मानसरोवर १/धिक्कार

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मानसरोवर १  (1947) 
द्वारा प्रेमचंद
[ १९८ ]
धिक्कार

अनाथ और विधवा मानो के लिए जीवन में अब रोने के सिवा दूसरा अवलंब न था। वह पांच ही वर्ष की थी जब पिता का देहान्त हो गया । मम ने किसी तरह उसका पालन किया। सोलह वर्ष की अवस्था में मुहल्लेवालों को मदद से उसका विवाह भी हो गया , पर साल के अन्दर ही माता और पति दोनों बिदा हो गये। इस विपत्ति में उसे अपने चाचा चशोधर के सिवा और कोई ऐसा नजर न आया जो उसे आश्रय देता। वंशीधर ने अब तक जो व्यवहार भिया था, उसके यह आशा न हो सकती थी कि वहाँ वह शांति के साथ रह सकेगी। पर, वह सब कुछ सहने और सब कुछ करने को तैयार थी। वह गालो, निकी, मार-पोट सा सह लेगी, कोई उन पर सन्देह तो न करेगा, उस पर मिथ्या लाछन तो न लगेगा, शोहदों और लुच्चों से तो उसका रक्षा होगी। यशोधर को कुलमर्यादा की कुछ चिन्ता हुई। मानो को याचना को अस्वीकार न कर सके।

लेकिन दो-चार महीनों में ही मानो को मालूम हो गया कि इस घर में बहुत दिनों तक उसका निवाह न होगा। वह घर का सारा काम करतो, इशारों पर नाचतो, सबको खुश रखने की कोशिश करती , पर न जाने क्यों चचा और वची दोनों उससे जलते रहते। उसके माते ही महरी अलग कर दी गई। नहलाने धुलाने के लिए एक लौंडा था, उसे भी जबार दिया गया , पर मानो से इतना उबार होने पर भी चचा और चची न जाने क्यों उससे मुँह फुलाये रहते। कभी चचा घुड़कियां जमाते, कभी चाची कोसतो, यहाँ तक कि उसको चचेरी बहन ललिता भी बात-बात पर उसे गालियाँ देती। घर-भर में केवल उसके चचेरे भाई गोकुल हो को उससे सहानुभूति थो। उनी की बातों में कुछ आत्मीयता कुछ स्नेह का परिचय मिलता था। वह अपनी माता का स्वभाव जानता था। अगर वह उसे समझाने की चेष्टा करता, या खुल्लम-खुल्ला मानी का पक्ष लेता, तो मानी को ए बड़ो घर में रहना कठिन हो जाता इसलिए उसकी सहानुभूति मानो ही को दिलासा देने तक रह जाती थी। वह कहता- बहन मुझे कहीं नौकर हो जाने दो, फिर तुम्हारे कष्टों का अन्त हो जायगा। तब
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देखू गा कौन तुम्हें तिही आँखों से देखता है। जब तक पढ़ता हूं, तभी तक तुम्हारे चुरे दिन हैं। मानी ये स्नेह में डूबी हुई बात सुनकर पुर क्ति हो जाती और उसका रोआनीमा गोकुल को आशीर्वाद देने लगता।

( २ )

आज ललिता का विवाह है। सवेरे से ही मेहमानों का आना शुरू हो गया है। पहनों की भनकार से घर गूंज रहा है। मानी भी मेहमानों को देख-देखकर खुश हो रही है। उसकी पर कोई छाभूषण नहीं है और न उसे सुन्दर कपड़े हो दिये गये हैं। फिर भी उसका मुख प्रसन्न है।

आधी रात हो गई थी। विवाह का मुहुर्त निकट आ गया। जनवासे से चढ़ावे को चीज आई। सभी औरतें उत्सुक हो-होकर उन चीजों को देखने लगीं। ललिता को भाषण पहिनाये जाने लगे। मान के हृदय में बड़ी इच्छा हुई कि जाकर बधू का देखे। अभी कल जो बालिका यौ उसे आज बधू वेश में देखने की इच्छा न रोक सकी। वह मुसकिराती हुई कमरे में घुसी। सहसा उसकी चची ने झिड़ककर कहा --- तुझे यहाँ किसने बुलाया था, निकल ना यहाँ से।

मानी ने बड़ी-बड़ी यातनाएँ सही थी , पर आज की वह मिड़की उसके हृदय में वाण की तरह चुभ गई। उसका मन उसे धिकारने लगा। तेरे छिछोरेपन का यही पुरस्कार है। यहां सुहागिनों के बीच में तेरे आने की क्या जरूरत थी। वह चिसि- याई हुई कमरे से निकली और एकान्त में बैठकर रोने के लिए ऊपर जाने लगी। सहसा होने पर उसकी इन्द्रनाथ से मुटभेद हो गई। इन्द्रनाथ गोकुल का सहपाठी और परम मित्र था। वह भी न्यौवे में आया हुआ था। इस वक्त गोकुल को खोजने के लिए ऊपर आया था। मानी को वह दो-एक बार देख चुका था और यह भी जानता था कि वहां उसके साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया जाता है। ची को बातों की भनक उसके कान में भी पद गई थी। मानौ को ऊपर जाते देखकर वह उसके चित्त का भाव समझ गया और उसे सांत्वना देने के लिए ऊपर आया; मगर दरवाजा भीतर से बन्द था। उसने किवाड़ की दरार से भीतर झाका। मानी मेज के पास सड़ी रो रही थी।

उसने धीरे से कहा --- मानी द्वार खोल दो।

मानी उसको आवाज सुनकर कोने में छिप गई और गभीर स्वर में बोली --- क्या काम है ? [ २०० ]इन्द्रनाथ ने गद्गद स्वर में कहा --- तुम्हारे पैरों पढ़ता हूँ मानो, खोल दो। यह स्नेह में डूबा हुआ विनय मानो के लिए अभूतपूर्व था। इस निर्दय संसार में कोई उससे ऐसो विनतो भो का सकता है, इपको उसने स्वप्न में भो कसना न को थी। मानो ने कांपते हुए हाथों से द्वार खोल दिया। इन्द्रनाथ हाटकर कमरे में घुसा, देखा कि छत के पखे के कड़े से एक रस्सो लटक रही है। उसका हृदय कांप उठा। उसने तुरन्त जेब से चाकू निकालकर रस्सी काट दो और बोला, क्या करने जा रहो थो मानी, जानतो हो इस अपराध का क्या दंड है।

