सामग्री पर जाएँ

भ्रमरगीत-सार/१२५-ऊधो! बेगि मधुबन जाहु

विकिस्रोत से

​

राग नट
ऊधो! बेगि मधुबन जाहु।

जोग लेहु संभारि अपनो बेंचिए जहँ लाहु[१]॥
हम बिरहिनी नारि हरि बिनु कौन करै निबाहु?
तहां दीजै मूर पूजै[२], नफा कछु तुम खाहु॥

​

जौ नहीं ब्रज में बिकानो नगरनारि बिसाहु।
सूर वै सब सुनत लैहैं जिय कहा पछिताहु॥१२५॥

  1. ↑ लाहु=लाभ।
  2. ↑ मूर पूजै=मूल धन निकल आए।