बिरजा

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
बिरजा  (1891) 
द्वारा राधाचरण गोस्वामी

[  ]


बिरजा ।

( उपन्यास)

श्रीराधाचरण गोस्वामी :

द्वारा

बजभाषा में अनुवादित।

_____

प्रियमम्याम: मुरादाशिचकम्गाम् ।

बगन्यूमानानाम शबानां स्त्रोतती यथा ॥

(श्रीमद्भागवतम् )

(भारतेन्दु)

विविधविषय विभूषित मानिकपत्र ।

-:५][ का ७, ८.८, १०, ११, १

जागग्य १ जुलाई, अगम्त, सिपम्बर, प्रायोवर,

नोवेम्बर, डिसेम्बर सन् १८८१ ई.)

अन्यकार की मुद्रा व्यतीत पुस्तके चोरी की है।

_______

काशी

तिजीपन यन्वालय वाबू रामनपायर्मा अधिर

______

सन् १८८१ ई.।

[  ]
प्रिय पाठक

हम आये तो हैं, पर मुंह छिपाये हुये! क्यों शर्म के मारे। हम झूँठे, झूँठे, महाझूँठे। पर पेशादारी की झूँठ माफ़! दर्जी, सुनार, लोहार, प्रेमवाले, पर इनकी झूठ सच से बढ़कर है। हमने मुंह जरूर छिपाया पर ज़रा मुंह खोल कर तो देखिये। अब की हम वकवाद न करके एक उत्तम उपन्यास आपके लिए लाये है कहिए देर क्यों? हम बहुत छोटे हैं, वर्षा बूंदों के भय से घर में बैठे रहे अब शरद आते ही हमारा प्रकाश हो गया। हमने सोचा, बार बार किसी के घर जाना अच्छा नहीं एक बार ही जो हो, फैसला कर देंगे। अब हम आपके आगे हैं जो चाहे सो हमारा कर लीजिये। खैर, यह १ वर्ष तो जैसे तैसे काटकर पूरा किया, आप से अनृण हुये। आगे "गढ़ भाव्यं तद् भविष्यति"।

आपका चिरवाधि
चिर अपराधी
भारतेन्दु

[  ]
बिरजा
(उपन्यास)

श्रीराधाचरण गोस्वामि कर्तृक अनुवादित।

प्रथमाध्याय।

आषाढ़ मास है; समय एक पहर भर मात्र दिन शेष है, आकाश के उत्तर पूर्व कोण में एक खण्ड वृहत् नील मेघ सज रहा है, उसके इतस्ततः कई एक क्षुद्र वारिदखण्ड छूट रहे हैं। भगवान् कमलिनीपति ज्यों ज्यों अस्ताचल शिखरावलम्बी होने लगे, वृहत् वारिदखण्ड भी त्यों त्यों वृहत होने लगा। ग्राम में जैसे किसी के बलवान और क्षमताशाली होने से पांच जन उसके शरणागत हो जाते हैं उसी प्रकार क्षुद्रकाय वारिदखण्ड समूह भी देखते देखते वृहत वारिदखण्ड के संग मिल गये। सूर्य्य-किरणों से मेघ समूह का पश्चिम प्रान्त रक्तवर्ण हो गया। झड़ वृष्टि के आगमन का पूर्व लक्षण देखकर गगनविहारी बिहङ्गम धीरे २ निम्न गमन करने लगे। दो एक श्वेतकाय पक्षी वारिदखण्ड को विद्रूप करने के छल से उसके इधर उधर फिरने लगे। नदी और पतिव्रता नारी का एक ही स्वभाव है। जैसे स्वामी का मुख विषण्ण देखने से पत्नी [  ] का बदनकमल भी विपन्न हो जाता है, वैसे ही वारिद खण्ड को कृष्णकाय देखकर पतितपावनी भागीरथी भी कृष्णकाय हो गईं।

