारी से इन्सान बनमः सकतो हूँ और शायद उसके हार्थों खुदा के बन्दों का खून इतनो कसरत से न बहे। [ १८७ ]
वह दिलेर है। मगर बेरहम नहीं। कोई दिलेर आदमो बेरहम नहीं हो सकता ! उसने अब तक जो कुछ किया है, मजहब के अन्धे जोश में किया है। भाज खुदा ने मुझे बह मौका दिया है कि मैं उसे दिखा दूं कि मजहब खिदमत का नाम है, लूट और कत्ल का नहीं। अपने बारे में मुझे मुतलक अन्देशा नहीं है। मैं अपनी हिफाज़त आप कर सकती हूँ। मुझे दावा है कि अपने फर्ज को नेकनीयती से अदा करके मैं दुश्मनों की जवान भी बन्द कर सकती हूँ ; और मान लीजिए मुझे नाकामो भी हो, तो क्या सचाई और इन के लिए कुर्मान हो जाना ज़िन्दगी को सबसे शान- दार प्रतह नहीं है ? अब तक मैंने जिस उसूल पर जिन्दगी बसर की है, उसने मुझे धोखा नहीं दिया और उसी के फैन से आन मुझे वह दर्जा हासिल हुआ है, जो बड़े- बड़े के लिए ज़िन्दगी का ख्वाब है। ऐसे आजमाये हुए दोस्त मुझे कभी धोखा नहीं दे, सकते। तैमूर पर मेरी हकीकत खुल भी जाय, तो क्या खौफ़ ? मेरी तलवार मेरी हिफाजत कर सकती है। शादी पर मेरे खयाल आपको मालूम हैं। अगर मुझे कोई ऐसा आदमी मिलेगा, जिसे मेरी रूह कबूल करती हो, जिसको जात में अपनी हस्ती को खोकर मैं अपनी रूह को ऊँचा उठा सकूँ, तो मैं उसके कदमों पर गिरकर अपने को उसकी नजर कर दूँगी।

यज़जानी ने खुश होकर बेटी को गले लगा लिया। उसको स्त्री इतनी जल्द आश्वस्त न हो सकी। वह किसी तरह बेटी को अकेली न छोड़ेगी। उसके साथ वह -भी जायगी।

( ५ )

कई महीने गुज़र गये। युवक हबीब तैमुर का वज़ीर है। लेकिन वास्तव में वही बादशाह है। तैमूर उसी की आँखों से देखता है, उसी के कानों से सुनता है और उसी की अक्ल से सोचता है। वह चाहता है, इबोब आठौ पहर उनके पास रहे। उसके सामोप्य में उसे स्वर्ग का-सा सुख मिलता है। समरकन्द में एक प्राणी भी ऐसा नहीं, जो उससे जलता हो। उसके बर्ताव ने सभी को मुग्ध कर लिया है। क्योंकि वह इन्सान से जी भर भी कदम नहीं हटाता। जो लोग उसके हार्थों चलती हुई न्याय की चक्की में पिस जाते हैं, वे भी उससे सद्भाव ही रखते है ; क्योंकि वह ल्याय को जरूरत से ज़्यादा कटु नहीं होने देता।

सन्ध्या हो गई थी। राज्य कर्मचारी जा चुके थे। शमादान में मोम को बत्तियाँ
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जल रही थी। अगर को सुगन्ध से सारा दीवानखाना महक रहा था। हबीब भी उठने ही को था कि चौबदार ने खबर दी-हुजूर, जहाँपनाह तशरीफ़ ला रहे हैं।

हबीब इस खबर से कुछ प्रमन्न नहीं हुआ। अन्य मन्त्रियों को भांति वह तैमर श्री सोहबत का भूखा नहीं है। वह हमेशा तैमूर से दूर रहने की चेष्टा करता है। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि उसने शाही दस्तरखान पर भोजन किया हो। तैनर को मजलिसों में भी वह कभी शरीक नहीं होता। उसे जक शाति मिलती है, व एकान्त में अपनी माता के पास बैठकर दिन भर का माजरा उससे कहता है और यह उस पर अपनी पसन्द की मुहर लगा देती है।

