भ्रमरगीत-सार/३८६-चित दै सुनौ स्याम प्रबीन
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बनारस: साहित्य-सेवा-सदन, पृष्ठ २२६
चित दै सुनौ, स्याम प्रबीन!
हरि तिहारे बिरह राधे मैं जो देखी छीन।
कहन को संदेस सुंदरि गवन मो तन कीन॥
छुटी छुद्रावलि[१], चरन अरुझे, गिरी बलहीन।
बहुरि उठी सँभारि, सुभट ज्यों परम साहस कीन॥
बिन देखे मनमोहन मुखरो सब सुख उनको दीन।
सूर हरि के चरन-अंबुज रहीं आसा-लीन॥३८६॥