मानी ने गर्दन झुकाकर कहा --- इस दण्ड से कोई ओर दण्ड कठोर हो सकता है ? जिसको सूरत से लोगों को घृणा हो उसे मरने पर भी अगर कठोर दण्ड दिया जाय, तो मैं यहो कहूँगो कि ईश्वर के दरमार में न्याय का नाम भी नहीं है। तुम मेरो दशा का अनुभव नहीं कर सकते।

इन्दनाथ को आंखें सजल हो गई। मानो की बातों में कितना कठोर सत्य भरा हुआ था। बोला --- सदा यह दिन नहीं रहेंगे मानो , अगर तुम यह समझ रहो हो कि संसार में तुम्हारा कोई नहीं है तो यह तुम्हारा भ्रम है। संसार में कम से कम एक मनुष्य ऐसा है जिसे तुम्हारे प्राण अपने प्राणों से भी प्यारे हैं।

सहसा गोकुल आता हुआ दिखाई दिया। मानो कमरे से निकल गई। इन्द्रनाथ के शब्दों ने उसके मन में एक तूफान-सा उठा दिया था। उसका क्या आशय है, यह उसको समझ में न आया। फिर भी आम उसे अपना जीवन सार्थक मालूम रहा था। उसके अधधारमय जीमन में एक प्रकाश का उदय हो गया था।

( ३ )

इन्द्रनाथ को वहा बैठे और मानी को कमरे से जाते देखकर गोकुल कुछ खटक गया। उसको त्योरियां बदल गई। कठोर स्वर में बोला-तुम यहां कव आये ?

इन्द्रनाथ ने अविचलित भाव से कहा --- तुम्हों को खाजता हुमा यहाँ आया था। तुम यहाँ न मिले तो नीचे लोटा जा रहा था ; अगर मैं चला गया होता तो इस वचः तुम्हें यह कमरा बन्द मिलता और पखे के कड़े में एक लाश लटकतो हुई नजर आती।

गोकुल ने समझा यह अपने अपराध को छिराने के लिए कोई बहाना निकाल रहा है। तीन कठ से बोला --- तुम यह विश्वासघात करोगे, मुझे ऐसो आशा न थी।

इन्द्रनाथ का चेहरा लाल हो गया। वह मावेश में आकर खहा गया और
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बोला --- न मुझे यह आशा थी कि तुम मुझ पर इतना बड़ा लांछन रख दोगे। मुझे न मालूम था कि तुम मुझे इतना नीच और कुटिल समझते हो। मानो तुम्हारे लिए तिरस्कार को वस्तु हो, मेरे लिए वह श्रद्धा को वस्तु है और रहेगो। मुझे तुम्हारे सामने अपनी सफाई देने को जरूरत नहीं है, लेकिन मानो मेरे लिए उससे कहीं पवित्र है, जितनो तुम समझते हो। मैं नहीं चाहता था कि इस वक्त तुमसे ये बातें कहूँ। इसके लिए और अनुकूल परिस्थितियों को राह देख रहा था लेकिन मुआमला आ पहने पर कहना हो पड़ रहा है। मैं यह तो जानता था कि मानो का तुम्हारे घर में कोई आदर नहीं; लेकिन तुम लोग उसे इतना नोच और त्याज्य समझते हो, यह आज तुम्हारी माताजी को बातें सुनकर मालूम हुआ। केवल इतनी-सी बात के लिए कि वह चढ़ावे के गहने देखने चली गई थी, तुम्हारी माता ने उसे इस बुरी तरह मितड़का, जैसे कोई कुत्ते को भी न मिहकेगा। तुम कहोगे इसे मैं क्या करूँ, मैं कर हो क्या सकता हूँ जिस घर में एक अनाथ त्रो पर इतना अत्याचार हो, उप घर का पानी पीना भी हराम है। अगर तुमने अपनी माता को पहले ही दिन समझा दिया होता, तो आज यह नौवत न आतो : तुम इस इलजाम से नहीं बच सकते। तुम्हारे घर में आज विवाह का उत्सव है, मैं तुम्हारे माता-पिता से कुछ बात वोत नहीं कर सकता, लेकिन तुमसे कहने में कोई सोच नहीं है कि मैं मानो को अफ्नो जीवन-सहचरो बनाकर आने को धन्य समझंगा। मैंने समझा था अपना कोई ठिकाना करके तब यह प्रस्ताव करू गा; पर मुझे भय है कि और बिलम्ब करने में शायद मानो से हाथ धोना पड़े, इसलिए तुम्हें और तुम्हारे घरवालों को चिन्ता से मुक्त करने के लिए मैं आज हो यह प्रस्ताव किये देता हूँ।

गोकुल के हृदय में इन्द्रनाथ के प्रति ऐसो श्रद्धा कभी न हुई थी। उस पर ऐसा सन्देह करके वह बहुत ही लजित हुआ। उसने यह अनुमन भो किया कि माता के भय से मैं मानी के विषय में तटस्थ रहकर कायरता का दोषी हुआ हूँ। यह केवळ कायरता थी और कुछ नहीं। कुछ झेपता हुआ बोला-अगर अम्मा ने मानो,को इस बात पर झिड़का तो यह उनको मूर्खता है, मैं उनठे अवसर मिलते हो पूछू गा।

इन्द्रनाथ --- अब पूछने पाछने का समय निकल गया। मैं चाहता हूँ कि तुम मानो से इस विषय में सलाह करके मुझे बतला दो। मैं नहीं चाहता कि अब वह यहाँ क्षण-भर भी रहे। मुझे आज मालूम हुआ कि वह गर्विणी प्रकृति को स्त्री है
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और सच पूछो तो मैं उसके स्वभाव पर मुग्ध हो गया हूँ। ऐसी स्त्री अत्याचार नहीं सह सकती।