उसने द्वार पर जाकर तैमूर का स्वागत किया। तैमूर ने मसनद पर बैठते कहा --- मुझे ताज्जुब होता है, कि तुम इस जवानी में ज़ाहिदों की-सी जिन्दगी कैसे पसर करते हो हयोग ! खुदा ने तुम्हें यह हुस्न दिया है कि हसीन-से-हसीन नाज़नीन भी तुम्हारी माशूद बनकर अपने को खुशनसीब समझेगी। मालूम नहीं, तुम्हें खबर है या नहीं, जब तुम अपने मुश्की घोड़े पर सवार होकर निकलते हो, तो समरबन्द की खिड़कियों पर हजारों आखें तुम्हारी एक झलक देखने के लिए मुन्तजिर बैठी रहती हैं , पर तुम्हें किसी न किसी तरफ आँखें उठाते नहीं देखा। मेरा खुदा गवाह है, मैं कितना चाहता हूँ कि तुम्हारे कदमों के नक्श, पर चलूँ, पर दुनिया मेरी गर्दन नहीं छोड़ती। क्यों अपनों पाक जिन्दगी का जादू मुम्स पर नहीं डालते ? मैं चाहता हूँ, जैसे तुम दुनिया में रहकर भी दुनिया से अलग रहते हो, वैसे मैं भी रहूँ; लेकिन मेरे पास न वह दिल है, न वह दिमाग मैं हमेशा अपने आप पर, सारी दुनिया पर, दांत पीसता रहता हूँ। जैसे मुझे हरदम खून की प्यास लगी रहती है, जिसे तुम बुकने नहीं देते, और यह.जानते हुए भी कि तुम जो कुछ करते हो, इससे बेहतर कोई दूसरा नहीं कर सकता। मैं अपने गुस्से को काबू में नहीं कर सकता। तुम जिवर से निकलते हो, मुहब्बत और रोशनी फैला देते हो। जिसको तुम्हारा, दुश्मन होना चाहिए, वह भी तुम्हारा दोस्त है। मैं जिधर से निकलता हूँ, नफरत और शुबहा फैलाता हुआ निकलता हूँ जिसे मेरा दोस्त होना चाहिए, वह भी मेरा दुश्मन है। दुनिया में बस यही एक जगह है जहाँ मुझे आफियत मिलती है। अगर तुम समझते हो, यह ताज और तख्त मेरे रास्ते के रोड़े हैं तो खुदा को क्रसम में आज इन पर लात मार दें। मैं आज तुम्हारे पास यहो दरख्वास्त लेकर आया हूँ
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कि तुम मुझे वह रास्ता दिखाओ, जिससे मैं सच्ची खुशी पा सकूँ। मैं चाहता हूँ, तुम इसी महल में रहो कि मैं तुमसे सच्ची जिन्दगी का सबक सीखू।

हबीब हृदय धक से हो उठा। कहीं अमौर पर उसके नारित्व का रहस्य खुन तो नहीं गया ? उसकी समझ में न भाया कि उसे क्या जवाब दे। उसका कोमल हृदय तैमूर को इस करुण आत्मग्लानि पर द्रवित हो गया। जिसके नाम से दुनिया कापतो है, वह उसके सामने एक दयनोयं प्रार्थी बना हुआ उससे प्रकाश को भिक्षा मांग रहा है। तैमूर की उस कठोर, विकृति, शुष्क, हिंसात्मक मुद्रा में उसे एक स्निग्ध मधुर ज्योति दिखाई दी, मानों उसका जाग्रत् विवेक भीतर से झांक रहा हो। उसे मपना स्थिर जीवन, जिसमें ऊपर उठने की स्फूति ही न रही थी, इस विफल उद्योग के सामने तुच्छ जान पड़ा।

उसने मुग्ध कण्ठ से कहा --- हुजूर इस गुलाम की इतनी कद्र करते हैं, यह मेरो खुशनसीबी है। लेकिन मेरा शाही महल में रहना मुनासिब नहीं।

तैमूर ने पूछा --- क्यों ?

'इसलिए कि जहाँ दौलत ज्यादा होती है, वहां डाके पाते हैं और जहाँ क्रन्द्र ज्यादा होती है, वहाँ दुश्मन भी ज्यादा होते हैं।'

'तुम्हारा दुश्मन भा कोई हो सकता है ?'

