गोदान/भाग 23

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गोदान  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

[ २२४ ]
अब तो तुम कभी ऐसी शरारत न करोगे?

'कभी नहीं, जीते जी कभी नहीं।'

'कान पकड़ो।'

'कान पकड़ता हूं, मगर अब तुम दया करके जाओ और मुझे एकांत में बैठकर सोचने और रोने दो। तुमने आज मेरे जीवन का सारा आनंद...।'

मालती और जोर से हंसी-देखो, तुम मेरा बहुत अपमान कर रहे हो और तुम जानते हो, रूप अपमान नहीं सह सकता। मैंने तो तुम्हारे साथ भलाई की और तुम उसे बुराई समझ रहे हो।

खन्ना विद्रोह-भरी आंखों से देखकर बोले-तुमने मेरे साथ भलाई की है या उलटी छुरी से मेरा गला रेता है?

'क्यों, मैं तुम्हें लूट लूटकर अपना घर भर रही थी। तुम उस लूट से बच गए।'

'क्यों घाव पर नमक छिड़क रही हो मालती। मैं भी आदमी हूं।'

मालती ने इस तरह खन्ना की ओर देखा, मानो निश्चय करना चाहती थी कि वह आदमी है या नहीं?

'अभी तो मुझे इसका कोई लक्षण नहीं दिखाई देता।'

'तुम बिल्कुल पहेली हो, आज यह साबित हो गया।'

'हां, तुम्हारे लिए पहेली हूं और पहेली रहूंगी।'

यह कहती हुई वह पक्षी की भांति फुर से उड़ गई और खन्ना सिर पर हाथ रखकर सोचने लगे, यह लीला है या इसका सच्चा रूप।

तेईस


गोबर और झुनिया के जाने के बाद घर सुनसान रहने लगा। धनिया को बार-बार चुन्नू की याद आती रहती है। बच्चे की मां तो झुनिया थी, पर उसका पालन धनिया ही करती थी। वही उसे उबटन मलती, काजल लगाती, सुलाती और जब काम-काज से अवकाश मिलता, उसे प्यार करती। वात्सल्य का यह नशा ही उसकी विपत्ति को भुलाता रहता था। उसका भोला भाला मक्खन-सा मुंह देखकर वह अपनी सारी चिंता भूल जाती और स्नेहमय गर्व से उसका हृदय फूल उठता। वह जीवन का आधार अब न था। उसका सूना खटोला देकर वह रो उठती। वह कवच, जो सारी चिंताओं और दुराशाओं से उसकी रक्षा करता था, उससे छिन गया था। वह बार-बार सोचती, उसने झुनिया के साथ ऐसी कौन-सी बुराई की थी, जिसका उसने यह दंड दिया। डाइन ने आकर उसका सोने-सा घर मिट्टी में मिला दिया। गोबर ने तो कभी उसकी बात का जवाब भी न दिया था। इसी राँड़ ने उसे फोड़ा और वहां ले जाकर न जाने कौन-कौन-सा नाच नचाएगी। यहां ही वह बच्चे की कौन बहुत परवाह करती थी। उसे तो अपनी मिस्सी-काजल, मांग-चोटी ही से छुट्टी नहीं मिलती। बच्चे की देखभाल क्या करेगी? बेचारा अकेला जमीन पर पड़ा रोता होगा। बेचारा एक दिन भी तो सुख से नहीं रहने पाता। कभी खांसी, कभी दस्त, [ २२५ ]
कभी कुछ, कभी कुछ यह सोच-सोचकर उसे झुनिया पर क्रोध आता। गोबर के लिए अब भी उसके मन में वही ममता थी। इसी चुडै़ल ने उसे कुछ खिला-पिलाकर अपने बस में कर लिया। ऐसी मायाबिनी न होती, तो यह टोना ही कैसे करती? कोई बात न पूछता था। भौजाइयों की लातें खाती थी। यह भुग्गा मिल गया तो आज रानी हो गई।

होरी ने चिढ़कर कहा-जब देखो तब झुनिया ही को दोस देती है। यह नहीं समझती कि अपना सोना खोटा तो सोनार का क्या दोष? गोबर उसे न ले जाता तो क्या आप-से-आप चली जाती? सहर का दाना-पानी लगने से लौंडे की आंखें बदल गईं, ऐसा क्यों नहीं समझ लेती।

धनिया गरज उठी-अच्छा, चुप रहो। तुम्हीं ने राँड को मूड़ पर चढ़ा रखा था, नहीं मैंने पहले ही दिन झाडू मारकर निकाल दिया होता।

खलिहान में डाठें जमा हो गई थीं। होरी बैलों को जुखरकर अनाज मांड़ने जा रहा था। पीछे मुंह फेरकर बोला-मान ले, बहू ने गोबर को फोड़ ही लिया, तो तू इतना कुढ़ती क्यों है? जो सारा जमाना करता है, वही गोबर ने भी किया। अब उसके बाल-बच्चे हुए। मेरे बाल-बच्चों के लिए क्यों अपनी सांसत कराए, क्यों हमारे सिर का बोझ अपने सिर रखे।

'तुम्हीं उपद्रव की जड़ हो।'

'तो मुझे भी निकाल दे। ले जा बैलों को अनाज मांड। मैं हुक्का पीता हूं।'

'तुम चलकर चक्की पीसो, मैं अनाज मांडूंगी।'