गोकुल ने डरते-डरते कहा --- लेकिन तुम्हें मालूम है-वह विधवा है।

जब हम किसी के हाथों अपना असाधारण हित होते देखते हैं तो हम अपनो सारी बुराइयाँ उसके सामने खोलकर रख देते हैं। हम उसे दिखाना चाहते है कि हम आपको इस कृपा के सर्वथा अयोग्य नहीं है।

इन्द्रनाथ ने मुसकराकर कहा --- जानता हूँ, सुन चुका हूँ और इसीलिए तुम्हारे बाबूजी से कुछ कहने का मुझे मन तक साहस हुआ , लेकिन न जानता वो भी इसका मेरे निश्चय पर कोई असर न पड़ता । मानी विधवा हो नहीं, अछूत हो, उससे भी गई बीती अगर कुछ हो सकती है वह भी हो, फिर भी मेरे लिये वह रमणी-रत्न है। हम छोटे-छोटे कामों के लिए तजुर्वकार आदमो खोजते हैं , मगर जिस के साथ हमें जीवनयात्रा करनी है, उसमें तजुर्वे का होना ऐव समझते हैं। मैं न्याय का गला घोटनेवालों में नहीं हूँ। विपत्ति से बढ़कर तजर्षा सिखानेवाला कोई विद्यालय आज तक नहीं खुला। जिसने इस विद्यालय में डिग्री ले लो, उसके हाथों में हम निश्चिन्त होकर जीवन की बाग-डोर दे सकते हैं। किसो रमणी का विधवा होना मेरी आँखों में दोष नहीं, गुण है।

गोकुल ने प्रसन्न होकर --- लेकिन तुम्हारे घर के लोग।

इन्द्रनाथ ने दृढ़ता से कहा --- मैं अपने घरवालों को इतना मूर्ख नहीं समझता कि इस विषय में आपत्ति करें; लेकिन आपत्ति करें भी तो मैं अपनी किस्मत अपने हाथ में ही रखना पसन्द करता हूँ। मेरे बड़ों को मुझ पर अनेको अधिकार हैं। बहुत सी बातों में मैं उनकी इच्छा को कानून समझता हूं लेकिन जिस बात को मैं अपनी आत्मा के विकास के लिए शुभ समझता है, उसमें मैं किसी से दवाना नहीं चाहता। में इस गर्व का आनन्द उठाना चाहता हूँ कि मैं स्वय अपने भोवन का निर्माता हूँ।

गोकुल ने कुछ शकित होकर कहा --- और अगर मानी न मजूर करे।

इन्द्रनाथ को यह शका बिलकुल निर्मूल जान पड़ी। बोले --- तुम इस समय बच्चों की-सी बातें कर रहे हो गोकुल। यह मानी हुई बात है कि माना आसानी से मजूर न करेगी। वह इस घर में ठोकरें खायगी, झिड़कियाँ सहेंगी, गालियां सुनेगी; पर
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इसी घर में रहेगो। युगों के संस्कारों को मिटा देना आसान नहीं है, लेकिन हमें उसको राज़ी करना पड़ेगा। उसके मन में सचित सरकारों को निकालना पड़ेगा। मैं विधवाओं के पुनर्विवाह के पक्ष में नहीं। मेरा खयाल है कि प्रतिव्रत का यह अलो- किक आदर्श संसार का अमूल्य रत्न है और हमें बहुत सोच-समझकर उस पर आघात करना चाहिए, लेकिन मानो के विषय में वह बात हो नहीं उठती। प्रेम और भक्ति - नाम से नहीं, व्यक्ति से होती है। जिस पुरुष की उसने सूरत भी नहीं देखो, उससे उसे प्रेम नहीं हो सकता। केवल रस्म की बात है। इस आडम्बर को, इस दिखावे को, हमें परवाह करनी चाहिए। देखो, शायद कोई तुम्हें बुला रहा है। मैं भी चाहता हूँ। दो-तीन दिन में फिर मिलूंगा ; मगर ऐसा न कही कि तुम संकोच में पड़कर, सोचते-विचारते रह जाओ और दिन निकलते चले जाय।

गोकुल ने उसके गले में हाथ डाल कर कहा -मैं परसों खुद हो आऊँगा।

( ४ )

बरात विदा हो गई थी। मेहमान भी रुखसत हो गये। रात के नौ बज गये थे विवाह के बाद को नौद मशहूर है। घर के सभी लोग सरेशाम से सो रहे थे। कोई चारपाई पर, कोई तख्त पर, कोई जमीन पर, जिसे जहां जगह मिल गई, वहीं सो रहा था। केवल मानो घर की देख-भाल कर रही थी, और ऊपर गोकुल अपने कमरे में धैठा हुआ समाचार पढ़ रहा था।

सहसा गोकुल ने पुकारा --- मानी, एक ग्लास ठंडा पानी तो लाना, बड़ी प्यास लगी है।

मानी पानी लेकर ऊपर गई और मेज़ पर पानी रखकर लौटा ही चाहतो थो कि गोकुल ने कहा --- जरा ठहरो मानी, तुमसे कुछ कहना है।

मानी ने कहा --- अभी फुरसत नहीं है भाई, सारा घर सो रहा है। कहीं कोई शुस आये तो लोटा-थाली भी न बचे।

गोकुल ने कहा --- धुप आने दो, मैं तो तुम्हारी जगह होता तो चोरों से मिल- कर चोरी कावा देता। मुझे इसी वक इन्द्रनाथ से मिलना है। मैंने उससे आज मिलने झा वचन दिया है-देखो सकोच मत करना, लो बात पूछ रहा हूँ उसका जल्द उत्ता देना। देर होगो तो वह घबरायगा। इन्द्रनाथ को तुमसे प्रेम है, यह तुम जानती हो न? [ २०४ ]मखनी ने मुंह फेरकर कहा --- यह बात कहने के लिए मुझे बुलाया था। मैं कुछ नहीं जानती।

गोकुल --- खैर, यह वह जाने और तुम जानो। वह तुमसे विवाह करना चाहता है । वैदिक रीति से विवाह होगी। तुम्हें स्वीकार है ?