'मैं खुद अपना दुश्मन हो जाऊँगा। आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन ग्ररूर है।'

तैमूर को जैसे कई रत्न मिल गया। उसे अपने मनातुष्टि का आभास हुआ। आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन ग्रार है, इस वाक्य को मन-हो भन दोहराकर उसने कहा-तुम मेरे काबू में कभी न आओगे हो। तुम वह परन्द हो, जो आसमान में ही उड़ सकता है। उसे सोने के पिंजरे में भी रखना चाहो तो फड़फड़ाता रहेगा। खैर, खुदा हाफ़िज़।

वह तुरन्त अपने महल को भोर चला, मानों उस रत्न को सुरक्षित स्थान में रख देना चाहता हो। यह वाक्य आज पहली बार उसने न सुना था; पर आज इसमें जो शान, जो आदेश, जो सप्रेरणा से मिली, वह कभी न मिली थी।

( ६ )

इस्तसर के इलाके से बगावत की खबर आई है। हबीब को शंका है कि तमर वहाँ पहुँचकर कहीं कत्लेआम न कर दे। वह शान्तिमय उपार्यों से इस विद्रोह को
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ठण्डा करके तैमूर को दिखाना चाहता है कि सद्भावना में कितनी शक्ति है। तैमूर उसे इस मुहिम पर नहीं भेजना चाहता। लेकिन हबीब के आग्रह के सामने बेबस है। होम को जब और कोई युक्ति न सूझी, तो उसने कहा --- गुलाम के रहते हुए हुजूर अपनी जान खतरे में डालें यह नहीं हो सकता।

तैमूर मुस्कराया --- मेरी जान को तुम्हारी जान के मुकाबले में कोई हकीकत नहीं है हबीब। फिर मैंने तो कभी जान की परवाह न को। मैंने दुनिया में कल और लूट के सिवा और क्या यादगार छोड़ी। मेरे मर जाने पर दुनिया मेरे नाम को रोयेगी नहीं, यकीन मानो। मेरे-जैसे लुटेरे हमेशा पैदा होते रहेंगे, लेकिन खुदा न करे, तुम्हारे दुश्मनों को कुछ हो गया, तो यह सल्तनत खाक में मिल जायगी, और तब मुझे भी सोने में खंजर घुभा लेने के सिवा और कोई रास्ता न रहेगा। मैं नहीं कह सकता हबोध, तुमसे मैंने कितना पाया। काश, दस-पांच साल पहले तुम मुझे मिल जाते, तो तैमूर तवारीख में इतना रूसियाह न होता। आज अगर जरूरत पड़े तो मैं अपने जैसे सो तैमूरों को तुम्हारे ऊपर निसार कर दूं। यहो समझ लो कि तुम मेरी रूह को अपने साथ लिये जा रहे हो। आज मैं तुमसे कहता हूँ हबीब कि मुझे तुमसे इश्क है, वह इश्क जो मुझे आज तक किसी हसीना से नहीं हुआ। इक क्या चौल है, इसे मैं अब जान पाया हूँ। मगर इसमे क्या बुराई है कि मैं भी तम्हारे साथ चलूँ।

हबीब ने धड़कते हुए हृदय से कहा --- अगर मैं भापकी ज़रूरत समगा, तो इत्तला दूंगा।

तैमूर ने दाढ़ी पर हाथ रखकर कहा --- जैसी तुम्हारी मर्जी, लेकिन रोजाना क्रासिद भेजते रहना, वरना शायद मैं बेचैन होकर चला आऊँ।

तैमूर ने कितनी मुहब्बत से हबीब के सफर की तैयारियां को। तरह-तरह के आराम और तकल्लुफ की चोजें उसके लिए जमा की। उस कोहिस्तान में यह चीजें कहां मिलेंगी। वह ऐसा संलग्न था, मानों माता अपनी लड़की को ससुराल भेज रही हो।

जिस वक्त हबीब फौज के साथ चला, तो सारा समरकन्द उसके साथ था। जौर तैमूर आँखों पर रूमाल रखे, अपने तख्त पर ऐसा सिर झुकाये बैठा था, मानो कोई