विनोद में दु:ख उड़ गया। वही उसकी दवा है। धनिया प्रसन्न होकर रूपा के बाल गूंधने बैठ गई, जो बिल्कुल उलझकर रह गए थे और होरी खलिहान चला। रसिक बसंत सुगंध और प्रमोद और जीवन की विभूति लुटा रहा था, दोनों हाथों दिल खोलकर कोयल आम की डालियों में छिपी अपनी रसीली, मधुर, आत्मस्पर्शी कूक से आशाओं को जगाती फिरती थी। महुए की डालियों पर मैनों की बारात-सी लगी बैठी थी। नीम और सिरस और करौंदे अपनी महक में नशा-सा घोल देते थे। होरी आमों के बाग में पहुंचा तो वृक्षों के नीचे तारे से खिले थे। उसका व्यथित, निराश मन भी इस व्यापक शोभा और स्फूर्ति में जैसे डूब गया। तरंग में आकर गाने लगा-

'हिया जरत रहत दिन-रैन।

आम की डरिया कोयल बोले,

तनिक न आवत चैन।'

सामने से दुलारी सहुआइन गुलाबी साड़ी पहने चली आ रही थी। पांव में मोटे चांदी के कड़े थे, गले में मोटे सोने की हंसली, चेहरा सूखा हुआ, पर दिल हरा। एक समय था, जब होरी खेत-खलिहान में उसे छेड़ा करता था। वह भाभी थी, होरी देवर था, इस नाते दोनों में विनोद होता रहता था। जब से साहजी मर गए, दुलारी ने घर से निकलना छोड़ दिया। सारे दिन दूकान पर बैठी रहती थी और वहीं से सारे गांव की खबर लगाती रहती थी। कहीं आपस में झगड़ा हो जाय सहुआइन वहां बीच बचाव करने के लिए अवश्य पहुंचेगी। आने रुपये सूद से कम पर रुपये उधार न देती थी। और यद्यपि सूद के लोभ में मूल भी हाथ न आता था-जो रुपये लेता, खाकर बैठ रहता-मगर उसके ब्याज का दर ज्यों-का-त्यों बना रहता था। बेचारी कैसे वसूल करे? नालिश-फरियाद करने से रही, थाना-पुलिस करने से रही, केवल जीभ का बल था, पर ज्यों-ज्यों उम्र के साथ जीभ की तेजी बढ़ती जाती थी, उसकी काट घटती जाती थी। [ २२६ ]
अब उसकी गालियों पर लोग हंस देते थे और मजाक में कहते-क्या करेगी रुपये लेकर काकी, साथ तो एक कौड़ी भी न ले जा सकेगी। गरीब को खिला-पिलाकर जितनी असीस मिल सके, ले-ले। यही परलोक में काम आएगा। और दुलारी परलोक के नाम से जलती थी।

होरी ने छेड़ा-आज तो भाभी, तुम सचमुच जवान लगती हो।

सहुआइन मगन होकर बोली-आज मंगल का दिन है, नजर न लगा देना। इसी मारे मैं कुछ पहनती-ओढ़ती नहीं। घर से निकलो तो सभी घूरने लगते हैं, जैसे कभी कोई मेहरिया देखी ही न हो। पटेश्वरी लाला की पुरानी बान अभी तक नहीं छूटी।

होरी ठिठक गया, बड़ा मनोरंजक प्रसंग छिड़ गया था। बैल आगे निकल गए।

'वह तो आजकल बड़े भगत हो गए हैं। देखती नहीं हो, हर पूरनमासी को सत्यनारायन की कथा सुनते हैं और दोनों जून मंदिर में दर्सन करने जाते हैं।'

'ऐसे लंपट जितने होते हैं, सभी बूढ़े होकर भगत बन जाते हैं। कुकर्म का परासचित तो करना ही पड़ता है। पूछो, मैं अब बुढिया हुई, मुझसे क्या हंसी।'

'तुम अभी बुढ़िया कैसे हो गई भाभी? मुझे तो अब भी...'

'अच्छा, चुप ही रहना, नहीं डेढ़ सों गाली दूंगी। लड़का परदेस कमाने लगा, एक दिन नेवता भी न खिलाया, सेंत-मेत में भाभी बनाने को तैयार।'

'मुझसे कसम ले लो भाभी, जो मैंने उसकी कमाई का एक पैसा भी छुआ हो। न जाने क्या लाया, कहां खरच किया, मुझे कुछ भी पता नहीं। बस, एक जोड़ा धोती और एक पगड़ी मेरे हाथ लगी।'

'अच्छा कमाने तो लगा, आज नहीं कल घर संभालेगा ही। भगवान् उसे सुखी रखे। हमारे रुपये भी थोड़ा-थोड़ा देते चलो। सूद ही ता बढ़ रहा है।'

'तुम्हारी एक-एक पाई दूंगा भाभी, हाथ में पैसे आने दो। और खा ही जाएंगे, तो कोई बाहर के तो नहीं हैं, हैं तो तुम्हारे ही।'

सहुआइन ऐसी विनोद-भरी चापलूसियों से निरस्त्र हो जाती थी। मुस्कराती हुई अपनी राह चली गई। होरी लपककर बैलों के पास पहुंच गया और उन्हें पोर में डालकर चक्कर देने लगा। सारे गांव का यही एक खलिहान था। कहीं मंड़ाई हो रही थी, कोई अनाज ओसा रहा था, कोई गल्ला तौल रहा था। नाई-भारी, बढ़ी, लोहार, पुरोहित, भाट, भिखारी, सभी अपने अपने जेवर लेने के लिए जमा हो गए थे। एक पेड़ के नीचे झिंगुरीसिंह खाट पर बैठे अपनी सवाई उगाह रहे थे। कई बनिये ख़डे गल्ले का भाव-ताव कर रहे थे। सारे खलिहान में मंडी की सी रौनक थी। एक खटकिन बेर और मकोय बेच रही थी और एक खोंचे वाला तेल के सेब और जलेबियां लिए फिर रहा था। पंडित दातादीन भी होरी से अनाज बंटवाने के लिए आ पहुंचे थे और झिंगुरीसिंह के साथ खाट पर बैठे थे।

दातादीन ने सुरती मलते हुए कहा-कुछ सुना, सरकार भी महाजनों से कह रही है कि सूद का दर घटा दो, नहीं डिगरी न मिलेगी।

झिंगुरी तमाखू फांककर बोले-पंडित, मैं तो एक बात जानता हूं। तुम्हें गरज पड़ेगी तो सौ बार हमसे रुपये उधार लेने आओगे, और हम जो ब्याज चाहेंगे, लेंगे। सरकार अगर असामिया को रुपये उधार देने का कोई बंदोबस्त न करेगी, तो हमें इस कानून से कुछ न होगा। हम दर कम लिखाएंगे, लेकिन एक सौ में पचीस पहले ही काट लेंगे६इसमें सरकार क्या कर सकती [ २२७ ]
है?