मानी की गर्दन शर्म से झुक दाई। वह कुछ जवाब न दे सकी।

गोकुक ने फिर कहा --- दादा और अम्माँ से यह बात नही हो गई, इसका कारण तुम जानत हो हो। वह तुम्हें चुड़कियाँ दे-देकर, जला-जलाकर चाहे मार डालें ; पर विवाह करने की सम्प्रति कभी न देंगे। इससे उनकी नाक कट ज्ञायगी, इसलिए अब इसका निर्णय तुम्हारे हो ऊपर है। मैं तो समझता हूँ, तुम्हें स्वोकार कर लेना चाहिए। इन्द्रनाथ तुमसे प्रेम तो रता है हो, यो भी निकलक चरित्र को आदमी है और बला का दिलेर। भय तो उसे छू ही नहीं गया। मुझे तुम्हें सुखी देखकर सच्चा आनन्द होगा। मानी के हुदय में एक वेग उठ रहा था ; अगर मैं इसे अवाज़ न निकली।

गोकुल ने अब की खीझकर कहा --- देखो, मानी यह चुप रहने का समय नहीं है। सोचती क्या हो।

मौनी ने काँपते हुए स्वर में कहा --– हाँ ।

गोकुल के हृदय का बोझ हलका हो गया। मुसकिराने लगा। मानी शर्म के मारे वहाँ से भाग गई।

( ५ )

शाम को गोकुल ने अपनी माँ से कहा --- अम्माँ, इन्द्रनाम के घर आज कोई उत्सव है। उसको माता अकेली घबड़ा रही थी कि कैसे सब काम होगा। मैंने झा, मैं भानी को भेज दें । तुम्हारी आज्ञा हो तो मानो को पहुंचा। कल-परसों तक चली आवेगी।

मानी उसी वक्त वह आ गई। गोकुल ने उसकी ओर कनखियों से ताशा। मानी लज्जा से गड़ गई। भागने का रास्ता न मिल।

माता ने कहा --- सुझसे क्या पूछठे हो, वह जाय ले जाय।

गोकुल ने मानी से कहा --- कपड़े पहनकर तैयार हो जावे, तुम्हें इन्द्रनाथ के घर चलना है। [ २०५ ]मानी ने आपत्ति की --- मेरा जो अच्छा नहीं हैं, मैं न जाऊँगी। गोकुल को मां ने कहा-बको क्यों नहीं जाती, क्या वहाँ कोई पहाड़ खोदना है।

मानी एक सुफेद साड़ी पहनकर तांगे पर बैठी, तो उसका हृदय कॉप रहा था और बार-बार आँखों में आंसू भर आते थे। उसका हृदय बैठा जाता था, मानों नदी में बने जा रही हो!

तांगा कुछ दूर निकल गया तो उसने गोकुळ से कहा भैया, मेरा जो न जाने कैसा हो रहा है, घर लौट चलो, तुम्हारे पैर पड़ती हूँ।

गोकुल ने कहा --- तू पागल है। यहाँ सब लोग तेरी राह देख रहे हैं और तू, कहती है लौर चलो।

मानी --- मेरा मन कहता है कोई भनिष्ट होनेवाला है।

गोकुल --- और मेरा मन कहता है तू रानी बनने जा रही है।

मानी --- दस-पांच दिन ठहर क्यों नही जासे। कह देना मानी बीमार है।

गोकुल --- पागलों की-सी बातें न करो।

मानी लोग कितना हँसेंगे।

गोकुल --- मैं शुभ-कार्य में किसी को हँसी की परवा नहीं करता।

मानी --- अम्माँ तुम्हें घर में घुसने न देंगी। मेरे कारण तुम्हें भी मिडकियाँ मिलेगी।

गोकुल --- इसकी कोई परवा नहीं है। उनकी तो यह आदत ही है।

तांगा पहुंच गया। इन्द्रनाथ की लाता विचारशील महिला थो। उन्होंने आकर वधू को उतारा और भीतर ले गई।

( ६ )

गोकुल यहाँ से घर चला तो ग्यारह बज रहे थे। एक ओर तो शुभ कार्य के पूरा करने का आनन्द था, दूसरो और लय था कि कल मानी न जायगी तो लोगों को क्या जवाब दूंगा। उसने निश्चय किया चलकर सब साफ-साफ़ कह दूँ। छिपाना व्यर्थ है। आज नहीं छल, कल नहीं परसों तो सब कुछ कहना ही पड़ेगा। आज ही क्यों न कह दूं।

यह निश्चय करके वह घर में दाखिल हुआ। [ २०६ ]माता ने किताब खोलते हुए कहा --- इतनी रात तक क्या करने लगे ? उसे भी क्यों न लेते आये, कल सवेरे चौका-बरतन कौन करेगा ?

गोकुल ने सिर झुकाकर कहा --- वह तो अब शायद लौटकर न आवे अम्माँ। उसके वहीं रहने का प्रबन्ध हो गया है।

माता ने आँखें फाड़कर कहा --- क्या बकता है, भला वह वहाँ के रहेगो ?

गोकुल --- इन्द्रनाथ से उसका विवाह हो गया है।

माता मानों आकाश से गिर पड़ीं। उन्हें कुछ सुध न रहो कि मेरे मुँह से क्या निकल रहा है, कुलगार, भडुवा, हरामजादा, और न जाने क्या-क्या कहा। यहां तक कि गोकुल का धैर्य चरम सीमा को उल्लंघन कर गया। उसका मुंह लाल हो गया, त्योरियां चढ़ गई । बोला --- अम्माँ, बस करो, अब मुझमें इससे ज्यादा सुनने को सामर्थ्य नहीं है। मगर मैंने कोई अनुचित कर्म किया होता, तो आपको जूतिया खाकर भी सिर न उठाता ; मगर मैंने कोई अनुचित कर्म नहीं शिया। मैंने वही डिया जो ऐसो दशा में मेरा कर्तव्य था और जो हर एक भले आदमो को करना चाहिए। तुम मूर्ख हो, तुम्हें कुछ नहीं मालूम कि समय की क्या प्राति है। इसी लिए तक मैंने धैर्य के साथ तुम्हारी गालियां सुनौं। तुमने, और मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि पिताजी ने भो, मानो के जोवन को नारकीय मा रखा था। तुमने उसे ऐसी-ऐसी ताइनाएं दो जो कोई अपने शत्रु को भो न देगा। इसो लिए न कि वह तुम्हारी आश्रित थी ? इसी लिए न कि वह अनाथिनो थो ? अब वह तुम्हारो गालियां खाने न आवेगी। जिस दिन तुम्हारे घर में विवाह का उत्सव हो रहा था, तुम्हारे हो एक कठोर वाक्य से आहत होकर वह आत्महत्या करने जा रही थी। इन्द्रनाथ उस समय ऊपर न पहुँच जाते तो आज हम, तुम और सारा घर हवालात में बैठे होते।