पक्षी आहत हो गया हो। [ १९१ ]

( ७ )

इस्तखर अरमनो ईसाइयों का इलाका था। मुसलमानों ने उन्हें परास्त करके वहाँ अपना अधिकार जमा लिया था और ऐसे नियम बना दिये थे, जिससे ईसाइयों को पा पग पर अपनी पराधीनता का स्मरण होता रहता था। पहला नियम जजिए का था, जो हरेक ईसाई को देना पड़ता था, जिससे मुसलमान मुक्त थे। दूसरा नियम यह था कि गिजों में घण्टा न वजे। तीसरा नियम मदिरा का था, जिसे मुसलमान हराम समझते थे। ईसाइयों ने इन नियमों का क्रियात्मक विरोध किया और जब मुसलमान अधिकारियों ने शस्त्रबल से काम लेना चाहा, तो ईसाइयों ने बगावत कर दी, मुसलमान सूबेदार को कैद कर लिया और किले पर सलीबी झण्डा उड़ने लगा।

हबीब को यहाँ आज दूसरा दिन है ; पर इस समस्या को कैसे हल करे। उसका उदार हृदय कहता था, ईसाइयों पर इन वन्धनों का कोई अर्थ नहीं, हरेक धर्म का समान रूप से आदर होना चाहिए, लेकिन मुसलमान इन क्लदों को उठा देने पर कभी राज़ी न होंगे। और यह लोग मान भी जाय तो तैमूर क्यों मानने लगा ? उसके धार्मिक विचारों में कुछ उदारता आई है, फिर भी वह इन कैदों को उठाना कभी मजूर न करेगा। लेकिन क्या वह ईसाइयों को सजा दे कि वे अपने धार्मिक स्वाधीनता के लिए लड़ रहे हैं। जिसे वह सत्य समझता है, उसकी हत्या कैसे करे ? नहीं, उसे सत्य का पालन करना होगा, चाहे इसका नतीजा कुछ भी हो। अमीर सम- झेंगे, मैं जरूरत से ज्यादा बढ़ा जा रहा हूँ। कोई मुज़ायका नहीं।

दूसरे दिन हबोक ने प्रातःकाल डके को चोट एलान कराया-अज़िया माफ शिया गया, शराब और यष्टों पर कोई कैद नहीं है।

मुसलमानों में तहलका पड़ गया। यह कुझ है, हरामपरस्ती है। अमौर तैमूर ने लिस इस्लाम को अपने खून से सींचा, उसकी जद उन्ही के वजीर हबीब पाशा के हार्थों खुद रही है। पासा पल्ट गया। शाही फौजें मुसलमानों से जा मिली। हबीब ने इस्तखर के किले में पनाह लो। मुसलमानों को ताकत शाही फौज के मिल जाने से बहुत बढ़ गई थी। उन्होंने किला घेर लिया और यह समझकर कि हबीब ने तैमूर से बगावत को है, तैमूर के पास इसको सूचना देने और परिस्थिति समझाने के लिए ,

क्रासिद भेजा। [ १९२ ]

( ८ )

आधी रात गुजा चुकी थी। तैमूर को दो दिनों से इस्तखर की कोई खबर न मिली थी। तरह-तरह को शकाएं हो रहो थी। मन में पछतावा हो रहा था कि उसने क्यों हमोव को अकेला जाने दिया। माना कि वह बड़ा नीतिकुशल है, पर बगावत कही जोर पकड़ गई, तो मुठो भर आदमियों से वह क्या कर सकेगा? और पगावत यकोनन् जोर पकड़ेगी। वहाँ के ईसाई बला के सरकश हैं। जब उन्हें मालूम होगा कि तैमूर को तलवार में जंग लग गया और उसे अब महलों को जिन्दगी पसन्द है, तो उनको हिम्मत दूनो हो जायगी। हबीब कहीं दुश्मनों में घिर गया, तो महा गजम हो जायगा।