'यह तो ठीक है, लेकिन सरकार भी इन बातों को खूब समझती है। इसकी भी कोई रोक निकालेगी, देख लेना।'

'इसकी कोई रोक हो ही नहीं सकती।'

'अच्छा, अगर वह सर्त कर दे, जब तक स्टांप पर गांव के मुखिया या कारिंदा के दसखत न होंगे, वह पक्का न होगा, तब क्या करोगे?॑'

'असामी को सौ बार गरज होगी, मुखिया को हाथ-पांव जोड़ के लाएगा और दसखत कराएगा। हम तो एक-चौथाई काट ही लेंगे।'

'और जो फंस जाओ। जाली हिसाब लिखा और गए चौदह साल को।'

झिंगुरीसिंह जोर से हंसा-तुम क्या कहते हो पंडित, क्या तब संसार बदल जाएगा? कानून और न्याय उसका है, जिसके पास पैसा है। कानून तो है कि महाजन किसी असामी के साथ कड़ाई न करे, कोई जमींदार किसी कास्तकार के साथ सख्ती न करे, मगर होता क्या है। रोज ही देखते हो। जमींदार मुसक बंधवा के पिटवाता है और महाजन लात और जूते से बात करता है। जो किसान पोढ़ा है, उससे न जमींदार बोलता है, न महाजन। ऐसे आदमियों से हम मिल जाते हैं और उनकी मदद से दूसरे आदमियों की गर्दन दबाते हैं। तुम्हारे ही ऊपर रायसाहब के पांच सौ रुपये निकलते हैं, लेकिन नोखेराम में है इतनी हिम्मत कि तुमसे कुछ बोले? वह जानते हैं तुमसे मेल करने ही में उनका हित है। किस असामी में इतना बूता है कि रोज अदालत दौड़े? सारा कारोबार इसी तरह चला जायगा, जैसे चल रहा है। कचहरी अदालत उसी के साथ है, जिसके पास पैसा है। हम लोगों को घबड़ाने की कोई बात नहीं।

यह कहकर उन्होंने खलिहान का एक चक्कर लगाया और फिर आकर खाट पर बैठते हुए बोले-हां, मतई के ब्याह का क्या हुआ? हमारी सलाह तो है कि उसका ब्याह कर डालो। अब तो बड़ी बदनामी हो रही है।

दातादीन को जैसे ततैया ने काट खाया। इस आलोचना का क्या आशय था, वह खूब समझते थे। गर्म होकर बोले- पीठ पीछे आदमी जो चाहे बके, हमारे मुंह पर कोई कुछ कहे, तो उसकी मूंछें उखाड़ लूं। कोई हमारी तरह नेमी बन तो ले। कितनों को जानता हूं, जो कभी संध्या-बंदन नहीं करते, न उन्हें धरम से मतलब न करम से, न कथा से मतलब न पुरान से। वह भी अपने को ब्राह्मण कहते हैं। हमारे ऊपर क्या हंसेगा कोई, जिसने अपने जीवन में एक एकादसी भी नागा नहीं की, कभी बिना स्नान-पूजन किए मुंह में पानी नहीं डाला। नेम का निभाना कठिन है। कोई बता दे कि हमने कभी बाजार की कोई चीज खाई हो, या किसी दूसरे के हाथ का पानी पिया हो, तो उसकी टांग की राह निकल जाऊं। सिलिया हमारी चौखट नहीं लांघने पाती, चौखट, बरतन-भांड़े छूना तो दूसरी बात है। मैं यह नहीं कहता कि मतई यह बहुत अच्छा काम कर रहा है, लेकिन जब एक बार बात हो गई तो यह पाजी का काम है कि औरत को छोड़ दे। मैं तो खुल्लमखुल्ला कहता हूं, इसमें छिपाने का कोई बात नहीं। स्त्री-जाति पवित्र है।

दातादीन अपनी जवानी में स्वयं बड़े रसिया रह चुके थे, लेकिन अपने नेम-धर्म से कभी नहीं चूके। मातादीन भी सुयोग्य पुत्र की भांति उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रहा था। धर्म का मूल तत्त्व है पूजा-पाठ, कथा-व्रत और चौका-चूल्हा। जब पिता-पुत्र दोनों ही मूल तत्त्व को [ २२८ ]
पकड़े हुए , तो किसकी मजाल है कि उन्हें पथ-भ्रष्ट कह सके?

झिंगुरीसिंह ने कायल होकर कहा-मैंने तो भाई, जो सुना था, वह तुमसे कह दिया।

दातादीन ने महाभारत और पुराणों से ब्राह्मणों द्वारा अन्य जातियों की कन्याओं के ग्रहण किए जाने की एक लंबी सूची पेश की और यह सिद्ध कर दिया कि उनसे जो संतान हुई, वह ब्राह्मण कहलाई और आजकल के जो ब्राह्मण हैं, वह उन्हीं संतानों की संतान हैं। यह प्रथा आदिकाल से चली आई है और इसमें कोई लज्जा की बात नहीं।

झिंगुरीसिंह उनके पांडित्य पर मुग्ध होकर बोले-तब क्यों आजकल लोग वाजपेयी और सुकुल बने फिरते हैं?