इस समय एक नौका गङ्गा में होकर नवद्वीप से कलकत्ते के अभिमुख जाती थी। वह नौका आषाढ़ मास की गङ्गा के तीक्ष्ण स्रोत के वेग में पूर्व पर होकर द्रुत गमन से जा रही थी, आरोही लोग छप्पर के भीतर थे और अति असमय में आहार करके सो रहे थे। आकाश में जो निविड़ कृष्णवर्ण मेघ छा रहा है यह उनलोगों ने नहीं देखा जिस स्थान में होकर नौका जाती थी, वह स्थान ऐमे विपद् के समय नौका ठहरने के उपयुक्त नहीं थी। आकाश में जो कृष्णकाय मेघ उपस्थित हो रहा था उसे नौका के केवल एक प्रधान माझी ने देखा और देखते ही बड़ा भयभीत हुआ उपयुक्त स्थान पाने से वह उसी क्षण नौका ठहरा देता, परन्तु स्थान नहीं था। इसी समय जो लोग नौका की सन्मुख दिशा में बैठकर बल्ली चला रहे थे, उनमें से एक जन ने अनुच्चैःस्वर से माझी से सम्बोधन करके कहा कि "दादा क्या अनुमान करते हो?" माझी ने कहा "और क्या अनुमान करूँगा देखते नहीं हो कि सब पक्षी नाच रहे हैं?" पश्चात् भाग से आरोही लोग कहीं न सुन लें और सुन करके भीत न हों इस निमित्त उन्होंने अनुच्चैः स्वर [  ] से बात चीत की, परन्तु वह उनलोगों के निकट अव्यक्त नहीं रही।

नौका में सभी सो रहे थे केवल एक बालिका जागती थी। आकाश में क्या हो रहा है यह कुछ उसने नहीं देखा, परन्तु गङ्गा का जल अत्यन्त कृष्णवर्ण देखकर वह चमत्कृत और भीत हो गई। अब वह मांझियों की बात चीत सुनकर आपही आप कहने लगी कि "गङ्गा का जल ऐसा क्यों हो गया? ज्ञात होता है आकाश में बादल हुआ है"। उसकी बात एक जन युवक आरोही के कान में पड़ी वह आकाश में बादल होने की बात सुनतेही चौंक कर उठ बैठा। नाव का आवरण (पर्दा) खोलकर देखा तो पूर्व और उत्तर दिशा में भयानक बादल हो रहा है। वह भृत्य को तम्बाकू भरने की आज्ञा देकर छप्पर पर चढ़ गया। वहां वैठकर सोचने लगा। युवक बड़ा भीत हो गया था। यदि वह इस समय एकाकी इस नौका में होता, तो इतना भीत न होता पर उसके संग में दो स्त्रियें थीं।

भृत्य ने हुक्का बाबू के हाथ में दिया। बाबू हुक्का पीते पीते मांझी से बोले "जहां कहीं हो एक ठौर नौका ठहरा दो"। मांझी ने कहा "महाराज! इस पार नौका रखने की ठौर नहीं है, और यहां से दो कोस और आगे चलने पर भी इस पार नौका ठहराने का स्थान नहीं [  ] पावेंगे, यदि आज्ञा हो तो उस पार जाकर नौका खड़ी कर दें"। बाबू ने कहा "पार चलने का अब समय नहीं है पार चलते २ बीच मेंही जल झड़ आय कर गिर सकती है इससे इस पारही नौका ठहरा दो"। नौका में एक मनुष्य पूर्व बङ्गाल अञ्चल का मुसलमान था। वह बाबू की बात से विरक्त होकर कहने लगा कि "इस पार क्या जान खुवाने के लिये नाव ठहराओगे? अल्लाह वेली है उस पार नाव ले चलो जो नसीब में होगा आप से आप हो रहैगा" इसकी बात सुनकर बाबू को क्रोध आया और कहने लगे कि "मांझी! इसकी बात मत सुनो क्योंकि नौका डूबने से इनलोगों को तो कुछ भय हैही नहीं यह लोग तो जल जन्तु होते हैं'। बसरुद्दीन, बाबू की बात सुनकर बड़े क्रोध से कहने लगा "बाबू! बात कहो गाली क्यों देते हो? और जो मैं कुसूर करूँ मुझे गाली दो देश के लोगों को क्यों गाली देते हो? हमें गाली दो हम सह सकते हैं, देश के लोगों को गाली देने से हमारे दिल में चोट लगती है"।