माता ने आंखें मटकाकर कहा --- आहा ! कितने सपूत बेटे हो तुम कि सारे घर को संकट से बचा लिया। क्यों न हो। सो बहन को पारो है। कुछ दिन में मुके ले जाकर किसी के गळे बाँध आना। फिर तुम्हारी चाँदो हो जायगो। यह रोजगार सब से अच्छा है। पढ़-लिखकर क्या करोगे।

गोकुल मर्म-वेदना से तिलमिला उठा। व्यथित कठ से बोला-श्वर न करे कि कोई बालक तुम जैसी माता के गर्भ से जन्म ले। तुम्हारा मुंह देखना भो पाप है। [ २०७ ]यह कहता हुआ वह घर से निकल पड़ा और उन्मत्तों की तरह एक तरफ चळ खड़ा हुआ। जोर के झोंके चल रहे थे ; पर उसे ऐसा मालूम हो रहा था कि सोस लेने के लिए इवा नहीं है।

( ७ )

एक सप्ताह बीत गया; पर गोकुल का कहीं पता नहीं। इन्द्रनाथ को बम्बई में एक जगह मिल गई थी। वह वहां चला गया था। वहाँ रहने का प्रान्ध करके वह अपनी माता को तार देगा और तब सास और बहू वहां चलो जायगी। वंशीधर को पहले संदेह हुआ कि गोकुल इन्द्रनाथ घर छिपा होगा; पर जब वहाँ पता न चला तो उन्होंने सारे शहर में खोज पूछ शुरू की। जितने मिलनेवाले, मित्र, स्नेही, सम्बन्धी थे, सभी के घर गये ; पर सब जगह से साफ जवाव पाया। दिन भर दौड़- धूप कर शाम को घर आते तो स्त्री को आड़े हाथों लेते और कोसो लड़के को, पानी पी-पीकर कोसी। न जाने तुम्हें कभी बुद्धि आयेगी भी या नहीं। गई थी चुड़ेल, जाने देतो। एक बोझ सिर से टला। एक महर रख लो काम चल जायगा। जब वर न थी, तो घर क्या भूखों मरता था। विधवाओं के पुनर्विवाह चारों ओर तो हो रहे हैं, यह कोई अनहोनी बात नहीं है। हमारे बस की बात होतो तो इन विधवा- विवाह के पक्षपातियों के देश से निकाल देते, शाप देकर जला देते; लेकिन यह हमारे बस की बात नहीं। फिर तुमसे इतना भो न हो सका कि मुझसे तो पूछ लेती। मैं जो उचित समझता, करता। क्या तुमने समझा था मैं दफ्तर से लौटकर भाऊँगा ही नहीं, वहीं मेरो अत्येष्टि हो जायगी। बस लड़के पर टूट पड़ी। अब रोओ, खुम दिल खोलकर।

संध्या हो गई थी। वंशीधर स्त्री को फटकारें सुनाकर द्वार पर उद्वेग की दशा में टहल रहे थे। रह-रहकर मानी पर क्रोध आता था। इसी राक्षसी के कारण मेरे घर का सर्वनाश हुआ। न जाने किस बुरो साइत में आई कि घर को मिटाकर छोड़ा ? वह न आई होती, तो आज क्यों यह बुरे दिन देखने पढ़ते ! कितना होनहार कितना प्रतिभाशाली लड़का था। न जाने कहाँ गया।

एकाएक एक बुढ़िया उनके समीप आई और बोली --- बाबू साहब, यह खत लाई हूँ ले लीजिए।

वंशीधर ने लपककर वुढ़िया के हाथ से पत्र ले लिया। उनकी छाती आशा से
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धक्-धक् करने लगो। गोकुल ने शायद यह पत्र लिखा होगा। अँधेरे में कुछ न सूझा। पूछा --- कहां से लाई है ?

बुढ़िया ने कहा --- वही जो बाबू हुसेनगंज में रहते हैं, जो बम्बई में नौकर हैं, उन्हीं को बहू ने भेजा है।

वंशीधर ने कमरे में जाकर लैंप जलाया और पत्र पढ़ने लगे। मानी का खत था। लिखा था ---

'पूज्य चाचाजो, अभागिनी मानो का प्रणाम स्वीकार कीजिए।

मुझे यह सुनकर अत्यन्त दुःख हुआ कि गोकुल भया कहाँ चले गये और अब तक उनका पता नहीं है। मैं हो इसका कारण हूँ। यह कलक मेरे हो मुख पर लाना था वह भी लग गया। मेरे कारण मापको इतना शोक हुआ इसका मुझे बहुत दु.ख है। मगर भैया आवेगे अवश्य, इसका मुझे विश्वास है। मैं इसो नौ बजे वाला गालो से पाई जा रही हूँ। मुझसे जो कुछ अपराध हुए हैं, उन्हें क्षमा कोजिएगा गौर चाचीजो से मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि गोकुल भैया सकुश घर लोट आवे। ईश्वर की इच्छा हुई तो भैया के विवाह में आपके चरणों के दर्शन करू गो।'

वंशीधर ने पत्र को फाड़कर पुर्जे पुर्ने कर डाला। घमा में देखा तो आठ बज रहे थे। तुरन्त कपड़े पहने, सड़क पर आकर एका किया और स्टेशन चले।

( 6 )