'समय-समय की परथा है और क्या। किसी में उतना तेज तो हो। बिस खाकर उसे पचाना तो चाहिए। वह सतयुग की बात थी, सतयुग के साथ गई। अब तो अपना निबाह बिरादरी के साथ मिलकर रहने में है, मगर करूं क्या, कोई लड़की वाला आता ही नहीं। तुमसे भी कहा औरों से भी कहा, कोई नहीं सुनता तो मैं क्या लड़की बनाऊं?'

झिंगुरीसिंह ने डांटा-झूठ मत बोलो पंडित, दो आदमियों को फांस-फूंसकर लाया मगर तुम मुंह फैलाने लगे, तो दोनों कान खड़े करके निकल भागे। आखिर किस बिरते पर हजार पांच सौ मांगते हो तुम? दस बीघे खेत और भीख के सिवा तुम्हारे पास और है क्या?

दातादीन के अभिमान को चोट लगी। दाढ़ी पर हाथ फेरकर बोले-पास कुछ न सही मैं भीख ही मांगता हूं, लेकिन मैंने अपनी लड़कियों के ब्याह में पांच-पांच सौ दिए हैं फिर लड़के के लिए पांच सौ क्यों न मांगू? किसी ने सेंत-मेंत में मेरी लड़की ब्याह ली होती तो मैं भी सेंत में लड़का ब्याह लेता। रही हैसियत की बात। तुम जजमानी को भीख समझो मैं तो उसे जमींदारी समझता हूं, बंकघर। जमींदार मिट जाय, बंकबर टूट जाय, लेकिन जजमानी अंत तक बनी रहेगी। जब तक हिन्दू-जाति रहेगी तब तक बांमन भी रहेंगे और जजमानी भी रहेगी। सहालग में मजे से घर बैठे सौ-दो-सौ फटकार लेते हैं। कभी भाग लढ़ गया, तो चार पांच सौ मार लिया। कपड़े, बरतन, भोजन अलग। कहीं-न-कहीं नित ही कार पराजन पड़ा ही रहता है। कुछ मिले तब भी एक-दो थाल और दो-चार आने दक्षिणा के मिल ही जाते हैं। ऐसा चैन न जमींदारी में है, न साहूकारों में। और फिर मेरा तो सिलिया से जितना उबार हाल है, उतना ब्राह्मण की कन्या से क्या होगा? वह तो बहुरिया बनी बैठी रहेगी। बहुत होगा रोटियां पका देगी। यहां सिलिया अकेली तीन आदमियों का काम करती है। और मैं उस रोटी के सिवा और क्या देता हूं? बहुत हुआ, तो साल में एक धोती दे दी।

दूसरे पेड़ के नीच दातादीन का निजी पैरा था। चार बैलों से मंड़ाई हो रही थी। धन्ना चमार बैलों को हांक रहा था, सिलिया पैरे से अनाज निकाल निकालकर औसा रही थी और मातादीन दूसरी ओर बैठा अपनी लाठी में तेल मल रहा था।

सिलि.ा सांवली सलोनी, छरहरी बालिका थी, जो रूपवती न होकर भो आकर्षक थी। उसके हास में, चितवन में, अंगों के विलास में हर्ष का उन्माद था , जिससे उसकी बोटी बोटी नाचती रहती थी, सिर से पांव तक भूसे के अणुओं में सनी, पसीने से तर, सिर के बाल आधे खुले, वह दौड़-दौड़कर अनाज ओसा रही थी, मानो तन-मन से कोई खेल खेल रही हो।

मातादीन ने कहा-आज सांझ तक अनाज बाकी न रहे सिलिया। तू थक गई हो तो मैं आऊं? [ २२९ ]

सिलिया प्रसन्न मुख बोली-तुम काहे को आओगे पंडित। मैं संझा तक सब ओसा दूंगी।

'अच्छा, तो मैं अनाज ढो-ढोकर रख आऊं। तू अकेली क्या-क्या कर लेगी?'

'तुम घबड़ाते क्यों हो, मैं ओसा दूंगी, ढोकर रख भी आऊंगी। पहर रात तक यहां दाना भी न रहेगा।'

दुलारी सहुआइन आज अपना लेहना वसूल करती फिरती थी। सिलिया उसकी दूकान से होली के दिन दो पैसे का गुलाबी रंग लाई थी। अभी तक पैसे न दिए थे। सिलया के पास आकर बोली-क्यों री सिलिया, महीना भर रंग लाए हो गया, अभी तक पैसे नहीं दिए? मांगती हूं तो मटककर चली जाती है। आज मैं बिना पैसे लिए न जाऊंगी।

मातादीन चुपके-से सरक गया था। सिलिया का तन और मन दोनों लेकर भी बदले में कुछ न देना चाहता था। सिलिया अब उसकी निगाह में केवल काम करने की मशीन थी, और कुछ नहीं। उसकी ममता को वह बड़े कौशल से नचाता रहता था। सिलिया ने आंख उठाकर देखा तो मातादीन वहां न था। बोली-चिल्लाओ मत सहुआइन, यह ले लो दो की जगह चार पैसे का अनाज। अब क्या जान लेगी? मैं मरी थोड़े ही जाती थी।

उसने अंदाज से कोई सेर-भर अनाज ढेर में से निकालकर सहुआइन के फैले हए अंचल में डाल दिया। उसी वक्त मातादीन पेड़ की आड़ से झल्लाया हुआ निकला और सहुआइन का अंचल पकड़कर बोला-अनाज सीधे से रख दो सहुआइन, लूट नहीं है।

फिर उसने लाल आंखों से सिलिया को देखकर डांटा-तूने अनाज क्यों दे दिया? किससे पूछकर दिया? तू कौन होती है मेरा अनाज देने वाली?