उसने अपने जानू पर हाथ मारा और पहलू यदलकर अपने ऊपर झुंझलाया। वह इतना पस्त-हिम्मत क्यों हो गया ? क्या उसका तेज और शौर्य उससे विदा हो गया ? जिसका नाम सुनकर दुश्मनों में उम्पन पड़ जाता था, वह आज अपना मुँह छिपाकर महलों में बैठा हुआ है। दुनिया को आँखों में इसका एक हो अर्थ हो सकता है कि तैमूर अब मैदान का शेर नहीं, कालोन का शेर हो गया। होश फरिश्ता है, नो इन्सान को बुराइयों से वाकिफ नहीं। जो रहम और सादिलो और बेगरजी का देवता है, वह क्या जाने इन्सान कितना शैतान हो सकता है । अमन के दिनों में तो ये बातें कौम ओर मुल्क को तरकी के रास्ते पर ले जाती हैं, पर जग में, जन कि शेतातो जोश का तूफान उठता है, इन ख्यियों को गुजाइश नहीं। उस वक्त तो उसी की जीत होती है, जो इन्सानी खून का रंग खेले, श्वेतों-खलिहानों की होली जलाये, जगलों को बसाये और पस्तियों को वीरान करे। अमन का कानून जा के कानून से बिलकुल जुदा है।

सहमा चारदार ने इस्तखर से एक क़ासिद के आने की खबर दी। क़ासिद ने ज़मीन चूमी और एक किनारे भक्ष से खड़ा हो गया। तैमूर का रोष ऐसा छा गया कि जो कुछ कहने आया था, वह सब भूल गया।

तैमूर ने त्योरियां चढ़ाकर पूछा --- क्या खबर लाया है ? तीन दिन के बाद आया भी तो इतनी रात गये ?

क़ासिद ने फिर ज़मीन चूमी और बोला --- खुदावन्द, वज़ीर साहब ने जज़िया मुआफ कर दिया। [ १९३ ]तैमूर गरज उठा --- क्या कहता है, जजिया माफ कर दिया ?

'हां, खुदावन्द।'

'वज़ीर साहब ने।'

'किसके हुक्म से ?'

'अपने हुक्म से हुजूर।'

'और हुजूर, शराब का भी हुक्म दे दिया।'

'मिरजों में घण्टे बजाने का भी हुक्म हो गया।'

'और खुदावन्द ईसाइयों से मिलकर मुसलमानों पर हमला कर दिया।'

'तो मैं क्या करूँ।'

'हुजूर हमारे मालिक हैं। अगर हमारी कुछ मदद न हुई, तो वहाँ एक मुसल- मान भी जिन्दा न बचेगा।'

'हबीब पाशा इस दख्त कहाँ है ?'

'इस्तख़र के किले में हुजूर।'

'और मुसलमान क्या कर रहे हैं।'

'हमने ईसाइयों को किले में घेर लिया है।'

'उन्हीं के साथ हबीब को भी।'

'हाँ हुजूर, वह हुजूर, से बागी हो गये है।'

'और इसलिए मेरे वफादार इस्लाम के खादिमों ने उन्हें कैद कर रखा है। मुमकिन है मेरे पहुँचते-पहुंचते उन्हें कल भी कर दें। बदनात दूर हो जा मेरे सामने से। मुसलमान समझते हैं हनीष मेरा नौकर है और मैं उसका आक्रा हूँ। यह गलत है, झूठ है। इस सल्तनत का मालिक हबीब है, तैमूर उसका अदना गुलाम है। उसके फैसले में तैसूर दस्तन्दाजी नहीं कर सकता। बेशक जज़िया मुआफ होना चाहिए। मुझे कोई मजाज़ नहीं है कि दूसरे मजहबवालो से उनके ईमान का तावान ढूं। कोई मजाज नहीं है; अगर मस्जिद में अजान होती है, तो कालीसा में घण्टा क्यों
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न बजे? पण्टे को आवास में कुम नहीं है। सुनता है बाज़ात ! घण्टे को आवाज में कुम नहीं हैं। काफिर वह है, जो दूसरों का हक छीन ले, जो गरीबों को सताये, दयावान हो, खुदगरज हो। काफ़िर वह नहों, जो मिट्टो या पत्थर के टुकड़े में खुदा का नूर देखता हो, जो नदियों और पहाड़ों में, दरख्तों और झाड़ियों में खुदा का जलवा पाता है। वह हमसे और तुमसे ज्यादा खुदापरस्त है, जो मस्जिद में खुदा को बन्द सम- झते हैं। तू समझता है मैं कुफ बक रहा हूँ ? किसी को काफिर सय सना हो कुम है। हम सर खुदा के बन्दे हैं, सब। बजा और उन पायो मुसलमानों से कह दे, अगर फौरन मुहासरा न उठा लिया गया, तो तैमूर कयामत को तरह आ पहुंचेगा।