मांझी ने बसरुद्दीन को दो एक मिन्ट भर्त्सना करके चुप किया। अनन्तर बाबू से कहा कि "बाबू पूर्व में पवन है, देखते देखते पार पहुँच जायँगे डर नहीं है"। मांझी आप डरता था तथापि बाबू से कहा कि "डर नहीं है"। मनुष्य का यह स्वभावही है कि आप विषद सागर में गिर कर और से कहता है कि "डर नहीं है"। [  ] बाबू ने मांझी की बात सुनकर कुछ उत्तर नहीं दिया पर मांझी उनका मौनभाव सम्मति लक्षण जानकर पार ले चला। वह मुसल्मान लोग पाल खोलकर खड़े हो गये, और "अल्लाह अल्लाह" कहकर नौका से जल गेरने लगे।

नौका के अभ्यन्तर स्त्रियों में एक बालिका और एक मध्य वयस की थी। बालिका ने उस स्त्री से पूछा कि "जीजी! तुम तैरना जानती हो?" उसने कहा "यद्यपि मेरा जन्म वक्रेश्वर नदी के तीर का है किन्तु मैं तैरना कुछ नहीं जानती।" बालिका ने फिर पूछा "यदि नौका डूबै तो क्या करोगी?" उसने कहा "ऐसी बात न कहना चाहिये स्थिर होकर बैठी रहो"।

ऐसे समय पूर्व दिशा में प्रबल वेग से वायु चलने लगी और उन्के मंगहों संग वही २ बूंदों से वृष्टि आई। गङ्गाजल के ऊपर 'चड़ चड़' शब्द से और नौका के छप्पर के ऊपर 'चटाम् चटास' शब्द से जल पड़ने लगा।

पाल में दमका वायु लगने से नाव डगमगाने लगी और उसमें बिस्तर जल भर गया। मध्या भय से कांपती थी, और त्राहि रव से गङ्गाजी को पुकारने लगी। एक जन मुसलमान ने नौका के जल गेरने का प्रारम्भ किया और सब पाल की डोरी पकड़कर खड़े रहे।

बाबू हुक्का हाथ में लेकर नीचे उतरे और नौका डूबने [  ] के समय जिस प्रकार सहज में बाहर जा पहुँचें ऐसे स्थान में खड़े रहे, बाबू की यह दशा देखकर बसरुद्दीन निकट आय कर कहने लगा "बाबू! तुम्हें डर लगता है? डरो मत, यदि नाव डूबै, तो हमारे रहते नहीं मरोगे"।

चारों ओर अन्धकार करके भयानक झड़ वृष्टि होने लगी। नदी का कूल नहीं दृष्ट होता था। विपद निश्चित जानकर सब ईश्वर का नाम लेने लगे। युवक नास्तिक था, परन्तु इस समय उसने भी विपदबान्धव ईश्वर के ऊपर आत्मसमर्पण किया। इति मध्य में पुनर्वार दमका वायु ने आकर नौका जलमग्न कर दीं।

द्वितीयाध्याय।

गंगा के उभय तीर गंगा यात्रियों के वास करने के लिये स्थान स्थान में घर बने हुये हैं उन्हें "मुर्दे का घर" कहते हैं। किसी को जीवन संशय पीड़ा होने से उसके आत्मीय लोग उसे वहां लाकर उसी घर में रखते हैं, गंगाप्रदेश के अति दूरवर्ती स्थानों में भी मरणासन्न पीड़ित लोग इसी भांति गंगा तीर पर लाये जाते हैं।