सहुआइन ने अनाज ढेर में डाल दिया और सिलिया हक्का-बक्का होकर मातादीन का मुंह देखने लगी। ऐसा जान पड़ा, जिस डाल पर वह निश्चित बैठी हुई थी, वह टूट गई और अब वह निराधार नीचे गिरे जा रही है। खिसियाए हुए मुंह से, आंखों में आंसू भरकर सहुआइन से बोली-तुम्हारे पैसे मैं फिर दे दूंगी सहुआइन। आज मुझ पर दया करो।

सहुआइन ने उसे दयार्द्र नेत्रों से देखा और मातादीन को धिक्कार-भरी-आंखों से देखती हुई चली गई।

तब सिलिया ने अनाज ओसाते हुए आहत स्वर से पूछा-तुम्हारी चीज में मेरा कुछ अख़्तियार नहीं है?

मातादीन आंखें निकालकर बोला-नहीं, तुझे कोई अख्तियार नहीं है। काम करती है, खाती है। जो चाहे कि खा भी लुटा भी, तो यह यहां न होगा। अगर तुझे यहां न परत पड़ता हो तो कहीं और जाकर काम कर । मजूरों की कमी नहीं है। सेंत में काम नहीं लेते, खाना-कपड़ा देते हैं।

सिलिया ने उस पक्षी की भांति, जिसे मालिक ने पर काटकर पिंजरे से निकाल दिया हो, मातादीन की ओर देखा। उस चितवन में वेदना अधिक थी या भर्त्सना, यह कहना कठिन है। पर उसी पक्षो की भांति उसका मन फड़फड़ा रहा था और ऊंची डाल पर उन्मुक्त वायुमंडल में उड़ने की शक्ति न पाकर उसी पिंजरे में जा बैठना चाहता था, चाहे उसे बेदाना, बेपानी, पिंजरे की तीलियों से सिर टकराकर मर ही क्यों न जाना पड़े। सिलिया सोच रही थी, अब उसके लिए दूसरा कौन-सा ठौर है। वह ब्याहता न होकर भी संस्कार में और व्यवहार में और मनोभावना में ब्याहता थी, और अब मातादीन चाहे उसे मारे या काटे, उसे दूसरा आश्रय नहीं है, दूसरा [ २३० ]
अवलंब नहीं है। उसे वह दिन याद आए-और अभी दो साल भी तो नहीं हुए-जब यहां मातादीन उसके तलवे सहलाता था, जब उसने जनेऊ हाथ में लेकर कहा था—सिलिया, जब तक दम में दम है, तुझे ब्याहता की तरह रखूंगा, प्रेमातुर होकर हार में और बाग में और नदी के तट, पर उसके पीछे-पीछे पागलों की भांति फिरा करता था। और आज उसका यह निष्ठुर व्यवहार। मुट्ठी-भर अनाज के लिए उसका पानी उतार लिया।

उसने कोई जवाब न दिया॥ कंठ में नमक के एक डले का-सा अनुभव करती हुई आहत हृदय और शिथिल हाथों से फिर काम करने लगी।

उसी वक्त उसकी मां, बाप, दोनों भाई और कई अन्य चमारों ने न जाने किधर से आकर मातादीन को घेर लिया। सिलिया की मां ने आते ही उसके हाथ से अनाज की टोकरी छीनकर फेंक दी और गाली देकर बोली-रांड, जब तुझे मजूरी ही करनी थी, तो घर की मजूरी छोड़कर यहां क्या करने आई॥ जब बांभन के साथ रहती है, तो बांभन की तरह रह। सारी बिरादरी की नाक कटवाकर भी चमारिन ही बनना था, तो यहां क्या घी का लोंदा लेने आई थी। चुल्लू-भर पानी में डूब नहीं मरती।

झिंगुरीसिंह और दातादीन दोनों दौड़े और चमारों के बदले तेवर देखकर उन्हें शांत करने की चेष्टा करने लगे॥ झिंगुरीसिंह ने सिलिया के बाप से पूछा-क्या बात है चौधरी, किस बात का झगड़ा है?

सिलिया का बाप हरखू साठ साल का बूढ़ा था, काला, दुबला, सूखी मिर्च की तरह पिचका हुआ, पर उतना ही तीक्ष्ण॥ बोला-झगड़ा कुछ नहीं है ठाकुर, हम आज या तो मातादीन को चमार बनाके छोड़ेंगे, या उनका और अपना रकत एक कर देंगे। सिलिया कन्या जात है किसी-न-किसी के घर तो जायगी ही। इस पर हमें कुछ नहीं कहना है, मगर उसे जो कोई रखे, हमारा होकर रहे। तुम हमें बांभन नहीं बना सकते, मुदा हम तुम्हें चमार बना सकते हैं। हमें बांभन बना दो, हमारी सारी बिरादरी बनने को तैयार है। जब यह समरथ नहीं हैं, तो फिर तुम भी चमार बनो। हमारे साथ खाओ, पिओ, हमारे साथ उठो-बैठो। हमारी इज्जत लेते हो तो अपना धरम हमें दो।

दातादीन ने लाठी फटकारकर कहा-मुंह संभालकर बातें कर हरखुआ॥ तेरी बिटिया वह खड़ी है, ले जा जहां चाहे। हमने उसे बांध नहीं रक्खा है। काम करती थी, मजूरी लेती थी। यहां मजूरों की कमी नहीं है।

सिलिया की मां उंगली चमकाकर बोली-वाह-वाह पंडित। खूब नियाव करते हो? तुम्हारी लड़की किसी चमार के साथ निकल गई होती और तुम इसी तरह की बातें करते, तो देखती। हम चमार हैं, इसलिए हमारी कोई इज्जत ही नहीं। हम सिलिया को अकेले न ले जायंगे उसके साथ मातादीन को भी ले जायंगे, जिसने उसकी इज्जत बिगाड़ी है। तुम बड़े नेमी-धरमी हो। उसके साथ सोओगे, लेकिन उसके हाथ का पानी न पियोगे। वही चुडै़ल है कि यह सब सहती है। मैं तो ऐसे आदमी को माहुर दे देती।

