भ्रमरगीत-सार/१५०-मधुकर! जानत नाहिंन बात
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फूँकि फूँकि हियरा सुलगावत उठि न यहाँ तें जात॥
जो उर बसत जसोदानंदन निगुन कहाँ समात?
कत भटकत डोलत कुसुमन को तुम हौ पातन पात?
जदपि सकल बल्ली बन बिहरत जाय बसत जलजात[१]।
सूरदास ब्रज मिले बनि आवै? दासी की कुसलात॥१५०॥