बंबईमेल प्लेटफार्म पर खड़ा था। मुसाफिरों में भगदड़ मची हुई थी। खोंचे- वालों को चोख-पुकार से कान में पड़ी आवाज न सुनाई देतो धी। गाड़ी छूटन में योड़ी ही देर थी। मानी और उसकी सास एक जनाने कमरे में घेठो हुई थी। माना सजल नेत्रों से सामने ताक रही थी। अतीत' चाहे दुःखद हो क्यों न हो, उनको स्मृतियाँ मधुर होती हैं। मानो आज उन बुरे दिनों को स्मरण करके सुखो हो रहो थो। गोकुल से अब न जाने कब भेंट होगी। चाचाजी आ जाते तो उनके दर्शन कर लेती। कभी-कभी विगढ़ते थे तो क्या उसके भले ही के लिए तो डाटते थे। वह भावेंगे नहीं। अब तो गाझे छूटने में थोड़ो हो देर है। कैसे आवे, समाज में हलचल न मच जायगी। भगवान् की इच्छा होगो, तो अब की जब यहाँ आऊँगी तो जरूर उनके दर्शन करूंगी।

एकाएक उसने लाला वंशीधर को आते देखा। वह गाड़ो से निचलकर वाहन
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खड़ी हो गई और चाचाजी की ओर बढ़ी। उनके चरणों पर गिरना चाहती थी कि वह पीछे हट गये और आँखें निकालकर बोले- मुझे मत छू, दूर रह, अभागिनी कहीं की। मुंह में कालिख लगाकर मुझे पत्र लिखती है। तुझे मौत नहीं आती ! तूने मेरे कुल का सर्वनाश कर दिया । आज तक गोकुळ का पता नहीं है। तेरे हो कारण वह घर से निकला और तू अभी तक मेरी छाती पर मूंग दलने को बैठो है। तेरे लिए क्या गंगा में पानी नहीं है ? मैं तुझे ऐसो कुलमा, ऐसी हरजाई समझता, तो पहले दिन तेरा गला घोट देता। अब मुझे अपनी भक्ति दिखलाने चली है ! तुम. जैसो पापिष्ठाओं का मरना हो अच्छा है, पृथ्वी का बोझ कम हो जायगा।

प्लेटफार्म पर सैकड़ों आदमियों को भोड़ लग गई थी, और वंशीधर निर्लज भाव से गालियों की बौछार कर रहे थे। किसो की समझ में न आता था, क्या माजरा है। पर मन में सब लाला को धिक्कार रहे थे।

मानी पाषाण-मूर्ति के समान खड़ी थी, मानो वहीं जम गई हो। उसका सारा अभिमान चूर-चूर हो गया। ऐसा जी चाहता था, धरती फट जाय और मैं समा जाऊँ, कोई वज्र गिरकर उसके जीवन-अधम जोवन-का अन्त कर दे। इतने आदमियों के सामने उसका पानो उतर गया ! उसकी आँखों से आंसू की एक बूंद भी न निकली। हृक्ष्य में आँसू न थे। उसकी जगह एक दावानल सा दहक रहा था जो मानों वेग से मस्तिष्क को ओर बढ़ता चला जाता था। ससार में कौन जीवन इतना अधम होगा !

'सास ने पुकारा --- बहू, अन्दर आ जाओ।

गाड़ी चली तो माता ने कहा --- ऐसा बेशर्म आदमी नहीं देखा। मुझे तो ऐसा क्रोध आ रहा था कि उसका मुँह नोंच लूँ।

मानी ने सिर ऊपर न उठाया।

माता फिर बोली --- न जाने इन सडियलों को कब बुद्धि आयेगो, अब तो मरने के दिन भी आ गये। पूछो, तेरा लड़का भाग गया तो क्या करे ; अगर ऐसे पापो न होते तो यह वज्र हो क्यों गिरता।

मानी ने फिर भी मुंह न खोला। शायद उसे कुछ सुनाई हो न देता था। [ २१० ]
शायद उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान भी न था। वह टकरको लगाये खिड़की की ओर ताक रही थी। उस अन्धकार में उसे न जाने क्या सूझ रहा था।

कानपुर आया। माता ने पूछा --- बेटी, कुछ खाओगी थोड़ी-सी मिठाई व लो; दस कब के बज गये।

मानी ने कहा --- अभी तो भख नहीं है अम्माँ, फिर खा लूंगी।

माता सोई। मानी भी लेटी पर चाचा की वह सूरत आंखों के सामने खड़ी थी और उनकी बाते कानों में गूंज रही थी --- आह ! मैं इतनी नीच है, ऐसी पतित, कि मेरे भर जाने से पृथ्वी का भार हलका हो जायगा क्या कहा था, तू अपने मां- भाप को बेट है तो फिर मुंह मत दिखाना। न दिखाऊँगी, जिस मुंह पर ऐसी कालिमा लगी हुई है, उसे किसी को दिखाने को इच्छा भी नहीं है।

गाड़ी अन्धकार को चीरती चली जा रहो थी। मानी ने अपना टूङ खोला और अपने आभूषण निकालकर उसमें रख दिये। फिर इन्द्रनाथ का चित्र निकालकर उसे देर तक देखती रही। उसकी आँखों में गर्व की एक झलक-सी दिखाई दो। उसने तसवोर रख दो और भाप हो-आप होली-नहीं-नहीं, मैं तुम्हारे जीवन को कलकित नहीं कर सकती। तुम देवतुत्य हो, तुमने मुझ पर दया की है, मैं अपने पूर्व संस्कारों का प्रायश्चित कर रहो थी तुमने मुझे उठाकर हृदय से लगा लिया, लेकिन मैं तुम्हें कलंकित न करूंगी। तुम्हें मुमसे प्रेम है। तुम मेरे लिए अनादर, अपमान, निंदा सब सह लोगे , पर मैं तुम्हारे जीवन का भार न बनूंगी।