हरखू ने अपने साथियों को ललकारा-सुन ली इन लोगों की बात कि नहीं। अब क्या खड़े मुंह ताकते हो।

इतना सुनना था कि दो चमारों ने लपककर मातादीन के हाथ पकड़ लिए, तीसरे ने झपटकर उसका जनेऊ तोड़ डाला और इसके पहले कि दातादीन और झिंगुरीसिंह अपनी-अपनी [ २३१ ]
लाठी संभाल सकें, दो चमारों ने मातादीन के मुंह में एक बड़ी-सी हड्डी का टुकड़ा डाल दिया। मातादीन ने दांत जकड़ लिए। फिर भी वह घिनौनी वस्तु उसके होंठों में तो लग ही गई। उन्हें मतली हुई और मुंह अपने-आप खुल गया और हड्डी कंठ तक जा पहुंची। इतने में खलिहान के सारे आदमी जमा हो गए, पर आश्चर्य यह कि कोई इन धर्म के लुटेरों से मुजाहिम न हुआ। मातादीन का व्यवहार सभी को नापसंद था। वह गांव की बहू-बेटियों को घूरा करता था, इसलिए मन में सभी उसकी दुर्गति से प्रसन्न थे। हां, ऊपरी मन से लोग चमारों पर रोब जमा रहे थे।

होरी ने कहा-अच्छा, अब बहुत हुआ हरखू। भला चाहते हो, तो यहां से चले जाओ।

हरखू ने निडरता से उत्तर दिया-तुम्हारे घर में लड़कियां हैं होरी महतो, इतना समझ लो। इसी तरह गांव की मरजाद बिगड़ने लगी, तो किसी की आबरू न बचेगी।

एक क्षण में शत्रु पर पूरी विजय पाकर आक्रमणकारियों ने वहां से टल जाना ही उचित समझा। जनमत बदलते देर नहीं लगती। उससे बचे रहना ही अच्छा है।

मातादीन कै कर रहा था। दातादीन ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा-एक-एक को पांच पांच साल के लिए न भेजवाया, तो कहना। पांच-पांच साल तक चक्की पिसवाऊंगा।

हरखू ने हेकड़ी के साथ जवाब दिया-इसका यहां कोई गम नहीं। कौन तुम्हारी तरह बैठे मौज करते हैं? जहां काम करेंगे, वहीं आधा पेट दाना मिल जायगा।

मातादीन कै कर चुकने के बाद निर्जीव-सा जमीन पर लेट गया, मानो कमर टूट गई हो, मानो डूब भरने के लिए चुल्लू-भर पानी खोज रहा हो। जिस मर्यादा के बल पर उसकी रसिकता और घमंड और पुरुषार्थ अकड़ता फिरता था, वह मिट चुकी थी। उस हड्डी के टुकड़े ने उसके मुंह को ही नहीं, उसकी आत्मा को भी अपवित्र कर दिया था। उसका धर्म इसी खान-पान, छूत-विचार पर टिका हुआ था। आज उस धर्म की जड़ कट गई। अब वह लाख प्रायश्चित्त करे, लाख गोबर खाए और गंगाजल पिए, लाख दान-पुण्य और तीर्थ-व्रत करे, उसका मरा हुआ धर्म जी नहीं सकता। अगर अकेले की बात होती, तो छिपा ली जाती। यहां तो सबके सामने उसका धर्म लुटा। अब उसका सिर हमेशा के लिए नीचा हो गया। आज से वह अपने ही घर में अछूत समझा जाएगा। उसकी स्नेहमयी माता भी उससे घृणा करेगी। और संसार से धर्म का ऐसा लोप हो गया कि इतने आदमी केवल खड़े तमाशा देखते रहे। किसी ने चूं तक न की। एक क्षण पहले जो लोग उसे देखते ही पालागन करते थे, अब उसे देखकर मुंह फेर लेंगे। वह किसी मंदिर में भी न जा सकेगा, न किसी के बरतन-भांडे छू सकेगा। और यह सब हुआ इस अभागिन सिलिया के कारण।

सिलिया जहां अनाज ओसा रही थी, वहीं सिर झुकाए खड़ी थी, मानो यह उसी की दुर्गति हो रही है। सहसा उसकी मां ने आकर डांटा-खड़ी ताकती क्या है? चल सीधे घर, नहीं बोटी-बोटी काट डालूंगी। बाप-दादा का नाम तो खूब उजागर कर चुकी, अब क्या करने पर लगी है?

सिलिया मूर्तिवत् खड़ी रही। माता-पिता और भाइयों पर उसे क्रोध आ रहा था। यह लोग क्यों उसके बीच में बोलते हैं? वह जैसे चाहती है, रहती है, दूसरों से क्या मतलब? कहते हैं, यहां तेरा अपमान होता है, तब क्या कोई बांभन उसका पकाया खा लेगा? उसके हाथ का पानी पी लेगा? अभी जरा देर पहले उसका मन मातादीन के निष्ठुर व्यवहार से खिन्न हो रहा था, पर अपने घर वालों और बिरादरी के इस अत्याचार ने उस विराग को प्रचंड अनुराग का रूप दे दिया। [ २३२ ]

विद्रोह-भरे मन से बोली-मैं कहीं नहीं जाऊंगी। तू क्या यहां भी मुझे जीने न देगी?

बुढ़िया कर्कश स्वर से बोली-तू न चलेगी?