कासिद इत्त-बुद्धि सा खड़ा हो या हिवाहर खतरे का बिगुल बज उठा और शोजें किसो समर-यात्रा की तैयारी करने लगीं।

(९)

तीसरे दिन तैमूर इस्तखर पहुंचा, तो हिले का मुहासरा उठ चुका था। किले को तोपों ने उसका स्वागत किया। हबीब ने सममा तैमूर ईसाइयों को सजा देने मा रहा है। ईसाइयों के हाथ-पांव इले हुए थे, मगर हबोन मुकाबले के लिए तैयार था। ईसाइयों को स्वत्ल को रक्षा में यदि उसको जान भी माय, तो कोई गम नहीं। इस मुआमले पर किसी तरह का समझौता नहीं हो सकता । तैमूर अगर तनार से काम लेना चाहता है, तो उसका जवाम तकवार से दिया जायगा।

मगर यह क्या बात है। शाही फौज सुफेद झण्डा दिखा रही है। तेमूर लाने नहीं सुलह करने आया है। उपका स्वागत दुसरो तरह का होगा। ईसाई सरदारों को साथ लिए हपोच किले से बाहर निकला। तैमर अकेला घोड़े पर सवार चला आ रहा था। हबीब घोड़े के उतरकर आदाव बमा लाया। तैमूर भो छोड़े से उतर पड़ा और होम का माया चूम लिया और बोला-मैं सब सुन चुका हूं हयोग ! तुमने बहुत अच्छा किया और वहीं किया जो तुम्हारे सिवा दूसरा नहीं कर सकता था। मुझे जजिया लेने का या ईसाइयों के मजो हक छीनने का कोई मजाज न था। मैं भान दरबार करके इन बातों को तसदीक कर दंगा और ता में एक ऐसो तमोर करूँगा, जो कई दिन से मेरे जेहन में भा रही है और मुझे उम्मोद है कि तुम उसे मजूर पर लोगे। मजूर करना पड़ेगा। [ १९५ ]हबीब के चेहरे का रंग, उड़ रहा था। कहीं इक्रोक्रत खुळ तो नहीं गई ? वह क्या तजबीज है, उसके मन में खलबली पड़ गई।

तैमूर ने मुस्कराकर पूछा --- तुम मुझसे लड़ने को तैयार थे ?

हबीब ने शरमाते हुए कहा --- हक के सामने अमीर तैमूर को भी कोई हकीकत नहीं।

बेशक बेशक तुममें फरिश्तों का दिल है, तो शेरों की हिम्मत भी है। लेकिन अफसोस यही है कि तुमने यह गुमान ही क्यों किया कि तैमूर तुम्हारे फैसले को भन्सूस कर सकता है । यह तुम्हारी लात है, जिसने मुझे बतलाया है कि सल्तनत किसी आदमी को जायदाद नहीं, बल्कि एक ऐसा दरख्त है जिसकी हरेक शाख और पत्तो एक-सी खुराक पाती है।'

दोनों किले में दाखिल हुए। सूरज डूब चुका था। आन-को-आन में दरबार लाए गया और उसमें तैमूर ने ईसाइयों के धार्मिक अधिकारों को स्वीकार किया।

चारों तरफ से आवाज़ आई-खुदा हमारे शाहंशाह की उन्न दराज़ करे।

तैम ने उसी सिलसिले में कहा-दोस्तो, मैं इस दुआ का हकदार नहीं हूँ। यो चीज़ मैंने आपसे जबरन ली थी, उसे आपको वापस देकर मैं दुआ का काम नहीं कर रहा हूँ, इससे कहीं ज्यादा मुनासिब यह है कि आप मुझे लानत है कि मैंने इतने दिनों तक आपके हकों से आपको महरूम रखा।

चारों तरफ से आवाज आई-मरहबा-मरहबा !!