पाठक को उस समय हमारे संग एक मुर्दे के घर में जाना होगा। यह देखो! एक पट्टे पर एक जन वृद्ध प्राण संशय पीड़ित होकर पड़ा है। उसकी शय्या के पार्श्व में उसके दो पुत्र बैठे हैं। और यह वृद्धा जो आसन्नमरण [  ] व्यक्ति के मस्तक में हस्तप्रचार कर रही है, यह वृद्ध की पत्नी है। अटाह व्यतीत हुआ कि इस पीड़ित व्यक्ति को यहां लाये हैं। जलहिलोल में पीड़ा के किञ्चित् उपशम होने से वृद्ध के आत्मीय लोग अत्यन्त भावनायुक्त हुये, क्योंकि गंगायात्रा के पीछे किसी व्यक्ति के मरण न होने से इस देश में बड़े कष्ट का विषय होता है। बहु व्यय से प्रायश्चित करके उस दुर्भाग्य व्यक्ति को घर में ले जाना पड़ता है। तब भी एक अख्याति रही आती है। किन्तु आज झड़ वृष्टि देखकर वृद्ध के आत्मीय लोग बड़े सन्तुष्ट हैं। उन्होंने वृद्ध को गंगाजल में स्नान कराय कर दधि भात खिलाया। इस पर भी जिस घर में वृद्ध को रक्खा है उसके सब द्वार खोल दिये हैं उन खुले द्वारों में होकर विलक्षण सिग्ध मारुतहिकोल ब्टह में प्रवेश करता है इन सब कारणों से वृद्ध की नाड़ी अत्यन्त क्षीण हो गई। एक जन कविराज ने (जो निकट में था) नाड़ी पकड़कर कहा 'अब विशेष विलम्ब नहीं है।" सब जने वृद्ध के प्राणप्रयाण की प्रतीक्षा में बैठेही थे कि इतने में कविराज की अनुमति पाकर वे लोग उसे गंगाजल में ले गये। उस्को नाभिदेशपर्व्यन्त गंगाजल में रखकर और मस्तक पर गंगाजल और गंगामृत्तिका रख कर (कफ का जोर बढ़ाकर) सब जने हरिनाम करने लगे। [ १० ] रात्रि दोपहर थी, इस समय दृष्टि निवारण हो गई। केवल वेग से शीतल वायु चल रही थी। वृद्ध के लिये चिता प्रस्तुत थी, केवल उस्की मृत्यु होतेही सब बानक बन जाता अनेक क्षण के पीछे उसके कठिन निर्लज्ज प्राणों ने प्रयाण किया। शास्त्रविहित कर्म करके उसकी देह चिता पर रक्खी। चिता वायुभर से जल उठी। वृद्ध की पत्नी चिता से अनति दूर गंगातीर पर बैठकर अनुञ्चस्वर से रोदन करने लगी।

कदाचित हमारे नव्यदल के पाठक कहेंगे कि “यह स्त्री बड़ी निर्लज्ज है। जिसे प्रथम बलपूर्वक मारा अब उसके लिये क्यों रोती है?" हम ऐसे पाठकों को अनुरोध करते हैं कि वह गङ्गासागर में सन्तानविसर्जन करने की कथा स्मरण करें। जो आर्थ्यमाता पुत्र के विद्याशिक्षा के लिये विदेश जाने पर रो रो कर अस्थिर होती हैं वही एक समय धर्म के अनुरोध से छाती में पाषाण बांधकर अपने हाथ से सन्तानविसर्जन करती थीं। धर्म के अनुरोध से स्त्रियेंही क्यों? पुरुष क्या नहीं कर सकते हैं? और क्या नहीं किया है।

झड़ वृष्टि थम गई है आकाश में बड़े २ नक्षत्र निकल आये हैं, अनन्त नील नभोमण्डल में शशधर दिखाई दे रहा है, भागीरथी की तरंगें नाना रंग से नक्षत्रशशधर[ ११ ] शोभित आकाशमण्डल की छवि हृदय में धारण करके वृत्य करतीं करती सागर के सम्मुख जा रही हैं।