'नहीं।'

'चल सीधे से।'

'नहीं जाती।'

तुरंत दोनों भाइयों ने उसके हाथ पकड़ लिए और उसे घसीटते हुए ले चले। सिलिया जमीन पर बैठ गई। भाइयों ने इस पर भी न छोड़ा। घसीटते ही रहे। उसकी साड़ी फट गई, पीठ और कमर की खाल छिल गई, पर वह जाने पर राजी न हुई।

तब हरखू ने लड़कों से कहा-अच्छा, अब इसे छोड़ दो। समझ लेंगे मर गई, मगर अब जो कभी मेरे द्वार पर आई तो लहू पी जाऊंगा।

सिलिया जान पर खेलकर बोली-हां, जब तुम्हारे द्वार पर आऊं तो पी लेना।

बुढ़िया ने क्रोध के उन्माद में सिलिया को कई लातें जमाईं और हरखू ने उसे हटा न दिया होता, तो शायद प्राण ही लेकर छोड़ती।

बुढ़िया फिर झपटी, तो हरखू ने उसे धक्के देकर पीछे हटाते हुए कहा-तू बड़ी हत्यारिन हैं कलिया। क्या उसे मार ही डालेगी?

सिलिया बाप के पैरों से लिपटकर बोली-मार डालो दादा, सब जने मिलकर मार डालो। हाय अम्मां, तुम इतनी निर्दयी हो, इसीलिए दूध पिलाकर पाला था? सौर में ही क्यों न गला घोंट दिया? हाय। मेरे पीछे पंडित को भी तुमने भिरस्ट कर दिया। उसका धरम लेकर तुम्हें क्या मिला? अब तो वह भी मुझे न पूछेगा। लेकिन पूछे न पूछे, रहूंगी तो उसी के साथ। वह मुझे चाहे भूखों रखे, चाहे मार डाले, पर उसका साथ न छोड़ूंगी। उसकी इतनी सांसत कराके कैसे छोड़ दूं? मर जाऊंगी, पर हरजाई न बनूंगी। एक बार जिसने बांह पकड़ ली, उसी की रहूंगी।

कलिया ने होठ चबाकर कहा-जाने दो रांड को। समझती है, वह इसका निबाह करेगा, मगर आज ही मारकर भगा न दे तो मुंह न दिखाऊं।

भाइयों को भी दया आ गई। सिलिया को वहीं छोड़कर सब-के-सब चले गए। तब वह धीरे-से उठकर लंगड़ाती, कराहती, खलिहान में आकर बैठ गई और अंचल में मुंह ढांपकर रोने लगी। दातादीन ने जुलाहे का गुस्सा डाढ़ी पर उतारा-उनके साथ चली क्यों न गई सिलिया। अब क्या करवाने पर लगी हुई है? मेरा सत्यानास करके भी न पेट नहीं भरा।

सिलिया ने आंसू-भरी आंखें ऊपर उठाई। उनमें सेज की झलक थी।

'उनके साथ क्यों जाऊं? जिसने बांह पकड़ी है, उसके साथ रहूंगी।'

पंडितजी ने धमकी दी-मेरे घर में पांव रखा, तो लातों से बात करूंगा।

सिलिया ने उद्दंडता से कहा-मुझे जहां वह रखेंगे, वहां रहूंगी। पेड़ तले रखें चाहे महल में रखें।

मातादीन संज्ञाहीन-सा बैठा था। दोपहर होने को आ रहा था। धूप पत्तियों से छन छनकर उसके चेहरे पर पड़ रही थी। माथे से पसीना टपक रहा था। पर वह मौन, निस्पंद बैठा हुआ था।

सहसा जैसे उसने होश में आकर कहा-मेरे लिए अब क्या कहते हो दादा? [ २३३ ]

दातादीन ने उसके सिर पर हाथ रखकर ढाढस देते हुए कहा-तुम्हारे लिए अभी मैं क्या कहूं बेटा? चलकर नहाओ,खाओ, फिर पंडितों की जैसी व्यवस्था होगी, वैसा किया जाएगा। हां, एक बात है, सिलिया को त्यागना पड़ेगा।

मातादीन ने सिलिया की ओर रक्त-भरे नेत्रों से देखा—मैं अब उसका कभी मुंह न देखूंगा, लेकिन परासचित हो जाने पर फिर तो कोई दोस न रहेगा?

'परासचित हो जाने पर कोई दोस-पाप नहीं रहता।'

'तो आज ही पंडितों के पास जाओ।'

'आज ही जाऊंगा बेटा।'

'लेकिन पंडित लोग कहें कि इसका परासचित नहीं हो सकता, तब?'

'उनकी जैसी इच्छा।'

'तो तुम मुझे घर से निकाल दोगे?'

दातादीन ने पुत्र-स्नेह से विह्वल होकर कहा-ऐसा कहीं हो सकता है, बेटा। धन जाय, धरम जाय, लोक-मरजाद जाय, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता।

मातादीन ने लकड़ी उठाई और बाप के पीछे-पीछे घर चला। सिलिया भी उठी और लंगड़ाती हुई उसके पीछे हो ली।

मातादीन ने पीछे फिरकर निर्मम स्वर में कहा-मेरे साथ मत आ। मेरा तुझमे कोई वास्ता नहीं। इतनी सांसत रचा के भी तेरा पेट नहीं भरता।

सिलिया ने धृष्टता के साथ उसका हाथ पकड़कर कहा-वास्ता कैसे नहीं है? इसी गांव में तुमसे धनी, तुमसे सुंदर, तुमसे इज्जतदार लोग हैं। मैं उनका हाथ क्यों नहीं पकड़ती? तुम्हारी यह दुरदसा ही आज क्यों हुई? जो रस्सी तुम्हारे गले पड़ गई है, उसे तुम लाख चाहो, नहीं तोड़ सकते। और न मैं तुम्हें छोड़कर कहीं जाऊंगी। मजूरी करूंगी, भीख मांगूगी, लेकिन तुम्हें न छोड़ूंगी।