दोस्तों, उन हकों के साथ-साथ मैं भापको सलतनत भी भापको वापस करता हुँ । क्योंकि खुदा की निगाह में सभी इन्सान बराबर हैं और किसी कौम या शख्स का दूसरी कोम पर हुकूमत करने का अख्तियार नहीं है। आज से आप अपने बादशाह हैं। मुझे उम्मीद है कि आप भी मुस्लिम आबादी को उसके जायज हक्कों से महरूम न करेंगे। अगर कभी ऐसा मौका माये कि कोई जाबिर क्रोम आपको आजादी छीनने की कोशिश करे, तो तैमूर आपको मदद करने को हमेशा तैयार रहेगा।

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किले में प्रश्न खतम हो चुका है। समरा और हुकाम रुखसत हो चुके हैं। दोवाने-खास में सिर्फ तैमूर और हयाब रह गये हैं। हबीब के मुख पर आज स्मित झोस्य की बह छटा है, जो सदैव गम्भीरता के नीचे दबो रहती थी। भाव उसके
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कपोलों पर जो लाली, आंखों में नशा, अगों में जो चचलता है, तो और कभी नज़र न आई थी। वह कई बार तैमूर से शोखियां कर चुका है, कई बार हंसो कर चुका है, उसको युवती चेतना, पद और अधिकार को भूलकर चहकती फिरती है।

सहसा तैसूर ने कहा --- हबीब, मैंने आज तक तुम्हारी हरेक बात मानी है। अब मैं तुम वह तजवीज करता हूँ, जिसका मैंने जिक्र किया था, उसे तुम्हें कबूल करना पड़ेगा।

हबीब ने धड़कते हुए हृदय से सिर झुकाकर कहा --- फरमाइए !

'पहले वादा करो कि तुम कबूल करोगे ।'

'मैं तो आपका गुलाम हूँ।'

'नहीं, तुम मेरे मालिक हो, मेरी ज़िन्दगो को रोशनो हो, तुमसे मैंने जितना फैज़ पाया है, उसका अन्दाजा नहीं जा सकता ? मैंने अब तक सलतनत को अपनी जिन्दगी की सबसे प्यारो चौज़ समझा है। इसके लिए मैंने सब कुछ किया, जो मुझे न करना चाहिए था। अपनों के खून से भी इन हाथों को दागदार किया, औरों के खून से भी। मेरा काम अम खत्म हो चुका। मैंने बुनियाद जमा दो, इस पर महल घनाना तुम्हारा काम है। मेरी यही इल्तजा है कि आज से तुम इस बादशाहत के अमीन हो जाओ, मेरी जिन्दगी में भी और मेरे मरने के बाद भी।

हबीब ने आकाश में उड़ते हुए कहा --- इतना बड़ा मोन्ह ! मेरे कन्धे इतने मज़. बूत नहीं हैं।

तैमूर ने दीन आग्रह के स्वर में कहा --- नहीं, मेरे प्यारे दोस्त, मेरो यह इल्ताना तुम्हें माननी पड़ेगी।

हपौष की आँखों में हँसो थी, अधरों पर सकोच। उसने आहिस्ता से कहा- मजूर है।

तैमूर ने प्रफुल्लित स्वर में कहा --- खुदा तुम्हें सलामत रखे।

'लेकिन अगर आपको मालूम हो जाय कि हबीब एक कच्ची अक्ल को क्वाँरी बालिका है तो?'

'तो वह मेरो बादशाहत के साथ मेरे दिल को भी रानी हो जायगी।'

'आपको बिलकुल ताज्जुब नहीं हुआ ? जानता था।' [ १९७ ]'का से ?

'जब तुमने पहली बार अपनी ज़ालिम आंखों से मुके देखा।'

'मगर आपने छिपाया खूब !!

'तुम्ही ने तो सिखाया। शायद मेरे सिवा यहां किसी को यह बात मालूम नहीं !

आपने कैसे पहचान लिया ?'

'तैमूर ने मतवाली आँखों से देखकर कहा --- यह न बताऊँगा ।

यही हमीब तैमूर की बेगम 'हमीदा' के नाम से मशहूर है।