पण्डित लोग कहते हैं कि इस जगत का धन मान सभी अस्थायी है, पर हम कहते हैं कि शोक दुःख भी अस्थायी है। काल में सभी सहा जाता है। वृद्धा का शोकावेग भी अनेक हास को पहुंचा। वह रोदन परित्याग कर के नीरव बैठी थो, और मन मन में कुछ भावना कर रही थी इतनेही में पासही किसी स्त्री का अनुच्च रोदन सुना। प्रथमबार सुनकर कुछ ठहरा नहीं सकी इस निमित्त फिर मन देकर सुना। जाना गया कि एक स्त्री का रोदन शब्द है। वृद्धा ने अपने कनिष्ट पुत्र को पुकारा 'गंगाधर' गंगा धर माता के निकट आया। वृद्धा ने अंगुलिनिर्देश करके कहा 'इस दिशा में स्त्री का रोदन सुना जाता है, मेरे संग आ, देखें। माता पुत्र दोनों जने चले, वहां जाय कर देखा तो एक बालिका नदी के तोर बालू के टीले पर पड़ी है, अगुञ्च रोदन कर रही है। उस रोदन करने की शक्ति कदाचित् न होगी।

वृद्धा ने अत्यन्त व्यस्तता से निकट जाय कर उसे पकड़ कर उठाते २ कहा 'बेटी! तू कौन है?" बालिका ने कुछ उत्तर नहीं दिया हाथ बढ़ाकर वृद्धा का हाथ पकड़ लिया किन्तु वृद्धा को उसके उठाने में असमर्थ देखकर गंगाधर [ १२ ]ने उसे उठाकर गोद में ले लिया। वृद्धा ने कहा इसे उसके पास ले चलो। चलते वृद्धा ने बालिका से पूंछा "बेटी! तेरी यह दशा कैसे हुई?” बालिका ने अति अस्फुट स्वर से कहा 'नौका डूब गई" वृद्धा ने समझा कि वैकालिक झड़ ने इसकी यह दशा कर दी। चिता को पास आय कर वृद्धा ने अपनी स्वतन्त्र आंच बलाई। एक जने से एक शुष्क वस्त्र मंगवाकर बालिका को पहिनाया और उसे अग्नि के निकट बिठाकर सेकने का आरम्भ किया। बहुत सेंकते २ बालिका का शरीर किञ्चित उषा हुआ। वृद्धा ने देखा बालिका परम सुन्दरी है और शरीर में नये नये गहने भी हैं। इस समय उसने जिज्ञासा किया कि "ऐरी तेरा नाम क्या है?" बालिका ने उत्तर दिया "मेरा नाम बिरजा है।" वृद्धा ने बालिका के अई शुष्क केश पोंछते २ पुनर्वार जिज्ञासा की कि "तेरे आत्मीय कौन हैं?" बालिका ने रोते रोते कहा "हम बाह्याण है।” वृद्धा ने उस की सांत्वना करके कहा "रो मत, अभी मेरे घर चल खोज करके मैं तुझे तेरे बाप के घर भेज दूंगी और तुझे अपनी बेटी के समान रक्खूंगी।

अनेक क्षण पीछे शवदाह शेष हुआ। शास्त्र कृत्य सम्पादन करके सब जनों ने उस मुर्दे के घर में जाय कर अवशिष्ट रात्रियापन की, पर दिन प्रात:काल गंगास्नान


PD-icon.svg यह कार्य भारत में सार्वजनिक डोमेन है क्योंकि यह भारत में निर्मित हुआ है और इसकी कॉपीराइट की अवधि समाप्त हो चुकी है। भारत के कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अनुसार लेखक की मृत्यु के पश्चात् के वर्ष (अर्थात् वर्ष 2021 के अनुसार, 1 जनवरी 1961 से पूर्व के) से गणना करके साठ वर्ष पूर्ण होने पर सभी दस्तावेज सार्वजनिक प्रभावक्षेत्र में आ जाते हैं।

यह कार्य संयुक्त राज्य अमेरिका में भी सार्वजनिक डोमेन में है क्योंकि यह भारत में 1996 में सार्वजनिक प्रभावक्षेत्र में आया था और संयुक्त राज्य अमेरिका में इसका कोई कॉपीराइट पंजीकरण नहीं है (यह भारत के वर्ष 1928 में बर्न समझौते में शामिल होने और 17 यूएससी 104ए की महत्त्वपूर्ण तिथि जनवरी 1, 1996 का संयुक्त प्रभाव है।

Flag of India.svg