यह कहते हुए उसने मातादीन का हाथ छोड़ दिया और फिर खलिहान में जाकर अनाज ओसाने लगी। होरी अभी तक वहां अनाज मड़ रहा था। धनिया उसे भोजन करने के लिए बुलाने आई थी। होरी ने बैलों को पैरे से बाहर निकालकर एक पेड़ में बांध दिया और सिलिया से बोला-तू भी जा, खा-पी आ सिलिया। धनिया यहां बैठी है। तेरी पीठ पर की साड़ी तो लहू से रंग गई है रे। कहीं घाव पक न जाय। तेरे घर वाले बड़े निरदयी हैं।

सिलिया ने उसकी ओर करुण नेत्रों से देखा-यहां निरदयी कौन नहीं हैं, दादा। मैंने तो किसी को दयावान् नहीं पाया।

'क्या कहा पंडित ने?'

'कहते हैं, मेरा तुमसे कोई वास्ता नहीं।'

'अच्छा। ऐसा कहते हैं।'

'समझते होंगे, इस तरह अपने मुंह की लाली रख लेंगे, लेकिन जिस बात को दुनिया जानती है, उसे कैसे छिपा लेंगे? मेरी रोटियां भारी हैं, न दें। मेरे लिए क्या? मजूरी अब भी करती हूं, तब भी करूंगी। सोने को हाथ-भर जगह तुम्हीं से मागूंगी तो क्या तुम न दोगे?'

धनिया दयार्द्र होकर बोली-जगह की कौन कमी है बेटी? तू चल मेरे घर रह।

होरी ने कातर स्वर में कहा-बुलाती तो है, लेकिन पंडित को जानती नहीं? [ २३४ ]

धनिया ने निर्भीक स्वर में कहा-बिगड़ेंगे तो एक रोटी बेसी खा लेंगे, और क्या करेंगे। कोई उसकी दबैल हूं? उसकी इज्जत ली, बिरादरी से निकलवाया, अब कहते हैं, मेरा तुझसे कोई वास्ता नहीं। आदमी है कि कसाई। यह उसकी नीयत का आज फल मिला है। पहले नहीं सोच लिया था। तब तो बिहार करते रहे। अब कहते हैं, मुझसे कोई वास्ता नहीं।'

होरी के विचार में धनिया गलत कर रही थी। सिलिया के घर वालों ने मतई को कितना बेधरम कर दिया, यह कोई अच्छा काम नहीं किया। सिलिया को चाहे मारकर ले जाते, चाहे दुलारकर ले जाते। वह उनकी लड़की है। मतई को क्यों बेधरम किया?

धनिया ने फटकार बताई-अच्छा रहने दो, बड़े न्यायी बनते हो। मरद-मरद सब एक होते हैं। इसको मतई ने बेधरम किया, तब तो किसी को बुरा न लगा। अब जो मतई बेधरम हो गए तो क्यों बुरा लगता है। क्या सिलिया का धरम, धरम ही नहीं? रखी तो चमारिन, उस पर नेक धरमी बनते हैं। बड़ा अच्छा किया हरखू चौधरी ने। ऐसे गुंडों की यही सजा है। तू चल सिलिया मेरे घर। न जाने कैसे बेदरद मां-बाप हैं कि बेचारी की सारी पीठ लहूलुहान कर दी। तुम जाके सोना को भेज दो। मैं इसे लेकर आती हूं।

होरी घर चला गया और सिलिया धनिया के पैरों पर गिरकर रोने लगी।


चौबीस

सोना सत्रहवें साल में थी और इस साल उसका विवाह करना आवश्यक था। होरी तो दो साल से इसी फिक्र में था, पर हाथ खाली होने से कोई काबू न चलता था। मगर इस साल जैसे भी हो, उसका विवाह कर देना ही चाहिए, चाहे कर्ज लेना पड़े, चाहे खेत गिरों रखने पड़े। और अकेले होरी की बात चलती, तो दो साल पहले ही विवाह हो गया होता। वह किफायत से काम करना चाहता था। पर धनिया कहती थी, कितना ही हाथ बांधकर खर्च करो, दो-ढाई सौ लग जायंगे। झुनिया के आ जाने से बिरादरी में इन लोगों का स्थान कुछ हेठा हो गया था और बिना सौ-दो सौ दिये कोई कुलीन बर न मिल सकता था। पिछले साल चैती में कछ मिला था तो पंडित दातादीन का आधा साझा, मगर पंडितजी ने बीज और मजूरी का कुछ ऐसा ब्यौरा बताया कि होरी के हाथ एक-चौथाई से ज्यादा अनाज न लगा। और लगान देना पड़ गया पूरा। ऊख और सन की फसल नष्ट हो गई, सन तो वर्षा अधिक होने और ऊब दीमक लग जाने के कारण। हां, इस साल चैती अच्छी थी और ऊख भी खूब लगी हुई थी। विवाह के लिए गल्ला तो मौजूद था, दो सौ रुपये भी हाथ आ जायं। तो कन्या-ऋण से उसका उद्धार हो जाय। अगर गोबर सौ रुपये की मदद कर दे, तो बाकी सौ रुपये होरी को आसानी से मिल जायंगे। झिंगुरीसिंह और मंगरू साह दोनों ही अब कुछ नर्म पड़ गए थे। जब गोबर परदेश में कमा रहा है, तो उनके रुपये मारे न जा सकते थे।

एक दिन होरी ने गोबर के पास दो-तीन दिन के लिए जाने का प्रस्ताव किया।

मगर धनिया अभी तक गोबर के वह कठोर शब्द न भूली थी। वह गोबर से एक पैसा भी न लेना चाहती थी, किसी तरह नहीं।