गाड़ी अन्धकार को चीरती चली जा रही थी। मानी आकाश को और इतनी देर तक देखती रही कि सारे तारे अदृश्य हो गये और उस अन्धकार में उसे अपनी माता का स्वरूप दिखाई दिया ऐसा उज्ज्वळ, ऐसा प्रत्यक्ष कि उसने चौंकार भखें बन्द कर लो। फिर कमरे के अन्दर देखा तो माताजी सो रही थी।

( १० )

न जाने कितनी रात गुजार चुकी थी। दरवाजा खुलने की आहट से माताजी का आँखें खुल गई। गाड़ी तेजी से चली जा रही थी, मगर बहू का पता न था। वह आँखें मलकर उठ बैठी और पुकारा --- बहूं ! बहूं ! कोई जवाब न मिला।

उसका हृदय धक-धक करने लगा। ऊपर के बर्थ पर नजर डाली, पेशावखाने में देखा, वैचों के नीचे देखा, बहू कहीं न थी वह द्वार पर आकर खड़ी हो गई। [ २११ ]
शंका हुई, यह द्वार किसने खोला ? कोई गादी में तो नहीं आया ! उसका जी पवमाने ला। उसने विवाह बन्द कर दिया और जोर-जोर से रोने लगी। किससे पूछे ? डाकगाड़ी बन जाने कितनी देर में रुकेगी। कहती थी, बहुमरदानी गाड़ी में बैठ। मेरा कहना न माना। कहने लगी, अम्माँजी, आपको सोने की तकलीफ होगी यही आराम दे गई।

सहसा से खतरे की जंजीर की याद आई। उसने जोर-ज़ोर से कई बार जजोर खींची। कई मिनट के बाद गाड़ी रुकी। गार्ड आया। पड़ोस के कमरे से दो चार आदमी और भी आये। फिर लोगों ने सारा कमरा तलाश किया। नीचे तख्ते को ध्यान से देखा। एक का कोई चिह्न न था। असबाब को जांच की। विस्तर, सदूक, संदकची बर्तन, सब मौजूद थे। ताले भी सबके बन्द थे। कोई चीन गायब न थी। अगर बाहर से कोई आदमी आता तो चलती गाड़ी से जाता कहाँ ? एक स्त्री को लेकर गाड़ी से कूद जाना असम्भव था। सब लोग इन लक्षणों से इसी नतीजे पर पहुंचे कि मानो द्वार खोलकर बाहर झांकने लगी होगी और मुठिया हाथ से छूट जाने के कारण गिर पड़ी होगी। गार्ड भला आदमी था। उसने नीचे उतरकर एक मील तक सनक के दोनों तरफ तलाश किया। मानी का कोई निशान न मिला। रात को इससे ज्यादा और क्या किया जा सकता था। माताजी को कुछ लोग आग्रह पूर्वक एक मरदाने डब्बे में ले' गये। यह निश्चय हुआ कि माताजी भगळे स्टेशन पर उतर पड़े और सबेरे इधर-उधर दूर तक देख-भाल की जाय। विपत्ति में हम पर-मुखापेक्षी हो जाते हैं। माताजी कभी इसका मुंह देखती, कभी उसका। उनकी याचना से भरी हुई आँखें मानो सबसे कह रही थी-कोई मेरी बच्ची को खोज क्यों नहीं लाता ? हाय 1 अभी तो बेचारी की चूदरी भी नहीं मैली हुई। कैसे-कसे साधों और अरमानों से भरी पति के पास जा रही थी ? कोई उस दुष्ट वशीधर से जाकर कहता क्यों नहीं - लो तेरी मनोभिलाषा पूरी हो गई जो तू चाहता था, वह पूरा हो गया क्या अब भी तेरी छाती नहीं जुड़ाती !

वृद्धा मैठी रो रही थी और गाड़ी अन्धकार को चीरती चली जाती थी।

( ११ )

रविवार का दिन था। सन्ध्या समय इद्रनाथ दो-तीन मित्रों के साथ अपने पर की छत पर बैठा हुआ था। आपस में हास-परिहास हो रहा था। मानी का आगमन इस परिहास का विषय था। [ २१२ ]एक मित्र बोले --- क्यों इन्द्र तुमने तो वैवाहिक जीवन का कुछ अनुभव किया है, हमें क्या सलाह देते हो ? बनाय कहाँ घोसना, या योही डालियों पर बैठे-बैठे दिन काटें ? पत्र-पत्रिकाओं को देखकर तो यही मालूम होता है कि वैवाहिक जीवन और नरक में कुछ थोड़ा ही-सा अन्तर है।

इन्द्रनाथ ने मुसकिराकर कहा --- यह तो तकदीर का खेल है भाई, सोलहों आना तकदीर का। अगर एक दशा में वैवाहिक जीवन नरक-तुल्य है तो दूसरी दशा में स्वर्ग से कम नहीं।

दूसरे मित्र बोले --- इतनी आजादी तो भला क्या रहेगो ?

इन्द्रनाथ --- इतनी क्या, इसका शतांश भी न रहेगी। अगर तुम रोङ्ग सिनेमा देखकर बारह बजे घर लौटना चाइते हो, नौ बजे सोकर ठना चाहते हो और दफ्तर से चार बजे लौटकर ताश खेलना चाहते हो, तो तुम्हें विवाह करने से कोई सुख न होगा। और जो हर महाने सूट बनवाते हो, तब शायद साल भर में भी न बनवा सको।

'श्रीमतीजी तो आज रात को गाड़ी से आ रही हैं?

'हाँ, मेल से। मेरे पथ चचकर उन्हें रिसीव करोगे न?'

'यह भी पूछने की बात है। अब पर कौन जाता है। मगर कळ दावत खिलानी पड़ेगी।'

सहसा तार के चपरासी ने आकर इन्द्रनाथ के हाथ में तार का लिफाफा रख दिया।

इन्द्रनाथ का चेहरा खिल उठा झट तार खोलकर पढ़ने लगा। एक बार पढ़ते हो उसका हृदय धक से हो गया, सांस रुक गई, सिर घूमने लगा। आँखों की रोशनी लुप्त हो गई, जैसे विश्व पर काला परदा पड़ गया हो। उसने तार को मित्रों के सामने फेंक दिया और दोनों हाथों से मुंह ढोपकर फूट-फूटकर रोने लगा। दोनों मित्रों ने घबड़ाकर तार उठा लिया और उसे पढते हो इतबुद्धि-से हो दीवार की ओर ताकने लगे। क्या सोच रहे थे और क्या हो गया।

तार में लिखा था मानी गाड़ी से कूद पड़ी। उसको लाश लालपुर से तीन मौल पर पाई गई। मैं लालपुर में हूँ। तुरन्त भाभी।

एक मित्र ने कहा --- किसी शत्रु ने झड़ी खवा न मेज दी हो ?

दुसरे मित्र बोले --- हाँ, कभी-कभी लोग ऐसो शरारते करते हैं। [ २१३ ]इन्द्रनाथ ने शून्य नेत्रों से उनकी ओर देखा ; पर मुँह से कुछ बोले नहीं।

कई मिनट तीनों आदमी निर्वाक, निस्पन्द बैठे रहे। एकाएक इन्द्रनाथ खड़े हो गये और बोले --- मैं इस गाड़ी से जाऊँगा।

बम्बई से नौ बजे रात को गाड़ी छूटती थी। दोनों मित्रों ने चटपट विस्तर आदि बाधकर तैयार कर दिया। एक ने बिस्तर उठाया दूसरे ने ट्रक। इन्द्रनाथ ने चटपट कपड़े पहने और स्टेशन चले। निराशा आगे पो; आशा रोती हुई पीछे।

( १२ )

एक सप्ताह गुजर गया था। लाला बोधर दफ्तर से आकर द्वार पर बैठे ही थे कि इन्द्रनाथ ने आकर प्रणाम किया। वंशीधर उसे देखकर चौंक पड़े, उसके अनपेक्षित आगमन पर नहीं, उसकी विकृत दशा पर , मानो वीत राग शोक सामने खड़ा हो, मानो कोई हृक्ष्य से निकली हुई आह मूर्तिमान हो गई हो ?

वंशीधर ने पूछा --- तुम तो मम्बई चले गये थे न ?

इन्द्रनाथ ने जवाब दिया --- जी हां, आज ही आया हूँ।

वंशीधर ने तीखे स्वर में कहा --- गोकुल को तो तुम ले बीते !

इंद्रनाथ ने अपने अंगूठे को और ताकते हुए कहा-वह मेरे घर पर हैं।

वंशीधर के उदास मुख पर हर्ष का प्रकाश दौड़ गया। बोले--तो यहाँ क्यों नहीं आये ? तुमसे कहां उसकी भेट हुई? क्या बम्बई चला गया था ?

'जी नहीं, कल मैं गाड़ी से उतरा तो स्टेशन पर मिल गये।'

'तो जाकर लिवा लाओ न, जो किया अच्छा किया।'

यह कहते हुए वह घर में दौड़े। एक क्षण में गोकुल की माता ने उसे अन्दर पुलाया।

वह अन्दर गया तो माता ने उसे सिर से पांव तक देखा-तुम बीमार थे क्या भैया ! नेहरा क्यों इतना उतरा हुआ है।

इन्द्रनाथ ने कुछ उत्तर न दिया।

गोकुल की माता ने लोटे का पानो रखकर कहा --- हाथ-मुँह धो डालो बेटा, गापुल है तो अच्छी तरह ? कहा रहा इतने दिन ? तब से सैकड़ों मन्नतें मान चाली। आशा या नहीं? . [ २१४ ]इन्द्रनाथ ने हाथ-मुँह धोते हुए कहा --- मैंने तो कहा था चलो लेकिन डर के मारे नहीं आते।

'और था कहाँ इतना दिन ?'

'कहते थे, देहातों में घूमता रहा।'

'तो क्या तुम अकेले बंबई से आये हो ?

'जो नहो, अम्माँ भी आई है।'

गोकुल की माता ने कुछ सकुचकर पूछा --- मानी तो अच्छी तरह है?

इन्द्रनाथ ने हँसकर कहा --- जी हाँ, अब वह बड़े सुख से हैं। संसार के घधर्ना से छूट गई।

माता ने अविश्वास करके कहा-चल नटखट कहाँ का। बेचारी को कोस रहा है। मगर इतनी जल्द बम्बई से लौट क्यों आये।

इ द्रनाथ ने मुसकिराते हुए कहा --- क्या करता। माताजो का तार बबई में मिला फि मानी ने गाड़ी से कूदकर प्राण दे दिये। वह लालपुर में पड़ी हुई थी, दौड़ा हुआ आया। वही दाह क्रिया की। आज घर चला आया। अब मेरा अपराध क्षमा कीजिए।

वइ और कुछ न कह सका। आँसुओं के वेग ने गला बन्द कर दिया। जेब से एक पत्र निकालकर माता के सामने रखता हुआ बोला --- उनके सदूक में महो पत्र मिला है।

गोकुल की माता कई मिनट तक मर्माहत सी बैठी ज़मीन की ओर ताकतो रही। शोक और उससे अधिक पश्चात्ताप ने सिर को दबा रखा था। फिर पन्त्र उठाकर पढ़ने लगी ---

'स्वामी !'

जब यह पत्र आपके हार्थों में पहुंचेगा तब तक मैं इस ससार से विदा हो जाऊँगी। मैं वही अभागिनी हूँ। मेरे लिए इस ससार में स्थान नहीं है। आपको भी मेरे कारण क्लेश और निन्दा ही मिलेगी। मैंने सोचकर देखा और यही निश्चय किया कि मेरे लिए मरना हो अच्छा है। मुझपर आपने जो दया की थी, उसके लिए आपको क्या प्रतिदान करूँ ? जीवन में मैंने कभी किसी वस्तु की इच्छा नहीं की ; परन्तु मुझे दुःख है कि आपके चरणों पर सिर रखकर न मर सकी। मेरी अतिम याचना है कि मेरे लिए आप शोक न कीजिएगा। ईश्वर आपको सदा सुखो रखे ।'

माताजी ने पत्र रख दिया और आंखों से आंसू बहने लगे। बरामदे में वंशीधर निस्सद खड़े थे और मानी लग्नानत उनके सामने खड़ी थी।